सोचिए एक बड़ा परिवार है — घर का सबसे बुज़ुर्ग सदस्य (राज्यपाल) ज़्यादातर फ़ैसले नौजवान मुखिया (मुख्यमंत्री) की सलाह पर ही लेता है, पर कुछ ख़ास और नाज़ुक मौक़ों पर अपने विवेक से भी फ़ैसला कर सकता है। मुखिया अपनी टीम (मंत्रिपरिषद्) बनाता है, और उस टीम के लिए रोज़ का हिसाब-किताब और योजना बनाने वाला "दिमाग़" होता है सचिवालय — जिसका सबसे वरिष्ठ सदस्य मुख्य सचिव कहलाता है।
पर सिर्फ़ योजना बनाने से काम नहीं चलता — ज़मीन पर उसे लागू करने के लिए अलग-अलग "हाथ-पैर" चाहिए, यही हैं निदेशालय (जैसे शिक्षा निदेशालय, पुलिस महकमा, राजस्व मंडल)। और अगर कहीं गड़बड़ी हो जाए, तो उसकी जाँच और निगरानी के लिए अलग-अलग चौकीदार भी बिठाए गए हैं — राज्य निर्वाचन आयोग, राज्य मानवाधिकार आयोग और लोकायुक्त।
यही है राज्य प्रशासन का पूरा ढाँचा — जिसे यह अध्याय एक-एक करके, राजस्थान के उदाहरणों के साथ समझाएगा। ध्यान रहे, संविधान ने राज्यों में भी केंद्र जैसा ही संसदीय ढाँचा अपनाया है (भाग VI, अनुच्छेद 152-237), इसलिए केंद्र की जो बातें आप पढ़ चुके हैं, उनका राज्य-रूप यहाँ मिलेगा।
1. राज्यपाल (Governor) — अनुच्छेद 153-162, नियुक्ति, शक्तियाँ, विवेकाधीन शक्तियाँ, विवाद
2. मुख्यमंत्री (Chief Minister) — अनुच्छेद 163-167; मुख्य कार्यपालिका का सिद्धांत — प्रकार, व्हाइट के 8 कार्य, गुण
3. मंत्रिपरिषद् (Council of Ministers) — सामूहिक उत्तरदायित्व, आकार की सीमा
4. राज्य सचिवालय (State Secretariat) — संरचना, पदसोपान; विभाग और गुलिक का 4P; नियोजन विभाग और राज्य योजना मंडल
5. मुख्य सचिव (Chief Secretary) — भूमिका, कार्य एवं शक्तियाँ
6. निदेशालयों की भूमिका (Role of Directorates) — सचिवालय बनाम निदेशालय; अजमेर स्थित मुख्यालय; संभाग और ज़िले
7. पुलिस प्रशासन (Police Administration) — पदसोपान, आयुक्तालय, प्रकाश सिंह मामला
8. राजस्व मंडल (Board of Revenue), अजमेर
9. राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) — अनुच्छेद 243K; 2026 के चुनाव
10. राज्य मानवाधिकार आयोग (State Human Rights Commission — SHRC)
11. लोकायुक्त (Lokayukta) — राजस्थान लोकायुक्त अधिनियम, 1973; उपयोगिता, मूल्यांकन, लोकपाल से तुलना
12. सार-तुलना और समय-रेखा

- संसदीय प्रणाली के अनुरूप प्रशासन: संविधान ने संघ और राज्य दोनों स्तरों पर संसदीय प्रणाली अपनाई — कार्यपालिका दो भागों में: नाममात्र की (राज्य में राज्यपाल) और वास्तविक (मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद्)। प्रशासनिक अधिकारी औपचारिक रूप से राज्यपाल के अधीन होते हैं — उनकी नियुक्ति, पदमुक्ति आदि उन्हीं के नाम से होती है — पर वास्तविक नियंत्रण संबंधित विभाग के मंत्री का होता है, जो नियुक्ति, स्थानांतरण, पदोन्नति और अनुशासनात्मक कार्यवाही देखता है। राज्यपाल केवल स्वीकृति देने का माध्यम है।
- अनुच्छेद 309: राज्य का विधानमंडल राज्य के पदों पर भर्ती और सेवा-शर्तों का नियमन क़ानून से कर सकता है; जब तक क़ानून न बने, राज्यपाल इसके नियम बनाता है।
- अनुच्छेद 310 — प्रसाद का सिद्धांत (Doctrine of Pleasure): राज्य की सिविल सेवा के सदस्य राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं; पर यह शक्ति आत्यंतिक नहीं — अनुच्छेद 311 और मूल अधिकारों के अधीन है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष-सदस्यों (अनुच्छेद 317) का कार्यकाल प्रसाद पर आधारित नहीं।
- अनुच्छेद 311 — दो संरक्षण: (1) किसी को उसके नियुक्ति-प्राधिकारी से अधीनस्थ अधिकारी द्वारा पद से नहीं हटाया जाएगा; (2) कार्यवाही से पहले सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर — आरोपों की सूचना, जाँच, बचाव का अवसर, और साक्ष्य के आधार पर दोषी पाए जाने पर ही दंड। इससे लोक सेवक स्वतंत्रता और तटस्थता से कार्य कर पाता है, यद्यपि अनुशासनात्मक कार्यवाही कठिन और लंबी हो जाती है।
- राज्य स्तर की संवैधानिक संस्थाएँ: राज्य लोक सेवा आयोग (अनुच्छेद 315-323 — योग्यता-आधारित, निष्पक्ष भर्ती; अनुच्छेद 16 से अवसर की समानता और 16(4) से आरक्षण), महाधिवक्ता (अनुच्छेद 165), राज्य वित्त आयोग (अनुच्छेद 243-I), राज्य निर्वाचन आयोग (243K)। अनुच्छेद 323क / 323ख (42वाँ संशोधन, 1976) — सेवा-विवादों के लिए प्रशासनिक अधिकरण; प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 की धारा 4(2) के अंतर्गत राज्य के अनुरोध पर राज्य प्रशासनिक अधिकरण बन सकता है (कई राज्यों में बने)।
- अखिल भारतीय सेवाएँ (IAS, IPS, IFS): भर्ती, सेवा-शर्तें और अनुशासनात्मक कार्यवाही संघ सरकार के पास, पर राज्य में नियुक्ति और स्थानांतरण राज्य सरकार के पास — दोहरा नियंत्रण; ये अधिकारी राष्ट्र की प्रशासनिक एकता सुनिश्चित करते हैं और राज्य प्रशासन के शीर्ष पदों (मुख्य सचिव, सचिव, कलेक्टर, SP) पर रहते हैं।
- ब्रिटिश विरासत: राज्य की प्रशासनिक इकाइयाँ — संभाग, ज़िला, उपखंड, तहसील, पटवार मंडल — और मुख्य सचिव, संभागीय आयुक्त, कलेक्टर जैसे पद ब्रिटिश काल की देन हैं। लॉर्ड कैनिंग (1859) की विभागीय (पोर्टफ़ोलियो) प्रणाली — मंत्री को विभाग का प्रभारी बनाना — और लॉर्ड कर्ज़न (1905) की कार्यकाल-प्रणाली (Tenure System) आज भी चल रही हैं। विधि का शासन (अनुच्छेद 14) — अधिकारी भी सामान्य क़ानून और सामान्य न्यायालयों के अधीन।
1राज्यपाल (Governor)
राज्यपाल राज्य का संवैधानिक या नाममात्र प्रमुख (Nominal/Constitutional Head) होता है — ठीक वैसे ही जैसे केंद्र में राष्ट्रपति। राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित है (अनुच्छेद 154), पर वह इसका प्रयोग मंत्रिपरिषद् की सलाह से करता है। राज्यपाल की एक दोहरी भूमिका भी है — वह राज्य का प्रमुख भी है, और साथ ही केंद्र सरकार का प्रतिनिधि (Agent of the Union) भी, जो राज्य में केंद्र की नज़र बनाए रखता है (देखें अध्याय 07 — केंद्र-राज्य संबंध)।
अनुच्छेद 153-162 | नियुक्ति: राष्ट्रपति द्वारा
- पद (अनुच्छेद 153): हर राज्य के लिए एक राज्यपाल; 7वें संविधान संशोधन (1956) के बाद एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी हो सकता है।
- नियुक्ति (अनुच्छेद 155): राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है — व्यवहार में केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय) की सलाह पर। योग्यता (अनुच्छेद 157-158): भारत का नागरिक, 35 वर्ष की आयु पूर्ण, राज्य विधानमंडल या संसद का सदस्य न हो, लाभ के पद पर न हो। शपथ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दिलाते हैं (अनुच्छेद 159)।
- कार्यकाल (अनुच्छेद 156): सामान्यतः 5 वर्ष, पर राष्ट्रपति के "प्रसादपर्यंत (During the Pleasure of the President)" — यानी कभी भी हटाया जा सकता है, कोई निश्चित सुरक्षा नहीं। पर बी.पी. सिंघल (2010) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हटाना मनमाना, सनकी या दुर्भावनापूर्ण नहीं हो सकता।
- दोहरी भूमिका: (1) राज्य का संवैधानिक प्रमुख — मंत्रिपरिषद् की सलाह पर कार्य (अनुच्छेद 163); (2) केंद्र का प्रतिनिधि — विशेषकर अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) की सिफ़ारिश भेजते समय।
- शक्तियाँ: कार्यपालिका (मुख्यमंत्री और मंत्रियों की नियुक्ति), विधायी (विधानसभा सत्र बुलाना या भंग करना, अभिभाषण, अध्यादेश — अनुच्छेद 213), वित्तीय (धन विधेयक की पूर्वानुमति), न्यायिक (क्षमादान — अनुच्छेद 161), एवं विवेकाधीन शक्तियाँ।
- विवेकाधीन शक्तियाँ (Discretionary Powers): त्रिशंकु विधानसभा (Hung Assembly) में मुख्यमंत्री चयन, बहुमत खो चुकी सरकार को बर्ख़ास्त करना, किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना (अनुच्छेद 200), तथा अनुच्छेद 356 की रिपोर्ट भेजना — ये वे इने-गिने मौक़े हैं जब राज्यपाल मंत्रिपरिषद् की सलाह के बिना स्वयं निर्णय ले सकता है। अनुच्छेद 163(2) के अनुसार कोई कार्य विवेकाधीन है या नहीं, इस पर राज्यपाल का निर्णय अंतिम है।
- वर्तमान राजस्थान के राज्यपाल: श्री हरिभाऊ किसनराव बागड़े (Haribhau Kisanrao Bagade) — 31 जुलाई 2024 से राजस्थान के 22वें राज्यपाल के रूप में कार्यरत (अक्टूबर 2026 में भी पदासीन)।

| राज्यपाल की शक्ति (Power) | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| कार्यपालिका (Executive) | मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद् की नियुक्ति, राज्य के प्रमुख अधिकारियों (महाधिवक्ता — अनुच्छेद 165, राज्य लोक सेवा आयोग अध्यक्ष और सदस्य, राज्य निर्वाचन आयुक्त) की नियुक्ति; राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति। |
| विधायी (Legislative) | विधानसभा का सत्र आहूत करना, सत्रावसान (Prorogue) करना और विधानसभा भंग करना (अनुच्छेद 174) — सदन की बैठक का स्थगन अध्यक्ष करते हैं; प्रथम सत्र और वार्षिक प्रथम सत्र में अभिभाषण (अनुच्छेद 176); विधेयकों पर अनुमति (अनुच्छेद 200); अध्यादेश (अनुच्छेद 213)। |
| वित्तीय (Financial) | धन विधेयक (Money Bill) पूर्व अनुमति के बिना पेश नहीं हो सकता; बजट उनकी ओर से रखा जाता है; राज्य आकस्मिकता निधि (Contingency Fund) पर नियंत्रण; पंचायतों और नगरपालिकाओं के लिए हर 5 वर्ष पर राज्य वित्त आयोग (अनुच्छेद 243-I)। |
| न्यायिक (Judicial) | राज्य के विषयों पर क्षमादान, लघुकरण और दंड-स्थगन की शक्ति (अनुच्छेद 161) — मृत्युदंड की क्षमा नहीं कर सकते (यह राष्ट्रपति की शक्ति है), पर निलंबन, परिहार या लघुकरण कर सकते हैं। |
| विवेकाधीन (Discretionary) | त्रिशंकु विधानसभा में मुख्यमंत्री चयन, विधेयक राष्ट्रपति हेतु आरक्षित रखना, अनुच्छेद 356 रिपोर्ट भेजना, बहुमत-परीक्षण का निर्देश। |
हाल के वर्षों में तमिलनाडु, केरल, पंजाब जैसे राज्यों में विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपाल द्वारा लंबे समय तक निर्णय न लेने (बिना अनुमति दिए, बिना लौटाए) को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में मामले गए — सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि राज्यपाल अनुच्छेद 200 के तहत अनिश्चितकाल तक विधेयक को "जेब में" (पॉकेट वीटो की तरह) नहीं रख सकते, उन्हें उचित समय-सीमा में निर्णय लेना होगा — यह केंद्र-राज्य संबंधों (देखें अध्याय 07) की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण उभरता विषय है।
अद्यतन: 8 अप्रैल 2025 के तमिलनाडु निर्णय ने 1 से 3 माह की समय-सीमा तय की थी; पर 20 नवंबर 2025 को राष्ट्रपति संदर्भ पर पाँच-न्यायाधीश पीठ ने राय दी कि न्यायालय समय-सीमा या "मानित स्वीकृति" नहीं थोप सकता, यद्यपि अनिश्चितकालीन निष्क्रियता की सीमित न्यायिक समीक्षा संभव है (विस्तार अध्याय 07)।
महत्वपूर्ण निर्णय: एस.आर. बोम्मई (1994) — बहुमत की परीक्षा सदन के पटल पर; रामेश्वर प्रसाद (2006) — बिहार विधानसभा का विघटन असंवैधानिक, राज्यपाल की रिपोर्ट दुर्भावनापूर्ण; नबाम रेबिया (2016) — राज्यपाल का विवेक सीमित, सत्र बुलाने में मंत्रिपरिषद् की सलाह मानें।
राजस्थान में अब तक चार बार राष्ट्रपति शासन लगा है — 1967, 1977, 1980 और 1992-93 में। इनमें सबसे लंबा 1992-93 (दिसंबर 1992 से दिसंबर 1993 तक, लगभग एक वर्ष) रहा, जब बाबरी-विध्वंस के बाद अन्य भाजपा-शासित राज्यों के साथ राजस्थान की सरकार भी बर्खास्त हुई।
परीक्षा-सूत्र: 4 बार — "67, 77, 80, 92"। राष्ट्रपति शासन में राज्यपाल राष्ट्रपति के एजेंट के रूप में प्रशासन चलाते हैं; विधानसभा निलंबित या भंग हो सकती है।
सोचिए घर के बड़े-बुज़ुर्ग (राज्यपाल) ज़्यादातर छोटे-बड़े फ़ैसले घर के मुखिया (मुख्यमंत्री) की सलाह पर ही लेते हैं — जैसे कौन-सा सामान ख़रीदना है, कब मेहमान बुलाने हैं। पर अगर परिवार में झगड़ा हो जाए और कोई भी फ़ैसला न ले पाए (त्रिशंकु विधानसभा), या मुखिया ग़लत काम कर रहा हो, तो बड़े-बुज़ुर्ग अपने विवेक से हस्तक्षेप करते हैं — यही है राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति।
राजस्थान के एकीकरण (1949) से 1956 तक राज्य का प्रमुख राजप्रमुख होता था — जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय। 7वें संविधान संशोधन और राज्य पुनर्गठन के बाद 1 नवंबर 1956 से राजप्रमुख का पद समाप्त होकर राज्यपाल का पद बना; पहले राज्यपाल सरदार गुरुमुख निहाल सिंह थे।
शास्त्रीय अर्थ: वह शक्ति जिसका प्रयोग राज्यपाल मंत्रिपरिषद् की सलाह के बिना, स्वयं अपने निर्णय से करता है — संविधान में स्पष्ट (जैसे अनुच्छेद 200 में विधेयक आरक्षित करना, छठी अनुसूची के कुछ मामले) या परिस्थितिजन्य (त्रिशंकु विधानसभा, बहुमत खो चुकी सरकार)।
सरल भाषा में: सामान्य दिनों में "रबर स्टांप", पर संकट के दिन "अंपायर"। उदाहरण: त्रिशंकु विधानसभा में किस दल के नेता को पहले सरकार बनाने बुलाया जाए — यह निर्णय राज्यपाल अपने विवेक से करता है (पर बहुमत की परीक्षा सदन के पटल पर ही — बोम्मई निर्णय)।
| आयोग / समिति | राज्यपाल पद पर प्रमुख सिफ़ारिशें |
|---|---|
| प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1969) | राज्यपाल लंबे सार्वजनिक जीवन और प्रशासनिक अनुभव वाला, निष्पक्ष व्यक्ति हो; विवेक के प्रयोग हेतु दिशानिर्देश बनें। |
| सरकारिया आयोग (1988) | राज्य के बाहर का प्रतिष्ठित व्यक्ति, हाल में सक्रिय राजनीति में न रहा हो; नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री से परामर्श; 5 वर्ष का कार्यकाल केवल असाधारण कारणों से कम हो; अनुच्छेद 356 का प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में। |
| पुंछी आयोग (2010) | "प्रसादपर्यंत" का सिद्धांत हटे — हटाने हेतु विधानसभा के प्रस्ताव जैसी प्रक्रिया; निश्चित 5 वर्ष का कार्यकाल; विधेयक पर 6 माह में निर्णय; राज्यपाल को विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति जैसे वैधानिक पदों से मुक्त रखा जाए। |
153 पद — 154 शक्ति — 155 नियुक्ति — 156 कार्यकाल — 157-158 योग्यता-शर्तें — 159 शपथ — 161 क्षमा — 163 मंत्रिपरिषद् और विवेक — 164 मंत्री — 165 महाधिवक्ता — 167 मुख्यमंत्री का कर्तव्य। याद रखें: "153 से 167 तक, राज्य की कार्यपालिका का पूरा ढाँचा"; केंद्र में यही क्रम 52 से 78 तक है।
2मुख्यमंत्री (Chief Minister)
जहाँ राज्यपाल राज्य का नाममात्र प्रमुख है, वहीं मुख्यमंत्री राज्य का वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख (Real Executive Head) होता है — ठीक केंद्र में प्रधानमंत्री की तरह। विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन का नेता ही राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री नियुक्त किया जाता है। कोई ग़ैर-सदस्य भी मुख्यमंत्री बन सकता है, पर उसे 6 माह के भीतर विधानमंडल का सदस्य बनना होता है।
अनुच्छेद 163-167 | नियुक्ति: राज्यपाल द्वारा
- नियुक्ति (अनुच्छेद 164): विधानसभा में बहुमत दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री नियुक्त करता है; शेष मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल करता है। मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद पर रहते हैं — व्यवहार में मुख्यमंत्री की इच्छा तक।
- अनुच्छेद 163: राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद् होगी।
- संवैधानिक कर्तव्य (अनुच्छेद 167): मुख्यमंत्री का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक कर्तव्य है — (क) मंत्रिपरिषद् के सभी निर्णयों और प्रशासन से जुड़े प्रस्तावित विधान की जानकारी राज्यपाल को संप्रेषित करना; (ख) राज्यपाल द्वारा माँगी गई प्रशासनिक और विधायी जानकारी देना; (ग) राज्यपाल के कहने पर किसी ऐसे विषय को मंत्रिपरिषद् के विचार हेतु रखना जिस पर किसी मंत्री ने अकेले निर्णय लिया हो। यही कर्तव्य मुख्यमंत्री को मंत्रिपरिषद् और राज्यपाल के बीच अनिवार्य "संचार-सेतु (Communication Link)" बनाकर सरकार का वास्तविक प्रमुख सिद्ध करता है।
- मुख्यमंत्री की भूमिका: मंत्रिपरिषद् का नेता — विभाग (पोर्टफ़ोलियो) आवंटन, कैबिनेट बैठकों की अध्यक्षता, मंत्रियों को हटाने की अनुशंसा; विधानसभा का नेता — सदन में सरकार का प्रवक्ता; राज्यपाल और मंत्रिपरिषद् के बीच सेतु; राज्य प्रशासन का समन्वयक — मुख्य सचिव और सचिवालय के माध्यम से पूरे प्रशासन-तंत्र पर निगरानी।
- "समकक्षों में प्रथम (Primus Inter Pares)": मुख्यमंत्री मंत्रिपरिषद् के अन्य सदस्यों में "प्रथम" तो है, पर सैद्धांतिक रूप से "समकक्ष" — व्यवहार में मुख्यमंत्री का प्रभाव और शक्ति सबसे अधिक होती है, क्योंकि वही पूरी टीम चुनता है; उसके त्यागपत्र से पूरी मंत्रिपरिषद् भंग हो जाती है।
- वर्तमान राजस्थान के मुख्यमंत्री: श्री भजनलाल शर्मा (Bhajan Lal Sharma) — 15 दिसंबर 2023 से।
मुख्यमंत्री क्रिकेट टीम के कप्तान जैसा है — वही तय करता है किसे कौन-सी ज़िम्मेदारी (विभाग) मिलेगी, वही रणनीति (नीति) बनाता है, और मैच के बाद वही अंपायर (राज्यपाल) को टीम की पूरी रिपोर्ट देता है। कप्तान भले ही टीम का "एक सदस्य" हो, पर असली फ़ैसले उसी के हाथ में होते हैं।
| मुख्यमंत्री की भूमिका (Role) | विवरण |
|---|---|
| मंत्रिपरिषद् का नेता | विभाग-बँटवारा, कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता, नीति-निर्णयों में अंतिम शब्द। |
| विधानसभा का नेता | सदन में सरकार की ओर से प्रमुख वक्ता, बहुमत बनाए रखने का दायित्व; विधानसभा भंग करने की सलाह। |
| राज्यपाल-मंत्रिपरिषद् सेतु (अनुच्छेद 167) | सभी मंत्रिपरिषद् निर्णयों की जानकारी राज्यपाल को देना — अनिवार्य संवैधानिक कर्तव्य। |
| प्रशासन का समन्वयक | मुख्य सचिव और सचिवालय के माध्यम से समूचे राज्य प्रशासन पर पर्यवेक्षण; वरिष्ठ अधिकारियों के तबादले-पदस्थापन। |
| दल का नेता और जननेता | सत्तारूढ़ दल का चेहरा; जन-शिकायतें, जन-सुनवाई। |
| राष्ट्रीय मंच पर प्रतिनिधि | नीति आयोग शासी परिषद् (देखें अध्याय 05), अंतर्राज्यीय परिषद्, क्षेत्रीय परिषद् जैसे मंचों पर राज्य का प्रतिनिधित्व। |
आलोचनात्मक मूल्यांकन: मुख्यमंत्री की वास्तविक शक्ति परिस्थितियों पर निर्भर करती है — स्पष्ट बहुमत और लोकप्रिय नेता हो तो वह अत्यंत शक्तिशाली, जबकि गठबंधन सरकार, दल के भीतर गुटबाज़ी या केंद्र में अलग दल की सरकार हो तो उसकी स्थिति कमज़ोर हो जाती है। सत्ता के केंद्रीकरण (मुख्यमंत्री कार्यालय का बढ़ता प्रभाव) से मंत्रिमंडलीय शासन के "व्यक्ति-केंद्रित" बनने की आलोचना भी होती है।
एकीकृत राजस्थान के पहले प्रधानमंत्री (तब यही पदनाम था) हीरालाल शास्त्री (30 मार्च 1949) थे; पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री टीकाराम पालीवाल (1952) बने। सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया रहे (लगभग 17 वर्ष), जिन्हें "आधुनिक राजस्थान का निर्माता" कहा जाता है।
2.1 मुख्य कार्यपालिका (Chief Executive) — सैद्धांतिक आधार
राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ठीक से समझने के लिए लोक प्रशासन की एक मूल अवधारणा जाननी ज़रूरी है — "मुख्य (प्रमुख) कार्यपालिका"। किसी भी देश या राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की तुलना एक पिरामिड (Pyramid) से की जा सकती है — आधार चौड़ा (हज़ारों कर्मचारी), और ऊपर जाते-जाते संकरा, अंत में एक बिंदु मात्र — यही शीर्ष (Apex) है। मुख्य कार्यपालिका प्रशासनिक पिरामिड का शीर्ष है — वह व्यक्ति या व्यक्ति-समूह जिसमें संविधान सरकार की कार्यपालिका शक्ति निहित करता है।
शास्त्रीय अर्थ: वह व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय, जो किसी देश या राज्य के प्रशासनिक तंत्र के शीर्ष पर होता है, जिसमें संविधान कार्यपालिका शक्ति निहित करता है, और जो संगठन के लक्ष्य, नीतियाँ, प्राथमिकताएँ तय करके पूरे प्रशासन को एकता और दिशा देता है।
सरल भाषा में: पूरे सरकारी तंत्र का "सबसे ऊपर बैठा मुखिया" — जो तय करता है कि क्या करना है, कौन करेगा, पैसा कहाँ से आएगा, और काम ठीक से हो रहा है या नहीं। उदाहरण: केंद्र में राष्ट्रपति (नाममात्र) और प्रधानमंत्री-सहित मंत्रिमंडल (वास्तविक); राजस्थान में राज्यपाल (नाममात्र) और मुख्यमंत्री-सहित मंत्रिमंडल (वास्तविक); नगर निगम में महापौर और आयुक्त अपने-अपने स्तर के मुख्य कार्यपालक हैं।
ध्यान दें — संघात्मक देशों (भारत, अमेरिका) में राष्ट्रीय स्तर के अलावा हर राज्य का अपना मुख्य कार्यपालक होता है, और स्थानीय स्तर पर भी (महापौर, अध्यक्ष, प्रमुख, नगर-प्रबंधक)। राष्ट्रीय कार्यपालक इन सबमें सर्वोच्च होता है, पर अपने क्षेत्र में हर स्तर का मुख्य कार्यपालक बाक़ी अधिकारियों से ऊपर होता है। मुख्य कार्यपालक विधिक, राजनीतिक और प्रशासनिक — तीनों प्रकार के कार्य करता है, इसलिए किसी संगठन की सफलता बहुत हद तक उसकी गतिशीलता और चरित्र पर निर्भर करती है।
2.2 मुख्य कार्यपालिका के प्रकार
(क) नाममात्र (Titular/Nominal) बनाम वास्तविक (Real) कार्यपालिका: संसदीय शासन में विधि के अनुसार सारी कार्यकारी सत्ता नाममात्र के प्रमुख (राजा / राष्ट्रपति / राज्यपाल) में निहित होती है, पर वह इसका प्रयोग मंत्रियों के परामर्श से करता है — व्यवहार में सत्ता प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रिमंडल के हाथ में चली जाती है। फिर भी नाममात्र का प्रमुख "शून्य" नहीं है — राजनीतिक संकट या गतिरोध के समय उसके पास विवेक से कार्य करने की अवशिष्ट शक्ति रहती है (जैसे राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ — खंड 1)।
| व्यवस्था | नाममात्र प्रमुख | वास्तविक प्रमुख | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| ब्रिटेन (संसदीय) | राजा / रानी | प्रधानमंत्री-सहित मंत्रिमंडल | परंपराओं पर आधारित |
| भारत — संघ | राष्ट्रपति | प्रधानमंत्री-सहित मंत्रिपरिषद् | अनुच्छेद 74 — सलाह बाध्यकारी |
| भारत — राज्य (राजस्थान) | राज्यपाल | मुख्यमंत्री-सहित मंत्रिपरिषद् | अनुच्छेद 163 — पर विवेकाधीन क्षेत्र भी |
| अमेरिका (अध्यक्षात्मक) | कोई नहीं | राष्ट्रपति (एकल) | सचिव राष्ट्रपति के अधीन, कांग्रेस से बाहर |
| स्विट्ज़रलैंड (बहुल) | कोई नहीं | संघीय परिषद् — 7 समान सदस्य | निश्चित कार्यकाल, कोई "प्रधान" नहीं |
(ख) संसदीय (Parliamentary) बनाम अध्यक्षात्मक (Presidential) कार्यपालिका: यह भेद प्रशासन के संगठन और कार्य-प्रणाली दोनों को गहराई से प्रभावित करता है।
- बहुल (Plural): मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री और अनेक मंत्री — सहयोगी, जो स्वयं दल के प्रभावशाली नेता होते हैं।
- मंत्री विधानमंडल के सदस्य होते हैं, सदन में बैठते हैं, विधेयक और बजट रखते हैं।
- विधानमंडल अविश्वास प्रस्ताव से कभी भी हटा सकता है — इसलिए निरंतर और प्रभावी उत्तरदायित्व।
- बहुल रचना से नियंत्रण-क्षेत्र (Span of Control) की समस्या कम।
- विधायिका ब्योरे में दख़ल कम देती है — विभागों के पुनर्गठन की अधिक स्वतंत्रता (ब्रिटेन: मिनिस्टर्स ऑफ़ द क्राउन एक्ट, 1946; भारत: राष्ट्रपति / राज्यपाल द्वारा बने कार्य-आवंटन नियम)।
- दोष: बहुदलीय व्यवस्था या दलीय अनुशासन के अभाव में अस्थिरता।
- एकल (Single): राष्ट्रपति अकेला वास्तविक कार्यपालक; उसके सचिव उसके अधीनस्थ, जिन्हें वह जब चाहे हटा सकता है।
- शक्ति-पृथक्करण और अवरोध-संतुलन — राष्ट्रपति और सचिव कांग्रेस की कार्यवाही में भाग नहीं लेते।
- निश्चित कार्यकाल (4 वर्ष); महाभियोग के बिना हटाना संभव नहीं।
- कांग्रेस ब्योरे पर क़ानून बनाकर नियंत्रण करती है; पुनर्गठन की शक्ति सीमित (पुनर्गठन अधिनियम 1939, 1945 में अनेक प्रतिबंध); स्वतंत्र नियामक आयोग राष्ट्रपति के नियंत्रण से बाहर।
- गुण: आदेश और निर्देशन में एकता, स्थिरता, आत्मविश्वास से कार्य।
- दोष: कार्यपालिका-विधायिका में तनाव; नीतियों के लिए कांग्रेस पर परोक्ष दबाव डालना पड़ता है।
निष्कर्ष: दोनों की तुलना से प्रायः यह माना जाता है कि प्रशासनिक दृष्टि से संसदीय कार्यपालिका अधिक लाभदायक है — अमेरिका में भी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन जैसे आलोचकों ने संसदीय सिद्धांतों की ओर सुधार सुझाए; 1921 का बजट एवं लेखा अधिनियम, 1936-37 की प्रशासनिक प्रबंध संबंधी राष्ट्रपति समिति (ब्राउनलो समिति) और 1949 के हूवर आयोग ने भी कार्यपालिका को राष्ट्रपति के एकीकृत नियंत्रण में लाने पर बल दिया।
संसदीय और अध्यक्षात्मक प्रणालियों का मिश्रण — 7 सदस्यीय संघीय परिषद् (Federal Council); सभी सदस्य पद में समान, कोई प्रधानमंत्री जैसा प्रमुख नहीं। सदस्य विधानमंडल की कार्यवाही में भाग लेते हैं, पर मतदान नहीं करते; विधानमंडल के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक इन्हें निश्चित अवधि के लिए चुनती है, और उस अवधि में हटाया नहीं जा सकता। नीति अस्वीकृत होने पर त्यागपत्र नहीं देते, बल्कि नीति बदल लेते हैं।
देखने में आदर्श, पर जिन देशों में स्विट्ज़रलैंड जैसी राजनीतिक परिस्थितियाँ नहीं, वहाँ अव्यावहारिक मानी जाती है।
2.3 मुख्य कार्यपालिका के कार्य — व्हाइट, वीग और गुलिक
मुख्य कार्यपालिका के उत्तरदायित्व की प्रकृति लाइन अभिकरणों जैसी है, पर उसका सबसे बड़ा लक्ष्य है — प्रशासन में यथासंभव एकता (Unity) स्थापित करना। उसके सभी कार्य इसी लक्ष्य के चारों ओर घूमते हैं, और उसकी सफलता भी इसी से आँकी जाती है।

| व्हाइट के अनुसार कार्य | अर्थ | राजस्थान के मुख्यमंत्री के संदर्भ में |
|---|---|---|
| 1. अनुकूल वातावरण की रचना | संगठन का मनोबल, ईमानदारी, नागरिकों के प्रति सौजन्य — सब नेतृत्व के चरित्र पर निर्भर। | सुशासन और भ्रष्टाचार-विरोधी संदेश, जन-सुनवाई की परंपरा। |
| 2. नीति-निर्माण | प्रबंध-नीति के बड़े प्रश्नों पर निर्णय; नीतियों में एकरूपता। | मंत्रिमंडल की अध्यक्षता, बजट-घोषणाएँ, नई नीतियाँ। |
| 3. बजट बनाना | वार्षिक अनुमानों की बड़ी मदों पर व्यक्तिगत ध्यान। | कई मुख्यमंत्रियों ने वित्त विभाग अपने पास रखा; वर्तमान में वित्त विभाग उप-मुख्यमंत्री दीया कुमारी के पास है, पर बजट की प्राथमिकताएँ मुख्यमंत्री तय करते हैं। |
| 4. निर्देश जारी करना | आज्ञाएँ, परिपत्र, अनौपचारिक पत्र, मौखिक निर्देश — काम ऊपर के आदेश से ही शुरू होता है। | मुख्य सचिव के माध्यम से विभागों को निर्देश। |
| 5. सेवीवर्ग का चयन | शीर्ष पदों पर नियुक्ति — राजनीतिक, भौगोलिक, वर्गगत संतुलन भी देखना पड़ता है। | मुख्य सचिव, DGP, विभागाध्यक्षों का चयन और पदस्थापन। |
| 6. पद-विमुक्ति (हटाना) | जिसे नियुक्त करे उसे हटा भी सके — तभी सब अधिकारी नीति लागू करने में उत्साह दिखाते हैं। | मंत्रियों को हटाने की सलाह; अधिकारियों के तबादले। |
| 7. निरीक्षण एवं नियंत्रण | सरकारी अभिकरणों की देखरेख; ऊँचा अधिकारी दैनिक कार्य कम देखता है। | विभागीय प्रगति की समीक्षा बैठकें, बजट-घोषणाओं की निगरानी। |
| 8. जन-संपर्क | जनता में प्रशासन का प्रतिनिधित्व, लोकमत का निर्माण; प्रेस-सम्मेलन। | जन-सुनवाई, संपर्क पोर्टल, जनसभाएँ। |
याद रखें — "वा-नी-ब-नि, च-ह-नि-ज" (वाणी बने, चाह निज): वातावरण, नीति, बजट, निर्देश — चयन, हटाना, निरीक्षण, जन-संपर्क।
जॉन ए. वीग (John A. Vieg) ने कार्यों को दो बड़े वर्गों में रखा — (1) प्रशासकीय नियोजन एवं निर्देशन: विधायिका से संबंध का स्वरूप, प्रमुख नीतियाँ और कार्यक्रम तय करना, उनके लिए संगठन-ढाँचा बनाना, अभिकरणों के प्रमुख नियुक्त कर उन्हें लक्ष्य बताना, बजट के माध्यम से कार्यक्रमों में संतुलन; (2) समन्वय एवं प्रशासकीय प्रतिवेदन: अच्छी योजना और योग्य कर्मचारियों के बावजूद सब ठीक चलेगा, यह निश्चित नहीं — इसलिए मुख्य कार्यपालिका सूचना और प्रतिवेदनों का केंद्र-बिंदु हो, एक अभिकरण की सूचना दूसरे तक पहुँचाए, और जनता व विधायिका को प्रतिवेदन दे।
लूथर गुलिक ने इन्हीं कार्यों को एक शब्द POSDCORB में समेट दिया — नियोजन, संगठन, कर्मचारी-व्यवस्था, निर्देशन, समन्वय, प्रतिवेदन और बजट (विस्तार अध्याय 01)।
2.4 सफल मुख्य कार्यपालक के गुण
| गुण-समूह | आवश्यक गुण |
|---|---|
| शारीरिक और नैतिक | अच्छा स्वास्थ्य और शारीरिक सहनशक्ति; उच्च और दोषरहित चरित्र; समय की पाबंदी; कर्तव्य-परायणता। |
| व्यक्तित्व | आत्मविश्वास, उत्साह, सेवा-भाव, मित्रता, ईमानदारी, निष्ठा, न्याय-भावना; आकर्षक व्यक्तित्व, अच्छा स्वभाव, अनुशासन। |
| निर्णय-क्षमता | सही और समय पर निर्णय; दूरदर्शिता — निर्णयों के संभावित परिणामों का अनुमान; पहल-क़दमी (Initiative)। |
| नेतृत्व | संगठन के उद्देश्य के प्रति निष्ठा दिखाकर कर्मचारियों का विश्वास जीतना; प्रेरणा देना, सहयोग पाना; अपने समूह को बाहरी आलोचना से बचाना। |
| प्रबंधकीय | उचित मात्रा में प्राधिकार का प्रत्यायोजन (Delegation); लोगों के गुण-दोष परखना और उनकी शक्ति का संगठन-हित में उपयोग। |
| राजनीतिक | राजनीतिक विवेक (Political Sense) — देश-प्रदेश के राजनीतिक वातावरण को परखने की क्षमता। |
- 1. चरित्र: जैसे जीवन के लिए सूर्य-प्रकाश आवश्यक है, वैसे ही मुख्य सचिव से लेकर निम्नतम कर्मचारी तक हर प्रशासक के लिए चरित्र।
- 2. उपयुक्त सलाह पहचानना और समझ के अनुसार शीघ्र निर्णय लेना।
- 3. अधीनस्थों में विश्वास — कठिन परिस्थिति और दबाव में उच्च अधिकारी उनका साथ नहीं छोड़ेगा; लोकतंत्र में किसी विभाग की सफलता के लिए यह अनिवार्य।
- 4. निर्णय पर अटल रहना — लोगों को भरोसा हो कि निर्णय बार-बार नहीं बदलेगा।
- 5. संतुलित स्वभाव — बुरा स्वभाव दृढ़ता का स्थान नहीं ले सकता।
- 6. सामाजिक उद्देश्य की भावना जगाना — कर्मचारी समझें कि वे क्या कर रहे हैं और वह कार्य कितना सराहनीय है।
2.5 वास्तविकता — "छलनी और कीप"
क़ानूनी दृष्टि से मुख्य कार्यपालक एक "अधिनायक" जैसा लगता है जिसके हाथ में पूरी सत्ता है — पर व्यवहार में वह अकेला सब नहीं कर सकता, जैसे टीम का कप्तान अकेले पूरा खेल नहीं खेल सकता। पदसोपान के हर स्तर के अधिकारी "छलनी और कीप (Filter and Funnel)" का काम करते हैं — अधिकांश समस्याएँ नीचे ही हल हो जाती हैं, और जो ऊपर पहुँचती हैं वे इतनी "पकी हुई" होती हैं कि मुख्य कार्यपालक को प्रायः "हाँ" ही कहना होता है। फिर भी वह निष्क्रिय यंत्र नहीं — असाधारण मामलों में नीचे से कई विकल्प भेजे जाते हैं और चुनाव वही करता है।
एफ़.सी. बिर्ने (F.C. Birrne) के व्यंग्यात्मक वर्णन के अनुसार मुख्य कार्यपालक को बस इतना करना होता है — तय करे कि क्या काम होना है; उसे किसी को सौंप दे; उसके पक्ष-विपक्ष के तर्क सुने; देखे कि काम हो रहा है या नहीं; न होने के बहाने सुने; तय करे कि बहाने बनाने वाले को हटाया जाए या नहीं; सोचे कि ख़ुद कर लेता तो कितना अच्छा होता — और अंत में इस दुःखद निष्कर्ष पर पहुँचे कि ख़ुद करना अव्यावहारिक है!
यह सूची स्वयं बताती है कि उसका कार्यक्षेत्र कितना व्यापक है — इसीलिए मुख्यमंत्री को मुख्य सचिव, मुख्यमंत्री कार्यालय और सचिवालय जैसे सहायक तंत्र की ज़रूरत पड़ती है (खंड 4-5)।
2.6 तुलनात्मक दृष्टि — राज्य और केंद्र की कार्यपालिका
| बिंदु | राष्ट्रपति | राज्यपाल |
|---|---|---|
| पद पर आना | निर्वाचक मंडल द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन (अनुच्छेद 54) | राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति (अनुच्छेद 155) |
| हटाना | केवल महाभियोग (अनुच्छेद 61) | राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत — कोई महाभियोग नहीं |
| मंत्रिपरिषद् की सलाह | बाध्यकारी (42वाँ / 44वाँ संशोधन, अनुच्छेद 74) | सामान्यतः बाध्यकारी, पर संविधान-प्रदत्त विवेकाधीन क्षेत्र (अनुच्छेद 163) |
| क्षमादान | मृत्युदंड की क्षमा और सैन्य न्यायालय के दंड भी (अनुच्छेद 72) | मृत्युदंड की क्षमा नहीं (अनुच्छेद 161) |
| आपात शक्ति | अनुच्छेद 352, 356, 360 | स्वयं कोई आपात-शक्ति नहीं; केवल 356 हेतु रिपोर्ट |
| विधेयक | राज्य के आरक्षित विधेयकों पर भी निर्णय (अनुच्छेद 201) | विधेयक राष्ट्रपति हेतु आरक्षित कर सकता है (अनुच्छेद 200) |
- लोकसभा में बहुमत दल का नेता; नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा (अनुच्छेद 75)।
- अनुच्छेद 78 — राष्ट्रपति को सूचना देने का कर्तव्य।
- नीति आयोग का पदेन अध्यक्ष; अंतर्राज्यीय परिषद् का अध्यक्ष।
- मंत्रिपरिषद् की सीमा — लोकसभा का 15%।
- सहायक तंत्र: कैबिनेट सचिव, प्रधानमंत्री कार्यालय।
- विधानसभा में बहुमत दल का नेता; नियुक्ति राज्यपाल द्वारा (अनुच्छेद 164)।
- अनुच्छेद 167 — राज्यपाल को सूचना देने का कर्तव्य।
- राज्य योजना मंडल का अध्यक्ष; नीति आयोग शासी परिषद् का सदस्य।
- मंत्रिपरिषद् की सीमा — विधानसभा का 15% (न्यूनतम 12)।
- सहायक तंत्र: मुख्य सचिव, मुख्यमंत्री कार्यालय; पर केंद्र में अलग दल की सरकार हो तो राज्यपाल के माध्यम से दबाव।
3मंत्रिपरिषद् (Council of Ministers)
राज्य मंत्रिपरिषद्, केंद्रीय मंत्रिपरिषद् की तरह ही, विधानसभा के प्रति "सामूहिक रूप से उत्तरदायी (Collectively Responsible)" होती है — अनुच्छेद 164(2) इसका सीधा प्रावधान करता है। यानी एक मंत्री की ग़लती पर भी पूरी मंत्रिपरिषद् ज़िम्मेदार मानी जाती है, और अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर पूरी मंत्रिपरिषद् को त्यागपत्र देना पड़ता है (देखें अध्याय 08 — विधायी नियंत्रण)। मंत्री व्यक्तिगत रूप से राज्यपाल के प्रति भी उत्तरदायी होते हैं।
- मंत्रिपरिषद् के तीन स्तर — केंद्र की तरह ही राज्यों में भी: कैबिनेट मंत्री (पूर्ण विभाग और कैबिनेट बैठकों में भागीदारी), राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार सहित या रहित), उप-मंत्री (किसी वरिष्ठ मंत्री के सहयोगी)।
- मंत्रिमंडल (Cabinet) और मंत्रिपरिषद् (Council of Ministers) में अंतर: मंत्रिपरिषद् व्यापक शब्द है (सभी स्तर के मंत्री शामिल), जबकि मंत्रिमंडल इसका छोटा, अधिक शक्तिशाली अंतरंग निकाय है, जो वास्तविक नीति-निर्णय लेता है — व्यवहार में "कैबिनेट" ही असली सत्ता-केंद्र होता है। मंत्रिमंडल की समितियाँ (जैसे वित्त, नियुक्ति) भी बनती हैं।
- मंत्रिपरिषद् के आकार पर सीमा: 91वें संविधान संशोधन (2003) के अनुसार (अनुच्छेद 164(1क)), किसी भी राज्य की मंत्रिपरिषद् का आकार (मुख्यमंत्री सहित) विधानसभा की कुल सदस्य-संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकता (छोटे राज्यों के लिए न्यूनतम 12 सदस्य) — दल-बदल और अनावश्यक रूप से बड़ी मंत्रिपरिषद् रोकने हेतु। राजस्थान की विधानसभा में 200 सदस्य हैं, इसलिए यहाँ मंत्रिपरिषद् में मुख्यमंत्री सहित अधिकतम 30 सदस्य हो सकते हैं।
- कुछ राज्यों में उप-मुख्यमंत्री (Deputy Chief Minister) का भी पद होता है — यह पूर्णतः राजनीतिक और प्रशासनिक सुविधा का पद है, संविधान में इसका कोई अलग उल्लेख नहीं है; तकनीकी रूप से उप-मुख्यमंत्री भी मंत्रिपरिषद् का एक सामान्य सदस्य (कैबिनेट मंत्री) ही होता है, बस प्रोटोकॉल में मुख्यमंत्री के बाद वरीयता (Seniority) पाता है।
सोचिए एक परिवार एक ही थाली से खाना खाता है — अगर एक सदस्य की वजह से खाना ख़राब निकले, तो पूरा परिवार शर्मिंदा होता है, अकेला वह सदस्य नहीं। ठीक इसी तरह मंत्रिपरिषद् के किसी एक मंत्री की भी बड़ी ग़लती पर विधानसभा पूरी मंत्रिपरिषद् को ज़िम्मेदार मानकर अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है — यही है "सामूहिक उत्तरदायित्व"।
दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में गठित मंत्रिपरिषद् में श्रीमती दीया कुमारी (Diya Kumari) और श्री प्रेम चंद बैरवा (Prem Chand Bairwa) को उप-मुख्यमंत्री (Deputy CM) बनाया गया — दोनों भाजपा से हैं। 30 दिसंबर 2023 के शपथ-ग्रहण में कुल 22 विधायकों को मंत्री बनाया गया, जिनमें लगभग 12 कैबिनेट मंत्री तथा शेष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार सहित या रहित) शामिल हैं — यह राजस्थान में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की परंपरा को दर्शाता है।
शास्त्रीय अर्थ: संसदीय शासन का वह सिद्धांत जिसके अनुसार मंत्रिपरिषद् अपने सभी निर्णयों और प्रत्येक मंत्री के विभागीय कार्यों के लिए विधानसभा के प्रति एक इकाई के रूप में उत्तरदायी होती है — "साथ तैरते हैं, साथ डूबते हैं"।
सरल भाषा में: मंत्रिमंडल के भीतर भले बहस हो, बाहर सब एक ही आवाज़ में बोलते हैं; और सदन का विश्वास गया तो सब एक साथ जाते हैं। उदाहरण: कैबिनेट ने कोई नीति तय की और कोई मंत्री सार्वजनिक रूप से उसका विरोध करना चाहे, तो परंपरा के अनुसार उसे पहले त्यागपत्र देना होता है।
| बिंदु | मंत्रिपरिषद् (Council of Ministers) | मंत्रिमंडल (Cabinet) |
|---|---|---|
| आकार | बड़ा — सभी स्तर के मंत्री (राजस्थान में अधिकतम 30) | छोटा — केवल कैबिनेट मंत्री |
| संवैधानिक स्थिति | अनुच्छेद 163-164 में उल्लेख | मूल संविधान में नहीं; 44वें संशोधन (1978) से अनुच्छेद 352 में शब्द जुड़ा |
| बैठक | पूरी परिषद् सामूहिक रूप से कम ही बैठती है | नियमित बैठकें — वास्तविक निर्णय-केंद्र |
| कार्य | मंत्रिमंडल के निर्णयों का पालन | नीति तय करना, परिषद् को निर्देश, निर्णयों की निगरानी |
| उत्तरदायित्व | सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति | परिषद् के सामूहिक उत्तरदायित्व को लागू करवाता है |
कार्य-संचालन नियम (Rules of Business): अनुच्छेद 166(3) के अंतर्गत राज्यपाल सरकार के कार्य के सुविधाजनक संचालन और मंत्रियों में कार्य-आवंटन के नियम बनाता है — यही नियम तय करते हैं कि कौन-सा मामला मंत्री स्तर पर निपटेगा, कौन-सा मुख्यमंत्री या मंत्रिमंडल के सामने जाएगा, और किन मामलों में वित्त या विधि विभाग की सहमति आवश्यक है। अनुच्छेद 166(1) के अनुसार राज्य सरकार की सभी कार्यपालिका कार्रवाइयाँ राज्यपाल के नाम से की जाती हैं — यही "नाममात्र बनाम वास्तविक कार्यपालिका" का व्यावहारिक रूप है।
4राज्य सचिवालय (State Secretariat)
राज्य सचिवालय राज्य सरकार का सर्वोच्च नीति-निर्माता और समन्वयक निकाय है — यह एक "स्टाफ़ एजेंसी (Staff Agency)" है (देखें अध्याय 03 — सूत्र और स्टाफ़), यानी यह स्वयं सीधे जनता को सेवा नहीं देता, बल्कि नीति बनाकर मार्गदर्शन और निगरानी करता है। इसे राज्य सरकार का "मस्तिष्क (Brain)" कहा जा सकता है, जबकि निदेशालय और फ़ील्ड कार्यालय इसके "हाथ-पैर (Hands & Legs)" हैं। राजस्थान का सचिवालय जयपुर में है; इसके कामकाज का आधार अनुच्छेद 166(3) के अंतर्गत बने कार्य-संचालन नियम (Rules of Business) और सचिवालय कार्य-पुस्तिका हैं।
राजस्थान सचिवालय, जयपुर | स्टाफ़ एजेंसी (Staff Agency)
- संरचना: सचिवालय कई विभागों (Departments) में बँटा होता है — प्रत्येक विभाग का राजनीतिक प्रमुख मंत्री और प्रशासनिक प्रमुख एक अपर मुख्य सचिव, प्रमुख शासन सचिव या शासन सचिव स्तर का IAS अधिकारी होता है, जिसकी सहायता के लिए संयुक्त, उप और सहायक शासन सचिव जैसे पद होते हैं। सबसे निचली कार्य-इकाई अनुभाग (Section) है, जहाँ फ़ाइल पर पहली टिप्पणी लिखी जाती है।
- कार्य (Functions): (1) नीति-निर्माण में मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद् की सहायता करना; (2) विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना; (3) बजट तैयार करने में सहयोग; (4) विधेयकों और अध्यादेशों का प्रारूपण; (5) केंद्र सरकार और अन्य राज्यों से संपर्क बनाए रखना; (6) निदेशालयों और फ़ील्ड कार्यालयों को नीतिगत मार्गदर्शन और निर्देश देना; (7) विधानसभा के प्रश्नों के उत्तर और समितियों के लिए सामग्री तैयार करना; (8) कार्मिक प्रबंधन — भर्ती-नियम, सेवा-शर्तें, तबादले।
- सचिवालय स्वयं क्रियान्वयन (Implementation) नहीं करता — क्रियान्वयन का कार्य निदेशालयों और ज़िला प्रशासन (देखें अध्याय 11) के माध्यम से होता है। यही "नीति बनाम क्रियान्वयन" का भेद सचिवालय और निदेशालय के बीच के मूल अंतर की जड़ है (देखें खंड 6)।
- कार्यकाल-प्रणाली (Tenure System): सचिवालय के अधिकांश वरिष्ठ पदों पर ज़िलों से अधिकारी कुछ वर्षों के लिए आते हैं और फिर फ़ील्ड में लौटते हैं — ताकि नीति बनाने वाले ज़मीनी अनुभव से जुड़े रहें, और ज़मीन पर काम करने वाले नीति की समझ लेकर जाएँ। यह ब्रिटिश काल की परंपरा है (भारत सरकार में 1905 में लॉर्ड कर्ज़न के समय से व्यवस्थित)।
सोचिए स्कूल का प्रिंसिपल-ऑफ़िस (सचिवालय) समय-सारणी बनाता है, नियम तय करता है, बजट मंज़ूर करता है — पर क्लासरूम में पढ़ाने का असली काम टीचर (निदेशालय और फ़ील्ड स्टाफ़) करते हैं। ऑफ़िस बताता है "क्या करना है", क्लासरूम में होता है "कैसे करना है" — यही सचिवालय और निदेशालय का रिश्ता है।
4.1 सचिवालय में पद-सोपान (Rank Hierarchy in Secretariat)

| पद (Rank) | स्थान/भूमिका |
|---|---|
| मुख्य सचिव (Chief Secretary) | सचिवालय और राज्य प्रशासन का सर्वोच्च पद — देखें अगला खंड। |
| अपर मुख्य सचिव (Additional Chief Secretary — ACS) | महत्वपूर्ण या भारी विभागों (जैसे गृह, वित्त, ऊर्जा) का नेतृत्व — मुख्य सचिव के ठीक बाद का सबसे वरिष्ठ स्तर। |
| प्रमुख शासन सचिव (Principal Secretary) | वरिष्ठ स्तर, सामान्यतः बड़े या मध्यम विभाग का नेतृत्व। |
| शासन सचिव (Secretary) | एक विभाग का नियमित प्रशासनिक प्रमुख — नीति-क्रियान्वयन की सीधी ज़िम्मेदारी। |
| विशिष्ट / संयुक्त शासन सचिव (Special / Joint Secretary) | सचिव की सहायता, विभाग के किसी उप-क्षेत्र (Wing) की ज़िम्मेदारी। |
| उप शासन सचिव / सहायक शासन सचिव (Deputy / Assistant Secretary) | फ़ाइल-स्तर पर परीक्षण, टिप्पणी और दैनिक कार्य — पदसोपान का आधार स्तर; इनके नीचे अनुभाग अधिकारी और सहायक। |
- आलोचना: फ़ाइल का अनेक स्तरों से गुज़रना — देरी और लालफ़ीताशाही; सचिवालय का क्रियान्वयन के छोटे-छोटे मामलों में उलझना; विभागों के बीच समन्वय की कमी; और बार-बार तबादलों से निरंतरता का अभाव। हरिश्चंद्र माथुर समिति (1963) ने कहा था कि सचिवालय केवल पर्याप्त महत्व वाले और नीतिगत मामलों पर ध्यान दे, और निर्णय लेने वाले स्तर बढ़ाए जाएँ (देखें अध्याय 07)। आज ई-फ़ाइल / राजकाज जैसी डिजिटल फ़ाइल-प्रणालियों से गति बढ़ाने का प्रयास हो रहा है।
4.2 विभाग (Department) — प्रशासन की बुनियादी इकाई
सचिवालय कई विभागों में बँटा होता है — इसलिए "विभाग" की अवधारणा समझना ज़रूरी है। शाब्दिक अर्थ में विभाग किसी संपूर्ण वस्तु का एक भाग (Part) है; प्रशासन में मुख्य कार्यपालिका के अधीन सारे सरकारी कार्य को अनेक खंडों में बाँटकर बनी सबसे बड़ी इकाइयाँ विभाग कहलाती हैं — जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, गृह विभाग। सरकार का अधिकांश कामकाज इन्हीं के माध्यम से होता है, इसलिए विभाग प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे पुरानी, सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी इकाई है। प्राचीन-मध्यकाल में भी राजा कार्य बाँटते थे — सेना सेनापति के पास, पुलिस फ़ौजदार के पास, कोषागार ख़ज़ांची के पास और भंडार भंडारपाल के पास।
शास्त्रीय अर्थ: मुख्य कार्यपालिका के ठीक नीचे स्थित, उसी के प्रति उत्तरदायी वह बड़ी प्रशासनिक इकाई, जिसे सरकार के किसी एक बड़े कार्य-क्षेत्र का दायित्व सौंपा गया हो और जिसका एक राजनीतिक प्रमुख (मंत्री) तथा एक प्रशासनिक प्रमुख (सचिव) हो।
सरल भाषा में: सरकार के बड़े काम को बाँटकर बना एक "बड़ा कमरा" — जिसमें एक ही तरह का काम होता है और जिसका एक मालिक-मंत्री होता है। उदाहरण: राजस्थान का स्कूल शिक्षा विभाग — मंत्री (राजनीतिक प्रमुख), शासन सचिव (प्रशासनिक प्रमुख), और नीचे निदेशक माध्यमिक शिक्षा, बीकानेर (क्रियान्वयन)।
विभाग की पहचान — डॉ. एम.पी. शर्मा के दो परीक्षण: (1) इकाई का नाम चाहे जो हो (प्रशासन, अभिकरण, परिषद्, समिति), यदि वह प्रशासकीय सोपान के शीर्ष के समीप हो और उसके तथा मुख्य कार्यपालक के बीच कोई अन्य इकाई न हो; (2) वह इकाई मुख्य कार्यपालक के अधीन और उसके प्रति उत्तरदायी हो — तो उसे विभाग कहेंगे।
| देश | विभाग बनाने / पुनर्गठित करने की शक्ति |
|---|---|
| अमेरिका | विधायिका (कांग्रेस) क़ानून बनाकर विभाग बनाती है। |
| पूर्व सोवियत संघ / रूस | संविधान में संशोधन आवश्यक माना गया। |
| ब्रिटेन | मुख्य कार्यपालिका (प्रधानमंत्री) — मिनिस्टर्स ऑफ़ द क्राउन एक्ट, 1946। |
| भारत (संघ और राज्य) | मुख्य कार्यपालिका — अनुच्छेद 77(3) / 166(3) के अंतर्गत राष्ट्रपति / राज्यपाल द्वारा बने कार्य-आवंटन नियम; व्यवहार में प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री की इच्छा और सुविधा से। |
| विभागों के प्रकार | उदाहरण |
|---|---|
| बड़े बनाम छोटे (आकार) | बड़े — रेल, वित्त, रक्षा; छोटे — परमाणु ऊर्जा विभाग। |
| पुराने बनाम नए | पुराने — ब्रिटेन का ट्रेज़री, भारत का वित्त विभाग; नए — नई गतिविधियों के लिए (जैसे 2025 में राजस्थान सरकार द्वारा प्रवासी राजस्थानियों के कल्याण हेतु नए विभाग की घोषणा)। |
| एक-कार्यी बनाम बहु-कार्यी | एक-कार्यी — रक्षा, शिक्षा; बहु-कार्यी — गृह विभाग (पुलिस, जेल, नागरिक सुरक्षा, होमगार्ड)। |
| सूत्र (Operating) बनाम समन्वयकारी / सेवा (Coordinating / Auxiliary) | सूत्र — कृषि, स्वास्थ्य (सीधे जनता को सेवा); समन्वयकारी — वित्त, कार्मिक, आयोजना, विधि (दूसरे विभागों की सेवा और नियंत्रण)। |
4.3 विभाग-गठन के आधार — गुलिक का "4P" सूत्र
यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने कार्य-बँटवारे के दो आधार सुझाए थे — व्यक्तियों / वर्गों के अनुसार, और सेवाओं के अनुसार। आधुनिक युग में लूथर गुलिक ने चार आधार बताए, जिन्हें "4P सूत्र" कहा जाता है।

| आधार | अर्थ और उदाहरण | गुण | दोष |
|---|---|---|---|
| उद्देश्य / कार्य (Purpose) | एक बड़े काम के लिए एक विभाग — रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा। | सबसे सरल, आम और कारगर; दोहरापन नहीं; आम आदमी जान लेता है कि कौन-सा काम किसके ज़िम्मे। | हर विभाग अपनी तकनीकी इकाइयाँ बनाने लगे तो साधनों की बर्बादी। |
| प्रक्रिया (Process) | किसी तकनीक / पेशे के आधार पर — विधि, लोक निर्माण, लेखा विभाग, जो सब विभागों की मदद करते हैं। | विशेषज्ञता और नवीनतम तकनीक सबको उपलब्ध; किफ़ायत, बेहतर तालमेल, एकरूपता। | कर्मचारियों में घमंड, संकीर्णता, श्रेष्ठता-भाव; संख्या गिनी-चुनी। |
| व्यक्ति / वर्ग (Persons) | विशेष समूह के लिए — जनजाति, शरणार्थी, पेंशनर, सैनिक-कल्याण, श्रम विभाग। | संबद्ध समूह को सुगम संपर्क; समन्वित सेवाएँ। | समूहों के निहित स्वार्थ, प्रशासन पर दबाव। |
| स्थान / क्षेत्र (Place) | विशेष भू-भाग के लिए — स्वतंत्रता-पूर्व "भारतीय मामलों का विभाग", ब्रिटेन में स्कॉटलैंड मामलों का विभाग; रेलवे के क्षेत्रीय ज़ोन। | स्थानीय समस्याओं की गहरी समझ। | राष्ट्रीय एकरूपता और समन्वय कठिन; भारत में ऐसे विभाग बहुत कम। |
"उ-प्र-व्य-स्था" — उद्देश्य, प्रक्रिया, व्यक्ति, स्थान। अंग्रेज़ी में चारों "P" से (Purpose, Process, Persons, Place)।
चारों आधार एक-दूसरे में गुँथे (Overlapping) हैं: कृषि विभाग का आधार "कार्य" है, पर सीधा लाभ किसानों को मिलता है, इसलिए वह "व्यक्ति" पर आधारित भी लगता है; विदेश विभाग का मूल कार्य विदेश-संबंध है, पर उसका काम राष्ट्रीय सीमा के बाहर होता है, इसलिए वह "स्थान" पर आधारित भी लगता है। कोई भी विभाग केवल एक आधार पर नहीं बनता — ऊपर के स्तर पर "कार्य" दिखता है, नीचे उतरते-उतरते क्षेत्रीय (भौगोलिक प्रभाग), प्रक्रिया-आधारित (गोपनीय संधि, विधि प्रकोष्ठ) और व्यक्ति-आधारित (प्रवासी भारतीयों हेतु प्रभाग) इकाइयाँ बनानी पड़ती हैं।
सर्वोत्तम आधार कौन-सा? वालेस के अनुसार विभाग-संगठन बनाते समय चारों आधारों का तुलनात्मक मूल्यांकन करना चाहिए, क्योंकि व्यवहार में विभाग अनेक आधारों पर बनते हैं। फिर भी विद्वान कार्यात्मक (उद्देश्य) आधार को सबसे उचित मानते हैं — इसमें दोहराव, अतिच्छादन और भ्रम सबसे कम होता है। प्रथम हूवर आयोग (1949, अमेरिका) ने कहा कि असंख्य अभिकरणों को "मुख्य प्रयोजनों के आधार पर" विभागों में संगठित किया जाए; भारत के प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्ययन दल ने कहा कि अन्य आधार तभी अपनाए जाएँ जब परिस्थितियाँ बाध्य करें।
उद्देश्य: स्कूल शिक्षा, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, कृषि, गृह विभाग। प्रक्रिया: विधि एवं विधिक कार्य विभाग, सार्वजनिक निर्माण विभाग, वित्त विभाग, सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग। व्यक्ति: जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग, अल्पसंख्यक मामलात विभाग, सैनिक कल्याण विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग। स्थान: इंदिरा गांधी नहर विभाग, उपनिवेशन विभाग (बीकानेर); क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम (डांग, मगरा, मेवात, मरु विकास) भी इसी सोच के उदाहरण हैं।
4.4 विभाग का आंतरिक संगठन — सचिवालयी और कार्यकारी शाखा
भारत में (केंद्र और राज्य दोनों में) हर विभाग का राजनीतिक प्रमुख मंत्री होता है, जो विभाग के कार्यों के लिए विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी है — उसकी सहायता हेतु राज्य मंत्री और उप-मंत्री भी हो सकते हैं, और एक मंत्री के पास एक से अधिक विभाग भी हो सकते हैं। मंत्री के ठीक नीचे विभाग का सचिवालयी संगठन (Secretariat Organisation) होता है, जिसका शीर्ष अधिकारी सचिव (प्रायः IAS) होता है। कार्य-कुशलता के लिए विभाग पदसोपान के सिद्धांत पर उप-विभागों (Wings), प्रभागों (Divisions), शाखाओं (Branches) और अनुभागों (Sections) में बँटा होता है।
| अधिकारी | प्रभार की इकाई | सामान्य आकार |
|---|---|---|
| सचिव (Secretary) | पूरा विभाग | विभाग का प्रशासनिक प्रमुख |
| संयुक्त / अतिरिक्त सचिव (Joint / Additional Secretary) | उप-विभाग (Wing) | प्रायः लगभग 8 अनुभाग; अपने विषयों पर सीधे मंत्री से संपर्क संभव |
| उप सचिव (Deputy Secretary) | प्रभाग (Division) | प्रायः लगभग 4 अनुभाग |
| अवर सचिव (Under Secretary) | शाखा (Branch) | प्रायः 2 अनुभाग |
| अनुभाग अधिकारी (Section Officer) | अनुभाग (Section) | 1 अनुभाग — सहायक, लिपिक, टंकक |
| लिपिक वर्गीय एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी | — | सहायक, उच्च / निम्न श्रेणी लिपिक, चपरासी, दफ़्तरी |
ध्यान रहे — हर विभाग में ये सभी इकाइयाँ हों, यह आवश्यक नहीं; राजस्थान सचिवालय में इन्हीं के समकक्ष पदनाम हैं — शासन सचिव, विशिष्ट / संयुक्त शासन सचिव, उप शासन सचिव, सहायक शासन सचिव, अनुभाग अधिकारी (देखें चित्र 10.4)।

- संलग्न कार्यालय (Attached Office): सचिवालय के अलावा, किसी विभाग के निकटतम नियंत्रण में काम करने वाले स्वयं-पूर्ण कार्यालय — मुख्यतः परामर्शदात्री और तकनीकी कार्य; दर्जा सचिवालय से नीचा। केंद्र के उदाहरण: मुद्रण नियंत्रक, आयात-निर्यात के मुख्य नियंत्रक, मुख्य श्रम आयुक्त।
- अधीनस्थ कार्यालय (Subordinate Office): क्षेत्र में नीतियों का वास्तविक क्रियान्वयन करने वाले कार्यालय, जो विभागाध्यक्ष के अधीन रहते हैं।
- प्राविधिक रूप से विभागाध्यक्ष नहीं — नीति-निर्माण में सरकार का परामर्शदाता।
- कार्य स्टाफ़ प्रकृति के — परामर्श, नीति, समन्वय, बजट।
- सामान्यज्ञ (प्रायः IAS), कार्यकाल-प्रणाली से।
- राजधानी के सचिवालय में बैठता है।
- वैधानिक दृष्टि से "विभागाध्यक्ष" — निदेशक, महानिदेशक, महानिरीक्षक या आयुक्त।
- कार्य सूत्र (Line) प्रकृति के — नीति लागू करवाना, आदेश-निर्देश, पर्यवेक्षण।
- सचिवालय और सरकार को प्राविधिक परामर्श भी देता है।
- प्रायः विशेषज्ञ / तकनीकी अधिकारी; निदेशालय में बैठता है (खंड 6)।
भारत सरकार में मंत्रालयों / विभागों की संख्या 1962 में 35, 1966 में 41, 1969 में 46, 1972 में 50, 1979 में 53, 1983 में 56, 1985 में 57, 1988 में 71, 1994 में 74 और 2000 में 83 थी — यानी कल्याणकारी राज्य के बढ़ते कार्यों के साथ विभाग भी बढ़ते गए। राज्यों में भी गृह, सामान्य प्रशासन, वित्त, कार्मिक, आयोजना, उद्योग, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य प्रमुख विभाग हैं; विभागों की संख्या राज्य-दर-राज्य भिन्न है।
4.5 नियोजन (आयोजना) विभाग और राज्य योजना मंडल
सचिवालय के समन्वयकारी विभागों में नियोजन विभाग विशेष है, क्योंकि राज्य का विकास इसी से जुड़ा है। संविधान ने कृषि, सिंचाई, सहकारिता, सामुदायिक सेवाएँ जैसे अनेक विकास-विषय राज्य सूची में रखे हैं, और राज्य योजनाएँ कुल सार्वजनिक क्षेत्र के व्यय का लगभग आधा हिस्सा रही हैं — इसलिए सहकारी संघवाद में राज्य-स्तरीय नियोजन तंत्र अनिवार्य है। प्रारंभ में योजना विभाग राज्यों के वित्त विभाग का ही अंग था, धीरे-धीरे पृथक विभाग बना।

| वर्ष | राजस्थान के नियोजन विभाग का विकास |
|---|---|
| 1949 | स्वतंत्रता के समय राजस्थान अत्यंत पिछड़ा — लगभग 8.5% साक्षरता, दो-तिहाई भू-भाग मरुस्थल, मात्र 13.27 मेगावाट विद्युत क्षमता, सड़क-घनत्व 3.96 किमी प्रति 100 वर्ग किमी — इसलिए नियोजन की आवश्यकता। |
| जुलाई 1953 | पहली बार मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में नियोजन विभाग की स्थापना; प्रारंभ में विकास आयुक्त ही योजना सचिव। |
| 1955 / 1961 | अतिरिक्त मुख्य सचिव का पद सृजित कर विभाग उसे सौंपा; अप्रैल 1961 में कार्यभार मुख्य सचिव को। |
| मार्च 1960 | मूल्यांकन संगठन का गठन; ज़िला गजेटियर्स विभाग (1960)। |
| 1964 / 1981 | 1964 में दायित्व योजना राज्य मंत्री को; 1981 से फिर मुख्यमंत्री के पास। |
| 1972 | योजना आयोग ने राज्यों को दूरगामी (Perspective) योजना, निगरानी, परियोजना-मूल्यांकन, ज़िला योजना, समन्वय और जनशक्ति इकाइयाँ बनाने का सुझाव दिया; परियोजना निगरानी इकाई (PMU) के निदेशक का पद सृजित। |
| 1973 | 6 फ़रवरी 1973 — राज्य योजना मंडल (State Planning Board) की स्थापना; पहली बैठक 25 जून 1973। |
| 1992 | मुख्य सचिव की व्यस्तता के कारण पृथक शासन सचिव (आयोजना) का पद। |
| 1995 / 1998 | 2 जून 1995 से परियोजना निगरानी इकाई; 26 मई 1998 को जनशक्ति और ज़िला गजेटियर्स का विलय। |
| पदाधिकारी | नियोजन में भूमिका |
|---|---|
| मुख्यमंत्री | राज्य योजना उसी की देखरेख में; विभागीय मंत्रियों से परामर्श कर अंतिम रूप; नीति आयोग और केंद्रीय मंत्रियों से संपर्क कर संसाधन जुटाना; राज्य योजना मंडल के सदस्यों की नियुक्ति; सामान्यतः स्वयं राज्य का योजना मंत्री। |
| योजना राज्य मंत्री | मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में विभाग का दैनिक संचालन; योजनाओं की रूपरेखा; विधानसभा में योजना-संबंधी प्रश्नों के उत्तर। |
| शासन सचिव (आयोजना) | मुख्यमंत्री, योजना मंत्री, मुख्य सचिव, विभागों, नीति आयोग और केंद्रीय मंत्रालयों के बीच समन्वय — अत्यंत व्यापक दायित्व। |
| विशिष्ट शासन सचिव | विभाग की आंतरिक कार्य-प्रणाली; राज्य योजना मंडल का सदस्य-सचिव; परियोजना मूल्यांकन इकाई का निदेशक। |
| संयुक्त शासन सचिव (4) | योजना वित्त, जनशक्ति, निगरानी (Monitoring) और संस्थागत वित्त का प्रभार। |
नियोजन विभाग के कार्य: (1) वार्षिक और पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण; (2) दीर्घकालीन योजना; (3) वित्त विभाग से संपर्क कर योजना हेतु वित्तीय संसाधनों का प्रबंध; (4) केंद्रीय मंत्रालयों, नीति आयोग, वित्त विभाग, मंत्रिमंडल, ज़िला आयोजना समितियों से समन्वय; (5) योजनाओं का मूल्यांकन और प्रतिवेदन; (6) अधीन कार्यकारी संगठन — आर्थिक एवं सांख्यिकी निदेशालय, जनशक्ति एवं गजेटियर्स, मूल्यांकन संगठन — जो नियोजन के सहायक अभिकरण हैं।
- प्रकृति: मूलतः एक परामर्शदात्री (Advisory) निकाय — मंत्रिमंडल को तर्कसंगत निष्कर्षों तक पहुँचाने में सहायता; अपना पृथक सचिवालय नहीं, नियोजन विभाग ही इसका सचिवालय।
- उद्देश्य: विशेषज्ञों से युक्त सशक्त निकाय; योजनाओं में स्थायित्व और राजनीतिक प्रभाव में कमी; परंपरागत नौकरशाही से स्वतंत्र दृष्टि; संसाधन-क्षमता का आकलन; केंद्र-राज्य सामंजस्य; प्राथमिकताओं का तर्कसंगत निर्धारण।
- संरचना: अध्यक्ष — मुख्यमंत्री (राष्ट्रपति शासन में राज्यपाल, सलाहकार या मुख्य सचिव के माध्यम से); उपाध्यक्ष (वित्त / योजना मंत्री या कोई विशेषज्ञ); कुछ मंत्री (गृह, वित्त, योजना); विशेषज्ञ सदस्य; प्रशासनिक सदस्य (अतिरिक्त मुख्य सचिव-आयोजना, वित्त सचिव, गृह सचिव); सदस्य-सचिव। 1973 में 17 अन्य सदस्य थे; बार-बार पुनर्गठन (1978, 1988, 1990, 1994, 1997, 1999) से आकार 40-65 सदस्यों तक पहुँचा; 1996 में केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश के अध्ययन के बाद आकार छोटा करने और पूर्णकालिक उपाध्यक्ष का निर्णय।
- हरिश्चंद्र माथुर समिति के सुझाए कार्य: दूरगामी योजना पर मंत्रिमंडल को परामर्श; पंचायती राज संस्थाओं को अनुदान में वित्त आयोग जैसी भूमिका; पिछड़े क्षेत्रों पर विशेष ध्यान; अन्य देशों और राज्यों के नियोजन तंत्र का अध्ययन; प्रगति की सतत निगरानी और चेतावनी; राजस्थान नहर क्षेत्र का सामाजिक-आर्थिक नियोजन; लोक उपक्रमों की योजना; राष्ट्रीय विकास परिषद् से घनिष्ठ संबंध। समिति ने "राज्य आयोजना तथा विकास आयोग" नाम से संस्था का सुझाव दिया था।
- प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1967) के सुझाए कार्य: संसाधनों का आकलन; राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के दायरे में राज्य की प्राथमिकताएँ; क्रियान्वयन की समीक्षा; ज़िला-स्तरीय योजनाओं में सहायता और समन्वय; विकास में बाधक कारकों की पहचान।
- सचिवालय का परंपरागत नौकरशाही विभाग।
- योजना-निर्माण, क्रियान्वयन, निगरानी — वास्तविक कार्य-भार यहीं।
- शासन सचिव (IAS), RAS तथा आर्थिक-सांख्यिकी सेवा के अधिकारी।
- नीति आयोग और केंद्रीय मंत्रालयों से औपचारिक संपर्क।
- स्वतंत्र, विशेषज्ञ-प्रधान परामर्शदात्री निकाय (आदर्श रूप में)।
- दिशा, प्राथमिकता और मूल्यांकन पर सलाह।
- मुख्यमंत्री अध्यक्ष; उपाध्यक्ष और विशेषज्ञ सदस्य।
- अपना सचिवालय नहीं — नियोजन विभाग पर निर्भर।
आलोचनात्मक मूल्यांकन: लगभग चार दशकों का अनुभव बताता है कि राज्य योजना मंडल अनेक न्यूनताओं और विसंगतियों से ग्रस्त रहे — (1) संरचना और कार्य स्पष्ट नहीं, राज्यों में कोई एकरूपता नहीं; (2) बहुत बड़ा आकार (राजस्थान में कभी 60-65 सदस्य, पश्चिम बंगाल-केरल में 25-30) — न समय पर बैठक, न सार्थक बहस; राजस्थान मंडल की 1973 के बाद दूसरी बैठक 4 सितंबर 1975 को हुई; (3) उपाध्यक्ष और सदस्य कभी अंशकालिक, कभी पूर्णकालिक — सब मुख्यमंत्री की इच्छा पर; (4) पृथक सचिवालय का अभाव; (5) स्पष्ट कार्य-विभाजन के अभाव में "सबकी ज़िम्मेदारी, किसी की ज़िम्मेदारी नहीं"; (6) योजना-स्वीकृति का बड़ा भाग केंद्रीय स्तर पर, इसलिए राज्यों की भूमिका सीमित; (7) उदारीकरण के युग में निर्देशात्मक (Directive) नियोजन की जगह संकेतात्मक (Indicative) नियोजन का बढ़ता चलन।
- हर राज्य के सचिवालय में एक योजना (नियोजन) विभाग होता है, जिसकी अध्यक्षता सचिव या विकास आयुक्त करता है। प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने पाया कि यह विभाग योजना-निर्माण से लेकर प्रगति-प्रतिवेदन तक बहुमुखी भूमिका निभाता है, और इन कार्यों में राज्य आर्थिक एवं सांख्यिकी ब्यूरो उसकी सहायता करता है।
- विभाग का कार्य कई प्रभागों में बँटा होता है, जिनमें से प्रत्येक का प्रभारी संयुक्त सचिव या उप सचिव होता है। प्रायः हर विभाग में एक निर्णय इकाई (योजना-निर्माण), और कृषि, वित्त, मूल्यांकन, निगरानी, जनशक्ति, रोज़गार, क्षेत्रीय तथा ज़िला योजना से जुड़े खंड होते हैं — पर राज्यों में कार्य-विभाजन की कोई एकरूपता नहीं है।
- कर्मचारी: IAS, राज्य प्रशासनिक सेवा (राजस्थान में RAS) के अधिकारी, तकनीकी विशेषज्ञ और सहायक कर्मचारी। अधिकांश अधिकारी प्रशासनिक पृष्ठभूमि के होते हैं — सामान्य प्रशासन अच्छा कर लेते हैं, पर योजना-तकनीकों की जानकारी कम होने से उनकी भूमिका प्रायः कम प्रभावी रहती है।
- सबसे अहम भूमिका: अन्य विभागों के साथ तालमेल, और मंत्रिमंडल तथा विधानमंडल के सामने राज्य योजना प्रस्तुत करना; राज्य के बाहर नीति आयोग (पहले योजना आयोग) और केंद्रीय कार्य-समूहों से संबंध। मूल प्रश्न सदा बना रहा — योजना के लिए प्राथमिक रूप से उत्तरदायी कौन है: योजना विभाग या राज्य योजना मंडल? इसलिए मुख्यमंत्री की कुशल भूमिका अनिवार्य हो जाती है।
| समूह (Group) | राजस्थान नियोजन विभाग में दायित्व |
|---|---|
| समूह-1 | राज्य आयोजना तंत्र तथा राज्य आयोजना मंडल; योजना-बजट संबंधी कार्य। |
| समूह-2 | लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा के प्रश्नों के उत्तर; राष्ट्रीय विकास परिषद् से जुड़े कार्य। |
| समूह-3 | ज़िलेवार वित्तीय और भौतिक लक्ष्य, वार्षिक योजना का प्रगति-प्रतिवेदन, ज़िलेवार लक्ष्यों का प्रकाशन। |
| समूह-4 | राज्य की पंचवर्षीय योजना का निर्माण और मध्यावधि समीक्षा। |
| समूह-5 | वार्षिक योजनाओं के प्रारूप; सिंचाई और बाढ़, ऊर्जा, परिवहन, चिकित्सा, सीवरेज, जल-प्रदाय। |
| समूह-6 | बैंकिंग संबंधी गतिविधियाँ (संस्थागत वित्त)। |
| समूह-7 | रोज़गार और जनशक्ति आयोजना की सूचनाएँ। |
| वर्ष | नियोजन विभाग में स्थापित प्रकोष्ठ (Cell) |
|---|---|
| 1975 | परियोजना नियोजन प्रकोष्ठ — 25 मई 1991 को इसका नाम "त्वरित कार्य मूल्यांकन प्रकोष्ठ" हुआ, और 2 जून 1995 से यह परियोजना निगरानी इकाई (PMU) में समाहित। |
| 1982-83 | बीस सूत्री कार्यक्रम प्रकोष्ठ। |
| 1986-89 | कंप्यूटर प्रकोष्ठ। |
| 1988-89 | ज़िला नियोजन प्रकोष्ठ। |
| 1995-96 | परियोजना निगरानी इकाई (Project Monitoring Unit)। |
| 1996-97 | ज़िला गरीबी उन्मूलन परियोजना प्रकोष्ठ। |
| बाद में | लोक-निजी भागीदारी (PPP) प्रकोष्ठ और भामाशाह योजना प्रकोष्ठ। |
1953 से पहले और 1967 तक: सन् 1967 तक राज्य में योजना के लिए नियोजन विभाग ही उत्तरदायी था; यह मुख्यमंत्री या वित्त मंत्री के अधिकार-क्षेत्र में रहता था और मुख्य सचिव ही इसका सचिव होता था, जिसकी सहायता के लिए एक पूर्णकालिक उप सचिव होता था। इसके अतिरिक्त विभाग में पाँच अन्य अधिकारी थे — निदेशक जनशक्ति, प्रगति अधिकारी, सहायक सचिव, सांख्यिकी अधिकारी और सहायक लेखाधिकारी। एक उच्चाधिकार प्राप्त राजस्थान नियोजन समिति भी थी — इसमें मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल के सदस्य, उप मंत्री (नियोजन), प्रभावशाली सांसद, ज़िला परिषदों के प्रमुख, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाशास्त्री और उद्योगपति सदस्य थे; मुख्य सचिव, वित्त आयुक्त और विकास आयुक्त स्थायी सदस्य थे; इसकी बैठक वर्ष में एक बार होती थी। 1968 में मूल्यांकन विभाग और ज़िला गजेटियर्स निदेशालय इससे जोड़े गए, और जनशक्ति नियोजन के उप सचिव को इनका अवैतनिक निदेशक बनाया गया; इसी वर्ष प्रगति अधिकारी का पद बना (तब सहायक सचिव के समकक्ष, अब उप सचिव के समकक्ष)।
पद किस सेवा से भरे जाते हैं: सचिव और विशिष्ट शासन सचिव — IAS; संयुक्त सचिव, उप सचिव और निदेशक — RAS या राज्य आर्थिक एवं सांख्यिकी सेवा; सहायक सचिव और अनुभाग अधिकारी — राजस्थान सचिवालय सेवा; अधीनस्थ पद — राजस्थान मंत्रालयिक सेवा और राजस्थान अधीनस्थ लेखाकार सेवा। योजनाओं के विभिन्न क्षेत्रों (ग्रामीण विकास, कृषि, ऊर्जा, स्वास्थ्य, शिक्षा) के लिए आयोजना तथा विकास समन्वय समितियाँ भी बनती हैं, जो नियोजन विभाग के मार्गदर्शन में काम करती हैं।
राजस्थान में योजना-प्रक्रिया (Planning Process)
राजस्थान में योजना-प्रक्रिया व्यवस्थित और आधुनिक रूप ले चुकी है — यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। दो प्रकार की योजनाएँ बनती रही हैं — (1) पंचवर्षीय योजना और (2) वार्षिक योजना। (ध्यान रहे — 2017 के बाद राष्ट्रीय स्तर पर पंचवर्षीय योजनाओं का दौर समाप्त हो गया; पर प्रक्रिया की यह समझ परीक्षा और राज्य के वार्षिक नियोजन के लिए आज भी उपयोगी है।)
| चरण | पंचवर्षीय योजना का निर्माण |
|---|---|
| प्रथम | योजना विभाग आरंभिक कार्य शुरू करता है — चल रही योजना की आधी अवधि पूरी होते ही उसका मूल्यांकन। |
| द्वितीय | पिछली योजना के अनुभव और राज्य के नीति-निर्देशों के आधार पर, प्राकृतिक, भौतिक, मानवीय और वित्तीय साधनों को देखकर अगली योजना के प्रमुख लक्ष्य और प्राथमिक क्षेत्र तय करना; फिर कार्यात्मक समूहों (Working Groups) का गठन। |
| तृतीय | कार्यात्मक समूह अपने क्षेत्रों की योजनाओं के प्रारूप बनाकर योजना विभाग को भेजते हैं। |
| चतुर्थ | योजना विभाग प्रस्तावों का गहन अध्ययन करता है, राज्य के वित्तीय साधन, संभावित केंद्रीय सहायता और राष्ट्रीय विकास परिषद् की सिफ़ारिशों को देखकर प्रारूप तैयार करता है — भौतिक नियोजन और वित्तीय नियोजन में संतुलन; प्रशासकीय विभागों और वित्त विभाग से निकट संपर्क। |
| पंचम | प्रारूप राज्य योजना मंडल को — राजनीतिज्ञों, प्रशासकों और विषय-विशेषज्ञों का विचार-विमर्श; मंडल चाहे तो संशोधन। |
| षष्ठ | मंडल की सिफ़ारिशों सहित प्रारूप मंत्रिमंडल के सामने — आवश्यक संशोधन के साथ स्वीकृति। |
| सप्तम | प्रारूप केंद्र के योजना आयोग (अब नीति आयोग) को — आयोग के कार्यात्मक समूह विश्लेषण करते हैं, उनकी सिफ़ारिशें "कार्यक्रम सलाहकार" के माध्यम से उपाध्यक्ष तक; राज्य के अधिकारियों का निरंतर संपर्क। |
| अष्टम | आयोग के उपाध्यक्ष और मुख्यमंत्री की उच्च-स्तरीय बैठक — केंद्रीय वित्तीय सहायता पर अंतिम निर्णय; योजना को अंतिम रूप। |
| अंतिम | राज्य सरकार योजना-प्रलेख प्रकाशित करती है और विभागों-संस्थाओं को भेजती है; वे इसके आधार पर अपनी योजनाओं को अंतिम रूप देते हैं। |
| चरण / माह | वार्षिक योजना का निर्माण |
|---|---|
| प्रथम — अगस्त | आगामी वित्त-वर्ष से लगभग 8 माह पहले — योजना विभाग विभागों से अगले वर्ष की आवश्यकताओं और साधनों का ब्योरा मँगाता है; विभाग ज़िलों से प्राप्त योजनाओं को देखकर प्रस्ताव बनाने लगते हैं। |
| द्वितीय — सितंबर | सब प्रस्ताव नियोजन विभाग को; संपादन, संशोधन, भौतिक और वित्तीय नियोजन में समन्वय; अक्टूबर के आरंभ में प्रारूप तैयार। |
| तृतीय — अक्टूबर | प्रारूप राज्य मंत्रिमंडल के सामने; आवश्यकता पर संशोधन के आदेश। |
| चतुर्थ — अक्टूबर अंत | संशोधित प्रारूप नीति आयोग के समक्ष। |
| पंचम — नवंबर-दिसंबर | नीति आयोग और राज्य योजना विभाग में विचार-विमर्श; राज्य के मंत्री और उच्च अधिकारी अपने तर्क रखते हैं; राष्ट्र की स्थिति देखकर प्रस्तावों में कटौती या बढ़ोतरी। |
| षष्ठ — जनवरी | नीति आयोग का अंतिम निर्णय — विशेषकर राज्य को कितनी वित्तीय सहायता मिलेगी। |
| सप्तम | योजना विभाग आवश्यक संशोधन करता है (ज़रूरत हो तो विभागों से उच्च-स्तरीय विमर्श); वित्तीय प्रारूप मंत्रिमंडल के सामने — प्रायः स्वीकार। |
| अष्टम | वित्त विभाग और प्रशासनिक विभागों से निकट संपर्क — विषय-क्षेत्रों में साधनों का सही आवंटन। |
| नवम | वित्त-वर्ष शुरू होने से कुछ पहले वार्षिक योजना का अंतिम प्रलेख — पर प्रकाशन विधानसभा में बजट प्रस्तुत होने के बाद, ताकि उपलब्ध वित्तीय साधन स्पष्ट रहें। |
| अंतिम | बजट पारित होने के बाद विभाग अपनी ज़िला-योजनाओं को अंतिम रूप देते हैं, और हर ज़िला अपनी योजना को समन्वित करता है। |
"अग-सित-अक्टू-नव-जन" — अगस्त में माँग, सितंबर में प्रस्ताव, अक्टूबर में मंत्रिमंडल और नीति आयोग, नवंबर-दिसंबर में विमर्श, जनवरी में अंतिम निर्णय; प्रकाशन बजट के बाद।
- 1. नियोजन विभाग — समग्र देखरेख।
- 2. सचिवालय-स्तर के प्रशासनिक विभाग।
- 3. कार्यकारी विभाग, निदेशालय और समितियाँ — इनमें समन्वय समिति का विशेष महत्व।
- 4. ज़िला और खंड स्तर — पंचवर्षीय योजना को वार्षिक योजनाओं में बाँटकर।
- कार्यकारी विभाग मासिक, त्रैमासिक, अर्द्धवार्षिक प्रगति-प्रतिवेदन भेजते हैं — भौतिक लक्ष्य, वित्तीय आवंटन और व्यय, अंतर-विभागीय समस्याएँ, संस्थागत वित्त, साख, रोज़गार के आँकड़े, प्रशिक्षण-भर्ती की आवश्यकताएँ।
- योजना के सही क्रियान्वयन और अगली बेहतर योजना के लिए मूल्यांकन आवश्यक।
- क्रियान्वयन के बाद विभाग और संस्थाएँ नियमित रूप से प्रगति का मूल्यांकन करती हैं।
- सामूहिक मूल्यांकन के लिए मूल्यांकन संगठन (मार्च 1960) — विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति का प्रतिवेदन।
- इन प्रतिवेदनों से नियोजन-निष्पादन की त्रुटियाँ सुधारी जाती हैं।
- नियोजन विभाग सामुदायिक विकास कार्यक्रमों का भी निर्देशन करता है — ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और ज़िला परिषद् के लिए लक्ष्य तय करता है और देखता है कि कार्यक्रम सही ढंग से लागू हों।
- संविधान लागू होने तक राज्यों में नियोजन तंत्र को सशक्त करने के सुनियोजित क़दम नहीं उठे थे। योजना आयोग ने 1962 में राज्यों को सलाह दी कि उसकी तरह हर राज्य में योजना मंडल बने — अध्यक्ष मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री सदस्य, और दो-तीन पूर्णकालिक विशेषज्ञ सदस्य; आयोग का मत था कि विशेषज्ञ प्रकृति का मंडल योजना विभाग से बेहतर ढंग से नियोजन-समस्याएँ सुलझा सकेगा।
- 1963 — राजस्थान की प्रशासनिक सुधार समिति (हरिश्चंद्र माथुर समिति) ने ऐसी संस्था का नाम "राज्य योजना तथा विकास आयोग" सुझाया।
- 1967 — प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग और उसके अध्ययन दल ने राज्य योजना मंडलों की स्थापना का परामर्श दिया और नाम "राज्य योजना मंडल" रखा।
- 6 फ़रवरी 1973 — राजस्थान में राज्य योजना मंडल की स्थापना; पहली बैठक 25 जून 1973, दूसरी 4 सितंबर 1975। 1973 में सरकार ने इसके कार्य तय किए — राजस्थान के स्थायी विकास हेतु दीर्घकालीन योजना पर परामर्श देना, विकास हेतु नीति-निर्धारण, आदि। फ़रवरी 1997 में मंत्रिमंडलीय समिति के आदेश से इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास हुआ।
1 जनवरी 2015 को योजना आयोग की जगह नीति आयोग बना और 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) के बाद पंचवर्षीय योजनाओं का दौर समाप्त हुआ। इसके बाद कई राज्यों ने अपने योजना मंडलों को नीति आयोग की तर्ज़ पर "रूपांतरण संस्थान (State Institution for Transformation — SIT)" जैसे निकायों में बदला; नीति आयोग का राज्य सहायता मिशन (State Support Mission) राज्यों को ऐसे संस्थान बनाने और साक्ष्य-आधारित नीति में मदद करता है। राजस्थान में "विकसित राजस्थान @2047" विज़न के लिए ऐसे संस्थान की घोषणा हुई है — विद्यार्थी परीक्षा से पहले इसकी नवीनतम स्थिति अवश्य जाँचें।
5मुख्य सचिव (Chief Secretary)
मुख्य सचिव राज्य सिविल सेवाओं का सबसे वरिष्ठ अधिकारी होता है — राज्य प्रशासन में यह पद ठीक वैसे ही सर्वोच्च है, जैसे केंद्र में कैबिनेट सचिव (देखें अध्याय 08)। यह पद संविधान में उल्लिखित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक परंपरा (Administrative Convention) से विकसित हुआ है, फिर भी व्यवहार में अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। मुख्य सचिव का पद पहली बार 1799 में बंगाल में लॉर्ड वेलेज़ली के समय बना था। मुख्य सचिव का चयन मुख्यमंत्री करता है — सामान्यतः वरिष्ठता के साथ विश्वास और योग्यता को देखकर; इसलिए कई बार वरिष्ठ अधिकारियों को छोड़कर कनिष्ठ को चुना जाता है।
राज्य के वरिष्ठतम IAS अधिकारी | शीर्ष वेतनमान
- मुख्यमंत्री का प्रधान सलाहकार (Principal Advisor): नीति-निर्माण और प्रशासनिक निर्णयों में मुख्यमंत्री को दिन-प्रतिदिन सलाह देना।
- मंत्रिमंडल का सचिव: मंत्रिमंडल की बैठकों का एजेंडा तैयार करना, बैठकों में उपस्थित रहना, निर्णयों का कार्यवृत्त (Minutes) तैयार करना और उनके क्रियान्वयन की निगरानी।
- सचिवालय का समन्वयक: विभिन्न विभागों के सचिवों और अपर मुख्य सचिवों के कार्यों में तालमेल बिठाना — अंतर-विभागीय टकराव सुलझाना; सचिवों की मासिक बैठक।
- सिविल सेवा का प्रमुख: सिविल सेवा बोर्ड का अध्यक्ष — IAS और राज्य सेवाओं के तबादलों, पदस्थापन और वरिष्ठता से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका; कार्मिक विभाग प्रायः उसी के अधीन।
- संकट प्रबंधन (Crisis Management): बाढ़, सूखा, महामारी, क़ानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति में समूचे प्रशासन-तंत्र का समन्वयन और नियंत्रण कक्ष (Control Room) का नेतृत्व; राज्य आपदा प्रबंधन की कार्यकारी समिति का अध्यक्ष।
- केंद्र-राज्य संपर्क सेतु: केंद्रीय कैबिनेट सचिवालय, विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों और नीति आयोग के साथ राज्य की ओर से मुख्य संपर्क अधिकारी; क्षेत्रीय परिषद् की बैठकों में भागीदारी।
- ज़िला प्रशासन का अभिभावक: कलेक्टरों और संभागीय आयुक्तों के सम्मेलन, ज़िलों के कामकाज की समीक्षा।
- वर्तमान राजस्थान के मुख्य सचिव: श्री वी. श्रीनिवास (V. Srinivas), 1989 बैच के IAS — 17 नवंबर 2025 से। अद्यतन: उनकी सेवानिवृत्ति (31 अगस्त 2026) से पहले उन्हें छह माह का सेवा-विस्तार दिया गया — 1 सितंबर 2026 से 28 फ़रवरी 2027 तक; इसलिए पुराने पाठ में दी गई उत्तराधिकार की चर्चा फ़िलहाल टल गई है।
प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग का मत: मुख्य सचिव को "समकक्षों में प्रथम (First among Equals)" होना चाहिए, उसका चयन योग्यता, अनुभव और निष्पक्षता के आधार पर हो, और उसका कार्यकाल कम से कम 3-4 वर्ष हो, ताकि वह स्थिर नेतृत्व दे सके। चुनौतियाँ: अल्प कार्यकाल, राजनीतिक दबाव, कार्य का अत्यधिक बोझ (वह कई समितियों का अध्यक्ष होता है) और अपर मुख्य सचिवों के बढ़ते पदों से उसकी विशिष्टता का घटना।
मुख्यमंत्री अगर टीम का कप्तान है, तो मुख्य सचिव उस टीम का "हेड-कोच" है — कप्तान बड़ी रणनीति (नीति) तय करता है, पर मैदान पर हर खिलाड़ी (IAS/RAS अधिकारी) को सही जगह लगाना, अनुशासन बनाए रखना और रोज़ का अभ्यास (दैनिक प्रशासन) चलाना हेड-कोच यानी मुख्य सचिव का काम है।
- राज्य का वरिष्ठतम सिविल सेवक; मुख्यमंत्री चुनते हैं।
- मंत्रिमंडल का सचिव और सचिवालय का प्रमुख — कई विभाग सीधे उसके अधीन (सामान्य प्रशासन, कार्मिक)।
- संकट-प्रबंधन, क़ानून-व्यवस्था की समीक्षा, ज़िला प्रशासन से सीधा जुड़ाव।
- राज्य सिविल सेवा बोर्ड का अध्यक्ष।
- केंद्र-राज्य संपर्क की प्रमुख कड़ी।
- भारत का वरिष्ठतम सिविल सेवक; मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति चुनती है; 1950 से पद।
- मंत्रिमंडल सचिवालय का प्रमुख — पर अन्य मंत्रालयों के सचिवों पर प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण कम, समन्वय अधिक।
- राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति का अध्यक्ष।
- सिविल सेवा बोर्ड (केंद्र) का अध्यक्ष।
- मुख्य सचिवों के सम्मेलन के माध्यम से राज्यों से संपर्क।
शास्त्रीय अर्थ: वह स्थिति जिसमें कोई पदाधिकारी औपचारिक रूप से अपने साथियों के बराबर दर्जे का होते हुए भी नेतृत्व, समन्वय और प्रतिनिधित्व के कारण उनमें प्रथम माना जाता है।
सरल भाषा में: सब सचिव एक ही "क्लास" के हैं, पर मॉनिटर एक ही है — वही मुख्य सचिव है। उदाहरण: अपर मुख्य सचिव भी शीर्ष वेतनमान में हो सकते हैं, फिर भी बैठकों की अध्यक्षता और मंत्रिमंडल के निर्णयों की निगरानी मुख्य सचिव ही करता है।
6निदेशालयों की भूमिका (Role of Directorates)
सचिवालय नीति बनाता है, पर उस नीति को ज़मीन पर उतारने का काम निदेशालय (Directorate) करते हैं — निदेशालय एक "लाइन एजेंसी (Line Agency)" है (देखें अध्याय 03), जिसका सीधा संपर्क आम जनता से होता है। हर प्रमुख विभाग का अपना एक निदेशालय होता है, जिसका मुखिया "निदेशक (Director)" या "विभागाध्यक्ष (Head of Department)" कहलाता है — कहीं इसे आयुक्त या महानिरीक्षक भी कहते हैं (जैसे आयुक्त, उद्योग; पुलिस महानिदेशक)।

- नीति-निर्माण करता है (Policy-making)।
- स्टाफ़ एजेंसी — सलाहकार और समन्वयक भूमिका।
- मंत्रालय-स्तर पर, राजधानी (जयपुर) में केंद्रित।
- सीधा जनता से संपर्क नहीं — अप्रत्यक्ष भूमिका।
- नेतृत्व: सचिव / प्रमुख शासन सचिव (IAS)।
- अधिकारी कार्यकाल-प्रणाली से आते-जाते हैं।
- नीति का क्रियान्वयन करता है (Implementation)।
- लाइन एजेंसी — प्रत्यक्ष सेवा-वितरण भूमिका।
- राज्यभर में फैले फ़ील्ड कार्यालयों के माध्यम से कार्यरत।
- सीधा जनता से संपर्क — योजनाओं का वास्तविक क्रियान्वयन।
- नेतृत्व: निदेशक (प्रायः विशेषज्ञ या वरिष्ठ राज्य सेवा अधिकारी, कभी-कभी IAS)।
- स्थायी विभागीय कर्मचारी; तकनीकी विशेषज्ञता।
निदेशालयों के कार्य: (1) सचिवालय को नीति-निर्माण के लिए तथ्य, आँकड़े और तकनीकी सलाह देना; (2) बजट-अनुमान तैयार करना; (3) फ़ील्ड कार्यालयों का निरीक्षण, नियंत्रण और मार्गदर्शन; (4) योजनाओं का क्रियान्वयन और प्रगति-रिपोर्ट; (5) विभागीय कर्मचारियों की भर्ती, तबादले, अनुशासन (निर्धारित सीमा तक)।
सचिवालय-निदेशालय संबंध की समस्याएँ: दोहरी जाँच (एक ही फ़ाइल दोनों जगह परखी जाती है) से देरी; सचिवालय का निदेशालय के अधिकार-क्षेत्र में हस्तक्षेप; युवा सचिव और वरिष्ठ विशेषज्ञ निदेशक के बीच सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ तनाव (देखें अध्याय 07)। इसी कारण कुछ विद्वानों और समितियों ने दोनों के एकीकरण (Merger) — यानी निदेशक को ही पदेन सचिव बनाने — का सुझाव दिया है।
सचिवालय वह है जो तय करता है कि आज खाने में क्या बनेगा, बजट कितना है, सामग्री कहाँ से आएगी (नीति) — पर असली खाना रसोईघर (निदेशालय) में बनता है, जहाँ रसोइया (फ़ील्ड स्टाफ़) उसे पकाकर परिवार (जनता) तक पहुँचाता है। दोनों के बिना काम नहीं चलता, पर दोनों की भूमिका बिल्कुल अलग है।
6.1 निदेशालयों के प्रकार — तकनीकी बनाम सामान्य विभाग
सभी निदेशालय एक जैसे नहीं होते — कुछ का नेतृत्व विशेषज्ञ या तकनीकी अधिकारी करते हैं, तो कुछ का सामान्यज्ञ (Generalist) प्रशासनिक अधिकारी — यह भेद अध्याय 07 में पढ़े गए "सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ विवाद" से सीधे जुड़ता है।
| निदेशालय का प्रकार | उदाहरण एवं नेतृत्व |
|---|---|
| तकनीकी निदेशालय (Technical Directorate) | सार्वजनिक निर्माण विभाग, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, सिंचाई / जल संसाधन, कृषि — इनका नेतृत्व इंजीनियर, चिकित्सक या कृषि-विशेषज्ञ (जैसे मुख्य अभियंता, निदेशक-चिकित्सा) करते हैं, जो उस क्षेत्र की तकनीकी शिक्षा प्राप्त विशेषज्ञ होते हैं। |
| सामान्य / प्रशासनिक निदेशालय (Non-Technical Directorate) | राजस्व, स्थानीय निकाय, सामाजिक न्याय — इनका नेतृत्व प्रायः IAS/RAS संवर्ग के सामान्यज्ञ (Generalist) अधिकारी करते हैं, जिन्हें विशिष्ट तकनीकी प्रशिक्षण नहीं, बल्कि व्यापक प्रशासनिक अनुभव प्राप्त होता है। |
अस्पताल के निदेशालय का मुखिया एक डॉक्टर (तकनीकी विशेषज्ञ) होता है, क्योंकि वहाँ दवा और इलाज से जुड़े फ़ैसले चाहिए। पर राजस्व निदेशालय जैसे सामान्य प्रशासनिक विभाग का मुखिया एक "मैनेजर-टाइप" प्रशासनिक अधिकारी (IAS/RAS) होता है, क्योंकि वहाँ ज़रूरत है समन्वय और क़ानून-व्यवस्था चलाने की, किसी ख़ास तकनीकी डिग्री की नहीं।
राजस्थान में ऐतिहासिक कारणों से (अजमेर लंबे समय तक ब्रिटिश-प्रशासित "अजमेर-मेरवाड़ा" क्षेत्र रहा, जो 1956 में राजस्थान में मिला; उस समय राजधानी जयपुर रहने के बदले कुछ प्रमुख संस्थाएँ अजमेर को दी गईं) कई महत्वपूर्ण राज्य-स्तरीय मुख्यालय आज भी जयपुर के बजाय अजमेर में स्थित हैं — जैसे (1) राजस्व मंडल (Board of Revenue), (2) माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान (स्थापना 1957), और (3) राजस्थान लोक सेवा आयोग (1958 से अजमेर में)।
तथ्य-सुधार: पुराने पाठ में देवस्थान विभाग को अजमेर में बताया गया था — देवस्थान विभाग का मुख्यालय वस्तुतः उदयपुर में है। इसी प्रकार ध्यान रखें — उपनिवेशन विभाग बीकानेर में और आबकारी आयुक्तालय उदयपुर में है; यानी राजस्थान में कई विभागाध्यक्ष कार्यालय जयपुर से बाहर हैं।
6.2 क्षेत्रीय प्रशासन — संभाग और ज़िले
सचिवालय और निदेशालय के नीचे क्षेत्रीय प्रशासन है। राजस्थान में संभाग (Division) स्तर पर संभागीय आयुक्त ज़िलों के कामकाज का पर्यवेक्षण, समन्वय और राजस्व-अपीलें देखता है, और ज़िला स्तर पर कलेक्टर प्रशासन की धुरी है (विस्तार अध्याय 11 में)। 29 दिसंबर 2024 को राज्य सरकार ने 2023 में बने 9 नए ज़िले और 3 नए संभाग समाप्त कर दिए — अब राजस्थान में 41 ज़िले और 7 संभाग हैं (जयपुर, जोधपुर, अजमेर, उदयपुर, कोटा, बीकानेर, भरतपुर)। ध्यान रहे — समाप्त ज़िलों में अनूपगढ़ भी था, जो अब फिर श्रीगंगानगर और बीकानेर ज़िलों का भाग है।
7पुलिस प्रशासन (Police Administration)
पुलिस "राज्य सूची" का विषय है (संविधान की सातवीं अनुसूची — लोक व्यवस्था प्रविष्टि 1 और पुलिस प्रविष्टि 2) — यानी पुलिस प्रशासन का संगठन, नियंत्रण और वित्त-पोषण मुख्यतः राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है। पुलिस-तंत्र एक सुस्पष्ट सोपानक्रम (Hierarchy) में कार्य करता है, ठीक सेना की तरह — हर स्तर ऊपर वाले स्तर को उत्तरदायी होता है। लंबे समय तक देश में पुलिस का ढाँचा भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 पर आधारित रहा, जो 1857 के विद्रोह के बाद शासन-केंद्रित (जनता-केंद्रित नहीं) पुलिस बनाने के लिए बना था — यही पुलिस-सुधार की बहस की जड़ है।
राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007 | राज्य स्तर से थाना स्तर तक
- राज्य स्तर: पुलिस महानिदेशक (Director General of Police — DGP) — राज्य पुलिस बल का प्रमुख, संपूर्ण राज्य में क़ानून-व्यवस्था और अपराध-नियंत्रण की अंतिम ज़िम्मेदारी। उसके साथ पुलिस मुख्यालय में अतिरिक्त महानिदेशक (ADG) विभिन्न शाखाएँ (अपराध, सतर्कता, प्रशिक्षण, गुप्तचर) सँभालते हैं। राजनीतिक नियंत्रण गृह विभाग का होता है।
- क्षेत्र (रेंज) स्तर: पुलिस महानिरीक्षक (Inspector General of Police — IGP) और पुलिस उप-महानिरीक्षक (Deputy Inspector General — DIG) — कई ज़िलों के समूह (रेंज) की निगरानी।
- ज़िला स्तर: पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police — SP) — ज़िले का पुलिस-प्रमुख, ज़िला कलेक्टर के साथ मिलकर क़ानून-व्यवस्था बनाए रखना (देखें अध्याय 11)। यह "दोहरा नियंत्रण" है — विभागीय रूप से SP अपने IG के अधीन, पर क़ानून-व्यवस्था के लिए ज़िला मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) के सामान्य निर्देशन में।
- उप-ज़िला / वृत्त स्तर: अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP), उप-अधीक्षक (Deputy SP / DySP) — वृत्ताधिकारी (Circle Officer)।
- थाना स्तर: थानाधिकारी (Station House Officer — SHO, प्रायः निरीक्षक या उप-निरीक्षक रैंक), सहायक उप-निरीक्षक (ASI), हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल — जनता से सीधा संपर्क वाली सबसे निचली इकाई। प्राथमिकी (FIR) थाने में ही दर्ज होती है।
- पुलिस आयुक्तालय प्रणाली (Commissionerate): बड़े शहरों में SP की जगह पुलिस आयुक्त होता है, जिसके पास कुछ मजिस्ट्रेटी शक्तियाँ (जैसे निषेधाज्ञा) भी होती हैं — राजस्थान में जयपुर और जोधपुर में 1 जनवरी 2011 से यह प्रणाली लागू है।

पुलिस विभाग भी सेना की तरह "आदेश-शृंखला (Chain of Command)" पर चलता है — गाँव के थाने का सिपाही अपने थानाधिकारी को, थानाधिकारी SP को, SP अपने रेंज के IG को, और IG राज्य के DGP को रिपोर्ट करता है। हर कड़ी टूटे बिना जुड़ी रहनी चाहिए, तभी क़ानून-व्यवस्था ठीक से चलती है।
7.1 पुलिस सुधार — आयोग और न्यायालय
| सुधार / मामला (Reform / Case) | विवरण |
|---|---|
| राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977-81) | अध्यक्ष धर्मवीर; 8 रिपोर्टें — राज्य सुरक्षा आयोग, DGP का निश्चित कार्यकाल, जाँच और क़ानून-व्यवस्था का पृथक्करण, नया पुलिस अधिनियम; पर वर्षों तक लागू नहीं हुईं। |
| रिबेरो समिति (1998), पद्मनाभैया समिति (2000), मॉडल पुलिस अधिनियम (2006, सोली सोराबजी) | राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफ़ारिशों को आगे बढ़ाया; जनता-केंद्रित, पेशेवर और जवाबदेह पुलिस का ढाँचा। |
| प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (22 सितंबर 2006) | सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस-सुधार हेतु 7 बाध्यकारी निर्देश (Binding Directives) दिए — जैसे राज्य सुरक्षा आयोग (State Security Commission) का गठन, DGP का न्यूनतम 2-वर्ष निश्चित कार्यकाल, क़ानून-व्यवस्था और अन्वेषण (Investigation) कार्यों का पृथक्करण, पुलिस स्थापना बोर्ड (Police Establishment Board), पुलिस शिकायत प्राधिकरण (Police Complaints Authority)। |
| राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007 एवं नियम, 2008 | सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में राजस्थान का अपना पुलिस अधिनियम — आधुनिक पुलिस-प्रशासन, सामुदायिक पुलिसिंग और जवाबदेही तंत्र की रूपरेखा प्रदान करता है; 1861 के अधिनियम का स्थान लिया। |
| द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग — "लोक व्यवस्था" (5वीं रिपोर्ट, 2007) | नागरिक-केंद्रित पुलिस, अपराध-अन्वेषण के लिए विशेष इकाई, संगठित अपराध से निपटने के लिए क़ानून। |
| क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति (नवीनतम) | लगभग दो दशक बाद भी अधिकांश राज्यों (राजस्थान सहित) में प्रकाश सिंह निर्देशों का क्रियान्वयन आंशिक या सतही ही रहा है — विश्लेषणों के अनुसार केवल आंध्र प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश ही आंशिक रूप से अनुपालनशील पाए गए हैं — राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी मुख्य कारण मानी जाती है। |

7.2 राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007 — संस्थागत ढाँचा
प्रकाश सिंह निर्देशों के अनुपालन में बने राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007 ने पुलिस को "नीति पर राजनीतिक नियंत्रण, पर दैनिक कार्य में पेशेवर स्वायत्तता" देने के लिए कई संस्थाएँ बनाईं —
| संस्था / प्रावधान (धारा) | संरचना | कार्य |
|---|---|---|
| राज्य पुलिस आयोग (धारा 21-22) | अध्यक्ष — गृह विभाग के प्रभारी मंत्री; सदस्य — विपक्ष के नेता, मुख्य सचिव, गृह विभाग के सचिव, DGP और 3 स्वतंत्र सदस्य (कम से कम एक कमज़ोर वर्ग से; चयन मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाले पैनल की सिफ़ारिश पर)। | पुलिस हेतु व्यापक नीतिगत दिशानिर्देश; कार्य-निष्पादन का मूल्यांकन — प्रकाश सिंह के "राज्य सुरक्षा आयोग" का राजस्थानी रूप। |
| पुलिस महानिदेशक (धारा 13) | महानिदेशक रैंक के अधिकारियों के पैनल से चयन; न्यूनतम कार्यकाल 2 वर्ष। | राज्य पुलिस का नेतृत्व; हटाने के आधार अधिनियम में सीमित। |
| पुलिस स्थापना बोर्ड (धारा 28) | अध्यक्ष — DGP; 4 महानिरीक्षक रैंक के सदस्य। | कांस्टेबल भर्ती, अधीनस्थ रैंकों की पदोन्नति और तबादले — राजनीतिक हस्तक्षेप कम करने हेतु। |
| पुलिस जवाबदेही समितियाँ — राज्य (धारा 62-63) और ज़िला (धारा 66) | 5 सदस्य — 4 स्वतंत्र (एक कमज़ोर वर्ग से, एक महिला) + सदस्य-सचिव (राज्य में ADGP, ज़िले में ASP रैंक); कार्यकाल 2 वर्ष (धारा 68)। | पुलिस कदाचार की शिकायतों की जाँच — प्रकाश सिंह के "पुलिस शिकायत प्राधिकरण" का रूप। (2016 में उच्च न्यायालय में जनहित याचिका से इनके निष्क्रिय होने का मुद्दा उठा।) |
| सामुदायिक संपर्क समूह — CLG (धारा 55) | प्रत्येक थाने हेतु समुदाय के प्रतिनिधि; हर पंचायत के लिए कम से कम एक। | पुलिस-जनता सहयोग, अपराध-रोकथाम, सामुदायिक पुलिसिंग। |
शास्त्रीय अर्थ: महानगरों में क़ानून-व्यवस्था की वह व्यवस्था जिसमें पुलिस आयुक्त को पुलिस-शक्तियों के साथ कुछ कार्यकारी मजिस्ट्रेटी शक्तियाँ (निषेधाज्ञा, लाइसेंस, निवारक धाराएँ) भी दी जाती हैं, और कलेक्टर-SP की "दोहरी व्यवस्था" की जगह एकीकृत कमान होती है।
सरल भाषा में: बड़े शहर में फ़ैसले के लिए दो दरवाज़े (कलेक्टर और SP) खटखटाने की जगह एक ही दरवाज़ा — पुलिस आयुक्त। उदाहरण: जयपुर में धारा 163 (BNSS, पहले CrPC 144) जैसी निषेधाज्ञा पुलिस आयुक्तालय स्तर से जारी होती है।
- पुलिस प्रशासन की समस्याएँ: राजनीतिक हस्तक्षेप और बार-बार तबादले; जनसंख्या की तुलना में कम पुलिस-बल और रिक्त पद; थानों में बुनियादी सुविधाओं और फ़ॉरेंसिक क्षमता की कमी; लंबे कार्य-घंटे; हिरासत में हिंसा और भ्रष्टाचार के आरोप; जनता का अविश्वास; और साइबर अपराध जैसी नई चुनौतियाँ।
- नए क़ानून: 1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम लागू हुए — ई-FIR, शून्य FIR, अपराध-स्थल की वीडियोग्राफ़ी और फ़ॉरेंसिक जाँच की अनिवार्यता जैसे प्रावधानों से पुलिस-कार्य-प्रणाली बदल रही है।
वर्तमान राजस्थान पुलिस महानिदेशक (DGP): श्री राजीव कुमार शर्मा (Rajeev Kumar Sharma), 1990-बैच के वरिष्ठ IPS अधिकारी — 3 जुलाई 2025 को पदभार ग्रहण किया; सितंबर 2026 के नगरीय निकाय चुनावों में भी वही DGP थे। कार्यकाल जून 2027 तक प्रस्तावित।
राजस्थान पुलिस अकादमी, जयपुर में प्रशिक्षण होता है; राज्य में जयपुर और जोधपुर पुलिस आयुक्तालय हैं; सामुदायिक पुलिसिंग के लिए ग्राम रक्षक, पुलिस मित्र और CLG (सामुदायिक संपर्क समूह) जैसी व्यवस्थाएँ हैं।
8राजस्व मंडल (Board of Revenue), अजमेर
राजस्व मंडल राजस्थान में भू-राजस्व (Land Revenue) और राजस्व-न्यायालयों से जुड़े मामलों की "सर्वोच्च अदालत" जैसी संस्था है — यह एक अर्ध-न्यायिक (Quasi-Judicial) निकाय है, जो अपील, पुनरीक्षण (Revision) और निर्देश (Reference) की शक्तियों का प्रयोग करता है। साथ ही यह भू-अभिलेखों के प्रशासन का शीर्ष प्रशासनिक निकाय भी है — यानी इसकी भूमिका दोहरी है।
स्थापना: 7 अप्रैल 1949 (अध्यादेश संख्या 22) | मुख्यालय: अजमेर
- स्थापना: संयुक्त राजस्थान के निर्माण के बाद, राजप्रमुख द्वारा अध्यादेश संख्या 22, 1949 के तहत 7 अप्रैल 1949 को स्थापित (यह अध्यादेश 1 नवंबर 1949 से प्रभावी हुआ) — इसने बीकानेर, जयपुर, जोधपुर, मत्स्य और पूर्वी राजस्थान की पुरानी अलग-अलग राजस्व-व्यवस्थाओं का स्थान लिया।
- वर्तमान विधिक आधार: राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 (Rajasthan Land Revenue Act, 1956), जिसने 1949 के अध्यादेश का स्थान लिया; साथ ही राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 के मामलों में भी यह सर्वोच्च राजस्व न्यायालय है।
- संरचना: एक अध्यक्ष (Chairman) और अधिकतम 20 सदस्य — सामान्यतः वरिष्ठ IAS, राज्य प्रशासनिक सेवा (RAS) अधिकारी और न्यायिक सेवा या अधिवक्ता पृष्ठभूमि के सदस्य नियुक्त होते हैं।
- कार्य: भू-राजस्व क़ानूनों के एकरूप और कुशल क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना; अधीनस्थ राजस्व न्यायालयों (तहसीलदार, उपखंड अधिकारी, कलेक्टर, संभागीय आयुक्त, राजस्व अपील अधिकारी — देखें अध्याय 11) के निर्णयों के विरुद्ध अपील या पुनरीक्षण सुनना; भू-अभिलेख (Land Records — जमाबंदी, खसरा, गिरदावरी) से जुड़े विवादों का अंतिम निपटारा; अधीनस्थ राजस्व अधिकारियों का अधीक्षण और निरीक्षण।
- मुख्यालय अजमेर में क्यों: ऐतिहासिक रूप से अजमेर ब्रिटिश काल में एक पृथक केंद्र-शासित क्षेत्र (अजमेर-मेरवाड़ा) था, और राजस्थान-एकीकरण के बाद भी कई पुरानी संस्थाएँ प्रशासनिक सुविधा और ऐतिहासिक निरंतरता के कारण अजमेर में ही बनी रहीं।
- चुनौती: हज़ारों लंबित राजस्व वाद; राजस्व न्यायालयों में न्यायिक प्रशिक्षण की कमी; इसलिए अलग राजस्व न्यायिक सेवा की माँग उठती रही है (शिवचरण माथुर आयोग ने इसे आवश्यक नहीं माना — देखें अध्याय 07)।

- अपील (Appeal) — अधीनस्थ राजस्व न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध।
- पुनरीक्षण (Revision) — अवैधता या अनियमितता सुधारना।
- निर्देश (Reference) — विधि-प्रश्न पर अधीनस्थ न्यायालयों से संदर्भ।
- नज़ीरें स्थापित कर राजस्व-क़ानून की एकरूप व्याख्या।
- भू-अभिलेख (जमाबंदी, खसरा, गिरदावरी) प्रशासन का शीर्ष।
- भू-प्रबंध (Settlement) और सर्वेक्षण का अधीक्षण।
- अधीनस्थ राजस्व अधिकारियों का निरीक्षण और मार्गदर्शन।
- राजस्व अधिकारियों के प्रशिक्षण और प्रक्रियाओं में सुधार।
शास्त्रीय अर्थ: वह प्रशासनिक संस्था जो न्यायालय नहीं है, पर विवादों पर सुनवाई करके विधि-अनुसार बाध्यकारी निर्णय देती है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (दोनों पक्षों को सुनना, निष्पक्षता) का पालन करती है।
सरल भाषा में: "आधा प्रशासन, आधा अदालत" — अधिकारी भी, पर फ़ैसला अदालत की तरह। उदाहरण: राजस्व मंडल, राजस्थान सिविल सेवा अपील अधिकरण, राज्य उपभोक्ता आयोग।
जैसे देश की हर बड़ी क़ानूनी अपील अंततः सर्वोच्च न्यायालय में जाती है, वैसे ही राजस्थान में ज़मीन और भू-राजस्व से जुड़े विवादों की सबसे बड़ी अपील राजस्व मंडल, अजमेर में जाकर ख़त्म होती है — इसीलिए इसे राज्य की "राजस्व संबंधी सुप्रीम कोर्ट" भी कहा जाता है। (इसके निर्णय के विरुद्ध भी रिट के माध्यम से उच्च न्यायालय जाया जा सकता है।)
9राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission — SEC)
73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992) ने पंचायती राज संस्थाओं और नगरीय स्थानीय निकायों (देखें अध्याय 03 — विकेंद्रीकरण) को संवैधानिक दर्जा दिया — इनके चुनाव सुचारू रूप से करवाने के लिए ही राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना की गई, ठीक वैसे ही जैसे केंद्र में भारत निर्वाचन आयोग (देखें अध्याय 05) संसद और विधानसभा चुनाव करवाता है। ध्यान दें — दोनों आयोग पूर्णतः अलग और स्वतंत्र हैं; राज्य निर्वाचन आयोग भारत निर्वाचन आयोग के अधीन नहीं है।
अनुच्छेद 243K एवं 243ZA | एकल-सदस्यीय आयोग | राजस्थान में 1994 से
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 243K (पंचायतों हेतु) और अनुच्छेद 243ZA (नगरपालिकाओं हेतु) — दोनों प्रावधान लगभग समान भाषा में राज्य निर्वाचन आयोग के गठन और शक्तियों का उल्लेख करते हैं।
- गठन: एक "राज्य निर्वाचन आयुक्त (State Election Commissioner)" — राज्यपाल द्वारा नियुक्त, एकल-सदस्यीय आयोग (भारत निर्वाचन आयोग के विपरीत, जो बहु-सदस्यीय है)। सेवा-शर्तें और कार्यकाल राज्यपाल नियम से तय करते हैं।
- मुख्य कार्य: पंचायती राज संस्थाओं (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, ज़िला परिषद्) और शहरी स्थानीय निकायों (नगर पालिका, नगर परिषद्, नगर निगम) के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण तथा मतदाता-सूचियाँ तैयार करवाना; आदर्श आचार संहिता लागू करना; प्रत्याशियों की योग्यता और चुनाव-व्यय की निगरानी।
- स्वतंत्रता के सुरक्षोपाय: राज्य निर्वाचन आयुक्त को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की तरह ही (उसी रीति और आधार पर) हटाया जा सकता है, और नियुक्ति के बाद उसकी सेवा-शर्तों में अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता — भारत निर्वाचन आयोग की तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय सुनिश्चित करने हेतु। किशनसिंह तोमर (2006) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि स्थानीय निकायों के चुनाव 5 वर्ष पूरे होने से पहले हर हाल में होने चाहिए और राज्य निर्वाचन आयोग को इसके लिए आवश्यक सहायता मिलनी चाहिए।
- वर्तमान राजस्थान राज्य निर्वाचन आयुक्त: श्री राजेश्वर सिंह (Rajeshwar Singh) — सितंबर 2025 से पदस्थापित।
| बिंदु | राज्य निर्वाचन आयोग | भारत निर्वाचन आयोग |
|---|---|---|
| संवैधानिक आधार | अनुच्छेद 243K, 243ZA (भाग IX, IX-A) | अनुच्छेद 324 (भाग XV) |
| संरचना | एकल — राज्य निर्वाचन आयुक्त | बहु-सदस्यीय — मुख्य निर्वाचन आयुक्त + 2 आयुक्त |
| नियुक्ति | राज्यपाल | राष्ट्रपति (2023 के अधिनियम के अनुसार चयन समिति की सिफ़ारिश पर) |
| चुनाव | पंचायतें और नगरीय निकाय | संसद, विधानमंडल, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति |
| हटाना | उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की रीति से | मुख्य निर्वाचन आयुक्त — सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की रीति से |
| मतदाता सूची | प्रायः विधानसभा सूची को आधार बनाकर अपनी सूची | स्वयं तैयार करता है |
नगरीय निकाय: सितंबर 2026 में दो चरणों (9 और 11 सितंबर) में मतदान; दूसरे चरण में 147 नगरीय निकाय, लगभग 18,266 प्रत्याशी और लगभग 87.6 लाख मतदाता; मतगणना 14 सितंबर।
पंचायती राज: 3 अक्टूबर 2026 को राज्य निर्वाचन आयुक्त ने चार चरणों का कार्यक्रम घोषित किया — ज़िला परिषद् और पंचायत समिति सदस्यों के लिए 23 अक्टूबर, 29 अक्टूबर, 4 नवंबर और 14 नवंबर; पंच-सरपंच के लिए 25 अक्टूबर से 16 नवंबर तक; मतगणना (ज़िला परिषद्-पंचायत समिति) 20 नवंबर। कुल 41 ज़िला परिषदें, 457 पंचायत समितियाँ और 14,403 ग्राम पंचायतें; लगभग 4.03 करोड़ मतदाता और 45,384 मतदान केंद्र।
यह उदाहरण दिखाता है कि ज़िलों के पुनर्गठन (41 ज़िले) के बाद राज्य निर्वाचन आयोग को परिसीमन, आरक्षण और मतदाता-सूचियों का बड़ा काम करना पड़ा; राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी चुनाव-कार्यक्रम समय पर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।
जैसे लोकसभा और विधानसभा चुनाव भारत निर्वाचन आयोग करवाता है, वैसे ही गाँव की पंचायत और शहर की नगर पालिका के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग करवाता है — दोनों का काम एक जैसा (निष्पक्ष चुनाव करवाना) है, बस स्तर अलग है।
10राज्य मानवाधिकार आयोग (State Human Rights Commission — SHRC)
मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (Protection of Human Rights Act, 1993) के तहत केंद्र में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के साथ-साथ राज्यों में भी राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) गठित करने का प्रावधान किया गया (धारा 21) — राजस्थान में भी इसी अधिनियम के तहत आयोग कार्यरत है। यह एक वैधानिक (Statutory) संस्था है, संवैधानिक नहीं। अधिनियम के अनुसार "मानवाधिकार" का अर्थ है संविधान द्वारा प्रत्याभूत या अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदाओं में निहित और भारतीय न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय जीवन, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा से जुड़े अधिकार।
मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 | गठन अधिसूचना 18 जनवरी 1999; कार्यारंभ 23 मार्च 2000 | अध्यक्ष + 2 सदस्य
- संरचना: एक अध्यक्ष (2019 के संशोधन के बाद — उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश) + अधिकतम 2 सदस्य (एक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या ज़िला न्यायाधीश; एक मानवाधिकार का जानकार)। 2006 के संशोधन से पहले राज्य आयोग में 4 सदस्य होते थे।
- नियुक्ति: अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा एक समिति की सिफ़ारिश पर होती है, जिसमें मुख्यमंत्री (अध्यक्ष के रूप में), विधानसभा अध्यक्ष, राज्य के गृह मंत्री और विधानसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं (जहाँ विधान परिषद् है, वहाँ उसके सभापति और विपक्ष के नेता भी)।
- कार्यकाल: 2019 के संशोधन के बाद 3 वर्ष या 70 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो (पहले 5 वर्ष); पुनर्नियुक्ति संभव।
- त्यागपत्र और पदच्युति: त्यागपत्र राज्यपाल को संबोधित कर दिया जा सकता है। पर पदच्युति (हटाना) केवल राष्ट्रपति द्वारा — सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद; अथवा दिवालिया होने, वेतनभोगी अन्य नियोजन, मानसिक या शारीरिक अक्षमता, विकृत-चित्त घोषित होने या नैतिक अधमता वाले अपराध में दोषसिद्धि पर। यानी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी सुरक्षा — स्वतंत्रता सुनिश्चित करने हेतु।
- कार्य: मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतों की स्वतः संज्ञान अथवा शिकायत पर जाँच; न्यायालय में लंबित मानवाधिकार मामलों में हस्तक्षेप; जेलों और हिरासत-केंद्रों का निरीक्षण; पीड़ितों हेतु मुआवज़े की अनुशंसा; मानवाधिकार साक्षरता का प्रसार; सरकार को मानवाधिकार-संबंधी सुधारों की सिफ़ारिश। जाँच के लिए इसे दीवानी न्यायालय की शक्तियाँ (गवाह बुलाना, दस्तावेज़ मँगाना) प्राप्त हैं।
- सीमाएँ: आयोग की सिफ़ारिशें सलाहकार (Advisory) प्रकृति की हैं, बाध्यकारी नहीं — यह लोकायुक्त (देखें अगला खंड) की तरह ही एक "मृदु शक्ति (Soft Power)" वाली संस्था है। घटना के एक वर्ष बाद की शिकायत पर यह विचार नहीं करता; सशस्त्र बलों के मामलों में सीमित भूमिका; राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों तक सीमित; अध्यक्ष के पद लंबे समय रिक्त रहना (राजस्थान में भी कार्यवाहक अध्यक्षों का लंबा दौर रहा)।
- वर्तमान अध्यक्ष — तथ्य-सुधार: पुराने पाठ में "न्यायमूर्ति मंधाता सीतारामा मूर्ति" का नाम था, जो वस्तुतः आंध्र प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग से जुड़ा नाम है। राजस्थान आयोग के वर्तमान अध्यक्ष न्यायमूर्ति गंगाराम मूलचंदानी हैं — 28 जून 2024 से। (पहली अध्यक्ष न्यायमूर्ति कांता कुमारी भटनागर थीं।)
| बिंदु | राज्य मानवाधिकार आयोग | राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग |
|---|---|---|
| आधार | अधिनियम 1993, धारा 21 | अधिनियम 1993, धारा 3 |
| अध्यक्ष | उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश | सर्वोच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश |
| सदस्य | अध्यक्ष + 2 | अध्यक्ष + सदस्य; पदेन सदस्य (राष्ट्रीय आयोगों के अध्यक्ष) |
| नियुक्ति | राज्यपाल — मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति | राष्ट्रपति — प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति |
| हटाना | राष्ट्रपति (राज्यपाल नहीं) | राष्ट्रपति |
| क्षेत्राधिकार | राज्य और समवर्ती सूची के विषय | सभी विषय; सशस्त्र बलों पर सीमित |
| प्रतिवेदन | राज्य सरकार को — विधानसभा में | केंद्र सरकार को — संसद में |
- 1. शिकायत: पीड़ित या उसकी ओर से कोई भी व्यक्ति — लिखित, डाक, ई-मेल या ऑनलाइन; कोई शुल्क नहीं; या आयोग स्वतः संज्ञान (समाचार-पत्र की रिपोर्ट पर भी)।
- 2. प्रारंभिक जाँच: क्या मामला मानवाधिकार उल्लंघन का है, एक वर्ष के भीतर का है, किसी अन्य आयोग या न्यायालय में लंबित तो नहीं।
- 3. रिपोर्ट मँगाना: संबंधित सरकार या प्राधिकारी (जैसे पुलिस अधीक्षक) से तथ्यात्मक रिपोर्ट; आवश्यकता हो तो आयोग की अपनी जाँच-टीम।
- 4. सुनवाई और निष्कर्ष: दीवानी न्यायालय की शक्तियों से गवाह और दस्तावेज़।
- 5. सिफ़ारिश: मुआवज़ा / अंतरिम राहत, दोषी के विरुद्ध अभियोजन या अनुशासनिक कार्रवाई, उच्च न्यायालय में रिट; सरकार एक माह में की गई कार्रवाई बताए।
सोचिए घर में एक बुज़ुर्ग सदस्य है जिसके पास हर कोई अपनी शिकायत लेकर जा सकता है, वे सुनकर सलाह देते हैं — पर उनकी सलाह मानना ज़रूरी नहीं, बस नैतिक दबाव बनता है। राज्य मानवाधिकार आयोग भी ठीक ऐसा ही करता है — मानवाधिकार हनन की शिकायत सुनता है, जाँच करता है, सलाह देता है — पर आदेश देने की सीधी शक्ति नहीं रखता।
11लोकायुक्त (Lokayukta)
जब केंद्र सरकार दशकों तक लोकपाल विधेयक पर बहस करती रही (देखें अध्याय 05), तब तक कई राज्यों ने अपने स्तर पर ही भ्रष्टाचार-निरोधक लोकायुक्त संस्था स्थापित कर ली — राजस्थान इस मामले में देश के अग्रणी राज्यों में से एक रहा है। राजस्थान में लोकायुक्त की स्थापना हरिश्चंद्र माथुर प्रशासनिक सुधार समिति (1963) की सिफ़ारिश का परिणाम थी (देखें अध्याय 07)।
राजस्थान लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973 | 3 फ़रवरी 1973 से प्रभावी
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: राजस्थान लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973 (अधिनियम संख्या 9, 1973) के तहत गठित। लोकायुक्त क़ानून बनाने के क्रम में राजस्थान देश में तीसरा था — पहले उड़ीसा (1970), फिर महाराष्ट्र (1971), और फिर राजस्थान (1973)। पर वास्तव में लोकायुक्त नियुक्त करने में महाराष्ट्र (1972) पहला और राजस्थान (1973, न्यायमूर्ति आई.डी. दुआ) दूसरा था, क्योंकि उड़ीसा का क़ानून 1983 में जाकर लागू हुआ। डोनाल्ड सी. रोवाट के अनुसार भारत में ऑम्बड्समैन का क्षेत्राधिकार विश्व में सबसे व्यापक प्रकार का है।
- नियुक्ति: राज्यपाल द्वारा, राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और विधानसभा में विपक्ष के नेता के परामर्श से — सामान्यतः किसी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश की नियुक्ति की परंपरा। कार्यकाल: 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु; पुनर्नियुक्ति नहीं (2018 में इसे 8 वर्ष किया गया था, पर मार्च 2019 में फिर 5 वर्ष कर दिया गया)।
- अधिकार-क्षेत्र (Jurisdiction): मंत्रिपरिषद् के सदस्य, राज्य सरकार के सचिव, विभागाध्यक्ष, अधिकारी-कर्मचारी, ज़िला परिषद् प्रमुख और उप-प्रमुख, नगर निगम महापौर और उप-महापौर, स्थानीय निकाय और सरकारी कंपनियों, निगमों और बोर्डों के अध्यक्ष और अधिकारी — भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और प्रशासनिक कदाचार की शिकायतों की जाँच। तथ्य-संगति: पुराने पाठ में यहाँ "मुख्यमंत्री" भी लिखा था, जबकि अध्याय 08 में उन्हें बाहर बताया गया; राजस्थान के अधिनियम में मुख्यमंत्री लोकायुक्त के दायरे से बाहर माने जाते हैं, और उन्हें इसमें लाने की माँग समय-समय पर उठती रही है।
- अधिकार-क्षेत्र से अपवर्जित (Excluded): (1) उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीश तथा न्यायिक सेवा के सदस्य; (2) मुख्य निर्वाचन आयुक्त, निर्वाचन आयुक्त, क्षेत्रीय आयुक्त और राजस्थान के मुख्य निर्वाचन अधिकारी; (3) राजस्थान विधानसभा सचिवालय के कर्मचारी। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार, लोकायुक्त की सिफ़ारिश पर, राजपत्र-अधिसूचना द्वारा किसी विशेष श्रेणी के लोक सेवकों (राजपत्रित रैंक को छोड़कर) को भी अधिकार-क्षेत्र से बाहर कर सकती है।
- कार्यप्रणाली की विशेषताएँ: (1) लोकायुक्त प्रतिवर्ष राज्यपाल को अपने कार्यों की समेकित रिपोर्ट प्रस्तुत करता है; (2) राज्यपाल यह रिपोर्ट स्पष्टीकरण-ज्ञापन सहित विधानसभा के समक्ष रखता है; (3) लोकायुक्त विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है; (4) जाँच हेतु राज्य की अन्वेषण एजेंसियों की सहायता ले सकता है; (5) राज्य सरकार के किसी भी विभाग से संबंधित फ़ाइलें और दस्तावेज़ तलब कर सकता है; (6) जाँच प्रायः गोपनीय होती है — परंतु उसकी सिफ़ारिशें केवल सलाहकार (Advisory) होती हैं, राज्य सरकार पर बाध्यकारी नहीं; उसके पास अभियोजन चलाने की शक्ति भी नहीं।
- वर्तमान राजस्थान लोकायुक्त — तथ्य-सुधार: पुराने पाठ में लिखा था कि न्यायमूर्ति प्रताप कृष्ण लोहरा "अक्टूबर 2023 से" लोकायुक्त हैं। सही तथ्य — उन्होंने 9 मार्च 2021 को पदभार ग्रहण किया और उनका कार्यकाल 8 मार्च 2026 को पूरा हुआ; वे 13वें कार्यकाल के धारक थे (देखें अध्याय 08)। अगस्त 2026 की रिपोर्टों के अनुसार पद रिक्त था।
सोचिए मोहल्ले में कोई विवाद हो, तो लोग किसी सम्मानित, निष्पक्ष बुज़ुर्ग (लोकायुक्त) के पास जाते हैं — वे दोनों पक्षों की सुनते हैं, जाँच करते हैं, और अपनी राय देते हैं, पर कोई पुलिस जैसी सज़ा नहीं दे सकते। यही लोकायुक्त की सीमा भी है — शक्तिशाली प्रभाव, पर सीधी दंड-शक्ति नहीं।
| राज्य (State) | लोकायुक्त — वर्ष |
|---|---|
| उड़ीसा (Orissa) | 1970-71 — देश में पहला लोकायुक्त क़ानून (1970); पर संस्था 1983 में कार्यरत |
| महाराष्ट्र (Maharashtra) | 1971-72 — पहला कार्यरत लोकायुक्त (1972) |
| राजस्थान (Rajasthan) | 1973 — दूसरा कार्यरत लोकायुक्त |
| बिहार (Bihar) | 1974 |
| उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) | 1975 |
| कर्नाटक (Karnataka) | 1979 |
| मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) | 1981 |
| आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) | 1983 |
| हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) | 1983 |
| गुजरात (Gujarat) | 1986 |
| पंजाब (Punjab) | 1995 |
राजस्थान भारत का तीसरा राज्य था जिसने लोकायुक्त क़ानून बनाया (और दूसरा, जहाँ लोकायुक्त वास्तव में नियुक्त हुआ) — यह दर्शाता है कि प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार-निरोध के मामले में राजस्थान शुरू से ही अग्रणी राज्यों में रहा है। राजस्थान में उप-लोकायुक्त (Up-Lokayukta) का भी प्रावधान है (पहले उप-लोकायुक्त के.पी.यू. मेनन, 1973), यद्यपि यह पद लंबे समय से रिक्त रहा है।
11.1 राज्यों में लोकायुक्त — साझा प्रावधान और उपयोगिता
लोकायुक्त के वर्ष पढ़ते समय ध्यान रखें कि कहीं क़ानून पारित होने का वर्ष दिया जाता है, कहीं अध्यादेश का, और कहीं पहली नियुक्ति का — इसलिए अलग-अलग पुस्तकों में अंतर दिखता है। उदाहरण: बिहार — 1973 में अध्यादेश, बाद में विधि (1974); उत्तर प्रदेश — अधिनियम 1975; मध्य प्रदेश — विधेयक 1981; आंध्र प्रदेश — विधेयक 1982 (संस्था 1983); हिमाचल प्रदेश — 1983; कर्नाटक — फ़रवरी 1983 में अध्यादेश, 1984-85 में अधिनियम; दिल्ली — अधिनियम 1995-96; हरियाणा — पहली नियुक्ति 1997। केरल में पहले भ्रष्टाचार-निवारण का अलग क़ानून (1983) और नागालैंड में सतर्कता आयोग था।
लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 63: हर राज्य को अधिनियम लागू होने के एक वर्ष के भीतर राज्य विधानमंडल के क़ानून से लोकायुक्त स्थापित करना था — पर ढाँचा राज्यों पर छोड़ा गया, इसलिए राज्यों के लोकायुक्तों में भारी असमानता बनी रही।
| अधिकांश राज्य-अधिनियमों के साझा प्रावधान | विवरण |
|---|---|
| नियुक्ति | राज्यपाल द्वारा — मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता से परामर्श (राजस्थान में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी)। |
| कार्यकाल | सामान्यतः 5 वर्ष। |
| कार्य-विभाजन | लोकायुक्त — मंत्रियों और सचिवों के विरुद्ध शिकायतें; उप-लोकायुक्त — सचिव स्तर से नीचे के अधिकारियों के विरुद्ध। |
| वेतन-भत्ते | लोकायुक्त — उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समान; उप-लोकायुक्त — उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान। |
| कार्य-प्रणाली | पूर्णतः गोपनीय। |
| पद से हटाना | केवल महाभियोग जैसी प्रक्रिया से — स्वतंत्रता की गारंटी। |

राजस्थान में शिकायत: शिकायतकर्ता का स्पष्ट नाम-पता, समर्थन में शपथ-पत्र और दस्तावेज़ आवश्यक; 5 वर्ष से अधिक पुराने मामलों की शिकायत नहीं की जा सकती; झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान भी है।
- 1. जनता की शिकायतों के निराकरण हेतु सुगम, स्वतंत्र और सहज उपलब्ध।
- 2. न्याय पाने का सुगम, मितव्ययी और शीघ्र साधन — न्यायालय जैसी औपचारिकता और ख़र्च नहीं।
- 3. प्रशासनिक अकुशलता और भ्रष्टाचार के विरुद्ध सुधारात्मक और निवारक — दोनों प्रकार के प्रयास।
- 4. कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका — तीनों से स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्था।
- 5. मध्यस्थों (दलालों / वकीलों) की आवश्यकता नहीं।
- 6. सभी विषयों पर न्यायपूर्ण और निष्पक्ष विचार।
- 7. नागरिकों के न्यायोचित हितों की अतिरिक्त गारंटी।
- 8. विधानमंडल के प्रतिनिधि की तरह कार्य — इसलिए उत्तरदायी और संतुलित निर्णय; शक्ति के दुरुपयोग पर विधानमंडल कार्रवाई कर सकता है।
"सुमि-निस्व-मध्य-अतिरिक्त" — सुगम, मितव्ययी, निवारक, स्वतंत्र, मध्यस्थ-मुक्त, अतिरिक्त गारंटी।
11.2 भारतीय अनुभव का मूल्यांकन — कमज़ोरियाँ
| कमज़ोरी | व्याख्या |
|---|---|
| 1. कुशासन और भ्रष्टाचार — एक ही संस्था | अन्य देशों में दो अलग संस्थाएँ (कुशासन के लिए ऑम्बड्समैन, भ्रष्टाचार के लिए अलग तंत्र); भारत में दोनों काम एक ही संस्था को — परिणामस्वरूप साधारण "पीड़न" की शिकायतों पर भी भ्रष्टाचार-जाँच जैसी भारी औपचारिक प्रक्रियाएँ। |
| 2. राजनीतिक शत्रुता | भ्रष्टाचार प्रायः राजनीतिक स्तर से शुरू होता है, इसलिए राजनीतिज्ञ इसे अपनी प्रतिष्ठा और सत्ता के लिए ख़तरा (विरोधी सत्ता-केंद्र) मानते हैं — कमज़ोर समर्थन। |
| 3. अधिकार-क्षेत्र की कमी | कई राज्यों ने भूतपूर्व मंत्रियों और अधिकारियों को बाहर रखा — पद छोड़ने से ठीक पहले के कदाचार पर कार्रवाई कठिन; शिमला सम्मेलन में इन्हें दायरे में लाने की आवश्यकता बताई गई। राजस्थान में मुख्यमंत्री भी दायरे से बाहर। |
| 4. विलंब | लंबित शिकायतों का बढ़ता ढेर — "शीघ्र और सस्ता न्याय" का मूल उद्देश्य ही विफल। |
| 5. स्वतंत्र जाँच एजेंसी का अभाव | जाँच का अधिकांश कार्य सरकारी एजेंसियों से — जनता में विश्वास नहीं; कर्नाटक मॉडल (लोकायुक्त के अधीन अपनी पुलिस शाखा) अपनाने की सिफ़ारिश। |
| 6. सलाहकारी सिफ़ारिशें | अभियोजन या दंड की शक्ति नहीं (अपवाद — दिल्ली का 1995-96 का अधिनियम, जिसमें दोषी को दंड देने और उच्च न्यायालय जैसी शक्तियों का प्रावधान था; अपील केवल सर्वोच्च न्यायालय में)। |
| 7. नियुक्ति में देरी | पद लंबे समय तक रिक्त — राजस्थान में मार्च 2026 के बाद भी यही स्थिति। |
निष्कर्ष: कमज़ोरियों के बावजूद इस संस्था का होना न होने से अच्छा है — इसकी उपस्थिति मात्र लोक-अधिकारियों में संयम का भय पैदा करती है। समय के साथ सुधारों और समायोजन से यह विकसित होगी, बशर्ते राजनीतिज्ञ और प्रशासक इसकी वांछनीयता में विश्वास करें और सहयोग दें।
- राज्य-अधिनियम (राजस्थान 1973); 2013 के अधिनियम की धारा 63 के अंतर्गत अनिवार्य।
- राज्यपाल द्वारा नियुक्त।
- राज्य के मंत्री, अधिकारी, स्थानीय निकाय प्रमुख (राजस्थान में मुख्यमंत्री बाहर)।
- राजस्थान में सिफ़ारिशें सलाहकारी; अपनी अभियोजन शाखा नहीं।
- एकल सदस्य + उप-लोकायुक्त।
- लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013; पहले अध्यक्ष 2019 में।
- राष्ट्रपति द्वारा — प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति की सिफ़ारिश पर।
- प्रधानमंत्री (कुछ अपवादों सहित), मंत्री, सांसद, समूह A-D के अधिकारी।
- अपनी जाँच और अभियोजन शाखा का प्रावधान; CBI पर अधीक्षण।
- अध्यक्ष + अधिकतम 8 सदस्य (आधे न्यायिक)।

12सार-तुलना और समय-रेखा
| पद / संस्था | आधार | नियुक्ति | मुख्य भूमिका | राजस्थान में (अक्टूबर 2026) |
|---|---|---|---|---|
| राज्यपाल | अनुच्छेद 153-162 | राष्ट्रपति | संवैधानिक प्रमुख + केंद्र का प्रतिनिधि | हरिभाऊ किसनराव बागड़े |
| मुख्यमंत्री | अनुच्छेद 163-167 | राज्यपाल | वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख | भजनलाल शर्मा |
| मुख्य सचिव | परंपरा | मुख्यमंत्री / राज्य सरकार | प्रशासन का शीर्ष, समन्वय | वी. श्रीनिवास |
| DGP | राजस्थान पुलिस अधिनियम 2007 | राज्य सरकार (प्रकाश सिंह मानदंड) | राज्य पुलिस प्रमुख | राजीव कुमार शर्मा |
| राजस्व मंडल | भू-राजस्व अधिनियम 1956 | राज्य सरकार | राजस्व की सर्वोच्च अपील | अजमेर |
| राज्य निर्वाचन आयोग | अनुच्छेद 243K, 243ZA | राज्यपाल | स्थानीय निकाय चुनाव | राजेश्वर सिंह |
| राज्य मानवाधिकार आयोग | अधिनियम 1993 | राज्यपाल (समिति की सिफ़ारिश पर) | मानवाधिकार संरक्षण | गंगाराम मूलचंदानी |
| लोकायुक्त | अधिनियम 1973 | राज्यपाल | भ्रष्टाचार की जाँच | पद रिक्त (मार्च 2026 के बाद) |
समय-रेखा — राजस्थान के राज्य प्रशासन के प्रमुख पड़ाव
| वर्ष/अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 1799 | बंगाल में मुख्य सचिव का पद |
| 1861 | भारतीय पुलिस अधिनियम |
| 1949 (30 मार्च) | संयुक्त राजस्थान — हीरालाल शास्त्री पहले प्रधानमंत्री; राजप्रमुख सवाई मानसिंह द्वितीय |
| 1949 (7 अप्रैल) | राजस्व मंडल की स्थापना (अध्यादेश 22/1949) — राजस्थान की एकीकृत राजस्व-न्याय व्यवस्था की नींव |
| 1956 | राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम पारित — राजस्व मंडल का वर्तमान विधिक आधार बना; 1 नवंबर से राज्यपाल का पद (गुरुमुख निहाल सिंह), अजमेर-मेरवाड़ा का विलय |
| 1957 / 1958 | माध्यमिक शिक्षा बोर्ड; RPSC अजमेर में |
| 1963 | हरिश्चंद्र माथुर प्रशासनिक सुधार समिति |
| 1970-71 | उड़ीसा — देश का पहला लोकायुक्त क़ानून — राज्य-स्तरीय ऑम्बड्समैन आंदोलन की शुरुआत |
| 1971-72 | महाराष्ट्र — लोकायुक्त क़ानून (1971) और देश का पहला कार्यरत लोकायुक्त (1972) |
| 1973 | राजस्थान लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम पारित — राजस्थान: क़ानून बनाने में तीसरा राज्य; पहले लोकायुक्त आई.डी. दुआ |
| 1977-81 | राष्ट्रीय पुलिस आयोग |
| 1992 / अनुच्छेद 243K, 243ZA | 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन — राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना का आधार (राजस्थान में 1994) |
| 1993 | मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम पारित — NHRC और SHRC (राज्य मानवाधिकार आयोग) की स्थापना का आधार |
| 1999 / 2000 | राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग — अधिसूचना 18 जनवरी 1999; कार्यारंभ 23 मार्च 2000 |
| 2003 | 91वाँ संविधान संशोधन — मंत्रिपरिषद् के आकार पर 15% की सीमा तय |
| 2006 (22 सितंबर) | प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ — सर्वोच्च न्यायालय के 7 निर्देश; पुलिस-सुधार की दिशा में ऐतिहासिक निर्णय |
| 2007-08 | राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007 और नियम, 2008 — राजस्थान का पुलिस-सुधार संबंधी विधिक ढाँचा |
| 2011 (1 जनवरी) | जयपुर और जोधपुर में पुलिस आयुक्तालय |
| 2019 | मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम — कार्यकाल 3 वर्ष; राजस्थान लोकायुक्त का कार्यकाल फिर 5 वर्ष |
| 2021 (9 मार्च) | न्यायमूर्ति प्रताप कृष्ण लोहरा — राजस्थान लोकायुक्त (कार्यकाल 8 मार्च 2026 तक) |
| 2023 (दिसंबर) | भजनलाल शर्मा मुख्यमंत्री (15 दिसंबर); दो उप-मुख्यमंत्री |
| 2024 (28 जून) | न्यायमूर्ति गंगाराम मूलचंदानी — राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष |
| 2024 (31 जुलाई) | हरिभाऊ किसनराव बागड़े — राजस्थान के 22वें राज्यपाल नियुक्त — राज्यपाल पद पर वर्तमान नियुक्ति |
| 2024 (29 दिसंबर) | राजस्थान सरकार द्वारा 9 नवगठित ज़िले (अनूपगढ़ सहित) और 3 संभाग समाप्त — 41 ज़िले, 7 संभाग शेष; राज्य के प्रशासनिक भूगोल में नवीनतम बड़ा परिवर्तन (देखें अध्याय 11) |
| 2025 (जुलाई) | राजीव कुमार शर्मा — पुलिस महानिदेशक |
| 2025 (सितंबर) | राजेश्वर सिंह — राजस्थान राज्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त — राज्य निर्वाचन आयोग में वर्तमान नेतृत्व |
| 2025 (17 नवंबर) | वी. श्रीनिवास — मुख्य सचिव |
| 2026 | मुख्य सचिव को सेवा-विस्तार (28 फ़रवरी 2027 तक); नगरीय निकाय चुनाव (सितंबर); पंचायती राज चुनाव (23 अक्टूबर से 17 नवंबर) |
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