📋 इस अध्याय में
- पृष्ठभूमि — गुप्त पतन के बाद उत्तर भारत की राजनीतिक शून्यता (Background)
- गुप्तोत्तर छोटे राज्य — मौखरि वंश एवं कन्नौज का उदय (Maukharis of Kannauj)
- पुष्यभूति/वर्धन वंश की उत्पत्ति — थानेश्वर (Origin of the Pushyabhuti Dynasty)
- राज्यवर्धन की हत्या — शशांक का षड्यंत्र (Assassination of Rajyavardhana)
- हर्षवर्धन का राज्यारोहण एवं मौखरि राज्य का विलय (Accession of Harsha)
- हर्षवर्धन का साम्राज्य-विस्तार — भौगोलिक सीमा (Extent of Harsha's Empire)
- हर्षवर्धन बनाम पुलकेशिन द्वितीय — नर्मदा का युद्ध (Battle on the Narmada)
- हर्षवर्धन का प्रशासन — सामंती-विकेंद्रीकृत व्यवस्था (Administration of Harsha)
- धार्मिक नीति — कन्नौज सभा एवं प्रयाग महामोक्ष परिषद (Kannauj Assembly & Prayag Parishad)
- ह्वेनसांग (युवानच्वांग) का भारत-विवरण (Xuanzang's Account)
- हर्षवर्धन साहित्यकार एवं साहित्य-संरक्षक के रूप में (Harsha as Author & Patron)
- नालंदा विश्वविद्यालय हर्षकाल में (Nalanda under Harsha)
- हर्षवर्धन के बाद पतन — वांग स्वान त्से घटना (Decline after Harsha)
- दक्षिण भारत की पृष्ठभूमि — इक्ष्वाकु, वाकाटक, कदंब, गंग वंश (Minor Southern Dynasties)
- पल्लव वंश — उत्पत्ति एवं प्रमुख शासक (Origin & Rulers of the Pallavas)
- कलभ्र विद्रोह — दक्षिण भारत की सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल (The Kalabhra Revolt)
- चालुक्य वंश (वातापी) — उत्पत्ति एवं पुलकेशिन द्वितीय (Chalukyas of Badami)
- चालुक्य-पल्लव संघर्ष — वातापीकोंड (Chalukya-Pallava Rivalry)
- पल्लव प्रशासन एवं समाज — कोट्टम, ऊर-सभा-नगरम व्यवस्था (Pallava Administration & Society)
- चालुक्य प्रशासन एवं समाज (Chalukya Administration & Society)
- पल्लव कला — महाबलीपुरम रथ एवं शोर मंदिर (Pallava Art & Architecture)
- चालुक्य कला — ऐहोल, बादामी, पट्टडकल — UNESCO धरोहर (Chalukya Art — UNESCO Heritage)
- साहित्य — दोनों राज्यों का योगदान (Literature under Chalukyas & Pallavas)
- नवीनतम पुरातात्विक शोध (Latest Research & Archaeological Updates)
- तुलनात्मक तालिका — चालुक्य बनाम पल्लव (Comparative Table)
- कालक्रम तालिका (Timeline)
छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य का दृश्य — हूण आक्रमणों व यशोधर्मन के विद्रोह से टूटा हुआ गुप्त साम्राज्य अब केवल इतिहास की बात बन चुका है। उत्तर भारत छोटे-छोटे राज्यों में बिखर गया है — मौखरि वंश कन्नौज पर, पुष्यभूति वंश थानेश्वर (हरियाणा) पर, और गौड़ का शशांक बंगाल पर राज कर रहा है। ऐसे ही एक राज्य — थानेश्वर — में राजा प्रभाकरवर्धन का छोटा पुत्र हर्षवर्धन बड़ा हो रहा है। किसे पता था कि यही युवक आगे चलकर उत्तर भारत को एक बार फिर एकता के सूत्र में बाँधेगा, और चीन से आया एक बौद्ध भिक्षु — ह्वेनसांग — उसके दरबार का ऐसा वर्णन लिखेगा जो आज भी इतिहासकारों के लिए सोने की खान है।
परंतु हर्षवर्धन की कहानी शुरू होती है एक त्रासदी से — उनके बड़े भाई राज्यवर्धन को धोखे से मरवा दिया जाता है, और उनकी बहन राज्यश्री जंगलों में भटकने को मजबूर हो जाती है। इसी संकट के बीच हर्षवर्धन सिंहासन पर बैठते हैं और अगले 41 वर्षों तक ऐसा शासन करते हैं कि उन्हें "उत्तर भारत का अंतिम महान हिंदू सम्राट" कहा जाने लगा। और जब हर्ष की सेना नर्मदा नदी पर दक्षिण के चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय से टकराई, तो पहली बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा — यही वह क्षण था जब भारत का इतिहास औपचारिक रूप से "उत्तर बनाम दक्षिण" के दो अलग रंगमंचों में बँट गया। आइए, इस अध्याय में गुप्तोत्तर उत्तर भारत, हर्षवर्धन के स्वर्णिम शासन, तथा दक्षिण भारत की दो महान शक्तियों — चालुक्य व पल्लव — की पूरी कहानी को विस्तार से समझें।
1पृष्ठभूमि — गुप्त पतन के बाद उत्तर भारत की राजनीतिक शून्यता (Background)
छठी शताब्दी के मध्य तक गुप्त साम्राज्य की साम्राज्यिक गरिमा समाप्त हो चुकी थी — हूण आक्रमण, यशोधर्मन का विद्रोह व सामंतों के उदय ने उत्तर भारत को दोबारा अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित कर दिया। लगभग आधा दर्जन सामंत-वंशों ने गुप्त साम्राज्य के विभिन्न भागों को आपस में बाँट लिया।
- उत्तर व पश्चिम भारत में लगभग 500 ई. से श्वेत हूणों (White Hunas) का प्रभुत्व स्थापित हुआ, जो कश्मीर, पंजाब व पश्चिम भारत तक फैला।
- गुप्तोत्तर काल में उभरे प्रमुख राज्यों में मौखरि (कन्नौज), पुष्यभूति/वर्धन (थानेश्वर), मैत्रक (वल्लभी, गुजरात), गौड़ (बंगाल — शशांक), तथा दक्षिण में वाकाटक, कदंब, गंग, इक्ष्वाकु, पल्लव व चालुक्य प्रमुख थे।
- इनमें से थानेश्वर में शासनरत एक वंश ने आगे चलकर संपूर्ण उत्तर भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया — इसका नेतृत्व करने वाले शासक हर्षवर्धन (606-647 ई.) थे।
2गुप्तोत्तर छोटे राज्य — मौखरि वंश एवं कन्नौज का उदय (Maukharis of Kannauj)
मौखरि वंश ने गंगा-यमुना के विशाल मैदानी क्षेत्र पर लगभग एक शताब्दी तक कन्नौज (उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद ज़िले में स्थित) से शासन किया। छठी शताब्दी के मध्य में मौखरियों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की — कन्नौज छठी शताब्दी के उत्तरार्ध से राजनीतिक महत्व की दृष्टि से उभरा।
- कन्नौज दोआब के ठीक मध्य में स्थित था तथा सातवीं शताब्दी में सुदृढ़-किलेबंद था — यहाँ से स्थल व जल दोनों मार्गों से दोआब के पूर्वी व पश्चिमी दोनों भागों पर नियंत्रण रखना सरल था। इसीलिए हर्ष के समय से कन्नौज का सत्ता-केंद्र बनना उत्तर भारत में सामंती युग (feudal age) के आगमन का प्रतीक माना जाता है, जबकि पाटलिपुत्र पूर्व-सामंती (pre-feudal) व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता था।
- मौखरि वंश के अंतिम शासक ग्रहवर्मन (लगभग 600-605 ई.) थे, जिनका विवाह थानेश्वर के पुष्यभूति वंश की राजकुमारी राज्यश्री (हर्षवर्धन की बहन) से हुआ था — इस विवाह-गठबंधन ने दोनों राज्यों को निकट ला दिया, जो आगे हर्ष के उत्थान में निर्णायक सिद्ध हुआ।
3पुष्यभूति/वर्धन वंश की उत्पत्ति — थानेश्वर (Origin of the Pushyabhuti Dynasty)
पुष्यभूति (या वर्धन) वंश की स्थापना थानेश्वर (आधुनिक हरियाणा) में हुई — प्रारंभ में यह मौखरियों का एक सामंत राज्य था, परंतु धीरे-धीरे शक्तिशाली होता गया।
📜 प्रभाकरवर्धन (Prabhakaravardhana) (हर्षवर्धन के पिता)
✍️ रचनाकार: शासनकाल: छठी शताब्दी का अंतिम भाग प्रभाकरवर्धन ने थानेश्वर राज्य को सुदृढ़ किया तथा हूणों, गुर्जरों, गांधार व सिंधु क्षेत्र के शासकों के विरुद्ध सैन्य-सफलता प्राप्त की — उनके शासनकाल में पुष्यभूति वंश की सैन्य-शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इनकी पुत्री राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरि शासक ग्रहवर्मन से हुआ, जबकि उनके दो पुत्र — राज्यवर्धन (ज्येष्ठ) व हर्षवर्धन (कनिष्ठ) — आगे चलकर वंश की बागडोर सँभालने वाले थे।
4राज्यवर्धन की हत्या — शशांक का षड्यंत्र (Assassination of Rajyavardhana)
प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र राज्यवर्धन (605-606 ई.) थानेश्वर के शासक बने — परंतु उनका शासनकाल एक वर्ष से भी कम समय तक चल सका, जो एक अत्यंत नाटकीय व दुखद घटनाक्रम में समाप्त हुआ।
- मालवा के शासक देवगुप्त ने कन्नौज के मौखरि शासक ग्रहवर्मन (राज्यवर्धन के बहनोई) पर आक्रमण कर उनकी हत्या कर दी तथा राज्यश्री को बंदी बना लिया।
- अपनी बहन को मुक्त कराने व मौखरि साम्राज्य की रक्षा हेतु राज्यवर्धन ने कन्नौज की ओर कूच किया तथा मार्ग में मालवा की सेना को पराजित किया (संभवतः देवगुप्त का वध भी किया)।
- परंतु लौटते समय बंगाल (गौड़) के महत्वाकांक्षी शासक शशांक ने, जो उत्तर-भारतीय राजनीति में पश्चिम की ओर विस्तार करना चाहता था, राज्यवर्धन को छल-पूर्वक (treacherously) आमंत्रित कर उनकी हत्या करवा दी — यह गुप्तोत्तर उत्तर भारतीय राजनीति की सबसे नाटकीय घटनाओं में से एक मानी जाती है।
- राज्यश्री इस दौरान बंदीगृह से भागकर विंध्य के घने जंगलों में शरण लेने को मजबूर हुईं — बाणभट्ट के "हर्षचरित" में इस पूरे प्रकरण का विस्तृत व मार्मिक वर्णन मिलता है।
5हर्षवर्धन का राज्यारोहण एवं मौखरि राज्य का विलय (Accession of Harsha)
📜 हर्षवर्धन (Harshavardhana) (पुष्यभूति वंश का सबसे महान व अंतिम शक्तिशाली शासक)
✍️ रचनाकार: शासनकाल: 606-647 ई. (लगभग 41 वर्ष) भाई राज्यवर्धन की हत्या के बाद हर्षवर्धन मात्र 16 वर्ष की आयु में थानेश्वर के सिंहासन पर बैठे। उन्होंने सर्वप्रथम अपनी बहन राज्यश्री को जंगलों से सकुशल खोज निकाला (जो आत्मदाह करने ही वाली थीं) तथा शशांक के विरुद्ध प्रतिशोध की नीति अपनाई। चूँकि मौखरि वंश का कोई प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी शेष नहीं बचा था, इसलिए मौखरि राज्य (कन्नौज सहित) हर्षवर्धन के राज्य में विलीन हो गया — उन्होंने कन्नौज को अपनी राजधानी व सत्ता का केंद्र बनाया, थानेश्वर के स्थान पर।
- हर्षवर्धन ने प्रारंभ में "राजा" व बाद में "महाराजाधिराज" जैसी उपाधियाँ धारण कीं — उन्हें इतिहासकारों ने प्रायः "उत्तर भारत का अंतिम महान हिंदू सम्राट" कहा है, यद्यपि यह उपाधि केवल आंशिक रूप से ही सटीक है, क्योंकि उनका साम्राज्य मौर्य या गुप्त साम्राज्य जितना केंद्रीकृत व विशाल नहीं था।
6हर्षवर्धन का साम्राज्य-विस्तार — भौगोलिक सीमा (Extent of Harsha's Empire)
हर्षवर्धन ने अपने शासनकाल में उत्तर भारत के लगभग समूचे भू-भाग (कश्मीर को छोड़कर) पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया — राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार व उड़ीसा सीधे उनके नियंत्रण में थे, जबकि उनका प्रभाव-क्षेत्र इससे भी कहीं व्यापक था।
- दक्षिण की ओर हर्ष का सैन्य-अभियान नर्मदा नदी पर जाकर रुक गया, जहाँ चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय (जो आधुनिक कर्नाटक व महाराष्ट्र के अधिकांश भाग पर बादामी से शासन करते थे) ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया — यह गुप्तोत्तर भारतीय इतिहास की सबसे निर्णायक सैन्य-घटनाओं में से एक थी (देखें अगला अनुभाग)।
7हर्षवर्धन बनाम पुलकेशिन द्वितीय — नर्मदा का युद्ध (Battle on the Narmada)
लगभग 618-619 ई. में हर्षवर्धन ने दक्षिण भारत में अपने साम्राज्य के विस्तार का प्रयास किया, परंतु नर्मदा नदी के तट पर चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय ने उनकी सेना को करारी शिकस्त दी — यह एकमात्र प्रमुख युद्ध था जिसमें हर्ष को पराजय का सामना करना पड़ा।
- इस विजय की जानकारी हमें पुलकेशिन द्वितीय के राजकवि रविकीर्ति द्वारा रचित "ऐहोल प्रशस्ति" (Aihole Prashasti/Inscription) से मिलती है — इस अभिलेख के अनुसार पुलकेशिन ने "परमेश्वर" की उपाधि धारण करने वाले हर्ष को हराकर उन्हें दक्कन की ओर बढ़ने से रोक दिया।
- इस पराजय के परिणामस्वरूप नर्मदा नदी उत्तर भारत (हर्ष के साम्राज्य) व दक्षिण भारत (चालुक्य साम्राज्य) के बीच एक स्थायी राजनीतिक सीमा-रेखा के रूप में स्थापित हो गई — इतिहासकार इसे भारतीय इतिहास में "उत्तर-दक्षिण विभाजन" की एक प्रतीकात्मक शुरुआत मानते हैं।
💡 आसान भाषा में समझें
सोचिए दो बड़े स्कूलों के सबसे मज़बूत खिलाड़ी आपस में भिड़ें — एक उत्तर भारत का चैंपियन (हर्ष) और दूसरा दक्षिण भारत का चैंपियन (पुलकेशिन)। जब उत्तर का चैंपियन हार जाता है, तो एक अदृश्य रेखा (नर्मदा नदी) दोनों के प्रभाव-क्षेत्रों को हमेशा के लिए अलग कर देती है — ठीक ऐसा ही हुआ 618-619 ई. के आसपास, जिसने आगे सदियों तक उत्तर व दक्षिण भारत की अलग-अलग राजनीतिक धाराओं को आकार दिया।
8हर्षवर्धन का प्रशासन — सामंती-विकेंद्रीकृत व्यवस्था (Administration of Harsha)
हर्षवर्धन का प्रशासन गुप्तों की तुलना में और भी अधिक सामंती (feudal) व विकेंद्रीकृत (decentralized) था — इतिहासकार यह मानते हैं कि राज्य-कर्मचारियों को भूमि-अनुदान देकर पारिश्रमिक देने की प्रथा हर्ष के काल में स्पष्ट रूप से स्थापित हुई प्रतीत होती है।
| पक्ष | विवरण |
|---|
| भूमि-अनुदान प्रथा | मंत्रियों व उच्च राजकीय अधिकारियों को भूमि प्रदान की जाती थी — पुरोहितों को विशेष सेवाओं हेतु भूमि-अनुदान की परंपरा जारी रही, साथ ही अधिकारियों को भी अब चार्टर (charter) द्वारा भूमि प्रदान की जाने लगी |
| राजस्व-विभाजन (ह्वेनसांग के अनुसार) | हर्ष का राजस्व चार बराबर भागों में विभाजित होता था — (1) राजा के व्यक्तिगत व्यय हेतु, (2) विद्वानों को अनुदान हेतु, (3) अधिकारियों व लोक-सेवकों के पारिश्रमिक हेतु, (4) धार्मिक/पुण्य कार्यों हेतु |
| सैन्य-शक्ति | हर्ष की सैन्य-शक्ति मुख्यतः सामंतों के सहयोग पर निर्भर थी, जो सैनिक व घोड़े दोनों उपलब्ध कराते थे — इस प्रकार एक विशाल व दुर्जेय सेना बनाए रखना संभव हुआ |
| कानून-व्यवस्था | ह्वेनसांग के अनुसार कानून-व्यवस्था अपेक्षाकृत कमज़ोर थी — स्वयं ह्वेनसांग को यात्रा के दौरान लूटा गया था; चोरी को द्वितीय राजद्रोह (treason) के समान गंभीर अपराध माना जाता था, जिसके लिए चोर का दाहिना हाथ काट दिया जाता था |
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9धार्मिक नीति — कन्नौज सभा एवं प्रयाग महामोक्ष परिषद (Kannauj Assembly & Prayag Parishad)
हर्षवर्धन प्रारंभ में शैव (शिव के उपासक) थे, परंतु धीरे-धीरे महायान बौद्ध धर्म के प्रबल संरक्षक बन गए — फिर भी उन्होंने अपने संपूर्ण शासनकाल में एक सहिष्णु धार्मिक नीति (सर्वधर्म समभाव) अपनाई।
🏛️ कन्नौज सभा (लगभग 643 ई.)
- उद्देश्य: महायान बौद्ध सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार तथा चीनी यात्री ह्वेनसांग का सम्मान
- लगभग 20 अधीनस्थ राजाओं, हज़ारों विद्वानों, 3000+ बौद्ध भिक्षुओं, 3000 ब्राह्मणों व जैनियों की भागीदारी
- बौद्ध धर्म-केंद्रित एक विशिष्ट धार्मिक-विद्वत् सभा
🙏 प्रयाग महामोक्ष परिषद
- गंगा-यमुना संगम (प्रयाग) पर प्रत्येक पाँच वर्ष में आयोजित होने वाला विशाल दान-समारोह
- क्रमिक दिनों में बुद्ध, सूर्य व शिव — तीनों की पूजा-अर्चना की जाती थी
- बौद्धों, ब्राह्मणों व जैनियों — सभी संप्रदायों के अनुयायियों में उदारतापूर्वक दान-वितरण, जिसमें राजा अपना संपूर्ण व्यक्तिगत खज़ाना तक दान कर देते थे
ध्यान दें: परीक्षा में अक्सर इन दोनों सभाओं को मिलाकर भ्रम पैदा किया जाता है — कन्नौज सभा विशेष रूप से महायान बौद्ध धर्म के प्रचार व ह्वेनसांग के सम्मान हेतु थी, जबकि प्रयाग महामोक्ष परिषद एक व्यापक बहु-धार्मिक दान-उत्सव था, जो हर पाँच वर्ष में होता था — दोनों को अलग-अलग स्पष्ट रूप से याद रखें।
10ह्वेनसांग (युवानच्वांग) का भारत-विवरण (Xuanzang's Account)
📜 ह्वेनसांग / युवानच्वांग (Hiuen Tsang/Xuanzang) (चीनी बौद्ध भिक्षु व यात्री)
✍️ रचनाकार: भारत आगमन: 629 ई., प्रस्थान: 645 ई. (लगभग 15 वर्ष भारत में प्रवास) ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध दर्शन के गहन अध्ययन हेतु भारत आए थे। उनका यात्रा-वृत्तांत हर्षकालीन दरबार, सामाजिक-आर्थिक जीवन व धार्मिक संप्रदायों पर फाह्यान के विवरण से भी कहीं अधिक समृद्ध, विस्तृत व विश्वसनीय माना जाता है। उनके विवरण से यह भी पता चलता है कि पाटलिपुत्र व वैशाली जैसे प्राचीन नगर पतनोन्मुख अवस्था में थे, जबकि प्रयाग व कन्नौज (दोआब क्षेत्र) राजनीतिक-आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरे थे — यह गुप्तोत्तर काल में सत्ता-केंद्र के स्थानांतरण का स्पष्ट प्रमाण है।
- ह्वेनसांग के अनुसार ब्राह्मण व क्षत्रिय वर्ग सामान्यतः सादा जीवन व्यतीत करते थे, जबकि कुलीन वर्ग व पुरोहित विलासितापूर्ण जीवन जीते थे — यह विवरण गुप्तोत्तर सामाजिक विषमता की एक झलक देता है।
- ह्वेनसांग ने शूद्रों को कृषक के रूप में वर्णित किया — यह उल्लेखनीय है क्योंकि इससे गुप्तकाल से चली आ रही परंपरा (शूद्रों के कृषक-वर्ग में परिवर्तन) की निरंतरता स्पष्ट होती है।
- अस्पृश्य वर्ग (जैसे सफ़ाईकर्मी व जल्लाद) गाँव के बाहर निवास करते थे — यह गुप्तकालीन सामाजिक कठोरता की निरंतरता को दर्शाता है।
- ह्वेनसांग के भारत-प्रवास के समय बौद्ध धर्म 18 संप्रदायों में विभाजित हो चुका था तथा बौद्ध धर्म के पुराने केंद्र पतनोन्मुख स्थिति में थे — यह दर्शाता है कि हर्ष के व्यक्तिगत संरक्षण के बावजूद बौद्ध धर्म समग्र रूप से गिरावट की ओर था।
11हर्षवर्धन साहित्यकार एवं साहित्य-संरक्षक के रूप में (Harsha as Author & Patron)
- हर्षचरित (Harshacharita) — हर्षवर्धन के राजकवि बाणभट्ट द्वारा अलंकृत (ornate) संस्कृत गद्य-शैली में रचित यह ग्रंथ हर्ष के प्रारंभिक जीवन का अत्यंत प्रशंसात्मक व विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है — यह संस्कृत गद्य-काव्य (biography) का प्रारंभिक व उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
- हर्ष स्वयं भी एक कुशल नाटककार थे — उन्होंने तीन संस्कृत नाटकों की रचना की: "प्रियदर्शिका", "रत्नावली" व "नागानंद" (जो बौद्ध विषय-वस्तु पर आधारित है) — यद्यपि कुछ इतिहासकार इस बात पर बहस करते हैं कि क्या ये नाटक वास्तव में स्वयं हर्ष द्वारा रचित थे या उनके दरबारी कवियों द्वारा, परंतु परंपरागत रूप से इनका श्रेय हर्ष को ही दिया जाता है।
- हर्ष स्वयं एक उदार साहित्य-संरक्षक थे — उन्होंने विद्वानों व साहित्यकारों को पुरस्कृत व संरक्षित किया, जिससे उनके दरबार में विद्वानों का जमावड़ा बना रहा।
12नालंदा विश्वविद्यालय हर्षकाल में (Nalanda under Harsha)
📍 नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda University) (बिहार (कुमारगुप्त प्रथम द्वारा स्थापित, हर्षकाल में चरम))
⏰ काल: हर्षवर्धन का शासनकाल — बौद्ध शिक्षा का चरम केंद्र
⭐ महत्व: हर्ष के शासनकाल में नालंदा अपने चरम वैभव पर पहुँचा — यहाँ लगभग 10,000 छात्र (सभी भिक्षु) महायान बौद्ध दर्शन का अध्ययन करते थे। मठ का संपूर्ण खर्च लगभग 200 गाँवों के राजस्व से वहन होता था — यह गुप्तोत्तर काल के सबसे विशाल मठ-संस्थानों में से एक था। ह्वेनसांग स्वयं यहाँ अध्ययनरत रहे तथा भारत लौटते समय अनेक बौद्ध ग्रंथ अपने साथ चीन ले गए।
- 670 ई. में एक अन्य चीनी यात्री इत्सिंग (I-Tsing) ने भी नालंदा की यात्रा की — उनके अनुसार उस समय नालंदा में लगभग 3000 भिक्षु निवास करते थे, जो ह्वेनसांग के समय की तुलना में कम संख्या दर्शाता है — यह इस बात का संकेत हो सकता है कि हर्ष के बाद बौद्ध धर्म को मिलने वाला राजकीय संरक्षण घटने लगा था।
13हर्षवर्धन के बाद पतन — वांग स्वान त्से घटना (Decline after Harsha)
हर्षवर्धन की मृत्यु (647 ई.) के बाद उनका साम्राज्य तेज़ी से बिखर गया — इसका मुख्य कारण यह था कि हर्ष का कोई प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी नहीं था तथा उनकी अत्यंत सामंती (feudal) प्रशासनिक संरचना किसी सुदृढ़ केंद्रीय नियंत्रण के अभाव में लंबे समय तक टिक नहीं सकी।
- हर्ष के मंत्री अर्जुन (कुछ स्रोतों में अरुणाश्व) ने सत्ता हथिया ली तथा चीनी दूत वांग स्वान त्से (Wang Xuance) के नेतृत्व वाले शांति-मिशन पर आक्रमण कर दिया — इस पर वांग स्वान त्से नेपाल व तिब्बत से सैन्य सहायता लेकर लौटे तथा अर्जुन को पराजित कर बंदी बना लिया — यह घटना हर्ष के बाद उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
- हर्ष साम्राज्य के विघटन के बाद उत्तर भारत पुनः अनेक क्षेत्रीय शक्तियों (यशोवर्मन-कन्नौज, प्रतिहार, पाल, राष्ट्रकूट आदि) में विभाजित हो गया — यह आगे "त्रिपक्षीय संघर्ष" (Tripartite Struggle) के युग की पृष्ठभूमि बना, जिसका विस्तृत अध्ययन आगामी अध्याय में किया जाएगा।
14दक्षिण भारत की पृष्ठभूमि — इक्ष्वाकु, वाकाटक, कदंब, गंग वंश (Minor Southern Dynasties)
चालुक्य व पल्लव जैसी बड़ी शक्तियों के उदय से पहले दक्षिण व मध्य भारत में अनेक छोटे राजवंशों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई — इनकी संक्षिप्त जानकारी आगे के अध्ययन हेतु आवश्यक है।
| राजवंश | काल एवं विवरण |
|---|
| इक्ष्वाकु (Ikshvaku) | लगभग 225-340 ई. — सातवाहनों के पतन के बाद कृष्णा-गुंटूर क्षेत्र में उदय; नागार्जुनकोंडा व धरणीकोटा में इनके स्मारक मिलते हैं; इन्होंने ही कृष्णा-गुंटूर क्षेत्र में भूमि-अनुदान प्रथा (ताम्रपत्र चार्टर) प्रारंभ की, जो आगे पल्लवों ने अपनाई |
| वाकाटक (Vakataka) | लगभग 250-500 ई. — उत्तर महाराष्ट्र व विदर्भ में सातवाहनों के उत्तराधिकारी, ब्राह्मण कुल के व वैदिक धर्म के प्रबल समर्थक; चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक राजकुमार से करवाकर गुजरात-विजय में सहयोग प्राप्त किया था; सांस्कृतिक रूप से वाकाटकों ने उत्तर भारतीय ब्राह्मणवादी विचारों को दक्षिण भारत तक पहुँचाने में सेतु की भूमिका निभाई |
| कदंब (Kadamba) | लगभग 345-540 ई. — संस्थापक मयूरशर्मन, राजधानी वैजयंती/बनवासी (कर्नाटक); जनश्रुति के अनुसार कांची में शिक्षा प्राप्ति के दौरान अपमानित होने पर मयूरशर्मन ने विद्रोह कर पल्लवों को पराजित किया; इन्होंने 18 अश्वमेध यज्ञ किए तथा ब्राह्मणों को अनेक गाँव दान में दिए |
| गंग (पश्चिमी गंग/मैसूर के गंग) | लगभग 250-1004 ई. — दक्षिण कर्नाटक में स्थापित, अधिकांश समय पल्लवों के सामंत रहे; प्रारंभिक राजधानी कोलार (स्वर्ण-खदानों के कारण समृद्ध); जैन धर्म को विशेष संरक्षण दिया |
15पल्लव वंश — उत्पत्ति एवं प्रमुख शासक (Origin & Rulers of the Pallavas)
पल्लव वंश ने इक्ष्वाकुओं के पतन के बाद दक्षिण भारत में लगभग 275-897 ई. तक शासन किया — "पल्लव" शब्द संस्कृत में "लता/बेल" (creeper) का अर्थ रखता है, जो तमिल शब्द "तोंडई" का संस्कृत रूपांतरण माना जाता है। पल्लवों का मूल क्षेत्र "तोंडईनाडु" (बेलों की भूमि) कहलाता था। इनका शासन-क्षेत्र दक्षिणी आंध्र प्रदेश व उत्तरी तमिलनाडु तक फैला था, तथा इनकी राजधानी काँची (आधुनिक कांचीपुरम) मंदिरों व वैदिक शिक्षा का समृद्ध केंद्र बनी।
👑 सिंहवर्मन (Simhavarman) (लगभग 280-335 ई.) पल्लव वंश के आरंभिक व प्रभावी शासक
- इक्ष्वाकु शासक रुद्रपुरुषदत्त को पराजित कर तटीय आंध्र प्रदेश में पल्लव सत्ता स्थापित की (लगभग 300 ई.)
- शिवस्कंदवर्मन (चतुर्थ शताब्दी के प्रारंभ में) को आरंभिक पल्लवों में सबसे महान शासक माना जाता है
👑 सिंहविष्णु (Simhavishnu) (छठी शताब्दी का उत्तरार्ध) साम्राज्यवादी पल्लव युग (Imperial Pallavas) के संस्थापक
- कलभ्रों को पराजित कर पल्लव सत्ता को पुनर्जीवित किया तथा "साम्राज्यवादी पल्लव युग" की नींव रखी
- इनके बाद से पल्लव वंश एक क्षेत्रीय शक्ति से एक साम्राज्यिक शक्ति में परिवर्तित हुआ
👑 महेंद्रवर्मन प्रथम (Mahendravarman I) (590-630 ई.) बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न शासक, चालुक्य-पल्लव संघर्ष के प्रारंभकर्ता
- कला, संगीत व वास्तुकला में गहरी रुचि रखने वाले "बहुमुखी प्रतिभा" (versatile genius) शासक
- इनके शासनकाल में ही दीर्घकालिक चालुक्य-पल्लव संघर्ष का प्रारंभ हुआ
- संस्कृत हास्य-नाटक "मत्तविलासप्रहसन" के रचयिता — स्वयं एक कुशल नाटककार
👑 नरसिंहवर्मन प्रथम "महामल्ल" (Narasimhavarman I) (630-668 ई.) चालुक्य-विजेता, महाबलीपुरम के निर्माता
- उपाधि — "महामल्ल"/"मामल्ल" (महान योद्धा); इसी नाम पर महाबलीपुरम का प्राचीन नाम "मामल्लपुरम" पड़ा
- 642 ई. में चालुक्य राजधानी वातापी पर अधिकार कर पुलकेशिन द्वितीय का वध किया — उपाधि धारण की "वातापीकोंड" (वातापी-विजेता)
- श्रीलंका के सिंहली राजकुमार मानवर्मन को पुनः राजगद्दी दिलाने हेतु सैन्य-अभियान भेजा
- इनके शासनकाल में ह्वेनसांग ने पल्लव राजधानी काँची की यात्रा की तथा वहाँ हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध व जैन धर्म के भी फलने-फूलने का उल्लेख किया
- महाबलीपुरम की स्थापना तथा प्रसिद्ध एकाश्मक रथों (Monolithic Rathas) के निर्माण का श्रेय इन्हें जाता है
👑 अन्य महत्वपूर्ण पल्लव शासक
- महेंद्रवर्मन द्वितीय (668-670 ई.) — अत्यंत अल्पकालिक शासन, चालुक्य विक्रमादित्य प्रथम द्वारा मारे गए
- परमेश्वरवर्मन प्रथम (670-695 ई.) — चालुक्यों व उनके सहयोगी गंगों पर निर्णायक विजय प्राप्त की
- नरसिंहवर्मन द्वितीय "राजसिंह" (695-722 ई.) — शांतिपूर्ण शासनकाल, महाबलीपुरम का शोर मंदिर व काँची का कैलाशनाथ मंदिर निर्मित करवाया
🏛️ नंदिवर्मन द्वितीय व पल्लव पतन
- नंदिवर्मन द्वितीय (731-795 ई.) — विष्णु-भक्त, विद्या के महान संरक्षक, काँची का वैकुंठ पेरुमल मंदिर बनवाया
- चालुक्य विक्रमादित्य द्वितीय के आक्रमण व अस्थायी काँची-अधिग्रहण से पल्लव पतन की शुरुआत हुई
- अंततः चोल शासक आदित्य प्रथम ने अपराजितवर्मन को पराजित कर काँची पर अधिकार किया — इसी के साथ पल्लव सत्ता का अंत हुआ
16कलभ्र विद्रोह — दक्षिण भारत की सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल (The Kalabhra Revolt)
पल्लवों ने ब्राह्मणों को कर-मुक्त भूमि-अनुदान (ब्रह्मदेय) की उदार प्रथा अपनाई — आरंभिक पल्लवों के लगभग 16 भूमि-चार्टर मिलते हैं, जिनमें से एक चतुर्थ शताब्दी के चार्टर में ब्राह्मणों को 18 प्रकार की छूटें (immunities) प्रदान की गई हैं।
- युद्ध, कला-साहित्य के संरक्षण, धार्मिक कार्यों व प्रशासनिक तंत्र के लिए आवश्यक संसाधन मुख्यतः किसान-वर्ग से ही जुटाए जाते थे — भूमि-अनुदान से ब्राह्मण वर्ग एक शक्तिशाली वर्ग के रूप में उभरा, जो सीधे किसानों से कर वसूलता था तथा राजा द्वारा वसूले गए कर का एक बड़ा भाग भी उपहार-स्वरूप प्राप्त करता था — इससे किसान-वर्ग पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ता गया।
- इसी बढ़ते असंतोष के परिणामस्वरूप छठी शताब्दी में कलभ्रों के नेतृत्व में एक व्यापक विद्रोह हुआ — कलभ्रों को परंपरागत स्रोतों में "दुष्ट शासक" (evil rulers) कहा गया है, जिन्होंने अनेक राजाओं को उखाड़ फेंका तथा तमिल भूमि पर अपना नियंत्रण स्थापित किया।
- कलभ्रों ने अनेक गाँवों में ब्राह्मणों को दिए गए ब्रह्मदेय अधिकार समाप्त कर दिए — यह दर्शाता है कि यह विद्रोह विशेष रूप से तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था (ब्राह्मण-प्रभुत्व) के विरुद्ध निर्देशित था।
- इस विद्रोह को दबाने में पल्लव, पांड्य व वातापी के चालुक्य — तीनों प्रमुख शक्तियों को संयुक्त प्रयास करना पड़ा — यह इस बात का प्रमाण है कि कलभ्र विद्रोह कितना व्यापक व गंभीर था। कहा जाता है कि कलभ्रों ने चोल, पांड्य व चेर — तीनों परंपरागत तमिल राजवंशों के शासकों को बंदी भी बना लिया था।
17चालुक्य वंश (वातापी) — उत्पत्ति एवं पुलकेशिन द्वितीय (Chalukyas of Badami)
चालुक्य वंश ने छठी शताब्दी के प्रारंभ में पश्चिमी दक्कन में अपनी सत्ता स्थापित की — इनकी राजधानी वातापी (आधुनिक बादामी, कर्नाटक के बीजापुर ज़िले में) थी। इस मुख्य शाखा ने लगभग दो शताब्दियों (543-757 ई.) तक वातापी से शासन किया, जब तक कि इनके सामंत राष्ट्रकूटों ने इन्हें अपदस्थ नहीं कर दिया।
- चालुक्यों ने स्वयं को ब्रह्मा, मनु अथवा चंद्रमा से उत्पन्न तथा अयोध्या के प्राचीन शासकों का वंशज होने का दावा किया — यह दावा मुख्यतः राजनीतिक वैधता व सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने हेतु किया गया था, ऐतिहासिक रूप से यह पूर्णतः प्रमाणित नहीं है।
📜 पुलकेशिन द्वितीय (Pulakeshin II) (चालुक्य वंश का सबसे महान शासक)
✍️ रचनाकार: शासनकाल: लगभग 609-642 ई. पुलकेशिन द्वितीय ने अपने चाचा से राज्य प्राप्त किया (उत्तराधिकार की सामान्य पितृ-पुत्र परंपरा से भिन्न) — उनकी उपलब्धियों की जानकारी हमें उनके राजकवि रविकीर्ति द्वारा रचित "ऐहोल प्रशस्ति" से मिलती है, जो चार पीढ़ियों की वंशावली का भी उल्लेख करती है। रविकीर्ति के अनुसार पुलकेशिन ने पश्चिमी व पूर्वी दोनों तटों पर सैन्य-अभियान चलाए, हर्षवर्धन को नर्मदा तट पर रोका, तथा पल्लव शासक को काँची की दीवारों के पीछे शरण लेने पर मजबूर किया।
- पुलकेशिन द्वितीय ने बनवासी के कदंब शासकों को अपदस्थ किया तथा मैसूर के गंग शासकों को अपनी अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया।
- लगभग 610 ई. में उन्होंने कृष्णा-गोदावरी के मध्य क्षेत्र (वेंगी प्रांत) पर विजय प्राप्त की, जहाँ उन्होंने अपने वंश की एक शाखा स्थापित की, जो "वेंगी के पूर्वी चालुक्य" (Eastern Chalukyas of Vengi) कहलाई।
- पुलकेशिन का प्रथम पल्लव-अभियान लगभग सफल रहा (पल्लवों ने उत्तरी प्रांत सौंपकर शांति खरीदी), परंतु उनका दूसरा पल्लव-आक्रमण असफल रहा — अंततः 642 ई. में पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने वातापी पर अधिकार कर पुलकेशिन का वध कर दिया (देखें अगला अनुभाग)।
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18चालुक्य-पल्लव संघर्ष — वातापीकोंड (Chalukya-Pallava Rivalry)
कृष्णा व तुंगभद्रा नदियों के मध्य स्थित उपजाऊ भूमि पर आधिपत्य को लेकर चालुक्यों व पल्लवों के बीच लगभग छठी से आठवीं शताब्दी तक एक दीर्घकालिक संघर्ष चलता रहा — इस संघर्ष में मदुरै-तिन्नेवेली क्षेत्र के पांड्य शासक भी समय-समय पर शामिल होते रहे।
| घटनाक्रम | विवरण |
|---|
| पुलकेशिन द्वितीय का आक्रमण (लगभग 610-630 ई.) | कदंब व गंग शासकों को अधीन किया, हर्ष को नर्मदा पर रोका, वेंगी विजय की, तथा पल्लव राजधानी तक पहुँचकर उन्हें उत्तरी प्रांत सौंपने पर मजबूर किया |
| नरसिंहवर्मन प्रथम का प्रतिशोध (642 ई.) | पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने वातापी पर अधिकार कर पुलकेशिन द्वितीय का वध किया — उपाधि धारण की "वातापीकोंड" (वातापी-विजेता); चोल, चेर, पांड्य व कलभ्रों को भी पराजित किया |
| विक्रमादित्य प्रथम का पुनरुत्थान | पुलकेशिन के उत्तराधिकारी विक्रमादित्य प्रथम ने पल्लवों को वातापी से बाहर निकाला तथा साम्राज्य में स्थिरता बहाल की |
| विक्रमादित्य द्वितीय का आक्रमण (733-745 ई.) | काँची पर तीन बार आक्रमण किया, तथा 740 ई. में पल्लवों को पूर्णतः पराजित किया |
| राष्ट्रकूट दांतिदुर्ग का उदय (753/757 ई.) | चालुक्यों के सामंत राष्ट्रकूट दांतिदुर्ग ने अंतिम वातापी चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन द्वितीय को अपदस्थ कर चालुक्य आधिपत्य समाप्त किया |
19पल्लव प्रशासन एवं समाज — कोट्टम, ऊर-सभा-नगरम व्यवस्था (Pallava Administration & Society)
- पल्लव प्रशासन राजतंत्रात्मक था — शासक "धर्म-महाराज" की उपाधि धारण करते थे, जो यह दर्शाती थी कि वे धर्मानुसार (righteously) शासन करते हैं।
- राज्य को "कोट्टम" नामक इकाइयों में विभाजित किया गया था, जिनका प्रबंधन राजा द्वारा नियुक्त अधिकारी करते थे — ग्राम प्रशासन की मूल इकाई था तथा स्थानीय स्वायत्त सभाएँ (autonomous assemblies) गाँव के मामलों का संचालन करती थीं।
| ग्राम-प्रकार | विवरण |
|---|
| ऊर (Ur) | सामान्य कृषक-जाति बहुल ग्राम, जो भूमि पर सामूहिक अधिकार रखते थे — ग्राम-मुखिया कर एकत्र कर राजा को अदा करने हेतु उत्तरदायी था; मुख्यतः दक्षिणी तमिलनाडु में पाए जाते थे |
| सभा (Sabha) | ब्रह्मदेय (ब्राह्मणों को दान में दी गई) व अग्रहार ग्राम — यहाँ ब्राह्मण भूस्वामी व्यक्तिगत अधिकार रखते हुए भी सामूहिक रूप से गतिविधियाँ संचालित करते थे |
| नगरम (Nagaram) | व्यापारियों व वणिकों का ग्राम — व्यापार में गिरावट के कारण व्यापारी वर्ग गाँवों की ओर स्थानांतरित हुआ, जिससे इस प्रकार के ग्राम अस्तित्व में आए |
- भू-राजस्व आय का प्रमुख स्रोत था — इसके अतिरिक्त पेशों, विवाहों, नमक-चीनी-वस्त्र निर्माण तथा बोझ ढोने वाले पशुओं पर भी कर लगाए जाते थे।
- अधिकांश पल्लव शासक वैष्णव व शैव दोनों मतों के अनुयायी थे — वे स्वयं को "धर्म-महाराज" के साथ-साथ अश्वमेध व वाजपेय जैसे वैदिक यज्ञों के संरक्षक भी मानते थे, जिसने वैदिक धर्म के पुनरुत्थान का मार्ग प्रशस्त किया।
- सातवीं शताब्दी से नयनार (शैव संत) व आलवार (वैष्णव संत) संतों के प्रभाव से शैव व वैष्णव भक्ति आंदोलन का विकास हुआ — फलस्वरूप बौद्ध व जैन धर्म को राजकीय संरक्षण व जन-समर्थन दोनों में गिरावट का सामना करना पड़ा, यद्यपि ह्वेनसांग के अनुसार वे पल्लव राज्य में तब भी सक्रिय थे।
- सामाजिक स्रोतों में विनयवती व विजयांका जैसी विधवाओं का उल्लेख मिलता है, जिससे संकेत मिलता है कि सती-प्रथा इस काल में अनुपस्थित रही होगी — साथ ही मंदिरों में देवदासी प्रथा का भी प्रारंभ इसी काल में हुआ।
20चालुक्य प्रशासन एवं समाज (Chalukya Administration & Society)
| पक्ष | विवरण |
|---|
| कर-व्यवस्था | हेर्जुंक, किरुकुल, बिल्कोड व पन्नय नामक विभिन्न प्रकार के कर वसूले जाते थे |
| प्रशासनिक विभाजन | साम्राज्य महाराष्ट्रक (प्रांत) → राष्ट्रक/मंडल → विषय (ज़िला) → भोग (दस गाँवों का समूह) में विभाजित था |
| विद्या-केंद्र (अग्रहार/घटिका) | विद्वान ब्राह्मणों (महाजन) के समूह अग्रहारों/घटिकाओं की देखरेख करते थे — बादामी में 2000 महाजन व ऐहोल में 500 महाजन कार्यरत थे, जो उच्च शिक्षा के प्रमुख केंद्र थे |
| सैन्य-व्यवस्था | पैदल सेना, अश्वारोही सेना, हाथी-सेना व एक शक्तिशाली नौसेना सम्मिलित थी — राष्ट्रकूट अभिलेखों में चालुक्यों की शक्तिशाली सेनाओं को "कर्नाटबल" कहा गया है |
| धर्म | प्रारंभ में वैदिक हिंदू धर्म के अनुयायी (ऐहोल के अनेक मंदिर इसके प्रमाण हैं); विक्रमादित्य प्रथम के समय से शैव मत (पाशुपत, कापालिक, कालामुख संप्रदाय) की ओर झुकाव बढ़ा; जैन धर्म को भी सक्रिय प्रोत्साहन मिला (बादामी की एक गुफा तथा ऐहोल के कई जैन मंदिर इसके उदाहरण हैं) |
| सामाजिक संरचना | समाज पर राजकुमारों (princes) व पुरोहितों का प्रभुत्व था — अनेक स्थानीय कुल-प्रमुख पुरोहितों को दान देकर द्वितीय वर्ण (क्षत्रिय) का दर्जा प्राप्त करते थे तथा पुरोहित उन्हें सम्मानजनक सौर/चंद्र वंशावली गढ़कर देते थे — यह प्रक्रिया नए शासकों को जनता की नज़रों में वैध बनाती थी |
21पल्लव कला — महाबलीपुरम रथ एवं शोर मंदिर (Pallava Art & Architecture)
📍 पंच रथ / एकाश्मक रथ, महाबलीपुरम (Pancha Rathas, Mahabalipuram) (महाबलीपुरम/मामल्लपुरम, तमिलनाडु (UNESCO विश्व धरोहर, 1984))
⏰ काल: महेंद्रवर्मन प्रथम व नरसिंहवर्मन प्रथम का शासनकाल (सातवीं शताब्दी)
⭐ महत्व: सात प्रसिद्ध रथ-मंदिर, जो एक ही विशाल चट्टान को तराश कर बनाए गए हैं (एकाश्मक/monolithic स्थापत्य) — प्रत्येक रथ की बनावट रथ (चारपहिया वाहन) जैसी है, इसीलिए इन्हें "रथ" कहा जाता है। इनका निर्माण नरसिंहवर्मन प्रथम की मृत्यु (668 ई.) के बाद अधूरा छोड़ दिया गया। महाबलीपुरम की स्थापना नरसिंहवर्मन प्रथम ने बंदरगाह-नगर के रूप में की थी, इसलिए इसे "मामल्लपुरम" भी कहा जाता है।
- शोर मंदिर (Shore Temple) — महाबलीपुरम में स्थित यह मंदिर नरसिंहवर्मन द्वितीय "राजसिंह" के शासनकाल में निर्मित हुआ — यह समुद्र-तट पर स्थित संरचनात्मक (structural, न कि शैलकृत) पाषाण-मंदिर का प्रारंभिक व उत्कृष्ट उदाहरण है।
- कैलाशनाथ मंदिर, काँची — यह भी नरसिंहवर्मन द्वितीय के शासनकाल में निर्मित एक भव्य संरचनात्मक मंदिर है, जो पल्लव स्थापत्य-कला की परिपक्वता को दर्शाता है।
- पल्लव मंदिर-स्थापत्य के विकास को चार क्रमिक चरणों में विभाजित किया जाता है — महेंद्रवर्मन चरण (शैलकृत मंडप), नरसिंह चरण (एकाश्मक रथ, जैसे द्रौपदी रथ), राजसिंह चरण (शोर मंदिर, संरचनात्मक स्थापत्य का प्रारंभ), तथा नंदिवर्मन चरण (जैसे काँची का मातंगेश्वर मंदिर)।
- 2025 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की जल-पुरातत्व शाखा (Underwater Archaeology Wing) ने महाबलीपुरम तट पर एक नए ROV (Remotely Operated Vehicle) की सहायता से समुद्र में डूबी हुई पल्लवकालीन संरचनाओं की खोज हेतु अन्वेषण का नया चरण प्रारंभ किया है — यह अत्यंत नवीनतम शोध-गतिविधि है, जो महाबलीपुरम के समुद्र में डूबे "सात पगोडा" (Seven Pagodas) की प्राचीन जनश्रुति से भी जुड़ी है।
22चालुक्य कला — ऐहोल, बादामी, पट्टडकल — UNESCO धरोहर (Chalukya Art — UNESCO Heritage)
वातापी चालुक्यों के काल में दक्षिण भारत में मंदिर-स्थापत्य कला अभूतपूर्व रूप से विकसित हुई — ऐहोल में लगभग 610 ई. से मंदिर-निर्माण का कार्य आरंभ हुआ, जो आगे बादामी व पट्टडकल के निकटवर्ती नगरों तक फैला। चालुक्य स्थापत्य को उत्तर भारतीय (नागर) व दक्षिण भारतीय (द्रविड़) दोनों शैलियों के मणि-कंचन समन्वय (harmonious blend) हेतु जाना जाता है।
📍 पट्टडकल स्मारक-समूह (Group of Monuments at Pattadakal) (बागलकोट ज़िला, कर्नाटक (UNESCO विश्व धरोहर, 1987 से सूचीबद्ध))
⏰ काल: सातवीं-आठवीं शताब्दी, चालुक्य काल
⭐ महत्व: यहाँ नौ हिंदू मंदिर व एक जैन मंदिर स्थित हैं, जो उत्तर व दक्षिण भारतीय स्थापत्य-शैलियों के मणि-कंचन संयोग का उत्कृष्ट प्रमाण हैं। सबसे उत्कृष्ट कृति विरुपाक्ष मंदिर (लगभग 740 ई.) है, जिसका निर्माण रानी लोकमहादेवी ने चालुक्य विक्रमादित्य द्वितीय की काँची पर विजय के उपलक्ष्य में करवाया। पापनाथ मंदिर (लगभग 680 ई.) भी यहाँ का एक अन्य प्रमुख स्मारक है।
- ऐहोल का दुर्गा मंदिर — आठवीं शताब्दी का यह मंदिर मूलतः सूर्य को समर्पित था तथा ऐहोल के सर्वाधिक अलंकृत व विशालतम शिल्प-पट्टों के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें शैव, वैष्णव व शाक्त — तीनों संप्रदायों के देवी-देवताओं का चित्रण मिलता है। इसकी अर्धवृत्ताकार (apsidal) योजना प्रारंभिक चालुक्य हिंदू मंदिर-स्थापत्य में एक दुर्लभ उदाहरण है।
- ऐहोल-बादामी-पट्टडकल को संयुक्त रूप से "मंदिर-स्थापत्य के विकास" (Evolution of Temple Architecture) की एक श्रृंखला के रूप में देखा जाता है — यह भारत की UNESCO अस्थायी सूची (Tentative List) में भी शामिल है, जो इसके वैश्विक महत्व को रेखांकित करता है।
- बादामी की गुफाओं में हिंदू (वैष्णव-शैव) मंदिरों के साथ-साथ एक जैन गुफा-मंदिर भी है — यह चालुक्यों की धार्मिक सहिष्णुता व बहुधार्मिक संरक्षण नीति का प्रमाण है।
23साहित्य — दोनों राज्यों का योगदान (Literature under Chalukyas & Pallavas)
पल्लव साहित्य
- काँची विश्वविद्यालय (University of Kanchi) पल्लव काल में विद्या व बौद्धिकता का केंद्र बन गया, जहाँ देश-विदेश से छात्र अध्ययन हेतु आते थे — कदंब वंश के संस्थापक मयूरशर्मन ने भी यहीं वेदों का अध्ययन किया था।
- संस्कृत रचनाएँ — भारवि कृत "किरातार्जुनीयम्", दंडी कृत "दशकुमारचरितम्" तथा महेंद्रवर्मन प्रथम कृत "मत्तविलासप्रहसन" इस काल की प्रमुख कृतियाँ हैं।
- तमिल साहित्य — इसी काल में तिरुवल्लुवर ने प्रसिद्ध नैतिक-ग्रंथ "तिरुक्कुरल" की रचना की; नंदिवर्मन द्वितीय के संरक्षण में पेरुंदेवनार ने महाभारत का तमिल अनुवाद किया; नयनारों द्वारा रचित "तेवारम्" व आलवारों द्वारा रचित "नालायिरदिव्यप्रबंधम्" भक्ति-साहित्य के प्रमुख उदाहरण हैं।
चालुक्य साहित्य
- चालुक्य शासन कन्नड़ व तेलुगु भाषाओं के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है — कन्नड़ साहित्य के "तीन रत्न" (Three Gems) आदिकवि पंप, श्री पोन्न व रन्न इसी काल से संबद्ध हैं।
24नवीनतम पुरातात्विक शोध (Latest Research & Archaeological Updates)
- महाबलीपुरम जल-पुरातत्व अन्वेषण (2025) — भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की जल-पुरातत्व शाखा ने नए ROV उपकरण की सहायता से महाबलीपुरम तट पर डूबी हुई पल्लवकालीन संरचनाओं की खोज का नया चरण आरंभ किया — यह उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग तकनीक से गहरे व दुर्गम समुद्री क्षेत्रों में भी सुरक्षित शोध सक्षम बनाती है।
- चालुक्य उत्सव 2025 — कर्नाटक सरकार द्वारा बादामी-ऐहोल-पट्टडकल क्षेत्र में आयोजित सांस्कृतिक महोत्सव, जो चालुक्यकालीन विरासत के संरक्षण व जन-जागरूकता हेतु आयोजित किया गया — यह गुप्तोत्तर दक्षिण भारतीय स्थापत्य-विरासत के प्रति बढ़ती राष्ट्रीय रुचि का प्रतीक है।
- मौखरि व पुष्यभूति वंशों से संबंधित नवीन अभिलेखीय शोध निरंतर जारी है, जो इन दोनों वंशों के बीच के जटिल राजनीतिक संबंधों (विवाह-गठबंधन, ग्रहवर्मन की हत्या इत्यादि) पर नई रोशनी डाल रहा है — विशेषकर मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश में हो रहे नए उत्खननों से।
25तुलनात्मक तालिका — चालुक्य बनाम पल्लव (Comparative Table)
| बिंदु | चालुक्य वंश (वातापी) | पल्लव वंश (काँची) |
|---|
| राजधानी | वातापी (आधुनिक बादामी, कर्नाटक) | काँची (आधुनिक कांचीपुरम, तमिलनाडु) |
| शासन-काल | लगभग 543-757 ई. | लगभग 275-897 ई. |
| सबसे महान शासक | पुलकेशिन द्वितीय (हर्ष-विजेता) | नरसिंहवर्मन प्रथम (वातापी-विजेता) |
| प्रमुख कला-स्थल | ऐहोल, बादामी, पट्टडकल (UNESCO) | महाबलीपुरम, काँची (UNESCO) |
| स्थापत्य विशेषता | शैलकृत गुफा-मंदिर व नागर-द्रविड़ मिश्रित मंदिर | एकाश्मक रथ (Monolithic Rathas) व संरचनात्मक मंदिर |
| पतन | 757 ई. में सामंत राष्ट्रकूटों द्वारा अपदस्थ | नौवीं शताब्दी में चोल शासक आदित्य प्रथम द्वारा पराजित |
🎯 गुप्तोत्तर काल एवं हर्षवर्धन — उत्तर लेखन कोण UPSC: 10अं/150श | 15अं/250श || RAS: 5अं/60-70श | 10अं/120श
- UPSC (10अं/150श): हर्षवर्धन के प्रशासन की सामंती प्रकृति पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
- UPSC (15अं/250श): "नर्मदा के युद्ध ने भारतीय इतिहास में उत्तर-दक्षिण विभाजन की एक प्रतीकात्मक शुरुआत की।" हर्षवर्धन व पुलकेशिन द्वितीय के संघर्ष के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए।
- RAS Mains (5अं/60-70श): कन्नौज सभा व प्रयाग महामोक्ष परिषद में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- RAS Mains (10अं/120श): चालुक्य व पल्लव वंशों की कला-स्थापत्य उपलब्धियों की तुलनात्मक विवेचना कीजिए।
- 📌 Prelims MCQ Angle: ऐहोल प्रशस्ति के रचयिता कौन थे? (उत्तर: रविकीर्ति) — नर्मदा युद्ध किन दो शासकों के बीच हुआ? (उत्तर: हर्षवर्धन व पुलकेशिन द्वितीय) — महाबलीपुरम रथों का निर्माण किसने करवाया? (उत्तर: नरसिंहवर्मन प्रथम) — हर्ष की हत्या के प्रयास से बचकर ह्वेनसांग कब भारत आए? (उत्तर: 629 ई.)
परीक्षा में अवश्य पूछे जाने वाले तथ्य
1. मौखरि वंश ने कन्नौज से लगभग एक शताब्दी तक शासन किया — अंतिम शासक ग्रहवर्मन का विवाह राज्यश्री (हर्ष की बहन) से हुआ था। 2. राज्यवर्धन (605-606 ई.) की हत्या गौड़ के शासक शशांक ने छल-पूर्वक करवाई — इससे हर्षवर्धन का राज्यारोहण हुआ। 3. हर्षवर्धन (606-647 ई.) — पुष्यभूति वंश के अंतिम महान शासक, राजधानी कन्नौज (थानेश्वर के स्थान पर)। 4. हर्ष व चालुक्य पुलकेशिन द्वितीय के बीच नर्मदा का युद्ध (लगभग 618-619 ई.) — हर्ष की एकमात्र प्रमुख पराजय। 5. ऐहोल प्रशस्ति — पुलकेशिन द्वितीय के राजकवि रविकीर्ति द्वारा रचित, नर्मदा-विजय की जानकारी का मुख्य स्रोत। 6. ह्वेनसांग (629-645 ई.) — चीनी बौद्ध यात्री, नालंदा में अध्ययन किया, हर्षकालीन भारत का सबसे विश्वसनीय विवरण दिया। 7. कन्नौज सभा (643 ई.) — महायान बौद्ध धर्म प्रचार व ह्वेनसांग-सम्मान हेतु; प्रयाग महामोक्ष परिषद — प्रत्येक 5 वर्ष में बहु-धार्मिक दान-उत्सव। 8. बाणभट्ट रचित "हर्षचरित" — हर्ष के प्रारंभिक जीवन का विवरण; हर्ष स्वयं "रत्नावली", "प्रियदर्शिका" व "नागानंद" नाटकों के रचयिता माने जाते हैं। 9. नालंदा हर्षकाल में चरम पर — लगभग 10,000 छात्र; 670 ई. में इत्सिंग के अनुसार केवल 3000 भिक्षु शेष रहे। 10. हर्ष के बाद मंत्री अर्जुन ने सत्ता हथियाई व चीनी दूत वांग स्वान त्से पर आक्रमण किया — तिब्बती-नेपाली सेना से पराजित व बंदी हुआ। 11. वाकाटक वंश — चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक राजकुमार से हुआ था। 12. नरसिंहवर्मन प्रथम "महामल्ल" ने 642 ई. में वातापी जीतकर पुलकेशिन द्वितीय का वध किया — उपाधि "वातापीकोंड"। 13. महाबलीपुरम के पंच रथ (एकाश्मक स्थापत्य) — महेंद्रवर्मन प्रथम व नरसिंहवर्मन प्रथम के काल में निर्मित, UNESCO विश्व धरोहर (1984)। 14. शोर मंदिर (महाबलीपुरम) व कैलाशनाथ मंदिर (काँची) — नरसिंहवर्मन द्वितीय "राजसिंह" द्वारा निर्मित। 15. कलभ्र विद्रोह (छठी शताब्दी) — ब्राह्मणों को दिए ब्रह्मदेय अधिकार समाप्त किए; पल्लव-पांड्य-चालुक्य के संयुक्त प्रयास से दमन। 16. पल्लव ग्राम-व्यवस्था — ऊर (सामान्य), सभा (ब्रह्मदेय), नगरम (व्यापारी) — तीन प्रकार के ग्राम। 17. पट्टडकल स्मारक-समूह — UNESCO विश्व धरोहर (1987); विरुपाक्ष मंदिर (740 ई.) रानी लोकमहादेवी द्वारा निर्मित। 18. चालुक्य कर-व्यवस्था — हेर्जुंक, किरुकुल, बिल्कोड, पन्नय; प्रशासनिक विभाजन — महाराष्ट्रक→राष्ट्रक→विषय→भोग। 19. चालुक्य वंश का अंत — 757 ई. में सामंत राष्ट्रकूट दांतिदुर्ग द्वारा; पल्लव वंश का अंत — चोल आदित्य प्रथम द्वारा। 20. 2025 में ASI की जल-पुरातत्व शाखा ने महाबलीपुरम तट पर डूबी पल्लवकालीन संरचनाओं की खोज हेतु नया अन्वेषण-चरण आरंभ किया।
📝 UPSC + RAS पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQs) 📝
Q1. (UPSC Prelims) हर्षवर्धन को किसने नर्मदा के युद्ध में पराजित किया? (a) पुलकेशिन प्रथम (b) पुलकेशिन द्वितीय (c) नरसिंहवर्मन प्रथम (d) शशांक — उत्तर: (b) पुलकेशिन द्वितीय Q2. (UPSC Prelims) ऐहोल प्रशस्ति के रचयिता कौन थे? (a) बाणभट्ट (b) हरिषेण (c) रविकीर्ति (d) दंडी — उत्तर: (c) रविकीर्ति Q3. (UPSC Mains) हर्षवर्धन के प्रशासन की प्रकृति की विवेचना करते हुए स्पष्ट कीजिए कि इसे "सामंती" क्यों कहा जाता है। Q4. (UPSC Mains) चालुक्य-पल्लव संघर्ष के कारणों व परिणामों का विश्लेषण कीजिए। Q5. (RAS Pre) महाबलीपुरम के एकाश्मक रथों का निर्माण किस पल्लव शासक ने करवाया? (a) महेंद्रवर्मन प्रथम (b) नरसिंहवर्मन प्रथम (c) नरसिंहवर्मन द्वितीय (d) नंदिवर्मन द्वितीय — उत्तर: (b) Q6. (RAS Mains) पट्टडकल के स्मारक-समूह के ऐतिहासिक व स्थापत्य महत्व की विवेचना कीजिए। Q7. (UPSC Prelims) कन्नौज सभा (643 ई.) किस उद्देश्य से आयोजित की गई थी? (a) प्रशासनिक सुधार (b) महायान बौद्ध धर्म का प्रचार व ह्वेनसांग का सम्मान (c) युद्ध-नीति निर्धारण (d) कर-सुधार — उत्तर: (b) Q8. (UPSC Mains) कलभ्र विद्रोह के कारणों व दक्षिण भारतीय राजनीति पर इसके प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए। Q9. (RAS Pre) "वातापीकोंड" उपाधि किस शासक ने धारण की? (a) पुलकेशिन द्वितीय (b) नरसिंहवर्मन प्रथम (c) विक्रमादित्य द्वितीय (d) महेंद्रवर्मन प्रथम — उत्तर: (b)
26कालक्रम तालिका (Timeline)
| काल/वर्ष | घटना |
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| लगभग 225-340 ई. | इक्ष्वाकु वंश का कृष्णा-गुंटूर क्षेत्र में शासन |
| लगभग 250-500 ई. | वाकाटक वंश का उत्तर महाराष्ट्र-विदर्भ में शासन |
| लगभग 275-897 ई. | पल्लव वंश का काँची से शासन |
| 300 ई. | सिंहवर्मन द्वारा इक्ष्वाकु शासक रुद्रपुरुषदत्त की पराजय — तटीय आंध्र में पल्लव सत्ता |
| लगभग 345-540 ई. | कदंब वंश का बनवासी से शासन |
| 550 ई. | पुलकेशिन प्रथम द्वारा चालुक्य वंश की स्थापना — वातापी राजधानी |
| 590-630 ई. | महेंद्रवर्मन प्रथम का शासनकाल — चालुक्य-पल्लव संघर्ष का प्रारंभ |
| लगभग 600-605 ई. | ग्रहवर्मन (मौखरि) की देवगुप्त द्वारा हत्या, राज्यश्री बंदी |
| 605-606 ई. | राज्यवर्धन का संक्षिप्त शासनकाल — शशांक द्वारा छल से हत्या |
| 606-647 ई. | हर्षवर्धन का शासनकाल — कन्नौज राजधानी |
| 609-642 ई. | पुलकेशिन द्वितीय का शासनकाल — चालुक्य वंश का चरम |
| 629-645 ई. | ह्वेनसांग की भारत-यात्रा |
| लगभग 618-619 ई. | नर्मदा का युद्ध — हर्ष की पुलकेशिन द्वितीय से पराजय |
| 630-668 ई. | नरसिंहवर्मन प्रथम "महामल्ल" का शासनकाल — महाबलीपुरम की स्थापना |
| 642 ई. | नरसिंहवर्मन प्रथम द्वारा वातापी-विजय व पुलकेशिन द्वितीय का वध |
| 643 ई. | हर्षवर्धन द्वारा कन्नौज सभा का आयोजन |
| 647 ई. | हर्षवर्धन की मृत्यु — साम्राज्य का विघटन, वांग स्वान त्से घटना |
| 670 ई. | इत्सिंग की नालंदा-यात्रा |
| 695-722 ई. | नरसिंहवर्मन द्वितीय "राजसिंह" — शोर मंदिर व कैलाशनाथ मंदिर निर्माण |
| 733-745 ई. | चालुक्य विक्रमादित्य द्वितीय का शासनकाल — काँची पर विजय |
| 753/757 ई. | राष्ट्रकूट दांतिदुर्ग द्वारा चालुक्य वंश का अंत |
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