कल्पना कीजिए — लगभग 2600 वर्ष पूर्व, गंगा घाटी के 16 महाजनपदों में व्यापार व नगरीकरण तेज़ी से बढ़ रहा था, परंतु धार्मिक जीवन जटिल यज्ञ-कर्मकांड व महंगे पशु-बलिदान में उलझा था, जिसका बोझ आम वैश्य-शूद्र वर्ग पर सर्वाधिक पड़ता था। ठीक इसी दौर में दो राजकुमारों — सिद्धार्थ गौतम (कपिलवस्तु) व वर्धमान महावीर (वैशाली) — ने राजसी सुख-सुविधा त्यागकर सत्य की खोज शुरू की, और कर्मकांड-रहित, सरल, नैतिकता-आधारित नए मार्ग सुझाए। यह 6वीं शताब्दी ई.पू. का 'श्रमण आंदोलन' भारतीय चिंतन के इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति साबित हुआ — इसने न केवल भारत बल्कि पूरे एशिया की सभ्यता को दिशा दी।
6वीं शताब्दी ई.पू. में उत्तर भारत में अनेक नए धार्मिक-दार्शनिक विचारों (बौद्ध, जैन, आजीविक, चार्वाक आदि) का उदय हुआ। इन्हें सामूहिक रूप से 'श्रमण आंदोलन' कहा जाता है, क्योंकि ये वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध तपस्या/श्रम पर आधारित मार्ग सुझाते थे।
| कारण | विवरण |
|---|---|
| जटिल कर्मकांड व पशु-बलि | यज्ञ महंगे व जटिल हो गए थे; पशु-बलि का सामान्य जन विरोध कर रहा था |
| वर्ण व्यवस्था की कठोरता | ब्राह्मणों का वर्चस्व व जन्म-आधारित ऊंच-नीच से वैश्य-शूद्र वर्ग असंतुष्ट था |
| आर्थिक कारण — नगरीकरण व व्यापार | गंगा घाटी में द्वितीय नगरीकरण (लोहे के प्रयोग से कृषि-अधिशेष) से उभरता वैश्य वर्ग सामाजिक सम्मान चाहता था |
| सरल भाषा का अभाव | वैदिक ग्रंथ संस्कृत में थे, जो आम जनता की भाषा नहीं थी — नए आंदोलनों ने पालि/प्राकृत अपनाई |
| राजनीतिक समर्थन | मगध जैसे शक्तिशाली राज्यों के शासकों (बिंबिसार, अजातशत्रु) ने नए संप्रदायों को संरक्षण दिया |
⚠️ महत्वपूर्ण (Important Note)
RAS Mains 2023 में पूछा गया — 'बौद्ध और जैन मत संहिताओं में वर्णित धर्म से किस प्रकार भिन्न थे?' — मुख्य अंतर: वैदिक धर्म कर्मकांड व यज्ञ प्रधान था, जबकि बौद्ध-जैन धर्म नैतिकता, अहिंसा व व्यक्तिगत साधना प्रधान — जाति-भेद को भी दोनों ने अस्वीकार किया।
वैदिक धर्म का विकास 2 चरणों में समझा जा सकता है — प्रारंभिक 'यज्ञ-प्रधान कर्मकांडी धर्म' (संहिता-ब्राह्मण काल) से क्रमिक रूप से 'दार्शनिक चिंतन-प्रधान धर्म' (उपनिषद काल) की ओर बढ़ना। उपनिषदों ने आत्मा-ब्रह्म एकत्व, कर्म-पुनर्जन्म व मोक्ष जैसी अवधारणाओं को जन्म दिया, जो आगे सभी भारतीय दर्शन शाखाओं का आधार बनीं।
| अवधारणा | अर्थ |
|---|---|
| ब्रह्म (Brahman) | सृष्टि का परम, निराकार, सर्वव्यापी तत्व |
| आत्मा (Atman) | व्यक्ति के भीतर स्थित चेतन तत्व — उपनिषदों के अनुसार आत्मा व ब्रह्म मूलतः एक हैं |
| कर्म सिद्धांत (Karma) | प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है — यह अगले जन्म को प्रभावित करता है |
| पुनर्जन्म (Samsara) | आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से गुजरती है, जब तक मोक्ष प्राप्त न हो |
| मोक्ष (Moksha) | जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति — जीवन का परम लक्ष्य |
'मोक्ष' को सरल भाषा में समझें — कल्पना कीजिए एक पानी की बूंद (आत्मा) बार-बार बादल बनकर बरसती है, नदी में बहती है, फिर समुद्र में मिल जाती है (ब्रह्म से मिलन) — जब तक यह बूंद अलग-अलग रूपों (जन्मों) में भटकती रहती है, तब तक 'संसार चक्र' चलता है; जब यह हमेशा के लिए समुद्र में मिल जाती है, तभी 'मोक्ष' प्राप्त होता है।
प्रस्थानत्रयी (Prasthana Trayi)
वेदांत दर्शन के 3 प्रामाणिक स्रोत ग्रंथों को सम्मिलित रूप से 'प्रस्थानत्रयी' कहा जाता है — उपनिषद (श्रुति प्रस्थान), ब्रह्मसूत्र/वेदांतसूत्र (न्याय प्रस्थान), भगवद्गीता (स्मृति प्रस्थान)। RAS Mains 2018 में यह सीधे पूछा गया था।
| जीवन-प्रसंग | विवरण |
|---|---|
| जन्म | लगभग 563 ई.पू., लुंबिनी (वर्तमान नेपाल) में शाक्य वंश के राजा शुद्धोधन व रानी महामाया के पुत्र के रूप में |
| बचपन का नाम | सिद्धार्थ गौतम |
| महाभिनिष्क्रमण (गृह-त्याग) | 29 वर्ष की आयु में — 4 दृश्यों (वृद्ध, रोगी, शव, संन्यासी) से प्रभावित होकर |
| ज्ञान प्राप्ति (संबोधि) | 35 वर्ष की आयु में, बोधगया (निरंजना नदी तट, पीपल वृक्ष के नीचे) |
| प्रथम उपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन) | सारनाथ में — 5 शिष्यों को दिया गया पहला उपदेश |
| महापरिनिर्वाण (मृत्यु) | लगभग 483 ई.पू., कुशीनगर में, 80 वर्ष की आयु में |
⚠️ महत्वपूर्ण (Important Note)
बुद्ध जीवन के 4 प्रमुख स्थल व उनके प्रतीक चिह्न याद रखें — लुंबिनी (कमल/सांड — जन्म), बोधगया (पीपल वृक्ष — ज्ञान प्राप्ति), सारनाथ (धर्मचक्र/धम्मचक्र — प्रथम उपदेश), कुशीनगर (स्तूप — महापरिनिर्वाण)। यह 'बौद्ध सर्किट' पर्यटन व करेंट अफेयर्स दोनों में महत्वपूर्ण है।
A. चार आर्य सत्य (Four Noble Truths)
बुद्ध के संपूर्ण दर्शन का सार 4 आर्य सत्यों में निहित है — यह दुःख की समस्या व उसके समाधान का तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जैसे एक चिकित्सक रोग का निदान करता है।
| आर्य सत्य | अर्थ |
|---|---|
| दुःख (Dukkha) | संसार में सब कुछ दुःखमय है — जन्म, बुढ़ापा, रोग, मृत्यु सभी दुःख हैं |
| समुदाय/दुःख समुदाय (Cause of Dukkha) | दुःख का कारण 'तृष्णा' (इच्छा/लालसा) है |
| निरोध (Cessation of Dukkha) | तृष्णा का पूर्ण नाश करने पर दुःख का भी अंत होता है — यही निर्वाण है |
| मार्ग (Path to Cessation) | दुःख-निरोध का मार्ग 'अष्टांगिक मार्ग' है |
B. अष्टांगिक मार्ग (Eightfold Path)
अष्टांगिक मार्ग (Eightfold Path) निर्वाण प्राप्ति का व्यावहारिक मार्ग है — इसे 'मध्यम मार्ग' (अति-भोग व अति-तप दोनों से बचना) भी कहा जाता है।
| अंग | अर्थ |
|---|---|
| सम्यक् दृष्टि | सही दृष्टिकोण — चार आर्य सत्यों में विश्वास |
| सम्यक् संकल्प | सही संकल्प — अहिंसा व करुणा का संकल्प |
| सम्यक् वाक् | सही वाणी — सत्य व मधुर भाषण |
| सम्यक् कर्मान्त | सही कर्म — अहिंसक, नैतिक आचरण |
| सम्यक् आजीव | सही आजीविका — नैतिक तरीके से जीवन-यापन |
| सम्यक् व्यायाम | सही प्रयास — बुरे विचारों को रोकने का प्रयास |
| सम्यक् स्मृति | सही स्मृति — सजगता व आत्म-अवलोकन |
| सम्यक् समाधि | सही समाधि — ध्यान द्वारा चित्त की एकाग्रता |
'मध्यम मार्ग' को ऐसे समझें — जैसे वीणा के तार न बहुत ढीले हों (आलस्य/अति-भोग) न बहुत कसे हों (अति-कठोर तप) — दोनों ही स्थिति में मधुर संगीत नहीं बजता। बुद्ध ने स्वयं पहले कठोर तप किया, फिर महसूस किया कि संतुलित मार्ग (न भोग न कठोर तप) ही सही है।
C. बौद्ध संगीतियां (Buddhist Councils)
बुद्ध की मृत्यु के बाद उनके उपदेशों को संकलित व सुरक्षित रखने हेतु समय-समय पर 4 प्रमुख 'संगीतियां' (बौद्ध सभाएं) आयोजित हुईं।
| संगीति | काल/स्थान | राजा/अध्यक्ष | उपलब्धि |
|---|---|---|---|
| प्रथम संगीति | लगभग 483 ई.पू., राजगृह | अजातशत्रु (राजा); महाकश्यप (अध्यक्ष) | विनय पिटक (उपालि) व सुत्त पिटक (आनंद) का संकलन |
| द्वितीय संगीति | लगभग 383 ई.पू., वैशाली | कालाशोक; सबाकामी (अध्यक्ष) | संघ का स्थविरवादी व महासांघिक — 2 भागों में विभाजन |
| तृतीय संगीति | लगभग 250 ई.पू., पाटलिपुत्र | अशोक; मोग्गलिपुत्त तिस्स (अध्यक्ष) | अभिधम्म पिटक का संकलन — त्रिपिटक पूर्ण हुआ |
| चतुर्थ संगीति | लगभग 72 ई., कुंडलवन, कश्मीर | कनिष्क; वसुमित्र (अध्यक्ष), अश्वघोष (उपाध्यक्ष) | हीनयान-महायान में औपचारिक विभाजन |
D. बौद्ध संप्रदाय — हीनयान, महायान, वज्रयान
| संप्रदाय | मूल मान्यता | प्रमुख क्षेत्र |
|---|---|---|
| हीनयान (Hinayana) | बुद्ध को महापुरुष/शिक्षक मानना; मूर्तिपूजा नहीं — प्रतीकों (चक्र, स्तूप) की पूजा; व्यक्तिगत मोक्ष पर बल | श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड (आज 'थेरवाद' कहलाता है) |
| महायान (Mahayana) | बुद्ध को देवता रूप में मूर्तिपूजा; 'बोधिसत्व' अवधारणा — सबकी मुक्ति हेतु प्रयास | चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, वियतनाम |
| वज्रयान (Vajrayana) | तंत्र-मंत्र व गूढ़ साधना पर आधारित परवर्ती शाखा | तिब्बत, नेपाल, पूर्वोत्तर भारत |
जैन परंपरा के अनुसार जैन धर्म बहुत प्राचीन है, जिसके 24 तीर्थंकर (मोक्ष-मार्ग दिखाने वाले) हुए। महावीर 24वें व अंतिम तीर्थंकर थे — प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव माने जाते हैं तथा 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ (जिन्होंने चातुर्याम — 4 व्रत — सिखाए) ऐतिहासिक रूप से भी प्रमाणित माने जाते हैं।
| जीवन-प्रसंग | विवरण |
|---|---|
| जन्म | लगभग 540 ई.पू., कुंडग्राम (वैशाली के निकट) में ज्ञातृक क्षत्रिय वंश के राजा सिद्धार्थ व रानी त्रिशला के पुत्र |
| मूल नाम | वर्धमान |
| गृह-त्याग | 30 वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण |
| कैवल्य ज्ञान (पूर्ण ज्ञान) | 42 वर्ष की आयु में, जृम्भिक ग्राम में ऋजुपालिका नदी तट पर साल वृक्ष के नीचे |
| उपाधि | 'महावीर' (महान योद्धा), 'जिन' (विजेता — इसी से 'जैन' शब्द बना) |
| निर्वाण (मृत्यु) | लगभग 468 ई.पू., पावापुरी (बिहार) में |
A. त्रिरत्न (Three Jewels)
जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति हेतु 3 मार्ग बताए गए हैं, जिन्हें सम्मिलित रूप से 'त्रिरत्न' कहा जाता है।
| रत्न | अर्थ |
|---|---|
| सम्यक् दर्शन (Right Faith) | तीर्थंकरों व जैन सिद्धांतों में सच्ची श्रद्धा |
| सम्यक् ज्ञान (Right Knowledge) | जैन दर्शन का सही व पूर्ण ज्ञान |
| सम्यक् चरित्र (Right Conduct) | व्रतों व नैतिक नियमों का पालन करते हुए आचरण |
B. पंच महाव्रत एवं अणुव्रत
| व्रत | अर्थ |
|---|---|
| अहिंसा (Ahimsa) | मन-वचन-कर्म से किसी भी जीव को हानि न पहुंचाना — जैन धर्म का सर्वोच्च सिद्धांत |
| सत्य (Satya) | सदैव सत्य बोलना |
| अस्तेय (Asteya) | चोरी न करना |
| अपरिग्रह (Aparigraha) | भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति/संग्रह न रखना |
| ब्रह्मचर्य (Brahmacharya) | महावीर द्वारा जोड़ा गया 5वां व्रत — संयमित/शुद्ध जीवन (पार्श्वनाथ के मूल 4 व्रतों में यह नहीं था) |
| ⚖️ महाव्रत (साधु-साध्वियों हेतु) बनाम अणुव्रत (गृहस्थों हेतु) | ⚖️ महाव्रत (साधु-साध्वियों हेतु) बनाम अणुव्रत (गृहस्थों हेतु) |
| महाव्रत (Mahavrata) | अणुव्रत (Anuvrata) |
| ▸ साधु-साध्वियों (मुनियों) द्वारा पूर्ण रूप से पालन ▸ कठोर व पूर्ण त्याग की स्थिति ▸ 5 व्रतों का बिना शर्त पालन | ▸ सामान्य गृहस्थ जैन अनुयायियों हेतु ▸ सीमित/आंशिक रूप में पालन — जीवन-यापन के अनुकूल ▸ 5 व्रतों का व्यावहारिक/लघु रूप |
C. जैन संगीतियां एवं दिगंबर-श्वेतांबर विभाजन
| घटना | काल/स्थान | विवरण |
|---|---|---|
| प्रथम जैन संगीति | लगभग तीसरी शताब्दी ई.पू., पाटलिपुत्र | स्थूलभद्र के नेतृत्व में — 12 अंगों का संकलन |
| दिगंबर-श्वेतांबर विभाजन | मौर्यकाल में (चंद्रगुप्त मौर्य के समय भद्रबाहु के दक्षिण गमन के बाद) | अकाल के दौरान भद्रबाहु दक्षिण गए (कठोर परंपरा — दिगंबर); स्थूलभद्र उत्तर में रहे (उदार परंपरा — श्वेतांबर) |
| वल्लभी संगीति (अंतिम) | लगभग 5वीं शताब्दी ई., वल्लभी (गुजरात) | देवर्धिगणि क्षमाश्रमण के नेतृत्व में जैन आगमों का अंतिम व लिखित संकलन (अध्याय 7 क्रॉस-रेफरेंस) |
| ⚖️ दिगंबर (Digambara) बनाम श्वेतांबर (Shvetambara) | ⚖️ दिगंबर (Digambara) बनाम श्वेतांबर (Shvetambara) | |
| दिगंबर ('दिशा ही वस्त्र') | श्वेतांबर ('श्वेत वस्त्रधारी') | |
| ▸ मुनि वस्त्र धारण नहीं करते — पूर्ण नग्नता ▸ स्त्रियों को उसी जन्म में मोक्ष संभव नहीं मानते ▸ मुख्यतः दक्षिण भारत (कर्नाटक) में प्रभाव | ▸ मुनि सफेद वस्त्र धारण करते हैं ▸ स्त्रियों की मोक्ष-प्राप्ति को स्वीकार करते हैं ▸ मुख्यतः पश्चिम भारत (गुजरात, राजस्थान) में प्रभाव |
| पहलू | बौद्ध धर्म | जैन धर्म |
|---|---|---|
| संस्थापक | गौतम बुद्ध (563-483 ई.पू.) | महावीर — 24वें तीर्थंकर (540-468 ई.पू.) |
| ईश्वर की अवधारणा | अनीश्वरवादी (ईश्वर का स्पष्ट खंडन नहीं, पर केंद्रीय नहीं) | अनीश्वरवादी — सृष्टिकर्ता ईश्वर को अस्वीकार करता है |
| मध्यम मार्ग/कठोरता | मध्यम मार्ग — अति-भोग व अति-तप दोनों से बचाव | कठोर तप व अहिंसा पर अत्यधिक बल (अपरिग्रह चरम तक) |
| भाषा | पालि | प्राकृत (अर्धमागधी) |
| प्रसार | एशिया के अधिकांश भागों में व्यापक प्रसार | मुख्यतः भारत तक सीमित रहा |
| केंद्रीय ग्रंथ | त्रिपिटक (विनय, सुत्त, अभिधम्म) | आगम (12 अंग) |
बौद्ध व जैन के अतिरिक्त 6वीं शताब्दी ई.पू. के दौर में अन्य 'नास्तिक' (वेद-प्रामाण्य को न मानने वाले) संप्रदाय भी सक्रिय थे — RAS Mains में यह प्रश्न बार-बार पूछा गया है।
| संप्रदाय | संस्थापक | मूल सिद्धांत |
|---|---|---|
| आजीविक (Ajivika) | मक्खलिपुत्र गोशाल (Makkhaliputra Gosala) | 'नियतिवाद' — सब कुछ पूर्वनिर्धारित है, मानव प्रयास (कर्म) निरर्थक है; बाराबर गुफाओं से संबद्ध (अध्याय 8 क्रॉस-रेफरेंस) |
| चार्वाक/लोकायत (Charvaka/Lokayata) | बृहस्पति (परंपरागत) | घोर भौतिकवाद — केवल प्रत्यक्ष प्रमाण मान्य; आत्मा-पुनर्जन्म-मोक्ष सबका खंडन; 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्' (कर्ज लेकर भी सुख भोगो) सिद्धांत |
⚠️ महत्वपूर्ण (Important Note)
RAS Mains 2016 (विशेष परीक्षा) में पूछा गया था — 'भारत में बौद्ध एवं जैन धर्म के अतिरिक्त किन्हीं अन्य दो अनीश्वरवादी धार्मिक सम्प्रदायों के नाम लिखिए' — उत्तर: आजीविक व चार्वाक/लोकायत। RAS Mains 2016 में यह भी पूछा गया — 'मक्खलिपुत्र गोशाल कौन था?' — वह आजीविक संप्रदाय का संस्थापक था, जो प्रारंभ में महावीर का साथी था, बाद में अलग हो गया।
वैदिक/ब्राह्मणिक परंपरा के भीतर 6 प्रमुख दार्शनिक शाखाएं विकसित हुईं, जिन्हें सम्मिलित रूप से 'षड्दर्शन' कहा जाता है। ये सभी वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार करती हैं, इसलिए इन्हें 'आस्तिक दर्शन' कहा जाता है (बौद्ध-जैन-चार्वाक के विपरीत, जो 'नास्तिक दर्शन' कहलाते हैं)।
| दर्शन | संस्थापक/मूल ग्रंथ | मूल सिद्धांत |
|---|---|---|
| सांख्य (Samkhya) | कपिल मुनि — सांख्य सूत्र | द्वैतवाद — पुरुष (चेतन) व प्रकृति (जड़) दो स्वतंत्र तत्व; सबसे प्राचीन दर्शन माना जाता है |
| योग (Yoga) | पतंजलि — योग सूत्र | अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) द्वारा चित्त-वृत्ति निरोध |
| न्याय (Nyaya) | गौतम/अक्षपाद — न्याय सूत्र | तर्कशास्त्र व प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द) आधारित ज्ञान-मीमांसा |
| वैशेषिक (Vaisheshika) | कणाद/उलूक — वैशेषिक सूत्र | सृष्टि परमाणुओं (Atoms) से बनी है — भौतिक जगत का परमाणुवादी विश्लेषण |
| मीमांसा/पूर्व मीमांसा (Mimamsa) | जैमिनि — मीमांसा सूत्र | वैदिक यज्ञ-कर्मकांड की तार्किक व्याख्या व औचित्य-सिद्धि |
| वेदांत/उत्तर मीमांसा (Vedanta) | बादरायण (व्यास) — ब्रह्मसूत्र | उपनिषदों की दार्शनिक व्याख्या — ब्रह्म-आत्मा संबंध; आगे शंकराचार्य व रामानुज द्वारा विस्तार (अध्याय 10 में विस्तृत) |
| 💡 उदाहरण (Example) |
|---|
| षड्दर्शन को याद रखने की तरकीब — इन्हें 3 जोड़ों में याद करें, क्योंकि परंपरागत रूप से ये जोड़े में साथ पढ़े जाते हैं: (1) न्याय-वैशेषिक (तर्क व भौतिक विश्लेषण), (2) सांख्य-योग (सिद्धांत व अभ्यास), (3) मीमांसा-वेदांत (कर्म व ज्ञान, अर्थात पूर्व मीमांसा व उत्तर मीमांसा)। |
| ⚠️ महत्वपूर्ण (Important Note) |
| RAS Mains 2021 में पूछा गया — 'भारतीय वैदिक दर्शन की परम्परागत छः शाखाओं में से किन्हीं चार का नामोल्लेख कीजिए' — सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदांत में से कोई 4 नाम पर्याप्त थे। |
राजस्थान जैन धर्म का एक प्रमुख केंद्र रहा है व आज भी है — मंदिर स्थापत्य पक्ष (दिलवाड़ा, रणकपुर) अध्याय 3 में विस्तृत है; यहां धार्मिक-सांप्रदायिक पक्ष का विवरण है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| तेरापंथ संप्रदाय की स्थापना | आचार्य भिक्षु (भीखणजी) द्वारा 1760 ई. के आसपास राजस्थान में श्वेतांबर जैन सुधारवादी संप्रदाय 'तेरापंथ' की स्थापना |
| ओसियां (जोधपुर) | प्राचीन जैन तीर्थ स्थल — महावीर मंदिर सहित अनेक प्राचीन जैन मंदिर |
| जैन समुदाय की समृद्ध परंपरा | राजस्थान में मारवाड़ी/ओसवाल जैन समुदाय का व्यापार, स्थापत्य व साहित्य में ऐतिहासिक योगदान |
| दादूदयाल व निर्गुण भक्ति (क्रॉस-रेफरेंस) | श्रमण परंपरा के सादगी व आंतरिक साधना के मूल्य आगे राजस्थान की निर्गुण भक्ति परंपरा में भी झलकते हैं (अध्याय 10 में विस्तृत) |
| विषय | विवरण |
|---|---|
| पिपरहवा बौद्ध अवशेष प्रदर्शनी (2026) | प्रधानमंत्री द्वारा नई दिल्ली में बुद्ध के पवित्र पिपरहवा अवशेषों की भव्य अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन — 120+ वर्षों बाद ये रत्न भारत लौटे |
| द्वितीय वैश्विक बौद्ध सम्मेलन (2nd Global Buddhist Summit, जनवरी 2026) | नई दिल्ली के भारत मंडपम में संस्कृति मंत्रालय व अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ (IBC) द्वारा आयोजित |
| कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा | बौद्ध सर्किट पर्यटन को बढ़ावा देने हेतु विकसित — अंतरराष्ट्रीय बौद्ध श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु |
| बौद्ध सर्किट (स्वदेश दर्शन योजना) | लुंबिनी-बोधगया-सारनाथ-कुशीनगर सहित प्रमुख बौद्ध स्थलों को जोड़ने वाली केंद्र सरकार की पर्यटन विकास योजना |
| जैन तीर्थ संरक्षण | श्रवणबेलगोला (गोमतेश्वर), दिलवाड़ा, रणकपुर आदि प्रमुख जैन तीर्थों का नियमित संरक्षण व पर्यटन विकास कार्य जारी |
| ❝ उद्धरण (Quote) |
|---|
| "अत्त दीप भव — अपने प्रकाश स्वयं बनो (अपनी शरण स्वयं बनो, दूसरों पर निर्भर मत रहो)।" — गौतम बुद्ध, महापरिनिर्वाण से पूर्व अंतिम उपदेश |
| ✍️ उत्तर लेखन कोण (Mains Answer Angle) |
| 🎯 5-अंक कोण (~70 शब्द): • संबंधित सिद्धांत/अवधारणा (जैसे चार आर्य सत्य/त्रिरत्न/किसी दर्शन) को संक्षेप में परिभाषित करें। • उसके 2-3 प्रमुख बिंदु स्पष्ट करें। • एक उदाहरण/तथ्य (जैसे संबंधित स्थल या ग्रंथ का नाम) अवश्य जोड़ें। 🎯 10-अंक कोण (~120 शब्द): • परिचय — धार्मिक आंदोलन/दर्शन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (6वीं शताब्दी ई.पू. का संदर्भ) स्पष्ट करें। • बहुआयामी विश्लेषण — सिद्धांत, संस्थापक, प्रमुख शिक्षाएं व संगीतियों/विभाजन का विकास शामिल करें। • तुलनात्मक दृष्टिकोण — जहां लागू हो (जैसे बौद्ध बनाम जैन, या षड्दर्शन में तुलना) संक्षिप्त अंतर दें। • सामाजिक प्रभाव — जाति-व्यवस्था, स्त्री-स्थिति व सामाजिक समता पर प्रभाव जोड़ें। • निष्कर्ष — वर्तमान प्रासंगिकता (करेंट अफेयर्स, UNESCO, बौद्ध सर्किट) के साथ समाप्त करें। |
| व्यक्ति (Person) | काल/संबंध | योगदान |
|---|---|---|
| गौतम बुद्ध | 563-483 ई.पू. | बौद्ध धर्म के संस्थापक |
| महावीर | 540-468 ई.पू. | जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर |
| पार्श्वनाथ | महावीर से पूर्व (23वें तीर्थंकर) | चातुर्याम (4 व्रत) के प्रवर्तक — ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित |
| मक्खलिपुत्र गोशाल | बुद्ध-महावीर के समकालीन | आजीविक संप्रदाय के संस्थापक |
| बृहस्पति (परंपरागत) | अनिश्चित प्राचीन काल | चार्वाक/लोकायत दर्शन के परंपरागत संस्थापक |
| मोग्गलिपुत्त तिस्स | अशोक काल | तृतीय बौद्ध संगीति के अध्यक्ष |
| वसुमित्र व अश्वघोष | कनिष्क काल | चतुर्थ बौद्ध संगीति के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष |
| भद्रबाहु | मौर्यकाल (चंद्रगुप्त मौर्य के समकालीन) | दिगंबर परंपरा के प्रवर्तक (दक्षिण गमन) |
| स्थूलभद्र | मौर्यकाल | श्वेतांबर परंपरा; प्रथम जैन संगीति के नेतृत्वकर्ता |
| देवर्धिगणि क्षमाश्रमण | 5वीं शताब्दी ई. | वल्लभी संगीति — अंतिम जैन आगम संकलन |
| कपिल मुनि | प्राचीन काल | सांख्य दर्शन के संस्थापक |
| पतंजलि | लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. | योग दर्शन (योग सूत्र) के संस्थापक |
| आचार्य भिक्षु | 1760 ई. के आसपास, राजस्थान | तेरापंथ जैन संप्रदाय के संस्थापक |
Q1. बौद्ध और जैन मत संहिताओं में वर्णित धर्म से किस प्रकार भिन्न थे? स्पष्ट कीजिए। (5 अंक) Q2. गौतम बुद्ध के चार आर्य सत्य एवं अष्टांगिक मार्ग की विवेचना कीजिए। (10 अंक) Q3. बौद्ध धर्म की चार प्रमुख संगीतियों का वर्णन कीजिए। (10 अंक) Q4. महावीर के पंच महाव्रतों को स्पष्ट कीजिए। (5 अंक) Q5. जैन धर्म में दिगंबर व श्वेतांबर संप्रदायों के मध्य विभाजन के कारणों की विवेचना कीजिए। (10 अंक) Q6. बौद्ध व जैन धर्म की तुलना कीजिए। (10 अंक) Q7. भारत में बौद्ध एवं जैन धर्म के अतिरिक्त अन्य अनीश्वरवादी धार्मिक सम्प्रदायों (आजीविक, चार्वाक) का वर्णन कीजिए। (5 अंक) Q8. भारतीय वैदिक दर्शन की छः परम्परागत शाखाओं (षड्दर्शन) का संक्षिप्त परिचय दीजिए। (10 अंक) Q9. 'प्रस्थानत्रयी' की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। (5 अंक) Q10. 6वीं शताब्दी ई.पू. में धार्मिक आंदोलनों के उदय के कारणों की विवेचना कीजिए। (10 अंक)
| वर्ष/काल | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| लगभग 599 ई.पू. | पार्श्वनाथ के अनुयायी काल में जैन परंपरा सक्रिय | 23वें तीर्थंकर की ऐतिहासिकता प्रमाणित |
| लगभग 563 ई.पू. | गौतम बुद्ध का जन्म (लुंबिनी) | बौद्ध धर्म की पृष्ठभूमि |
| लगभग 540 ई.पू. | महावीर का जन्म (कुंडग्राम) | जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर |
| लगभग 528 ई.पू. | बुद्ध को बोधगया में ज्ञान प्राप्ति | बौद्ध धर्म का प्रवर्तन |
| लगभग 468 ई.पू. | महावीर का निर्वाण (पावापुरी) | जैन धर्म प्रचार की पूर्णता |
| लगभग 483 ई.पू. | बुद्ध का महापरिनिर्वाण (कुशीनगर) | बौद्ध धर्म संस्थापक-काल की समाप्ति |
| लगभग 483 ई.पू. | प्रथम बौद्ध संगीति (राजगृह) | त्रिपिटक संकलन प्रारंभ |
| लगभग तीसरी शताब्दी ई.पू. | प्रथम जैन संगीति (पाटलिपुत्र, स्थूलभद्र) | 12 अंगों का संकलन |
| लगभग 383 ई.पू. | द्वितीय बौद्ध संगीति (वैशाली) | स्थविरवादी-महासांघिक विभाजन |
| लगभग 250 ई.पू. (अशोक काल) | तृतीय बौद्ध संगीति (पाटलिपुत्र) | अभिधम्म पिटक संकलन; त्रिपिटक पूर्ण |
| लगभग 72 ई. (कनिष्क काल) | चतुर्थ बौद्ध संगीति (कश्मीर) | हीनयान-महायान औपचारिक विभाजन |
| लगभग 5वीं शताब्दी ई. | वल्लभी संगीति (जैन आगम अंतिम संकलन) | देवर्धिगणि क्षमाश्रमण नेतृत्व |
| 1760 ई. के आसपास | तेरापंथ संप्रदाय की स्थापना (आचार्य भिक्षु, राजस्थान) | जैन सुधारवादी परंपरा |
| जनवरी 2026 | द्वितीय वैश्विक बौद्ध सम्मेलन, नई दिल्ली | करेंट अफेयर्स — अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सहयोग |