☸️ अध्याय 4/10 — प्राचीन भारत का इतिहास

जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म

Jainism & Buddhism | RAS Pre+Mains | IAS/UPSC Prelims+Mains
📋 इस अध्याय में
  1. उदय के कारण — सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि (Causes of Origin)
  2. महावीर एवं जैन धर्म — जीवन परिचय (Life of Mahavira)
  3. जैन धर्म के सिद्धांत — त्रिरत्न व पंचमहाव्रत (Triratna & Five Vows)
  4. जैन संघ, आचार-व्यवस्था एवं दर्शन (Jain Sangha & Philosophy)
  5. जैन धर्म का विभाजन — दिगंबर व श्वेतांबर (Digambara-Shvetambara Schism)
  6. जैन धर्म का प्रसार एवं साहित्य (Spread & Literature of Jainism)
  7. बुद्ध एवं बौद्ध धर्म — जीवन परिचय (Life of Buddha)
  8. बुद्ध के उपदेश — चार आर्य सत्य एवं अष्टांगिक मार्ग (Four Noble Truths & Eightfold Path)
  9. बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत (Core Buddhist Philosophy)
  10. बौद्ध संघ एवं भिक्षुणी संघ (Buddhist Sangha & Bhikkhunis)
  11. बौद्ध साहित्य — त्रिपिटक (Buddhist Literature — Tripitaka)
  12. बौद्ध संगीतियाँ — चार महासंगीतियाँ (The Four Buddhist Councils)
  13. हीनयान-महायान विभाजन (Hinayana-Mahayana Split)
  14. स्तूप, विहार एवं बौद्ध कला (Stupas, Viharas & Buddhist Art)
  15. आजीवक एवं लोकायत — अन्य समकालीन संप्रदाय (Ajivikas & Lokayatas)
  16. प्रसार एवं प्रभाव — तुलनात्मक तालिका (Spread, Impact & Comparison)
  17. कालक्रम तालिका (Timeline)

कल्पना कीजिए — एक राजकुमार, जिसे जन्म से ही ऐशो-आराम, सुंदर महल, सुख-सुविधाओं से घेर कर रखा गया है, ताकि वह कभी दुनिया का दुख न देख पाए। परंतु एक दिन वह गुप्त रूप से महल से बाहर निकलता है, और सड़क पर उसे एक बूढ़ा, बीमार व्यक्ति और एक शव दिखाई देता है। यह दृश्य उसे झकझोर देता है — "अगर बुढ़ापा, बीमारी व मृत्यु सबको आनी है, तो फिर सुख कहाँ है?" उसी रात वह अपना राजसी जीवन त्याग कर सत्य की खोज में निकल पड़ता है। यही है सिद्धार्थ गौतम की कहानी, जो आगे चलकर "बुद्ध" (जागृत/प्रबुद्ध) कहलाए।

लगभग उसी काल में, एक और राजकुमार वर्धमान — जो लिच्छवी गणराज्य के ज्ञातृक कुल में जन्मे थे — तीस वर्ष की आयु में अपना राजसी जीवन त्यागकर बारह वर्षों की कठोर तपस्या पर निकल पड़े और "महावीर" (महान विजेता) कहलाए। दोनों ही छठी शताब्दी ईसा पूर्व के महाजनपद-काल में, लगभग एक ही सामाजिक परिस्थितियों की प्रतिक्रिया में उभरे — यह वह काल था जब वैदिक कर्मकांड की जटिलता व वर्ण-व्यवस्था की कठोरता से समाज में गहरी बेचैनी फैली हुई थी। आइए, इस अध्याय में हम इन दोनों महान धर्मों — जैन धर्म व बौद्ध धर्म — को गहराई से समझें।

1उदय के कारण — सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि (Causes of Origin)

छठी शताब्दी ईसा पूर्व को भारतीय इतिहास में "द्वितीय नगरीकरण" (Second Urbanisation) का काल कहा जाता है — इसी दौर में जैन व बौद्ध धर्म सहित लगभग 62 विधर्मी/अपरंपरागत संप्रदाय (heterodox sects) उभरे। इनके उदय के पीछे कई सामाजिक-आर्थिक कारण थे:

1. वैदिक कर्मकांड की जटिलता एवं महँगापन — उत्तर वैदिक काल तक यज्ञ अत्यंत खर्चीले व जटिल हो चुके थे, जिनमें बड़े पैमाने पर पशु-बलि दी जाती थी — यह आर्थिक व नैतिक दोनों दृष्टि से आम जनता के लिए बोझिल हो गया था।

2. वर्ण-व्यवस्था की कठोरता — वर्ण अब जन्माधारित हो चुके थे, ब्राह्मणों का समाज पर वर्चस्व बढ़ गया था। क्षत्रिय वर्ग में ब्राह्मणों के इस प्रभुत्व के विरुद्ध असंतोष था — यही कारण है कि बुद्ध व महावीर दोनों ही क्षत्रिय कुल से थे।

3. व्यापारी वर्ग का असंतोष — द्वितीय नगरीकरण से वैश्य/व्यापारी वर्ग आर्थिक रूप से समृद्ध हो चुका था, परंतु वर्ण-व्यवस्था में उसे निम्न सामाजिक दर्जा प्राप्त था — इसलिए वैश्य वर्ग ने बौद्ध व जैन धर्म को खुलकर समर्थन दिया, जो कर्म व अहिंसा पर आधारित थे, जन्म पर नहीं।

4. कृषि-अधिशेष एवं लोहे का प्रयोग — लोहे के औज़ारों से कृषि-उत्पादन बढ़ा, जिससे व्यापार, नगरीकरण व नई सामाजिक श्रेणियाँ (गहपति, सेट्ठि) उभरीं, जो सरल व नैतिक जीवन-दर्शन की तलाश में थीं।

5. भाषा की सुगमता — बुद्ध व महावीर दोनों ने अपने उपदेश आम बोलचाल की भाषा प्राकृत/पालि में दिए, न कि कुलीन वर्ग की संस्कृत में — इससे आम जनता तक इनकी पहुँच आसान हुई।

🔥 वैदिक धर्म से असंतोष के कारण
  • महँगे व जटिल यज्ञ-कर्मकांड
  • पशु-बलि पर बढ़ता विरोध
  • ब्राह्मणों का सामाजिक वर्चस्व
  • जन्माधारित कठोर वर्ण-व्यवस्था
✨ नए धर्मों की अपील
  • सरल, नैतिक आचरण पर बल
  • कर्म व अहिंसा पर आधारित समानता
  • आम भाषा (प्राकृत/पालि) में उपदेश
  • व्यापारी व निम्न वर्ग को समान दर्जा

2महावीर एवं जैन धर्म — जीवन परिचय (Life of Mahavira)

जैन धर्म वर्धमान महावीर द्वारा "स्थापित" नहीं, बल्कि "प्रवर्तित/पुनर्जीवित" धर्म माना जाता है — जैन परंपरा के अनुसार महावीर 24वें व अंतिम तीर्थंकर (Tirthankara) थे, जबकि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे। "जैन" शब्द "जिन" से बना है, जिसका अर्थ है "विजेता" (जिसने इंद्रियों व वासनाओं पर विजय पाई)।

📜 वर्धमान महावीर (Vardhamana Mahavira) (24वें तीर्थंकर)

✍️ रचनाकार: जन्म: लगभग 540 ई.पू., कुण्डग्राम (वैशाली के निकट) क्षत्रिय राजकुमार, ज्ञातृक कुल (वज्जि संघ का भाग) में जन्म — पिता सिद्धार्थ व माता त्रिशला (लिच्छवी राजकुमारी)। 30 वर्ष की आयु में गृह-त्याग कर 12 वर्षों की कठोर तपस्या की। 42 वर्ष की आयु में जृम्भिकग्राम में एक साल वृक्ष के नीचे "कैवल्य ज्ञान" (सर्वज्ञता) प्राप्त हुआ। 72 वर्ष की आयु में पावापुरी (बिहार) में निर्वाण प्राप्त किया, लगभग 468 ई.पू.।

3जैन धर्म के सिद्धांत — त्रिरत्न व पंचमहाव्रत (Triratna & Five Vows)

जैन धर्म के अनुसार मोक्ष (कैवल्य) प्राप्ति के लिए तीन "रत्नों" का पालन आवश्यक है:

त्रिरत्न (Three Jewels)अर्थ
सम्यक् दर्शन (Right Faith)तीर्थंकरों द्वारा बताए सत्य में सही व दृढ़ आस्था
सम्यक् ज्ञान (Right Knowledge)जीव, अजीव व सृष्टि के वास्तविक स्वरूप का सही व संदेह-रहित ज्ञान
सम्यक् चरित्र (Right Conduct)पाँच महाव्रतों का पालन करते हुए सदाचारपूर्ण जीवन जीना

पंचमहाव्रत (Five Great Vows)

A. अहिंसा (Non-violence) — किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म से हानि न पहुँचाना — जैन धर्म का सबसे केंद्रीय सिद्धांत। महावीर ने कहा — "सभी प्राणी जीना चाहते हैं, सभी को जीवन प्रिय है।"

B. सत्य (Truthfulness) — सदैव सत्य वचन बोलना।

C. अस्तेय (Non-stealing) — बिना दी हुई वस्तु ग्रहण न करना।

D. अपरिग्रह (Non-possession) — भौतिक वस्तुओं व संपत्ति के प्रति मोह-त्याग।

E. ब्रह्मचर्य (Celibacy) — महावीर द्वारा जोड़ा गया पाँचवाँ व्रत — पूर्ण संयम व सांसारिक विषय-वासनाओं का त्याग।

दार्शनिक विशेषता: जैन दर्शन में "अनेकांतवाद" (Anekantavada — सत्य के अनेक पहलू) व "स्यादवाद" (Syadvada — सापेक्षता का सिद्धांत, "कदाचित ऐसा हो सकता है") महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं — इनके अनुसार कोई भी वस्तु/सत्य केवल एक दृष्टिकोण से पूर्ण रूप से नहीं समझा जा सकता, इसे विभिन्न कोणों से देखना आवश्यक है। जैन धर्म सृष्टि को "अनादि-अनंत" (बिना आदि-अंत के) मानता है तथा किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर की अवधारणा को स्वीकार नहीं करता।

4जैन संघ, आचार-व्यवस्था एवं दर्शन (Jain Sangha & Philosophy)

5जैन धर्म का विभाजन — दिगंबर व श्वेतांबर (Digambara-Shvetambara Schism)

महावीर के लगभग दो सौ वर्ष बाद (लगभग तीसरी-पहली शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास) जैन धर्म दो प्रमुख संप्रदायों में विभाजित हो गया।

🤍 श्वेतांबर (Shvetambara — "श्वेत वस्त्रधारी")
  • मुनि श्वेत वस्त्र धारण करते हैं
  • मुनि 14 प्रकार की वस्तुएँ (वस्त्र, भिक्षा-पात्र आदि) रख सकते हैं
  • स्त्रियाँ भी मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं — ऐसा मानते हैं
  • वल्लभी संगीति (5वीं शताब्दी ई.) के 12 अंग ग्रंथों को प्रामाणिक मानते हैं
🚫 दिगंबर (Digambara — "दिगंबर/नग्न")
  • मुनि पूर्ण वस्त्र-त्याग करते हैं (नग्न रहते हैं)
  • मुनि केवल दो वस्तुएँ — मयूर-पंख की पिच्छी व कमंडल — रख सकते हैं
  • स्त्रियों को मोक्ष हेतु पहले पुरुष रूप में जन्म आवश्यक मानते हैं
  • मूल प्राचीन ग्रंथ लुप्त हो चुके मानते हैं, वल्लभी संगीति को अस्वीकार करते हैं

ध्यान दें: दोनों संप्रदायों में मौलिक सिद्धांतों (अहिंसा, कर्म, अनेकांतवाद) पर कोई मतभेद नहीं है — भेद मुख्यतः आचार-व्यवहार (वस्त्र-धारण) व कुछ व्याख्याओं तक सीमित है।

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6जैन धर्म का प्रसार एवं साहित्य (Spread & Literature of Jainism)

7बुद्ध एवं बौद्ध धर्म — जीवन परिचय (Life of Buddha)

📜 सिद्धार्थ गौतम (Siddhartha Gautama) (बुद्ध — "जागृत/प्रबुद्ध")

✍️ रचनाकार: जन्म: लगभग 563 ई.पू., लुम्बिनी (नेपाल) शाक्य गण के क्षत्रिय कुल में जन्म — पिता शुद्धोधन (शाक्य गणराज्य के प्रमुख) व माता महामाया। विवाह यशोधरा से, पुत्र राहुल। 29 वर्ष की आयु में वृद्ध, रोगी व शव को देखकर विचलित होकर गृह-त्याग ("महाभिनिष्क्रमण") किया। 6 वर्षों तक कठोर तप के बाद भी सत्य न मिलने पर "मध्यम मार्ग" अपनाया। 35 वर्ष की आयु में बोधगया (बिहार) में पीपल वृक्ष के नीचे "बोधि" (ज्ञान) प्राप्त हुआ। सारनाथ (वाराणसी के निकट) में पहला उपदेश दिया — इसे "धर्मचक्र प्रवर्तन" कहा जाता है। 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में महापरिनिर्वाण प्राप्त हुआ, लगभग 483 ई.पू.।

बौद्ध धर्म से जुड़े चार पवित्र स्थल (चार महास्थान)

स्थलघटना
लुम्बिनी (नेपाल)बुद्ध का जन्म-स्थान
बोधगया (बिहार)ज्ञान-प्राप्ति (बोधि) स्थल — पीपल/बोधि वृक्ष के नीचे
सारनाथ (उत्तर प्रदेश)प्रथम उपदेश — धर्मचक्र प्रवर्तन
कुशीनगर (उत्तर प्रदेश)महापरिनिर्वाण स्थल

8बुद्ध के उपदेश — चार आर्य सत्य एवं अष्टांगिक मार्ग (Four Noble Truths & Eightfold Path)

बुद्ध ने सारनाथ में अपने प्रथम उपदेश में चार आर्य सत्यों (Four Noble Truths) की व्याख्या की — यह बौद्ध दर्शन का मूल आधार है:

आर्य सत्यअर्थ
दुःख (Dukkha)संसार में सर्वत्र दुःख व्याप्त है — जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, अप्रिय संयोग — सभी दुःखमय हैं
दुःख समुदाय (Samudaya)दुःख का कारण है "तृष्णा" (Tanha) — अपूर्ण इच्छाएँ व लालसा
दुःख निरोध (Nirodha)तृष्णा का पूर्ण नाश करने से दुःख का भी अंत हो जाता है — यही "निर्वाण" की अवस्था है
दुःख निरोध मार्ग (Magga)दुःख-निवारण का मार्ग है "अष्टांगिक मार्ग" (Eightfold Path)

अष्टांगिक मार्ग (Eightfold Path) — निर्वाण प्राप्ति के आठ सोपान:

1. सम्यक् दृष्टि (Right View) — यथार्थ को सही ढंग से समझना

2. सम्यक् संकल्प (Right Resolve) — शुद्ध विचार व संकल्प

3. सम्यक् वाणी (Right Speech) — सत्य व मधुर वचन

4. सम्यक् कर्मान्त (Right Action) — सदाचारपूर्ण कर्म

5. सम्यक् आजीव (Right Livelihood) — नैतिक जीविकोपार्जन

6. सम्यक् व्यायाम (Right Effort) — निरंतर सद्प्रयास

7. सम्यक् स्मृति (Right Mindfulness) — जागरूक चित्त

8. सम्यक् समाधि (Right Concentration) — गहन ध्यान-साधना

💡 मध्यम मार्ग (Middle Path)

बुद्ध ने अत्यधिक विलासिता (जैसा उनका राजसी जीवन था) और अत्यधिक कठोर तपस्या (जो उन्होंने पहले 6 वर्ष तक की) — दोनों को अस्वीकार करते हुए एक संतुलित "मध्यम मार्ग" (Middle Path) अपनाने की सलाह दी। इसे समझने के लिए वीणा के तार का उदाहरण दिया जाता है — तार न बहुत ढीला हो, न बहुत कसा, तभी सुरीला संगीत बजता है।

9बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत (Core Buddhist Philosophy)

10बौद्ध संघ एवं भिक्षुणी संघ (Buddhist Sangha & Bhikkhunis)

11बौद्ध साहित्य — त्रिपिटक (Buddhist Literature — Tripitaka)

बुद्ध की मृत्यु (लगभग 5वीं-4वीं शताब्दी ई.पू.) के बाद उनके उपदेशों को शिष्यों ने वैशाली में एक "स्थविर परिषद" में संकलित किया — इस संकलन को "त्रिपिटक" (तीन टोकरियाँ) कहा जाता है।

पिटकविषयवस्तु
विनय पिटक (Vinaya Pitaka)संघ (मठ-व्यवस्था) के लिए नियम-कानून व अनुशासन
सुत्त पिटक (Sutta Pitaka)बुद्ध के मूल उपदेश एवं शिक्षाएँ — थेरीगाथा भी इसी का भाग
अभिधम्म पिटक (Abhidhamma Pitaka)गहन दार्शनिक एवं तात्विक विवेचन
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12बौद्ध संगीतियाँ — चार महासंगीतियाँ (The Four Buddhist Councils)

बुद्ध के उपदेशों के संकलन, व्याख्या व मतभेदों को सुलझाने के लिए समय-समय पर बड़ी सभाएँ (संगीतियाँ) आयोजित हुईं — यह विषय परीक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण है:

संगीतिकाल एवं स्थानसंरक्षक/अध्यक्षमुख्य परिणाम
प्रथम संगीतिलगभग 483 ई.पू., राजगृह (सप्तपर्णी गुफा)राजा अजातशत्रु; अध्यक्ष महाकस्सपउपालि द्वारा विनय पिटक व आनंद द्वारा सुत्त पिटक का पाठ संकलित
द्वितीय संगीतिलगभग 383 ई.पू., वैशालीराजा कालाशोक"दस बिंदुओं" के विवाद पर चर्चा — संघ में पहला विभाजन (स्थविरवादी व महासंघिक)
तृतीय संगीतिलगभग 250 ई.पू., पाटलिपुत्रसम्राट अशोक; अध्यक्ष मोग्गलिपुत्त तिस्सअभिधम्म पिटक का संकलन — त्रिपिटक पूर्ण; बौद्ध धर्म के विदेश-प्रसार हेतु मिशनरी भेजे गए
चतुर्थ संगीतिलगभग प्रथम शताब्दी ई., कुण्डलवन (कश्मीर)कुषाण सम्राट कनिष्क; अध्यक्ष वसुमित्र (उपाध्यक्ष अश्वघोष)बौद्ध धर्म का हीनयान व महायान में औपचारिक विभाजन

परीक्षा हेतु याद रखें: प्रथम संगीति — राजगृह/अजातशत्रु; द्वितीय — वैशाली/कालाशोक; तृतीय — पाटलिपुत्र/अशोक; चतुर्थ — कश्मीर/कनिष्क — यह क्रम याद रखना Prelims के लिए अत्यंत उपयोगी है।

13हीनयान-महायान विभाजन (Hinayana-Mahayana Split)

पहली शताब्दी ईस्वी तक बौद्ध धर्म में एक बड़ा वैचारिक परिवर्तन आया — बुद्ध की मूर्ति-पूजा व "बोधिसत्व" (करुणामय, जो स्वयं निर्वाण प्राप्त कर सकते थे परंतु दूसरों की सहायता हेतु संसार में रुके रहे) की अवधारणा का उदय हुआ। इस नए मार्ग को "महायान" (महान मार्ग/यान) कहा गया, जबकि पुराने मार्ग को महायान अनुयायियों ने "हीनयान" (लघु मार्ग) कहा — परंतु पुरानी परंपरा के अनुयायी स्वयं को "थेरवादी" (theravadin — अपने वरिष्ठ गुरुओं/थेरों के मार्ग पर चलने वाले) कहते थे।

🛕 थेरवाद/हीनयान
  • बुद्ध को मानव गुरु के रूप में देखता है, मूर्ति-पूजा नहीं
  • व्यक्तिगत प्रयास से "अर्हत" बनकर निर्वाण प्राप्ति पर बल
  • श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड में प्रचलित
  • प्रतीकों से बुद्ध को दर्शाया गया — खाली आसन, स्तूप, चक्र, बोधि वृक्ष
🙏 महायान
  • बुद्ध की मूर्ति-पूजा एवं बोधिसत्व की अवधारणा
  • बुद्ध को उद्धारक (saviour) देवता स्वरूप मानना
  • मध्य एशिया, चीन, कोरिया, जापान में प्रचलित
  • मथुरा व तक्षशिला (गांधार शैली) में बुद्ध की मूर्तियाँ प्रारंभ हुईं

14स्तूप, विहार एवं बौद्ध कला (Stupas, Viharas & Buddhist Art)

स्तूप (Stupa) — संस्कृत में "ढेर/टीला" — मूलतः अर्ध-गोलाकार मिट्टी का टीला, जिसमें बुद्ध या अन्य बौद्ध महापुरुषों के अवशेष (relics) रखे जाते थे। अशोकावदान के अनुसार सम्राट अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को विभिन्न नगरों में वितरित कर उन पर स्तूप बनवाए।

स्तूप का भागविवरण
अंड (Anda)अर्ध-गोलाकार मिट्टी का मूल टीला
हर्मिका (Harmika)बालकनी-जैसी संरचना, देवताओं के निवास का प्रतीक
यष्टि (Yashti)हर्मिका से ऊपर उठा हुआ मस्तूल, छत्र (छतरी) सहित
वेदिका/रेलिंगपवित्र व सांसारिक क्षेत्र को अलग करने वाली घेराबंदी, बाँस-बाड़े जैसी नक्काशी
📍 साँची स्तूप (Sanchi Stupa) (रायसेन ज़िला, मध्य प्रदेश)

⏰ काल: मौर्य काल में निर्माण प्रारंभ, शुंग-सातवाहन काल में विस्तार
⭐ महत्व: सबसे सुरक्षित प्राचीन स्तूप — चार भव्य नक़्क़ाशीदार तोरणद्वार (gateways) चारों दिशाओं में। 1818 में "पुनः खोजा" गया, अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा अध्ययन किया गया। भोपाल की शाहजहाँ बेगम व सुल्तान जहाँ बेगम ने संरक्षण हेतु धन दिया, जिससे यह यूरोप ले जाए जाने से बच गया। 1989 में UNESCO विश्व धरोहर स्थल घोषित।

📍 अमरावती स्तूप (Amaravati Stupa) (आंध्र प्रदेश (कृष्णा नदी तट))

⏰ काल: सातवाहन काल
⭐ महत्व: साँची के विपरीत, अमरावती की अधिकांश मूर्तियाँ 1796 में खोज के बाद बिखर गईं — वाल्टर इलियट (1854) द्वारा एकत्रित पट्टिकाएँ "इलियट मार्बल्स" कहलाईं, जो कोलकाता, चेन्नई व लंदन तक बिखर गईं — यह भारतीय पुरावशेषों के संरक्षण में हुई एक बड़ी चूक का उदाहरण है।

15आजीवक एवं लोकायत — अन्य समकालीन संप्रदाय (Ajivikas & Lokayatas)

बुद्ध व महावीर के अतिरिक्त इसी काल में अन्य कई विधर्मी संप्रदाय भी उभरे, जिनमें आजीवक व लोकायत प्रमुख थे — इनके मूल ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं, इनके बारे में जानकारी अन्य परंपराओं के ग्रंथों से ही मिलती है।

मक्खलि गोसाल (आजीवक परंपरा)अजित केशकंबलिन (लोकायत/चार्वाक परंपरा)
नियतिवाद — कर्म व पुण्य से भाग्य नहीं बदला जा सकतादान, यज्ञ व परलोक के अस्तित्व को नकारना
सुख-दुःख पूर्वनिर्धारित हैं, संसार-चक्र में परिवर्तन असंभवमनुष्य चार तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु) से बना है, मृत्यु के बाद ये तत्व अपने मूल स्रोत में लौट जाते हैं
सब कुछ पूर्वनिर्धारित है, जैसे धागे की गेंद अपनी पूरी लंबाई तक खुलती हैदान की अवधारणा को खोखला झूठ बताया — मृत्यु के बाद कुछ शेष नहीं रहता

16प्रसार एवं प्रभाव — तुलनात्मक तालिका (Spread, Impact & Comparison)

बौद्ध धर्म भारत से बाहर मध्य एशिया, चीन, कोरिया, जापान, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड व इंडोनेशिया तक फैला — जबकि जैन धर्म मुख्यतः भारत तक ही सीमित रहा, परंतु भारत में आज भी एक जीवंत परंपरा के रूप में कायम है।

बिंदुजैन धर्मबौद्ध धर्म
संस्थापक/प्रवर्तकमहावीर (24वें तीर्थंकर)सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध)
मूल भाषाप्राकृत (अर्धमागधी)पालि
केंद्रीय सिद्धांतअहिंसा, अनेकांतवाद, कठोर तपमध्यम मार्ग, अष्टांगिक मार्ग, करुणा
आत्मा की अवधारणाआत्मा (जीव) का अस्तित्व स्वीकारअनात्म — स्थायी आत्मा को नकारना
प्रमुख समर्थक वर्गव्यापारी वर्गव्यापारी, राजा (अशोक, कनिष्क), सभी वर्ग
भौगोलिक प्रसारमुख्यतः भारत (गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान)भारत सहित पूरे एशिया में
वर्तमान स्थितिभारत में अल्पसंख्यक परंतु जीवंत परंपराभारत में लगभग लुप्त, एशिया में व्यापक
""अत्त दीपो भव" — अपना दीपक स्वयं बनो, अपनी मुक्ति के लिए स्वयं प्रयास करो।" — बुद्ध, महापरिनिब्बान सुत्त
🎯 जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म — उत्तर लेखन कोण UPSC: 10अं/150श | 15अं/250श || RAS: 5अं/60-70श | 10अं/120श

परीक्षा में अवश्य पूछे जाने वाले तथ्य

1. महावीर 24वें व अंतिम तीर्थंकर थे; प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव माने जाते हैं; पार्श्वनाथ 23वें तीर्थंकर थे। 2. महावीर का जन्म कुण्डग्राम (वैशाली निकट) में, कैवल्य ज्ञान जृम्भिकग्राम में, तथा निर्वाण पावापुरी में हुआ। 3. त्रिरत्न — सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र — जैन मोक्ष-प्राप्ति के तीन आधार। 4. पंचमहाव्रत — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य (पाँचवाँ महावीर द्वारा जोड़ा गया)। 5. दिगंबर-श्वेतांबर विभाजन — भद्रबाहु (दक्षिण गए) व स्थूलभद्र (मगध में रहे) की परंपराओं में भिन्नता से हुआ। 6. जैन साहित्य वल्लभी (गुजरात) की संगीति में लगभग 1500 वर्ष पूर्व लिखित रूप में संकलित हुआ। 7. बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में, ज्ञान बोधगया में, प्रथम उपदेश सारनाथ में, निर्वाण कुशीनगर में हुआ। 8. चार आर्य सत्य — दुःख, समुदाय (कारण), निरोध (अंत), मार्ग (अष्टांगिक मार्ग)। 9. अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग — सम्यक् दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्मान्त, आजीव, व्यायाम, स्मृति, समाधि। 10. बुद्ध ने अनात्मवाद (आत्मा को नकारना) व अनित्यवाद (क्षणभंगुरता) का सिद्धांत दिया — उपनिषद के आत्म-सिद्धांत से भिन्न। 11. त्रिपिटक — विनय पिटक (नियम), सुत्त पिटक (उपदेश), अभिधम्म पिटक (दर्शन)। 12. प्रथम संगीति — राजगृह (अजातशत्रु, महाकस्सप); द्वितीय — वैशाली (कालाशोक); तृतीय — पाटलिपुत्र (अशोक, मोग्गलिपुत्त तिस्स); चतुर्थ — कश्मीर (कनिष्क, वसुमित्र)। 13. हीनयान/थेरवाद — बुद्ध को मानव गुरु मानता है; महायान — बुद्ध व बोधिसत्व की मूर्ति-पूजा करता है। 14. साँची स्तूप — 1989 में UNESCO विश्व धरोहर घोषित; अमरावती स्तूप की मूर्तियाँ "इलियट मार्बल्स" कहलाकर बिखर गईं। 15. अजंता गुफाएँ (महाराष्ट्र) — जातक कथाओं पर आधारित विश्व-प्रसिद्ध भित्ति-चित्र। 16. महाप्रजापती गौतमी — बौद्ध संघ में प्रवेश पाने वाली प्रथम स्त्री; आनंद ने स्त्री-प्रवेश में सहायता की। 17. थेरीगाथा — भिक्षुणियों की रचित गाथाओं का संग्रह, सुत्त पिटक का भाग। 18. मक्खलि गोसाल (आजीवक) — नियतिवाद के प्रवर्तक; अजित केशकंबलिन (लोकायत) — भौतिकवादी दर्शन के प्रवर्तक। 19. नालंदा विश्वविद्यालय (बिहार) — गुप्तकाल का प्रमुख बौद्ध शिक्षा-केंद्र, ह्वेनसांग ने यहाँ अध्ययन किया। 20. बुद्ध व महावीर दोनों क्षत्रिय कुल से थे — दोनों ने वैदिक कर्मकांड व वर्ण-व्यवस्था का विरोध किया।

📝 UPSC + RAS पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQs) 📝

Q1. (UPSC Prelims) बौद्ध धर्म की कौन-सी संगीति सम्राट कनिष्क के संरक्षण में आयोजित हुई? (a) प्रथम (b) द्वितीय (c) तृतीय (d) चतुर्थ — उत्तर: (d) चतुर्थ Q2. (UPSC Prelims) महावीर के माता-पिता किस गणराज्य से संबंधित थे? (a) मल्ल (b) वज्जि (लिच्छवी) (c) शाक्य (d) कोलिय — उत्तर: (b) वज्जि Q3. (UPSC Mains) बौद्ध धर्म के हीनयान व महायान संप्रदायों की मूल मान्यताओं में अंतर स्पष्ट कीजिए। Q4. (UPSC Mains) जैन व बौद्ध धर्म के उदय ने तत्कालीन भारतीय समाज पर क्या प्रभाव डाला? विवेचना कीजिए। Q5. (RAS Pre) पार्श्वनाथ किस तीर्थंकर क्रम में आते हैं? (a) 22वें (b) 23वें (c) 24वें (d) 21वें — उत्तर: (b) 23वें Q6. (RAS Mains) जैन धर्म के दिगंबर व श्वेतांबर संप्रदायों के बीच प्रमुख अंतर स्पष्ट कीजिए। Q7. (UPSC Prelims) साँची स्तूप को UNESCO विश्व धरोहर स्थल कब घोषित किया गया? (a) 1989 (b) 2003 (c) 2014 (d) 1975 — उत्तर: (a) 1989 Q8. (UPSC Mains) प्राचीन भारत में बौद्ध संघ की संरचना व कार्यप्रणाली का वर्णन कीजिए। Q9. (RAS Pre) थेरीगाथा किस बौद्ध ग्रंथ का भाग है? (a) विनय पिटक (b) सुत्त पिटक (c) अभिधम्म पिटक (d) दीपवंश — उत्तर: (b) सुत्त पिटक

17कालक्रम तालिका (Timeline)

काल/वर्षघटना
लगभग 563 ई.पू.सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) का जन्म, लुम्बिनी
लगभग 540 ई.पू.वर्धमान महावीर का जन्म, कुण्डग्राम
लगभग 528 ई.पू.बुद्ध को बोधगया में ज्ञान-प्राप्ति
लगभग 483 ई.पू.बुद्ध का महापरिनिर्वाण, कुशीनगर
लगभग 483 ई.पू.प्रथम बौद्ध संगीति, राजगृह (अजातशत्रु)
लगभग 468 ई.पू.महावीर का निर्वाण, पावापुरी
लगभग 383 ई.पू.द्वितीय बौद्ध संगीति, वैशाली (कालाशोक)
तीसरी शताब्दी ई.पू.प्रथम स्तूपों का निर्माण (साँची, भरहुत, सारनाथ)
लगभग 250 ई.पू.तृतीय बौद्ध संगीति, पाटलिपुत्र (सम्राट अशोक)
लगभग तीसरी-पहली शताब्दी ई.पू.जैन धर्म का दिगंबर-श्वेतांबर विभाजन प्रारंभ
प्रथम शताब्दी ई.चतुर्थ बौद्ध संगीति, कश्मीर (कनिष्क) — हीनयान-महायान विभाजन
द्वितीय शताब्दी ई. आगेमहायान बौद्ध धर्म, वैष्णव-शैव भक्ति परंपराओं का विकास
लगभग 500 ई.वल्लभी (गुजरात) संगीति — जैन साहित्य का लिखित संकलन
5वीं-7वीं शताब्दी ई.फाह्यान (गुप्तकाल) व ह्वेनसांग (हर्षकाल) की भारत यात्रा, नालंदा अध्ययन
1818 ई.साँची स्तूप की "पुनः खोज"
1854 ई.वाल्टर इलियट द्वारा अमरावती की मूर्तियों का संग्रहण ("इलियट मार्बल्स")
1989 ई.साँची को UNESCO विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया
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