📚 अध्याय 02/11 — लोक प्रशासन

सिद्धांत एवं उपागम

वैज्ञानिक प्रबंधन से पारिस्थितिक उपागम तक — संगठन को समझने के तरीक़ों की यात्रा
📖 कहानी से शुरुआत — स्टॉपवॉच, रोशनी और एक प्रिज़्म

सोचिए — 1890 के दशक की एक अमेरिकी स्टील फ़ैक्ट्री में मज़दूर अपनी मर्ज़ी से काम करते थे, किसी को नहीं पता था कि एक मज़दूर एक दिन में कितना लोहा ढो सकता है, और उत्पादन बेहद कम था। फ़्रेडरिक टेलर नाम के एक इंजीनियर ने घड़ी और स्टॉपवॉच लेकर हर हरकत को मापना शुरू किया — यहीं से जन्म हुआ वैज्ञानिक प्रबंधन (Scientific Management) का।

कुछ दशक बाद, शिकागो की एक फ़ैक्ट्री में एक अजीब बात हुई — रोशनी बढ़ाओ तो उत्पादन बढ़ जाए, घटाओ तो भी बढ़ जाए! एल्टन मेयो ने पाया कि असली वजह थी — मज़दूरों पर ध्यान दिया जाना और उनका आपसी सामाजिक समूह। यहीं से जन्म हुआ मानव संबंध सिद्धांत (Human Relations Theory) का।

फिर 1947 में हर्बर्ट साइमन ने कहा कि प्रशासन का असली काम "निर्णय लेना" है, और मनुष्य कभी पूरी तरह तार्किक नहीं हो सकता। उसी दौर में फ़्रेड रिग्स थाईलैंड और फ़िलीपींस गए और उन्होंने देखा कि अमेरिका में सफल प्रशासनिक नियम वहाँ काम ही नहीं करते — क्योंकि हर देश का समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था अलग है। उन्होंने विकासशील समाज की तुलना एक प्रिज़्म से की, जिसमें सफ़ेद रोशनी आधी टूटी हुई होती है।

इस अध्याय में हम लोक प्रशासन के उन सभी बड़े सिद्धांतों और उपागमों (Approaches) की यात्रा करेंगे — वैज्ञानिक प्रबंधन से लेकर पारिस्थितिक उपागम तक — जो बताते हैं कि संगठन और प्रशासन को समझने के तरीक़े समय के साथ कैसे बदलते गए, और हर नया सिद्धांत पिछले की किस कमी को दूर करने के लिए आया।

📋 विषय-सूची — इस अध्याय में क्या पढ़ेंगे?

1. सिद्धांत और उपागम — भूमिका, वर्गीकरण और विकास-क्रम

2. वैज्ञानिक प्रबंधन सिद्धांत (Scientific Management) — फ़्रेडरिक विंसलो टेलर और उनके अनुयायी

3. पूरक — प्रशासनिक प्रबंधन / शास्त्रीय सिद्धांत (Administrative / Classical Theory) — फेयोल, गुलिक, उर्विक

4. पूरक — नौकरशाही सिद्धांत (Bureaucratic Theory) — मैक्स वेबर और उनके आलोचक

5. मानव संबंध सिद्धांत (Human Relations Theory) — एल्टन मेयो, हॉथोर्न प्रयोग, फॉलेट, मैस्लो, मैक्ग्रेगर

6. व्यवहारवादी उपागम (Behavioural Approach) — हर्बर्ट साइमन, चेस्टर बर्नार्ड, आर्गिरिस, लिकर्ट

7. संरचना-प्रकार्यवादी उपागम (Structural-Functional Approach) — पार्सन्स (AGIL), मर्टन, रिग्स

8. पारिस्थितिक उपागम (Ecological Approach) — जॉन गॉस, फ़्रेड रिग्स, प्रिज़्मैटिक-साला मॉडल

9. पूरक — प्रणाली उपागम (Systems Approach) — बर्टलान्फ़ी, ईस्टन का इनपुट-आउटपुट मॉडल

10. सभी सिद्धांतों की तुलनात्मक तालिका और समय-रेखा

1सिद्धांत और उपागम — भूमिका

प्रशासनिक व्यवहार, संरचनाओं और प्रक्रियाओं को ठीक से समझने के लिए प्रशासनिक विचारधाराओं को समझना बहुत आवश्यक है। किसी विषय पर केंद्रित सिद्धांतों के समूह को विचारधारा कहते हैं। यह व्यापक मतों, विचारों, विश्वासों, मूल्यों और मानकों से बनती है, और समाज तथा संगठन को एक दिशा देती है। उपागम (Approach) का अर्थ है किसी विषय को देखने और अध्ययन करने का दृष्टिकोण या रास्ता। जैसे एक ही हाथी को कोई सूँड़ से, कोई पैर से और कोई कान से पहचानता है, वैसे ही अलग-अलग उपागम संगठन के अलग-अलग पक्षों पर रोशनी डालते हैं।

उन्नीसवीं सदी में प्रबंधन की परंपरागत सोच थी — संसाधनों से उत्पादन करके मालिक का लाभ अधिकतम करना, और काम पुराने "अंगूठे के नियम" यानी अनुमान और आदत से होता था। बीसवीं सदी की शुरुआत में स्वचालन, नई मशीनों और बड़े उद्योगों ने उत्पादन के तरीक़े बदल दिए। अब प्रबंधन का दायित्व केवल मालिक का लाभ नहीं रहा, बल्कि कर्मचारियों, समाज, सरकार और राष्ट्र के प्रति भी हो गया। इसी बदलाव ने संगठन के व्यवस्थित सिद्धांतों को जन्म दिया।

लोक प्रशासन के सिद्धांतों को मोटे तौर पर तीन युगों में बाँटा जाता है। शास्त्रीय युग में संगठन को एक मशीन माना गया और संरचना तथा दक्षता पर बल दिया गया। नव-शास्त्रीय युग में मनुष्य को सामाजिक प्राणी माना गया और समूह तथा मनोबल पर बल दिया गया। आधुनिक युग में संगठन को एक व्यवस्था माना गया, जो व्यवहार, निर्णय और पर्यावरण से प्रभावित होती है।

चित्र 2.1: लोक प्रशासन के सिद्धांतों का विकास-क्रम
चित्र 2.1: लोक प्रशासन के सिद्धांतों का विकास-क्रम
युगसिद्धांत / उपागमप्रमुख विचारकमनुष्य की छवि
शास्त्रीय (Classical)वैज्ञानिक प्रबंधन; प्रशासनिक प्रबंधन; नौकरशाहीटेलर; फेयोल, गुलिक, उर्विक; वेबर"आर्थिक मनुष्य" — पैसे से प्रेरित, मशीन का पुर्ज़ा
नव-शास्त्रीय (Neo-classical)मानव संबंधमेयो, फॉलेट, रोथलिसबर्गर"सामाजिक मनुष्य" — समूह और सम्मान से प्रेरित
आधुनिक (Modern)व्यवहारवादी; प्रणाली; संरचना-प्रकार्यवादी; पारिस्थितिकसाइमन, बर्नार्ड; बर्टलान्फ़ी, ईस्टन; पार्सन्स, मर्टन; गॉस, रिग्स"प्रशासनिक मनुष्य" — सीमित तार्किकता वाला, पर्यावरण से जुड़ा

📌 पाठ्यक्रम का ध्यान रखें: पाठ्यक्रम में पाँच सिद्धांत और उपागम हैं — वैज्ञानिक प्रबंधन, मानव संबंध, व्यवहारवादी, संरचना-प्रकार्यवादी और पारिस्थितिक। प्रशासनिक प्रबंधन, नौकरशाही और प्रणाली उपागम इन्हें समझने के लिए "पूरक" के रूप में दिए गए हैं, क्योंकि इनके बिना बाक़ी सिद्धांतों की पृष्ठभूमि अधूरी रहती है।

🔑 इस खंड का कीवर्ड सारांश
विचारधारा
किसी विषय पर सिद्धांतों का समूह
उपागम
अध्ययन का दृष्टिकोण / रास्ता
शास्त्रीय युग
संरचना और दक्षता; आर्थिक मनुष्य
नव-शास्त्रीय युग
मानव संबंध; सामाजिक मनुष्य
आधुनिक युग
व्यवहार, निर्णय, पर्यावरण, व्यवस्था
अंगूठे का नियम
अनुमान और आदत से काम

2वैज्ञानिक प्रबंधन सिद्धांत (Scientific Management)

2.1 अर्थ, परिभाषाएँ और पृष्ठभूमि

"वैज्ञानिक प्रबंधन" दो शब्दों से बना है — वैज्ञानिक और प्रबंधन। विज्ञान ज्ञान की वह शाखा है जो तथ्यों को इकट्ठा करती है, उनके कार्य-कारण संबंध खोजती है और सामान्य नियम बनाती है। हक्सले के अनुसार, "विज्ञान ऐसा सम्यक् ज्ञान है जो युक्ति और साक्ष्य पर आधारित है।" प्रबंधन का अर्थ है किसी कार्य को सुव्यवस्थित ढंग से चलाना — यानी मानवीय प्रयासों का नियोजन, संगठन, निर्देशन और नियंत्रण करना। इस प्रकार, अनुभव से सीखने के पुराने तरीक़े "ग़लती करो और सुधारो" की जगह निश्चित नियमों और सिद्धांतों के आधार पर प्रबंधन चलाना ही वैज्ञानिक प्रबंधन है। यह पुराने "अंगूठे के नियम (Rule of Thumb)" का विरोधी दर्शन है।

विद्वानपरिभाषा
फ़्रेडरिक विंसलो टेलर (F. W. Taylor)यह जानने की कला कि तुम लोगों से संगठन में क्या कराना चाहते हो, और यह देखना कि वे उसे सबसे उचित और सस्ते ढंग से कैसे करते हैं — वैज्ञानिक प्रबंधन कहलाता है।
पीटर ड्रकर (Peter Drucker)वैज्ञानिक प्रबंधन का कार्य है — काम का संगठित अध्ययन, काम को सबसे सरल भागों में बाँटना, और हर भाग को श्रमिक द्वारा करने के लिए व्यवस्थित सुधार करना।

वैज्ञानिक प्रबंधन संगठन का पहला सुसंगत और व्यवस्थित सिद्धांत माना जाता है। फिर भी टेलर इसके एकमात्र जनक नहीं थे — उनसे पहले चार्ल्स बैबेज (Charles Babbage), हेनरी टाउन (Henry Towne), फ़्रेडरिक हैल्से और हेनरी मेटकाफ़ ने भी कुछ वैज्ञानिक तरीक़े अपनाए थे। "वैज्ञानिक प्रबंधन" शब्द सबसे पहले लुई ब्रैंडाइस (Louis Brandeis) ने 1910 में प्रयोग किया। पर टेलर ने ही इस शब्द को एक पूर्ण और व्यवस्थित सिद्धांत का रूप दिया, इसलिए उन्हें "वैज्ञानिक प्रबंधन का जनक" कहा जाता है।

🎓 चिंतक-परिचय — वैज्ञानिक प्रबंधन (Scientific Management)

विचारक/प्रवर्तक: फ़्रेडरिक विंसलो टेलर (F. W. Taylor) | वर्ष: 20वीं सदी का प्रारंभ (मिडवेल और बेथलहम स्टील कंपनी)

🎬 सच्ची घटना — बेथलहम स्टील और लोहे की सिल्लियाँ

बेथलहम स्टील कंपनी में मज़दूर कच्चे लोहे की भारी सिल्लियाँ (Pig Iron) उठाकर रेल के डिब्बों में लादते थे। एक मज़दूर दिन में औसतन लगभग 12.5 टन लोहा लादता था। टेलर ने स्टॉपवॉच से हर हरकत मापी — कितनी देर उठाना, कितनी देर चलना, कब और कितना आराम करना।

फिर उन्होंने एक मज़बूत और इच्छुक मज़दूर को चुना, उसे काम का सही तरीक़ा सिखाया और तय समय पर आराम दिलाया। परिणाम चौंकाने वाला था — वही मज़दूर दिन में लगभग 47 टन लोहा लादने लगा, और उसकी दैनिक मज़दूरी भी लगभग 1.15 डॉलर से बढ़कर 1.85 डॉलर हो गई। इस प्रयोग ने दिखाया कि "सही तरीक़ा + सही व्यक्ति + सही प्रोत्साहन" से उत्पादकता कई गुना बढ़ सकती है — और यही वैज्ञानिक प्रबंधन का सार है। (टेलर ने यह विवरण अपनी 1911 की पुस्तक में दिया।)

2.2 कामचोरी (Soldiering) की समस्या और टेलर की मान्यताएँ

टेलर ने "सोल्जरिंग" (Soldiering) नामक समस्या पहचानी — मज़दूर जान-बूझकर धीमी गति से काम करते थे: प्राकृतिक सोल्जरिंग (आदतन धीमापन) और व्यवस्थित सोल्जरिंग (पर्यवेक्षकों की अपेक्षाएँ बढ़ने के डर से जान-बूझकर कम उत्पादन)। टेलर ने इसे समाप्त करने हेतु वैज्ञानिक तकनीकों का प्रस्ताव रखा — "हर कार्य को करने का एक सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा" (One Best Way) खोजना।

प्राकृतिक सोल्जरिंग व्यक्तिगत कारणों से होती है — आराम से काम करने की आदत, आलस या ज़्यादा मेहनत न करने की प्रवृत्ति। व्यवस्थित सोल्जरिंग संगठनात्मक और सामाजिक कारणों से होती है — मज़दूर सोचते थे कि अगर उन्होंने ज़्यादा काम करके दिखा दिया तो मालिक लक्ष्य बढ़ा देगा या मज़दूरी की दर घटा देगा, इसलिए वे मिलकर उत्पादन कम रखते थे। टेलर ने अपने सिद्धांत को तीन मान्यताओं पर आधारित किया:

2.3 उद्देश्य और विशेषताएँ

वैज्ञानिक प्रबंधन के उद्देश्य
  • भौतिक और मानवीय संसाधनों में समन्वय और सहयोग बनाकर उत्पादन बढ़ाना; श्रम और पूँजी के बीच विश्वास पैदा करना।
  • कर्मचारियों की कार्य-दशाएँ सुधारना, वैज्ञानिक भर्ती, चयन, शिक्षा और प्रशिक्षण से कार्यकुशलता बढ़ाना।
  • मज़दूर और मालिक में "मानसिक क्रांति" लाना, ताकि उनका ध्यान उत्पादन के बँटवारे से हटकर उसे बढ़ाने पर लगे।
  • अंगूठे के नियम की जगह वैज्ञानिक रीतियाँ — उत्पादन, वित्त, कार्मिक और बिक्री सब विभागों में।
  • समय, श्रम और साधनों का अपव्यय रोककर न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन।
  • मानक वस्तुओं का उत्पादन, प्रेरणात्मक मज़दूरी, और कार्य-गति, थकान तथा समय का नियमित अध्ययन।
वैज्ञानिक प्रबंधन की विशेषताएँ
  • नियोजित और निश्चित योजना, जिससे हर काम निश्चित तरीक़े से हो।
  • तथ्य एकत्र करना, उनका अवलोकन, विश्लेषण और प्रयोग करके सिद्धांत बनाना।
  • संसाधनों का अधिकतम उपयोग; पूर्व-निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति हेतु पूरी शक्ति लगाना।
  • योग्यता के अनुसार काम और कुशल श्रमिक को प्रेरणात्मक मज़दूरी।
  • श्रम-विभाजन और विशेषीकरण; हर काम का प्रमाप (Standard) तय करना।
  • पूँजी और श्रम में संघर्ष की जगह सहयोग; हर कर्मचारी के अधिकार और उत्तरदायित्व की सीमा तय।

2.4 वैज्ञानिक प्रबंधन के सिद्धांत

वैज्ञानिक प्रबंधन के 4 मूल सिद्धांतविवरण
1. कार्य का विज्ञान विकसित करनापुराने अंगूठे के नियम (Rule of Thumb) की जगह कार्य-निष्पादन की वैज्ञानिक विधि; समय और गति अध्ययन (Time & Motion Studies) की शुरुआत। इससे हर काम का "सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा" और मानक उत्पादन तय होता है।
2. वैज्ञानिक चयन एवं क्रमिक विकासश्रमिकों का वैज्ञानिक चयन और प्रशिक्षण ताकि अधिकतम दक्षता प्राप्त हो। पहले मज़दूर अपना काम स्वयं चुनता और जैसे-तैसे सीखता था।
3. विज्ञान और प्रशिक्षित श्रमिकों का सम्मिलनप्रशिक्षित श्रमिक + वैज्ञानिक तकनीक = उत्पादकता। प्रबंधन श्रमिकों से पूरा सहयोग करे ताकि काम वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुसार हो।
4. कार्य और उत्तरदायित्व का समान विभाजनयोजना (प्रबंधन) और क्रियान्वयन (श्रमिक) में स्पष्ट विभाजन — प्रबंधक योजना बनाएँ, श्रमिक क्रियान्वयन करें। पहले लगभग सारा काम और ज़िम्मेदारी मज़दूर पर डाल दी जाती थी।

टेलर के इन चार सिद्धांतों का सार पाँच वाक्यांशों में समाया है — "विज्ञान, अनुमान नहीं; सामंजस्य, कलह नहीं; सहयोग, व्यक्तिवाद नहीं; अधिकतम उत्पादन, सीमित उत्पादन नहीं; तथा श्रमिकों का पूर्ण विकास।" इसे टेलर ने "मानसिक क्रांति" (Mental Revolution) कहा — जिसमें श्रमिक और प्रबंधक दोनों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक है ताकि टकराव की जगह सहयोग हो।

📘 आसान परिभाषा — मानसिक क्रांति (Mental Revolution)

शास्त्रीय अर्थ: टेलर के अनुसार श्रमिकों और प्रबंधकों — दोनों के दृष्टिकोण में ऐसा आमूल परिवर्तन, जिसमें दोनों "अधिशेष (Surplus) के बँटवारे" पर लड़ने की बजाय मिलकर "अधिशेष को बढ़ाने" पर ध्यान दें, ताकि वह इतना बड़ा हो जाए कि बँटवारे पर झगड़ने की ज़रूरत ही न रहे।

सरल भाषा में: मालिक और मज़दूर एक-दूसरे को दुश्मन मानना छोड़ें और एक ही टीम की तरह सोचें — "रोटी छोटी है तो छीना-झपटी होगी, रोटी बड़ी कर दो तो सबका पेट भरेगा।" उदाहरण: एक कपड़ा मिल में मज़दूर संघ और प्रबंधन हर साल बोनस पर झगड़ते थे। दोनों ने मिलकर उत्पादन की बर्बादी घटाई और गुणवत्ता सुधारी; मिल का लाभ दोगुना हुआ और बोनस अपने-आप बढ़ गया — झगड़ा ख़त्म।

टेलर मानसिक क्रांति को वैज्ञानिक प्रबंधन का मूल दर्शन मानते थे। उनके शब्दों में, प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य मालिक की अधिकतम समृद्धि के साथ हर कर्मचारी की अधिकतम समृद्धि सुनिश्चित करना होना चाहिए। रेनहार्ड बेंडिक्स (Reinhard Bendix) के अनुसार, वैज्ञानिक प्रबंधन मानता था कि हर श्रमिक की उत्पादकता बढ़ाकर मज़दूर और मालिक दोनों की कमाई बढ़ेगी, और इस प्रकार श्रम और पूँजी का सारा संघर्ष विज्ञान से हल हो जाएगा।

2.5 वैज्ञानिक प्रबंधन की तकनीकें

वैज्ञानिक प्रबंधन की तकनीकेंविवरण
कार्यात्मक फोरमैनशिप (Functional Foremanship)एकल पर्यवेक्षण (Unity of Command) को अस्वीकार — एक श्रमिक की निगरानी 8 विशेषज्ञ फोरमैन करें (योजना-वर्ग में: कार्यक्रम-मार्ग लिपिक, निर्देश-कार्ड लिपिक, समय एवं लागत लिपिक, अनुशासक; क्रियान्वयन-वर्ग में: टोली नायक, गति नायक, निरीक्षक, मरम्मत नायक)।
गति अध्ययन (Motion Study)कार्य-विधियों का मानकीकरण — किसी कार्य की सभी गतियों का अवलोकन कर सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा (One Best Way) निर्धारित करना। अनावश्यक गतियाँ हटाकर समय और शक्ति की बचत।
समय अध्ययन (Time Study)स्टॉपवॉच से प्रत्येक गति का मानक समय निर्धारित करना, दैनिक कार्य-योजना हेतु। यह गति अध्ययन के बाद किया जाता है।
थकान अध्ययन (Fatigue Study)काम से मांसपेशियों पर पड़ने वाले ज़ोर और थकान का अध्ययन, ताकि उचित विश्राम-काल तय हो और श्रमिक कम थककर अधिक उत्पादन करे।
विभेदी दर मज़दूरी योजना (Differential Piece Rate)मानक से कम कार्य = कम मज़दूरी; मानक पूरा = बोनस; मानक से अधिक = उच्च दर — उत्पादकता हेतु प्रोत्साहन। टेलर इसे लाभ-भागिता योजना से अधिक प्रभावी मानते थे।
अपवाद सिद्धांत (Exception Principle)प्रबंधक केवल मानक से भिन्न (अपवादस्वरूप) मामलों पर ध्यान दे, सामान्य कार्य पर नहीं; सामान्य मामले अधीनस्थ ही निपटाएँ। इससे प्रबंधक का क़ीमती समय बचता है।
अन्य तकनीकेंऔज़ारों और गतियों का मानकीकरण, वस्तुओं के वर्गीकरण की स्मरण-प्रणाली, पृथक योजना विभाग, स्लाइड-रूल जैसे समय-बचाऊ उपकरण, निर्देश-पत्र, आधुनिक लागत-प्रणाली, मार्ग-निर्धारण (Routing) प्रणाली।
चित्र 2.2: टेलर की कार्यात्मक फोरमैनशिप — आठ विशेषज्ञ नायक
चित्र 2.2: टेलर की कार्यात्मक फोरमैनशिप — आठ विशेषज्ञ नायक

कार्यात्मक फोरमैनशिप में योजना वाले चार नायक दफ़्तर (नियोजन कक्ष) में बैठते हैं: कार्यक्रम-मार्ग लिपिक हर दिन के काम का क्रम और रास्ता तय करता है; निर्देश-कार्ड लिपिक हर काम के लिए लिखित निर्देश तैयार करता है; समय एवं लागत लिपिक काम में लगे समय और लागत का हिसाब रखकर मज़दूरी और बोनस तय करता है; अनुशासक अनुशासन, पुरस्कार, दंड और विवाद देखता है। क्रियान्वयन वाले चार नायक कारख़ाने में रहते हैं: टोली नायक मशीन और औज़ार तैयार रखता है; गति नायक काम की सही गति सुनिश्चित करता है; मरम्मत नायक मशीनों की सफ़ाई और मरम्मत देखता है; निरीक्षक उत्पाद की गुणवत्ता जाँचता है। इस प्रकार विशेषीकरण भी होता है और योजना तथा क्रियान्वयन अलग भी हो जाते हैं।

2.6 टेलर के अनुयायी

टेलर के प्रमुख सहयोगी थे — फ़्रैंक और लिलियन गिलब्रेथ (Gilbreths), जिन्होंने "थर्बलिग" (Therblig) नामक 17 मूल गतियों की पहचान कर गति-अध्ययन को और परिष्कृत किया; तथा हेनरी गैंट (Henry Gantt), जिन्होंने कार्य-प्रगति दर्शाने हेतु "गैंट चार्ट" (Gantt Chart) विकसित किया, जो आज भी परियोजना-प्रबंधन में उपयोग होता है। टेलर के विचार सोवियत संघ में "स्टाखानोवाइट आंदोलन" (1930 का दशक) के रूप में तथा विश्वभर में अपनाए गए।

अनुयायीयोगदान
हेनरी एल. गैंट (Henry L. Gantt)कार्य और बोनस प्रणाली में सुधार (मानक पूरा करने पर बोनस); "उद्योग की आदतें" — शुरुआत में ही अच्छी आदतें डालना; गैंट चार्ट — समय के साथ काम की प्रगति दिखाने वाला नियोजन और नियंत्रण का साधन।
फ़्रैंक और लिलियन गिलब्रेथ (Gilbreths)प्रवाह-प्रक्रिया चार्ट (Flow Process Chart) से अनावश्यक चरण हटाना; आधुनिक गति और समय अध्ययन की नींव; "थर्बलिग" (Gilbreth शब्द को उल्टा लिखकर) — काम की मूल इकाइयाँ।
हैरिंगटन एमर्सन (Harrington Emerson)दक्षता के 12 सिद्धांत — स्पष्ट उद्देश्य, सामान्य बुद्धि, सक्षम परामर्श, अनुशासन, उचित व्यवहार, विश्वसनीय अभिलेख, प्रेषण, मानक और समय-सारणी, मानक दशाएँ, मानक कार्य, लिखित मानक निर्देश और दक्षता-पुरस्कार। वे इसे "दक्षता प्रणाली" कहना पसंद करते थे।
मॉरिस एल. कुक (Morris L. Cooke)वैज्ञानिक प्रबंधन को सरकार और शिक्षा क्षेत्र में लागू किया और दिखाया कि यह सार्वभौमिक है; उन्होंने "सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा" खोजने में मज़दूरों की भागीदारी का सुझाव दिया, जबकि टेलर इसे केवल विशेषज्ञों का काम मानते थे।
अन्यकार्ल बार्थ, एच. के. हैथवे, मॉरिस कुक, एच. पी. केंडाल आदि।

2.7 टेलर बनाम फेयोल

आधार (Aspect)टेलर (वैज्ञानिक प्रबंधन)फेयोल (प्रशासनिक प्रबंधन)
फ़ोकसशॉप-फ़्लोर, श्रमिक-स्तरीय क्रियाएँशीर्ष-स्तरीय प्रबंधकीय गतिविधियाँ
दृष्टिकोणनीचे से ऊपर (परिचालन स्तर)ऊपर से नीचे (प्रबंधकीय स्तर)
उद्देश्यउत्पादकता सुधारना, अपव्यय समाप्त करनाप्रबंधन का सार्वभौमिक सिद्धांत विकसित करना
पद्धतिवैज्ञानिक प्रयोग, अवलोकन, मापनव्यक्तिगत अनुभव
क्षेत्रसूक्ष्म (कार्य-प्रबंधन)वृहद् (संपूर्ण संगठन-प्रबंधन)
प्रमुख सिद्धांतकार्यात्मक फोरमैनशिपआदेश की एकता (Unity of Command)
प्रयोज्यताकेवल उत्पादन-गतिविधियाँसंगठन के सभी कार्यात्मक क्षेत्र

2.8 लाभ, विरासत और आलोचना

टेलर का दावा था कि वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने से उद्योग में हर औसत व्यक्ति की उत्पादकता दोगुनी हो जाएगी, काम के घंटे घटेंगे और शिक्षा, संस्कृति तथा मनोरंजन के अवसर बढ़ेंगे। इसके लाभ तीन वर्गों को मिलते हैं:

श्रमिकों कोप्रबंधन कोउपभोक्ता, समाज और राष्ट्र को
मज़दूरी में वृद्धि; काम का समय कम; जीवन-स्तर में उन्नति; काम में रुचि; निःशुल्क प्रशिक्षण; उपयुक्त वातावरण; स्थायी रोज़गारवस्तु की गुणवत्ता में सुधार; प्रति इकाई कम लागत; श्रम-पूँजी झगड़ों का अंत; श्रम-विभाजन के लाभ; अधिकतम कार्य और उत्पादनक्रय-शक्ति में वृद्धि; अच्छी और सस्ती वस्तुएँ; रहन-सहन में सुधार; तीव्र आर्थिक विकास; औद्योगिक शांति; रोज़गार और राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि
टेलर की विरासत (Legacy)
  • औद्योगिक इंजीनियरिंग और आधुनिक प्रबंधन की नींव रखी; इसे "द्वितीय औद्योगिक क्रांति" भी कहा गया।
  • विश्वभर (अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ़्रांस, जर्मनी, जापान) में प्रभाव — 1918 में लेनिन ने रूस में टेलर-पद्धति का अध्ययन और प्रयोग करने का आदेश दिया; जापानी उद्योग ने इकाई-लागत घटाने में इसका व्यापक प्रयोग किया।
  • सरकार में दक्षता, कार्य-वर्गीकरण और कार्य-डिज़ाइन को प्रभावित किया; बर्ट्रम ग्रॉस के अनुसार लोक प्रशासन के दक्षता और मितव्ययता आंदोलन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा।
  • दक्षता और उत्पादकता पर बल आज भी प्रासंगिक; पद्धति-अध्ययन, समय-अध्ययन, अपवाद का सिद्धांत — सब टेलर की देन।
आलोचनाएँ (Criticism)
  • यांत्रिक दृष्टिकोण — मनुष्यों को मशीन जैसा माना; मानवीय पक्ष की उपेक्षा।
  • मनोवैज्ञानिक-सामाजिक पहलुओं की उपेक्षा (मेयो के प्रयोगों से खंडित); प्रेरणा को केवल पैसे से जोड़ा — "एकल-कारक (Monistic)" सिद्धांत।
  • श्रमिक अलगाव (Worker Alienation), बोरियत और मानवीयता का ह्रास।
  • केवल शॉप-फ़्लोर तक सीमित सूक्ष्म-दृष्टि — ऊपरी स्तरों के समन्वय पर ध्यान नहीं; मार्च और साइमन ने इसे "शारीरिक संगठन सिद्धांत" कहा।
  • मज़दूर संघों के लिए ख़तरा — मानसिक क्रांति से संघ अनावश्यक हो जाते; प्रो. रॉबर्ट हॉक्सी की जाँच-रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिक प्रबंधन और श्रमिक-संघवाद के मूल आदर्श मेल नहीं खाते।
  • प्रबंधकों का भी विरोध — उनका विवेक घटता और काम तथा ज़िम्मेदारी बढ़ती।

टेलर के प्रमुख आलोचकों में मेरी पार्कर फॉलेट, पीटर ड्रकर, ओलिवर शेल्डन, चेस्टर बर्नार्ड, क्रिस आर्गिरिस और एल्टन मेयो हैं। फिर भी, टेलर का योगदान अद्वितीय रहा — वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अच्छे कार्य-निष्पादन की वैज्ञानिक खोज शुरू की और औद्योगिक प्रबंधन के अध्ययन में मापन की तकनीकों का प्रयोग किया।

❝ टेलर इतिहास के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने काम को केवल "किया" नहीं, बल्कि उसका वैज्ञानिक अध्ययन किया। ❞ (Taylor was the first man in history who didn't just work — he studied work scientifically) — (पीटर ड्रकर (Peter Drucker))
💡 सरल भाषा में समझें — टेलर का सिद्धांत

सोचिए एक क्रिकेट कोच किसी बल्लेबाज़ की हर गेंद खेलने की तकनीक को स्टॉपवॉच और वीडियो-कैमरे से बारीकी से मापता है ताकि "सबसे बेहतर तरीक़ा" (One Best Way) खोजा जा सके — टेलर ने ठीक यही फ़ैक्ट्री के मज़दूरों के लिए किया। जैसे एक ईंट उठाने के 10 अलग-अलग तरीक़े हो सकते हैं, टेलर ने विज्ञान से वह एक तरीक़ा खोजा जो सबसे कम थकाए और सबसे तेज़ काम करे। मतलब टेलर यह कहना चाहते थे — "अंदाज़े से काम मत करो, मापो और सबसे अच्छा तरीक़ा ढूँढो, फिर सबको वही सिखाओ।"

🇮🇳 भारतीय उदाहरण — सरकार में वैज्ञानिक प्रबंधन

भारत सरकार में कर्मचारियों की वास्तविक आवश्यकता "कार्य-अध्ययन (Work Study)" से तय की जाती है — हर पद पर कितना काम है और उसके लिए कितने कर्मचारी चाहिए। वित्त मंत्रालय के अधीन कर्मचारी निरीक्षण इकाई (Staff Inspection Unit) इसी तरह के अध्ययन करती रही है। यह टेलर के समय और गति अध्ययन का सरकारी रूप है।

आज बड़ी सरकारी परियोजनाओं की निगरानी में गैंट चार्ट और समय-सीमा आधारित डैशबोर्ड का प्रयोग होता है; डाकघरों और बैंकों में "मानक सेवा-समय" तय करना भी वैज्ञानिक प्रबंधन की ही सोच है।

🔑 इस खंड का कीवर्ड सारांश
टेलर
वैज्ञानिक प्रबंधन का जनक
ब्रैंडाइस
1910 — "वैज्ञानिक प्रबंधन" शब्द
सोल्जरिंग
जान-बूझकर कम उत्पादन; प्राकृतिक और व्यवस्थित
सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा
One Best Way
मानसिक क्रांति
अधिशेष बाँटने की जगह बढ़ाना
कार्यात्मक फोरमैनशिप
8 विशेषज्ञ नायक; आदेश की एकता का त्याग
विभेदी दर
मानक से अधिक काम = ऊँची दर
अपवाद सिद्धांत
केवल असामान्य मामले ऊपर
गैंट चार्ट
हेनरी गैंट; प्रगति का चार्ट
थर्बलिग
गिलब्रेथ; 17 मूल गतियाँ
एमर्सन
दक्षता के 12 सिद्धांत
आर्थिक मनुष्य
पैसे से प्रेरित — टेलर की मान्यता

3पूरक — प्रशासनिक प्रबंधन / शास्त्रीय सिद्धांत (Administrative / Classical Theory)

📎 पूरक जानकारी — यह खंड क्यों

यह विषय पाठ्यक्रम में अलग से नहीं है, पर वैज्ञानिक प्रबंधन, मानव संबंध और व्यवहारवादी उपागम — तीनों इसी की प्रतिक्रिया या विस्तार हैं। इसलिए इसे पृष्ठभूमि के रूप में पढ़ें। संगठन के सिद्धांतों (पदानुक्रम, आदेश की एकता, नियंत्रण का क्षेत्र आदि) का विस्तार अध्याय 03 में है।

शास्त्रीय सिद्धांत (Classical Theory) का नामकरण स्वयं हर्बर्ट साइमन ने किया — यह मैक्स वेबर के नौकरशाही सिद्धांत और टेलर के वैज्ञानिक प्रबंधन का विस्तार और संश्लेषण है, जो संपूर्ण संगठनात्मक ढाँचे और प्रशासन पर केंद्रित है (न कि केवल शॉप-फ़्लोर पर)। इसके प्रमुख प्रतिपादक हैं — हेनरी फेयोल, लूथर गुलिक, लिंडल उर्विक, जे. डी. मूने और ए. सी. रैली। इसे परंपरागत सिद्धांत, औपचारिक संगठन सिद्धांत, यांत्रिक सिद्धांत, संरचनात्मक सिद्धांत और "प्रबंधन प्रक्रिया विचारधारा" भी कहा जाता है; मार्च और साइमन ने इसे "प्रशासनिक प्रबंधन सिद्धांत" कहा।

🎓 चिंतक-परिचय — प्रशासनिक प्रबंधन सिद्धांत (फेयोल)

विचारक/प्रवर्तक: हेनरी फेयोल (Henri Fayol, 1841-1925) | वर्ष: 1916 — "General and Industrial Management"

फेयोल के 6 प्रकार की गतिविधियाँविवरण
तकनीकी (Technical)उत्पादन एवं निर्माण
वाणिज्यिक (Commercial)क्रय-विक्रय एवं वस्तुओं का आदान-प्रदान
वित्तीय (Financial)पूँजी जुटाना एवं कुशल उपयोग
सुरक्षा (Security)व्यक्ति एवं संपत्ति की सुरक्षा
लेखांकन (Accounting)स्टॉक-लेखा, लागत-नियंत्रण, सांख्यिकी, तुलन-पत्र
प्रबंधकीय (Managerial)योजना, संगठन, आदेश, समन्वय, नियंत्रण (POCCC)

इनमें से प्रबंधकीय तत्व (POCCC) — योजना (Planning), संगठन (Organizing), आदेश (Commanding), समन्वय (Coordinating) एवं नियंत्रण (Controlling) — ही एक प्रबंधक के मूल दायित्व हैं और आधुनिक प्रबंधकीय भूमिकाओं की नींव हैं। फेयोल ने देखा कि प्रबंधक पहली पाँच गतिविधियों पर तो ध्यान देते हैं, पर प्रबंधकीय गतिविधि उपेक्षित रह जाती है। इसके बाद फेयोल ने प्रशासन के 14 सिद्धांत प्रतिपादित किए, जिन्हें उन्होंने स्वयं "लचीले और असंपूर्ण" (Flexible, not exhaustive) बताया:

क्र.सिद्धांतसंक्षिप्त विवरण
1कार्य-विभाजन (Division of Work)विशेषीकरण से कौशल-विकास, उत्पादकता और दक्षता में वृद्धि
2सत्ता एवं उत्तरदायित्व (Authority & Responsibility)आदेश देने का अधिकार तथा कार्य-निष्पादन का दायित्व — दोनों में संतुलन आवश्यक
3अनुशासन (Discipline)आज्ञापालन, समझौतों का सम्मान — अच्छे नेतृत्व और स्पष्ट नियमों पर निर्भर
4आदेश की एकता (Unity of Command)एक अधीनस्थ को आदेश केवल एक ही वरिष्ठ से मिले — भ्रम और टकराव से बचाव
5निर्देशन की एकता (Unity of Direction)एक लक्ष्य वाली गतिविधियों का एक ही योजना और एक ही नेता द्वारा समन्वय
6सामान्य हित को व्यक्तिगत हित पर प्राथमिकतासंगठनात्मक लक्ष्य व्यक्तिगत हित से ऊपर — दृढ़ नेतृत्व और निरंतर पर्यवेक्षण से सुनिश्चित
7उचित पारिश्रमिक (Fair Remuneration)न्यायसंगत, प्रेरक और नियमित रूप से समीक्षित वेतन — समय-दर, टुकड़ा-दर, बोनस, लाभ-भागिता
8केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरणअनुपात का प्रश्न — अधीनस्थों की भूमिका जितनी अधिक, विकेंद्रीकरण उतना अधिक
9पदसोपान शृंखला (Scalar Chain)शीर्ष से तल तक सत्ता की पदानुक्रमिक रेखा; "गैंग प्लैंक" संचार में तेज़ी हेतु छोटा रास्ता
10व्यवस्था (Order)भौतिक व्यवस्था ("हर वस्तु का एक स्थान") और सामाजिक व्यवस्था ("सही व्यक्ति सही स्थान पर")
11समता (Equity)कर्मचारियों के साथ निष्पक्षता, दयालुता और न्याय से व्यवहार
12कार्यकाल की स्थिरता (Stability of Tenure)स्थिरता से दक्षता और निष्ठा; बार-बार कर्मचारी बदलने से प्रशिक्षण-लागत और उत्पादकता-हानि
13पहल (Initiative)कर्मचारियों को पहल हेतु प्रोत्साहित करना — मनोबल और नवाचार बढ़ाता है
14सामूहिक भावना (Esprit de Corps)टीम-भावना ही शक्ति है — सहयोग की संस्कृति, प्रतिस्पर्धा की नहीं
💡 सरल भाषा में समझें — फेयोल के सिद्धांत

फेयोल के सिद्धांत ऐसे हैं जैसे एक स्कूल चलाने के व्यावहारिक नियम। "आदेश की एकता" का मतलब है कि किसी कक्षा के बच्चे को अगर कक्षा-अध्यापिका कुछ कहती है तो प्रधानाचार्य उसी वक़्त कोई उल्टा आदेश न दें, वरना बच्चा उलझ जाएगा — यानी एक व्यक्ति को आदेश एक ही बॉस से मिलना चाहिए। "सामूहिक भावना" (Esprit de Corps) का मतलब है टीम-भावना — जैसे किसी स्कूल की क्रिकेट टीम आपस में लड़ती रहे तो मैच कभी नहीं जीत पाएगी, भले हर खिलाड़ी अकेले में कितना भी अच्छा हो।

गुलिक और उर्विक ने 1937 में अपने ऐतिहासिक ग्रंथ "Papers on the Science of Administration" के माध्यम से शास्त्रीय सिद्धांत को चरम पर पहुँचाया। POSDCoRB के सात तत्व अध्याय 01 में विस्तार से पढ़े जा चुके हैं — यहाँ हम गुलिक के संगठन के 10 सिद्धांत तथा उर्विक के योगदान को समझेंगे।

गुलिक के संगठन-सिद्धांत (10 सिद्धांत)विवरण
1. कार्य-विभाजन (Division of Work)कार्यों को विशिष्ट इकाइयों में बाँटना, कौशल के अनुरूप कार्य सौंपना
2. विभागीकरण का 4P सूत्रउद्देश्य (Purpose — स्वास्थ्य, शिक्षा), प्रक्रिया (Process — विधि, अभियांत्रिकी), व्यक्ति (Person — बाल-कल्याण), स्थान (Place — रेलवे क्षेत्र)
3. पदानुक्रम से समन्वयआदेश-शृंखला से स्पष्टता और व्यवस्था
4. जान-बूझकर समन्वय (विचारों से)विविध कार्यों को समान लक्ष्यों के अनुरूप जोड़ना
5. समितियों से समन्वयसामूहिक विचार-विमर्श और संतुलित दृष्टिकोण
6. विकेंद्रीकरण (Holding Company Concept)शक्ति का बँटवारा — तीव्र निर्णय, अधिक जवाबदेही और विशेषज्ञता
7. आदेश की एकता"एक स्वामी, एक आदेश" — भ्रम और दोहरी जवाबदेही से बचाव
8. स्टाफ़ एवं लाइनलाइन अधिकारी = आदेश और निर्णय; स्टाफ़ अधिकारी = विशेषज्ञता और सलाह
9. प्रत्यायोजन (Delegation)जवाबदेही बरक़रार रखते हुए सत्ता का हस्तांतरण
10. नियंत्रण का क्षेत्र (Span of Control)एक पर्यवेक्षक कितने अधीनस्थों को प्रभावी ढंग से संभाल सकता है — कार्य-प्रकृति, संचार-साधन और भौगोलिक फैलाव पर निर्भर
उर्विक के 8 संगठन-सिद्धांत (Urwick)विवरण
उद्देश्य का सिद्धांतहर संगठन का स्पष्ट और अभिव्यक्त उद्देश्य होना चाहिए
संगति का सिद्धांतसत्ता और उत्तरदायित्व सभी स्तरों पर समान और संगत हों
उत्तरदायित्व का सिद्धांतवरिष्ठ अपने अधीनस्थों के कार्य की पूर्ण ज़िम्मेदारी लें
पदसोपान सिद्धांत (Scalar)संगठन में पिरामिड जैसा पदानुक्रमिक ढाँचा हो
नियंत्रण-क्षेत्र सिद्धांतएक पर्यवेक्षक प्रभावी ढंग से केवल 5-6 अधीनस्थों को संभाल सकता है
विशेषीकरण सिद्धांतकर्मचारी एक ही कार्य पर केंद्रित रहें ताकि दक्षता बढ़े
समन्वय सिद्धांतसंगठन के विभिन्न भागों में सामंजस्यपूर्ण कार्य सुनिश्चित करना
परिभाषा सिद्धांतहर पद के कर्तव्य, सत्ता और उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से परिभाषित हों

उर्विक ने अपनी पुस्तक "The Elements of Administration" (1943) में 29 सिद्धांतों का विस्तृत समूह भी प्रस्तुत किया तथा "थ्योरी Z" के माध्यम से बताया कि प्रबंधन का आर्थिक उद्देश्य उपभोक्ताओं को किफ़ायती दरों पर वस्तुएँ और सेवाएँ उपलब्ध कराना है, जिसके लिए उपभोक्ता-उत्पादक-वितरक के बीच संचार-अंतराल पाटना आवश्यक है। लूथर गुलिक ने मुख्यालय और क्षेत्रीय इकाइयों के संबंध को भी तीन रूपों में समझाया — "सब उँगलियाँ (All Fingers)" (सीधा नियंत्रण, कोई क्षेत्रीय उप-विभाजन नहीं), "छोटी भुजाएँ, लंबी उँगलियाँ (Short Arms and Long Fingers)" (क्षेत्रीय विभाजन परंतु मुख्यालय के भीतर ही, जैसे विदेश मंत्रालय के प्रभाग), तथा "लंबी भुजाएँ, छोटी उँगलियाँ (Long Arms and Short Fingers)" (मुख्यालय से दूर विकेंद्रीकृत इकाइयाँ, जैसे भारत में ज़िला कलेक्टर का कार्यालय)।

💡 सरल भाषा में समझें — नियंत्रण का क्षेत्र (Span of Control)

एक अध्यापिका कक्षा के 30 बच्चों को अच्छे से पढ़ा और संभाल सकती है, लेकिन अगर उसी अध्यापिका को 300 बच्चों की एक साथ ज़िम्मेदारी दे दी जाए तो न पढ़ाई ठीक होगी न अनुशासन — यही है "नियंत्रण का क्षेत्र" (Span of Control)। इसी तरह गुलिक और उर्विक कहते हैं कि एक अफ़सर सीमित संख्या में ही अधीनस्थों को प्रभावी ढंग से संभाल सकता है — इसीलिए बड़े दफ़्तरों में एक के ऊपर एक अफ़सरों की पूरी सीढ़ी (Hierarchy) बनानी पड़ती है।

शास्त्रीय सिद्धांत का महत्व
  • प्रशासन-विज्ञान की नींव — विल्सन की "प्रशासन-विज्ञान" की माँग का उत्तर।
  • रिपोर्टिंग, बजटिंग, प्रत्यायोजन जैसी प्रबंधकीय तकनीकों का प्रवर्तन।
  • सत्ता, उत्तरदायित्व, आदेश-एकता जैसी अवधारणाओं का ढाँचा दिया।
  • मानव-संबंध और व्यवहारवादी सिद्धांतों की नींव बना।
शास्त्रीय सिद्धांत की आलोचना
  • अवैज्ञानिक — अनुभवजन्य परीक्षण का अभाव; हर्बर्ट साइमन ने इसे "कहावतें" (Proverbs) कहा।
  • मानवीय पक्ष की उपेक्षा — श्रमिकों को मशीन का पुर्ज़ा माना (वॉरेन बेनिस: "बिना लोगों के संगठन")।
  • अंतर्विरोधी सिद्धांत — केंद्रीकरण बनाम विकेंद्रीकरण जैसे टकराव।
  • अनौपचारिक संगठन की उपेक्षा — बर्नार्ड और साइमन ने इसे उजागर किया।
🔑 इस खंड का कीवर्ड सारांश
फेयोल
शास्त्रीय सिद्धांत का जनक; 1916
POCCC
योजना, संगठन, आदेश, समन्वय, नियंत्रण
14 सिद्धांत
लचीले और असंपूर्ण
गैंग प्लैंक
समान स्तर पर सीधा संचार
गुलिक-उर्विक
1937; POSDCoRB
4P
उद्देश्य, प्रक्रिया, व्यक्ति, स्थान

4पूरक — नौकरशाही सिद्धांत (Bureaucratic Theory)

📎 पूरक जानकारी — यह खंड क्यों

नौकरशाही पाठ्यक्रम का अलग विषय नहीं है, पर मानव संबंध सिद्धांत, मर्टन का संरचना-प्रकार्यवाद और रिग्स का "साला" मॉडल — सब वेबर की नौकरशाही से तुलना करके ही समझ आते हैं। इसलिए यह पृष्ठभूमि के रूप में दिया गया है।

"Bureaucracy" शब्द सर्वप्रथम फ़्रांसीसी अर्थशास्त्री विंसेंट डी गॉर्ने (Vincent de Gournay) ने 1745 में गढ़ा था, जब उन्होंने फ़्रांस में उभरते "ब्यूरोमेनिया" के रुझान को देखा। 18वीं सदी के अंत में फ़्रेंच अकादमी के शब्दकोश ने इसे "सरकारी कार्यालयों के प्रमुखों और कर्मचारियों की शक्ति और प्रभाव" के रूप में परिभाषित किया। परंतु इसे एक तटस्थ, व्यवस्थित सामाजिक-वैज्ञानिक अवधारणा के रूप में सर्वप्रथम जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर (1864-1920) ने प्रस्तुत किया।

🎓 चिंतक-परिचय — आदर्श प्रारूप नौकरशाही (Ideal-Type Bureaucracy)

विचारक/प्रवर्तक: मैक्स वेबर (Max Weber) | वर्ष: प्रारंभिक 20वीं सदी — "अर्थव्यवस्था और समाज" (1922, मृत्यु के बाद); अंग्रेज़ी अनुवाद "The Theory of Social and Economic Organization" (1947)

💡 सरल भाषा में समझें — सत्ता के 3 प्रकार

महात्मा गांधी के पास कोई सरकारी पद नहीं था, फिर भी लाखों लोग उनका अनुसरण करते थे — यह करिश्माई सत्ता है, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व से आती है। किसी गाँव में पुराने ज़माने के राजा-महाराजा की आज्ञा इसलिए मानी जाती थी क्योंकि "हमेशा से ऐसा ही होता आया है" — यह परंपरागत सत्ता है। परंतु आज अगर ज़िला कलेक्टर कोई आदेश दे तो हम उसे इसलिए मानते हैं क्योंकि वह "कलेक्टर की कुर्सी" पर बैठा है, भले वह व्यक्ति कोई भी हो — कलेक्टर बदल जाए तब भी वही आदेश-पालन होगा। यही वैध-तर्कसंगत सत्ता है, जिस पर पूरी आधुनिक नौकरशाही टिकी है।

वेबर के अनुसार नौकरशाही आधुनिक प्रशासन का सर्वाधिक तर्कसंगत रूप है, जो निम्न विशेषताओं पर आधारित है:

क्र.विशेषता (Characteristic)विवरण
1श्रम-विभाजन एवं विशेषीकरणकार्य को इकाइयों में बाँटना; बार-बार वही कार्य करने से दक्षता
2पदानुक्रम (Hierarchy)आदेश की शृंखला — प्रत्येक कर्मचारी उच्च प्राधिकारी की निगरानी में
3नियम (Rules)सभी कार्य स्थापित नियमों के अनुसार — एकरूपता और निरंतरता सुनिश्चित
4योग्यता-आधारित भर्तीतकनीकी योग्यता और खुली प्रतियोगी परीक्षा से नियुक्ति, व्यक्तिगत पसंद नहीं
5पूर्णकालिक अधिकारीकर्मचारी अपना पूरा समय संगठन को समर्पित करें
6कैरियर विकासपदानुक्रम में पदोन्नति का अवसर
7नियमित वेतन एवं पेंशनपद के अनुसार निश्चित वेतन तथा सेवानिवृत्ति-लाभ
8निजी-लोक हितों का पृथक्करणसंगठनात्मक संसाधनों का निजी लाभ हेतु उपयोग वर्जित
9अवैयक्तिकता (Impersonality)बिना पूर्वाग्रह या भावनात्मक प्रभाव के, नियमानुसार निष्पक्ष कार्य
10व्यवस्थित अनुशासनआचार-संहिता और अनुशासनात्मक नियंत्रण
11लिखित दस्तावेज़ीकरणसभी निर्णय और गतिविधियाँ औपचारिक रूप से अभिलिखित
12दक्षताश्रम-विभाजन, योग्यता-चयन, नियत वेतन और निष्पक्ष कार्य-प्रणाली से दक्षता
मॉर्स्टीन मार्क्स के अनुसार नौकरशाही के प्रकारविवरण
संरक्षक नौकरशाही (Guardian)अधिकारी नैतिक आचरण में प्रशिक्षित, जन-कल्याण के संरक्षक — उदा. प्लेटो का दार्शनिक-राजा, प्रशा (1640-1740)
जाति नौकरशाही (Caste)उच्च जाति या वर्ग से अधिकारी — उदा. प्राचीन भारत, कुलीन इंग्लैंड, मेइजी-जापान
संरक्षण / लूट-तंत्र (Patronage / Spoils System)सत्तारूढ़ दल के वफ़ादारों को पद — उदा. परंपरागत रूप से अमेरिका, 19वीं सदी तक ब्रिटेन
योग्यता नौकरशाही (Merit)योग्यता और खुली प्रतियोगी परीक्षा पर आधारित नियुक्ति — उदा. भारत जैसी आधुनिक लोकतांत्रिक सिविल सेवाएँ
नौकरशाही की सीमाएँ (Negative Aspects)विवरण
कठोर पदानुक्रमसामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों के प्रति अनुत्तरदायी हो सकती है
अत्यधिक नियंत्रणतकनीकी विशेषज्ञता के दम पर अधिनायकवादी प्रवृत्तियाँ
अवैयक्तिक व्यवहारव्यक्तिगत मामलों में असंवेदनशीलता और अन्याय
खंडित भूमिकाएँसंकीर्ण, पूर्व-निर्धारित कार्य — व्यक्तिगत निर्णय की गुंजाइश कम
अनुकूलन में असमर्थतासंगति पर बल के कारण बदलती परिस्थितियों में लचीलेपन की कमी
पर्यावरण की उपेक्षासामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक परिवेश से अंतःक्रिया को नज़रअंदाज़ करना
स्व-हित प्रधानतासंगठन और समाज के लक्ष्यों से ऊपर अपने हितों को प्राथमिकता
भ्रष्टाचार की संभावनानियमों को व्यक्तिगत लाभ हेतु मोड़ना
विकासशील देशों से असंगतिकठोर वेबरीय ढाँचा उन देशों की ज़रूरतों से मेल नहीं खाता जहाँ लचीलापन और नवाचार आवश्यक है

वेबर के आदर्श मॉडल की कई विद्वानों ने आलोचना की है, जो परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है:

आलोचक (Critic)मुख्य आलोचना
रॉबर्ट के. मर्टन (Robert K. Merton)"लक्ष्य-विस्थापन" (Goal Displacement) — नियमों का पालन साधन से साध्य (अंत) बन जाता है; अत्यधिक अनुरूपता और सुरक्षित निर्णय लेने की प्रवृत्ति ("प्रशिक्षित अक्षमता — Trained Incapacity"; यह मूल अवधारणा थॉर्स्टीन वेब्लेन की है, जिसे मर्टन ने नौकरशाही पर लागू किया); "लाल फ़ीताशाही" (Red Tape) से नागरिक-सेवा प्रभावित; अत्यधिक केंद्रीकरण से विलंबित निर्णय।
एल्विन गोल्डनर (Alvin Gouldner)नौकरशाही के तीन प्रतिरूप बताए — दंड-केंद्रित (Punishment-Centred), प्रतिनिधिक (Representative — पारस्परिक सहमति से नियम) एवं नक़ली (Mock — नियम केवल काग़ज़ों पर, व्यवहार में उपेक्षित)।
मिशेल क्रोज़िए (Michel Crozier)"नौकरशाही का दुष्चक्र" (Bureaucratic Vicious Circle) — नियमों की कठोरता से अनिश्चितता के क्षेत्रों में ही वास्तविक शक्ति केंद्रित हो जाती है; परिवर्तन का प्रतिरोध।
हैरी एम. जॉनसन (Harry M. Johnson)नियमों पर अत्यधिक बल से नौकरशाह व्यावहारिक उद्देश्य भूल जाते हैं — नागरिक के लिए अनोखी समस्या को नौकरशाह "नियमित मामला" मानकर निपटाता है।
वॉरेन बेनिस (Warren Bennis)भविष्यवाणी की कि परंपरागत वेबरीय नौकरशाही तेज़ी से बदलते परिवेश के अनुकूल न होने के कारण पतन की ओर जाएगी।
चार्ल्स पेरो (Charles Perrow)इसके विपरीत तर्क — नियमित प्रशासनिक कार्यों के प्रबंधन में नौकरशाही आज भी प्रभावी है।
💡 सरल भाषा में समझें — लक्ष्य-विस्थापन (मर्टन) और लाल फ़ीताशाही

सोचिए राशन कार्ड बनवाने आप ब्लॉक ऑफ़िस जाते हैं और वहाँ बाबू कहता है "फ़ॉर्म में एक कॉलम ख़ाली है, कल फिर आना" — जबकि आपकी असली ज़रूरत (राशन कार्ड बनवाना) सामने खड़ी है। यहाँ "नियम भरना" ख़ुद एक लक्ष्य बन गया, जबकि नियम तो सिर्फ़ साधन थे असली काम पूरा करने का — मर्टन इसी को "लक्ष्य-विस्थापन" (Goal Displacement) कहते हैं। इसी अत्यधिक नियम-प्रेम को हम रोज़मर्रा की भाषा में "लाल फ़ीताशाही" (Red Tape) कहते हैं।

📌 क्या नौकरशाही अपरिहार्य है?: एफ़. ए. नाइग्रो और एल. जी. नाइग्रो के शब्दों में — "निकट भविष्य में नौकरशाही के लुप्त होने या समाज में इसके प्रभाव में कमी की कोई संभावना नहीं है।" जब तक हम परमाणु शक्ति, वाहन, दूरसंचार और रोज़गार-सुरक्षा रहित सरल युग में वापस नहीं जाना चाहते, तब तक नौकरशाही से बचा नहीं जा सकता।

🔑 इस खंड का कीवर्ड सारांश
डी गॉर्ने
1745 — "ब्यूरोक्रेसी" शब्द
वेबर
आदर्श प्रारूप नौकरशाही
सत्ता के 3 प्रकार
करिश्माई, परंपरागत, वैध-तर्कसंगत
मर्टन
लक्ष्य-विस्थापन; प्रशिक्षित अक्षमता
गोल्डनर
दंड-केंद्रित, प्रतिनिधिक, नक़ली
क्रोज़िए
नौकरशाही का दुष्चक्र

5मानव संबंध सिद्धांत (Human Relations Theory)

5.1 उदय और पृष्ठभूमि

1930 की आर्थिक मंदी, पूँजी-प्रधान उद्योगों में हड़तालों, तकनीकी प्रगति से श्रमिकों की बढ़ती शिक्षा-अपेक्षाओं, तथा टेलरवाद की प्रतिक्रिया में मानव संबंध विचारधारा (लगभग 1940 से) का उदय हुआ। कीथ डेविस के अनुसार, "मानव संबंध का अर्थ है लोगों को इस प्रकार कार्य में एकीकृत करना कि वे आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संतुष्टि पाते हुए सहयोगपूर्ण ढंग से उत्पादक कार्य हेतु प्रेरित हों।"

मानव संबंध से पहले की विचारधाराएँ — वैज्ञानिक प्रबंधन, शास्त्रीय सिद्धांत और नौकरशाही — मनुष्य के साथ एक वस्तु की तरह व्यवहार करती थीं। उनका ध्यान संरचना, औपचारिक नियमों और अधिकतम उत्पादन पर था, और श्रमिकों की भावनाओं और आकांक्षाओं का उनमें कोई स्थान नहीं था। इसलिए इन्हें "उत्पादकता-प्रधान विचारधाराएँ" भी कहा जाता है। इन्हीं की प्रतिक्रिया में मानव संबंध विचारधारा आई, जो मशीनों और नियमों की जगह मनुष्य को अध्ययन का केंद्र बनाती है और मनोविज्ञान, मानवशास्त्र और समाजशास्त्र के ज्ञान का उपयोग करती है। इसे मानवतावादी सिद्धांत, सामाजिक-आर्थिक सिद्धांत और नव-शास्त्रीय सिद्धांत (Neo-classical Theory) भी कहा जाता है।

उदय का कारणविवरण
1930 की आर्थिक मंदीमशीनीकरण ने शारीरिक श्रम घटाया पर मानसिक तनाव बढ़ाया; नियोक्ताओं को उद्योग के मनोवैज्ञानिक और मानवीय तत्वों पर ध्यान देना पड़ा।
पूँजी-आधारित उद्योगमशीनें ख़राब होने, हड़तालों और श्रमिकों के बार-बार नौकरी छोड़ने से बड़ा नुक़सान; इसलिए श्रमिकों में निष्ठा जगाने के उपाय खोजे गए।
तकनीकी प्रगतिश्रमिकों की शिक्षा और कौशल बढ़ा; वे सम्मानजनक व्यवहार की माँग करने लगे।
टेलरवाद की प्रतिक्रियाटेलर ने श्रमिक को केवल पैसे से चलने वाला निष्क्रिय प्राणी माना था; इसकी प्रतिक्रिया में मानवीय पक्ष पर बल।
वर्ग-संघर्ष और श्रमिक संगठनसंगठित श्रमिकों ने सामूहिक सौदेबाज़ी से नियोक्ताओं और सरकार को अपने हितों पर ध्यान देने को बाध्य किया; सरकार ने श्रम-क़ानून बनाए।
मेयो के प्रयोगहॉथोर्न प्रयोगों ने वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया कि सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कारक उत्पादकता तय करते हैं।
विद्वानमानव संबंध की परिभाषा
कीथ डेविस (Keith Davis)कार्य पर व्यक्तियों का ऐसा एकीकरण, जिससे वे आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संतुष्टि पाते हुए सहयोगपूर्वक उत्पादन के लिए प्रेरित हों।
मैक्फ़रलैंड (McFarland)कार्यरत व्यक्तियों की क्रियाओं, अभिवृत्तियों, भावनाओं और आपसी संबंधों की समझ द्वारा मानवीय साधनों के सदुपयोग की पद्धति और अध्ययन।
फ़्रेड लुथांस (Fred Luthans)कर्मचारी-सहयोग और मनोबल पर बल देने वाला प्रबंधकीय व्यवहार ही मानव संबंध है।

5.2 मानव संबंध विचारधारा की विशेषताएँ

मानव संबंधों का अर्थ नियोक्ता और कर्मचारियों के उन संबंधों से है जो क़ानूनी नियमों से नियंत्रित नहीं होते, बल्कि नैतिक और मनोवैज्ञानिक होते हैं और साथ काम करते-करते अपने-आप बन जाते हैं। इनमें आदेश का पालन बाध्यता से नहीं, बल्कि सहयोग और प्रेरणा से होता है।

5.3 एल्टन मेयो और हॉथोर्न प्रयोग

🎓 चिंतक-परिचय — हॉथोर्न प्रयोग (Hawthorne Experiments)

विचारक/प्रवर्तक: एल्टन मेयो (Elton Mayo) — मानव संबंध विचारधारा के जनक | वर्ष: 1924-1932, वेस्टर्न इलेक्ट्रिक कंपनी, शिकागो

हॉथोर्न प्रयोग अमेरिका की वेस्टर्न इलेक्ट्रिक कंपनी के शिकागो के पास स्थित हॉथोर्न संयंत्र में 1924 से 1932 के बीच हुए। कंपनी कर्मचारियों को अच्छा वेतन, जलपान-गृह, औषधालय और मनोरंजन जैसी सुविधाएँ देती थी, फिर भी कर्मचारियों में असंतोष और तनाव था। इसलिए 1924 में कंपनी ने राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (National Academy of Sciences) के सहयोग से अध्ययन शुरू किया; 1927 में हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल का दल एल्टन मेयो के नेतृत्व में इसमें जुड़ा। इन प्रयोगों के परिणाम रोथलिसबर्गर और डिक्सन की पुस्तक "Management and the Worker" (1939) में प्रकाशित हुए।

चित्र 2.3: हॉथोर्न प्रयोग के चार मुख्य चरण
चित्र 2.3: हॉथोर्न प्रयोग के चार मुख्य चरण
हॉथोर्न प्रयोग के चरणक्या किया गयामुख्य निष्कर्ष
प्रकाश-प्रयोग (Illumination, 1924-27)छह-छह महिला श्रमिकों के दो दल बनाए; एक दल के कमरे में रोशनी स्थिर रखी, दूसरे में घटाई-बढ़ाई।रोशनी बढ़ाने और घटाने दोनों में उत्पादकता बढ़ी, और स्थिर रोशनी वाले दल की भी — भौतिक परिस्थितियों से परे कोई कारक काम कर रहा था।
रिले असेंबली परीक्षण कक्ष (1927-29)छह लड़कियों के छोटे दल को अलग कमरे में टेलीफ़ोन के रिले जोड़ने का काम; बातचीत की पूरी छूट; काम के घंटे घटाए, विश्राम, चाय-नाश्ता दिया; अंत में सब सुविधाएँ हटा दीं।विश्राम-अवकाश और कम कार्य-घंटों से उत्पादकता बढ़ी — और सुविधाएँ हटाने पर भी ऊँची रही; वास्तविक कारण था कार्य में स्वतंत्रता और बेहतर सामाजिक संबंध, न कि केवल भौतिक बदलाव।
द्वितीय रिले समूह — समूह बोनस (1928)पाँच अनुभवी कर्मचारी; कार्य-दशाएँ वही, केवल समूह-बोनस दिया; लगभग नौ सप्ताह।समूह-बोनस से लगभग 13% उत्पादकता वृद्धि — प्रेरणा का प्रदर्शन-प्रभाव।
माइका-विभाजन समूहपाँच अपरिचित लड़कियाँ अलग कक्ष में; दो वर्ष में कार्य-दशाएँ पाँच बार बदलीं; भुगतान वही।लड़कियाँ एक सामाजिक समूह बन गईं; सामाजिक अंतःक्रिया और अनौपचारिक समूहों से कार्य-संतुष्टि और उत्पादकता बढ़ी।
साक्षात्कार अध्ययन (1928-31)शुरुआत निरीक्षण शाखा के लगभग 1,600 कर्मचारियों से; कुल 21,000 से अधिक कर्मचारियों के साक्षात्कार; पहले प्रश्नावली, फिर खुली "गहन बातचीत"।शिकायत व्यक्त करने का अवसर मिलने से ही मनोबल बढ़ा; शिकायतें अक्सर मन के गहरे असंतोष का लक्षण होती हैं; कारख़ाने के बाहर का वातावरण भी माँगों को प्रभावित करता है।
प्रेक्षण अध्ययन — बैंक वायरिंग कक्ष (1931-32)14 श्रमिक (9 वायरमैन, 3 सोल्डरमैन, 2 निरीक्षक); समूह-प्रोत्साहन मज़दूरी; व्यवहार का अवलोकन।कर्मचारी प्रबंधन के लक्ष्यों के विपरीत भी अनौपचारिक समूह-मानदंडों का पालन करते हैं; समूह ने स्वयं प्रबंधन से कम उत्पादन-सीमा तय कर ली।

बैंक वायरिंग कक्ष के श्रमिकों ने अपनी एक अलिखित "आचार संहिता" बना रखी थी: (1) बहुत अधिक काम मत करो — करोगे तो "दर-तोड़ू (Rate Buster)" कहलाओगे; (2) बहुत कम काम मत करो — करोगे तो "कामचोर (Chiseler)" कहलाओगे; (3) पर्यवेक्षक से किसी साथी की ऐसी बात मत कहो जिससे उसे नुक़सान हो — कहोगे तो "चुग़लख़ोर (Squealer)" कहलाओगे; (4) समूह से दूरी मत बनाओ और अफ़सरी मत दिखाओ — जैसे निरीक्षक, निरीक्षक जैसा व्यवहार न करे। इस प्रयोग ने सिद्ध किया कि व्यक्ति को भौतिक लाभ से अधिक अपने समूह की मान्यताओं और सामाजिक बहिष्कार की चिंता होती है।

मेयो के प्रयोगों के निष्कर्ष: मनुष्य केवल आर्थिक प्राणी नहीं बल्कि सामाजिक प्राणी है; भौतिक कार्य-परिस्थितियों का उत्पादकता पर सीमित प्रभाव है; संगठनों में अनौपचारिक समूह स्वाभाविक रूप से बनते हैं; उच्च मनोबल (पहचान और स्वतंत्रता से प्रेरित) उत्पादकता बढ़ाता है; तथा शिकायतों को सुनने का मंच असंतोष घटाता है। मेयो ने "रैबल परिकल्पना (Rabble Hypothesis)" (कि समाज केवल स्वार्थी व्यक्तियों का असंगठित झुंड है) को ख़ारिज किया।

💡 सरल भाषा में समझें — हॉथोर्न प्रभाव

जैसे कोई अध्यापक जब कक्षा में घूम-घूम कर बच्चों पर व्यक्तिगत ध्यान देना शुरू कर दे — भले पढ़ाई का तरीक़ा बिल्कुल न बदले — तो बच्चे अपने-आप ज़्यादा मन लगाकर पढ़ने लगते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है "मुझ पर ध्यान दिया जा रहा है।" यही मेयो के प्रयोग का सबसे बड़ा सबक़ है — मशीन-जैसी सुविधाएँ बढ़ाने से ज़्यादा असर मानवीय ध्यान और अपनापन देने से पड़ता है। इसी को आज "हॉथोर्न प्रभाव" (Hawthorne Effect) कहा जाता है — लोग बेहतर काम इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें देखा और परखा जा रहा है।

📘 आसान परिभाषा — अनौपचारिक संगठन (Informal Organisation)

शास्त्रीय अर्थ: एल. डी. व्हाइट के अनुसार, लंबे समय तक साथ काम करने वाले व्यक्तियों की आपसी अंतःक्रिया से अपने-आप बनने वाले कार्य-संबंधों का समूह; यह औपचारिक ढाँचे के भीतर "छाया संगठन" की तरह रहता है।

सरल भाषा में: दफ़्तर का वह असली "दोस्तों का समूह" जो किसी चार्ट में नहीं दिखता, पर तय करता है कि कौन किसकी मदद करेगा, कौन-सी ख़बर कितनी तेज़ी से फैलेगी और काम की असली गति क्या होगी। उदाहरण: तहसील कार्यालय में चाय के समय रोज़ साथ बैठने वाले चार बाबू — इनमें से एक नए नियम को "ठीक नहीं" कह दे, तो बाक़ी तीन भी उसे धीमे लागू करते हैं; यह अनौपचारिक संगठन का प्रभाव है।

आधारऔपचारिक संगठनअनौपचारिक संगठन
उत्पत्तिजान-बूझकर बनाया गया, क़ानूनी (Enacted)प्रथा से अपने-आप बना (Customary)
रूपलिखित, नियमावली और संगठन-चार्ट मेंअलिखित, चार्ट में नहीं दिखता
प्रकृतितार्किक और अवैयक्तिकभावनात्मक और व्यक्तिगत
आधारनियोजित और वैधानिकस्वतःस्फूर्त और सामाजिक

मानव संबंध सिद्धांत के तीन तत्व

❝ अक्सर हम मानवीय समस्याओं को ग़ैर-मानवीय औज़ारों से सुलझाने की कोशिश करते हैं; मानवीय समस्या का हल मानवीय ही होना चाहिए। ❞ (A human problem requires a human solution) — (एफ़. जे. रोथलिसबर्गर (F. J. Roethlisberger))
मेयो के प्रमुख ग्रंथ
  • "Democracy and Freedom" (1919)
  • "The Human Problems of an Industrial Civilization" (1933)
  • "The Social Problems of an Industrial Civilization" (1945)
  • "The Political Problems of an Industrial Civilization" (1947)
  • सहयोगियों के ग्रंथ: रोथलिसबर्गर और डिक्सन — "Management and the Worker" (1939); रोथलिसबर्गर — "Management and Morale" (1942); व्हाइटहेड — "Leadership in a Free Society" (1936), "The Industrial Worker" (1938)
मेयो के प्रयोगों की आलोचना
  • डब्ल्यू. एच. व्हाइट — कर्मचारियों के निजी जीवन में नियोक्ता के हस्तक्षेप को बढ़ावा देने का आरोप।
  • प्रबंधन के प्रति पक्षपात — प्रबंधकीय व्यवहार पर कोई प्रयोग नहीं किया; लॉरेन बारिट्ज़ ने इन्हें प्रबंधन-समर्थक और संघ-विरोधी कहा; 1949 में यूनाइटेड ऑटो वर्कर्स ने इन्हें "गाय जैसे भीरु समाजशास्त्री (Cow Sociologists)" कहा।
  • त्रुटिपूर्ण शोध-पद्धति और श्रमिक संघों की भूमिका की उपेक्षा (शेपर्ड, बारिट्ज़)।
  • एलेक्स केरी — पाँच-छह लड़कियों के छोटे और चुने हुए नमूने से सामान्यीकरण पर सवाल।
  • पीटर ड्रकर — काम की प्रकृति और आर्थिक पक्ष की उपेक्षा; अमिताई एट्ज़ियोनी — औपचारिक संबंधों और उनके अनौपचारिक संबंधों से जुड़ाव की उपेक्षा।
  • डेविड ईस्टन — व्यापक सामाजिक संदर्भ का अभाव; मार्क्सवादी — श्रमिकों के शोषण की नई तकनीक; संघर्ष और तनाव के लिए कोई स्थान नहीं।
आधारशास्त्रीय सिद्धांत (Classical)मानव संबंध सिद्धांत (Human Relations)
संगठन-संरचनाऔपचारिक संगठन-ढाँचाअनौपचारिक संगठन और व्यक्तिगत गतिशीलता
संगठन का स्वरूपतार्किक और अवैयक्तिक व्यवस्थाभावनात्मक और सामाजिक व्यवस्था
श्रमिक की छविमशीन का पुर्ज़ा, "आर्थिक मानव"सामाजिक प्राणी, अनौपचारिक समूह बनाने वाला
प्रेरणा के कारकआर्थिक पुरस्कार, भौतिक परिस्थितियाँसामाजिक-मनोवैज्ञानिक कारक
व्यवहार का स्रोतप्रबंधन के नियम और विनियमकर्मचारियों की अभिवृत्तियाँ, भावनाएँ और संवेग
लोगों के बारे में मान्यतासब लोग एक जैसे (समरूप)सब लोग अलग-अलग (विषमरूप)
पर्यवेक्षण शैलीअधिनायकवादीलोकतांत्रिक और सहभागी
बलतथ्यों पर बल; विवेकशीलतामूल्यों पर बल; भावनात्मक पक्ष
दक्षता का आधारसिद्धांतों पर आधारित संरचनाकर्मचारी-संतुष्टि और मानव-संबंध
कार्य-वातावरणभौतिक वातावरण पर ध्यानसामाजिक वातावरण पर ध्यान
प्रमुख विचारकमैक्स वेबर, हेनरी फेयोलएल्टन मेयो, मेरी पार्कर फॉलेट
आधारटेलरमेयो
मनुष्य की अवधारणा"आर्थिक मनुष्य"; श्रमिक अलग-थलग व्यक्ति"सामाजिक मनुष्य"; श्रमिक सामाजिक प्राणी
ध्यानऔज़ार, प्रक्रिया, नियम — शारीरिक और यांत्रिक पक्षलोग और समूह — सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष
प्रबंधन शैलीनिरंकुश प्रबंधनसहभागी प्रबंधन
प्रेरणा सिद्धांतएकल-कारक (केवल पैसा)सामाजिक-आर्थिक
मुख्य चिंताकाम का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ाश्रमिक की संतुष्टि और मनोबल
श्रमिक-समूहप्रबंधन का विरोधीप्रबंधन का विरोधी नहीं
कौशल पर बलतकनीकी कौशलसामाजिक कौशल

टेलर और मेयो में समानताएँ — दोनों ने कम उत्पादकता के कारण खोजे; दोनों मानते थे कि मज़दूर-प्रबंधक सहयोग से औद्योगिक संघर्ष ख़त्म होगा; दोनों ने दक्षता और मितव्ययता को संगठन का लक्ष्य माना और प्रबंधन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर बल दिया।

5.4 मेरी पार्कर फॉलेट — गतिशील प्रशासन (Dynamic Administration)

मेरी पार्कर फॉलेट को "प्रबंधन की जननी" (Mother of Management) कहा जाता है। उनका मानना था कि समन्वय (Coordination) संगठन का प्रथम सिद्धांत है। उन्होंने "परिस्थिति का नियम" (Law of the Situation) प्रस्तुत किया — आदेश किसी व्यक्ति की इच्छा से नहीं, बल्कि परिस्थिति की माँग से उपजना चाहिए। उन्होंने रचनात्मक संघर्ष (Constructive Conflict) की भी वकालत की — संघर्ष को दबाने या समझौते से नहीं, बल्कि "एकीकरण" (Integration) से सुलझाना चाहिए, जिसमें दोनों पक्षों के हित संतुष्ट हों। फॉलेट ने सत्ता के "साथ" कार्य करने (Power-with) को सत्ता के "ऊपर" (Power-over) से बेहतर बताया।

🎓 चिंतक-परिचय — मेरी पार्कर फॉलेट (Mary Parker Follett, 1868-1933)

शास्त्रीय और मानव संबंध-व्यवहारवादी विचारधारा के बीच का "सेतु" | प्रमुख ग्रंथ: "The New State" (1920), "Creative Experience" (1924), "Dynamic Administration" (1941, उनके लेखों का संकलन)

💡 सरल भाषा में समझें — फॉलेट का "एकीकरण"

दो बहनों को एक ही संतरा चाहिए और झगड़ा हो रहा है। माँ बीच का हल निकालती है — आधा-आधा बाँट दो — यह "समझौता" (Compromise) है, दोनों को पूरा संतरा नहीं मिला। परंतु अगर माँ पूछे "तुम्हें संतरा क्यों चाहिए?" तो पता चलता है एक बहन को सिर्फ़ छिलके से केक बनाना है और दूसरी को सिर्फ़ गूदा खाना है — अब दोनों को पूरी संतुष्टि मिल सकती है, बिना किसी का त्याग किए। यही है फॉलेट का "एकीकरण" (Integration) — असली ज़रूरत समझकर ऐसा हल निकालना जिसमें दोनों पक्ष जीतें।

5.5 अब्राहम मैस्लो और डगलस मैक्ग्रेगर

🎓 चिंतक-परिचय — मैस्लो का आवश्यकता-पदानुक्रम सिद्धांत

विचारक/प्रवर्तक: अब्राहम मैस्लो (Abraham Maslow) | वर्ष: 1943

स्तर (निम्न से उच्च)आवश्यकताउदाहरण
1शारीरिक आवश्यकताएँ (Physiological)भोजन, जल, नींद, वेतन
2सुरक्षा आवश्यकताएँ (Safety)नौकरी की सुरक्षा, स्वास्थ्य-बीमा
3सामाजिक आवश्यकताएँ (Social)मित्रता, टीम-भावना, संबंध
4सम्मान आवश्यकताएँ (Esteem)मान्यता, पदोन्नति, उपलब्धि
5आत्म-सिद्धि आवश्यकताएँ (Self-Actualization)क्षमता की पूर्ण प्राप्ति, सृजनात्मकता
💡 सरल भाषा में समझें — मैस्लो का पिरामिड

एक दिहाड़ी मज़दूर जिसे दो वक़्त की रोटी जुटाने की चिंता है, वह उस समय "समाज में इज़्ज़त" या "अपनी प्रतिभा साबित करने" के बारे में नहीं सोचेगा — पहले पेट भरेगा (शारीरिक आवश्यकता), फिर नौकरी पक्की होगी तो सुरक्षा महसूस करेगा, फिर दोस्त-रिश्तेदार (सामाजिक), फिर तरक़्क़ी और सम्मान चाहेगा, और अंत में जब सब कुछ मिल जाए तब वह अपनी असली प्रतिभा (जैसे चित्रकारी, लेखन) को निखारने के बारे में सोचेगा। यही क्रम है मैस्लो का पिरामिड — नीचे की ज़रूरत पूरी हुए बिना ऊपर की ज़रूरत मन में आती ही नहीं।

डगलस मैक्ग्रेगर (Douglas McGregor, MIT) ने 1960 में अपनी पुस्तक "The Human Side of Enterprise" में मानव-प्रकृति के दो विपरीत दृष्टिकोण — थ्योरी X एवं थ्योरी Y — प्रस्तुत किए, जो प्रबंधकों की श्रमिकों के प्रति धारणा को दर्शाते हैं। उनकी मूल मान्यता थी — "हर प्रबंधकीय कार्य किसी सिद्धांत पर टिका होता है।" थ्योरी X शास्त्रीय (सत्तावादी) प्रबंधन का प्रतिनिधित्व करती है और थ्योरी Y व्यवहारवादी (सहभागी) प्रबंधन का।

थ्योरी X (Theory X)
  • अधिकांश लोग कार्य को नापसंद करते हैं और टालते हैं।
  • निर्देशन, नियंत्रण और दंड की धमकी से ही कार्य करते हैं।
  • औसत व्यक्ति आलसी है, उत्तरदायित्व से बचता है, सुरक्षा चाहता है।
  • अधिनायकवादी प्रबंधन शैली — निर्देश ऊपर से नीचे; इसका केंद्रीय सिद्धांत "पदसोपान (Scalar) सिद्धांत" है।
थ्योरी Y (Theory Y)
  • कार्य मनुष्य के लिए स्वाभाविक है — विश्राम या खेल जैसा।
  • लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता स्वाभाविक व्यवहार है।
  • लोग आत्म-निर्देशन और आत्म-नियंत्रण का प्रयोग करते हैं; रचनात्मकता व्यापक रूप से फैली है।
  • सहभागी प्रबंधन — नवाचार और सृजनात्मकता को प्रोत्साहन; इसका केंद्रीय सिद्धांत "एकीकरण (Integration)" है।
प्रबंधकीय कार्यथ्योरी X मेंथ्योरी Y में
लक्ष्य-निर्धारणअधीनस्थों की भागीदारी बहुत कमअधीनस्थ लक्ष्य तय करने में भाग लेते हैं
संचारकेवल ऊपर से नीचेऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर
नेतृत्वनिरंकुश / निर्देशात्मकलोकतांत्रिक / सहभागी
पर्यवेक्षणकड़ासामान्य
नियंत्रणबाहरी और कठोरआंतरिक, आत्म-नियंत्रण पर आधारित
प्रेरणादंडात्मकपुरस्कार और प्रशंसा
मूल्यांकनदोष ढूँढनासमस्या सुलझाना
💡 सरल भाषा में समझें — X बनाम Y

एक अध्यापिका जो मानती है कि "बच्चे मौक़ा मिलते ही नक़ल करेंगे" वह हर परीक्षा में सख़्त निगरानी, सीसीटीवी और जाँच में उलझी रहती है (थ्योरी X सोच)। दूसरी अध्यापिका मानती है कि "बच्चे ख़ुद अच्छा करना चाहते हैं, बस सही माहौल चाहिए" — वह भरोसा करके ज़िम्मेदारी सौंपती है और बच्चे ख़ुद प्रेरित होकर मेहनत करते हैं (थ्योरी Y सोच)। मैक्ग्रेगर कहना चाहते थे कि एक प्रबंधक की अपने कर्मचारियों के बारे में धारणा ही तय करती है कि वह उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा।

चेस्टर बर्नार्ड ने भी अपनी पुस्तक "The Functions of the Executive" (1938) में संगठनों को "सहयोग की प्रणाली" (Cooperative System) बताया — कार्यपालक के मुख्य कार्य हैं संचार-प्रणाली स्थापित करना, आवश्यक सेवाएँ प्राप्त करना, तथा संगठनात्मक उद्देश्य निर्धारित करना (इनका विस्तृत विवरण अगले खंड — व्यवहारवादी उपागम — में है)।

🇮🇳 भारतीय उदाहरण — मानव संबंध की सोच सरकार में

सरकारी दफ़्तरों में "शिकायत-पेटी", कर्मचारी कल्याण समितियाँ, संयुक्त सलाहकार तंत्र और सिविल सेवा दिवस पर सम्मान — सब मेयो के निष्कर्ष पर आधारित हैं कि बात सुने जाने और मान्यता मिलने से मनोबल और उत्पादकता बढ़ती है (विस्तार अध्याय 04 में)।

ज़िला कलेक्टर द्वारा पटवारियों और ग्राम-सेवकों की टीम के साथ नियमित संवाद, उनकी समस्याएँ सुनना और अच्छे काम पर सार्वजनिक प्रशंसा — यह "सहभागी प्रबंधन" का ही व्यावहारिक रूप है।

🔑 इस खंड का कीवर्ड सारांश
मेयो
मानव संबंध का जनक; हॉथोर्न 1924-32
हॉथोर्न प्रभाव
ध्यान मिलने से उत्पादकता बढ़ना
बैंक वायरिंग
अनौपचारिक समूह-मानदंड; दर-तोड़ू, कामचोर
साक्षात्कार
21,000+ कर्मचारी; बात सुनने से मनोबल
रैबल परिकल्पना
समाज = स्वार्थी झुंड; मेयो ने ख़ारिज की
अनौपचारिक संगठन
छाया संगठन; प्रथा से बना
फॉलेट
प्रबंधन की जननी; परिस्थिति का नियम
एकीकरण
दोनों पक्षों की असली ज़रूरत पूरी
Power-with
सत्ता के साथ, ऊपर नहीं
मैस्लो
1943; आवश्यकता-पदानुक्रम
मैक्ग्रेगर
1960; थ्योरी X और Y
नव-शास्त्रीय
मानव संबंध का दूसरा नाम

6व्यवहारवादी उपागम (Behavioural Approach)

6.1 अर्थ और मूल विचार

व्यवहारवादी उपागम संगठनों में व्यक्तियों और समूहों के वास्तविक व्यवहार (Actual Behaviour) पर केंद्रित है — यह संगठन को एक सामाजिक व्यवस्था मानता है, तथा औपचारिक संरचना और निर्देशों से अधिक महत्वपूर्ण "व्यवहार" को मानता है। यह मनोविज्ञान, समाज-मनोविज्ञान और नृविज्ञान से ज्ञान उधार लेता है, तथा शास्त्रीय सिद्धांतों के विरुद्ध एक विरोध-आंदोलन (Protest Movement) के रूप में उभरा।

व्यवहारवादी उपागम को मानव संबंध उपागम का ही अधिक व्यवस्थित, वैज्ञानिक और परिष्कृत रूप माना जाता है। इसे "सामाजिक-मनोवैज्ञानिक उपागम" और "नव-मानव संबंध उपागम" भी कहते हैं। डी. एस. पग ने मेयो को "व्यवहार-वैज्ञानिक शब्द के लोकप्रिय होने से बहुत पहले का व्यवहार-वैज्ञानिक" कहा। बाद में इसे चेस्टर बर्नार्ड, हर्बर्ट साइमन, मैस्लो, मैक्ग्रेगर, क्रिस आर्गिरिस, हर्ज़बर्ग, रेंसिस लिकर्ट, वॉरेन बेनिस, कर्ट लेविन आदि ने विकसित किया — पर इसके सबसे बड़े प्रवक्ता हर्बर्ट साइमन थे।

❝ संगठन में काम करने वाले मनुष्यों की आकांक्षाएँ और इच्छाएँ होती हैं; उनका व्यवहार उनके मनोविज्ञान, प्रेरणाओं और सामाजिक वातावरण से बनता है। प्रशासन-विज्ञान को "मूल्यों" के प्रश्न में उलझे बिना व्यवहार के इन "तथ्यों" का अध्ययन करना चाहिए। ❞ (Organisation is a group of people behaving) — (हर्बर्ट साइमन, "Administrative Behavior" (1947))

6.2 हर्बर्ट साइमन — निर्णय-निर्माण का सिद्धांत

🎓 चिंतक-परिचय — प्रशासनिक व्यवहार (Administrative Behavior)

विचारक/प्रवर्तक: हर्बर्ट ए. साइमन (Herbert A. Simon) | वर्ष: 1947 — नोबेल पुरस्कार 1978 (अर्थशास्त्र)

साइमन के अनुसार निर्णय-निर्माण पूरे संगठन में फैला है — हर स्तर पर निर्णय लिए जाते हैं, इसलिए संगठन "निर्णयकर्ताओं की संरचना" है। उन्होंने प्रशासन को निर्णय-निर्माण के बराबर माना, क्योंकि फेयोल के POCCC और गुलिक के POSDCoRB के सभी कार्य निर्णयों के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं। उनके अनुसार किसी इमारत को मिस्त्री के हाथ बनाते हैं, इंजीनियर के नहीं; इसलिए संगठन को समझने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह देखना है कि कर्मचारियों के निर्णय और व्यवहार कैसे प्रभावित होते हैं।

शास्त्रीय "सिद्धांतों" पर साइमन की आपत्ति एक उदाहरण से समझिए: एक सिद्धांत कहता है "नियंत्रण का क्षेत्र छोटा रखो, ताकि पर्यवेक्षण अच्छा हो", और दूसरा कहता है "पदानुक्रम के स्तर कम रखो, ताकि संचार तेज़ हो"। पर नियंत्रण का क्षेत्र छोटा करेंगे तो स्तर अपने-आप बढ़ेंगे! इसलिए साइमन ने कहा कि ये सिद्धांत कहावतों की तरह जोड़ों में आते हैं और एक-दूसरे का खंडन करते हैं — जैसे "जल्दी का काम शैतान का" और "समय पर एक टाँका, बाद के नौ बचाता है"। उनका प्रसिद्ध कथन है — "कोई विज्ञान सिद्धांत बनाए, उससे पहले उसके पास अवधारणाएँ होनी चाहिए।"

तथ्य और मूल्य; निर्णय के तीन चरण

साइमन के अनुसार हर निर्णय दो आधारों पर टिका होता है — तथ्यात्मक आधार (Factual Premise), जिसे देखकर और मापकर परखा जा सकता है, और मूल्यात्मक आधार (Value Premise), जो किसी पसंद या प्राथमिकता को व्यक्त करता है और जिसे अनुभवजन्य रूप से परखा नहीं जा सकता। मूल्य "साध्य" (क्या पाना है) से जुड़े हैं और तथ्य "साधन" (कैसे पाना है) से। उनके अनुसार निर्णय-प्रक्रिया के तीन मुख्य चरण हैं, जो जॉन ड्यूई (1910) के समस्या-समाधान के चरणों से मिलते हैं:

चित्र 2.4: साइमन का निर्णय-निर्माण मॉडल और सीमित तार्किकता
चित्र 2.4: साइमन का निर्णय-निर्माण मॉडल और सीमित तार्किकता
निर्णयों का वर्गीकरणअर्थ
कार्यक्रमित (Programmed) — साइमनबार-बार आने वाले, नियमित निर्णय, जिनके लिए तय प्रक्रिया होती है — जैसे आकस्मिक अवकाश स्वीकृत करना। परंपरागत तकनीक: आदत, लिपिकीय दिनचर्या; आधुनिक: संक्रिया अनुसंधान, इलेक्ट्रॉनिक डेटा प्रोसेसिंग।
अकार्यक्रमित (Non-programmed) — साइमननए, असंरचित और महत्वपूर्ण निर्णय, जिनका कोई बना-बनाया तरीक़ा नहीं — जैसे बाढ़ में राहत-शिविरों की जगह तय करना। तकनीक: विवेक, अंतर्ज्ञान, रचनात्मकता, अधिकारियों का चयन और प्रशिक्षण।
सामान्य और अद्वितीय — ड्रकरकार्यक्रमित और अकार्यक्रमित निर्णयों जैसे ही।
संगठनात्मक और व्यक्तिगत — बर्नार्डसंगठन के सदस्य के रूप में लिया गया निर्णय बनाम निजी हैसियत में लिया गया निर्णय।
नीतिगत और परिचालनपूरे संगठन को प्रभावित करने वाले रणनीतिक निर्णय (शीर्ष प्रबंधन) बनाम उन्हें लागू करने वाले दैनिक निर्णय (निचला स्तर)।
📘 आसान परिभाषा — योजना का ग्रेशम नियम (Gresham's Law of Planning)

शास्त्रीय अर्थ: साइमन और मार्च का कथन कि जो अधिकारी नियमित कार्य और दीर्घकालिक योजना — दोनों के लिए ज़िम्मेदार है, वह अधिकतर समय नियमित कार्य में लगा देता है, जिससे दीर्घकालिक निर्णय टलते रहते हैं; यानी "दिनचर्या, अकार्यक्रमित गतिविधि को बाहर कर देती है।"

सरल भाषा में: रोज़ की फ़ाइलें, बैठकें और फ़ोन — इनमें उलझकर अफ़सर के पास भविष्य की योजना सोचने का समय ही नहीं बचता। उदाहरण: एक ज़िला शिक्षा अधिकारी पूरा साल तबादलों, वेतन-बिलों और निरीक्षण में व्यस्त रहता है; "अगले पाँच साल में ड्रॉपआउट कैसे घटाएँ" वाली योजना हर साल अगले साल पर टल जाती है।

सीमित तार्किकता और "प्रशासनिक मनुष्य"

साइमन ने तार्किकता के कई प्रकार बताए — वस्तुनिष्ठ (वास्तव में सही), व्यक्तिनिष्ठ (निर्णयकर्ता के ज्ञान के अनुसार सही), सचेत, सुविचारित, संगठनात्मक (संगठन के लक्ष्यों की ओर) और व्यक्तिगत (अपने लक्ष्यों की ओर)। उनके अनुसार पूर्ण तार्किकता के लिए तीन चीज़ें चाहिए — हर विकल्प के परिणामों का पूरा ज्ञान, भविष्य के परिणामों का सही मूल्यांकन, और सभी संभावित विकल्पों में से चयन। वास्तव में ये तीनों कभी पूरी नहीं होतीं, इसलिए मनुष्य की तार्किकता "सीमित" रहती है। इसके कारण हैं — संगठन के बदलते लक्ष्य, अधूरी सूचना और उसे समझने की सीमित क्षमता, समय और लागत की बाधाएँ, बाहरी दबाव, सभी विकल्पों और उनके परिणामों की जानकारी न होना, व्यक्ति की आदतें और पूर्वाग्रह, तथा संगठन के नियम और प्रक्रियाएँ।

आर्थिक मनुष्य (Economic Man)
  • सभी उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ चुनता है (अधिकतमीकरण)।
  • वास्तविक दुनिया की पूरी जटिलता को ध्यान में रखता है।
  • शास्त्रीय विचारकों — वेबर, टेलर, फेयोल — की मान्यता।
प्रशासनिक मनुष्य (Administrative Man)
  • संतोषजनक या "ठीक-ठाक" विकल्प मिलते ही रुक जाता है (संतुष्टिकरण)।
  • दुनिया का एक सरल चित्र बनाकर उसी में निर्णय लेता है; सभी विकल्प परखे बिना अपेक्षाकृत सरल नियमों से चुनता है।
  • साइमन की मान्यता — यही वास्तविक व्यवहार है।
💡 सरल भाषा में समझें — परिबद्ध तर्कसंगतता और संतुष्टिकरण

जब आप कॉलेज चुनते हैं, तो आप दुनिया-भर के हज़ारों कॉलेजों की तुलना करके "सर्वश्रेष्ठ" कॉलेज नहीं चुनते — क्योंकि इतना समय, पैसा और जानकारी किसी के पास नहीं होती (यही है परिबद्ध तर्कसंगतता — Bounded Rationality)। इसकी बजाय आप अपने शहर या बजट के 5-6 कॉलेज देखकर, जो "ठीक-ठाक अच्छा" लगे उसे चुन लेते हैं — साइमन इसी को "संतुष्टिकरण" (Satisficing) कहते हैं: सर्वश्रेष्ठ नहीं, पर्याप्त रूप से अच्छा विकल्प चुनना।

साइमन के अनुसार संगठन व्यक्ति के व्यवहार को कई तरह से प्रभावित करता है — सत्ता (आदेश), संगठन के प्रति निष्ठा या "पहचान" (Identification) (व्यक्ति स्वयं को संगठन से जोड़कर सोचता है), दक्षता का मानदंड, सलाह और सूचना, तथा प्रशिक्षण, जो कर्मचारी को स्वयं सही निर्णय लेने लायक़ बनाता है। निजी संगठन में निर्णय केवल संस्था पर असर देखकर लिया जाता है, जबकि सरकारी निर्णय को सामाजिक मूल्यों — जैसे अवसर की समानता — की कसौटी पर भी परखा जाता है। अच्छे सरकारी निर्णय में प्रक्रिया का सरलीकरण, बोर्ड-प्रकार के निकाय, बाहरी दबाव से बचाव, सलाहकार निकायों का उपयोग, पक्षपात से बचाव, निर्णयों के कारणों का प्रचार और प्रशिक्षण सहायक होते हैं।

6.3 चेस्टर बर्नार्ड — सहकारी व्यवस्था

🎓 चिंतक-परिचय — कार्यपालक के कार्य (Functions of the Executive)

विचारक/प्रवर्तक: चेस्टर आई. बर्नार्ड (Chester I. Barnard, 1886-1961) | वर्ष: 1938

बर्नार्ड को व्यवहारवादी आंदोलन का पहला "पूर्ण व्यवहारवादी" और "सामाजिक व्यवस्था विचारधारा का आध्यात्मिक पिता" कहा जाता है। उनके अनुसार संगठन "दो या अधिक व्यक्तियों की सचेत रूप से समन्वित गतिविधियों की व्यवस्था" है, और इसके तीन तत्व हैं — संचार, सहयोग की इच्छा और साझा उद्देश्य। उनके अन्य महत्वपूर्ण विचार:

💡 सरल भाषा में समझें — उदासीनता का क्षेत्र (Zone of Indifference)

दफ़्तर में बॉस कहे "यह रिपोर्ट कल तक भेज दो" तो आप बिना सवाल किए मान लेते हैं — यह आपके काम का ही हिस्सा है (यानी यह आदेश "उदासीनता के क्षेत्र" के भीतर आता है, आप उस पर सवाल नहीं उठाते)। परंतु अगर बॉस कहे "मेरे घर का निजी काम कर दो" तो आप सवाल उठाएँगे — क्योंकि यह उस दायरे से बाहर है। बर्नार्ड कहना चाहते थे कि सत्ता तब तक ही काम करती है जब तक अधीनस्थ उसे स्वीकार करने को तैयार हो — सत्ता ऊपर से थोपी नहीं जाती, नीचे से स्वीकृति से बनती है।

6.4 क्रिस आर्गिरिस, रेंसिस लिकर्ट और अन्य

🎓 चिंतक-परिचय — अपरिपक्वता-परिपक्वता सिद्धांत

विचारक/प्रवर्तक: क्रिस आर्गिरिस (Chris Argyris) | पुस्तक: "Personality and Organisation" (1957)

रेंसिस लिकर्ट ("New Patterns of Management", 1961; "The Human Organisation", 1967) ने प्रबंधन की चार प्रणालियाँ बताईं — शोषक-सत्तावादी, परोपकारी-सत्तावादी, परामर्शी और सहभागी समूह — और सहभागी प्रणाली-4 को सर्वश्रेष्ठ माना (विस्तार अध्याय 04 में)। उन्होंने "सहायक संबंधों का सिद्धांत" और "कड़ी-पिन मॉडल (Linking Pin Model)" भी दिया, जिसमें हर प्रबंधक अपने समूह का नेता और ऊपर के समूह का सदस्य होकर दोनों को जोड़ता है। अन्य योगदान: कर्ट लेविन — समूह-गतिकी; हर्ज़बर्ग — प्रेरणा-स्वास्थ्य सिद्धांत; डेविड मैक्लीलैंड — उपलब्धि-प्रेरणा सिद्धांत; ब्लेक और माउटन — प्रबंधकीय ग्रिड; जॉर्ज होमन्स — मानव समूह; वॉरेन बेनिस — प्रयोगशाला प्रशिक्षण।

6.5 विशेषताएँ, महत्व और आलोचना

व्यवहारवादी उपागम की विशेषताएँविवरण
सामाजिक व्यवस्था के रूप में संगठनवास्तविक संगठनों में वास्तविक व्यवहार पर फ़ोकस; औपचारिक और अनौपचारिक — दोनों संबंधों पर समान ध्यान
अनुभवजन्य आधारअवलोकन, आँकड़ों और प्रयोग पर आधारित; क्षेत्र-अध्ययन और प्रयोगशाला-अध्ययन
अंतर-अनुशासनात्मकमनोविज्ञान, समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान का समन्वय
निर्णय-निर्माण उन्मुखवास्तविक परिस्थितियों में निर्णय कैसे लिए जाते हैं, इसका अध्ययन
सूक्ष्म-स्तरीय विश्लेषणव्यक्तियों और छोटे समूहों पर केंद्रित; प्रेरणा, नेतृत्व, संचार, सत्ता की गतिकी पर ध्यान
भविष्यसूचक प्रकृतिप्रशासनिक व्यवहार की व्याख्या और भविष्यवाणी का प्रयास; वर्णनात्मक, निर्देशात्मक नहीं
मूल्य-निरपेक्ष और वस्तुनिष्ठलोक प्रशासन को वस्तुनिष्ठ बनाने का प्रयास; परिमाणीकरण और औपचारिक सिद्धांत-निर्माण

डेविड ईस्टन ने व्यवहारवाद की आठ "बौद्धिक आधारशिलाएँ" बताईं — नियमितताएँ (व्यवहार में खोजी जा सकने वाली एकरूपताएँ), सत्यापन, तकनीकें, परिमाणीकरण, मूल्य-तथ्य पृथक्करण, व्यवस्थापन, शुद्ध विज्ञान और एकीकरण (अंतर-अनुशासनात्मकता)। स्मिथबर्ग के अनुसार यह उपागम व्यक्ति और संगठन के संबंध पर, संगठन को सामाजिक व्यवस्था मानने पर, अनौपचारिक संचार पर और "संप्रभुता" की जगह "वैधता" के सिद्धांत पर बल देता है — यानी यह पूछता है कि लोग आदेश क्यों मानते हैं।

व्यवहारवादी उपागम का महत्व
  • निर्णय-निर्माण को प्रशासन के केंद्र में स्थापित किया।
  • साइमन को 1978 में नोबेल पुरस्कार — अंतरानुशासनात्मक मान्यता।
  • आधुनिक व्यवहारवादी अध्ययन की नींव रखी; तुलनात्मक लोक प्रशासन को प्रेरणा दी।
  • शास्त्रीय सिद्धांतों की सीमाओं को वैज्ञानिक ढंग से उजागर किया।
  • संचार, प्रेरणा और नेतृत्व जैसे नए आयाम जोड़े; अध्ययन का केंद्र औपचारिक-क़ानूनी ढाँचे से हटाकर लोगों और उनके व्यवहार पर लाया।
व्यवहारवादी उपागम की आलोचना
  • औपचारिक संरचना और ग़ैर-मानवीय कारकों की उपेक्षा।
  • मूल्यों और मानदंडात्मक विश्लेषण को नज़रअंदाज़ करना — लियो स्ट्रॉस ने इसे "प्रत्यक्षवाद" और क्रिश्चियन बे ने "नैतिक रूप से तटस्थ और सामाजिक रूप से अप्रासंगिक" कहा।
  • व्यावहारिक प्रशासकों के लिए सीमित उपयोगिता; छोटे संगठनों पर अधिक लागू, बड़े सरकारी संगठनों पर कम।
  • मौलिकता की कमी — परंपरावाद का ही विस्तार होने का आरोप।
🇮🇳 भारतीय उदाहरण — मिशन कर्मयोगी — व्यवहारवादी सोच का समकालीन प्रयोग

मिशन कर्मयोगी के "कर्मयोगी दक्षता मॉडल" में सिविल सेवकों की दक्षताओं को तीन प्रकारों में बाँटा गया है — व्यवहारगत (जैसे सहानुभूति, नेतृत्व), कार्यात्मक (जैसे परियोजना प्रबंधन, टिप्पण और प्रारूपण) और क्षेत्र-विशेष (डोमेन) (जैसे किसी मंत्रालय का तकनीकी ज्ञान)। नियमों के साथ-साथ व्यवहार और दृष्टिकोण को प्रशिक्षण का विषय बनाना व्यवहारवादी उपागम का ही समकालीन प्रयोग है।

🔑 इस खंड का कीवर्ड सारांश
साइमन
"Administrative Behavior" 1947; नोबेल 1978
कहावतें
शास्त्रीय सिद्धांतों पर साइमन का आरोप (1946)
तथ्य-मूल्य
तथ्य परखे जा सकते हैं, मूल्य नहीं
तीन चरण
आसूचना, अभिकल्पना, चयन
परिबद्ध तर्कसंगतता
पूर्ण तार्किकता असंभव
संतुष्टिकरण
पर्याप्त अच्छा विकल्प
प्रशासनिक मनुष्य
संतोषजनक से संतुष्ट
ग्रेशम नियम
दिनचर्या योजना को बाहर कर देती है
बर्नार्ड
सहकारी व्यवस्था; 1938
स्वीकृति सिद्धांत
सत्ता नीचे से आती है
उदासीनता का क्षेत्र
बिना प्रश्न माने जाने वाले आदेश
आर्गिरिस
अपरिपक्वता-परिपक्वता; 1957

7संरचना-प्रकार्यवादी उपागम (Structural-Functional Approach)

संरचना-प्रकार्यवादी उपागम एक समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण है, जो समाज को एक जटिल व्यवस्था मानता है, जिसकी विभिन्न संरचनाएँ (संस्थाएँ, संगठन) सामाजिक स्थिरता और व्यवस्था बनाए रखने हेतु कार्य (Functions) करती हैं। इसे लोक प्रशासन में सर्वप्रथम ड्वाइट वाल्डो (1955) ने लागू करने का सुझाव दिया, तथा टैल्कॉट पार्सन्स और रॉबर्ट मर्टन ने इसे सैद्धांतिक गहराई दी।

इस उपागम के दो मूल शब्द हैं — संरचना (Structure), यानी कोई संस्था या ढाँचा, जैसे संसद, न्यायालय, परिवार या ज़िला कार्यालय; और प्रकार्य (Function), यानी वह काम या परिणाम जो वह संरचना पूरे समाज के लिए करती है। इसकी मूल मान्यता है कि हर समाज में कुछ कार्य अनिवार्य रूप से होने चाहिए, पर अलग-अलग समाजों में वही कार्य अलग-अलग संरचनाएँ कर सकती हैं। इसलिए दो देशों की तुलना "किसके पास कौन-सी संस्था है" से नहीं, बल्कि "कौन-सा कार्य कौन कर रहा है" से करनी चाहिए। पार्सन्स और मर्टन के अलावा मैरियन लेवी, गैब्रियल आमंड, डेविड एप्टर और फ़्रेड रिग्स ने इसे अपनाया।

🎓 चिंतक-परिचय — संरचना-प्रकार्यवाद (AGIL ढाँचा)

विचारक/प्रवर्तक: टैल्कॉट पार्सन्स (Talcott Parsons) | वर्ष: 1950 का दशक

चित्र 2.5: पार्सन्स का AGIL ढाँचा
चित्र 2.5: पार्सन्स का AGIL ढाँचा
💡 सरल भाषा में समझें — AGIL को क्रिकेट टीम से समझें

एक क्रिकेट टीम को ज़िंदा रहने के लिए चार काम करने होते हैं — नए अच्छे खिलाड़ी ढूँढना और संसाधन जुटाना (Adaptation), मैच जीतने का लक्ष्य तय करना (Goal Attainment), टीम में आपसी तालमेल और एकता बनाए रखना (Integration), और टीम की परंपरा, संस्कृति और जज़्बे को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनाए रखना (Latency)। पार्सन्स कहते हैं कि हर समाज या संस्था — चाहे वह सरकार हो या क्रिकेट टीम — इन्हीं चार कामों को करके ज़िंदा रहती है।

रॉबर्ट मर्टन ने कार्यों (Functions) को दो भागों में बाँटा, जो परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है:

प्रकार्य का प्रकारपरिभाषाउदाहरण
प्रकट प्रकार्य (Manifest Function)जान-बूझकर किया गया और स्पष्ट रूप से मान्यता-प्राप्त परिणामविश्वविद्यालय का प्रकट कार्य — शिक्षा प्रदान करना
गुप्त प्रकार्य (Latent Function)अनजाने में उत्पन्न और कम स्पष्ट परिणामविश्वविद्यालय का गुप्त कार्य — सामाजिक संपर्क-जाल और मित्रता के संबंध बनाना
प्रति-प्रकार्य (Dysfunction)संरचना द्वारा उत्पन्न व्यवधान जो व्यवस्था की स्थिरता को चुनौती देते हैंअत्यधिक नियम-पालन से लक्ष्य-विस्थापन (नौकरशाही में)
💡 सरल भाषा में समझें — प्रकट और गुप्त प्रकार्य

स्कूल में सुबह की प्रार्थना-सभा का प्रकट उद्देश्य है अनुशासन और नैतिक शिक्षा — यह सबको साफ़ दिखता है। लेकिन इसका एक गुप्त उद्देश्य भी है जो किसी ने योजना बनाकर नहीं रखा — बच्चों में रोज़ सुबह मिलने से दोस्ती और सामूहिक पहचान (हम सब एक स्कूल के हैं) बनना। पहला "प्रकट प्रकार्य" है, दूसरा "गुप्त प्रकार्य" — मर्टन का यही मुख्य योगदान है कि किसी संस्था के केवल दिखते उद्देश्य से नहीं, उसके छिपे प्रभावों से भी समझा जाना चाहिए।

फ़्रेड डब्ल्यू. रिग्स ने संरचना-प्रकार्यवादी उपागम को तुलनात्मक प्रशासनिक विश्लेषण के लिए लोकप्रिय बनाया — उन्होंने पाँच प्रमुख कार्य पहचाने: आर्थिक, सामाजिक, संचारात्मक, प्रतीकात्मक और राजनीतिक। ये कार्य किसी समाज की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग या समान संरचनाओं द्वारा संपन्न होते हैं — यही अवधारणा अगले खंड, पारिस्थितिक उपागम, से गहराई से जुड़ती है। रिग्स के अनुसार यही कार्यात्मक अपेक्षाएँ प्रशासनिक उप-व्यवस्था पर भी लागू होती हैं।

📌 महत्वपूर्ण जुड़ाव: संरचना-प्रकार्यवादी उपागम और पारिस्थितिक उपागम एक-दूसरे के पूरक हैं — रिग्स ने संरचना-प्रकार्यवादी पद्धति का उपयोग करते हुए ही पारिस्थितिक उपागम में अपना प्रसिद्ध "प्रिज़्मैटिक-साला मॉडल" विकसित किया, जिसे अगले खंड में विस्तार से पढ़ेंगे।

महत्व
  • विभिन्न देशों के प्रशासन की तुलना का साझा ढाँचा देता है — "कौन-सा कार्य कौन कर रहा है"।
  • संस्थाओं के छिपे (गुप्त) प्रभाव और प्रति-प्रकार्य समझने में मदद।
  • तुलनात्मक और विकास प्रशासन की नींव बना।
आलोचना
  • "प्रकार्य" शब्द अस्पष्ट है — किसके लिए उपयोगी और किस अर्थ में, यह साफ़ नहीं।
  • स्थिरता और संतुलन पर अधिक बल, इसलिए यथास्थितिवादी; परिवर्तन और संघर्ष को ठीक से नहीं समझाता।
  • अमूर्त और कठिन शब्दावली; अनुभवजन्य परीक्षण कठिन।
🇮🇳 भारतीय उदाहरण — भारत में संरचना और प्रकार्य

भारत में ग्राम पंचायत एक औपचारिक संरचना है, जिसका प्रकट प्रकार्य स्थानीय विकास और सेवा है; पर इसका गुप्त प्रकार्य गाँव में नए सामाजिक नेतृत्व — जैसे महिलाओं और वंचित वर्गों के प्रतिनिधियों — को उभारना भी रहा है। वहीं, कई जगह परंपरागत जाति-पंचायतें बिना किसी औपचारिक मान्यता के विवाद-निपटारे का कार्य करती हैं — यानी एक ही कार्य औपचारिक और अनौपचारिक, दोनों संरचनाएँ कर रही हैं।

🔑 इस खंड का कीवर्ड सारांश
संरचना
संस्था या ढाँचा
प्रकार्य
समाज के लिए किया गया कार्य
वाल्डो
1955 — लोक प्रशासन में प्रयोग का सुझाव
पार्सन्स
AGIL — अनुकूलन, लक्ष्य, एकीकरण, अनुरक्षण
मर्टन
प्रकट, गुप्त और प्रति-प्रकार्य
रिग्स के 5 कार्य
आर्थिक, सामाजिक, संचारात्मक, प्रतीकात्मक, राजनीतिक

8पारिस्थितिक उपागम (Ecological Approach)

8.1 अर्थ और प्रवर्तक

पारिस्थितिकी (Ecology) मूलतः जीव-विज्ञान का शब्द है, जिसका अर्थ है जीवों और उनके पर्यावरण के बीच संबंध। लोक प्रशासन में इसका अर्थ है — प्रशासनिक तंत्र और उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक पर्यावरण के बीच पारस्परिक संबंध। प्रशासन अपने पर्यावरण से प्रभावित भी होता है और उसे प्रभावित भी करता है।

क्योंकि लोक प्रशासन समाज की एक उप-व्यवस्था है, इसलिए वह बाक़ी उप-व्यवस्थाओं के साथ लगातार क्रिया-प्रतिक्रिया करता है। रिग्स के शब्दों में, "किसी भी प्रशासनिक प्रतिरूप का महत्व उसकी परिस्थिति के भीतर ही होता है।" इस दृष्टि से प्रशासनिक संस्कृति, बड़ी सामाजिक संस्कृति का ही विस्तार है। लोकतंत्र में यह उपागम विशेष उपयोगी है, क्योंकि जनता का सहयोग तभी मिलता है जब प्रशासन लोगों की सामाजिक समस्याओं, मूल्यों और परंपराओं के प्रति जागरूक हो।

पारिस्थितिक उपागम के प्रवर्तकयोगदान
जॉन एम. गॉस (J. M. Gaus, 1947)"Reflections on Public Administration" का अध्याय "Ecology of Government" — प्रशासन के अध्ययन में पारिस्थितिक कारकों (जनसंख्या, स्थान, तकनीक, संसाधन) को शामिल करने वाले प्रथम विद्वान
रॉबर्ट ए. डाल (Robert A. Dahl, 1947)"The Science of Public Administration: Three Problems" — लोक प्रशासन के एक संस्कृति तक सीमित होने की आलोचना; अंतर-सांस्कृतिक अध्ययन की माँग
रॉस्को मार्टिन (Roscoe Martin, 1952)पारिस्थितिक दृष्टिकोण का विस्तार
फ़्रेड डब्ल्यू. रिग्स (Fred W. Riggs, 1961)"The Ecology of Public Administration" (1961) — सबसे प्रमुख प्रतिपादक; तुलनात्मक ढंग से प्रशासन और पर्यावरण की अंतःक्रिया का अध्ययन

गॉस के अनुसार प्रशासन के पारिस्थितिक तत्व हैं — लोग, स्थान (भू-भाग, जलवायु), भौतिक तकनीक, सामाजिक तकनीक, इच्छाएँ और विचार, आपदाएँ, और व्यक्तित्व। उन्होंने कहा कि प्रशासन के विद्यार्थी को वातावरण को इस तरह देखना चाहिए कि उसे समझ आए कि वातावरण की विशेषताएँ प्रशासनिक संस्थाओं को कैसे गढ़ती हैं। डाल ने तीन निष्कर्ष दिए — (1) एक राष्ट्र के अनुभव पर बने सामान्यीकरण सार्वभौमिक नहीं हो सकते; (2) प्रशासन के सिद्धांतों को अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों में परखे बिना सार्वभौमिक नहीं माना जा सकता; (3) इसलिए लोक प्रशासन को वास्तव में अंतर-अनुशासनात्मक और पारिस्थितिक होना चाहिए। 1950 के बाद अमेरिका के तकनीकी सहायता कार्यक्रमों से नए स्वतंत्र देशों के प्रशासन के अध्ययन में रुचि बढ़ी, जिससे तुलनात्मक प्रशासन और पारिस्थितिक उपागम को बल मिला।

8.2 फ़्रेड रिग्स का पारिस्थितिक उपागम

🎓 चिंतक-परिचय — रिग्स का पारिस्थितिक उपागम (Riggs' Ecological Approach)

विचारक/प्रवर्तक: फ़्रेड डब्ल्यू. रिग्स (F. W. Riggs) | वर्ष: 1961 — "The Ecology of Public Administration"; 1964 — "Administration in Developing Countries: The Theory of Prismatic Society"

रिग्स के 5 पारिस्थितिक कारकविवरण
आर्थिक (Economic)वित्तीय व्यवस्था, उत्पादकता का स्तर
सामाजिक (Social)परिवार, वर्ग-संरचना, धर्म
प्रतीकात्मक (Symbolic)मिथक, मूल्य, सामाजिक सहमति
संचारात्मक (Communicative)साक्षरता-दर, मीडिया की पहुँच
राजनीतिक (Political)नेतृत्व की प्रकृति, राजनीतिक व्यवस्था का प्रकार

रिग्स ने समाजों को उनके विकास-स्तर के अनुसार तीन मॉडलों में वर्गीकृत किया — यह वर्गीकरण तुलनात्मक लोक प्रशासन (अध्याय 09) से सीधा जुड़ता है। 1956 में उन्होंने "एग्रेरिया-इंडस्ट्रिया" मॉडल दिया और 1957 में बीच का मॉडल "ट्रांज़िशिया" जोड़ा:

रिग्स का मॉडलप्रकृतिउदाहरण
एग्रेरिया (Agraria)परंपरागत, कृषि-प्रधान समाज — एकल / अ-विभेदित भूमिकाएँ (Fused)शाही चीन (Imperial China)
ट्रांज़िशिया (Transitia) / प्रिज़्मैटिक (Prismatic)संक्रमणकालीन / विकासशील समाज — परंपरा और आधुनिकता का मिश्रण, अतिव्यापी भूमिकाएँ, अस्थिर संस्थाएँफ़िलीपींस, थाईलैंड, भारत जैसे विकासशील देश
इंडस्ट्रिया (Industria)आधुनिक, विकसित समाज — प्रत्येक कार्य हेतु विशिष्ट और विभेदित संस्थाएँ (Diffracted)समकालीन संयुक्त राज्य अमेरिका
एग्रेरिया (कृषि-प्रधान)इंडस्ट्रिया (औद्योगिक)
आरोपित (जन्म से मिले) मूल्यउपलब्धि (योग्यता से अर्जित) मूल्य
विशिष्टवादी मानदंड — अपनों के लिए अलग नियमसार्वभौमिक मानदंड — सबके लिए एक नियम
व्यापक / बिखरे हुए प्रतिरूपविशिष्ट प्रतिरूप
स्थिर स्थानीय समूह, कम गतिशीलताऊँची सामाजिक और भौगोलिक गतिशीलता
सरल, स्थिर व्यवसायविकसित व्यावसायिक व्यवस्था
सम्मान-आधारित स्तरीकरणसमतावादी वर्ग-व्यवस्था

इस मॉडल की आलोचना हुई कि यह संक्रमणकालीन और मिश्रित समाजों को ठीक से नहीं समझाता, एकतरफ़ा विकास मान लेता है और बहुत अमूर्त है। इसलिए रिग्स ने इसे छोड़कर फ़्यूज़्ड-प्रिज़्मैटिक-डिफ़्रैक्टेड मॉडल बनाया। प्रिज़्म की उपमा में — सफ़ेद रोशनी (फ़्यूज़्ड) प्रिज़्म में जाती है, भीतर आधी टूटी अवस्था में रहती है (प्रिज़्मैटिक) और बाहर निकलकर अलग-अलग रंगों में बँट जाती है (डिफ़्रैक्टेड)। फ़्यूज़्ड समाज में एक संरचना बहुत सारे कार्य करती है; डिफ़्रैक्टेड समाज में हर कार्य के लिए अलग संरचना होती है; प्रिज़्मैटिक समाज "अर्ध-विभेदित" होता है। रिग्स के अनुसार कोई समाज पूरी तरह फ़्यूज़्ड या पूरी तरह डिफ़्रैक्टेड नहीं होता।

चित्र 2.6: रिग्स का फ़्यूज़्ड-प्रिज़्मैटिक-डिफ़्रैक्टेड मॉडल
चित्र 2.6: रिग्स का फ़्यूज़्ड-प्रिज़्मैटिक-डिफ़्रैक्टेड मॉडल
विशेषताफ़्यूज़्डप्रिज़्मैटिकडिफ़्रैक्टेड
पद कैसे मिलता हैआरोपण (जन्म से)प्राप्ति (दोनों का मिश्रण)उपलब्धि (योग्यता से)
नियम किस पर लागूविशिष्टवाद (अपनों पर अलग)चयनवाद (कुछ पर लागू, कुछ पर नहीं)सार्वभौमिकता (सब पर समान)
कार्य-विभाजनकार्यात्मक व्यापकताबहु-कार्यात्मकताकार्यात्मक विशिष्टता
अर्थव्यवस्थापुनर्वितरण / वस्तु-विनिमयबाज़ार-कैंटीनबाज़ार अर्थव्यवस्था
प्रशासनिक इकाईचैंबर (Chamber)साला (Sala)ब्यूरो (Bureau)
उदाहरणशाही चीन, क्रांति-पूर्व स्याम (थाईलैंड)भारत, थाईलैंड, फ़िलीपींसअमेरिका

8.3 प्रिज़्मैटिक-साला मॉडल

रिग्स ने विकासशील देशों — विशेषकर प्रिज़्मैटिक समाजों — के प्रशासन को समझने हेतु "प्रिज़्मैटिक-साला मॉडल" (Prismatic-Sala Model) विकसित किया। "साला" (Sala) शब्द ऐसे समाजों की प्रशासनिक उप-व्यवस्था को दर्शाता है, जिसकी तीन प्रमुख विशेषताएँ हैं:

प्रिज़्मैटिक-साला मॉडल की विशेषताएँविवरण
विषमरूपता (Heterogeneity)आधुनिक और परंपरागत प्रथाओं का साथ-साथ अस्तित्व — जैसे शहरों में गगनचुंबी इमारतें और विशेषीकृत एजेंसियाँ, गाँवों में बुज़ुर्गों द्वारा सब भूमिकाएँ; एलोपैथी अस्पतालों के साथ आयुर्वेद, यूनानी केंद्र। "साला" में फ़्यूज़्ड समाज के "चैंबर" और डिफ़्रैक्टेड समाज के "ब्यूरो" दोनों के तत्व होते हैं।
औपचारिकतावाद (Formalism)औपचारिक नियमों और वास्तविक व्यवहार के बीच व्यापक अंतर — नियम काग़ज़ों तक सीमित। अधिकारी कभी नियमों पर अड़ते हैं, कभी उन्हें तोड़ते हैं; इससे भ्रष्टाचार का रास्ता बनता है। संवैधानिक औपचारिकतावाद — संविधान में कुछ, व्यवहार में कुछ और।
अतिव्यापन (Overlapping)एक ही भूमिका या कार्य कई परस्पर-विरोधी प्राधिकारियों द्वारा संपन्न होना; जो व्यवहार "प्रशासनिक" दिखता है, वह असल में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक या पारिवारिक आधार पर तय होता है।

रिग्स ने अतिव्यापन के पाँच पहलू बताए:

💡 सरल भाषा में समझें — प्रिज़्मैटिक समाज

एक ही गाँव में आपको सरकारी कंप्यूटरीकृत ई-मित्र केंद्र भी मिलेगा और बग़ल में पुराने ढंग से चलने वाली पटवारी की चौपाल भी — यानी आधुनिक और परंपरागत दोनों तरीक़े एक साथ, बिखरे हुए चल रहे हैं। किसी काम के लिए नियम-पुस्तिका में कुछ और लिखा है, पर असली व्यवहार में कुछ और होता है (जैसे "आज साहब नहीं हैं, कल आना")। यही है रिग्स का "प्रिज़्मैटिक समाज" — न पूरी तरह पुराना, न पूरी तरह नया, बीच का एक उलझा हुआ मिश्रण, ठीक वैसे ही जैसे कोई प्रिज़्म (त्रिपार्श्व शीशा) सफ़ेद रोशनी को कई रंगों में तोड़ देता है।

📘 आसान परिभाषा — औपचारिकतावाद (Formalism)

शास्त्रीय अर्थ: रिग्स के अनुसार जो औपचारिक रूप से निर्धारित है और जो वास्तव में प्रभावी रूप से किया जाता है — उनके बीच का अंतर; यानी मानदंडों और वास्तविकता के बीच, घोषित उद्देश्य और वास्तविक प्रदर्शन के बीच की दूरी।

सरल भाषा में: क़ानून की किताब में जो लिखा है और ज़मीन पर जो होता है — इन दोनों के बीच जितनी बड़ी खाई, औपचारिकतावाद उतना अधिक। उदाहरण: शहर में भवन-निर्माण के नियम हैं, पर कई इमारतें बिना नक़्शा पास कराए बनती हैं और बाद में "नियमित" कर दी जाती हैं; नशाबंदी के क़ानून के बावजूद शराब बिकती है।

परिवर्तन के प्रकार: रिग्स के अनुसार जब बदलाव का दबाव बाहर से आता है तो वह "बहिर्जनित (Exo-genetic)" परिवर्तन है, भीतर से आए तो "अंतर्जनित (Endo-genetic)", और दोनों से आए तो "सम-जनित (Equi-genetic)"। बाहर से थोपे गए बदलाव वाले "बहि-प्रिज़्मैटिक" समाजों में विषमरूपता, औपचारिकतावाद और अतिव्यापन अधिक होते हैं, क्योंकि वहाँ नई संस्थाएँ पहले बन जाती हैं और व्यवहार बाद में बदलता है। संशोधित सिद्धांत: "Prismatic Society Revisited" (1973) में रिग्स ने केवल "विभेदीकरण" की जगह "विभेदीकरण + एकीकरण" — दो आयाम अपनाए, और समाजों को इयो-, ऑर्थो- और नियो-प्रिज़्मैटिक तथा इयो-, ऑर्थो- और नियो-डिफ़्रैक्टेड में बाँटा। इससे उन्होंने अमेरिका जैसे विकसित समाजों के तनाव (नस्लीय हिंसा, छात्र आंदोलन) को भी समझाने की कोशिश की।

पारिस्थितिक उपागम का महत्व
  • प्रशासन की वास्तविक प्रकृति और क्रियाशीलता को समझने में सहायक।
  • प्रशासनिक व्यवहार को पूर्णतः समझने हेतु पर्यावरणीय कारकों के अध्ययन को प्रोत्साहन।
  • तुलनात्मक लोक प्रशासन और विकासशील देशों की समस्याओं के विश्लेषण में अत्यंत उपयोगी।
  • पश्चिमी सिद्धांतों को आँख मूँदकर विकासशील देशों पर लागू करने के ख़तरे को उजागर किया।
रिग्स के मॉडल की आलोचना
  • कठिन और नई गढ़ी शब्दावली; भौतिक विज्ञानों से उधार लिए शब्द भ्रम पैदा करते हैं।
  • परिवर्तन-उन्मुखता की कमी — हान-बीन ली के अनुसार यह संतुलन-मॉडल है, विकास और बदलाव समझाने में कमज़ोर।
  • मापने योग्य (परिमाणात्मक) सूचकों का अभाव — किसी समाज को कितना प्रिज़्मैटिक कहें, यह तय करना कठिन।
  • नकारात्मक दृष्टि — औपचारिकतावाद के केवल दोष दिखाए; कुछ विद्वानों ने "सकारात्मक औपचारिकतावाद" की बात कही, जिसमें ऊँचे लक्ष्य वास्तविक प्रदर्शन से आगे रखे जाते हैं ताकि सुधार हो।
  • पश्चिम-केंद्रित (Ethnocentric) — डिफ़्रैक्टेड (पूँजीवादी पश्चिमी) मॉडल को ही श्रेष्ठ मान लिया।
🏜️ राजस्थान संदर्भ — पारिस्थितिक उपागम की प्रासंगिकता

भारत — विशेषकर राजस्थान जैसे राज्य — में प्रशासन आज भी आंशिक रूप से "प्रिज़्मैटिक" लक्षण दिखाता है (जैसे गाँवों में पंचायत और पटवारी व्यवस्था का सह-अस्तित्व), परंतु ई-मित्र (राज्य के सभी ज़िलों में ऑनलाइन सेवा-केंद्र), जन सूचना पोर्टल और डिजिटल शासन जैसी पहलें राज्य को धीरे-धीरे "प्रिज़्मैटिक" से "डिफ़्रैक्टेड / इंडस्ट्रिया" प्रकृति की ओर ले जाने का प्रयास हैं — औपचारिकतावाद और अतिव्यापन को कम करके एकरूप, पारदर्शी सेवा-वितरण की दिशा में।

पारिस्थितिक उपागम का महत्व यह है कि यह प्रशासन की वास्तविक प्रकृति और क्रियाशीलता को समझने में सहायक है, प्रशासनिक व्यवहार को पूर्णतः समझने हेतु पर्यावरणीय कारकों के अध्ययन को प्रोत्साहित करता है, तथा तुलनात्मक लोक प्रशासन और वास्तविक दुनिया की चुनौतियों के विश्लेषण में अत्यंत उपयोगी है।

🔑 इस खंड का कीवर्ड सारांश
पारिस्थितिकी
प्रशासन और पर्यावरण का पारस्परिक संबंध
गॉस
1947 — पहले प्रवर्तक
डाल
1947 — संस्कृति-बद्धता की आलोचना
रिग्स
1961 — "The Ecology of Public Administration"
एग्रेरिया-इंडस्ट्रिया
1956; ट्रांज़िशिया 1957
फ़्यूज़्ड
एक संरचना, अनेक कार्य
प्रिज़्मैटिक
अर्ध-विभेदित; संक्रमणकालीन
डिफ़्रैक्टेड
हर कार्य की अलग संरचना
साला
प्रिज़्मैटिक समाज की प्रशासनिक उप-व्यवस्था
तीन विशेषताएँ
विषमरूपता, औपचारिकतावाद, अतिव्यापन
क्लेक्ट
क्लब + सेक्ट
बाज़ार-कैंटीन
मूल्य-अनिश्चितता वाली अर्थव्यवस्था

9पूरक — प्रणाली उपागम (Systems Approach)

📎 पूरक जानकारी — यह खंड क्यों

प्रणाली उपागम पाठ्यक्रम में अलग से नहीं है, पर पारिस्थितिक और संरचना-प्रकार्यवादी उपागम इसी "व्यवस्था" की सोच पर टिके हैं, इसलिए यह पृष्ठभूमि के रूप में दिया गया है।

लुडविग वॉन बर्टलान्फ़ी (Ludwig von Bertalanffy) ने 1950 में "सामान्य प्रणाली सिद्धांत" (General Systems Theory) प्रस्तुत किया, जिसे टैल्कॉट पार्सन्स (समाजशास्त्र), डेविड ईस्टन (राजनीति विज्ञान) तथा चेस्टर बर्नार्ड, हर्बर्ट साइमन और फ़्रेड रिग्स (लोक प्रशासन) ने अपने-अपने क्षेत्रों में लागू किया। एक "प्रणाली" (System) परस्पर-जुड़े, परस्पर-निर्भर भागों का ऐसा समूह है जो एक साझा लक्ष्य की दिशा में मिलकर कार्य करता है।

डेविड ईस्टन का इनपुट-आउटपुट मॉडलविवरण
इनपुट (Input)मानवीय और भौतिक संसाधन (कर्मचारी, धन) तथा सामाजिक माँगें और समर्थन
रूपांतरण प्रक्रिया (Throughput)नीति-निर्माण, समन्वय जैसी आंतरिक प्रक्रियाएँ जो इनपुट को आउटपुट में बदलती हैं
आउटपुट (Output)नीतियाँ, सेवाएँ या विनियम जो समाज को दिए जाते हैं
प्रतिपुष्टि (Feedback)पर्यावरण से प्रतिक्रिया (नागरिक-संतुष्टि, आलोचना) जो भविष्य के इनपुट और प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है
चित्र 2.7: प्रणाली उपागम — ईस्टन का इनपुट-आउटपुट मॉडल
चित्र 2.7: प्रणाली उपागम — ईस्टन का इनपुट-आउटपुट मॉडल
💡 सरल भाषा में समझें — प्रणाली उपागम को शरीर से समझें

हमारा शरीर भी एक "प्रणाली" (System) है — हम भोजन खाते हैं (इनपुट), पेट और आँतें उसे पचाती हैं (रूपांतरण), शरीर को ऊर्जा मिलती है (आउटपुट), और जब ऊर्जा कम होने लगती है तो फिर भूख लगती है जो हमें दोबारा खाना खिलाती है (प्रतिपुष्टि)। ठीक इसी तरह सरकार भी जनता से माँगें और संसाधन लेती है (इनपुट), नीति बनाती है (रूपांतरण), सेवाएँ देती है (आउटपुट), और जनता की प्रतिक्रिया (संतोष या असंतोष) फिर अगली नीति को प्रभावित करती है (प्रतिपुष्टि) — यही एक सतत चलने वाला चक्र है।

लोक प्रशासन एक "खुली व्यवस्था" (Open System) है — यह समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय कारकों के साथ निरंतर अंतःक्रिया करता है (बंद व्यवस्था जैसे थर्मोस्टेट के विपरीत)। यह विभिन्न उप-प्रणालियों (राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी) से मिलकर बना है, जो एक बड़ी "अधि-प्रणाली" (Supra-System) — जैसे भारत सरकार और समग्र भारतीय समाज — के भीतर कार्य करती हैं। लोक-चयन उपागम (Public Choice Approach, विंसेंट ऑस्ट्रॉम, 1960 का दशक) भी इसी दौर में विकसित हुआ, जो राजनीतिक-प्रशासनिक प्रक्रियाओं के अध्ययन हेतु आर्थिक सिद्धांतों का उपयोग करता है — इसे "राजनीति का आर्थिक सिद्धांत" कहा जाता है (विस्तार से अध्याय 01 में नए लोक प्रबंधन के अंतर्गत पढ़ा जा चुका है)।

10सभी सिद्धांतों की तुलना और समय-रेखा

सिद्धांत / उपागमप्रमुख विचारकमूल प्रश्नमुख्य योगदानमुख्य कमी
वैज्ञानिक प्रबंधनटेलरकाम का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा क्या?दक्षता, मापन, मानकीकरणमनुष्य को मशीन माना
मानव संबंधमेयो, फॉलेटमनुष्य को क्या प्रेरित करता है?अनौपचारिक संगठन, मनोबल, भागीदारीसंरचना और संघर्ष की उपेक्षा
व्यवहारवादीसाइमन, बर्नार्डलोग वास्तव में निर्णय कैसे लेते हैं?निर्णय-निर्माण, सीमित तार्किकतामूल्यों की उपेक्षा
संरचना-प्रकार्यवादीपार्सन्स, मर्टनकौन-सी संरचना कौन-सा कार्य करती है?AGIL, प्रकट-गुप्त प्रकार्ययथास्थितिवादी, अस्पष्ट
पारिस्थितिकगॉस, रिग्सपर्यावरण प्रशासन को कैसे गढ़ता है?प्रिज़्मैटिक-साला, तुलनात्मक दृष्टिकठिन शब्दावली, मापन कठिन
❝ लोक और निजी प्रशासन में कोई अंतर नहीं — दोनों को सामान्य सिद्धांतों की आवश्यकता है। ❞ (There is no difference between public and private administration) — (हेनरी फेयोल (Henri Fayol))

समय-रेखा — सिद्धांतों और प्रकाशनों के प्रमुख पड़ाव

वर्ष/अनुच्छेदविषय
1745"ब्यूरोक्रेसी" शब्द — विंसेंट डी गॉर्ने
1895 / 1903"A Piece Rate System" / "Shop Management" — एफ़. डब्ल्यू. टेलर
1910"वैज्ञानिक प्रबंधन" शब्द — लुई ब्रैंडाइस
1911"Principles of Scientific Management" — एफ़. डब्ल्यू. टेलर
1916"General and Industrial Management" (14 सिद्धांत) — हेनरी फेयोल
1922 (अंग्रेज़ी अनुवाद 1947)"अर्थव्यवस्था और समाज" / "The Theory of Social and Economic Organization" — मैक्स वेबर
1924हॉथोर्न — प्रकाश प्रयोग प्रारंभ — वेस्टर्न इलेक्ट्रिक; 1927 से एल्टन मेयो का दल
1927–1932रिले असेंबली, साक्षात्कार और बैंक वायरिंग अध्ययन — एल्टन मेयो टीम
1937"Papers on the Science of Administration" (POSDCoRB) — गुलिक एवं उर्विक
1938"The Functions of the Executive" — चेस्टर बर्नार्ड
1939"Management and the Worker" — रोथलिसबर्गर और डिक्सन
1940"Bureaucratic Structure and Personality" — रॉबर्ट के. मर्टन
1941"Dynamic Administration" (लेखों का संकलन) — मेरी पार्कर फॉलेट
1943आवश्यकता-पदानुक्रम सिद्धांत; "The Elements of Administration" — अब्राहम मैस्लो; लिंडल उर्विक
1946–1947"Proverbs of Administration" / "Administrative Behavior" — हर्बर्ट साइमन
1947"Reflections on Public Administration" ("Ecology of Government"); "Three Problems" — जॉन एम. गॉस; रॉबर्ट डाल
1950सामान्य प्रणाली सिद्धांत — लुडविग वॉन बर्टलान्फ़ी
1950 का दशकAGIL ढाँचा — टैल्कॉट पार्सन्स
1955संरचना-प्रकार्यवाद के लोक प्रशासन में प्रयोग का सुझाव — ड्वाइट वाल्डो
1956–1957एग्रेरिया-इंडस्ट्रिया; ट्रांज़िशिया — फ़्रेड रिग्स
1957"Personality and Organisation" — क्रिस आर्गिरिस
1960थ्योरी X एवं थ्योरी Y — डगलस मैक्ग्रेगर
1961"The Ecology of Public Administration"; "New Patterns of Management" — फ़्रेड रिग्स; रेंसिस लिकर्ट
1964"Administration in Developing Countries: The Theory of Prismatic Society" (प्रिज़्मैटिक-साला मॉडल) — फ़्रेड डब्ल्यू. रिग्स
1973"Prismatic Society Revisited" — फ़्रेड डब्ल्यू. रिग्स
1978अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार — हर्बर्ट साइमन
2020–2026मिशन कर्मयोगी — कर्मयोगी दक्षता मॉडल — भारत सरकार, कार्मिक विभाग / क्षमता-निर्माण आयोग
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