कल्पना कीजिए — 14वीं शताब्दी में दिल्ली के एक बाजार में कबीर नामक जुलाहा कपड़ा बुनते हुए दोहे गुनगुना रहा है — 'पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय' — वहीं कुछ ही दूरी पर एक सूफी संत अपनी खानकाह में हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों को समान भाव से गले लगा रहा है। यह मध्यकालीन भारत का वह दौर था, जब भक्ति व सूफी दो समानांतर धाराएं — एक हिंदू परंपरा से, दूसरी इस्लामी परंपरा से — साथ-साथ बहती हुईं, जाति-भेद व कर्मकांड की दीवारों को तोड़ रही थीं। यह अध्याय अध्याय 9 (प्राचीन धार्मिक आंदोलन) की अगली कड़ी है — RAS Mains 2024 में इन दोनों कालखंडों के बीच सीधी तुलना भी पूछी गई थी।
भक्ति आंदोलन (Bhakti Movement) की शुरुआत दक्षिण भारत में (6ठी-9वीं सदी) हुई तथा यह क्रमशः उत्तर भारत की ओर फैला (14वीं-17वीं सदी) — यह भक्ति (ईश्वर के प्रति प्रेमपूर्ण समर्पण) को मोक्ष का सर्वोच्च व सरलतम मार्ग मानता है।
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| भक्ति की प्रधानता | ज्ञान-मार्ग व कर्म-मार्ग के बजाय प्रेमपूर्ण भक्ति को मोक्ष का सरलतम साधन माना गया |
| जाति-भेद का विरोध | अधिकांश भक्ति संतों ने जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था व ऊंच-नीच को अस्वीकार किया |
| कर्मकांड की आलोचना | जटिल यज्ञ, मूर्तिपूजा व पुरोहित-वर्चस्व की आलोचना (विशेषतः निर्गुण भक्ति में) |
| जनभाषा में साहित्य | संस्कृत के बजाय क्षेत्रीय भाषाओं (तमिल, हिंदी, आदि) में उपदेश व काव्य रचना (अध्याय 7 क्रॉस-रेफरेंस) |
| गुरु का महत्व | आध्यात्मिक मार्गदर्शन हेतु गुरु की भूमिका को केंद्रीय माना गया |
भक्ति आंदोलन की शुरुआत तमिल क्षेत्र में हुई, जहां वैष्णव आलवार संत व शैव नयनार संत क्रमशः विष्णु व शिव भक्ति में लीन होकर तमिल भाषा में भावपूर्ण स्तोत्र रचते थे। RAS Mains 2023 में इनके सामाजिक-धार्मिक महत्व पर सीधा प्रश्न पूछा गया था।
| परंपरा | संख्या/देवता | विवरण |
|---|---|---|
| आलवार संत (Alvars) | 12 संत; विष्णु भक्त | प्रमुख संत: आंडाल (एकमात्र महिला आलवार), नम्मालवार, तिरुप्पाण आलवार; रचना — दिव्य प्रबंधम् (4000 तमिल स्तोत्र) |
| नयनार संत (Nayanars) | 63 संत; शिव भक्त | प्रमुख संत: अप्पार, संबंदर, सुंदरर, माणिक्यवाचकर; रचना — तेवारम् व तिरुवाचकम् |
⚠️ महत्वपूर्ण (Important Note)
RAS Mains 2023 में पूछा गया — 'नयनार और अलवार भक्ति संतों के सामाजिक-धार्मिक महत्त्व को व्याख्यायित कीजिए' — मुख्य बिंदु: जाति-भेद का विरोध, जनभाषा (तमिल) में भक्ति साहित्य, मंदिर-केंद्रित सामूहिक भक्ति परंपरा की स्थापना, तथा उत्तर भारत के परवर्ती भक्ति आंदोलन को प्रेरणा। आलवार-नयनार संतों में समाज के सभी वर्गों (निम्न जाति सहित) के लोग शामिल थे — जैसे नयनार संत नंदनार (जन्म से निम्न जाति) व आलवार संत आंडाल (महिला) — यह सामाजिक समावेशिता का प्रमाण है।
निर्गुण भक्ति में निराकार, गुणरहित ब्रह्म की उपासना होती है — मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा व कर्मकांड की कटु आलोचना इसकी पहचान है। साहित्यिक विवरण अध्याय 7 में है; यहां धार्मिक-दार्शनिक पक्ष पर बल है।
| संत | क्षेत्र/काल | मूल शिक्षा |
|---|---|---|
| कबीरदास (Kabir Das) | काशी, 15वीं सदी | हिंदू-मुस्लिम दोनों की कट्टरता की आलोचना; निराकार 'राम' की उपासना; गुरु रामानंद के शिष्य माने जाते हैं |
| गुरु नानक देव | पंजाब, 15वीं-16वीं सदी | 'इक ओंकार' (एक ईश्वर) की अवधारणा; सिख धर्म के प्रवर्तक; लंगर प्रथा द्वारा सामाजिक समानता |
| रैदास (रविदास) | काशी, 15वीं सदी | जाति-प्रथा का प्रबल विरोध; स्वयं चर्मकार जाति से — सामाजिक समता का प्रतीक |
| दादूदयाल | जयपुर/अहमदाबाद, 16वीं सदी | निर्गुण भक्ति की राजस्थान शाखा; 'दादूपंथ' के प्रवर्तक (राजस्थान कनेक्शन) |
| 💡 उदाहरण (Example) |
|---|
| निर्गुण भक्ति को सरल भाषा में समझें — जैसे हम हवा को देख नहीं सकते पर उसका अनुभव महसूस कर सकते हैं (स्पर्श, ठंडक से), वैसे ही निर्गुण भक्त ईश्वर को किसी मूर्ति/आकार में नहीं, बल्कि निराकार शक्ति के रूप में महसूस कर उसकी भक्ति करते हैं — इसीलिए कबीर मंदिर-मस्जिद दोनों की मूर्ति/कर्मकांड-पूजा की आलोचना करते थे। |
| ⚠️ महत्वपूर्ण (Important Note) |
| RAS Mains 2016 (विशेष परीक्षा) में पूछा गया — 'मध्यकालीन भारत में निर्गुण भक्ति की समृद्ध परम्परा थी। स्पष्ट कीजिए' — कबीर, नानक, रैदास, दादू के उदाहरण देकर जाति-विरोध व निराकार उपासना पर बल दें। RAS Mains 2024 में पूछा गया — 'वर्ण व्यवस्था एवं प्रचलित कुरीतियों के विरुद्ध छठी शताब्दी ईसा पूर्व के धार्मिक आन्दोलनों (बौद्ध-जैन) एवं मध्यकालीन निर्गुण भक्ति आन्दोलन के मध्य समानताओं को रेखांकित कीजिए' — दोनों ने जाति-भेद, कर्मकांड व पुरोहित-वर्चस्व का विरोध किया, जनभाषा अपनाई तथा सामाजिक समता पर बल दिया। |
सगुण भक्ति में साकार, अवतारी ईश्वर (राम/कृष्ण) की भावपूर्ण उपासना होती है — इसमें राम-भक्ति व कृष्ण-भक्ति दोनों धाराएं शामिल हैं।
| संत | धारा/क्षेत्र | मूल शिक्षा |
|---|---|---|
| तुलसीदास (Tulsidas) | राम-भक्ति, अवध | रामचरितमानस के माध्यम से राम को आदर्श मर्यादा-पुरुषोत्तम के रूप में प्रस्तुत |
| सूरदास (Surdas) | कृष्ण-भक्ति, ब्रज | कृष्ण की बाल-लीला व राधा-कृष्ण प्रेम का भावपूर्ण चित्रण; वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग से संबद्ध |
| मीराबाई (Mirabai) | कृष्ण-भक्ति, मेवाड़ (राजस्थान) | मेवाड़ की राजकुमारी; कृष्ण को पति रूप में मानकर भक्ति; सामाजिक-पारिवारिक बंधनों को तोड़ने का प्रतीक |
| चैतन्य महाप्रभु | कृष्ण-भक्ति, बंगाल | 'हरे कृष्ण' संकीर्तन आंदोलन के प्रवर्तक; गौड़ीय वैष्णव परंपरा |
| वल्लभाचार्य | कृष्ण-भक्ति, ब्रज | 'पुष्टिमार्ग' व 'शुद्धाद्वैत' दर्शन के प्रवर्तक (अनुभाग 8 में दार्शनिक पक्ष विस्तृत) |
| ⚖️ निर्गुण भक्ति बनाम सगुण भक्ति | ⚖️ निर्गुण भक्ति बनाम सगुण भक्ति |
|---|---|
| निर्गुण भक्ति (Nirguna) | सगुण भक्ति (Saguna) |
| ▸ निराकार, गुणरहित ब्रह्म की उपासना ▸ मूर्तिपूजा व कर्मकांड की कटु आलोचना ▸ जाति-भेद का प्रबल विरोध ▸ प्रतिनिधि: कबीर, नानक, रैदास, दादू | ▸ साकार, अवतारी ईश्वर (राम/कृष्ण) की उपासना ▸ भक्ति-काव्य में लीला व शृंगार वर्णन प्रमुख ▸ जाति-भेद पर अपेक्षाकृत कम बल ▸ प्रतिनिधि: तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, चैतन्य |
सूफीवाद (Sufism) इस्लाम की रहस्यवादी (Mystic) परंपरा है, जो ईश्वर-प्रेम, आत्म-शुद्धि व गुरु (पीर) के मार्गदर्शन पर बल देती है। भारत में सूफी संत 'सिलसिलों' (परंपरा-शृंखलाओं) में संगठित थे, जो 2 वर्गों में बंटे — बा-शरा (शरीयत का पालन करने वाले) व बे-शरा (शरीयत से मुक्त)।
| सिलसिला | संस्थापक (भारत में) | प्रमुख केंद्र/संत |
|---|---|---|
| चिश्ती सिलसिला (Chishti) | ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (1141-1236 ई.) | अजमेर (राजस्थान) — मुख्य केंद्र; निजामुद्दीन औलिया (दिल्ली), बाबा फरीद (पंजाब), सलीम चिश्ती (फतेहपुर सीकरी) |
| सुहरावर्दी सिलसिला (Suhrawardi) | शेख बहाउद्दीन जकारिया (1182-1262 ई.) | मुल्तान व सिंध (पंजाब क्षेत्र) — बा-शरा परंपरा, राजसत्ता से निकट संबंध |
| कादिरी सिलसिला (Qadiri) | अब्दुल कादिर जिलानी (मूल संस्थापक); भारत में शेख नियामतुल्लाह व मियां मीर | पंजाब क्षेत्र — मुगलकाल में लोकप्रिय (दारा शिकोह इससे प्रभावित) |
| नक्शबंदी सिलसिला (Naqshbandi) | ख्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंद (मूल संस्थापक); भारत में ख्वाजा बाकी बिल्लाह | बा-शरा परंपरा — शरीयत के कठोर पालन पर बल; शेख अहमद सरहिंदी (मुजद्दिद) इसी सिलसिले से |
⚠️ महत्वपूर्ण (Important Note)
RAS Mains 2021 में पूछा गया — 'सुहरावर्दी सूफी सिलसिले का वर्णन कीजिए' — इसके संस्थापक शेख बहाउद्दीन जकारिया, केंद्र मुल्तान-सिंध, तथा बा-शरा (शरीयत-अनुयायी) व राजसत्ता से घनिष्ठ संबंध जैसे बिंदु शामिल करें। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अजमेर (राजस्थान) में स्थित है — यह भारत के सबसे बड़े सूफी तीर्थ स्थलों में से एक है व 'गरीब नवाज़' के नाम से प्रसिद्ध है (राजस्थान कनेक्शन)।
| पहलू | भक्ति आंदोलन | सूफी आंदोलन |
|---|---|---|
| धार्मिक परंपरा | हिंदू परंपरा से उद्भूत | इस्लामी परंपरा से उद्भूत |
| गुरु/मार्गदर्शक | गुरु (संत) | पीर/शेख |
| उपासना केंद्र | मंदिर/सत्संग | खानकाह (मठ) व दरगाह |
| साधना पद्धति | भजन-कीर्तन, नाम-स्मरण | समा (संगीत-नृत्य द्वारा ध्यान), ज़िक्र |
| सामाजिक प्रभाव | जाति-भेद का विरोध, हिंदू समाज-सुधार | इस्लाम के भीतर उदार-सहिष्णु दृष्टिकोण; हिंदू-मुस्लिम सद्भाव को बढ़ावा |
| समान बिंदु | दोनों ने कर्मकांड-बाह्याडंबर से अधिक आंतरिक प्रेम/भक्ति पर बल दिया — यही समन्वयवादी 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' का आधार बना |
भक्ति आंदोलन के समानांतर हिंदू धर्म की 3 प्रमुख उपासना-परंपराएं (संप्रदाय) मध्यकाल में और सुदृढ़ हुईं।
| परंपरा | आराध्य | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| शैव मत (Shaivism) | शिव | शिवलिंग पूजा; दक्षिण भारत में नयनार परंपरा से जुड़ाव; कश्मीर शैव दर्शन (त्रिक दर्शन) भी प्रमुख शाखा |
| वैष्णव मत (Vaishnavism) | विष्णु व उनके अवतार (राम, कृष्ण) | 'पांचरात्र' (Pancharatra) आगम परंपरा — वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध (विष्णु के 4 व्यूह रूप) की उपासना; भागवत संप्रदाय से जुड़ाव |
| शाक्त मत (Shaktism) | देवी/शक्ति (दुर्गा, काली आदि) | स्त्री शक्ति को सृष्टि का मूल तत्व मानना; तंत्र साधना से घनिष्ठ संबंध; शक्तिपीठों की पूजा-परंपरा |
⚠️ महत्वपूर्ण (Important Note)
RAS Mains 2024 में पूछा गया — 'पाँचरात्र की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए' — पांचरात्र वैष्णव आगम परंपरा है, जिसमें विष्णु के 4 व्यूह रूप (वासुदेव-ज्ञान/शक्ति, संकर्षण-बल, प्रद्युम्न-ऐश्वर्य, अनिरुद्ध-वीर्य) की उपासना होती है — यह भागवत/वैष्णव संप्रदाय के दार्शनिक आधार का हिस्सा है।
अध्याय 9 में वेदांत को षड्दर्शन के एक अंग के रूप में परिचित कराया गया था; मध्यकाल में विभिन्न आचार्यों ने वेदांत की अलग-अलग व्याख्याएं प्रस्तुत कीं, जिससे वेदांत की 5 प्रमुख उप-शाखाएं विकसित हुईं।
| उप-शाखा | आचार्य/काल | मूल सिद्धांत |
|---|---|---|
| अद्वैत वेदांत (Advaita) | आदि शंकराचार्य (लगभग 8वीं सदी, केरल) | ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, जगत मिथ्या/माया है; जीवात्मा व ब्रह्म में कोई भेद नहीं (पूर्ण अद्वैत) |
| विशिष्टाद्वैत (Vishishtadvaita) | रामानुजाचार्य (11वीं-12वीं सदी, तमिलनाडु) | ब्रह्म (विष्णु) ही सत्य है, परंतु जगत व जीव उसके 'शरीर' के रूप में वास्तविक हैं — योग्य-विशिष्ट अद्वैत |
| द्वैत वेदांत (Dvaita) | मध्वाचार्य (13वीं सदी, कर्नाटक) | ब्रह्म (विष्णु), जीव व जगत — तीनों पूर्णतः भिन्न व स्वतंत्र वास्तविकताएं (पूर्ण द्वैतवाद) |
| द्वैताद्वैत (Dvaitadvaita) | निम्बार्काचार्य (12वीं-13वीं सदी) | जीव-जगत ब्रह्म से भिन्न भी हैं व अभिन्न भी (भेदाभेद सिद्धांत) |
| शुद्धाद्वैत (Shuddhadvaita) | वल्लभाचार्य (15वीं-16वीं सदी) | शुद्ध अद्वैतवाद — जगत ब्रह्म (कृष्ण) की ही वास्तविक अभिव्यक्ति है, माया नहीं; 'पुष्टिमार्ग' इसी दर्शन पर आधारित |
| ⚖️ अद्वैत वेदांत (शंकराचार्य) बनाम विशिष्टाद्वैत (रामानुज) | ⚖️ अद्वैत वेदांत (शंकराचार्य) बनाम विशिष्टाद्वैत (रामानुज) |
|---|---|
| अद्वैत वेदांत | विशिष्टाद्वैत |
| ▸ ब्रह्म ही एकमात्र सत्य, जगत मिथ्या (माया) ▸ जीव-ब्रह्म में पूर्ण अभेद (एकत्व) ▸ ज्ञान-मार्ग पर बल — निर्गुण ब्रह्म की उपासना ▸ 4 मठ स्थापित — शृंगेरी, द्वारका, पुरी, ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) | ▸ ब्रह्म सत्य, जगत व जीव भी वास्तविक (ब्रह्म के अंश) ▸ जीव-ब्रह्म में भेद सहित एकत्व (योग्य-विशिष्ट) ▸ भक्ति-मार्ग पर बल — सगुण ईश्वर (विष्णु) की उपासना ▸ श्रीवैष्णव संप्रदाय के प्रवर्तक — दक्षिण भारत में व्यापक प्रभाव |
अद्वैत बनाम विशिष्टाद्वैत को सरल उदाहरण से समझें — अद्वैत कहता है 'समुद्र व लहर वास्तव में एक ही हैं, लहर का अलग अस्तित्व सिर्फ भ्रम है' (माया)। विशिष्टाद्वैत कहता है 'लहर समुद्र का ही हिस्सा है और वास्तविक भी है — लहर व समुद्र न पूरी तरह अलग हैं, न पूरी तरह एक' — यही जीव-ब्रह्म संबंध पर दोनों दर्शनों का मूल अंतर है।
अकबर ने 1582 ई. में 'दीन-ए-इलाही' (ईश्वरीय पंथ) की स्थापना की — यह कोई पूर्ण धर्म नहीं, बल्कि विभिन्न धर्मों के सर्वोत्तम तत्वों को मिलाकर बनाई गई एक आचार-संहिता/नैतिक व्यवस्था थी, जिसे सीमित कुलीन वर्ग ने ही अपनाया।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| स्थापना वर्ष | 1582 ई., फतेहपुर सीकरी में |
| उद्देश्य | हिंदू, इस्लाम, जैन, पारसी, ईसाई धर्मों के अच्छे तत्वों का समन्वय — सुलह-ए-कुल (सभी धर्मों में सौहार्द) नीति का विस्तार |
| अनुयायी | बहुत सीमित — मुख्यतः दरबारी कुलीन वर्ग (जैसे बीरबल); आम जनता में प्रसार नहीं हुआ |
| इबादतखाना (पृष्ठभूमि) | 1575 ई. में फतेहपुर सीकरी में स्थापित — विभिन्न धर्मों के विद्वानों के बीच धार्मिक संवाद हेतु मंच, जिससे दीन-ए-इलाही की नींव पड़ी |
⚠️ महत्वपूर्ण (Important Note)
RAS Mains 2013 में पूछा गया — 'अकबर के दीन-ए-इलाही की प्रकृति पर प्रकाश डालिये' — मुख्य बिंदु: यह संगठित धर्म नहीं बल्कि आचार-संहिता थी, सुलह-ए-कुल नीति का विस्तार, सीमित प्रभाव, अकबर की धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक।
राजस्थान मध्यकालीन भक्ति व सूफी दोनों परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
| व्यक्ति/स्थल | संबंध | विवरण |
|---|---|---|
| मीराबाई | मेवाड़ (चित्तौड़गढ़) | कृष्ण-भक्ति की सर्वाधिक लोकप्रिय राजस्थानी संत-कवयित्री (साहित्यिक विवरण अध्याय 7 में) |
| दादूदयाल | जयपुर/अहमदाबाद | निर्गुण भक्ति की राजस्थान शाखा — दादूपंथ के प्रवर्तक |
| ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती | अजमेर | चिश्ती सिलसिले का भारत में मुख्य केंद्र — 'गरीब नवाज़' दरगाह, विश्वप्रसिद्ध सूफी तीर्थ |
| आचार्य भिक्षु व तेरापंथ | राजस्थान (अध्याय 9 क्रॉस-रेफरेंस) | जैन सुधारवादी परंपरा — भक्ति-सूफी युग की सुधारवादी भावना से समानांतर |
| पुष्टिमार्ग व राजस्थान | मेवाड़/नाथद्वारा | वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग (कृष्ण भक्ति) का नाथद्वारा (राजसमंद) प्रमुख केंद्र — श्रीनाथजी मंदिर |
| विषय | विवरण |
|---|---|
| महाकुंभ 2025, प्रयागराज | 13 जनवरी से 26 फरवरी 2025 तक संगम (प्रयागराज) में आयोजित — लगभग 40 करोड़ श्रद्धालुओं की भागीदारी; भक्ति-सांस्कृतिक परंपरा का विशाल आयोजन |
| काशी विश्वनाथ कॉरिडोर | वाराणसी में शिव मंदिर परिसर का पुनर्विकास — शैव भक्ति परंपरा को आधुनिक अवसंरचना से जोड़ने की पहल |
| अजमेर दरगाह (ख्वाजा गरीब नवाज़) | प्रतिवर्ष उर्स मेला व श्रद्धालुओं की भारी आमद — चिश्ती सूफी परंपरा का जीवंत केंद्र, नियमित समाचारों में |
| नाथद्वारा श्रीनाथजी मंदिर विकास | राजस्थान सरकार द्वारा पुष्टिमार्ग तीर्थ स्थल के अवसंरचना विकास हेतु योजनाएं |
| सूफी-भक्ति सद्भाव कार्यक्रम | गंगा-जमुनी तहज़ीब को बढ़ावा देने हेतु सांस्कृतिक मंत्रालय के नियमित आयोजन |
| ❝ उद्धरण (Quote) |
|---|
| "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।" — संत कबीरदास |
| ✍️ उत्तर लेखन कोण (Mains Answer Angle) |
| 🎯 5-अंक कोण (~70 शब्द): • संबंधित संत/सिलसिला/दर्शन (जैसे कोई निर्गुण संत, सूफी सिलसिला, वेदांत शाखा) को संक्षेप में परिभाषित करें। • उसके 2-3 प्रमुख सिद्धांत/शिक्षाएं स्पष्ट करें। • एक ठोस उदाहरण या राजस्थान संबंध अवश्य जोड़ें। 🎯 10-अंक कोण (~120 शब्द): • परिचय — भक्ति/सूफी आंदोलन या दर्शन की ऐतिहासिक-सामाजिक पृष्ठभूमि स्पष्ट करें। • बहुआयामी विश्लेषण — प्रमुख संत/आचार्य, सिद्धांत, साहित्यिक व सामाजिक योगदान शामिल करें। • तुलनात्मक दृष्टिकोण — जहां लागू हो (जैसे निर्गुण बनाम सगुण, भक्ति बनाम सूफी, अद्वैत बनाम विशिष्टाद्वैत) संक्षिप्त अंतर दें। • राजस्थान संबंध — मीरा, दादू, अजमेर दरगाह, नाथद्वारा के उदाहरण अवश्य जोड़ें। • निष्कर्ष — सामाजिक समरसता (गंगा-जमुनी तहज़ीब) व वर्तमान प्रासंगिकता के साथ समाप्त करें। |
| व्यक्ति (Person) | काल/क्षेत्र | योगदान |
|---|---|---|
| आदि शंकराचार्य | 8वीं सदी, केरल | अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक; 4 मठों की स्थापना |
| रामानुजाचार्य | 11-12वीं सदी, तमिलनाडु | विशिष्टाद्वैत दर्शन; श्रीवैष्णव संप्रदाय |
| मध्वाचार्य | 13वीं सदी, कर्नाटक | द्वैत वेदांत के प्रवर्तक |
| निम्बार्काचार्य | 12-13वीं सदी | द्वैताद्वैत दर्शन के प्रवर्तक |
| वल्लभाचार्य | 15-16वीं सदी, ब्रज | शुद्धाद्वैत व पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक |
| ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती | 1141-1236 ई., अजमेर | चिश्ती सिलसिले के भारत-संस्थापक |
| निजामुद्दीन औलिया | 13-14वीं सदी, दिल्ली | चिश्ती सिलसिला — दिल्ली केंद्र |
| शेख बहाउद्दीन जकारिया | 1182-1262 ई., मुल्तान | सुहरावर्दी सिलसिले के भारत-संस्थापक |
| कबीरदास | 15वीं सदी, काशी | निर्गुण भक्ति के अग्रणी संत |
| गुरु नानक देव | 15-16वीं सदी, पंजाब | सिख धर्म के प्रवर्तक |
| मीराबाई | 16वीं सदी, मेवाड़ | कृष्ण-भक्ति की प्रतीक (राजस्थान संबंध) |
| चैतन्य महाप्रभु | 15-16वीं सदी, बंगाल | गौड़ीय वैष्णव संकीर्तन आंदोलन |
Q1. नयनार और अलवार भक्ति संतों के सामाजिक-धार्मिक महत्त्व को व्याख्यायित कीजिए। (5 अंक) Q2. मध्यकालीन भारत में निर्गुण भक्ति की समृद्ध परम्परा को स्पष्ट कीजिए। (5 अंक) Q3. छठी शताब्दी ईसा पूर्व के धार्मिक आन्दोलनों एवं मध्यकालीन निर्गुण भक्ति आन्दोलन के मध्य समानताओं को रेखांकित कीजिए। (10 अंक) Q4. सुहरावर्दी सूफी सिलसिले का वर्णन कीजिए। (5 अंक) Q5. भारत के प्रमुख सूफी सिलसिलों (चिश्ती, सुहरावर्दी, कादिरी, नक्शबंदी) की तुलना कीजिए। (10 अंक) Q6. 'पाँचरात्र' की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। (5 अंक) Q7. अद्वैत वेदांत (शंकराचार्य) एवं विशिष्टाद्वैत (रामानुज) के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए। (10 अंक) Q8. अकबर के दीन-ए-इलाही की प्रकृति पर प्रकाश डालिए। (5 अंक) Q9. भक्ति आंदोलन एवं सूफी आंदोलन की तुलना कीजिए। (10 अंक) Q10. मध्यकालीन भारत में वेदांत की विभिन्न उप-शाखाओं (अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत आदि) का विवेचन कीजिए। (10 अंक)
| वर्ष/काल | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| लगभग 6ठी-9वीं सदी | आलवार-नयनार भक्ति परंपरा (दक्षिण भारत) | भक्ति आंदोलन का प्रारंभिक चरण |
| 8वीं सदी | आदि शंकराचार्य व अद्वैत वेदांत का प्रवर्तन | 4 मठों की स्थापना |
| 11वीं-12वीं सदी | रामानुजाचार्य व विशिष्टाद्वैत दर्शन | श्रीवैष्णव संप्रदाय की स्थापना |
| 1141-1236 ई. | ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का जीवनकाल | चिश्ती सिलसिले की भारत में स्थापना (अजमेर) |
| 13वीं सदी | मध्वाचार्य व द्वैत वेदांत का प्रवर्तन | पूर्ण द्वैतवादी दर्शन |
| 13वीं-14वीं सदी | निजामुद्दीन औलिया का काल (दिल्ली) | चिश्ती सिलसिला दिल्ली में सुदृढ़ |
| 15वीं सदी | कबीरदास व निर्गुण भक्ति का प्रसार (काशी) | जाति-भेद विरोधी भक्ति साहित्य |
| 15वीं-16वीं सदी | गुरु नानक देव व सिख धर्म का प्रवर्तन | 'इक ओंकार' व लंगर प्रथा |
| 15वीं-16वीं सदी | वल्लभाचार्य व पुष्टिमार्ग/शुद्धाद्वैत | नाथद्वारा (राजस्थान) केंद्र स्थापित |
| 16वीं सदी | तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई — सगुण भक्ति चरम पर | रामचरितमानस, सूरसागर रचनाकाल |
| 1575 ई. | इबादतखाना की स्थापना (फतेहपुर सीकरी) | अंतर-धार्मिक संवाद मंच |
| 1582 ई. | अकबर द्वारा दीन-ए-इलाही की स्थापना | धार्मिक सहिष्णुता नीति का विस्तार |
| 1760 ई. के आसपास | आचार्य भिक्षु द्वारा तेरापंथ स्थापना (राजस्थान) | जैन सुधारवादी परंपरा (अध्याय 9 क्रॉस-रेफरेंस) |
| जनवरी-फरवरी 2025 | महाकुंभ 2025, प्रयागराज | करेंट अफेयर्स — विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन |