कल्पना कीजिए — एक राजकुमार, जिसे जन्म से ही ऐशो-आराम, सुंदर महल, सुख-सुविधाओं से घेर कर रखा गया है, ताकि वह कभी दुनिया का दुख न देख पाए। परंतु एक दिन वह गुप्त रूप से महल से बाहर निकलता है, और सड़क पर उसे एक बूढ़ा, बीमार व्यक्ति और एक शव दिखाई देता है। यह दृश्य उसे झकझोर देता है — "अगर बुढ़ापा, बीमारी व मृत्यु सबको आनी है, तो फिर सुख कहाँ है?" उसी रात वह अपना राजसी जीवन त्याग कर सत्य की खोज में निकल पड़ता है। यही है सिद्धार्थ गौतम की कहानी, जो आगे चलकर "बुद्ध" (जागृत/प्रबुद्ध) कहलाए।
लगभग उसी काल में, एक और राजकुमार वर्धमान — जो लिच्छवी गणराज्य के ज्ञातृक कुल में जन्मे थे — तीस वर्ष की आयु में अपना राजसी जीवन त्यागकर बारह वर्षों की कठोर तपस्या पर निकल पड़े और "महावीर" (महान विजेता) कहलाए। दोनों ही छठी शताब्दी ईसा पूर्व के महाजनपद-काल में, लगभग एक ही सामाजिक परिस्थितियों की प्रतिक्रिया में उभरे — यह वह काल था जब वैदिक कर्मकांड की जटिलता व वर्ण-व्यवस्था की कठोरता से समाज में गहरी बेचैनी फैली हुई थी। आइए, इस अध्याय में हम इन दोनों महान धर्मों — जैन धर्म व बौद्ध धर्म — को गहराई से समझें।
छठी शताब्दी ईसा पूर्व को भारतीय इतिहास में "द्वितीय नगरीकरण" (Second Urbanisation) का काल कहा जाता है — इसी दौर में जैन व बौद्ध धर्म सहित लगभग 62 विधर्मी/अपरंपरागत संप्रदाय (heterodox sects) उभरे। इनके उदय के पीछे कई सामाजिक-आर्थिक कारण थे:
जैन धर्म वर्धमान महावीर द्वारा "स्थापित" नहीं, बल्कि "प्रवर्तित/पुनर्जीवित" धर्म माना जाता है — जैन परंपरा के अनुसार महावीर 24वें व अंतिम तीर्थंकर (Tirthankara) थे, जबकि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे। "जैन" शब्द "जिन" से बना है, जिसका अर्थ है "विजेता" (जिसने इंद्रियों व वासनाओं पर विजय पाई)।
✍️ रचनाकार: जन्म: लगभग 540 ई.पू., कुण्डग्राम (वैशाली के निकट) क्षत्रिय राजकुमार, ज्ञातृक कुल (वज्जि संघ का भाग) में जन्म — पिता सिद्धार्थ व माता त्रिशला (लिच्छवी राजकुमारी)। 30 वर्ष की आयु में गृह-त्याग कर 12 वर्षों की कठोर तपस्या की। 42 वर्ष की आयु में जृम्भिकग्राम में एक साल वृक्ष के नीचे "कैवल्य ज्ञान" (सर्वज्ञता) प्राप्त हुआ। 72 वर्ष की आयु में पावापुरी (बिहार) में निर्वाण प्राप्त किया, लगभग 468 ई.पू.।
जैन धर्म के अनुसार मोक्ष (कैवल्य) प्राप्ति के लिए तीन "रत्नों" का पालन आवश्यक है:
| त्रिरत्न (Three Jewels) | अर्थ |
|---|---|
| सम्यक् दर्शन (Right Faith) | तीर्थंकरों द्वारा बताए सत्य में सही व दृढ़ आस्था |
| सम्यक् ज्ञान (Right Knowledge) | जीव, अजीव व सृष्टि के वास्तविक स्वरूप का सही व संदेह-रहित ज्ञान |
| सम्यक् चरित्र (Right Conduct) | पाँच महाव्रतों का पालन करते हुए सदाचारपूर्ण जीवन जीना |
A. अहिंसा (Non-violence) — किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म से हानि न पहुँचाना — जैन धर्म का सबसे केंद्रीय सिद्धांत। महावीर ने कहा — "सभी प्राणी जीना चाहते हैं, सभी को जीवन प्रिय है।"
B. सत्य (Truthfulness) — सदैव सत्य वचन बोलना।
C. अस्तेय (Non-stealing) — बिना दी हुई वस्तु ग्रहण न करना।
D. अपरिग्रह (Non-possession) — भौतिक वस्तुओं व संपत्ति के प्रति मोह-त्याग।
E. ब्रह्मचर्य (Celibacy) — महावीर द्वारा जोड़ा गया पाँचवाँ व्रत — पूर्ण संयम व सांसारिक विषय-वासनाओं का त्याग।
दार्शनिक विशेषता: जैन दर्शन में "अनेकांतवाद" (Anekantavada — सत्य के अनेक पहलू) व "स्यादवाद" (Syadvada — सापेक्षता का सिद्धांत, "कदाचित ऐसा हो सकता है") महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं — इनके अनुसार कोई भी वस्तु/सत्य केवल एक दृष्टिकोण से पूर्ण रूप से नहीं समझा जा सकता, इसे विभिन्न कोणों से देखना आवश्यक है। जैन धर्म सृष्टि को "अनादि-अनंत" (बिना आदि-अंत के) मानता है तथा किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर की अवधारणा को स्वीकार नहीं करता।
महावीर के लगभग दो सौ वर्ष बाद (लगभग तीसरी-पहली शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास) जैन धर्म दो प्रमुख संप्रदायों में विभाजित हो गया।
ध्यान दें: दोनों संप्रदायों में मौलिक सिद्धांतों (अहिंसा, कर्म, अनेकांतवाद) पर कोई मतभेद नहीं है — भेद मुख्यतः आचार-व्यवहार (वस्त्र-धारण) व कुछ व्याख्याओं तक सीमित है।
✍️ रचनाकार: जन्म: लगभग 563 ई.पू., लुम्बिनी (नेपाल) शाक्य गण के क्षत्रिय कुल में जन्म — पिता शुद्धोधन (शाक्य गणराज्य के प्रमुख) व माता महामाया। विवाह यशोधरा से, पुत्र राहुल। 29 वर्ष की आयु में वृद्ध, रोगी व शव को देखकर विचलित होकर गृह-त्याग ("महाभिनिष्क्रमण") किया। 6 वर्षों तक कठोर तप के बाद भी सत्य न मिलने पर "मध्यम मार्ग" अपनाया। 35 वर्ष की आयु में बोधगया (बिहार) में पीपल वृक्ष के नीचे "बोधि" (ज्ञान) प्राप्त हुआ। सारनाथ (वाराणसी के निकट) में पहला उपदेश दिया — इसे "धर्मचक्र प्रवर्तन" कहा जाता है। 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में महापरिनिर्वाण प्राप्त हुआ, लगभग 483 ई.पू.।
| स्थल | घटना |
|---|---|
| लुम्बिनी (नेपाल) | बुद्ध का जन्म-स्थान |
| बोधगया (बिहार) | ज्ञान-प्राप्ति (बोधि) स्थल — पीपल/बोधि वृक्ष के नीचे |
| सारनाथ (उत्तर प्रदेश) | प्रथम उपदेश — धर्मचक्र प्रवर्तन |
| कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) | महापरिनिर्वाण स्थल |
बुद्ध ने सारनाथ में अपने प्रथम उपदेश में चार आर्य सत्यों (Four Noble Truths) की व्याख्या की — यह बौद्ध दर्शन का मूल आधार है:
| आर्य सत्य | अर्थ |
|---|---|
| दुःख (Dukkha) | संसार में सर्वत्र दुःख व्याप्त है — जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, अप्रिय संयोग — सभी दुःखमय हैं |
| दुःख समुदाय (Samudaya) | दुःख का कारण है "तृष्णा" (Tanha) — अपूर्ण इच्छाएँ व लालसा |
| दुःख निरोध (Nirodha) | तृष्णा का पूर्ण नाश करने से दुःख का भी अंत हो जाता है — यही "निर्वाण" की अवस्था है |
| दुःख निरोध मार्ग (Magga) | दुःख-निवारण का मार्ग है "अष्टांगिक मार्ग" (Eightfold Path) |
अष्टांगिक मार्ग (Eightfold Path) — निर्वाण प्राप्ति के आठ सोपान:
बुद्ध ने अत्यधिक विलासिता (जैसा उनका राजसी जीवन था) और अत्यधिक कठोर तपस्या (जो उन्होंने पहले 6 वर्ष तक की) — दोनों को अस्वीकार करते हुए एक संतुलित "मध्यम मार्ग" (Middle Path) अपनाने की सलाह दी। इसे समझने के लिए वीणा के तार का उदाहरण दिया जाता है — तार न बहुत ढीला हो, न बहुत कसा, तभी सुरीला संगीत बजता है।
बुद्ध की मृत्यु (लगभग 5वीं-4वीं शताब्दी ई.पू.) के बाद उनके उपदेशों को शिष्यों ने वैशाली में एक "स्थविर परिषद" में संकलित किया — इस संकलन को "त्रिपिटक" (तीन टोकरियाँ) कहा जाता है।
| पिटक | विषयवस्तु |
|---|---|
| विनय पिटक (Vinaya Pitaka) | संघ (मठ-व्यवस्था) के लिए नियम-कानून व अनुशासन |
| सुत्त पिटक (Sutta Pitaka) | बुद्ध के मूल उपदेश एवं शिक्षाएँ — थेरीगाथा भी इसी का भाग |
| अभिधम्म पिटक (Abhidhamma Pitaka) | गहन दार्शनिक एवं तात्विक विवेचन |
बुद्ध के उपदेशों के संकलन, व्याख्या व मतभेदों को सुलझाने के लिए समय-समय पर बड़ी सभाएँ (संगीतियाँ) आयोजित हुईं — यह विषय परीक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण है:
| संगीति | काल एवं स्थान | संरक्षक/अध्यक्ष | मुख्य परिणाम |
|---|---|---|---|
| प्रथम संगीति | लगभग 483 ई.पू., राजगृह (सप्तपर्णी गुफा) | राजा अजातशत्रु; अध्यक्ष महाकस्सप | उपालि द्वारा विनय पिटक व आनंद द्वारा सुत्त पिटक का पाठ संकलित |
| द्वितीय संगीति | लगभग 383 ई.पू., वैशाली | राजा कालाशोक | "दस बिंदुओं" के विवाद पर चर्चा — संघ में पहला विभाजन (स्थविरवादी व महासंघिक) |
| तृतीय संगीति | लगभग 250 ई.पू., पाटलिपुत्र | सम्राट अशोक; अध्यक्ष मोग्गलिपुत्त तिस्स | अभिधम्म पिटक का संकलन — त्रिपिटक पूर्ण; बौद्ध धर्म के विदेश-प्रसार हेतु मिशनरी भेजे गए |
| चतुर्थ संगीति | लगभग प्रथम शताब्दी ई., कुण्डलवन (कश्मीर) | कुषाण सम्राट कनिष्क; अध्यक्ष वसुमित्र (उपाध्यक्ष अश्वघोष) | बौद्ध धर्म का हीनयान व महायान में औपचारिक विभाजन |
परीक्षा हेतु याद रखें: प्रथम संगीति — राजगृह/अजातशत्रु; द्वितीय — वैशाली/कालाशोक; तृतीय — पाटलिपुत्र/अशोक; चतुर्थ — कश्मीर/कनिष्क — यह क्रम याद रखना Prelims के लिए अत्यंत उपयोगी है।
पहली शताब्दी ईस्वी तक बौद्ध धर्म में एक बड़ा वैचारिक परिवर्तन आया — बुद्ध की मूर्ति-पूजा व "बोधिसत्व" (करुणामय, जो स्वयं निर्वाण प्राप्त कर सकते थे परंतु दूसरों की सहायता हेतु संसार में रुके रहे) की अवधारणा का उदय हुआ। इस नए मार्ग को "महायान" (महान मार्ग/यान) कहा गया, जबकि पुराने मार्ग को महायान अनुयायियों ने "हीनयान" (लघु मार्ग) कहा — परंतु पुरानी परंपरा के अनुयायी स्वयं को "थेरवादी" (theravadin — अपने वरिष्ठ गुरुओं/थेरों के मार्ग पर चलने वाले) कहते थे।
स्तूप (Stupa) — संस्कृत में "ढेर/टीला" — मूलतः अर्ध-गोलाकार मिट्टी का टीला, जिसमें बुद्ध या अन्य बौद्ध महापुरुषों के अवशेष (relics) रखे जाते थे। अशोकावदान के अनुसार सम्राट अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को विभिन्न नगरों में वितरित कर उन पर स्तूप बनवाए।
| स्तूप का भाग | विवरण |
|---|---|
| अंड (Anda) | अर्ध-गोलाकार मिट्टी का मूल टीला |
| हर्मिका (Harmika) | बालकनी-जैसी संरचना, देवताओं के निवास का प्रतीक |
| यष्टि (Yashti) | हर्मिका से ऊपर उठा हुआ मस्तूल, छत्र (छतरी) सहित |
| वेदिका/रेलिंग | पवित्र व सांसारिक क्षेत्र को अलग करने वाली घेराबंदी, बाँस-बाड़े जैसी नक्काशी |
⏰ काल: मौर्य काल में निर्माण प्रारंभ, शुंग-सातवाहन काल में विस्तार
⭐ महत्व: सबसे सुरक्षित प्राचीन स्तूप — चार भव्य नक़्क़ाशीदार तोरणद्वार (gateways) चारों दिशाओं में। 1818 में "पुनः खोजा" गया, अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा अध्ययन किया गया। भोपाल की शाहजहाँ बेगम व सुल्तान जहाँ बेगम ने संरक्षण हेतु धन दिया, जिससे यह यूरोप ले जाए जाने से बच गया। 1989 में UNESCO विश्व धरोहर स्थल घोषित।
⏰ काल: सातवाहन काल
⭐ महत्व: साँची के विपरीत, अमरावती की अधिकांश मूर्तियाँ 1796 में खोज के बाद बिखर गईं — वाल्टर इलियट (1854) द्वारा एकत्रित पट्टिकाएँ "इलियट मार्बल्स" कहलाईं, जो कोलकाता, चेन्नई व लंदन तक बिखर गईं — यह भारतीय पुरावशेषों के संरक्षण में हुई एक बड़ी चूक का उदाहरण है।
बुद्ध व महावीर के अतिरिक्त इसी काल में अन्य कई विधर्मी संप्रदाय भी उभरे, जिनमें आजीवक व लोकायत प्रमुख थे — इनके मूल ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं, इनके बारे में जानकारी अन्य परंपराओं के ग्रंथों से ही मिलती है।
| मक्खलि गोसाल (आजीवक परंपरा) | अजित केशकंबलिन (लोकायत/चार्वाक परंपरा) |
|---|---|
| नियतिवाद — कर्म व पुण्य से भाग्य नहीं बदला जा सकता | दान, यज्ञ व परलोक के अस्तित्व को नकारना |
| सुख-दुःख पूर्वनिर्धारित हैं, संसार-चक्र में परिवर्तन असंभव | मनुष्य चार तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु) से बना है, मृत्यु के बाद ये तत्व अपने मूल स्रोत में लौट जाते हैं |
| सब कुछ पूर्वनिर्धारित है, जैसे धागे की गेंद अपनी पूरी लंबाई तक खुलती है | दान की अवधारणा को खोखला झूठ बताया — मृत्यु के बाद कुछ शेष नहीं रहता |
बौद्ध धर्म भारत से बाहर मध्य एशिया, चीन, कोरिया, जापान, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड व इंडोनेशिया तक फैला — जबकि जैन धर्म मुख्यतः भारत तक ही सीमित रहा, परंतु भारत में आज भी एक जीवंत परंपरा के रूप में कायम है।
| बिंदु | जैन धर्म | बौद्ध धर्म |
|---|---|---|
| संस्थापक/प्रवर्तक | महावीर (24वें तीर्थंकर) | सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) |
| मूल भाषा | प्राकृत (अर्धमागधी) | पालि |
| केंद्रीय सिद्धांत | अहिंसा, अनेकांतवाद, कठोर तप | मध्यम मार्ग, अष्टांगिक मार्ग, करुणा |
| आत्मा की अवधारणा | आत्मा (जीव) का अस्तित्व स्वीकार | अनात्म — स्थायी आत्मा को नकारना |
| प्रमुख समर्थक वर्ग | व्यापारी वर्ग | व्यापारी, राजा (अशोक, कनिष्क), सभी वर्ग |
| भौगोलिक प्रसार | मुख्यतः भारत (गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान) | भारत सहित पूरे एशिया में |
| वर्तमान स्थिति | भारत में अल्पसंख्यक परंतु जीवंत परंपरा | भारत में लगभग लुप्त, एशिया में व्यापक |
""अत्त दीपो भव" — अपना दीपक स्वयं बनो, अपनी मुक्ति के लिए स्वयं प्रयास करो।" — बुद्ध, महापरिनिब्बान सुत्त
1. महावीर 24वें व अंतिम तीर्थंकर थे; प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव माने जाते हैं; पार्श्वनाथ 23वें तीर्थंकर थे। 2. महावीर का जन्म कुण्डग्राम (वैशाली निकट) में, कैवल्य ज्ञान जृम्भिकग्राम में, तथा निर्वाण पावापुरी में हुआ। 3. त्रिरत्न — सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र — जैन मोक्ष-प्राप्ति के तीन आधार। 4. पंचमहाव्रत — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य (पाँचवाँ महावीर द्वारा जोड़ा गया)। 5. दिगंबर-श्वेतांबर विभाजन — भद्रबाहु (दक्षिण गए) व स्थूलभद्र (मगध में रहे) की परंपराओं में भिन्नता से हुआ। 6. जैन साहित्य वल्लभी (गुजरात) की संगीति में लगभग 1500 वर्ष पूर्व लिखित रूप में संकलित हुआ। 7. बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में, ज्ञान बोधगया में, प्रथम उपदेश सारनाथ में, निर्वाण कुशीनगर में हुआ। 8. चार आर्य सत्य — दुःख, समुदाय (कारण), निरोध (अंत), मार्ग (अष्टांगिक मार्ग)। 9. अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग — सम्यक् दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्मान्त, आजीव, व्यायाम, स्मृति, समाधि। 10. बुद्ध ने अनात्मवाद (आत्मा को नकारना) व अनित्यवाद (क्षणभंगुरता) का सिद्धांत दिया — उपनिषद के आत्म-सिद्धांत से भिन्न। 11. त्रिपिटक — विनय पिटक (नियम), सुत्त पिटक (उपदेश), अभिधम्म पिटक (दर्शन)। 12. प्रथम संगीति — राजगृह (अजातशत्रु, महाकस्सप); द्वितीय — वैशाली (कालाशोक); तृतीय — पाटलिपुत्र (अशोक, मोग्गलिपुत्त तिस्स); चतुर्थ — कश्मीर (कनिष्क, वसुमित्र)। 13. हीनयान/थेरवाद — बुद्ध को मानव गुरु मानता है; महायान — बुद्ध व बोधिसत्व की मूर्ति-पूजा करता है। 14. साँची स्तूप — 1989 में UNESCO विश्व धरोहर घोषित; अमरावती स्तूप की मूर्तियाँ "इलियट मार्बल्स" कहलाकर बिखर गईं। 15. अजंता गुफाएँ (महाराष्ट्र) — जातक कथाओं पर आधारित विश्व-प्रसिद्ध भित्ति-चित्र। 16. महाप्रजापती गौतमी — बौद्ध संघ में प्रवेश पाने वाली प्रथम स्त्री; आनंद ने स्त्री-प्रवेश में सहायता की। 17. थेरीगाथा — भिक्षुणियों की रचित गाथाओं का संग्रह, सुत्त पिटक का भाग। 18. मक्खलि गोसाल (आजीवक) — नियतिवाद के प्रवर्तक; अजित केशकंबलिन (लोकायत) — भौतिकवादी दर्शन के प्रवर्तक। 19. नालंदा विश्वविद्यालय (बिहार) — गुप्तकाल का प्रमुख बौद्ध शिक्षा-केंद्र, ह्वेनसांग ने यहाँ अध्ययन किया। 20. बुद्ध व महावीर दोनों क्षत्रिय कुल से थे — दोनों ने वैदिक कर्मकांड व वर्ण-व्यवस्था का विरोध किया।
Q1. (UPSC Prelims) बौद्ध धर्म की कौन-सी संगीति सम्राट कनिष्क के संरक्षण में आयोजित हुई? (a) प्रथम (b) द्वितीय (c) तृतीय (d) चतुर्थ — उत्तर: (d) चतुर्थ Q2. (UPSC Prelims) महावीर के माता-पिता किस गणराज्य से संबंधित थे? (a) मल्ल (b) वज्जि (लिच्छवी) (c) शाक्य (d) कोलिय — उत्तर: (b) वज्जि Q3. (UPSC Mains) बौद्ध धर्म के हीनयान व महायान संप्रदायों की मूल मान्यताओं में अंतर स्पष्ट कीजिए। Q4. (UPSC Mains) जैन व बौद्ध धर्म के उदय ने तत्कालीन भारतीय समाज पर क्या प्रभाव डाला? विवेचना कीजिए। Q5. (RAS Pre) पार्श्वनाथ किस तीर्थंकर क्रम में आते हैं? (a) 22वें (b) 23वें (c) 24वें (d) 21वें — उत्तर: (b) 23वें Q6. (RAS Mains) जैन धर्म के दिगंबर व श्वेतांबर संप्रदायों के बीच प्रमुख अंतर स्पष्ट कीजिए। Q7. (UPSC Prelims) साँची स्तूप को UNESCO विश्व धरोहर स्थल कब घोषित किया गया? (a) 1989 (b) 2003 (c) 2014 (d) 1975 — उत्तर: (a) 1989 Q8. (UPSC Mains) प्राचीन भारत में बौद्ध संघ की संरचना व कार्यप्रणाली का वर्णन कीजिए। Q9. (RAS Pre) थेरीगाथा किस बौद्ध ग्रंथ का भाग है? (a) विनय पिटक (b) सुत्त पिटक (c) अभिधम्म पिटक (d) दीपवंश — उत्तर: (b) सुत्त पिटक
| काल/वर्ष | घटना |
|---|---|
| लगभग 563 ई.पू. | सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) का जन्म, लुम्बिनी |
| लगभग 540 ई.पू. | वर्धमान महावीर का जन्म, कुण्डग्राम |
| लगभग 528 ई.पू. | बुद्ध को बोधगया में ज्ञान-प्राप्ति |
| लगभग 483 ई.पू. | बुद्ध का महापरिनिर्वाण, कुशीनगर |
| लगभग 483 ई.पू. | प्रथम बौद्ध संगीति, राजगृह (अजातशत्रु) |
| लगभग 468 ई.पू. | महावीर का निर्वाण, पावापुरी |
| लगभग 383 ई.पू. | द्वितीय बौद्ध संगीति, वैशाली (कालाशोक) |
| तीसरी शताब्दी ई.पू. | प्रथम स्तूपों का निर्माण (साँची, भरहुत, सारनाथ) |
| लगभग 250 ई.पू. | तृतीय बौद्ध संगीति, पाटलिपुत्र (सम्राट अशोक) |
| लगभग तीसरी-पहली शताब्दी ई.पू. | जैन धर्म का दिगंबर-श्वेतांबर विभाजन प्रारंभ |
| प्रथम शताब्दी ई. | चतुर्थ बौद्ध संगीति, कश्मीर (कनिष्क) — हीनयान-महायान विभाजन |
| द्वितीय शताब्दी ई. आगे | महायान बौद्ध धर्म, वैष्णव-शैव भक्ति परंपराओं का विकास |
| लगभग 500 ई. | वल्लभी (गुजरात) संगीति — जैन साहित्य का लिखित संकलन |
| 5वीं-7वीं शताब्दी ई. | फाह्यान (गुप्तकाल) व ह्वेनसांग (हर्षकाल) की भारत यात्रा, नालंदा अध्ययन |
| 1818 ई. | साँची स्तूप की "पुनः खोज" |
| 1854 ई. | वाल्टर इलियट द्वारा अमरावती की मूर्तियों का संग्रहण ("इलियट मार्बल्स") |
| 1989 ई. | साँची को UNESCO विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया |