भारत का निर्वाचन आयोग (Election Commission of India — ECI) एक स्थायी, स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, जिसे संविधान निर्माताओं ने बेहद सोच-समझकर, लोकतंत्र की रीढ़ के रूप में स्थापित किया। इसका संवैधानिक आधार है अनुच्छेद 324, जो संविधान के भाग 15 (अनुच्छेद 324-329) में आता है — यह भाग पूरी तरह 'निर्वाचन (Elections)' को समर्पित है।
अनुच्छेद 324(1) कहता है कि संसद, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचन से जुड़ी मतदाता सूचियों की तैयारी तथा निर्वाचन के संचालन की 'अधीक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण (Superintendence, Direction and Control)' की शक्ति निर्वाचन आयोग में निहित होगी। यह प्रावधान इतना व्यापक है कि इसने ECI को भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की सबसे शक्तिशाली संस्थाओं में से एक बना दिया है।
इसे ऐसे समझिए जैसे किसी बड़े क्रिकेट मैच में अंपायर की भूमिका — अंपायर किसी भी टीम का हिस्सा नहीं होता, फिर भी मैच के दौरान हर फैसला उसी का अंतिम माना जाता है। ठीक इसी तरह, निर्वाचन आयोग किसी राजनीतिक दल या सरकार का हिस्सा नहीं होता, लेकिन चुनाव के दौरान उसका हर निर्देश अंतिम व बाध्यकारी होता है — चाहे वह सत्तारूढ़ दल हो या विपक्ष।
| अनुच्छेद | विषय-वस्तु |
|---|---|
| अनुच्छेद 324 | निर्वाचन आयोग की स्थापना एवं अधीक्षण-निर्देशन-नियंत्रण की शक्ति |
| अनुच्छेद 325 | धर्म, जाति, लिंग के आधार पर मतदाता सूची में भेदभाव न करने का सिद्धांत |
| अनुच्छेद 326 | लोकसभा व विधानसभाओं के लिए वयस्क मताधिकार (Universal Adult Suffrage) |
| अनुच्छेद 327-328 | संसद व राज्य विधानमंडल को निर्वाचन संबंधी कानून बनाने की शक्ति |
| अनुच्छेद 329 | चुनावी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर सीमाएं (चुनाव याचिका के अतिरिक्त) |
निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई — यानी संविधान लागू होने (26 जनवरी 1950) से ठीक एक दिन पहले, जो इस बात का प्रतीक है कि संविधान निर्माता चुनावी व्यवस्था को गणतंत्र की स्थापना जितना ही महत्वपूर्ण मानते थे। इसीलिए हर साल 25 जनवरी को 'राष्ट्रीय मतदाता दिवस (National Voters' Day)' के रूप में मनाया जाता है।
शुरुआत में निर्वाचन आयोग एक 'एकल सदस्यीय (Single-Member)' संस्था थी — यानी सिर्फ एक मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner — CEC) होता था। यह व्यवस्था लगभग चार दशकों तक चली, जब तक अक्टूबर 1989 में पहली बार इसे अस्थायी रूप से बहु-सदस्यीय बनाया गया (हालांकि जनवरी 1990 में यह फिर एकल सदस्यीय हो गया)। आख़िरकार 1 अक्टूबर 1993 को इसे स्थायी रूप से बहु-सदस्यीय (Multi-Member) बना दिया गया, और तब से आज तक निर्वाचन आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो अन्य चुनाव आयुक्त — कुल तीन सदस्य — होते हैं।
बहु-सदस्यीय आयोग बनाने का मुख्य उद्देश्य था — निर्णय-प्रक्रिया में सामूहिकता व संतुलन लाना, ताकि किसी एक व्यक्ति के हाथों में इतनी बड़ी शक्ति केंद्रित न रहे। तीनों आयुक्तों के बीच किसी भी मतभेद की स्थिति में, निर्णय बहुमत (Majority) के आधार पर लिया जाता है — यानी CEC के पास कोई विशेष 'वीटो' या निर्णायक अतिरिक्त वोट नहीं होता, वह भी बाकी दो आयुक्तों के समान ही एक वोट रखता है।
वर्तमान में निर्वाचन आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) तथा दो अन्य चुनाव आयुक्त (Election Commissioners — EC) होते हैं — तीनों को सामूहिक रूप से बराबर शक्तियां व वेतन-भत्ते प्राप्त होते हैं (मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ प्रोटोकॉल व अध्यक्षता में वरीयता मिलती है)। तीनों का वेतन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन के बराबर होता है।
प्रत्येक आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक (जो भी पहले हो) होता है — यह ठीक वैसी ही व्यवस्था है जैसी हम आगे UPSC सदस्यों के लिए भी देखेंगे (अनुच्छेद 316)। यह समानता दर्शाती है कि संविधान निर्माताओं ने दोनों संस्थाओं की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए समान सिद्धांत अपनाए।
दशकों तक भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पूरी तरह राष्ट्रपति द्वारा, यानी व्यवहार में केंद्रीय मंत्रिमंडल (प्रधानमंत्री) की सलाह पर की जाती थी — संविधान में इसके लिए कोई स्वतंत्र, बहु-पक्षीय समिति नहीं थी। इस व्यवस्था की लंबे समय से आलोचना होती रही कि जब नियुक्ति करने वाली सरकार खुद ही चुनाव में एक 'पक्ष' होती है, तो क्या यह निर्वाचन आयोग की तटस्थता को प्रभावित नहीं करता?
अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) 2 मार्च 2023 को न्यायमूर्ति के.एम. जोसेफ की अध्यक्षता वाली 5-सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से एक ऐतिहासिक निर्णय दिया — जब तक संसद इस विषय पर कोई कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक 3-सदस्यीय समिति की सिफारिश पर होगी, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता) तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल होंगे। कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपनी व्यापक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह निर्देश दिया, क्योंकि कोर्ट ने पाया कि इस विषय पर एक 'संवैधानिक रिक्तता (Constitutional Vacuum)' मौजूद थी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद, संसद ने 'मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं पदावधि) अधिनियम, 2023' पारित किया — यह राज्यसभा से 12 दिसंबर 2023 को तथा लोकसभा से 21 दिसंबर 2023 को पारित हुआ, और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद 2 जनवरी 2024 से प्रभावी हुआ। इस अधिनियम ने 1991 के पुराने कानून की जगह ली।
खोज समिति (Search Committee) — विधि मंत्री की अध्यक्षता में एक खोज समिति पहले 5 उम्मीदवारों की एक शॉर्टलिस्ट तैयार करती है चयन समिति (Selection Committee) — प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता — यह 3-सदस्यीय समिति शॉर्टलिस्ट में से अंतिम चयन कर राष्ट्रपति को सिफारिश भेजती है CJI को हटाया जाना — अनूप बरनवाल निर्णय में शामिल भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की जगह अब एक कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया है
संविधान ने मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण, जानबूझकर किया गया अंतर रखा है — जो निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता की एक बड़ी गारंटी है।
यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि कोई भी सरकार सिर्फ अपनी पसंद के अनुसार परिणाम न लाने पर आयुक्तों को आसानी से न हटा सके। यही कारण है कि निर्वाचन आयोग को भारत की सबसे मज़बूत, स्वतंत्र संस्थाओं में गिना जाता है — CEC को हटाना लगभग उतना ही कठिन है जितना किसी सुप्रीम कोर्ट जज को हटाना।
1. सुरक्षित कार्यकाल — जैसा टॉपिक 6 में देखा, आयुक्तों को हटाना अत्यंत कठिन है, जिससे वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के काम कर सकते हैं।
2. सेवा शर्तों में प्रतिकूल बदलाव पर रोक — किसी आयुक्त की नियुक्ति के बाद, उसकी सेवा शर्तों (जैसे वेतन-भत्ते) को उसके नुकसान की दिशा में नहीं बदला जा सकता।
3. निश्चित वेतन — तीनों आयुक्तों का वेतन सुप्रीम कोर्ट जज के समान, संसद द्वारा तय, और भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित (Charged) होता है — यानी हर साल संसद में इस पर मतदान नहीं होता।
4. पुनर्नियुक्ति पर सीमा — CEC के रूप में सेवा दे चुका व्यक्ति सेवानिवृत्ति के बाद केंद्र या राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होता, जिससे भविष्य में किसी लाभ की उम्मीद में पक्षपात की आशंका कम होती है।
निर्वाचन आयोग के कार्यों को व्यापक रूप से प्रशासनिक, सलाहकार व अर्ध-न्यायिक — तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है।
| कार्य की श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| प्रशासनिक कार्य | मतदाता सूची तैयार व अद्यतन करना (देखें अध्याय 23), निर्वाचन क्षेत्रों का सीमांकन में सहयोग, चुनाव तिथियों की घोषणा, आदर्श आचार संहिता लागू करना |
| राजनीतिक दलों संबंधी कार्य | राजनीतिक दलों को पंजीकृत करना, राष्ट्रीय/राज्य दल के रूप में मान्यता देना, चुनाव चिन्ह आवंटित करना (देखें अध्याय 23) |
| सलाहकार कार्य | राष्ट्रपति/राज्यपाल को सांसदों/विधायकों की सदन-सदस्यता संबंधी अयोग्यता पर सलाह देना (अनुच्छेद 103, 192) |
| अर्ध-न्यायिक कार्य | चुनाव चिन्ह व दलों के विभाजन से जुड़े विवादों का निपटारा करना, उम्मीदवारों की अयोग्यता से जुड़े मामलों की जांच |
अनुच्छेद 103 के तहत, यदि किसी संसद सदस्य की सदस्यता के लिए अयोग्यता को लेकर कोई प्रश्न उठता है (जैसे कोई लाभ का पद धारण करना), तो राष्ट्रपति यह मामला निर्वाचन आयोग को भेजते हैं, और आयोग की सलाह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होती है। राज्य विधानमंडल के सदस्यों के लिए यही व्यवस्था अनुच्छेद 192 के तहत राज्यपाल के लिए लागू होती है।
चुनाव जैसे विशाल कार्य को अंजाम देने के लिए निर्वाचन आयोग को हर राज्य व ज़िले में एक विस्तृत प्रशासनिक श्रृंखला की आवश्यकता होती है — यह श्रृंखला केंद्र से लेकर हर मतदान केंद्र तक फैली होती है।
| पद | स्तर एवं भूमिका |
|---|---|
| मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) | राज्य स्तर — राज्य में चुनाव प्रक्रिया का समन्वय, सामान्यतः वरिष्ठ IAS अधिकारी |
| ज़िला निर्वाचन अधिकारी (DEO) | ज़िला स्तर — आमतौर पर ज़िला कलेक्टर, ज़िले में चुनाव संचालन की ज़िम्मेदारी |
| रिटर्निंग अधिकारी (RO) | निर्वाचन क्षेत्र स्तर — नामांकन प्राप्त करना, मतगणना व परिणाम घोषित करना |
| पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) | मतदान केंद्र स्तर — मतदान केंद्र पर मतदान प्रक्रिया का सीधा संचालन |
निर्वाचन आयोग की शक्तियों की सीमा को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक व्याख्या 1978 के मोहिंदर सिंह गिल मामले से मिलती है, जिसने यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 324 सिर्फ एक 'खाली' या 'सांकेतिक' प्रावधान नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग को वास्तविक, व्यापक शक्तियां देता है।
मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त (1978) सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि जहां भी चुनाव संचालन से जुड़ा कोई विशिष्ट कानून या नियम मौजूद नहीं है (यानी 'विधायी रिक्तता'), वहां निर्वाचन आयोग अनुच्छेद 324 के तहत अपनी अवशिष्ट/व्यापक शक्तियों (Plenary/Residuary Powers) का उपयोग कर आवश्यक कदम उठा सकता है — जैसे किसी क्षेत्र में मतदान रद्द करना या पुनर्मतदान (Re-poll) का आदेश देना, ताकि स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित हो सकें। यह निर्णय आयोग को एक सशक्त, गतिशील संस्था के रूप में स्थापित करता है, जो सिर्फ मौजूदा कानूनों को यांत्रिक रूप से लागू करने तक सीमित नहीं।
जैसा इस अध्याय की शुरुआती कहानी में देखा, 1990-1996 के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टी.एन. शेषन को भारतीय निर्वाचन आयोग के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ लाने वाला व्यक्तित्व माना जाता है। उन्होंने अनुच्छेद 324 की व्यापक शक्तियों का सक्रिय रूप से इस्तेमाल कर आदर्श आचार संहिता को सख़्ती से लागू किया, चुनावी खर्च की निगरानी बढ़ाई, तथा फ़ोटो पहचान पत्र (Voter ID) की शुरुआत को गति दी — जिससे फर्ज़ी मतदान पर काफी हद तक अंकुश लगा।
शेषन के कार्यकाल को अक्सर यह दिखाने के उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है कि एक संवैधानिक संस्था, यदि उसका नेतृत्व दृढ़ इच्छाशक्ति वाला हो, तो वह कितनी प्रभावी ढंग से अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकती है — बिना किसी नए कानून की प्रतीक्षा किए, सिर्फ मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के बेहतर व सख़्त क्रियान्वयन के ज़रिए भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct — MCC) तथा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन-VVPAT (EVM-VVPAT), निर्वाचन आयोग के दो सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक औज़ार हैं, जिनकी हमने अध्याय 23 में पूरी गहराई से चर्चा की है — MCC का इतिहास (1960 केरल से 1979 के औपचारिकीकरण तक), इसके प्रावधान, तथा EVM-VVPAT की तकनीक, ADR बनाम भारत निर्वाचन आयोग (2024) मामले में 100% VVPAT सत्यापन की मांग खारिज होने का विस्तृत विवरण वहां उपलब्ध है।
यहां यह समझना ज़रूरी है कि ये दोनों औज़ार निर्वाचन आयोग की उन्हीं अनुच्छेद 324 शक्तियों से प्रवाहित होते हैं, जिनकी हमने इस अध्याय में चर्चा की — MCC किसी संसदीय कानून से नहीं, बल्कि आयोग की प्रशासनिक शक्ति से लागू होता है (देखें टॉपिक 10 — मोहिंदर सिंह गिल सिद्धांत), जबकि EVM का इस्तेमाल जनप्रतिनिधित्व अधिनियम व संबंधित नियमों के प्रावधानों पर आधारित है।
वर्तमान में निर्वाचन आयोग कई नई, जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिनकी हमने अध्याय 23 में विस्तार से चर्चा की है — यहां हम सिर्फ संक्षिप्त सूची व क्रॉस-रेफरेंस देते हैं, ताकि दोहराव से बचा जा सके।
1. विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) 2025-26 — मतदाता सूचियों की शुद्धता सुनिश्चित करने की महत्वाकांक्षी प्रक्रिया, जिसमें राजस्थान भी शामिल है (देखें अध्याय 23, टॉपिक 7-8)।
2. परिसीमन 2026 की चुनौती — दक्षिणी बनाम उत्तरी राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण की जटिल बहस (देखें अध्याय 23, टॉपिक 9)।
3. एक राष्ट्र-एक चुनाव — कोविंद समिति व JPC की सिफारिशों के आधार पर संभावित बड़ा संरचनात्मक बदलाव (देखें अध्याय 23, टॉपिक 19)।
4. AI व डीपफेक से जुड़ी चुनौतियां — चुनाव प्रचार में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दुरुपयोग को रोकने हेतु आयोग के नए दिशा-निर्देश (देखें अध्याय 22)।
भारत का निर्वाचन आयोग विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में, दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी कवायद (जैसा अध्याय 23 में 2024 के 64.2 करोड़ मतदाताओं के आंकड़े से स्पष्ट है) को सफलतापूर्वक संचालित करने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रशंसित रहा है। हालांकि, कुछ आलोचनाएं भी लगातार उठती रही हैं — जैसे नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के प्रभाव की आशंका (देखें टॉपिक 5), आदर्श आचार संहिता का कोई ठोस वैधानिक आधार न होना, तथा कुछ मामलों में निष्पक्षता को लेकर विपक्षी दलों द्वारा उठाए गए सवाल।
फिर भी, निर्वाचन आयोग की संस्थागत साख आज भी दुनिया भर के कई नए लोकतंत्रों के लिए एक मॉडल मानी जाती है — बांग्लादेश, नेपाल व अफ्रीका के कई देशों के चुनाव आयोगों ने भारतीय ECI के अनुभव व तकनीकी सहयोग (जैसे EVM तकनीक) का लाभ उठाया है।
अब हम इस अध्याय के दूसरे बड़े स्तंभ की ओर बढ़ते हैं — संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission — UPSC), जो भारत की सर्वोच्च भर्ती संस्था है, तथा जिसके ज़रिए हर साल लाखों युवा IAS, IPS, IFS जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं में चयनित होने का सपना देखते हैं।
UPSC का इतिहास संविधान से भी पुराना है। 1912 में गठित 'इस्लिंग्टन आयोग (Islington Commission)' ने पहली बार भारत में एक लोक सेवा आयोग बनाने की सिफारिश की थी। इसके बाद 1924 में 'ली आयोग (Lee Commission)' ने भी इसी सिफारिश को दोहराया। परिणामस्वरूप, भारत सरकार अधिनियम, 1919 के प्रावधानों के तहत 1 अक्टूबर 1926 को 'लोक सेवा आयोग (Public Service Commission)' की स्थापना हुई — सर रॉस बार्कर इसके पहले अध्यक्ष बने। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत इसे 'संघीय लोक सेवा आयोग (Federal Public Service Commission)' नाम दिया गया, और आख़िरकार 26 जनवरी 1950 को, संविधान लागू होने के साथ ही, यह 'संघ लोक सेवा आयोग (UPSC)' बना — जो आज भी उसी नाम से कार्यरत है। इस प्रकार, 2026 में UPSC अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है।
2026, UPSC की स्थापना (1926) का शताब्दी वर्ष है — यह दिखाता है कि भारत में योग्यता-आधारित, निष्पक्ष सरकारी भर्ती की परंपरा एक सदी पुरानी है, जो औपनिवेशिक काल से चली आ रही है, लेकिन संविधान ने इसे एक मज़बूत, स्वतंत्र संवैधानिक दर्जा देकर और सशक्त बनाया।
UPSC व राज्य लोक सेवा आयोगों (SPSC) का संवैधानिक आधार संविधान के भाग 14 में अनुच्छेद 315 से 323 तक फैला हुआ है।
| अनुच्छेद | विषय-वस्तु |
|---|---|
| अनुच्छेद 315 | संघ व राज्यों के लिए लोक सेवा आयोगों की स्थापना |
| अनुच्छेद 316 | सदस्यों की नियुक्ति एवं कार्यकाल |
| अनुच्छेद 317 | सदस्यों को हटाना व निलंबित करना |
| अनुच्छेद 318 | सदस्यों व कर्मचारियों की सेवा शर्तें विनियमित करने की शक्ति |
| अनुच्छेद 319 | सदस्यों की सेवानिवृत्ति बाद पदों के लिए अपात्रता |
| अनुच्छेद 320 | लोक सेवा आयोगों के कार्य |
| अनुच्छेद 321 | आयोगों के कार्यों का विस्तार करने की शक्ति |
| अनुच्छेद 322 | आयोगों का व्यय — संचित निधि पर भारित |
| अनुच्छेद 323 | आयोगों द्वारा वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करना |
अनुच्छेद 316 के अनुसार, UPSC में एक अध्यक्ष (Chairman) तथा अन्य सदस्य होते हैं — सदस्यों की सटीक संख्या संविधान में तय नहीं की गई है, बल्कि यह राष्ट्रपति द्वारा प्रशासनिक आवश्यकता के अनुसार तय की जाती है (वर्तमान में आमतौर पर अध्यक्ष सहित 9-11 सदस्य होते हैं)। अध्यक्ष व सभी सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
संविधान यह भी प्रावधान करता है कि UPSC के कम से कम आधे सदस्य ऐसे होने चाहिए, जिन्होंने भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कम से कम 10 वर्ष तक पद धारण किया हो — इसका उद्देश्य आयोग में प्रशासनिक अनुभव व व्यावहारिक ज्ञान का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक (जो भी पहले हो) होता है — यह ठीक उसी सिद्धांत पर आधारित है जो हमने निर्वाचन आयुक्तों के लिए भी देखा (टॉपिक 3)। कोई सदस्य राष्ट्रपति को संबोधित त्यागपत्र देकर स्वयं भी पद छोड़ सकता है।
अनुच्छेद 317 UPSC (व राज्य लोक सेवा आयोगों) के अध्यक्ष व सदस्यों को हटाने की प्रक्रिया तय करता है — यह प्रक्रिया दो अलग-अलग आधारों पर बंटी है, जो सदस्यों को मनमानी बर्ख़ास्तगी से बचाने के लिए बनाई गई है।
यह ध्यान देने योग्य है कि 'दुर्व्यवहार' के आधार पर हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की जांच व सकारात्मक रिपोर्ट अनिवार्य है — राष्ट्रपति (यानी व्यवहार में सरकार) अकेले इस आधार पर किसी सदस्य को नहीं हटा सकते। यह प्रावधान UPSC सदस्यों को कार्यपालिका के मनमाने दबाव से बचाने की एक मज़बूत गारंटी है — ठीक वैसी ही जैसी हमने CEC के लिए महाभियोग प्रक्रिया में देखी (टॉपिक 6)।
1. सुरक्षित कार्यकाल — जैसा टॉपिक 18 में देखा, अध्यक्ष व सदस्यों को हटाना अत्यंत कठिन प्रक्रिया के अधीन है।
2. सेवा शर्तों में प्रतिकूल बदलाव पर रोक — नियुक्ति के बाद सेवा शर्तों को सदस्य के नुकसान की दिशा में नहीं बदला जा सकता (अनुच्छेद 318 के अपवाद सहित)।
3. संचित निधि पर भारित व्यय — UPSC का सम्पूर्ण प्रशासनिक व्यय (वेतन, भत्ते, पेंशन) भारत की संचित निधि पर भारित है (अनुच्छेद 322) — यानी यह संसद में वार्षिक मतदान के अधीन नहीं।
4. पुनर्नियुक्ति पर सीमा (अनुच्छेद 319) — UPSC अध्यक्ष सेवानिवृत्ति के बाद भारत या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होता (सिवाय UPSC/SPSC अध्यक्ष या सदस्य पद के)। UPSC सदस्य (अध्यक्ष के अलावा) आगे चलकर UPSC अध्यक्ष या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त हो सकते हैं, परंतु अन्य किसी सरकारी नौकरी के लिए पात्र नहीं होते।
5. वार्षिक प्रतिवेदन (अनुच्छेद 323) — UPSC हर वर्ष राष्ट्रपति को अपना कार्य-प्रतिवेदन सौंपता है, जिसे संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाता है — साथ में एक ज्ञापन (Memorandum) भी होता है, जिसमें बताया जाता है कि आयोग की सलाह कहां-कहां स्वीकार नहीं की गई, और क्यों।
अनुच्छेद 320 UPSC के कार्यों को विस्तार से परिभाषित करता है — यह सिर्फ 'परीक्षा लेने वाली संस्था' नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की समूची कार्मिक (Personnel) व्यवस्था की एक व्यापक सलाहकार संस्था भी है।
1. भर्ती परीक्षाएं आयोजित करना — संघ की सेवाओं (जैसे IAS, IPS, IFS आदि) में नियुक्ति हेतु परीक्षाएं आयोजित करना — UPSC का सबसे प्रसिद्ध कार्य।
2. संयुक्त भर्ती के लिए सहायता — यदि दो या अधिक राज्य अनुरोध करें, तो उनके लिए एक संयुक्त भर्ती योजना तैयार करने में सहायता करना।
3. राज्यों को सेवाएं देना — किसी राज्य के अनुरोध पर व राष्ट्रपति की सहमति से, उस राज्य की ज़रूरतों के लिए भी अपनी सेवाएं (जैसे संयुक्त परीक्षा आयोजित करना) उपलब्ध कराना।
4. भर्ती के तरीकों व सिद्धांतों पर परामर्श — सिविल सेवाओं व पदों पर भर्ती के तरीकों, तथा नियुक्तियों, प्रोन्नतियों (Promotions) व तबादलों (Transfers) में अपनाए जाने वाले सिद्धांतों पर सरकार को सलाह देना।
5. अनुशासनिक मामलों पर परामर्श — किसी सिविल सेवक के विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई से जुड़े मामलों पर परामर्श देना — जैसे किसी अधिकारी को बर्ख़ास्त करना या पदावनत करना।
6. कानूनी खर्च व चोट-मुआवज़े संबंधी दावे — किसी सिविल सेवक द्वारा अपनी सरकारी ड्यूटी के दौरान की गई कार्रवाई के लिए कानूनी कार्यवाही में हुए खर्च की प्रतिपूर्ति, या ड्यूटी के दौरान चोट लगने पर पेंशन संबंधी दावों पर भी सलाह देना।
UPSC के परामर्श से छूट (अनुच्छेद 320(3) का प्रावधान)
राष्ट्रपति (केंद्र के मामले में) या राज्यपाल (राज्य के मामले में) किसी विशेष वर्ग के पदों, सेवाओं या मामलों को UPSC/SPSC के परामर्श की आवश्यकता से छूट दे सकते हैं — जैसे अखिल भारतीय सेवाओं की भर्ती के अलावा निचले स्तर (ग्रुप 'ग'/'घ') के कई पदों की भर्ती में, या अस्थायी नियुक्तियों में, आमतौर पर UPSC के परामर्श की आवश्यकता नहीं होती।
UPSC द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा (Civil Services Examination — CSE) भारत की सबसे प्रतिष्ठित व सबसे प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में से एक मानी जाती है, जिसके ज़रिए IAS, IPS, IFS सहित लगभग 20+ केंद्रीय सेवाओं में चयन होता है। यह परीक्षा तीन चरणों में होती है।
| चरण | संरचना |
|---|---|
| प्रारंभिक परीक्षा (Preliminary) | दो प्रश्न-पत्र — सामान्य अध्ययन प्रश्न-पत्र I (मेरिट में गिना जाता है) व CSAT प्रश्न-पत्र II (सिर्फ क्वालिफाइंग, न्यूनतम 33% अनिवार्य) |
| मुख्य परीक्षा (Mains) | कुल 9 प्रश्न-पत्र — निबंध, सामान्य अध्ययन I-IV, वैकल्पिक विषय I-II (मेरिट में गिने जाते हैं); तथा 2 भाषा प्रश्न-पत्र (सिर्फ क्वालिफाइंग) |
| साक्षात्कार/व्यक्तित्व परीक्षण (Interview) | 275 अंकों का साक्षात्कार — उम्मीदवार के व्यक्तित्व, सामान्य ज्ञान व निर्णय-क्षमता का आकलन |
मुख्य परीक्षा व साक्षात्कार, दोनों के संयुक्त अंकों के आधार पर अंतिम मेधा सूची (Final Merit List) तैयार होती है — प्रारंभिक परीक्षा के अंक अंतिम चयन में नहीं जोड़े जाते, यह सिर्फ मुख्य परीक्षा के लिए 'छनाई (Screening)' का माध्यम है।
'पार्श्व प्रवेश (Lateral Entry)' का अर्थ है — पारंपरिक सिविल सेवा परीक्षा के ज़रिए नीचे से ऊपर बढ़ने के बजाय, निजी क्षेत्र, शिक्षा जगत या अन्य पेशेवर क्षेत्रों के विशेषज्ञों को सीधे संयुक्त सचिव (Joint Secretary), निदेशक (Director) या उप-सचिव (Deputy Secretary) जैसे वरिष्ठ पदों पर नियुक्त करना। इसे 2018 में विशेष विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों (जैसे वित्त, अर्थशास्त्र, तकनीकी विषय) में ताज़ा दृष्टिकोण व विशेषज्ञता लाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।
अगस्त 2024 में UPSC ने पार्श्व प्रवेश के तहत 45 पदों (10 संयुक्त सचिव, 35 निदेशक/उप-सचिव) के लिए विज्ञापन जारी किया। लेकिन इस विज्ञापन में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग (SC/ST/OBC) के लिए कोई आरक्षण नहीं था — जिसके कारण विपक्षी दलों व सामाजिक न्याय से जुड़े संगठनों ने तीखा विरोध किया। इस दबाव में केंद्र सरकार ने कार्मिक राज्य मंत्री के माध्यम से UPSC अध्यक्ष को यह विज्ञापन रद्द करने का निर्देश दिया, और 20 अगस्त 2024 को यह विज्ञापन वापस ले लिया गया। सरकार ने स्पष्ट किया कि भविष्य में पार्श्व प्रवेश को आरक्षण के सिद्धांतों के अनुरूप बनाया जाएगा।
इस विवाद ने एक महत्वपूर्ण नीतिगत बहस को जन्म दिया — क्या संविदा (Contractual) आधार पर होने वाली अल्पकालिक नियुक्तियों पर भी आरक्षण के संवैधानिक सिद्धांत (अनुच्छेद 16(4), देखें अध्याय 4-5) लागू होने चाहिए? यह विषय आज भी संसदीय स्थायी समिति के समक्ष विचाराधीन है।
1. सलाह बाध्यकारी नहीं — UPSC की सलाह सिर्फ 'परामर्शी (Advisory)' प्रकृति की होती है, सरकार उसे मानने के लिए बाध्य नहीं — हालांकि सरकार को असहमति के कारण वार्षिक प्रतिवेदन में स्पष्ट करने होते हैं (अनुच्छेद 323)।
2. सीमित क्षेत्राधिकार — रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB), कर्मचारी चयन आयोग (SSC) जैसी अन्य भर्ती एजेंसियां भी बनी हुई हैं, जिससे केंद्र सरकार की भर्ती व्यवस्था कई एजेंसियों में बंटी हुई है।
3. लंबी चयन प्रक्रिया — सिविल सेवा परीक्षा की पूरी प्रक्रिया (प्रारंभिक-मुख्य-साक्षात्कार) में लगभग एक वर्ष से अधिक का समय लगता है, जिसे लेकर प्रक्रिया को तेज़ बनाने की मांग उठती रही है।
4. पार्श्व प्रवेश जैसी नई नीतियों पर बहस — जैसा टॉपिक 22 में देखा, नई भर्ती नीतियां कई बार सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के साथ तालमेल बिठाने में चुनौतियां पैदा करती हैं।
जैसा हमने अनुच्छेद 315 में देखा, संविधान सिर्फ UPSC ही नहीं, बल्कि हर राज्य के लिए एक 'राज्य लोक सेवा आयोग (State Public Service Commission — SPSC)' की भी व्यवस्था करता है। इनकी संरचना, नियुक्ति, कार्यकाल, हटाने की प्रक्रिया व कार्य — लगभग UPSC जैसे ही होते हैं, बस कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं।
| बिंदु | UPSC | राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) |
|---|---|---|
| नियुक्ति प्राधिकारी | राष्ट्रपति द्वारा | राज्यपाल द्वारा |
| हटाने की प्रक्रिया | राष्ट्रपति (दुर्व्यवहार पर सुप्रीम कोर्ट जांच) | राष्ट्रपति ही हटाते हैं (राज्यपाल नहीं) — दुर्व्यवहार पर सुप्रीम कोर्ट जांच |
| व्यय का भार | भारत की संचित निधि पर | राज्य की संचित निधि पर |
| वार्षिक प्रतिवेदन | राष्ट्रपति को, संसद में रखा जाता है | राज्यपाल को, राज्य विधानमंडल में रखा जाता है |
यद्यपि SPSC सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, फिर भी उन्हें हटाने की शक्ति सिर्फ राष्ट्रपति के पास है, राज्यपाल के पास नहीं — यह प्रावधान SPSC को राज्य सरकार के राजनीतिक दबाव से और अधिक सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है, ताकि राज्य स्तर पर भी भर्ती संस्था पूरी तरह स्वतंत्र रह सके।
राजस्थान लोक सेवा आयोग (Rajasthan Public Service Commission — RPSC) का गठन 1949 में हुआ — यानी संविधान लागू होने से भी पहले, राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया के दौरान ही — जो दिखाता है कि राज्य ने शुरू से ही योग्यता-आधारित भर्ती व्यवस्था को प्राथमिकता दी। आयोग का मुख्यालय अजमेर में है।
RPSC की संरचना संवैधानिक रूप से UPSC जैसी ही है — इसमें एक अध्यक्ष तथा अन्य सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है (अनुच्छेद 316)। सदस्यों का कार्यकाल भी 6 वर्ष या 62 वर्ष की आयु (राज्य आयोगों के सदस्यों के लिए आयु-सीमा 62 वर्ष होती है, जबकि UPSC सदस्यों के लिए यह 65 वर्ष है) — जो भी पहले हो, तक होता है।
RPSC के प्रमुख कार्य
1. राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) परीक्षा — राज्य की सबसे प्रतिष्ठित संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा, जिसके ज़रिए RAS, RPS (राजस्थान पुलिस सेवा) व अन्य राज्य सेवाओं में भर्ती होती है।
2. अधीनस्थ सेवा परीक्षाएं — विभिन्न राज्य विभागों में अधीनस्थ (Subordinate) पदों की भर्ती परीक्षाएं आयोजित करना।
3. शिक्षक भर्ती परीक्षाएं — प्रथम श्रेणी व द्वितीय श्रेणी शिक्षक भर्ती जैसी बड़े पैमाने की परीक्षाएं, जिनमें लाखों अभ्यर्थी शामिल होते हैं।
4. पदोन्नति व सेवा नियम संबंधी परामर्श — राज्य सरकार को सिविल सेवकों की पदोन्नति, अनुशासनिक कार्रवाई व सेवा नियमों पर सलाह देना (अनुच्छेद 320 के समान)।
राजस्थान प्रशासनिक सेवा (Rajasthan Administrative Service — RAS) संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा, ठीक UPSC की सिविल सेवा परीक्षा की तरह, तीन चरणों में आयोजित होती है — यही कारण है कि RAS की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए UPSC पैटर्न को समझना भी उपयोगी होता है।
| चरण | संरचना |
|---|---|
| प्रारंभिक परीक्षा (RAS Pre) | सामान्य अध्ययन का एक प्रश्न-पत्र — वस्तुनिष्ठ (Objective) प्रकार, सिर्फ छनाई (Screening) हेतु, मेरिट में नहीं जुड़ता |
| मुख्य परीक्षा (RAS Mains) | सामान्य अध्ययन के कई प्रश्न-पत्र (वर्णनात्मक/Descriptive प्रकार) — राजस्थान इतिहास-भूगोल-संस्कृति, भारतीय संविधान-राजव्यवस्था-शासन सहित कई प्रश्न-पत्र |
| साक्षात्कार (Interview) | व्यक्तित्व परीक्षण — उम्मीदवार के प्रशासनिक दृष्टिकोण, सामान्य जागरूकता व निर्णय-क्षमता का आकलन |
RAS परीक्षा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि RAS मुख्य परीक्षा में राजस्थान-विशिष्ट विषयों (जैसे राजस्थान का इतिहास, कला-संस्कृति, भूगोल, अर्थव्यवस्था) पर विशेष ज़ोर होता है — यह UPSC की सिविल सेवा परीक्षा से एक बड़ा अंतर है, जहां राष्ट्रीय स्तर के विषयों पर ध्यान केंद्रित होता है।
पिछले कुछ वर्षों में RPSC, दुर्भाग्यवश, पेपर लीक (Paper Leak) जैसे गंभीर विवादों के लिए भी बार-बार चर्चा में रहा है — जो एक भर्ती संस्था की सबसे बड़ी संपत्ति, यानी उसकी विश्वसनीयता (Credibility), पर सीधा आघात है।
RPSC द्वितीय श्रेणी शिक्षक भर्ती पेपर लीक (2022-23) दिसंबर 2022 में, द्वितीय श्रेणी शिक्षक भर्ती परीक्षा के सामान्य ज्ञान प्रश्न-पत्र की परीक्षा से कुछ घंटे पहले ही लीक हो जाने पर उदयपुर ज़िले में 44 लोगों (37 अभ्यर्थी व 7 विशेषज्ञ) को गिरफ्तार किया गया, तथा उस विषय की परीक्षा रद्द करनी पड़ी। इस मामले की जांच में अप्रैल 2023 में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया — स्वयं RPSC के एक सदस्य, बाबूलाल कटारा, को इस पेपर लीक मामले में गिरफ्तार किया गया, आरोप था कि उन्होंने प्रश्न-पत्र लीक करने के बदले ₹60 लाख की रिश्वत ली थी। यह मामला विशेष रूप से गंभीर था, क्योंकि आरोपी कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि खुद आयोग का एक संवैधानिक सदस्य था।
यह संकट यहीं नहीं थमा — सितंबर 2025 में एक अन्य RPSC सदस्य, मंजू शर्मा, ने राजस्थान उच्च न्यायालय की आयोग की कार्यप्रणाली व जवाबदेही को लेकर की गई आलोचनात्मक टिप्पणियों के बाद इस्तीफा दिया, जिसे राज्यपाल ने स्वीकार किया। नवंबर 2025 में एक और सदस्य, संगीता आर्य, ने कार्यपालक अधिकारी (Executive Officer) भर्ती परीक्षा में कथित पेपर लीक से जुड़े मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की पूछताछ के बाद इस्तीफा दे दिया। जनवरी 2026 तक, विभिन्न पेपर लीक मामलों में कुल मिलाकर लगभग 340 गिरफ्तारियां हो चुकी थीं — हालांकि सरकार का यह भी कहना है कि इसी अवधि में 296 भर्ती परीक्षाएं बिना किसी लीक के सफलतापूर्वक आयोजित की जा चुकी हैं।
सरकार व राज्य की प्रतिक्रिया
इन घटनाओं के बाद राजस्थान सरकार ने 'राजस्थान लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2022' पारित किया, जो पेपर लीक व नकल-गिरोहों में शामिल दोषियों के लिए आजीवन कारावास तक की सज़ा तथा भारी जुर्माने का प्रावधान करता है। इसके अतिरिक्त, विशेष अभियान समूह (Special Operations Group — SOG) को भी परीक्षा-संबंधी अपराधों की जांच में विशेष रूप से सक्रिय किया गया है।
यह केस स्टडी सिर्फ एक नकारात्मक खबर नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण सबक भी है — यह दिखाती है कि संवैधानिक संस्थाएं, चाहे वे कितनी भी स्वतंत्र क्यों न हों, उनकी वास्तविक साख उनके भीतर काम करने वाले व्यक्तियों की सत्यनिष्ठा (Integrity) पर निर्भर करती है। साथ ही, यह भी दिखाती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही तंत्र (उच्च न्यायालय की निगरानी, ACB की जांच, मीडिया की सक्रियता) किस तरह मिलकर ऐसी संस्थाओं को सुधार की दिशा में मजबूर करते हैं।
इस अध्याय में हमने भारतीय लोकतंत्र की दो आधारभूत संस्थाओं को गहराई से समझा — निर्वाचन आयोग, जो यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता शांतिपूर्ण, निष्पक्ष चुनावों के ज़रिए बदले; तथा UPSC व राज्य लोक सेवा आयोग (जैसे RPSC), जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रशासन योग्यता के आधार पर, राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होकर चले।
1. संवैधानिक स्वतंत्रता की समान वास्तुकला — दोनों संस्थाओं में सुरक्षित कार्यकाल, कठिन बर्ख़ास्तगी प्रक्रिया, संचित निधि पर भारित व्यय, तथा सेवानिवृत्ति बाद पुनर्नियुक्ति पर सीमा — यह समान वास्तुकला दिखाती है कि संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर इन संस्थाओं को कार्यपालिका के सीधे नियंत्रण से मुक्त रखा।
2. नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार जारी — अनूप बरनवाल केस व CEC/EC अधिनियम 2023 दिखाते हैं कि निर्वाचन आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया को और स्वतंत्र बनाने की बहस अभी जारी है।
3. साख बनाए रखने की चुनौती — RPSC पेपर लीक विवाद दिखाता है कि सिर्फ संवैधानिक सुरक्षा काफी नहीं — संस्था के भीतर सत्यनिष्ठा व जवाबदेही बनाए रखना उतना ही ज़रूरी है।
4. बदलते दौर की नई चुनौतियां — SIR, परिसीमन, पार्श्व प्रवेश जैसे मुद्दे दिखाते हैं कि दोनों संस्थाओं को समय के साथ नई तकनीकी व सामाजिक चुनौतियों के अनुरूप खुद को ढालना होगा।
एक जागरूक नागरिक और भावी प्रशासक के तौर पर, यह समझना ज़रूरी है कि निर्वाचन आयोग व लोक सेवा आयोग, दोनों ही भारतीय लोकतंत्र के 'अदृश्य स्तंभ' हैं — जब ये सही तरीके से काम करते हैं, तो इनकी उपस्थिति लगभग महसूस नहीं होती, लेकिन जैसे ही इनकी स्वतंत्रता या साख पर आंच आती है, पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर सवाल खड़े हो जाते हैं। इसीलिए इन संस्थाओं की स्वतंत्रता व सत्यनिष्ठा की रक्षा करना, सिर्फ इन संस्थाओं की नहीं, बल्कि हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है।
1. निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को अनुच्छेद 324 के तहत हुई — 1993 से यह स्थायी रूप से बहु-सदस्यीय (CEC + 2 EC) संस्था है, जिसका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष आयु तक होता है। 2. अनूप बरनवाल केस (2023) ने PM-LoP-CJI समिति की व्यवस्था दी, लेकिन CEC एवं EC अधिनियम 2023 ने CJI की जगह कैबिनेट मंत्री को शामिल किया — जो आज भी एक बड़ी संवैधानिक बहस का विषय है। 3. CEC को सुप्रीम कोर्ट जज की तरह महाभियोग से ही हटाया जा सकता है, जबकि अन्य EC को CEC की सिफारिश पर राष्ट्रपति हटाते हैं — यह असमानता आयोग की स्वतंत्रता की एक बड़ी गारंटी है। 4. मोहिंदर सिंह गिल केस (1978) ने अनुच्छेद 324 की अवशिष्ट/व्यापक शक्तियों को मान्यता दी; टी.एन. शेषन (1990-96) के कार्यकाल ने दिखाया कि मज़बूत नेतृत्व से संस्था कितनी प्रभावी बन सकती है। 5. UPSC की स्थापना 1926 में हुई (2026 में शताब्दी वर्ष), और यह अनुच्छेद 315-323 के तहत संचालित होता है — इसकी संरचना, सुरक्षा-प्रावधान व स्वतंत्रता निर्वाचन आयोग से काफी मिलती-जुलती है। 6. अनुच्छेद 317 के तहत UPSC सदस्यों को दुर्व्यवहार के आधार पर हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की जांच अनिवार्य है — जो कार्यपालिका के मनमाने हस्तक्षेप से एक मज़बूत सुरक्षा है। 7. सिविल सेवा परीक्षा तीन चरणों (प्रारंभिक-मुख्य-साक्षात्कार) में होती है; पार्श्व प्रवेश (2018 से) 2024 में SC/ST/OBC आरक्षण न होने के कारण विवादों में रहा और विज्ञापन वापस लेना पड़ा। 8. राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) UPSC जैसी ही संरचना रखते हैं, पर राज्यपाल नियुक्ति करते हैं जबकि राष्ट्रपति ही हटाने का अधिकार रखते हैं — जो राज्य स्तर पर भी स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। 9. RPSC (गठन 1949, मुख्यालय अजमेर) RAS सहित राजस्थान की प्रमुख भर्ती परीक्षाएं आयोजित करता है, जिसका ढांचा UPSC जैसा ही (प्रारंभिक-मुख्य-साक्षात्कार) है, पर राजस्थान-विशिष्ट सामग्री पर विशेष ज़ोर होता है। 10. RPSC पेपर लीक विवाद (2022 से) — बाबूलाल कटारा जैसे सदस्यों की गिरफ्तारी व 2025 के इस्तीफों तक — दिखाता है कि संवैधानिक सुरक्षा के बावजूद, संस्थागत सत्यनिष्ठा बनाए रखना एक सतत चुनौती है; राजस्थान लोक परीक्षा अधिनियम 2022 इसी दिशा में एक कदम है।