कल्पना कीजिए — सुबह उठते ही आप जिस सड़क पर चलकर स्कूल या दफ़्तर जाते हैं, जिस बिजली से आपका पंखा चलता है, जिस राशन की दुकान से गेहूँ मिलता है, और जिस अस्पताल में आपका इलाज होता है — इन सबके पीछे कोई-न-कोई सरकारी तंत्र काम कर रहा होता है। यह तंत्र अपने-आप नहीं चलता — इसे चलाने, दिशा देने और बेहतर बनाने के तरीक़ों का व्यवस्थित अध्ययन ही लोक प्रशासन (Public Administration) कहलाता है।
अब बाड़मेर ज़िले के एक गाँव के किसान रमेश का एक दिन देखिए। सुबह वह ग्राम पंचायत भवन में ई-मित्र केंद्र पर जाकर अपनी फ़सल-बीमा की स्थिति देखता है। दोपहर में उसकी बेटी सरकारी स्कूल में मध्याह्न भोजन खाती है। शाम को उसकी माँ को पास के स्वास्थ्य केंद्र में निःशुल्क दवा मिलती है। रात को गाँव में बिजली आती है और पानी की टंकी भरती है। रमेश ने पूरे दिन किसी मंत्री को नहीं देखा, किसी क़ानून की किताब नहीं पढ़ी — फिर भी सरकार पूरे दिन उसके साथ थी। यही "काम करती हुई सरकार" (Government in Action) है, जिसे वुडरो विल्सन ने लोक प्रशासन कहा था।
यह अध्याय इसी विषय की नींव है — यहाँ से हम समझेंगे कि यह विषय क्या है, इसकी प्रकृति कैसी है, इसका दायरा कितना बड़ा है, यह कितना महत्वपूर्ण है, और यह विषय पिछले 130 से अधिक वर्षों में किस तरह बदलता हुआ आज सुशासन (Good Governance) और नई लोक सेवा (New Public Service) तक पहुँचा है।
1. अर्थ — प्रशासन एवं लोक प्रशासन; व्यापक और संकुचित दृष्टिकोण
2. प्रशासन, प्रबंधन एवं संगठन में अंतर
3. प्रकृति — व्यापक बनाम प्रबंधकीय दृष्टिकोण; कला, विज्ञान या दर्शन?
4. क्षेत्र — POSDCoRB दृष्टिकोण, विषय-वस्तु दृष्टिकोण, अन्य दृष्टिकोण और अध्ययन के उपागम
5. लोक एवं निजी प्रशासन — अंतर और समानताएँ
6. महत्व — आधुनिक सभ्यता की धुरी; उदारीकरण के दौर में भूमिका; राज्य बनाम बाज़ार बहस
7. विकसित एवं विकासशील समाजों में भूमिका
8. लोक प्रशासन का ऐतिहासिक विकास — एक अनुशासन के रूप में
9. भारत एवं राजस्थान में लोक प्रशासन अध्ययन के पड़ाव
10. नया लोक प्रशासन (New Public Administration) और मिन्नोब्रुक सम्मेलन
11. नया लोक प्रबंधन (New Public Management)
12. सुशासन (Good Governance)
13. नई लोक सेवा (New Public Service)
14. पूरक — उत्तर-आधुनिकतावाद एवं नारीवादी दृष्टिकोण
15. तुलना और समय-रेखा
1अर्थ — प्रशासन एवं लोक प्रशासन (Meaning of Administration & Public Administration)
1.1 "प्रशासन" शब्द का अर्थ
लोक प्रशासन, "प्रशासन" नामक एक बड़ी अवधारणा का ही एक भाग है। इसलिए लोक प्रशासन को समझने से पहले "प्रशासन" शब्द को समझना ज़रूरी है। अंग्रेज़ी शब्द "Administer" लैटिन भाषा के दो शब्दों "ad" (की ओर) तथा "ministrare" (सेवा करना, निर्देशित करना, प्रबंध करना) से मिलकर बना है। अर्थात् मूल रूप से प्रशासन का अर्थ है — सेवा करना, दिशा देना, नियंत्रित करना और मामलों का प्रबंध करना। शाब्दिक रूप से प्रशासन का अर्थ है "मामलों का प्रबंधन", चाहे वे मामले सरकारी हों या निजी।
संस्थागत संदर्भ के आधार पर प्रशासन को दो भागों में बाँटा जाता है — लोक प्रशासन (Public Administration), जो सरकारी परिवेश में कार्य करता है, तथा निजी प्रशासन (Private Administration), जो व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में कार्य करता है। प्रशासन को "सामाजिक संबंधों की एक तकनीक" (Technology of Social Relationships) भी कहा जाता है — यह एक लक्ष्योन्मुखी, उद्देश्यपूर्ण एवं सहकारी मानवीय प्रयास है। प्रशासन एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है — परिवार, विद्यालय, अस्पताल, कंपनी, सेना और सरकार, हर जगह किसी-न-किसी रूप में प्रशासन होता है।
| विद्वान | प्रशासन की परिभाषा |
|---|---|
| ई. एन. ग्लैडन (E. N. Gladden) | प्रशासन एक लंबा और थोड़ा भारी शब्द है, परंतु इसका विनम्र अर्थ है — लोगों की देखभाल करना और मामलों का प्रबंध करना; यह किसी सचेत उद्देश्य की पूर्ति के लिए उठाया गया दृढ़ कदम है। |
| फेलिक्स ए. नाइग्रो (Felix A. Nigro) | प्रशासन किसी उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु मनुष्यों एवं सामग्री का संगठन एवं उपयोग है। |
| एल. डी. व्हाइट (L. D. White) | प्रशासन की कला किसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अनेक व्यक्तियों का निर्देशन, समन्वय एवं नियंत्रण है। |
| फिफनर और प्रेस्थस (Pfiffner & Presthus) | प्रशासन वांछित आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मानवीय और भौतिक संसाधनों का संगठन एवं निर्देशन है। |
| लूथर गुलिक (Luther Gulick) | प्रशासन का संबंध कार्य सम्पन्न कराने से है — निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति से। |
| हर्बर्ट साइमन (Herbert A. Simon) | अपने व्यापकतम अर्थ में प्रशासन को साझा लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सहयोग करने वाले समूहों की गतिविधियों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। |
| जॉन ए. वेग (John A. Vieg) | प्रशासन किसी सचेत उद्देश्य की पूर्ति के लिए उठाया गया दृढ़ कदम है — मामलों का व्यवस्थित क्रम और संसाधनों का सोचा-समझा उपयोग, ताकि जो हम चाहते हैं वह हो और जो नहीं चाहते वह रुके। |
| ऑर्डवे टेड (Ordway Tead) | प्रशासन किसी संस्था का केंद्रीय "शक्ति-गृह" (Power House) है, जो उसे अपने उद्देश्य की ओर प्रेरित करता है। |
| ड्वाइट वाल्डो (Dwight Waldo) | प्रशासन उच्च स्तर की तर्कसंगतता वाला सहकारी मानवीय प्रयास है। |
इन सभी परिभाषाओं से स्पष्ट है कि प्रशासन के दो आवश्यक तत्व हैं — सामूहिक प्रयास और साझा उद्देश्य। अर्थात् जब कुछ लोग मिलकर किसी साझा लक्ष्य के लिए योजनाबद्ध ढंग से काम करते हैं, तो वह प्रशासन है। अकेला व्यक्ति अपने घर का बजट बनाए तो वह प्रबंध है, पर जब एक हज़ार कर्मचारी मिलकर पूरे ज़िले में चुनाव कराते हैं, तो वह प्रशासन है।
1.2 लोक प्रशासन का अर्थ और परिभाषाएँ
"लोक" (Public) शब्द का अर्थ यहाँ "सरकार" है — इसलिए लोक प्रशासन का सीधा अर्थ है सरकार का कार्य में परिवर्तित रूप, अर्थात् सरकार सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों को जिस तरह संभालती है, वही लोक प्रशासन है। इसमें लोक-नौकरशाही (Public Bureaucracy), यानी सरकार के प्रशासनिक संगठन, पर विशेष बल दिया जाता है। इसे "सरकारी प्रशासन" (Governmental Administration) भी कहा जाता है। लोक प्रशासन राजनीतिक व्यवस्था के भीतर रहकर राजनीतिक निर्णयकर्ताओं द्वारा तय किए गए लक्ष्यों को पूरा करता है।
| विद्वान | लोक प्रशासन की परिभाषा |
|---|---|
| वुडरो विल्सन (Woodrow Wilson) | सार्वजनिक विधि (क़ानून) का विस्तृत एवं क्रमबद्ध क्रियान्वयन ही लोक प्रशासन है — सामान्य विधि का हर विशिष्ट प्रयोग प्रशासन का एक कार्य है। प्रशासन सरकार का सबसे स्पष्ट भाग है; यह "काम करती हुई सरकार" है। |
| एल. डी. व्हाइट (L. D. White) | लोक प्रशासन में वे सभी संचालन शामिल हैं जिनका उद्देश्य लोक नीति (Public Policy) की पूर्ति अथवा प्रवर्तन है। |
| लूथर गुलिक (Luther Gulick) | लोक प्रशासन प्रशासन-विज्ञान का वह भाग है जिसका संबंध सरकार से है; इसलिए यह मुख्यतः कार्यपालिका शाखा से संबंधित है, जहाँ सरकार का काम होता है। |
| हर्बर्ट साइमन (Herbert A. Simon) | सामान्य प्रयोग में लोक प्रशासन का अर्थ है — राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय सरकारों की कार्यपालिका शाखाओं की गतिविधियाँ। |
| फिफनर (Pfiffner) | लोक प्रशासन सरकार का काम करना है — चाहे वह स्वास्थ्य प्रयोगशाला में एक्स-रे मशीन चलाना हो या टकसाल में सिक्के ढालना। |
| ड्वाइट वाल्डो (Dwight Waldo) | लोक प्रशासन राज्य के कार्यों पर लागू प्रबंध की कला एवं विज्ञान है। |
| मार्शल ई. डिमॉक (M. E. Dimock) | लोक प्रशासन सक्षम अधिकारियों द्वारा घोषित लोक नीति की पूर्ति या प्रवर्तन है; यह "क्रिया में क़ानून" (Law in Action) है — सरकार का कार्यकारी पक्ष। |
| डब्ल्यू. एफ़. विलोबी (W. F. Willoughby) | व्यापकतम अर्थ में प्रशासन सरकार के वास्तविक संचालन का सारा काम है; संकुचित अर्थ में केवल प्रशासनिक शाखा के संचालन — और लोक प्रशासन के विद्यार्थी के रूप में हमारा संबंध संकुचित अर्थ से है। |
| ग्रीनवुड और विल्सन (Greenwood & Wilson) | लोक प्रशासन एक गतिविधि है, संस्थाओं का एक समूह है और अध्ययन का एक विषय भी है। |
| डेविड रोज़नब्लूम (David Rosenbloom) | लोक प्रशासन समाज के लिए नियामक और सेवा-कार्यों हेतु विधायी, कार्यकारी और न्यायिक आदेशों को पूरा करने के लिए प्रबंधकीय, क़ानूनी और राजनीतिक सिद्धांतों तथा प्रक्रियाओं का उपयोग है। |
शास्त्रीय अर्थ: सरकार द्वारा बनाई गई लोक नीति और क़ानूनों को लागू करने के लिए सरकारी संगठन, कर्मचारियों और प्रक्रियाओं की समग्र गतिविधि, तथा इसी गतिविधि का व्यवस्थित अध्ययन।
सरल भाषा में: सरकार जो वादा करती है (नीति), उसे ज़मीन पर उतारने का पूरा काम लोक प्रशासन है — और इस काम को समझने वाला विषय भी लोक प्रशासन कहलाता है। उदाहरण: संसद ने "राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम" बनाया — यह नीति है; पर गोदाम से अनाज उठाना, राशन कार्ड बनाना, दुकान तक पहुँचाना और सही व्यक्ति को सही मात्रा देना — यह लोक प्रशासन है।
1.3 व्यापक और संकुचित दृष्टिकोण
ऊपर की परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि "लोक प्रशासन" शब्द का प्रयोग दो अर्थों में हुआ है — व्यापक अर्थ में और संकुचित अर्थ में।
- 1. व्यापक दृष्टिकोण (Broad Perspective): इसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — सरकार की तीनों शाखाओं की गतिविधियाँ शामिल हैं। इस मत के समर्थक हैं — वुडरो विल्सन, एल. डी. व्हाइट, मार्शल डिमॉक, फेलिक्स नाइग्रो और फिफनर।
- 2. संकुचित दृष्टिकोण (Narrow Perspective): इसमें केवल कार्यपालिका शाखा (Executive Branch) से जुड़ी गतिविधियाँ शामिल हैं — योजना, संगठन, निर्देशन, समन्वय और नियंत्रण जैसे कार्य। इस मत के समर्थक हैं — हर्बर्ट साइमन, लूथर गुलिक, ऑर्डवे टेड, हेनरी फेयोल और विलोबी।
📌 तथ्य-सुधार: कई पुरानी सामग्रियों में गुलिक, साइमन, विलोबी, फेयोल और ऑर्डवे टेड को "व्यापक दृष्टिकोण" का समर्थक लिख दिया जाता है, जो सही नहीं है। ये सभी विद्वान लोक प्रशासन को केवल कार्यपालिका (प्रशासनिक शाखा) की गतिविधि मानते हैं, इसलिए ये संकुचित दृष्टिकोण के समर्थक हैं। व्यापक दृष्टिकोण के समर्थक विल्सन, व्हाइट, डिमॉक, नाइग्रो और फिफनर हैं।

विलोबी ने तो कार्यकारी शक्ति (Executive Power) और प्रशासनिक शक्ति (Administrative Power) में भी अंतर किया और प्रशासन को सरकार की "चौथी शाखा" का दर्जा दे दिया (बाक़ी तीन — विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका)। अल्बर्ट लेपावस्की ने टिप्पणी की कि विलोबी द्वारा प्रशासन को चौथी शाखा मानना, विल्सन द्वारा शुरू किए गए राजनीति-प्रशासन के कठोर पृथक्करण का सबसे चरम, पर शायद सबसे तार्किक परिणाम था।
लोक प्रशासन शब्द के दो और प्रयोग समझना ज़रूरी है। पहला, एक क्रिया (Activity) के रूप में — यानी सरकार के मामलों को चलाने की गतिविधि, जैसे क़ानून-व्यवस्था बनाए रखना, कर वसूलना, सड़क बनाना। दूसरा, एक अध्ययन-विषय (Discipline) के रूप में — यानी समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र या राजनीति विज्ञान की तरह एक शैक्षिक विषय, जो इस गतिविधि का व्यवस्थित अध्ययन करता है। क्रिया के रूप में लोक प्रशासन उतना ही पुराना है जितना राजनीतिक समाज, पर अध्ययन-विषय के रूप में यह लगभग 130-140 वर्ष पुराना है।
लोक प्रशासन के कुछ और महत्वपूर्ण पहलू इस प्रकार हैं:
- यह सरकार की कार्यपालिका शाखा (Executive Branch) की गतिविधियों का मुख्य रूप से अध्ययन है।
- इसमें नीति-निर्माण से लेकर क्रियान्वयन तक की पूरी प्रक्रिया शामिल है — क्योंकि अधिकारी मंत्रियों को नीति बनाने में सलाह भी देते हैं।
- यह एक अंतर-अनुशासनात्मक (Inter-disciplinary) विषय है — राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, प्रबंधन, अर्थशास्त्र, विधि और मनोविज्ञान से जुड़ा हुआ।
- आधुनिक लोक प्रशासन केवल "सरकारी काम" तक सीमित नहीं — सुशासन (Good Governance), पारदर्शिता और जन-भागीदारी भी इसके अभिन्न अंग हैं।
जब आप राशन कार्ड बनवाने पटवारी या ब्लॉक कार्यालय जाते हैं, तब सरकार की नीति (कि गरीब परिवारों को सस्ता अनाज मिलेगा) को ज़मीनी स्तर पर लागू करने का यही व्यावहारिक कार्य लोक प्रशासन है — केवल नीति बनाना नहीं, बल्कि उसे धरातल पर उतारना इसका केंद्र-बिंदु है।
इसी तरह, जब किसी ज़िले में चुनाव होते हैं, तो ज़िला निर्वाचन अधिकारी (कलेक्टर), हज़ारों मतदान कर्मी, पुलिस, परिवहन और शिक्षा विभाग — सब मिलकर काम करते हैं। यह "सामूहिक प्रयास + साझा उद्देश्य" का जीवंत उदाहरण है।
2प्रशासन, प्रबंधन एवं संगठन में अंतर (Administration, Management & Organisation)
ये तीनों शब्द अक्सर एक-दूसरे के स्थान पर प्रयोग किए जाते हैं, परंतु इनके अर्थ में स्पष्ट अंतर है। सरल शब्दों में — प्रशासन लक्ष्य एवं नीतियाँ तय करता है, प्रबंधन उन्हें दक्षतापूर्वक क्रियान्वित करता है, और संगठन वह उपकरण (Tool) है जिसके माध्यम से प्रबंधन उन लक्ष्यों तक पहुँचता है।
मेरी पार्कर फॉलेट के अनुसार, "प्रबंधन दूसरों के माध्यम से कार्य सम्पन्न कराने की कला है", जबकि हेनरी फेयोल के अनुसार प्रबंधन का अर्थ है — पूर्वानुमान लगाना, योजना बनाना, संगठित करना, आदेश देना, समन्वय करना एवं नियंत्रण करना। प्रबंधन संगठन के 5M — मनुष्य (Men), सामग्री (Material), मशीन (Machines), पद्धति (Methods) और धन (Money) — को एक साथ लाकर परिणाम-उन्मुख कार्य करता है।
विलियम शुल्ज़ (William Schulze) ने यह अंतर बहुत स्पष्ट शब्दों में बताया: "प्रशासन वह शक्ति है जो उस उद्देश्य को तय करती है जिसके लिए संगठन और उसका प्रबंधन प्रयास करेंगे, और वे व्यापक नीतियाँ तय करती है जिनके भीतर वे काम करेंगे। संगठन आवश्यक मनुष्यों, सामग्री, औज़ारों, उपकरणों और कार्य-स्थल का ऐसा व्यवस्थित मेल है, जो किसी इच्छित उद्देश्य को पूरा करने के लिए बनाया गया हो। प्रबंधन वह है जो पूर्व-निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संगठन का नेतृत्व, मार्गदर्शन और निर्देशन करता है।"
इसी तरह ओलिवर शेल्डन (Oliver Sheldon) कहते हैं कि प्रशासन उद्योग में नीति-निर्धारण का कार्य है, जबकि प्रबंधन उस नीति को प्रशासन द्वारा तय सीमाओं के भीतर लागू करने का कार्य है। "प्रशासन संगठन को निर्धारित करता है, प्रबंधन उसका उपयोग करता है। प्रशासन लक्ष्य को परिभाषित करता है, प्रबंधन उसकी ओर प्रयास करता है। संगठन प्रबंधन की वह मशीन है जिससे वह प्रशासन द्वारा तय लक्ष्यों को प्राप्त करता है।" इस प्रकार प्रशासन एक व्यापक अवधारणा है, जिसमें संगठन और प्रबंधन दोनों शामिल हैं।

| आधार | प्रशासन (Administration) | प्रबंधन (Management) |
|---|---|---|
| फोकस | नीति-निर्माण एवं रणनीतिक लक्ष्य | नीति क्रियान्वयन एवं परिचालन |
| स्तर | शीर्ष-स्तरीय कार्य | मध्य से निम्न-स्तरीय कार्य |
| प्रकृति | निर्णायक एवं नौकरशाही-प्रधान | कार्यकारी एवं परिचालनात्मक |
| भूमिका | नियम और रूपरेखा तय करना | योजनाओं का क्रियान्वयन और संसाधन प्रबंधन |
| प्रश्न | "क्या" करना है और "क्यों" | "कैसे" करना है |
| संदर्भ | सरकार एवं गैर-लाभकारी क्षेत्र में प्रमुख | लाभ कमाने वाले संगठनों में सामान्य |
📌 ध्यान दें: व्यवहार में प्रशासन और प्रबंधन परस्पर जुड़े और अतिव्यापी (Overlapping) हैं। उच्च स्तर (सरकार, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, निदेशक मंडल) पर प्रशासनिक कार्य अधिक होते हैं, जबकि मध्य और निम्न स्तर (प्रबंधक, अधिकारी, पर्यवेक्षक) पर प्रबंधकीय कार्य अधिक होते हैं। एक ज़िला कलेक्टर नीति के स्तर पर "प्रशासक" है, पर बाढ़ राहत शिविर चलाते समय वही "प्रबंधक" भी है।
चयन समिति और बोर्ड तय करते हैं कि टीम का लक्ष्य विश्व कप जीतना है और किन खिलाड़ियों को चुनना है — यह प्रशासन है। कप्तान और कोच मैदान पर तय करते हैं कि कौन किस क्रम में बल्लेबाज़ी करेगा और किस गेंदबाज़ को कब लाना है — यह प्रबंधन है। ग्यारह खिलाड़ियों, सहायक स्टाफ़, फ़िज़ियो और उपकरणों का पूरा ढाँचा — यह संगठन है।
3प्रकृति — कला, विज्ञान या दर्शन? (Nature of Public Administration)
3.1 व्यापक (समग्र) दृष्टिकोण बनाम प्रबंधकीय दृष्टिकोण
लोक प्रशासन की प्रकृति को समझने के लिए दो प्रमुख दृष्टिकोण हैं — व्यापक या समग्र दृष्टिकोण (Integral View) एवं प्रबंधकीय दृष्टिकोण (Managerial View)।
समग्र दृष्टिकोण के अनुसार किसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए की गई सभी गतिविधियाँ प्रशासन हैं — प्रबंधकीय, तकनीकी, लिपिकीय और शारीरिक (हाथ से किए जाने वाले) — सबका योग। अर्थात् चपरासी से लेकर सर्वोच्च अधिकारी तक, ऊपर से नीचे तक सभी व्यक्तियों की गतिविधियाँ प्रशासन हैं। इस मत के अनुसार प्रशासन संबंधित विभाग की विषय-वस्तु पर निर्भर करता है, यानी स्वास्थ्य विभाग का प्रशासन शिक्षा विभाग के प्रशासन से अलग होगा। एल. डी. व्हाइट और डिमॉक इस मत के समर्थक हैं।
प्रबंधकीय दृष्टिकोण के अनुसार केवल प्रबंधकीय गतिविधियाँ ही प्रशासन हैं — तकनीकी, लिपिकीय और शारीरिक गतिविधियाँ नहीं, क्योंकि वे गैर-प्रबंधकीय हैं। अर्थात् प्रशासन केवल शीर्ष पर बैठे व्यक्तियों की गतिविधि है। इस मत के अनुसार प्रशासन सभी क्षेत्रों में एक जैसा है, क्योंकि प्रबंधन की तकनीकें हर क्षेत्र में समान होती हैं। हर्बर्ट साइमन, स्मिथबर्ग, थॉम्पसन और लूथर गुलिक इस मत के समर्थक हैं।
| आधार | समग्र दृष्टिकोण (Integral View) | प्रबंधकीय दृष्टिकोण (Managerial View) |
|---|---|---|
| परिभाषा | संगठनात्मक उद्देश्यों हेतु सभी क्रियाओं (शारीरिक, लिपिकीय, तकनीकी, प्रबंधकीय) का योग | केवल शीर्ष-स्तरीय प्रबंधकीय निर्णय-प्रक्रिया |
| क्षेत्र | चपरासी से लेकर शीर्ष अधिकारी तक सभी कर्मचारी शामिल | केवल नीति-क्रियान्वयन का प्रबंधन करने वाले शीर्ष अधिकारी |
| विषय-वस्तु | विभाग की विषय-वस्तु के अनुसार प्रशासन बदलता है | प्रबंधन-तकनीक हर क्षेत्र में समान |
| समर्थक | एल. डी. व्हाइट, मार्शल डिमॉक (हेनरी फेयोल, जे. ए. वेग भी इसी झुकाव के माने जाते हैं) | हर्बर्ट साइमन, स्मिथबर्ग, थॉम्पसन, लूथर गुलिक |
| भारतीय प्रासंगिकता | अधिक प्रासंगिक — लगभग 90% कार्य लिपिक (बाबू) स्तर से शुरू होकर ऊपर स्वीकृत होता है | सीमित प्रासंगिकता — केवल उच्च अधिकारियों तक केंद्रित |
वास्तव में इनमें से कोई भी दृष्टिकोण पूरी तरह दोषमुक्त नहीं है; "प्रशासन" का सही अर्थ उस संदर्भ पर निर्भर करता है जिसमें शब्द का प्रयोग हो रहा है। डिमॉक, डिमॉक और कोएनिग ने कहा कि एक अध्ययन के रूप में लोक प्रशासन सरकार द्वारा क़ानून लागू करने के हर प्रयास की जाँच करता है; एक प्रक्रिया के रूप में यह किसी विभाग द्वारा ज़िम्मेदारी संभालने से लेकर "अंतिम ईंट रखे जाने" तक के सभी कदम हैं; और एक व्यवसाय के रूप में यह सरकारी संस्था में दूसरों की गतिविधियों को संगठित और निर्देशित करना है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे विकासशील देशों में लोक प्रशासन का अध्ययन समग्र दृष्टिकोण से करना होगा, क्योंकि यहाँ लिपिक स्तर से शुरू होने वाला लगभग 90 प्रतिशत काम ऊपर जाकर स्वीकृत होता है — इसीलिए "बाबू" को भारतीय प्रशासन की धुरी माना जाता है।
3.2 लोक प्रशासन — कला है, विज्ञान है या दोनों?
दूसरा प्रश्न है — क्या लोक प्रशासन एक कला है, विज्ञान है, या दोनों? "विज्ञान" का अर्थ है ऐसा व्यवस्थित ज्ञान, जो अवलोकन और प्रयोग पर आधारित हो, जिसके नियम सार्वभौमिक हों और जिसके आधार पर भविष्यवाणी की जा सके। "कला" का अर्थ है किसी ज्ञान को व्यवहार में कुशलता से लागू करने का कौशल, जो अभ्यास, अनुभव और रचनात्मकता से आता है। इसे नीचे तुलनात्मक ढंग से समझते हैं:
- चार्ल्स ए. बीयर्ड — इसे एक सुव्यवस्थित ज्ञान-भंडार वाला "सामान्य विज्ञान" मानते हैं।
- लूथर गुलिक — भौतिकी-रसायन की भाँति संगठित सिद्धांतों पर आधारित मानते हैं।
- वुडरो विल्सन और विलोबी ने भी "प्रशासन के विज्ञान" की बात की।
- आधुनिक लोक प्रशासन व्यवहारवादी, तुलनात्मक एवं सांख्यिकीय पद्धतियाँ उपयोग करता है।
- सिद्धांतों के आधार पर भविष्यवाणी (Prediction) संभव है।
- ऑर्डवे टेड, ग्लैडन, चार्ल्सवर्थ — इसे कौशल और अभ्यास पर आधारित मानते हैं।
- नेतृत्व, प्रेरणा और मानवीय अंतःक्रिया आवश्यक — केवल नियम पर्याप्त नहीं।
- ऐतिहासिक उदाहरण — अकबर, नेपोलियन, समुद्रगुप्त, अशोक — अनुभव और सृजनात्मकता की मिसाल।
- संकट प्रबंधन (Crisis Management) में निर्णय और अनुभव ही निर्णायक होते हैं, केवल नियम नहीं।
- हर परिस्थिति अलग होती है — एक ही नियम हर ज़िले में एक जैसा परिणाम नहीं देता।
हर्बर्ट साइमन ने प्रशासनिक सिद्धांतों को महज़ "कहावतें" (Proverbs) कहकर उनकी वैज्ञानिकता पर सवाल उठाया, जबकि रॉबर्ट डाहल ने कहा कि मूल्यों और नैतिकता को प्रशासन से अलग नहीं किया जा सकता। निष्कर्ष यह है कि लोक प्रशासन का दोहरा स्वरूप (Dual Nature) है — यह भौतिकी जैसा ठोस विज्ञान नहीं, बल्कि राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र जैसा एक सामाजिक विज्ञान है, जिसमें विज्ञान (सिद्धांत और संरचना) तथा कला (प्रभावी क्रियान्वयन और नेतृत्व) दोनों का सम्मिश्रण है।
इसके अतिरिक्त, आधुनिक विद्वान इसे एक दर्शन (Philosophy) भी मानते हैं, क्योंकि इसका मूल उद्देश्य केवल दक्षता नहीं बल्कि समाज-सेवा, नैतिक मूल्य एवं जन-कल्याण है। मार्शल डिमॉक ने कहा था कि प्रशासन अब इतना विशाल क्षेत्र बन गया है कि "प्रशासन का दर्शन लगभग जीवन का दर्शन बन गया है।"

एक डॉक्टर चिकित्सा-विज्ञान पढ़ता है — यह विज्ञान है। पर एक ही बीमारी के दो मरीज़ों का इलाज वह उनकी उम्र, स्वभाव और परिस्थिति देखकर अलग-अलग ढंग से करता है — यह कला है। और वह इलाज इसलिए करता है क्योंकि उसका धर्म मरीज़ की भलाई है — यह दर्शन है। एक अच्छा कलेक्टर भी ठीक ऐसा ही होता है — नियम जानता है (विज्ञान), हर मामले को समझदारी से संभालता है (कला), और जनता की सेवा को अपना लक्ष्य मानता है (दर्शन)।
4क्षेत्र (Scope of Public Administration)
लोक प्रशासन के क्षेत्र (Scope) से आशय है — एक क्रिया (Activity) तथा एक अनुशासन (Discipline) दोनों रूप में इसकी प्रमुख चिंताएँ क्या हैं। एक क्रिया के रूप में यह कल्याणकारी सेवाएँ देता है, राजकीय उद्योगों का प्रबंधन करता है, निजी उद्योगों को विनियमित करता है तथा लोक-नीतियों को क्रियान्वित करता है — यह व्यापक क्षेत्र आधुनिक राज्य की विस्तृत भूमिका को दर्शाता है। एक अध्ययन-विषय के रूप में इसके क्षेत्र को लेकर दो प्रमुख विचार हैं — POSDCoRB दृष्टिकोण और विषय-वस्तु दृष्टिकोण।
4.1 POSDCoRB दृष्टिकोण (POSDCoRB View)
1937 में लूथर गुलिक (Luther Gulick) ने लिंडल उर्विक (Lyndall Urwick) के साथ संपादित ग्रंथ "Papers on the Science of Administration" में प्रशासन के कार्यों को व्यवस्थित रूप से सात भागों में बाँटा — इसे ही POSDCoRB कहा जाता है। गुलिक इन्हें "मुख्य कार्यपालक के कार्य" मानते थे। यह शब्द इन सात कार्यों के अंग्रेज़ी नामों के पहले अक्षरों से बना है:
| अक्षर | कार्य (Function) | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|---|
| P | योजना (Planning) | क्या करना है और कैसे करना है, इसकी मोटी रूपरेखा बनाना, ताकि संस्था का उद्देश्य पूरा हो। |
| O | संगठन (Organizing) | सत्ता का औपचारिक ढाँचा बनाना, जिसमें काम के उप-भाग तय, परिभाषित और समन्वित हों; लक्ष्यों को उप-लक्ष्यों में बाँटना। |
| S | कार्मिक / नियुक्ति (Staffing) | कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण एवं अनुकूल कार्य-परिस्थितियाँ सुनिश्चित करना — पूरा कार्मिक-कार्य। |
| D | निर्देशन (Directing) | लगातार निर्णय लेना, उन्हें आदेशों और निर्देशों में बदलना, और संस्था का नेतृत्व करना। |
| Co | समन्वय (Coordinating) | काम के विभिन्न हिस्सों को आपस में जोड़ने का अत्यंत महत्वपूर्ण कर्तव्य। |
| R | प्रतिवेदन (Reporting) | जिनके प्रति कार्यपालक उत्तरदायी है, उन्हें प्रगति की जानकारी देना — रिकॉर्ड, शोध और निरीक्षण के माध्यम से। |
| B | बजट-निर्माण (Budgeting) | वित्तीय योजना, लेखा और नियंत्रण के रूप में बजट से जुड़ा सारा काम। |

- एकता, निश्चितता और स्पष्टता प्रदान करता है।
- संगठनात्मक गतिविधियों को स्पष्ट रूप से विभाजित करता है।
- दक्षता और प्रभावशीलता बढ़ाता है।
- प्रशासन के अध्ययन को एक व्यवस्थित ढाँचा देता है — हर विभाग पर लागू किया जा सकता है।
- निर्णय-प्रक्रिया की उपेक्षा करता है — यह कार्यों की सूची तो देता है, पर यह नहीं बताता कि निर्णय कैसे लिए जाएँ।
- केवल शीर्ष प्रबंधन तकनीकों पर केंद्रित, निम्न स्तर की उपेक्षा।
- विषय-वस्तु ज्ञान (जैसे रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा) की उपेक्षा करता है।
- मानवीय पक्ष, प्रेरणा और अनौपचारिक संगठन की उपेक्षा — यह "तकनीक-केंद्रित" है, "विषय-केंद्रित" नहीं।
"योगी संत काशी में नित्य सरोवर को प्रणाम कर बढ़ते हैं" — योजना, संगठन, कार्मिक, निर्देशन, समन्वय, प्रतिवेदन, बजट। (क्रम वही है जो अंग्रेज़ी शब्द POSDCoRB में है।)
4.2 विषय-वस्तु दृष्टिकोण (Subject-Matter View)
POSDCoRB दृष्टिकोण लंबे समय तक स्वीकार किया गया, पर समय के साथ इसके विरुद्ध प्रतिक्रिया हुई। यह महसूस किया गया कि POSDCoRB की गतिविधियाँ (तकनीकें) न तो पूरा लोक प्रशासन हैं, न ही उसका सबसे महत्वपूर्ण भाग। यह दृष्टिकोण मान लेता है कि हर विभाग की समस्याएँ एक जैसी हैं, चाहे उसका काम कुछ भी हो — जबकि वास्तव में अलग-अलग विभागों की समस्याएँ अलग-अलग होती हैं।
इस दृष्टिकोण के अनुसार प्रशासन केवल प्रबंधकीय तकनीकों तक सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षेत्र (रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, क़ानून-व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा) को अपनी विशेष तकनीक की आवश्यकता होती है। प्रशासन का असली "सार" जनता को दी जाने वाली सेवाएँ हैं। हर विभाग का अपना एक "स्थानीय POSDCoRB" होता है, जो उसकी विषय-वस्तु से तय होता है। इसलिए POSDCoRB दृष्टिकोण "तकनीक-केंद्रित" है, जबकि विषय-वस्तु दृष्टिकोण "सेवा-केंद्रित" या "विषय-केंद्रित" है।
परंतु ये दोनों दृष्टिकोण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। लुईस मेरियम (Lewis Meriam) ने इसे कैंची के दो ब्लेड से समझाया — "लोक प्रशासन दो ब्लेड वाली कैंची जैसा उपकरण है; एक ब्लेड POSDCoRB के क्षेत्रों का ज्ञान है, दूसरा उस विषय-वस्तु का ज्ञान जिसमें ये तकनीकें लागू होती हैं। प्रभावी उपकरण के लिए दोनों ब्लेड अच्छे होने चाहिए।" एम. ई. डिमॉक (M. E. Dimock) ने इसे "क्या" (What — विषय-ज्ञान) और "कैसे" (How — प्रबंधन की तकनीक) के रूप में समझाया — "प्रत्येक अनिवार्य है; दोनों मिलकर वह संश्लेषण बनाते हैं जिसे प्रशासन कहते हैं।"

4.3 क्षेत्र संबंधी अन्य दृष्टिकोण
| दृष्टिकोण | प्रमुख समर्थक | मुख्य विचार |
|---|---|---|
| कल्याणकारी दृष्टिकोण (Welfare-Oriented View) | एल. डी. व्हाइट, यहेज़केल ड्रोर | राज्य और प्रशासन में कोई भेद नहीं — उद्देश्य जन-कल्याण है। |
| लोक-नीति दृष्टिकोण (Public Policy View) | यहेज़केल ड्रोर, एल. डी. व्हाइट | प्रशासन केवल नीति-क्रियान्वयन तक सीमित नहीं, नीति-निर्माण में भी इसकी भूमिका है। |
| तुलनात्मक लोक प्रशासन दृष्टिकोण (Comparative View) | फ़्रेड रिग्स, फ़ेरल हेडी, रॉबर्ट डाहल | "जब तक लोक प्रशासन तुलनात्मक नहीं बनता, विज्ञान होने का उसका दावा खोखला है" — डाहल। |
| मनो-सामाजिक दृष्टिकोण (Psychosocial View) | व्यवहारवादी विद्वान | प्रशासन निर्वात में नहीं, सभ्यता-संस्कृति-मूल्यों के प्रभाव में कार्य करता है। |
| आधुनिक दृष्टिकोण (एम. पी. शर्मा का मत) | डॉ. एम. पी. शर्मा | प्रशासनिक संरचना, कार्य, लोक निगम एवं नियंत्रण-तंत्र — चारों स्तरों को शामिल करता है। |
प्रशासन के कार्यों के कुछ अन्य वर्गीकरण भी दिए गए हैं। वॉकर का वर्गीकरण (Walker's Classification) प्रशासन को राजनीतिक, विधिक, वित्तीय, रक्षा, शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक प्रशासन आदि लगभग दस क्षेत्रों में बाँटता है। फेयोल के 6 तत्व — तकनीकी, वाणिज्यिक, वित्तीय, सुरक्षा, लेखांकन एवं प्रशासनिक कार्य — ये छह तत्व मिलकर किसी उद्यम के संचालन को पूरा करते हैं, जिनमें प्रशासनिक कार्य सबसे महत्वपूर्ण है।
एक अध्ययन-विषय के रूप में आज लोक प्रशासन की पाँच प्रमुख शाखाएँ मानी जाती हैं: (1) संगठन सिद्धांत और संगठनात्मक व्यवहार, (2) लोक कार्मिक प्रशासन, (3) लोक वित्तीय प्रशासन, (4) तुलनात्मक एवं विकास प्रशासन, और (5) लोक नीति विश्लेषण। इस पुस्तक के आगे के अध्याय इन्हीं शाखाओं के विभिन्न विषयों पर आधारित हैं।
1. दार्शनिक उपागम (Philosophical Approach): सबसे पुराना और व्यापक उपागम — यह बताता है कि प्रशासन "कैसा होना चाहिए"। प्लेटो का "रिपब्लिक", हॉब्स का "लेवियाथन", लॉक का "सिविल गवर्नमेंट पर निबंध", महाभारत का "शांति पर्व" और स्वामी विवेकानंद के विचार इसके उदाहरण हैं।
2. विधिक उपागम (Legal / Juristic Approach): यूरोप (फ़्रांस, जर्मनी, बेल्जियम) में लोकप्रिय; अमेरिका में फ़्रैंक गुडनाउ इसके प्रमुख समर्थक। यह संविधान, क़ानून, अधिकारियों की शक्तियों और सीमाओं पर बल देता है। "अहस्तक्षेप" (Laissez Faire) के युग में, जब राज्य के कार्य सीमित थे, यह सबसे लोकप्रिय था।
3. ऐतिहासिक उपागम (Historical Approach): अतीत की प्रशासनिक घटनाओं के माध्यम से वर्तमान को समझना। एल. डी. व्हाइट की अमेरिकी प्रशासन पर चार ऐतिहासिक पुस्तकें, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, मुग़ल और ब्रिटिश प्रशासन पर ग्रंथ इसके उदाहरण हैं।
4. केस-अध्ययन उपागम (Case Method): किसी प्रशासक के किसी विशेष निर्णय तक पहुँचने वाली घटनाओं का विस्तृत वर्णन। 1930 के दशक में अमेरिका में लोकप्रिय हुआ; भारत में भारतीय लोक प्रशासन संस्थान और लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (मसूरी) ने अनेक केस-अध्ययन प्रकाशित किए।
5. अन्य उपागम: संरचनात्मक, मानव संबंध, व्यवहारवादी, प्रणाली, तुलनात्मक, पारिस्थितिक, विकास और लोक-चयन उपागम — इनका विस्तृत अध्ययन अध्याय 02 और 03 में है।
तथ्य-मूल्य के आधार पर सभी उपागम दो वर्गों में आते हैं — अनुभवजन्य (Empirical), जो बताता है कि प्रशासन "क्या है", और मानकीय (Normative), जो बताता है कि प्रशासन "क्या होना चाहिए"।
5लोक एवं निजी प्रशासन — अंतर और समानताएँ (Public vs Private Administration)
लोक प्रशासन सरकारी परिवेश में काम करता है, जबकि निजी प्रशासन गैर-सरकारी परिवेश, यानी व्यावसायिक उद्यमों में। इसलिए इन्हें क्रमशः सरकारी प्रशासन और व्यावसायिक प्रशासन भी कहा जाता है। दोनों में अंतर मुख्यतः उस वातावरण (संस्थागत परिवेश) का है जिसमें वे काम करते हैं। इस प्रश्न पर विद्वान दो खेमों में बँटे हैं — एक खेमा दोनों को अलग मानता है (पॉल एपलबी, जोशिया स्टाम्प, हर्बर्ट साइमन, पीटर ड्रकर), जबकि दूसरा खेमा दोनों को मूलतः एक मानता है (हेनरी फेयोल, मेरी पार्कर फॉलेट, लिंडल उर्विक)।
5.1 अंतर पर विद्वानों के मत
| विद्वान | अंतर के आधार |
|---|---|
| पॉल एच. एपलबी (Paul H. Appleby) | तीन आधार — (1) राजनीतिक चरित्र, (2) कार्यक्षेत्र, प्रभाव और विचार की व्यापकता, (3) सार्वजनिक जवाबदेही। उनके शब्दों में, "सरकारी प्रशासन अन्य सभी प्रशासनिक कार्यों से इस हद तक भिन्न है, जिसका बाहर के लोग अनुमान भी नहीं लगा सकते — क्योंकि इस पर सार्वजनिक निगाह और शोर रहता है।" |
| सर जोशिया स्टाम्प (Sir Josiah Stamp) | चार सिद्धांत — (1) एकरूपता का सिद्धांत, (2) बाहरी वित्तीय नियंत्रण का सिद्धांत, (3) सार्वजनिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत, (4) सेवा-भाव का सिद्धांत। |
| हर्बर्ट साइमन (Herbert A. Simon) | अंतर लोगों की धारणा में है — (1) लोक प्रशासन नौकरशाही वाला, निजी व्यवसाय-जैसा; (2) लोक प्रशासन राजनीतिक, निजी गैर-राजनीतिक; (3) लोक प्रशासन में लालफ़ीताशाही, निजी इससे मुक्त। |
| पीटर ड्रकर (Peter Drucker) | सेवा-संस्था (सरकार) व्यावसायिक संस्था से मूलतः भिन्न है — "इसका उद्देश्य अलग है, मूल्य अलग हैं, लक्ष्य अलग हैं और समाज में इसका योगदान अलग है।" |
5.2 प्रमुख अंतर
| आधार | लोक प्रशासन (Public) | निजी प्रशासन (Private) |
|---|---|---|
| राजनीतिक निर्देशन | राजनीतिक नियंत्रण के अधीन — यही प्राथमिक अंतर है | राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त |
| जवाबदेही | जनता, विधायिका, मीडिया और न्यायालय के प्रति जवाबदेह | निजी मालिकों / शेयरधारकों के प्रति जवाबदेह |
| एकरूपता का सिद्धांत | समान क़ानूनों से शासित, सबसे एक जैसा व्यवहार अनिवार्य | वरीयतापूर्ण व्यवहार संभव (जैसे विशेष ग्राहक को छूट) |
| वित्तीय नियंत्रण | विधायिका द्वारा वित्त नियंत्रित (बाहरी नियंत्रण) | स्वतंत्र रूप से वित्त प्रबंधन |
| सेवा-उद्देश्य | जन-कल्याण और सामुदायिक सेवा | लाभ-अधिकतमीकरण |
| क़ानूनी ढाँचा | कठोर क़ानूनी ढाँचे में कार्य — इसलिए कम लचीलापन | परिचालन में अधिक लचीलापन |
| कार्यों की प्रकृति | अधिक व्यापक, अधिक आवश्यक, कई बार एकाधिकार (जैसे रक्षा) | सीमित, प्रतिस्पर्धी |
| गुमनामी (Anonymity) | गुमनामी के सिद्धांत से युक्त — मंत्री ज़िम्मेदारी लेता है | गुमनामी नहीं; प्रबंधक सीधे उत्तरदायी |
| दक्षता मापन | प्रशासनिक, नीतिगत और सेवा-दक्षता से मापन (पीटर सेल्फ़) | संसाधन-उपयोग और लाभ से मापन |
दक्षता मापन का अंतर विशेष ध्यान देने योग्य है। निजी प्रशासन में दक्षता का मापदंड सीधा है — कितना लगाया और कितना लाभ कमाया (इनपुट-आउटपुट संबंध)। पर लोक प्रशासन में यह मापदंड पर्याप्त नहीं है। पीटर सेल्फ़ (Peter Self) के अनुसार लोक प्रशासन में तीन प्रकार की दक्षता प्रासंगिक है — (1) प्रशासनिक या प्रबंधकीय दक्षता, जैसी निजी क्षेत्र में होती है; (2) नीतिगत दक्षता, यानी सही निर्णय और सही कार्यक्रम चुनना; और (3) सेवा दक्षता, यानी नागरिक की संतुष्टि और विकास। एक सरकारी अस्पताल घाटे में चलकर भी "दक्ष" हो सकता है, अगर वह गरीबों का अच्छा इलाज कर रहा है।
5.3 समानताएँ
हेनरी फेयोल, मेरी पार्कर फॉलेट और उर्विक जैसे विद्वान मानते हैं कि दोनों में कोई मौलिक भेद नहीं है। फेयोल ने कहा था कि सभी उद्यमों को योजना, संगठन, आदेश, समन्वय और नियंत्रण की ज़रूरत होती है, और सबको समान सामान्य सिद्धांतों का पालन करना पड़ता है — "अब हमारे सामने कई प्रशासनिक विज्ञान नहीं, बल्कि एक ही विज्ञान है जो सार्वजनिक और निजी, दोनों मामलों पर समान रूप से लागू होता है।" उर्विक ने व्यंग्य में कहा कि बैंकरों की अलग जैव-रसायन या प्रोफ़ेसरों की अलग शरीर-क्रिया की कल्पना जितनी बेतुकी है, उतनी ही प्रबंधन के अध्ययन को उद्यम के प्रकार के अनुसार बाँटना।
- प्रबंधकीय तकनीक और कौशल — योजना, संगठन, समन्वय, नियंत्रण — दोनों में समान।
- लेखा, फ़ाइलिंग, आँकड़े और भंडारण की प्रक्रियाओं में एकरूपता।
- दोनों पदानुक्रम (Hierarchy / Scalar Chain) के सिद्धांत पर संगठित।
- संगठन, कार्मिक और वित्त की समस्याएँ दोनों में मिलती-जुलती।
- कर्मचारियों का आदान-प्रदान — इसीलिए हैदराबाद का "एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ़ कॉलेज ऑफ़ इंडिया" दोनों क्षेत्रों के लिए साझा प्रशिक्षण देता है।
- सार्वजनिक निगम (Public Corporation) — फिफनर-प्रेस्थस के शब्दों में "व्यावसायिक प्रतिरूप और पारंपरिक सरकारी विभाग के बीच का आधा रास्ता"।
- सरकार निजी क्षेत्र से प्रदर्शन-मापन, ग्राहक-सेवा और तकनीक सीख रही है।
- निजी क्षेत्र पर सरकारी नियमन — उपभोक्ता संरक्षण, पर्यावरण, श्रम-क़ानून।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) — सड़कें, हवाई अड्डे, बिजली।
📌 वैश्वीकरण का प्रभाव: उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण तथा सूचना-प्रौद्योगिकी क्रांति के कारण लोक और निजी प्रशासन के बीच की रेखा तेज़ी से धुँधली होती जा रही है — सरकारें अब सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) के माध्यम से व्यवसाय-सदृश प्रथाएँ अपना रही हैं, और निजी कंपनियाँ कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के माध्यम से जन-कल्याण में भागीदारी कर रही हैं।
एक निजी कूरियर कंपनी चाहे तो केवल बड़े शहरों में सेवा दे और दूर-दराज़ के गाँवों को छोड़ दे, क्योंकि वहाँ लाभ नहीं है। पर भारतीय डाक विभाग को जैसलमेर की सीमांत ढाणी तक भी उसी दर पर चिट्ठी पहुँचानी होती है जिस दर पर जयपुर में — यही "एकरूपता का सिद्धांत" और "सेवा-भाव" है। साथ ही, डाक विभाग का बजट संसद से पास होता है (बाहरी वित्तीय नियंत्रण) और उस पर संसद में प्रश्न पूछे जा सकते हैं (सार्वजनिक जवाबदेही)।
6महत्व — आधुनिक सभ्यता की धुरी (Significance of Public Administration)
लोक प्रशासन को आधुनिक सभ्यता की धुरी कहा जाता है — "लोक प्रशासन = सामाजिक न्याय + विकास + सेवा"। यह नागरिकों के जीवन के हर पहलू को प्रभावित करता है। आधुनिक समाज में जिस "प्रशासनिक राज्य" (Administrative State) का उदय हुआ है, उसमें व्यक्ति की "गर्भ से कब्र तक" (Womb to Tomb) हर गतिविधि किसी-न-किसी सरकारी एजेंसी से जुड़ी होती है — जन्म प्रमाण-पत्र से लेकर मृत्यु प्रमाण-पत्र तक।
6.1 विद्वानों के मत
| विद्वान | कथन / महत्व |
|---|---|
| प्रो. वालेस बी. डोनहम (Wallace B. Donham) | यदि हमारी सभ्यता विफल होती है, तो इसका प्रमुख कारण प्रशासन का टूट जाना होगा। |
| चार्ल्स ए. बीयर्ड (Charles A. Beard) | प्रशासन से बढ़कर कोई विषय महत्वपूर्ण नहीं — सभ्य शासन और स्वयं सभ्यता का भविष्य प्रशासन के विज्ञान, दर्शन और व्यवहार को विकसित करने की हमारी क्षमता पर निर्भर है। |
| अरस्तू (Aristotle) | राज्य का जन्म जीवन के लिए हुआ, और वह एक अच्छे जीवन के लिए बना रहता है। |
| हरमन फ़ाइनर (Herman Finer) | आधुनिक सरकार की मुख्य विशेषता उसकी सकारात्मक प्रकृति है; राज्य हर जगह है, वह शायद ही कोई ख़ाली जगह छोड़ता है। कुशल प्रशासन ही सरकार का मज़बूत स्तंभ है। |
| एडवर्ड वाइडनर (Edward Weidner) | विकास प्रशासन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने का साधन है। |
| मार्शल ई. डिमॉक (Marshall E. Dimock) | हर नागरिक प्रशासन से प्रभावित होता है — वह सेवाएँ प्राप्त करता है और कर चुकाता है। लोकप्रिय सरकार उचित प्रशासन के बिना तकनीकी सभ्यता की जटिलताओं में टिक नहीं सकती। |
| ऑर्डवे टेड (Ordway Tead) | प्रशासन एक नैतिक कार्य है, और प्रशासक इसका नैतिक अभिकर्ता है। |
| सी. पी. भांभरी (C. P. Bhambhri) | लोक प्रशासन के पतन के साथ सभ्यता स्वयं बिखर जाएगी। |
| लॉर्ड ब्राइस (Lord Bryce) | क़ानून तभी सम्मान पाता है जब वह निर्दोष की रक्षा करे और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करे। |
| पॉल एच. एपलबी (Paul H. Appleby) | प्रशासन सरकार का आधार है; प्रशासन के बिना सरकार केवल एक "वाद-विवाद क्लब" रह जाएगी। |
| रैम्से म्योर (Ramsay Muir) | सरकारें आती-जाती रहती हैं, मंत्री उठते-गिरते रहते हैं, पर देश का प्रशासन सदा चलता रहता है। |
| अलेक्ज़ेंडर पोप (Alexander Pope) | शासन के रूपों पर मूर्ख झगड़ते रहें — जो सबसे अच्छी तरह प्रशासित है, वही सबसे अच्छा है। |
| पॉल पिगर्स (Paul Pigors) | प्रशासन का मुख्य उद्देश्य समाज में यथास्थिति बनाए रखना है; प्रशासक मूलतः परंपराओं के संरक्षक हैं। (इसके विपरीत ब्रुक्स एडम्स ने प्रशासन को सामाजिक परिवर्तन को सुगम बनाने वाली मानवीय क्षमता माना।) |
| जेराल्ड केडन (Gerald Caiden) | समाज राजनीतिक व्यवस्था पर, और राजनीतिक व्यवस्था प्रशासनिक व्यवस्था पर, अधिकाधिक निर्भर होती जा रही है। |
6.2 महत्व के प्रमुख आयाम
- राज्य का व्यावहारिक पक्ष: जनगणना, क़ानून-व्यवस्था, कर-संग्रहण जैसे जटिल कार्य प्रशासन के बिना असंभव। राजतंत्र हो या लोकतंत्र, पूँजीवादी देश हो या साम्यवादी — प्रशासन हर सरकार का आधार है।
- जन-कल्याण का माध्यम: स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, परिवहन, कृषि — "आधुनिक राज्य = प्रशासनिक राज्य"। रोस्को पाउंड ने कल्याणकारी राज्य को "सेवा राज्य" (Service State) कहा।
- रक्षा, अखंडता और क़ानून प्रवर्तन: बाह्य सुरक्षा (सेना), आंतरिक स्थिरता (पुलिस-न्यायपालिका), साम्प्रदायिक सद्भाव।
- लोकतंत्र का वाहक और संरक्षक: स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव, मानवाधिकार संरक्षण, जन-शिकायत निवारण।
- सामाजिक परिवर्तन का अभिकर्ता: गरीबी, बेरोज़गारी, बाल-श्रम, दहेज, अस्पृश्यता जैसे मुद्दों पर नीति-क्रियान्वयन।
- सभ्यता-संस्कृति का संरक्षक: कला, स्थापत्य, लोक-संगीत और परंपराओं का संरक्षण अब प्रशासन का दायित्व है।
- विकास-प्रशासन: अब प्रशासन केवल क़ानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं, बल्कि लक्ष्य-उन्मुख, नागरिक-केंद्रित विकास प्रशासन है।
- विधि एवं न्याय: संविधान और क़ानूनी ढाँचे के अनुरूप कार्य, न्यायिक निर्णयों का प्रवर्तन।
- औद्योगिक-आर्थिक विकास: औद्योगिक-वित्तीय नीतियों के माध्यम से आधुनिक अर्थव्यवस्था का नियमन।
- रोज़गार का स्रोत: केंद्र, राज्यों, सार्वजनिक उपक्रमों और स्थानीय निकायों को मिलाकर भारत में करोड़ों लोग सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं — "राज्य सबसे बड़ा नियोक्ता है"।
- स्थिरता का स्रोत: क्रांति, चुनाव या तख़्तापलट से सरकार बदलने पर भी प्रशासन निरंतरता बनाए रखता है।
- विशिष्ट विषय के रूप में महत्व: जटिल समाजों के प्रबंधन, सरकारी दक्षता सुधार और विकासशील देशों में प्रासंगिकता के लिए आवश्यक।
जेराल्ड केडन ने अपनी पुस्तक "The Dynamics of Public Administration" में आधुनिक समाज में लोक प्रशासन की आठ महत्वपूर्ण भूमिकाएँ बताईं — (1) राजव्यवस्था का संरक्षण, (2) स्थिरता और व्यवस्था बनाए रखना, (3) सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों का संस्थानीकरण, (4) बड़े पैमाने की व्यावसायिक सेवाओं का प्रबंधन, (5) विकास और आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित करना, (6) समाज के कमज़ोर वर्गों की रक्षा, (7) जनमत का निर्माण, और (8) लोक नीतियों और राजनीतिक प्रवृत्तियों को प्रभावित करना।
6.3 बढ़ते महत्व के कारण
परंपरागत रूप से समाज में लोक प्रशासन की भूमिका सीमित थी, पर आज यह कई गुना बढ़ गई है। एल. डी. व्हाइट ने कहा था, "एक समय था जब लोग सरकार से केवल दमन की अपेक्षा करते थे; फिर वे चाहते थे कि उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए; पर अब वे तरह-तरह की सेवाओं और सुरक्षा की अपेक्षा करते हैं।" इसके प्रमुख कारण हैं:
| कारण | प्रभाव |
|---|---|
| वैज्ञानिक-तकनीकी विकास | "बड़ी सरकार" (Big Government) — प्रशासन की गतिविधियों का भारी विस्तार |
| औद्योगिक क्रांति | नई सामाजिक-आर्थिक समस्याएँ — सरकार को नए दायित्व लेने पड़े |
| कल्याणकारी राज्य का उदय | "पुलिस राज्य" (अहस्तक्षेप पर आधारित नकारात्मक राज्य) की जगह सकारात्मक "सेवा राज्य" |
| आर्थिक नियोजन | कल्याणकारी लक्ष्यों के लिए योजनाबद्ध विकास — प्रशासन की भूमिका बढ़ी |
| जनसंख्या विस्फोट | झुग्गियाँ, खाद्य-कमी, परिवहन जैसी समस्याएँ |
| आधुनिक युद्ध | मानव और भौतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर संग्रहण |
| प्राकृतिक आपदाएँ | बाढ़, सूखा, भूकंप में बचाव और राहत |
| सामाजिक तनाव | वर्ग-संघर्ष, साम्प्रदायिक दंगे — संकट प्रबंधन की ज़रूरत |
शास्त्रीय अर्थ: आधुनिक कल्याणकारी राज्य के कार्यों की विविधता, संख्या और जटिलता बढ़ने से आकांक्षाओं और प्रदर्शन के बीच उत्पन्न गंभीर असंतुलन — यानी पूरी की जाने वाली ज़रूरतों और उन्हें पूरा करने वाली प्रशासनिक मशीनरी की क्षमता के बीच का अंतर।
सरल भाषा में: जनता की उम्मीदें तेज़ दौड़ रही हैं, पर सरकारी मशीनरी धीमे चल रही है — इस दूरी को प्रशासनिक अंतराल कहते हैं। इसे भरने के लिए संरचना, प्रक्रिया और व्यवहार में सुधार (प्रशासनिक विकास) ज़रूरी है। उदाहरण: सरकार हर गाँव में डिजिटल सेवाएँ देने की घोषणा करे, पर गाँव में इंटरनेट, प्रशिक्षित कर्मचारी और बिजली ही न हो।
6.4 उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण (LPG) के दौर में भूमिका
1980 के दशक के आर्थिक सुधारों (और भारत में 1991 के सुधारों) ने विकासशील देशों की सरकारों और नौकरशाही की भूमिका को गहराई से प्रभावित किया — राज्य की भूमिका "निवेशक और स्वामी" से बदलकर "नियामक और पर्यवेक्षक" हो गई। पर इसका अर्थ यह नहीं कि प्रशासन का महत्व घट गया; बल्कि उसका स्वरूप बदल गया।
| राज्य की नई भूमिका | विवरण |
|---|---|
| आर्थिक संवर्धन | कृषि और उद्योग हेतु अवसंरचना का विकास |
| संस्थागत सुदृढ़ीकरण | बैंकों और सहकारी संस्थाओं का आधुनिकीकरण |
| बाज़ार विनियमन | उपभोक्ता संरक्षण हेतु नियामक निकाय (जैसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, बीमा नियामक, दूरसंचार नियामक) |
| मानव संसाधन विकास | शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव संसाधन में निरंतर निवेश |
| आवश्यक वस्तु वितरण | सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से समान वितरण |
| सामाजिक सुरक्षा सुदृढ़ीकरण | आर्थिक उदारीकरण के जोखिमों के विरुद्ध सामाजिक सुरक्षा-जाल |
6.5 राज्य बनाम बाज़ार बहस (State vs Market Debate)
समाज और अर्थव्यवस्था में राज्य और बाज़ार की भूमिका को लेकर बहस उतनी ही पुरानी है जितने "अर्थशास्त्र के जनक" एडम स्मिथ। बीसवीं सदी में चार बड़ी घटनाओं ने राज्य के हस्तक्षेप को बढ़ाया — (1) 1917 की रूसी क्रांति, (2) 1930 के दशक की महामंदी, जिसने बाज़ार की विफलता दिखाई, (3) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का पुनर्निर्माण, और (4) नव-स्वतंत्र देशों द्वारा राज्य-प्रधान विकास का रास्ता अपनाना। 1950 से 1980 तक का समय राज्य-हस्तक्षेप का स्वर्ण-काल था, जब पश्चिम में कीन्स के सिद्धांत के अनुसार सरकारें भारी निवेश कर रही थीं।
1980 के बाद राज्य की भूमिका की आलोचनात्मक समीक्षा हुई। कारण थे — भारी सार्वजनिक व्यय से महँगाई और ऊँचे कर; कल्याणकारी राज्य का वित्तीय संकट; कई विकासशील देशों में बुनियादी सेवाएँ देने में राज्य की विफलता; सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप की नियंत्रित अर्थव्यवस्थाओं का पतन; सीमित राज्य-हस्तक्षेप वाले जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर जैसे देशों की तीव्र प्रगति; और सार्वजनिक उपक्रमों का घाटा। इसका परिणाम था "न्यूनतम राज्य" और "बाज़ार-मित्रता" की प्रवृत्ति। इस बहस का सैद्धांतिक आधार लोक-चयन उपागम (Public Choice Approach) था, जो आगे चलकर नए लोक प्रबंधन का आधार बना।
विश्व बैंक की 1991 की विश्व विकास रिपोर्ट ने "बाज़ार-मित्र" (Market-Friendly) राज्य-हस्तक्षेप का अर्थ समझाया — (1) अनिच्छा से हस्तक्षेप करें, यानी जब तक हस्तक्षेप स्पष्ट रूप से बेहतर न हो, बाज़ार को काम करने दें; (2) हस्तक्षेपों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के अनुशासन में रखें; और (3) खुलकर हस्तक्षेप करें, यानी सरल, पारदर्शी और नियम-आधारित। पर बाज़ार की भी सीमाएँ हैं — विकासशील देशों में बाज़ार अपूर्ण होते हैं, बाज़ार संसाधनों का सर्वोत्तम आवंटन सुनिश्चित नहीं करता, और बाज़ार समता (Equity) की उपेक्षा करता है। इसलिए संतुलित दृष्टिकोण यह है कि जहाँ बाज़ार कुशलता से काम कर सकता है, वहाँ उसे करने दिया जाए, और जहाँ नहीं कर सकता, वहाँ राज्य तुरंत और कुशलता से आगे आए।
विश्व बैंक की 1997 की रिपोर्ट ने कहा कि "राज्य आर्थिक और सामाजिक विकास का केंद्र है — विकास के प्रत्यक्ष प्रदाता के रूप में नहीं, बल्कि एक साझेदार, उत्प्रेरक और सुविधाप्रदाता के रूप में।" इसने हर सरकार के पाँच मूल कार्य बताए — (1) क़ानून की नींव स्थापित करना, (2) व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखना, (3) बुनियादी सामाजिक सेवाओं और अवसंरचना में निवेश, (4) कमज़ोरों की रक्षा, और (5) पर्यावरण की रक्षा।

2020-21 की कोविड-19 महामारी ने दिखाया कि संकट में अंततः लोक प्रशासन ही समाज की रीढ़ होता है। भीलवाड़ा (राजस्थान) में मार्च 2020 में संक्रमण के शुरुआती मामलों के बाद ज़िला प्रशासन ने सख़्त कर्फ़्यू, घर-घर सर्वेक्षण और संपर्क-अनुरेखण (Contact Tracing) अपनाया — इसे "भीलवाड़ा मॉडल" के नाम से सराहा गया। बाद में देशभर में राशन वितरण, प्रवासी मज़दूरों की वापसी और विश्व का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान — सब प्रशासनिक मशीनरी के ज़रिए हुआ।
यह पॉल पिगर्स की उस बात का उल्टा उदाहरण भी है कि प्रशासन केवल "यथास्थिति का रक्षक" होता है — संकट में यही प्रशासन सबसे तेज़ परिवर्तन का वाहक बनता है।
7विकसित एवं विकासशील समाजों में भूमिका (Role in Developed & Developing Societies)
विकासशील समाज (Developing Societies), जिन्हें प्रायः "तृतीय विश्व के देश" (Third World Countries) कहा जाता है, एशिया, अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका के वे राष्ट्र हैं जो कृषि-प्रधान से औद्योगिक अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण के दौर में हैं। फ़्रेड डब्ल्यू. रिग्स (F. W. Riggs) के अनुसार, ये समाज "एग्रेरिया" (कृषि-प्रधान) से "इंडस्ट्रिया" (औद्योगिक) की ओर बढ़ते हुए एक "प्रिज़्मीय समाज" (Prismatic Society) की स्थिति में होते हैं — जहाँ परंपरागत और आधुनिक तत्व साथ-साथ विद्यमान रहते हैं (विस्तार अध्याय 02 में)। भारतीय लोक प्रशासन के विद्वानों का भी यही मत रहा है कि "परिवर्तन की सर्वाधिक तात्कालिक आवश्यकता तथाकथित विकासशील देशों में ही है।"
7.1 विकासशील देशों के प्रशासन की विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| अनुकरणात्मक प्रतिरूप | औपनिवेशिक युग के मॉडलों पर आधारित, न कि स्वदेशी व्यवस्थाओं पर — अधिनायकवादी और अभिजातवादी। |
| कुशल जनशक्ति की भारी कमी | विकास कार्यक्रमों में प्रशिक्षित प्रशासकों और तकनीकी विशेषज्ञता का अभाव। |
| अनुत्पादक कार्यों पर केंद्रित नौकरशाही | नौकरशाह जन-सेवा से अधिक स्व-हित को प्राथमिकता देते हैं। |
| रूप और वास्तविकता में अंतर (औपचारिकतावाद) | नियम मौजूद हैं परंतु व्यवहार में पालन नहीं होता — वेबर-जैसा रूप तो है, पर वास्तविक योग्यता-तंत्र नहीं। |
| नौकरशाही की परिचालन स्वायत्तता | तकनीकी विशेषज्ञता के एकाधिकार से अत्यधिक शक्ति, कमज़ोर संवैधानिक जवाबदेही। |
| राजनीतिक-प्रशासनिक कार्यों का अतिव्यापन | नौकरशाह नीति-निर्माण में हस्तक्षेप करते हैं, प्रशासन और शासन की रेखा धुँधली। |
| विकासात्मक कार्यों में अक्षमता | विरासत में मिली औपनिवेशिक व्यवस्था नियमन और कर-वसूली के लिए कारगर, विकास के लिए नहीं। |
7.2 विकासशील देशों में लोक प्रशासन की भूमिका
विकासशील देशों में लोक प्रशासन की भूमिका बहुआयामी है। पहली भूमिका जन-अपेक्षाओं की पूर्ति की है — शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और आवास जैसी बुनियादी ज़रूरतें। दूसरी, सामाजिक-आर्थिक विकास — कृषि और औद्योगिक विकास तथा भूमि-सुधार। तीसरी, पारंपरिक कार्यों का प्रभावी निष्पादन — क्योंकि क़ानून-व्यवस्था और राजस्व-संग्रहण विकास की पूर्व-शर्तें हैं। चौथी, राष्ट्रीयता की भावना का विकास — साम्प्रदायिक और जातीय तनावों के बीच राष्ट्रीय एकता, उप-राष्ट्रवाद और अलगाववाद की चुनौतियों का सामना। पाँचवीं, लोकतंत्र के अस्तित्व को सहारा देना। इसीलिए विकासशील देशों में प्रशासन को "सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र-निर्माण का उपकरण" कहा जाता है।
7.3 विकासशील देशों हेतु प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता
- नौकरशाही को अधिक उत्तरदायी बनाना — कठोर नियम-बद्ध ढाँचे की बजाय लचीली, कार्य-उन्मुख संस्थाएँ।
- सिविल सेवा का व्यावसायीकरण — आधुनिक भर्ती और प्रशिक्षण पद्धतियाँ।
- नौकरशाही के दृष्टिकोण और मूल्यों में परिवर्तन — जन-केंद्रित बनाना, अभिजातवादी नहीं।
- नियमों का सरलीकरण एवं लालफ़ीताशाही में कमी — सेवाएँ जन-सुलभ बनाना।
- संरचनात्मक सुधार — पदानुक्रम में कमी, विकेंद्रीकरण, सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया।
- तकनीक का समावेश — डिजिटल शासन, उद्देश्यों द्वारा प्रबंधन (Management by Objectives) जैसी तकनीकें।
7.4 विकसित देशों में लोक प्रशासन
विकसित देशों (उच्च सकल घरेलू उत्पाद, उन्नत तकनीक, उच्च जीवन-स्तर) का प्रशासनिक तंत्र औद्योगीकरण, विश्व-युद्धों तथा व्यवहारवादी विज्ञान की प्रगति से विकसित हुआ है। ये देश वेबर के मॉडल पर आधारित विशाल, विशिष्ट नौकरशाही पर निर्भर करते हैं — योग्यता-आधारित चयन, तर्कसंगत निर्णय-प्रक्रिया और पारदर्शी जवाबदेही इसकी पहचान है। कई यूरोपीय देशों को "प्रशासनिक राज्य" (Administrative States) कहा जाता है, क्योंकि उनकी नौकरशाही विनियामक (Regulatory) और सुरक्षा (Security) दोनों भूमिकाएँ निभाती है। फिर भी, समन्वय की कमी, राजनीतिक हस्तक्षेप, आर्थिक मंदी का दबाव और कमज़ोर नियामक निगरानी जैसी चुनौतियाँ वहाँ भी बनी रहती हैं।
| आधार | विकसित समाज (Developed) | विकासशील समाज (Developing) |
|---|---|---|
| भूमिका | सीमित भूमिका — दक्षता हेतु निजी क्षेत्र का विनियमन | अवसंरचना विकास और सामाजिक कल्याण में प्रमुख भूमिका |
| चुनौतियाँ | उन्नत तकनीक से साइबर अपराध जैसी जटिल समस्याएँ | गरीबी, बेरोज़गारी और निम्न उत्पादकता से निपटना |
| प्रभाव | विज्ञान और तकनीक से प्रभावित | अल्पविकसित अर्थव्यवस्था और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से प्रभावित |
| नौकरशाही | व्यावहारिक और उत्पादन-उन्मुख | व्यक्तिगत सत्ता-केंद्रित, लक्ष्य-निर्देशित नहीं |
| संस्कृति | समतावादी-लोकतांत्रिक, असहमति के लिए खुली | पदानुक्रमिक — वरिष्ठों की राय पर सवाल नहीं |
| विधि क्रियान्वयन | प्रभावी क्रियान्वयन क्षमता | कमज़ोर क्रियान्वयन से क़ानून कागज़ों तक सीमित |
| भ्रष्टाचार | अपेक्षाकृत कम | अपेक्षाकृत व्यापक |
| प्रशासनिक भूमिकाएँ | अत्यधिक विशिष्ट और स्पष्ट परिभाषित | अतिव्यापी भूमिकाएँ, नौकरशाही की परिचालन स्वायत्तता |
जनवरी 2018 में शुरू हुआ "आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम" विकासशील समाज में प्रशासन की भूमिका का अच्छा उदाहरण है। इसमें देश के सबसे पिछड़े ज़िलों को चुनकर स्वास्थ्य-पोषण, शिक्षा, कृषि-जल संसाधन, वित्तीय समावेशन-कौशल विकास और बुनियादी ढाँचे पर हर महीने आँकड़ों के आधार पर ज़िलों की रैंकिंग की जाती है। राजस्थान के करौली, धौलपुर, बारां, जैसलमेर और सिरोही इसमें शामिल रहे हैं। इसकी मूल भावना है — प्रतिस्पर्धा (ज़िलों के बीच), सहयोग (केंद्र-राज्य-ज़िला) और समन्वय (विभागों के बीच), जिसमें ज़िला कलेक्टर विकास का मुख्य अभिकर्ता बनता है।
8लोक प्रशासन का ऐतिहासिक विकास — एक अनुशासन के रूप में (Evolution as a Discipline)
लोक प्रशासन समाज के गठन के समय से ही अस्तित्व में रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता के नियोजित नगर, जल-निकास व्यवस्था और अन्नागार बताते हैं कि वहाँ प्रारंभ से ही सुविकसित प्रशासनिक व्यवस्था थी। प्राचीन यूनान के नगर-राज्यों में भी संगठित प्रशासन मिलता है। परंतु एक स्वतंत्र अकादमिक अनुशासन के रूप में इसका उदय वुडरो विल्सन के ऐतिहासिक निबंध "The Study of Administration" (1887) से माना जाता है। इसलिए क्रिया के रूप में लोक प्रशासन हज़ारों वर्ष पुराना है, पर अध्ययन-विषय के रूप में लगभग 140 वर्ष पुराना।
8.1 1887 से पूर्व के प्रशासनिक विचार
| काल / स्रोत | योगदान |
|---|---|
| कौटिल्य का अर्थशास्त्र (भारत) | शासन-कला और राजनीति के प्रारंभिक सिद्धांत — लोक प्रशासन के सिद्धांत, सरकारी तंत्र और कार्मिकों का प्रबंध; कौटिल्य के अनुसार प्रशासन की कला वही अपना सकता है जो प्रशासन के विज्ञान से परिचित हो। |
| अरस्तू की "Politics" (प्राचीन पश्चिम) | शासन की दार्शनिक बुनियाद। |
| मैकियावेली की "The Prince" (मध्यकालीन पश्चिम) | प्रभावी शासन हेतु व्यावहारिक रणनीतियाँ। |
| कैमरेलवाद — जर्मनी और ऑस्ट्रिया (17वीं-18वीं सदी) | राज्य के व्यवस्थित प्रबंधन पर बल; सिविल सेवा के लिए उम्मीदवारों को प्रशिक्षित करने हेतु प्रशासन की संरचना, सिद्धांतों और प्रक्रियाओं का वर्णनात्मक अध्ययन; प्रमुख विचारक: जॉर्ज ज़िंके। |
| हैमिल्टन का "फ़ेडरलिस्ट" (अमेरिका, 18वीं सदी का अंत) | "फ़ेडरलिस्ट" के 72वें निबंध में पहली बार लोक प्रशासन के अर्थ और क्षेत्र की व्याख्या। |
| चार्ल्स-जीन बोनिन (फ़्रांस, 1812) | "Principes d'administration publique" — लोक प्रशासन पर पहला अलग ग्रंथ माना जाता है। |
अध्ययन-विषय के रूप में लोक प्रशासन का जन्म और विकास संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ। इसके पीछे कई कारक थे — (1) एफ़. डब्ल्यू. टेलर का वैज्ञानिक प्रबंधन आंदोलन; (2) उन्नीसवीं सदी का औद्योगीकरण, जिसने बड़े-बड़े संगठनों को जन्म दिया; (3) "पुलिस राज्य" (अहस्तक्षेप) की जगह कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का उदय; (4) "लूट प्रणाली" (Spoils System) के दुष्परिणामों के कारण सरकारी सुधार का आंदोलन; (5) सरकारी गतिविधियों का लगातार विस्तार और कुशलता तथा उत्तरदायित्व के प्रति बढ़ती चिंता; और (6) समाज की बढ़ती जटिलता।
उन्नीसवीं सदी के अमेरिका में "लूट प्रणाली" (Spoils System) चलती थी — चुनाव जीतने वाला दल अपने समर्थकों को सरकारी नौकरियाँ "इनाम" में बाँटता था, योग्यता का कोई मतलब नहीं था। जुलाई 1881 में चार्ल्स गिटो नाम के एक व्यक्ति ने, जो ख़ुद को राष्ट्रपति के चुनाव-प्रचार का हक़दार मानकर सरकारी पद न मिलने से नाराज़ था, राष्ट्रपति जेम्स गारफ़ील्ड को गोली मार दी। कुछ महीनों बाद गारफ़ील्ड की मृत्यु हो गई।
इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और 1883 में "पेंडलटन अधिनियम" (Pendleton Act) पारित हुआ, जिसने योग्यता-आधारित परीक्षा से संघीय नौकरियाँ देने की व्यवस्था शुरू की। इसी सुधार-माहौल में चार वर्ष बाद, 1887 में, प्रिंसटन के युवा प्रोफ़ेसर वुडरो विल्सन ने वह निबंध लिखा जिसने लोक प्रशासन को एक अलग विषय की नींव दी। संयोग से वही विल्सन आगे चलकर (1913-1921) अमेरिका के 28वें राष्ट्रपति बने।
8.2 विकास के चरण — एक दृष्टि में
अध्ययन की सुगमता के लिए 1887 के बाद लोक प्रशासन के विकास को प्रायः पाँच चरणों में बाँटा जाता है, और 1990 के बाद के "शासन (गवर्नेंस) प्रतिमान" को छठे चरण के रूप में जोड़ा जाता है। ये चरण एक-दूसरे पर आंशिक रूप से अतिव्याप्त (Overlapping) हैं:
| चरण (काल) | नाम | प्रमुख विद्वान एवं विशेषताएँ |
|---|---|---|
| I (1887–1926) | राजनीति-प्रशासन द्वैधता (Politics-Administration Dichotomy) | वुडरो विल्सन ("लोक प्रशासन का जनक") — नीति-निर्माण और क्रियान्वयन पृथक; फ़्रैंक गुडनाउ ("Politics and Administration", 1900) — "अमेरिकी लोक प्रशासन का जनक"; एल. डी. व्हाइट (1926) — प्रथम पाठ्यपुस्तक। |
| II (1927–1937) | सिद्धांतों का स्वर्ण-युग (Principles Era) | डब्ल्यू. एफ़. विलोबी (1927); हेनरी फेयोल के 14 सिद्धांत; मैक्स वेबर का नौकरशाही सिद्धांत; गुलिक और उर्विक का POSDCoRB (1937); फॉलेट और मूने-रेले के संगठनात्मक योगदान। |
| III (1938–1947) | चुनौती का युग (Era of Challenge) | चेस्टर बर्नार्ड ("The Functions of the Executive", 1938); हर्बर्ट साइमन का "Proverbs of Administration" (1946) और "Administrative Behavior" (1947, नोबेल पुरस्कार 1978); रॉबर्ट डाहल की आलोचना (1947); एल्टन मेयो के हॉथोर्न प्रयोग — मानव-संबंध उपागम का उदय। |
| IV (1948–1970) | पहचान का संकट (Crisis of Identity) | नव-मानव-संबंध उपागम (आर्गिरिस, मैक्ग्रेगर, लिकर्ट); एफ़. डब्ल्यू. रिग्स का पारिस्थितिक उपागम; तुलनात्मक और विकास प्रशासन; नए लोक प्रशासन (NPA) का उदय; विंसेंट ऑस्ट्रॉम का लोक-चयन उपागम। |
| V (1971–1990 का दशक) | लोक नीति परिप्रेक्ष्य / अंतर-अनुशासनात्मकता एवं परिपक्वता | नीति-विज्ञान, राजनीतिक अर्थशास्त्र और व्यवहार-विज्ञान का समावेश; ड्वाइट वाल्डो ने राजनीति-प्रशासन द्वैधता को "पुराना पड़ चुका मत" (Outworn Credo) बताया। |
| VI (1990 का दशक–वर्तमान) | शासन प्रतिमान (Governance Paradigm) | संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक द्वारा सुशासन को बढ़ावा; उदारीकरण सुधार; नागरिक-केंद्रित शासन; बाज़ार-चालित प्रशासन (NPM); डिजिटल शासन का उदय (डिजिटल इंडिया, आधार, UMANG)। |

"दो सिपाही चुपचाप संकट में नीति से शासन करते हैं" — द्वैधता → सिद्धांत → चुनौती → संकट → नीति → शासन।
वर्ष याद रखें: 1887 (विल्सन) — 1927 (विलोबी) — 1938 (बर्नार्ड) — 1948 (संकट/वाल्डो) — 1971 (नीति, NPA की पुस्तकें) — 1990 (शासन)।
8.3 चरण I — राजनीति-प्रशासन द्वैधता (1887–1926)
यह एक अनुशासन के रूप में लोक प्रशासन के विकास की शुरुआत है। इस चरण का मूल विषय था — राजनीति को प्रशासन से अलग करना, जिसे "राजनीति-प्रशासन द्वैधता" कहा जाता है। यह चरण 1887 में "पॉलिटिकल साइंस क्वार्टरली" में वुडरो विल्सन के निबंध "The Study of Administration" के प्रकाशन से शुरू हुआ। इस निबंध ने लोक प्रशासन के अलग, स्वतंत्र और व्यवस्थित अध्ययन की नींव रखी, इसलिए विल्सन को "लोक प्रशासन का जनक" कहा जाता है।
निबंध: "The Study of Administration" (1887) | अमेरिका के 28वें राष्ट्रपति (1913–1921) | उपाधि: "लोक प्रशासन का जनक"
- राजनीति का संबंध नीति-निर्माण से है, जबकि प्रशासन का संबंध नीति-निर्णयों को लागू करने से — "प्रशासन राजनीति के उचित क्षेत्र से बाहर है; प्रशासनिक प्रश्न राजनीतिक प्रश्न नहीं हैं।"
- उन्होंने प्रशासन को "व्यापार का क्षेत्र" कहा — "प्रशासन का क्षेत्र व्यापार का क्षेत्र है; यह राजनीति की जल्दबाज़ी और संघर्ष से दूर है।"
- उनका प्रसिद्ध तर्क — "संविधान बनाना आसान है, पर उसे चलाना कठिन होता जा रहा है।" इसलिए प्रशासन का एक विज्ञान होना चाहिए।
- प्रशासन के विज्ञान के चार लक्ष्य — (1) सरकार के रास्ते को सीधा करना, (2) उसके काम को अधिक व्यवसाय-जैसा बनाना, (3) उसके संगठन को मज़बूत और शुद्ध करना, (4) उसके कर्तव्यों को कर्तव्य-निष्ठा से सुशोभित करना।
- उन्होंने यूरोपीय (विशेषकर फ़्रांसीसी और जर्मन) प्रशासनिक व्यवस्थाओं से सीखने की बात भी कही — तुलनात्मक लोक प्रशासन का बीज यहीं से पड़ा।
विल्सन की विचारधारा को कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रशासनिक क़ानून के प्राध्यापक फ़्रैंक जे. गुडनाउ ने अपनी पुस्तक "Politics and Administration" (1900) में आगे बढ़ाया। उनके अनुसार "राजनीति का संबंध नीतियों या राज्य की इच्छा की अभिव्यक्ति से है", जबकि "प्रशासन का संबंध इन नीतियों के क्रियान्वयन से है।" इस भेद का आधार शक्ति-पृथक्करण का शास्त्रीय सिद्धांत था। स्पष्ट द्वैधता के कारण गुडनाउ को "अमेरिकी लोक प्रशासन का जनक" कहा जाता है।
बीसवीं सदी के आरंभ में अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने "लोक सेवा आंदोलन" (सरकारी सुधार आंदोलन) में गहरी रुचि ली। अमेरिकन पॉलिटिकल साइंस एसोसिएशन ने अपनी 1914 की रिपोर्ट में कहा कि राजनीति विज्ञान का एक सरोकार सरकारी पदों के लिए विशेषज्ञ तैयार करना भी है। 1926 में एल. डी. व्हाइट की पुस्तक "Introduction to the Study of Public Administration" प्रकाशित हुई, जिसे लोक प्रशासन की पहली पाठ्यपुस्तक माना जाता है। इसके साथ विषय को अकादमिक वैधता मिली और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में इसके पाठ्यक्रम शुरू हुए। व्हाइट ने भी द्वैधता में विश्वास किया और कहा कि लोक प्रशासन का मुख्य उद्देश्य कार्यकुशलता और मितव्ययता है।
8.4 चरण II — प्रशासन के सिद्धांतों का स्वर्ण-युग (1927–1937)
इस चरण में विद्वानों का विश्वास था कि प्रशासन के कुछ सार्वभौमिक सिद्धांत हैं, जिन्हें खोजकर लागू करने से कार्यकुशलता और मितव्ययता बढ़ाई जा सकती है। उनका तर्क था कि "प्रशासन, प्रशासन है" — चाहे काम की प्रकृति या संदर्भ कुछ भी हो। इसलिए उन्होंने दावा किया कि लोक प्रशासन एक विज्ञान है। यह चरण डब्ल्यू. एफ़. विलोबी की पुस्तक "Principles of Public Administration" (1927) से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि "प्रशासन में किसी भी विज्ञान की तरह कुछ मूलभूत, सामान्य रूप से लागू होने वाले सिद्धांत होते हैं।"
| रचना | लेखक | वर्ष |
|---|---|---|
| General and Industrial Management (फ़्रांसीसी मूल; अंग्रेज़ी अनुवाद बाद में) | हेनरी फेयोल | 1916 |
| Creative Experience | मेरी पार्कर फॉलेट | 1924 |
| Principles of Public Administration | डब्ल्यू. एफ़. विलोबी | 1927 |
| Onward Industry | मूने और रेले | 1931 |
| Papers on the Science of Administration (संपादित) | गुलिक और उर्विक | 1937 |
| Principles of Organisation | मूने और रेले | 1939 |
यह चरण गुलिक और उर्विक के "Papers on the Science of Administration" (1937) के साथ अपने शिखर पर पहुँचा। उनका कहना था कि मानव संगठन के अध्ययन से ऐसे सिद्धांत निकाले जा सकते हैं जो किसी भी प्रकार के मानव संगठन पर लागू हों — चाहे उद्यम का उद्देश्य, उसके कर्मचारी या उसकी राजनीतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो। इस चरण में लोक प्रशासन का "लोक" पक्ष लगभग छूट गया और ध्यान पूरी तरह दक्षता पर केंद्रित हो गया; इसलिए इसे "रूढ़िवादिता का चरण" (Stage of Orthodoxy) भी कहा जाता है। इसी चरण में लोक प्रशासन अपनी प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुँचा।
8.5 चरण III — चुनौती का युग (1938–1947)
इस चरण में लोक प्रशासन के दोनों आधार-स्तंभों को चुनौती मिली। पहला, यह तर्क दिया गया कि प्रशासन को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रशासन नीति-निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है — यानी द्वैधता अस्वीकार हुई। दूसरा, प्रशासन के सिद्धांतों को वैज्ञानिक वैधता और सार्वभौमिक प्रासंगिकता के अभाव में "कहावतें" (Proverbs) और "प्राकृतिक भ्रांतियाँ" कहा गया। साथ ही सिद्धांत-उपागम को "यांत्रिक" बताया गया, क्योंकि वह औपचारिक संरचना पर ज़ोर देता था और संगठन के सामाजिक-मनोवैज्ञानिक पक्ष की उपेक्षा करता था। एल्टन मेयो के हॉथोर्न प्रयोगों (1924–1932) ने अनौपचारिक संगठन की भूमिका दिखाकर इस उपागम की नींव हिला दी।
| रचना | लेखक | वर्ष |
|---|---|---|
| The Functions of the Executive | चेस्टर आई. बर्नार्ड | 1938 |
| Elements of Public Administration (संपादित) | एफ़. मॉर्स्टीन मार्क्स | 1946 |
| The Proverbs of Administration (लेख) | हर्बर्ट ए. साइमन | 1946 |
| Administrative Behavior | हर्बर्ट ए. साइमन | 1947 |
| The Science of Public Administration: Three Problems (लेख) | रॉबर्ट डाहल | 1947 |
| The Administrative State | ड्वाइट वाल्डो | 1948 |
हर्बर्ट साइमन सिद्धांतों के सबसे बड़े आलोचक थे। उन्होंने कहा कि "यदि कोई सिद्धांत है, तो वह यह है कि निर्णय-निर्माण प्रशासन का हृदय है।" उन्होंने द्वैधता को अस्वीकार किया और अनुभवजन्य (Empirical) अध्ययन पर ज़ोर दिया। रॉबर्ट डाहल ने कहा कि लोक प्रशासन के विज्ञान के विकास में तीन बाधाएँ हैं — (1) प्रशासन की समस्याओं से मूल्यों (Normative Values) को अलग करना प्रायः असंभव है; (2) मानव व्यवहार को समझे बिना विज्ञान संभव नहीं, और मनुष्यों के व्यक्तित्व अलग-अलग होते हैं; (3) सीमित राष्ट्रीय और ऐतिहासिक संदर्भों के कुछ उदाहरणों से सार्वभौमिक सिद्धांत नहीं बनाए जा सकते। इसलिए उन्होंने तुलनात्मक अध्ययन की वकालत की — "जब तक लोक प्रशासन का अध्ययन तुलनात्मक नहीं होता, तब तक इसका विज्ञान होने का दावा खोखला है।"
8.6 चरण IV — पहचान का संकट (1948–1970)
द्वैधता और सिद्धांतों दोनों के अस्वीकार होने से लोक प्रशासन पहचान के संकट में आ गया — यहाँ तक कि विषय के अस्तित्व पर ही प्रश्न उठने लगा। विद्वानों ने दो तरह से प्रतिक्रिया दी। कुछ विद्वान अपने "मातृ-विषय" राजनीति विज्ञान की ओर लौट गए — जॉन गॉस ने 1950 में लिखा कि "हमारे समय में लोक प्रशासन का सिद्धांत राजनीति का सिद्धांत भी है", और रोस्को मार्टिन ने 1952 में लोक प्रशासन पर राजनीति विज्ञान के "निरंतर प्रभुत्व" की माँग की; पर राजनीति विज्ञानियों ने उन्हें अधिक प्रोत्साहन नहीं दिया। कुछ अन्य विद्वान "प्रशासनिक विज्ञान" (प्रबंधन) की ओर गए और 1956 में "Administrative Science Quarterly" पत्रिका शुरू की। दोनों ही स्थितियों में लोक प्रशासन ने अपनी अलग पहचान खो दी — इसीलिए इसे "पहचान के संकट का चरण" कहा जाता है।
फिर भी यह चरण नई धाराओं के जन्म का भी समय था — (1) आर्गिरिस, मैक्ग्रेगर, लिकर्ट, वॉरेन बेनिस का नव-मानव-संबंध उपागम; (2) तुलनात्मक लोक प्रशासन का विकास — 1960 के दशक में अमेरिकन सोसाइटी फ़ॉर पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के "तुलनात्मक प्रशासन समूह" (Comparative Administration Group) ने, फ़्रेड रिग्स के नेतृत्व में, इसे गति दी; (3) रिग्स का पारिस्थितिक उपागम; (4) एडवर्ड वाइडनर और रिग्स द्वारा विकास प्रशासन की अवधारणा — "विकास प्रशासन" शब्द का सबसे पहले प्रयोग भारतीय प्रशासक यू. एल. गोस्वामी ने 1955 में "इंडियन जर्नल ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन" के एक लेख में किया माना जाता है; (5) रिग्स द्वारा "प्रशासनिक विकास" की अवधारणा; (6) नए लोक प्रशासन का उदय; (7) विंसेंट ऑस्ट्रॉम का लोक-चयन उपागम; और (8) आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य (हैबरमास) का उदय।
8.7 चरण V और VI — लोक नीति परिप्रेक्ष्य से शासन प्रतिमान तक
पाँचवें चरण (1971 से) का मुख्य विषय लोक नीति विश्लेषण है। लोक प्रशासन के विद्वान नीति-विज्ञान, राजनीतिक अर्थशास्त्र, नीति-निर्माण और नीति-विश्लेषण में गहरी रुचि लेने लगे। राजनीति-प्रशासन द्वैधता का पारंपरिक विचार छोड़ दिया गया; ड्वाइट वाल्डो ने निष्कर्ष निकाला कि यह पृथक्करण एक "पुराना पड़ चुका मत" (Outworn Credo) बन गया है। रॉबर्ट टी. गोलम्बियुस्की के अनुसार यह चरण दो विषयों पर आधारित है — (1) सभी या अधिकांश स्तरों पर राजनीति और प्रशासन का आपस में घुलना-मिलना, और (2) सारे प्रशासन का कार्यक्रम-आधारित (Programmatic) चरित्र। इससे लोक प्रशासन अंतर-अनुशासनात्मक बना, सामाजिक प्रासंगिकता बढ़ी और दायरा फैला।
छठा चरण (1990 से) शासन (Governance) प्रतिमान का है, जो पाँचवें चरण के साथ-साथ चल रहा है। इसमें वैश्वीकरण, नागरिक को केंद्र में रखना, और शासन को सरकार, निजी क्षेत्र तथा गैर-लाभकारी संस्थाओं की साझा ज़िम्मेदारी मानना शामिल है — यानी पदानुक्रमिक "सरकार" से क्षैतिज "शासन" की ओर बदलाव। नया लोक प्रबंधन, सुशासन और नई लोक सेवा — तीनों इसी दौर की अवधारणाएँ हैं।
8.8 विद्वानों द्वारा दिए गए अन्य वर्गीकरण
निकोलस हेनरी (Nicholas Henry) ने लोक प्रशासन के बौद्धिक विकास को "प्रतिमानों" (Paradigms) में बाँटा। उनका वर्गीकरण "स्थान" (Locus — विषय कहाँ है, जैसे सरकारी नौकरशाही) और "केंद्र" (Focus — विषय क्या अध्ययन करता है, जैसे सिद्धांत या प्रबंधन) की अवधारणा पर आधारित है:
| प्रतिमान | काल | मुख्य बात |
|---|---|---|
| 1. राजनीति-प्रशासन द्वैधता | 1900–1926 | स्थान पर बल — प्रशासन का स्थान सरकारी नौकरशाही; गुडनाउ, व्हाइट। |
| 2. प्रशासन के सिद्धांत | 1927–1937 | केंद्र पर बल — सार्वभौमिक सिद्धांत, स्थान गौण; विलोबी, गुलिक-उर्विक। |
| 3. राजनीति विज्ञान के रूप में लोक प्रशासन | 1950–1970 | राजनीति विज्ञान का एक "रुचि-क्षेत्र" बनकर रह गया; केंद्र खो गया। |
| 4. प्रबंधन (प्रशासनिक विज्ञान) के रूप में लोक प्रशासन | 1956–1970 | व्यवसाय प्रबंधन के साथ मिलकर तकनीकों पर बल; "Administrative Science Quarterly" (1956)। |
| 5. लोक प्रशासन के रूप में लोक प्रशासन | 1970 से | अलग पहचान की पुनर्प्राप्ति; लोक नीति, संगठन सिद्धांत और प्रबंधन तकनीकें। |
| 6. शासन का उदय (बाद में जोड़ा गया) | 1990 से | पाँचवें के साथ-साथ; सरकार, बाज़ार और नागरिक समाज की साझा ज़िम्मेदारी। |
📌 तथ्य-सुधार: ऊपर दिए गए "छह चरणों" (द्वैधता, सिद्धांत, चुनौती, पहचान-संकट, नीति, शासन) का वर्गीकरण सामान्य कालक्रम-आधारित वर्गीकरण है — इसे निकोलस हेनरी का वर्गीकरण बताना ठीक नहीं। हेनरी का वर्गीकरण अलग है और "स्थान-केंद्र" पर आधारित है, जिसमें "राजनीति विज्ञान के रूप में" और "प्रबंधन के रूप में" लोक प्रशासन जैसे प्रतिमान हैं। दोनों को अलग-अलग समझें।
रॉबर्ट टी. गोलम्बियुस्की (Robert T. Golembiewski) ने ऐतिहासिक विकास के चार चरण बताए — (1) विश्लेषणात्मक राजनीति/प्रशासन, (2) ठोस राजनीति/प्रशासन, (3) प्रबंधन का विज्ञान, और (4) लोक-नीति उपागम। उनके अनुसार हर चरण को उसके "स्थान" (Locus — कहाँ) और "केंद्र" (Focus — क्या) के आधार पर पहचाना जा सकता है।
9भारत एवं राजस्थान में लोक प्रशासन अध्ययन के पड़ाव
एक प्रक्रिया के रूप में भारत में लोक प्रशासन का इतिहास उतना ही पुराना है जितना सिंधु घाटी सभ्यता का। मौर्य, गुप्त, चोल, मुग़ल और ब्रिटिश — हर युग की अपनी प्रशासनिक व्यवस्था रही, और वर्तमान व्यवस्था इन्हीं का सुधरा और विस्तृत रूप है। ब्रिटिश लेखकों ने ईस्ट इंडिया कंपनी, भारतीय सिविल सेवा और ज़िला प्रशासन पर अनेक शोध-ग्रंथ लिखे। पर एक अध्ययन-विषय के रूप में भारत में लोक प्रशासन की शुरुआत स्थानीय स्वशासन से जुड़े प्रश्न-पत्र के रूप में हुई, और इसके शुरुआती शिक्षक वे राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक थे जिन्होंने स्थानीय स्वशासन में विशेषज्ञता प्राप्त की थी।
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1930 का दशक | लखनऊ विश्वविद्यालय ने, प्रो. वी. के. एन. मेनन के नेतृत्व में, एम.ए. राजनीति विज्ञान में लोक प्रशासन का एक पूर्ण अनिवार्य प्रश्न-पत्र शामिल किया — ऐसा करने वाला भारत का पहला विश्वविद्यालय। |
| 1937 | मद्रास विश्वविद्यालय ने लोक प्रशासन में देश का पहला डिप्लोमा पाठ्यक्रम आरंभ किया। |
| 1938 | इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने स्थानीय स्वशासन में डिप्लोमा शुरू किया (प्रो. बेनी प्रसाद के प्रयास)। |
| 1949–50 | नागपुर विश्वविद्यालय में डॉ. एम. पी. शर्मा के नेतृत्व में लोक प्रशासन और स्थानीय स्वशासन का भारत का पहला पूर्ण स्वतंत्र विभाग स्थापित — विषय को पहली बार पूर्ण अकादमिक वैधता मिली। डॉ. शर्मा भारत में लोक प्रशासन के पहले प्रोफ़ेसर थे और उन्हें "भारतीय लोक प्रशासन का जनक" कहा जाता है। |
| 1954 | पॉल एच. एपलबी की रिपोर्ट (1953) की सिफ़ारिश पर भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA), नई दिल्ली की स्थापना — प्रशासनिक शोध का केंद्र; "इंडियन जर्नल ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन" का प्रकाशन। |
| 1957 | राजस्थान विश्वविद्यालय ने अर्थशास्त्र विभाग के साथ लोक प्रशासन का अध्यापन शुरू किया ("अर्थशास्त्र एवं लोक प्रशासन विभाग") — प्रो. एम. वी. माथुर की अग्रणी भूमिका। |
| 1959 | लखनऊ विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम (वी. के. एन. मेनन के प्रयास); राजस्थान विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर का पहला दल उत्तीर्ण। |
| 1961 | उस्मानिया और पंजाब विश्वविद्यालयों में अलग लोक प्रशासन विभाग और स्नातकोत्तर शिक्षण। |
| 1965 | राजस्थान विश्वविद्यालय में लोक प्रशासन एक स्वतंत्र विभाग बना। |
| 1971 | राजस्थान विश्वविद्यालय ने लोक प्रशासन में पहली पीएच.डी. उपाधि प्रदान की। |
| 1987 | अखिल भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में लोक प्रशासन को एक पूर्णतः स्वतंत्र वैकल्पिक विषय के रूप में शामिल किया गया — विषय को ज़बरदस्त गति मिली। |
अधिकांश विश्वविद्यालयों में लोक प्रशासन का अध्ययन राजनीति विज्ञान विभाग के साथ शुरू हुआ, पर राजस्थान में इसकी यात्रा अर्थशास्त्र विभाग से शुरू हुई। राजस्थान विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर एम. वी. माथुर ने, जिन्होंने इंग्लैंड से लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया था, इस विषय को शुरू करने में विशेष रुचि ली। उनके नेतृत्व में विभाग का नाम "अर्थशास्त्र एवं लोक प्रशासन विभाग" रखा गया। इसलिए प्रो. माथुर को राजस्थान में लोक प्रशासन का जनक माना जाता है।
आज राजस्थान में लोक प्रशासन का महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि राज्य सेवा परीक्षा की मुख्य परीक्षा में लोक प्रशासन और प्रबंधन एक प्रमुख इकाई है, और जयपुर स्थित राज्य लोक प्रशासन संस्थान राज्य के अधिकारियों के प्रशिक्षण का प्रमुख केंद्र है।
10नया लोक प्रशासन (New Public Administration — NPA)
10.1 उदय की पृष्ठभूमि
1960 का दशक अमेरिका में भारी उथल-पुथल का समय था — वियतनाम युद्ध (जिसमें अमेरिका गहराई से उलझ गया था), अश्वेत अमेरिकियों का नागरिक अधिकार आंदोलन, शहरी दंगे, विश्वविद्यालय परिसरों में असंतोष और राजनीतिक हिंसा। ड्वाइट वाल्डो के शब्दों में, "न तो लोक प्रशासन का अध्ययन और न ही उसका व्यवहार इस बढ़ती उथल-पुथल और गंभीर समस्याओं का उचित उत्तर दे पा रहा था।" गोलम्बियुस्की ने कहा कि लोक प्रशासन के विद्वानों के लिए 1960 का दशक "युद्ध जैसा" था। पारंपरिक लोक प्रशासन के कार्यकुशलता और मितव्ययता के लक्ष्य अपर्याप्त लगने लगे और विषय अप्रासंगिक दिखने लगा।
साथ ही, विषय युवा पीढ़ी के प्रभाव में आ रहा था, जो उसकी वर्तमान स्थिति से असंतुष्ट थी — एक तरह का "पीढ़ी-अंतराल" (Generation Gap) था। नए लोक प्रशासन के उदय के प्रमुख पड़ाव थे:
- 1. अमेरिका में सार्वजनिक सेवा हेतु उच्च शिक्षा पर हनी प्रतिवेदन (Honey Report), 1967।
- 2. जेम्स सी. चार्ल्सवर्थ की अध्यक्षता में लोक प्रशासन के सिद्धांत और व्यवहार पर फ़िलाडेल्फ़िया सम्मेलन, 1967।
- 3. ड्वाइट वाल्डो का लेख "Public Administration in a Time of Revolutions" (1968)।
- 4. प्रथम मिन्नोब्रुक सम्मेलन, सितंबर 1968।
- 5. फ़्रैंक मैरिनी द्वारा संपादित "Toward a New Public Administration: The Minnowbrook Perspective" (1971) और ड्वाइट वाल्डो द्वारा संपादित "Public Administration in a Time of Turbulence" (1971)।
1968 अमेरिका के इतिहास का सबसे अशांत वर्ष माना जाता है। अप्रैल में नागरिक अधिकार नेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या हुई, जून में राष्ट्रपति पद के दावेदार रॉबर्ट कैनेडी की हत्या हुई, वियतनाम युद्ध के विरोध में विश्वविद्यालय परिसर उबल रहे थे और कई शहरों में दंगे भड़के थे।
इसी माहौल में सितंबर 1968 में सिराक्यूज़ विश्वविद्यालय के मिन्नोब्रुक सम्मेलन केंद्र (न्यूयॉर्क राज्य) में लगभग 33 युवा विद्वान और व्यवहारकर्ता, ड्वाइट वाल्डो के संरक्षण में इकट्ठा हुए। उनका सवाल सीधा था — "जब समाज जल रहा है, तब लोक प्रशासन केवल दक्षता और मितव्ययता की बात क्यों कर रहा है?" इस युवा सम्मेलन से जो विचार निकले, उन्हें "नया लोक प्रशासन" कहा गया।
नेतृत्व/संरक्षण: ड्वाइट वाल्डो | प्रमुख प्रवक्ता: फ़्रैंक मैरिनी (जिनकी 1971 की पुस्तक से "नया लोक प्रशासन" शब्द प्रचलित हुआ), एच. जॉर्ज फ्रेडरिक्सन | वर्ष: 1968 (मिन्नोब्रुक सम्मेलन-I)
- नया लोक प्रशासन "प्रशासन" की बजाय "लोक" (Public) को केंद्र में रखता है — जनता और सामाजिक न्याय प्राथमिकता हैं।
- "सिद्धांतों और प्रक्रियाओं" की बजाय "मूल्यों और दर्शन" पर बल — मूल्य-निरपेक्षता को अस्वीकार करता है।
- "दक्षता और मितव्ययता" की बजाय "प्रभावशीलता और सेवा-दक्षता" को प्राथमिकता देता है।
- 1960 के दशक की सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल (नागरिक अधिकार आंदोलन, वियतनाम युद्ध विरोध) की प्रतिक्रिया में उदय।
- फ्रेडरिक्सन ने इसे "दूसरी पीढ़ी का व्यवहारवाद" (Second Generation Behaviouralism) कहा; कई विद्वान इसे लोक प्रशासन का "पहला पुनःआविष्कार" और 1990 के दशक के नए लोक प्रबंधन को "दूसरा पुनःआविष्कार" मानते हैं।
मिन्नोब्रुक सम्मेलन-I (1968) का उद्देश्य लोक प्रशासन को सामाजिक रूप से उत्तरदायी बनाना तथा प्रशासकों को परिवर्तन के वाहक (Change Agents) के रूप में स्थापित करना था। सम्मेलन में लोक प्रशासन की क्षमता पर कई मौलिक प्रश्न उठाए गए — सामाजिक और राजनीतिक विज्ञान के रूप में लोक प्रशासन के क्या उपयोग हैं? केवल दक्षता और मितव्ययता ही क्यों? किन प्रश्नों का अध्ययन होना चाहिए और कैसे? लोक प्रशासन के ज्ञान के सामाजिक और नैतिक निहितार्थ क्या हैं?
10.2 नए लोक प्रशासन के लक्ष्य / विषय
फ़्रैंक मैरिनी ने नए लोक प्रशासन के विषयों को पाँच शीर्षकों में समेटा, जबकि कई पाठ्यपुस्तकें इनमें से पहले चार को "चार प्रमुख लक्ष्य" के रूप में पढ़ाती हैं:
| लक्ष्य | अर्थ और व्याख्या |
|---|---|
| 1. प्रासंगिकता (Relevance) | पारंपरिक लोक प्रशासन केवल दक्षता और मितव्ययता में रुचि रखता था और समकालीन समस्याओं पर उसके पास कहने को कुछ नहीं था, इसलिए वह अप्रासंगिक हो रहा था। नया लोक प्रशासन सामाजिक जीवन की वास्तविकताओं से जुड़े सार्थक अध्ययन की माँग करता है। |
| 2. मूल्य (Values) | यह प्रबंधन-उन्मुख लोक प्रशासन के मूल्य-तटस्थ रुख़ को अस्वीकार करता है। मिन्नोब्रुक के प्रतिभागियों ने स्पष्ट कहा कि मूल्य-तटस्थ लोक प्रशासन असंभव है; प्रशासन को खुलकर बताना चाहिए कि वह किन मूल्यों की सेवा कर रहा है, और ऐसे मूल्य अपनाने चाहिए जो कमज़ोर वर्गों के हितों की रक्षा करें। |
| 3. सामाजिक समता (Social Equity) | सामाजिक समता की प्राप्ति लोक प्रशासन का लक्ष्य होनी चाहिए — प्रशासकों को समाज के वंचित वर्गों का "पक्षधर" बनना चाहिए और अपने विवेक का प्रयोग गरीबों के हित में करना चाहिए। फ्रेडरिक्सन: "जो लोक प्रशासन अल्पसंख्यकों के अभाव दूर करने वाले परिवर्तनों के लिए काम नहीं करता, उसका अंततः उपयोग उन्हीं अल्पसंख्यकों के दमन में होगा।" |
| 4. परिवर्तन (Change) | प्रशासकों को सामाजिक परिवर्तन का सक्रिय अभिकर्ता बनना चाहिए, यथास्थिति का समर्थक नहीं। यह उन स्थायी संस्थाओं की दासता नहीं स्वीकारता जो प्रभुत्वशाली वर्गों के स्व-पोषी शक्ति-केंद्र बन जाती हैं; सामाजिक बदलाव के लिए प्रशासनिक मशीनरी में नवाचार का सुझाव देता है। |
| 5. ग्राहक-केंद्रितता (Client-Focus) | नागरिकों को केवल वस्तुएँ और सेवाएँ देना नहीं, बल्कि यह तय करने में उन्हें आवाज़ देना कि क्या, कब और कैसे दिया जाए। इसके लिए सकारात्मक, सक्रिय और उत्तरदायी प्रशासक चाहिए, न कि सत्तावादी और "हाथीदाँत की मीनार" में बैठे नौकरशाह। |

"प्राण मूल्यवान हैं, समता से परिवर्तन ग्राम तक" — प्रासंगिकता, मूल्य, समता, परिवर्तन, ग्राहक-केंद्रितता।
10.3 विद्वानों की दृष्टि में नया लोक प्रशासन
फ्रेडरिक्सन के अनुसार नया लोक प्रशासन पारंपरिक लोक प्रशासन की तुलना में — (1) कम सामान्य (Generic) और अधिक "लोक" (Public) है; (2) कम वर्णनात्मक और अधिक निर्देशात्मक (Prescriptive) है; (3) जो है उसे अपरिवर्तनीय मानने के बजाय वास्तविकता बदलने की ओर अधिक उन्मुख है; (4) कार्य-जीवन की गुणवत्ता सुधारने वाली नीतियों को प्रभावित करने और लागू करने में अधिक तत्पर है; (5) कम संस्था-उन्मुख और ग्राहक पर प्रभाव की ओर अधिक उन्मुख है; (6) कम तटस्थ और अधिक मानकीय (Normative) है; (7) सामाजिक घटनाओं पर प्राकृतिक-विज्ञान मॉडल लागू करने को लेकर कम आश्वस्त है; और (8) फिर भी "कम वैज्ञानिक नहीं" है।
| NPA में क्या नया था? (फ्रेडरिक्सन) | विवरण |
|---|---|
| सामान्य से जन-केंद्रित | कम सामान्य नौकरशाही कार्य, अधिक जन-कल्याण पर फोकस |
| वर्णनात्मक से निर्देशात्मक | केवल सिद्धांत नहीं, वास्तविक समस्याओं का सक्रिय समाधान |
| संस्थान-केंद्रित से ग्राहक-केंद्रित | प्रशासनिक ढाँचे से अधिक नागरिक-प्रभाव को प्राथमिकता |
| तटस्थ से मानकीय (किंतु वैज्ञानिक) | मूल्यों और नैतिकता को वैज्ञानिक अन्वेषण के साथ जोड़ना |
ड्वाइट वाल्डो के अनुसार नया लोक प्रशासन सकारात्मक रूप से मानकीय सिद्धांत, दर्शन, सामाजिक चिंता और सक्रियता की दिशा में एक आंदोलन है, और नकारात्मक रूप से प्रत्यक्षवाद (Positivism) और "विज्ञानवाद" से दूर हटना है। उन्होंने इसके तीन स्पष्ट परिप्रेक्ष्य बताए — (1) ग्राहक-उन्मुख नौकरशाही, (2) प्रतिनिधि नौकरशाही (Representative Bureaucracy), और (3) प्रशासन में जन-सहभागिता। गोलम्बियुस्की ने इसके तीन "विरोधी लक्ष्य" (Anti-Goals) बताए — यह प्रत्यक्षवाद-विरोधी, तकनीक-विरोधी और पदानुक्रम-विरोधी है। नाइग्रो और नाइग्रो के अनुसार इसमें ग्राहक-केंद्रित प्रशासन के साथ-साथ "विनौकरशाहीकरण" (Debureaucratisation), लोकतांत्रिक निर्णय-निर्माण और प्रशासनिक प्रक्रिया के विकेंद्रीकरण की सिफ़ारिश है।
| कृति (वर्ष) | लेखक / संपादक | योगदान |
|---|---|---|
| Toward a New Public Administration: The Minnowbrook Perspective (1971) | फ़्रैंक मैरिनी | मूल्य-निरपेक्ष परंपराओं से हटकर नई दिशा का प्रस्ताव; मिन्नोब्रुक के लेखों का संग्रह |
| Public Administration in a Time of Turbulence (1971) | ड्वाइट वाल्डो | मिन्नोब्रुक के विषयों का विस्तार |
| New Public Administration (1980) | एच. जॉर्ज फ्रेडरिक्सन | नए लोक प्रशासन के स्थायी प्रभाव को प्रदर्शित किया |
नया लोक प्रशासन एक बात में विकास प्रशासन से मिलता-जुलता है — दोनों लक्ष्य-उन्मुख और परिवर्तन-उन्मुख हैं। पर नया लोक प्रशासन मुख्यतः पश्चिमी (विकसित) समाजों से संबंधित था, जबकि विकास प्रशासन विकासशील देशों से।
10.4 मिन्नोब्रुक सम्मेलन — I, II और III
ठीक बीस वर्ष बाद, सितंबर 1988 में मिन्नोब्रुक सम्मेलन-II हुआ, जिसकी अध्यक्षता एच. जॉर्ज फ्रेडरिक्सन ने की। फ्रेडरिक्सन के अनुसार इसका उद्देश्य लोक प्रशासन के बदलते युगों की तुलना करना था। यह पहले सम्मेलन से कहीं अधिक व्यावहारिक और कम क्रांतिकारी था:
| आधार | मिन्नोब्रुक-I (1968) | मिन्नोब्रुक-II (1988) |
|---|---|---|
| अध्यक्ष / संरक्षक | ड्वाइट वाल्डो | एच. जॉर्ज फ्रेडरिक्सन |
| संरचना | संकुचित — अधिकांश प्रतिभागी राजनीति विज्ञान पृष्ठभूमि के | व्यापक — विधि, अर्थशास्त्र, नियोजन, नीति-विश्लेषण, नगरीय अध्ययन |
| रुख़ | विवादास्पद, टकरावपूर्ण, क्रांतिकारी | अधिक शिष्ट, व्यावहारिक, कम क्रांतिकारी, वरिष्ठों के प्रति सम्मानजनक |
| बल | प्रासंगिकता, मूल्य, सामाजिक समता, परिवर्तन, ग्राहक-केंद्रितता | नेतृत्व, संवैधानिक-क़ानूनी परिप्रेक्ष्य, तकनीक-नीति, आर्थिक परिप्रेक्ष्य |
| व्यवहारवाद के प्रति | स्पष्ट रूप से व्यवहारवाद-विरोधी | सामाजिक और व्यवहार-विज्ञानों के योगदान के प्रति अधिक ग्रहणशील |
| सामाजिक परिवेश | सरकार के प्रति गहरा संशय; प्रशासन को सक्रिय बनाने की चुनौती | राज्य के सिकुड़ने, निजीकरण, स्वैच्छिकता और "तृतीय-पक्ष सरकार" की बढ़ती माँग |
फिर भी दोनों सम्मेलनों में निरंतरता थी — सामाजिक समता, नैतिकता, मानव संबंध, जवाबदेही, लोक प्रशासन और लोकतंत्र में सामंजस्य, तथा प्रशासनिक नेतृत्व जैसे विषय दोनों में उठे।
मिन्नोब्रुक सम्मेलन-III (सितंबर 2008) की अध्यक्षता प्रो. रोज़मेरी ओ’लियरी ने की। यह दो चरणों में हुआ — पहले चरण में युवा और उभरते विद्वान, और दूसरे चरण में अनुभवी विद्वान शामिल हुए। यह ऐसे समय हुआ जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी से गुज़र रही थी और वैश्विक आतंकवाद एक बड़ी चिंता था। इसने विषय को अमेरिकी संदर्भ से बाहर वैश्विक स्तर पर देखा। इसके प्रमुख विषय थे — पिछले मिन्नोब्रुक सम्मेलनों के विचारों (प्रासंगिकता, परिवर्तन) की पुनर्समीक्षा, वैश्वीकरण, सहयोगी शासन (Collaborative Governance), शासन में सूचना प्रौद्योगिकी, विचार-विमर्शी लोकतंत्र और जन-सहभागिता, भविष्य का संगठन, और अगली पीढ़ी के नेताओं का प्रशिक्षण। इसके निष्कर्ष 2010 में रोज़मेरी ओ’लियरी, डेविड वैन स्लाइक और सूनही किम द्वारा संपादित पुस्तक "The Future of Public Administration around the World: The Minnowbrook Perspective" में प्रकाशित हुए। हर 20 वर्ष की परंपरा के अनुसार अगला सम्मेलन (मिन्नोब्रुक-IV) लगभग 2028 में अपेक्षित है।
📌 तथ्य-सुधार: कुछ पुरानी सामग्रियों में लिखा मिलता है कि मिन्नोब्रुक-III से "Journal of Public Administration Research and Theory" (JPART) का प्रकाशन 2009 से शुरू हुआ, या कि इसी सम्मेलन में NPM के "3E" की अवधारणा जन्मी। ये दोनों बातें सही नहीं हैं — यह पत्रिका 1991 से प्रकाशित हो रही है, और "3E" की अवधारणा 1980-90 के दशक के नए लोक प्रबंधन से जुड़ी है। मिन्नोब्रुक-III के निष्कर्ष 2010 की उपर्युक्त पुस्तक में संकलित हुए।

10.5 आलोचना और स्थायी महत्व
- सीमित व्यावहारिक प्रभाव — गोलम्बियुस्की: "शब्दों में क्रांति या उग्रवाद, पर कौशल या तकनीक में (अधिक से अधिक) यथास्थिति।"
- अति-सैद्धांतिक, प्रत्यक्षवाद-विरोधी और प्रबंधन-विरोधी — व्यावहारिक क्रियान्वयन कठिन।
- कैम्पबेल: यह पुराने लोक प्रशासन से केवल इस बात में अलग है कि यह अलग सामाजिक समस्याओं का उत्तर देता है — अनेक विचार (विकेंद्रीकरण, लोकतांत्रिक शासन) पहले से मौजूद थे।
- गोलम्बियुस्की के अनुसार, आकांक्षा और वास्तविक प्रदर्शन के बीच अंतर की "क्रूर याद"; इसे अस्थायी या संक्रमणकालीन घटना माना।
- कार्टर और डफ़ी: क्या सामाजिक समता सचमुच दक्षता, प्रभावशीलता और जवाबदेही की तरह स्थापित उद्देश्य बन पाई?
- डन और फ़ोज़ौनी: इसने "प्रतिमान-परिवर्तन" का केवल भ्रम फैलाया; आलोचक यह भी कहते हैं कि यह राजनीतिक संस्थाओं के क्षेत्र को प्रशासन के लिए हथियाना चाहता है।
- नाइग्रो और नाइग्रो: इसने नीति-नैतिकता पर रचनात्मक बहस शुरू की; तब से मूल्य और नैतिकता लोक प्रशासन के प्रमुख विषय बने हुए हैं।
- जन-केंद्रित प्रशासन — एकल-खिड़की मंज़ूरी, नागरिक फीडबैक तंत्र।
- सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण — मनरेगा, स्वच्छ भारत मिशन, 73वें-74वें संविधान संशोधन जैसी पहलों की भावना से मेल।
- रमेश के. अरोड़ा के अनुसार, इसने नीति-विज्ञान को सुदृढ़ किया और राजनीति-प्रशासन द्वैधता पर "अंतिम प्रहार" (Coup de Grace) किया।
- अरोड़ा: इसने विषय को अधिक प्रासंगिक बनाया, अकादमिक क्षेत्र और व्यवसाय को निकट लाया, ग्राहक-उन्मुखता और लोकतांत्रिक मानवतावाद को बल दिया, तथा डेविड ईस्टन की "उत्तर-व्यवहारवादी क्रांति" को ठोस आधार दिया।
भारत के संविधान का नीति-निदेशक तत्वों वाला भाग, अनुसूचित जातियों-जनजातियों के लिए आरक्षण (प्रतिनिधि नौकरशाही), 73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा पंचायतों-नगरपालिकाओं में महिलाओं और वंचित वर्गों को आरक्षण, तथा मनरेगा में सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) — ये सभी नए लोक प्रशासन के "सामाजिक समता", "जन-सहभागिता" और "प्रतिनिधि नौकरशाही" के विचारों के व्यावहारिक रूप हैं।
11नया लोक प्रबंधन (New Public Management — NPM)
11.1 अर्थ, उदय और पृष्ठभूमि
नया लोक प्रबंधन 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक के प्रारंभ में उभरा प्रतिमान है, जिसे लोक प्रशासन के विकास का अपेक्षाकृत नवीनतम प्रतिमान माना जाता है। इसका जन्म ब्रिटेन के थैचरवाद (ब्रिटेन — सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण शुरू करने वाला पहला बड़ा देश) और अमेरिका के रीगनवाद से हुआ। यह लोक प्रशासन और निजी प्रशासन (व्यवसाय प्रबंधन) का संश्लेषण है — यह "क्या" और "क्यों" लोक प्रशासन से, तथा "कैसे" निजी प्रशासन से लेता है।
शब्द-प्रवर्तक: क्रिस्टोफ़र हुड (1991) | लोकप्रिय बनाया: डेविड ऑस्बर्न और टेड गेब्लर — "Reinventing Government" (1992)
- 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक के प्रारंभ में उदय — वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की प्रतिक्रिया में।
- क्रिस्टोफ़र हुड ने यह शब्द अपने लेख "A Public Management for All Seasons?" (1991) में प्रयुक्त किया।
- ऑस्बर्न और गेब्लर ने "Reinventing Government" (1992) से इसे लोकप्रिय बनाया — नारा: "पतवार थामो, चप्पू मत चलाओ" (Steer, not row)।
- वैकल्पिक नाम: प्रबंधनवाद (Managerialism — क्रिस्टोफ़र पॉलिट), उद्यमशील सरकार (Entrepreneurial Government — ऑस्बर्न-गेब्लर), बाज़ार-आधारित लोक प्रशासन (लैन और रोज़नब्लूम), लोक और निजी प्रशासन के बीच का "तीसरा रास्ता" (एल. गन — L. Gunn)।
नया लोक प्रबंधन समाज और अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका में मूलभूत परिवर्तन की वकालत करता है। यह राज्य के मुक़ाबले "बाज़ार" को समाज और अर्थव्यवस्था का मुख्य नियामक मानता है। इसमें सरकार द्वारा सेवाओं के प्रत्यक्ष प्रावधान से हटकर अप्रत्यक्ष तरीक़ों — नीति-निर्माण, सुविधा देना, अनुबंध करना, सूचना देना और अन्य कर्ताओं का समन्वय — की ओर बढ़ना शामिल है। दूसरे शब्दों में, सरकार को सार्वजनिक गतिविधियों का "कर्ता" (Doer) बनने के बजाय सार्वजनिक लाभों का "वितरक", "सुविधाप्रदाता" और "परिवर्तन का प्रोत्साहक" बनना चाहिए। ऑस्बर्न और गेब्लर के शब्दों में इसका केंद्रीय विचार है — "हमें अधिक सरकार नहीं, बेहतर सरकार चाहिए; और ठीक-ठीक कहें तो बेहतर शासन (Governance) चाहिए। शासन मिलकर अपनी समस्याएँ हल करने की क्रिया है; सरकार वह उपकरण है जिसका हम प्रयोग करते हैं — और यह उपकरण पुराना हो गया है।"
1980 के दशक में न्यूज़ीलैंड गंभीर आर्थिक संकट में था। 1984 के बाद वहाँ की सरकार ने अभूतपूर्व सुधार किए — सरकारी विभागों को व्यावसायिक निगमों में बदला गया, विभाग-प्रमुखों को निश्चित अवधि के अनुबंध पर रखा गया और उनके वेतन को प्रदर्शन से जोड़ा गया, तथा "आउटपुट" (क्या सेवा दी गई) के आधार पर बजट दिया जाने लगा।
ब्रिटेन में मार्गरेट थैचर की सरकार ने 1988 में "नेक्स्ट स्टेप्स" (Next Steps) कार्यक्रम शुरू किया, जिसमें नीति बनाने वाले मंत्रालयों से सेवा देने वाले कामों को अलग करके "कार्यकारी एजेंसियाँ" बनाई गईं — जैसे पासपोर्ट जारी करने वाली एजेंसी, जिसके मुख्य कार्यकारी को स्पष्ट लक्ष्य दिए गए। 1991 में ब्रिटेन ने "नागरिक अधिकार-पत्र" (Citizen's Charter) शुरू किया। हुड ने इन्हीं प्रवृत्तियों को देखकर "नया लोक प्रबंधन" शब्द दिया, और भारत ने भी 1997 में नागरिक अधिकार-पत्र अपनाया।
11.2 नए लोक प्रबंधन के 3E
नए लोक प्रबंधन का केंद्र-बिंदु 3E हैं — मितव्ययिता, दक्षता और प्रभावशीलता। ये शब्द क्रिस्टोफ़र पॉलिट ने प्रयुक्त किए:
| 3E | अर्थ | सरल उदाहरण |
|---|---|---|
| मितव्ययिता (Economy) | शासन में फ़िज़ूलख़र्ची समाप्त करना | कम क़ीमत पर उतनी ही गुणवत्ता की दवाएँ ख़रीदना |
| दक्षता (Efficiency) | संसाधनों के अधिकतम उपयोग हेतु सेवा-वितरण को सुव्यवस्थित करना | उतने ही कर्मचारियों से दोगुने लोगों को पेंशन देना |
| प्रभावशीलता (Effectiveness) | स्पष्ट उद्देश्य तय कर संसाधनों को प्रमुख समस्याओं पर केंद्रित करना | टीकाकरण का लक्ष्य वास्तव में शिशु-मृत्यु दर घटाना हो, केवल टीके बाँटना नहीं |
इसके अतिरिक्त नया लोक प्रबंधन प्रदर्शन-मूल्यांकन, प्रबंधकीय स्वायत्तता, लागत-कटौती, वित्तीय प्रोत्साहन, आउटपुट लक्ष्य, नवाचार, अनुक्रियाशीलता, प्रतिस्पर्धा, आउटसोर्सिंग (अनुबंध पर काम देना), ग्राहक का चयन, सूचना प्रौद्योगिकी, विनौकरशाहीकरण, विकेंद्रीकरण, आकार-घटाव (Downsizing) और उद्यमशीलता पर बल देता है।
11.3 सैद्धांतिक आधार
| सैद्धांतिक आधार | मुख्य विचार |
|---|---|
| लोक-चयन उपागम (Public Choice Approach) | विंसेंट ऑस्ट्रॉम ("The Intellectual Crisis in American Public Administration") — नौकरशाही-विरोधी दृष्टिकोण, संस्थागत बहुलवाद (एक ही सेवा के अनेक प्रदाता), अनेक लोकतांत्रिक निर्णय-केंद्र, विकेंद्रीकरण, जन-सहभागिता एवं आर्थिक तर्क का लोक सेवाओं पर प्रयोग। अन्य समर्थक — बुकानन, डाउन्स, ओल्सन, टुलॉक, निस्कानेन। इनका "प्रशासनिक स्वार्थ" का सिद्धांत कहता है कि नौकरशाह लोक-हित से अधिक स्व-हित (बजट और शक्ति बढ़ाना) को प्राथमिकता देते हैं। |
| नव-टेलरवाद / प्रबंधनवाद (Neo-Taylorism / Managerialism) | वेबर की नौकरशाही में निजी क्षेत्र की प्रबंध-तकनीकों का समावेश — (1) पूर्व-निर्धारित लक्ष्यों के विरुद्ध वास्तविक उपलब्धि का प्रदर्शन-मूल्यांकन; (2) उत्पादन-प्रक्रिया के हर चरण के लिए व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी; (3) सामूहिक की बजाय व्यक्तिगत प्रोत्साहन — अच्छे प्रदर्शन पर पुरस्कार, कमज़ोर पर दंड; (4) सार्वजनिक क्षेत्र में बनने वाली लगभग हर चीज़ की लागत निकालना। |
नया लोक प्रबंधन पारंपरिक लोक प्रशासन की कई धारणाओं को अस्वीकार करता है — राजनीति-प्रशासन द्वैधता, पदानुक्रम-प्रधान संगठन, शक्ति का अति-केंद्रीकरण, प्रशासन में नियमों की सर्वोच्चता, निर्णय-निर्माण में केवल तर्कसंगतता, प्रशासन का अवैयक्तिक स्वरूप, प्रशासनिक प्रक्रिया की कठोरता और अंतर्मुखी (Inward-looking) दृष्टि।
11.4 हुड के सात तत्व और रोड्स के सिद्धांत
क्रिस्टोफ़र हुड ने नए लोक प्रबंधन के सात निर्णायक तत्व (सिद्धांत) बताए हैं:
| क्र. | तत्व (Element) |
|---|---|
| 1 | सार्वजनिक क्षेत्र में व्यावसायिक प्रबंधन पर बल — प्रबंधकीय स्वायत्तता के साथ मज़बूत नेतृत्व ("प्रबंधकों को प्रबंधन करने दो") |
| 2 | प्रदर्शन के स्पष्ट मानक और माप (प्रमुख प्रदर्शन संकेतक, बेंचमार्क) |
| 3 | प्रक्रियाओं की बजाय परिणाम-नियंत्रण (Output Controls) पर अधिक बल |
| 4 | सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का विखंडन — बड़ी नौकरशाहियों को छोटी विशिष्ट इकाइयों में बाँटना |
| 5 | सार्वजनिक क्षेत्र में अधिक प्रतिस्पर्धा — आउटसोर्सिंग, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) |
| 6 | निजी क्षेत्र की प्रबंध-प्रथाओं को अपनाना |
| 7 | संसाधन-उपयोग में अधिक अनुशासन और मितव्ययिता — लागत-प्रभावशीलता ("कम में अधिक") |
आर. ए. डब्ल्यू. रोड्स (R. A. W. Rhodes) के अनुसार नए लोक प्रबंधन के केंद्रीय सिद्धांत हैं — (1) नीति के बजाय प्रबंधन, प्रदर्शन-मूल्यांकन और दक्षता पर ध्यान; (2) सार्वजनिक नौकरशाहियों को ऐसी एजेंसियों में बाँटना जो आपस में "उपयोगकर्ता-भुगतान" के आधार पर काम करें; (3) प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए अर्ध-बाज़ार और ठेके (Contracting Out); (4) लागत-कटौती — "पैसे का पूरा मूल्य" (Value for Money); और (5) ऐसी प्रबंधन-शैली जो आउटपुट लक्ष्य, सीमित अवधि के अनुबंध, मौद्रिक प्रोत्साहन और "प्रबंधन की स्वतंत्रता" पर बल दे।
11.5 ऑस्बर्न और गेब्लर — उद्यमशील सरकार के 10 सिद्धांत
ऑस्बर्न और गेब्लर ने अपनी पुस्तक "Reinventing Government" (1992) में उद्यमशील सरकार (Entrepreneurial Government) के 10 सिद्धांत प्रस्तुत किए:
| क्र. | सिद्धांत | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|---|
| 1 | उत्प्रेरक सरकार (Catalytic) | "पतवार थामो, चप्पू मत चलाओ" — सरकार सार्वजनिक, निजी और स्वयंसेवी क्षेत्र को समस्याएँ हल करने के लिए प्रेरित करे, स्वयं हर सेवा न दे। |
| 2 | समुदाय-स्वामित्व वाली सरकार (Community-Owned) | नौकरशाही का नियंत्रण घटाकर नागरिकों, परिवारों और समुदायों को अपनी समस्याएँ स्वयं हल करने के लिए सशक्त बनाना। |
| 3 | प्रतिस्पर्धी सरकार (Competitive) | सेवा-प्रदाताओं के बीच प्रतिस्पर्धा — प्रदर्शन बढ़ता है, लागत घटती है। |
| 4 | लक्ष्य-प्रेरित सरकार (Mission-Driven) | नियमों से नहीं, लक्ष्यों से संचालित — नियम-आधारित से उद्देश्य-आधारित शासन। |
| 5 | परिणाम-उन्मुख सरकार (Results-Oriented) | इनपुट (कितना ख़र्च) नहीं, आउटकम (क्या परिणाम) से एजेंसियों का मूल्यांकन। |
| 6 | ग्राहक-प्रेरित सरकार (Customer-Driven) | नागरिक = ग्राहक — विकल्प देना, उनकी राय का सर्वेक्षण, सेवाएँ सुविधाजनक बनाना, सुझाव आमंत्रित करना। |
| 7 | उद्यमी सरकार (Enterprising) | केवल ख़र्च नहीं, कमाई पर भी ध्यान — शुल्क, बचत, उद्यम-निधि और साझेदारी से राजस्व। |
| 8 | दूरदर्शी सरकार (Anticipatory) | समस्या के उत्पन्न होने के बाद इलाज नहीं, पहले से रोकथाम। |
| 9 | विकेंद्रीकृत सरकार (Decentralised) | ऊपर से नीचे तक सत्ता का विकेंद्रीकरण — पदानुक्रमिक नियंत्रण से सहभागी प्रबंधन और टीमवर्क। |
| 10 | बाज़ार-उन्मुख सरकार (Market-Oriented) | नौकरशाही तंत्र के बजाय बाज़ार तंत्र — बाज़ार की शक्तियों से परिवर्तन लाना। |
पहले तीन अक्षरों में सोचें: उ-स-प्र (उत्प्रेरक, समुदाय, प्रतिस्पर्धी), फिर ल-प-ग्रा (लक्ष्य, परिणाम, ग्राहक), फिर उ-दू-वि-बा (उद्यमी, दूरदर्शी, विकेंद्रीकृत, बाज़ार)। वाक्य: "उस प्रधान ने लपक कर ग्राम में उदूल विबाह रचाया" — थोड़ा मज़ेदार, पर याद रहता है!
11.6 प्रभाव और प्रयुक्त तंत्र
इन लक्ष्यों को पाने के लिए दुनिया भर की सरकारों ने कई तंत्र अपनाए — स्वायत्त सार्वजनिक संगठनों का सृजन, सरकार के आकार में कमी, सरकारी संगठनों का निगमीकरण, बजट और कल्याण-व्यय में कटौती, सिविल सेवा ढाँचे में सुधार, प्रदर्शन मापन और मूल्यांकन, सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण, निचले स्तरों तक सत्ता का विकेंद्रीकरण, निजी एजेंसियों को ठेके पर सेवाएँ, प्रशासन में खुलापन और पारदर्शिता, जन-सहभागिता को प्रोत्साहन, और नागरिक अधिकार-पत्रों की घोषणा।
1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत में नए लोक प्रबंधन की कई प्रवृत्तियाँ दिखीं — सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश, सड़कों-हवाई अड्डों-बिजली में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), नागरिक अधिकार-पत्र (1997), द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा सुझाया गया "सेवोत्तम" (Sevottam) सेवा-गुणवत्ता मॉडल, परिणाम-आधारित बजट (Outcome Budget, 2005 से), प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT, 2013 से) और "न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन" का नारा।
राजस्थान में ई-मित्र (सरकारी सेवाएँ निजी-सार्वजनिक भागीदारी वाले कियोस्क से) इसका अच्छा उदाहरण है — सरकार "पतवार" थामती है (सेवा और शुल्क तय करती है), जबकि "चप्पू" स्थानीय उद्यमी चलाते हैं।
11.7 नए लोक प्रबंधन के विरोधाभास (Paradoxes)
नए लोक प्रबंधन ने कई प्रशासनिक विरोधाभास भी पैदा किए हैं। क्रिस्टोफ़र हुड और गाय पीटर्स (2004) ने इसके परिपक्व दौर को "विरोधाभासों का युग" कहा, और वैन थील तथा लीउ (2002) ने "प्रदर्शन विरोधाभास" (Performance Paradox) की बात की — यानी प्रदर्शन के आँकड़े अच्छे दिखते हैं, पर वास्तविक प्रदर्शन नहीं सुधरता, क्योंकि लोग संकेतकों को "पूरा करने" लगते हैं।
| विरोधाभास (Paradox) | व्याख्या |
|---|---|
| जवाबदेही बनाम स्वायत्तता | प्रबंधकीय लचीलेपन हेतु दी गई स्वायत्तता, सख़्त प्रदर्शन-आधारित जवाबदेही से टकराती है। |
| दक्षता बनाम समता | लागत-दक्षता की खोज आवश्यक सेवाओं की समान पहुँच से समझौता कर सकती है। |
| ग्राहक बनाम नागरिक | नागरिकों को ग्राहक मानना उनकी लोकतांत्रिक हिस्सेदारी को कमज़ोर कर सकता है। |
| विखंडन बनाम समन्वय | विकेंद्रीकृत सेवा-वितरण से एजेंसियों के बीच समन्वय की समस्या। |
| मात्रात्मकता बनाम लोक-उद्देश्य | मापने योग्य लक्ष्यों पर अति-बल गुणात्मक और दीर्घकालिक मूल्यों की उपेक्षा कर सकता है। |
| बाज़ार-तर्क बनाम लोक-नैतिकता | बाज़ार प्रतिस्पर्धा लोक-सेवा नैतिकता और सामूहिक कल्याण को क्षति पहुँचा सकती है। |
| नवाचार बनाम जोखिम-भीरुता | नवाचार को बढ़ावा देने का दावा, पर अत्यधिक अंकेक्षण-संस्कृति जोखिम लेने को हतोत्साहित करती है। |
- स्वायत्त सार्वजनिक संगठनों का सृजन।
- सरकार के आकार में कमी, बजट अनुशासन।
- प्रदर्शन मापन एवं मूल्यांकन तंत्र।
- पारदर्शिता और जन-भागीदारी को बढ़ावा — नागरिक अधिकार-पत्र।
- सेवा-गुणवत्ता और नागरिक-संतुष्टि को महत्व।
- मौलिकता का अभाव — पुराने सिद्धांतों (टेलरवाद) की पुनरावृत्ति: "पुरानी शराब नई बोतल में"।
- नौकरशाही का मनोबल गिराना।
- बाज़ार-उन्मुखता पर अति-बल, लोक-हित और समता की उपेक्षा।
- नागरिक को "ग्राहक" बनाना — लोकतांत्रिक नागरिकता का अवमूल्यन।
- विकासशील देशों में सार्वभौमिक रूप से लागू नहीं — जहाँ बाज़ार ही कमज़ोर है।
12सुशासन (Good Governance)
12.1 शासन का अर्थ और "सरकार" से अंतर
शासन (Governance) शब्द यूनानी शब्द "Kybernan" / "Kubernaein" (पतवार चलाना, दिशा देना) से बना है। हार्लन क्लीवलैंड ने 1970 के दशक में इसे लोकप्रिय बनाया: "लोग जो चाहते हैं वह कम सरकार और अधिक शासन है।" सरकार (Government) एक संस्था है, जबकि शासन (Governance) एक प्रक्रिया है, जिसमें सरकार के साथ बाज़ार और नागरिक समाज भी भागीदार होते हैं। सुशासन की अवधारणा 1990 के दशक में विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और OECD की रिपोर्टों से उभरी — इसका उद्देश्य विकासशील देशों में बेहतर विकासात्मक परिणामों के लिए शासन में सुधार करना था।
| आधार | सरकार (Government) | शासन (Governance) |
|---|---|---|
| अभिविन्यास | राज्य-केंद्रित, नौकरशाही-चालित | उत्तरदायी, सहभागी और समतापूर्ण |
| नागरिकों की भूमिका | निष्क्रिय प्राप्तकर्ता | सक्रिय सहभागी / हितधारक |
| निर्णय-प्रक्रिया | पदानुक्रम, नियम, सत्ता | सहमति, साझेदारी, सहयोग |
| सेवा-वितरण | सरकार द्वारा प्रत्यक्ष प्रावधान | साझा प्रावधान — PPP, स्वयंसेवी संस्थाएँ, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व |
| शक्ति | सरकारी संस्थाओं में केंद्रित | राज्य, बाज़ार और नागरिक समाज में विकेंद्रित |
12.2 विश्व बैंक का दृष्टिकोण (1992)
विश्व बैंक की 1992 की रिपोर्ट "Governance and Development" के अनुसार शासन "किसी देश के आर्थिक और सामाजिक संसाधनों के विकास-प्रबंधन में शक्ति के प्रयोग का ढंग" है। इसने ख़राब शासन (Bad Governance) की पाँच प्रमुख समस्याएँ चिह्नित कीं — क़ानूनों का अनुचित या विलंबित क्रियान्वयन, कमज़ोर लेखा-प्रणाली, भ्रष्टाचार-प्रवण ख़रीद-प्रक्रिया, विकृत निवेश प्राथमिकताएँ, तथा लाभार्थी-भागीदारी का अभाव।
| विश्व बैंक के 4 आयाम | विवरण |
|---|---|
| लोक क्षेत्र प्रबंधन | दक्षता और व्यावसायिक नौकरशाही |
| जवाबदेही | अधिकारियों को उनके कार्यों के लिए उत्तरदायी बनाना |
| विकास हेतु क़ानूनी ढाँचा | स्पष्ट, निष्पक्ष, पूर्वानुमेय और प्रवर्तनीय क़ानून |
| सूचना एवं पारदर्शिता | निर्णय-प्रक्रिया में खुलापन और सूचना की उपलब्धता |
12.3 सुशासन के लक्षण — UNDP और संयुक्त राष्ट्र
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने 1997 के अपने नीति-दस्तावेज़ "Governance for Sustainable Human Development" में सुशासन के नौ लक्षण बताए — सहभागिता, विधि का शासन, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता (तत्परता), सहमति-उन्मुखता, समता, प्रभावशीलता और दक्षता, जवाबदेही, तथा रणनीतिक दृष्टि (Strategic Vision)। बाद में संयुक्त राष्ट्र के एशिया-प्रशांत आर्थिक और सामाजिक आयोग (UNESCAP) ने "रणनीतिक दृष्टि" को छोड़कर और "समता" को "समता एवं समावेशिता" के रूप में रखते हुए सुशासन के आठ लक्षण प्रचलित किए, जो परीक्षा की दृष्टि से सबसे अधिक पूछे जाते हैं:
| क्र. | लक्षण | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | सहभागिता (Participatory) | सभी स्त्री-पुरुषों की निर्णय-प्रक्रिया में प्रत्यक्ष या प्रतिनिधि संस्थाओं के माध्यम से आवाज़; अभिव्यक्ति और संगठन की स्वतंत्रता |
| 2 | सहमति-उन्मुखता (Consensus Oriented) | विभिन्न हितों में मध्यस्थता कर समाज के सर्वोत्तम हित पर व्यापक सहमति प्राप्त करना |
| 3 | जवाबदेही (Accountable) | सरकार, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज — सभी निर्णयकर्ता जनता और संस्थागत हितधारकों के प्रति उत्तरदायी |
| 4 | पारदर्शिता (Transparent) | निर्णय नियमों के अनुसार; सूचना स्वतंत्र रूप से उपलब्ध और समझने योग्य |
| 5 | अनुक्रियाशीलता / तत्परता (Responsive) | संस्थाएँ और प्रक्रियाएँ उचित समय-सीमा में सभी हितधारकों की सेवा करें |
| 6 | प्रभावशीलता एवं दक्षता (Effective & Efficient) | संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करते हुए समाज की ज़रूरतें पूरी करने वाले परिणाम; पर्यावरण का संरक्षण भी |
| 7 | समता एवं समावेशिता (Equitable & Inclusive) | समाज के हर सदस्य, विशेषकर सबसे कमज़ोर को यह अनुभव हो कि वह मुख्यधारा का हिस्सा है |
| 8 | विधि का शासन (Rule of Law) | निष्पक्ष और समान रूप से प्रवर्तित क़ानूनी ढाँचा; मानवाधिकारों की रक्षा; स्वतंत्र न्यायपालिका और निष्पक्ष पुलिस |
📌 तथ्य-सुधार: प्रायः लिखा जाता है कि "UNDP (1997) ने सुशासन के आठ सिद्धांत दिए।" वास्तव में UNDP के 1997 के दस्तावेज़ में नौ लक्षण हैं (नौवाँ — रणनीतिक दृष्टि)। आठ लक्षणों वाली प्रसिद्ध सूची संयुक्त राष्ट्र के एशिया-प्रशांत आयोग (UNESCAP) की है। उत्तर में "संयुक्त राष्ट्र / UNDP के अनुसार सुशासन के प्रमुख लक्षण" लिखना सुरक्षित है।

"सही समय पर जवाब पाओ, तभी प्रशासन सबका विश्वास पाए" — सहभागिता, सहमति, जवाबदेही, पारदर्शिता, तत्परता, प्रभावशीलता-दक्षता, समता-समावेशिता, विधि का शासन।
सुशासन के प्रमुख लक्षण हैं — सहभागिता, विधि का शासन, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, समता, प्रभावशीलता-दक्षता, जवाबदेही और पूर्वानुमेयता। इसके उद्देश्य हैं — नागरिकों के जीवन-स्तर में सुधार, प्रशासन की विश्वसनीयता स्थापित करना, सूचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा देना, नागरिक-हितैषी प्रशासन प्रदान करना, तथा नागरिक समाज, राज्य और बाज़ार के बीच साझेदारी को प्रोत्साहित करना।
12.4 सुशासन से आगे — वैकल्पिक उपागम
| उपागम | प्रस्तावक एवं मुख्य विचार |
|---|---|
| मानवीय शासन (Humane Governance) | दक्षिण एशिया मानव विकास रिपोर्ट (1999) — केवल अर्थव्यवस्था नहीं, राजनीतिक, सामाजिक और नागरिक कमियों पर बल; मानव क्षमता और गरिमा का विकास। |
| "पर्याप्त-अच्छा" शासन (Good Enough Governance) | मेरिली ग्रिंडल (2004) — सुशासन का एजेंडा "अवास्तविक रूप से लंबी सूची" है; न्यूनतम स्वीकार्य शासन पर्याप्त है, और प्राथमिकता-क्रम तय करना ज़रूरी है। |
| संवर्धित वाशिंगटन सहमति (Augmented Washington Consensus) | 2000 के दशक की चर्चा — बाज़ार-सुधारों के साथ गरीबी-उन्मूलन, सामाजिक सुरक्षा-जाल और भ्रष्टाचार-विरोधी संस्थागत उपायों को जोड़ना। |
12.5 भारत में सुशासन
| भारत में सुशासन हेतु प्रमुख पहलें | विवरण |
|---|---|
| सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 | पारदर्शिता को क़ानूनी अधिकार बनाया |
| नागरिक अधिकार-पत्र (Citizens' Charter), 1997 | सेवा-मानकों के प्रति जवाबदेही; "सेवोत्तम" मॉडल से जोड़ा गया |
| लोकपाल एवं लोकायुक्त | भ्रष्टाचार-विरोधी संस्थागत तंत्र (लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013) |
| पंचायती राज संस्थाएँ (73वाँ/74वाँ संशोधन, 1992) | विकेंद्रीकरण और स्थानीय स्वशासन |
| डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस | दक्षता और सुलभता में वृद्धि; CPGRAMS जैसी ऑनलाइन शिकायत प्रणाली |
| सामाजिक अंकेक्षण (जैसे मनरेगा) | नागरिक निगरानी और जवाबदेही |
| मिशन कर्मयोगी (2020) | सिविल सेवकों का क्षमता-निर्माण — "नियम-आधारित" से "भूमिका-आधारित" प्रशासन |
| सुशासन दिवस (25 दिसंबर) | 2014 से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर मनाया जाता है |
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2005 में गठित, अध्यक्ष — एम. वीरप्पा मोइली; बाद में वी. रामचंद्रन) ने 15 रिपोर्टें दीं। इसकी 12वीं रिपोर्ट का शीर्षक ही था — "नागरिक-केंद्रित प्रशासन — शासन का हृदय" (Citizen Centric Administration — The Heart of Governance), जिसमें नागरिक अधिकार-पत्र को प्रभावी बनाने और सेवा-गुणवत्ता के "सेवोत्तम" मॉडल की सिफ़ारिश की गई।
कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG) ने 25 दिसंबर 2019 (सुशासन दिवस) को सुशासन सूचकांक का ढाँचा शुरू किया। यह 10 क्षेत्रों और 58 संकेतकों पर राज्यों का मूल्यांकन करता है — कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र, वाणिज्य एवं उद्योग, मानव संसाधन विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सार्वजनिक अवसंरचना एवं उपयोगिताएँ, आर्थिक शासन, समाज कल्याण एवं विकास, न्यायिक एवं सार्वजनिक सुरक्षा, पर्यावरण, तथा नागरिक-केंद्रित शासन। राज्यों को चार समूहों में बाँटा जाता है — समूह-A, समूह-B, पूर्वोत्तर एवं पहाड़ी राज्य, और केंद्रशासित प्रदेश।
अब तक इसके दो संस्करण आए हैं — 2019 और 2021 (2020-21)। 2021 के सूचकांक में समूह-A में गुजरात, महाराष्ट्र और गोवा शीर्ष पर रहे, जबकि समूह-B में मध्य प्रदेश पहले और राजस्थान दूसरे स्थान पर रहा (छत्तीसगढ़ तीसरे)। इसके बाद का संस्करण अभी तक जारी नहीं हुआ है, इसलिए नवीनतम पूर्ण आँकड़े 2021 के ही हैं।
जन सूचना पोर्टल (13 सितंबर 2019): सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4(2) — यानी सरकार द्वारा स्वयं आगे बढ़कर सूचना सार्वजनिक करने — की भावना पर आधारित। आज इस पर 115 से अधिक विभागों की 350 से अधिक प्रकार की सूचनाएँ (राशन, मनरेगा मस्टर-रोल, पेंशन, छात्रवृत्ति, खनन-पट्टे आदि) बिना सूचना का अधिकार आवेदन दाखिल किए, ग्राम पंचायत स्तर तक उपलब्ध हैं। यह सुशासन के "पारदर्शिता" और "सूचना तक पहुँच" के सिद्धांतों का उत्कृष्ट उदाहरण है।
राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम, 2011: चिह्नित सरकारी सेवाओं को तय समय-सीमा में देने की क़ानूनी गारंटी; देरी पर अपील और दोषी अधिकारी पर आर्थिक दंड का प्रावधान।
राजस्थान सुनवाई का अधिकार अधिनियम, 2012 (1 अगस्त 2012 से लागू): लोक सुनवाई अधिकारी को 15 दिन में शिकायत की सुनवाई करनी होती है; प्रथम और द्वितीय अपील का प्रावधान; दोषी अधिकारी पर ₹500 से ₹5,000 तक का जुर्माना।
राजस्थान संपर्क पोर्टल और हेल्पलाइन 181: नागरिक शिकायतों के ऑनलाइन पंजीकरण और निगरानी की व्यवस्था — सुशासन के "अनुक्रियाशीलता" सिद्धांत का व्यावहारिक रूप।
| सुशासन के समक्ष संस्थागत चुनौतियाँ | आवश्यकता |
|---|---|
| संसदीय कार्यप्रणाली | घटती बहस और व्यवधान — उत्तरदायित्व और उत्पादकता में सुधार आवश्यक |
| सिविल सेवा | नौकरशाही की जड़ता — व्यावसायिकता, नागरिक-केंद्रितता, ई-गवर्नेंस और नैतिकता आवश्यक |
| न्यायपालिका | लंबित मामले और पहुँच की समस्या — स्वतंत्रता, गति और सामाजिक न्याय उन्मुखता आवश्यक |
| निजी क्षेत्र | अनियंत्रित लाभ-उद्देश्य — जवाबदेही, उपभोक्ता संरक्षण और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व आवश्यक |
| नागरिक समाज | उदासीनता और अनभिज्ञता — अधिकार-जागरूकता और सहभागी भूमिका आवश्यक |
13नई लोक सेवा (New Public Service — NPS)
विचारक/प्रवर्तक: रॉबर्ट बी. डेनहार्ट एवं जेनेट वी. डेनहार्ट | लेख 2000; पुस्तक 2003 — "The New Public Service: Serving, Not Steering"
- नए लोक प्रबंधन की आलोचना और विकल्प के रूप में उदय — लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिकता और लोक-हित की पुनर्स्थापना।
- मूल दर्शन: "उत्पादकता से अधिक मूल्य" — लोक सेवकों की भूमिका है नागरिकों को अपने साझा हित स्पष्ट करने और साकार करने में मदद करना।
- फोकस में परिवर्तन: नए लोक प्रबंधन का "पतवार थामना" (Steering — मार्गदर्शन/नियंत्रण) बदलकर नई लोक सेवा का "सेवा करना" (Serving — संवाद, सहयोग)।
- सह-शासन (Co-Governance) — नागरिक और प्रशासक मिलकर नीति का "सह-निर्माण" (Co-production) करें।
- बौद्धिक जड़ें: लोकतांत्रिक नागरिकता का सिद्धांत, रॉबर्ट पुटनम की "सामाजिक पूँजी" (Social Capital) और समुदाय व नागरिक समाज के मॉडल, संगठनात्मक मानवतावाद, और उत्तर-आधुनिक लोक प्रशासन।
डेनहार्ट दंपति का तर्क था कि नए लोक प्रबंधन ने नागरिक को "ग्राहक" बनाकर लोकतंत्र को बाज़ार में बदल दिया। ग्राहक केवल अपने स्वार्थ की सोचता है, जबकि नागरिक पूरे समुदाय के हित की सोचता है। इसलिए सरकार को ग्राहकों की नहीं, नागरिकों की सेवा करनी चाहिए, और प्रशासकों को उद्यमी नहीं, "लोक सेवक" बनना चाहिए। रॉबर्ट डेनहार्ट और जेनेट डेनहार्ट ने नई लोक सेवा के सात सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं:
| क्र. | सिद्धांत | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|---|
| 1 | नियंत्रण नहीं, सेवा करें (Serve, Not Steer) | लोक सेवकों की भूमिका नागरिकों के साझा हितों को स्पष्ट करने और पूरा करने में मदद करना है, समाज को पूर्व-निर्धारित दिशा में नियंत्रित करना नहीं। |
| 2 | लोक-हित लक्ष्य है, उप-उत्पाद नहीं | प्रशासकों को साझा लोक-हित की सक्रिय रूप से रचना करनी चाहिए, न कि केवल व्यक्तिगत पसंद पर आधारित त्वरित समाधान देना। |
| 3 | रणनीतिक सोच, लोकतांत्रिक क्रिया | प्रभावी नीतियाँ सामूहिक प्रयासों, सहयोग और लोकतांत्रिक सहभागिता से उपजती हैं। |
| 4 | ग्राहक नहीं, नागरिकों की सेवा करें | लोक-हित व्यक्तिगत स्वार्थों के योग से नहीं, बल्कि साझा मूल्यों पर संवाद से उत्पन्न होता है; विश्वास और सहयोग के संबंध बनाने पर बल। |
| 5 | जवाबदेही सरल नहीं है | जवाबदेही में संवैधानिक-सांविधिक अपेक्षाएँ, राजनीतिक मानदंड, सामुदायिक मूल्य और व्यावसायिक मानक — सभी शामिल हैं; केवल बाज़ार नहीं। |
| 6 | उत्पादकता नहीं, लोगों को महत्व दें | दीर्घकालिक सफलता सहयोग, साझा नेतृत्व और मानवीय गरिमा पर निर्भर करती है, केवल संकुचित प्रदर्शन-मापदंडों पर नहीं। |
| 7 | उद्यमिता से ऊपर नागरिकता और लोक सेवा | लोक-हित उन नागरिकों और लोक सेवकों से बेहतर सधता है जो समाज के लिए सार्थक योगदान हेतु प्रतिबद्ध हैं, न कि उन उद्यमी प्रबंधकों से जो सार्वजनिक संसाधनों को निजी संपत्ति समझें। |
13.1 पारंपरिक लोक प्रशासन, नया लोक प्रबंधन और नई लोक सेवा — तुलना
पारंपरिक लोक प्रशासन (Old Public Administration), नए लोक प्रबंधन और नई लोक सेवा के बीच का तुलनात्मक विश्लेषण इस विषय की सबसे महत्वपूर्ण तुलना है:
| आयाम | पारंपरिक लोक प्रशासन | नया लोक प्रबंधन | नई लोक सेवा |
|---|---|---|---|
| सैद्धांतिक आधार | राजनीतिक सिद्धांत; परंपरागत नौकरशाही | आर्थिक सिद्धांत; बाज़ार / प्रत्यक्षवाद | लोकतांत्रिक सिद्धांत; नागरिकता और संवाद |
| नागरिकों की भूमिका | निष्क्रिय लाभार्थी / प्रजा | ग्राहक (Customer) | सक्रिय नागरिक और सह-निर्माता |
| सरकार की भूमिका | चप्पू चलाना (Rowing) — प्रत्यक्ष प्रावधान और नियंत्रण | पतवार थामना (Steering) — बाज़ार को सुगम बनाना | सेवा करना (Serving) — सुविधा, मध्यस्थता, सहयोग |
| लोक-हित | राजनीतिक रूप से परिभाषित, क़ानून में व्यक्त | व्यक्तिगत हितों का योग | साझा मूल्यों पर संवाद से उत्पन्न |
| जवाबदेही | पदानुक्रमिक (वरिष्ठों और निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति) | बाज़ार / परिणाम-उन्मुख | बहुआयामी — क़ानून, मानदंड, समुदाय, नागरिक |
| प्रशासनिक विवेक | सीमित | उद्यमशील लक्ष्य पाने हेतु व्यापक | आवश्यक, पर बाध्य और जवाबदेह |
| मूल आलोचना | अत्यधिक कठोर, अनुत्तरदायी नौकरशाही | बाज़ार और दक्षता पर अति-बल | आदर्शवादी — संसाधन-सीमित परिवेश में क्रियान्वयन कठिन |

"मायगव" (MyGov, जुलाई 2014) मंच पर नागरिक नीतियों के मसौदों पर सुझाव देते हैं; ग्राम सभाओं में सामाजिक अंकेक्षण होता है; स्वच्छ भारत मिशन को "जन-आंदोलन" के रूप में चलाया गया; और कई शहरों में नागरिक-सहभागी बजट के प्रयोग हुए हैं। ये सब "सह-निर्माण" और "नागरिक, ग्राहक नहीं" के विचार के उदाहरण हैं। राजस्थान का जन सूचना पोर्टल भी नागरिक को सूचना देकर उसे निगरानी करने वाला "सक्रिय नागरिक" बनाता है।
14पूरक — उत्तर-आधुनिकतावाद एवं नारीवादी दृष्टिकोण (Postmodernism & Feminist Approach)
प्रबोधन-युग (18वीं सदी) और औद्योगीकरण (19वीं-20वीं सदी) के बाद समाज विज्ञान और तर्क पर आधारित हो गया — मार्क्स, दुर्खीम और वेबर जैसे विचारकों ने तर्कसंगत-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समाज को दिशा दी। परंतु लोक प्रशासन में इसने पदानुक्रम, गोपनीयता, विशेषज्ञ-प्रभुत्व एवं कम नागरिक-भागीदारी को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप असमानताएँ और सामाजिक टकराव उत्पन्न हुए। उत्तर-आधुनिकतावाद (Postmodernism) इसी तर्कवादी एकाधिकार को चुनौती देते हुए विविध स्वरों, संवाद और प्रासंगिक-नैतिकता (Situational Ethics) पर बल देता है — यह "एक सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा" (One Best Way) की धारणा को अस्वीकार करता है। चार्ल्स फ़ॉक्स और ह्यू मिलर की पुस्तक "Postmodern Public Administration" (1995) इस धारा की प्रमुख रचना है, जो "प्रामाणिक संवाद" (Authentic Discourse) पर ज़ोर देती है।
- नारीवादी दृष्टिकोण (Feminist Approach): बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लैंगिक-समानता के मुद्दों ने लोक प्रशासन को पुनर्परिभाषित किया — "व्यक्तिगत ही राजनीतिक है" (Personal is Political) के नारे के साथ। कैमिला स्टिवर्स की पुस्तक "Gender Images in Public Administration" (1993) इस धारा की प्रमुख रचना है।
- आलोचना: वेबर की नौकरशाही "लिंग-निरपेक्ष" दिखती है, परंतु वास्तव में यह पुरुष-प्रधान, अभिजात्य मानसिकता को प्रतिबिंबित करती है — यहाँ तक कि 1990 के दशक का "सरकार का पुनःआविष्कार" आंदोलन भी लैंगिक दृष्टि से तटस्थ नहीं था।
- महत्व: शासन-नीतियों में महिला-हितैषी नीतियों का समावेश, निर्णय-प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी, तथा प्रशासन के प्रति दृष्टिकोण में लैंगिक-संवेदनशीलता लाना। भारत में "जेंडर बजटिंग" (2005-06 से केंद्रीय बजट में जेंडर बजट विवरण) और पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण इसी सोच के व्यावहारिक रूप हैं।
15तुलना और समय-रेखा
| प्रतिमान | काल | प्रमुख विचारक | मूल मंत्र | नागरिक की छवि |
|---|---|---|---|---|
| पारंपरिक लोक प्रशासन | 1887–1960 का दशक | विल्सन, वेबर, गुलिक | दक्षता, नियम, पदानुक्रम | प्रजा / लाभार्थी |
| नया लोक प्रशासन | 1968 से | वाल्डो, मैरिनी, फ्रेडरिक्सन | सामाजिक समता, मूल्य, प्रासंगिकता | ग्राहक (आवाज़ के साथ) |
| नया लोक प्रबंधन | 1980 के दशक के अंत से | हुड, ऑस्बर्न-गेब्लर, पॉलिट | 3E, बाज़ार, "Steer, not row" | ग्राहक / उपभोक्ता |
| सुशासन | 1990 के दशक से | विश्व बैंक, UNDP, क्लीवलैंड | सहभागिता, पारदर्शिता, जवाबदेही | हितधारक |
| नई लोक सेवा | 2000 से | रॉबर्ट और जेनेट डेनहार्ट | "Serve, not steer" | सक्रिय नागरिक, सह-निर्माता |
समय-रेखा — लोक प्रशासन के प्रमुख पड़ाव
| वर्ष/अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 1812 | चार्ल्स-जीन बोनिन का ग्रंथ (फ़्रांस) |
| 1883 | अमेरिका का पेंडलटन अधिनियम |
| 1887 | वुडरो विल्सन का निबंध "The Study of Administration" |
| 1900 | फ़्रैंक गुडनाउ की "Politics and Administration" |
| 1926 | एल. डी. व्हाइट की प्रथम पाठ्यपुस्तक |
| 1927 | विलोबी की "Principles of Public Administration" |
| 1937 | गुलिक और उर्विक का POSDCoRB |
| 1938–1947 | बर्नार्ड, साइमन और डाहल का योगदान |
| 1949–50 | नागपुर विश्वविद्यालय में भारत का पहला लोक प्रशासन विभाग |
| 1954 | भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) की स्थापना |
| 1957–1965 | राजस्थान विश्वविद्यालय में लोक प्रशासन — आरंभ से स्वतंत्र विभाग तक |
| 1968 | मिन्नोब्रुक सम्मेलन-I |
| 1987 | सिविल सेवा परीक्षा में स्वतंत्र वैकल्पिक विषय |
| 1988 | मिन्नोब्रुक सम्मेलन-II |
| 1991 | क्रिस्टोफ़र हुड द्वारा NPM शब्द; भारत के आर्थिक सुधार |
| 1992 | ऑस्बर्न-गेब्लर की "Reinventing Government"; विश्व बैंक की "Governance and Development" |
| 1997 | UNDP का शासन नीति-दस्तावेज़; भारत में नागरिक अधिकार-पत्र |
| 2000/2003 | डेनहार्ट दंपति की "The New Public Service" |
| 2005 | सूचना का अधिकार अधिनियम; द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग |
| 2008 | मिन्नोब्रुक सम्मेलन-III |
| 2011–2012 | राजस्थान लोक सेवा गारंटी अधिनियम; सुनवाई का अधिकार अधिनियम |
| 2019 | सुशासन सूचकांक का ढाँचा; राजस्थान का जन सूचना पोर्टल |
| 2020 से | मिशन कर्मयोगी |
लोक प्रशासन — संपूर्ण 413 पृष्ठ PDF एडिशन (Version 2.0)
विषय-परिचय, सभी 11 मुख्य अध्याय, 300+ तुलनात्मक तालिकाएँ, 100+ चित्र एवं फ़्लोचार्ट, थिंकर्स प्रोफ़ाइल और RAS Mains 2026 नए पैटर्न के अनुसार संपूर्ण प्रामाणिक संकलन — अब मोबाइल व प्रिंटेबल HD PDF में।
मात्र ₹49 में संपूर्ण 413 पृष्ठ PDF खरीदें →