सोचो लगभग 2000 साल पहले भरत मुनि नामक एक ऋषि नाट्यशास्त्र नामक एक ऐसा ग्रंथ लिखते हैं, जिसे बाद में 'पाँचवाँ वेद' कहा जाने लगा — क्योंकि इसमें नृत्य, संगीत व अभिनय — तीनों को एक साथ पिरोया गया था। यहीं से भारत की समृद्ध प्रदर्शनकारी कला परंपरा की नींव पड़ी, जो आगे चलकर 8 शास्त्रीय नृत्यों, दो महान संगीत-परंपराओं (हिन्दुस्तानी व कर्नाटक), और सैकड़ों लोक-नाट्य व कठपुतली परंपराओं में विकसित हुई। यह अध्याय इसी पूरी यात्रा को कवर करता है — जहाँ भी संभव हो, content को तालिका में रखा गया है ताकि Revision आसान हो।
प्रदर्शनकारी कला (Performing Arts) के अंतर्गत तीन प्रमुख धाराएँ आती हैं — नृत्य (Dance), संगीत (Music) व नाट्य/रंगमंच (Theatre)। भारत में इन तीनों की जड़ें एक ही मूल ग्रंथ — नाट्यशास्त्र — से जुड़ी हैं।
| धारा | मुख्य रूप |
|---|---|
| नृत्य (Dance) | शास्त्रीय नृत्य (8 मान्यता-प्राप्त शैलियाँ) व लोक नृत्य (क्षेत्रीय) |
| संगीत (Music) | हिन्दुस्तानी संगीत (उत्तर भारत) व कर्नाटक संगीत (दक्षिण भारत) |
| नाट्य/रंगमंच (Theatre) | शास्त्रीय संस्कृत नाटक परंपरा, लोक-नाट्य (नौटंकी, रामलीला आदि) व कठपुतली कला |
नाट्यशास्त्र भारत की प्रदर्शनकारी कलाओं का सबसे प्राचीन व मूल ग्रंथ है — इसे समझे बिना कोई भी शास्त्रीय नृत्य या संगीत परंपरा पूरी तरह नहीं समझी जा सकती।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| रचयिता | भरत मुनि |
| रचना-काल | लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ई. के बीच (विद्वानों में मतभेद) |
| उपनाम | 'पाँचवाँ वेद' (Fifth Veda) — क्योंकि यह चारों वेदों से तत्व लेकर बना माना जाता है |
| विषय-वस्तु | कुल 36 अध्याय — इसमें नृत्य, संगीत, अभिनय, रंगमंच-निर्माण, वेशभूषा, रस-सिद्धांत आदि सभी विषय शामिल |
| महत्व | सभी 8 शास्त्रीय नृत्यों व शास्त्रीय संगीत परंपराओं की सैद्धांतिक नींव यहीं से मानी जाती है |
नाट्यशास्त्र में दी गई सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा है 'रस सिद्धांत' — इसके अनुसार किसी भी प्रदर्शन (नृत्य, नाटक, संगीत) का उद्देश्य दर्शक में एक विशेष भाव-रस जगाना है। मूल रूप से 8 रस बताए गए थे, बाद में 9वाँ रस (शांत) जोड़ा गया:
| रस (Rasa) | भाव (मूल भावना) |
|---|---|
| शृंगार (Shringara) | प्रेम / सौंदर्य |
| हास्य (Hasya) | हास्य-विनोद |
| करुण (Karuna) | शोक / दया |
| रौद्र (Raudra) | क्रोध |
| वीर (Veera) | वीरता / साहस |
| भयानक (Bhayanaka) | भय |
| बीभत्स (Bibhatsa) | घृणा |
| अद्भुत (Adbhuta) | आश्चर्य |
| शांत (Shanta) | शांति — यह रस बाद में आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा जोड़ा गया, मूल आठ रसों में शामिल नहीं था |
भारत सरकार की संगीत नाटक अकादमी (Sangeet Natak Akademi) ने कुछ निश्चित मापदंडों के आधार पर 8 नृत्य-शैलियों को 'शास्त्रीय नृत्य' (Classical Dance) का दर्जा दिया है:
| मापदंड | विवरण |
|---|---|
| प्राचीन शास्त्रीय ग्रंथों में जड़ें | नाट्यशास्त्र या अन्य प्राचीन ग्रंथों में सैद्धांतिक आधार होना आवश्यक |
| गुरु-शिष्य परंपरा | पीढ़ी-दर-पीढ़ी औपचारिक प्रशिक्षण-पद्धति द्वारा हस्तांतरण |
| निश्चित व्याकरण | मुद्रा (हाथ के इशारे), भाव (चेहरे के भाव) व ताल का निश्चित व मानकीकृत नियम-तंत्र |
| जीवंत परंपरा | आज भी सक्रिय रूप से प्रस्तुत व सिखाई जाने वाली परंपरा |
अब हम एक-एक करके सभी 8 शास्त्रीय नृत्यों का अध्ययन करेंगे — पहले चार नृत्य नीचे देखें:
| भरतनाट्यम | विवरण |
|---|---|
| उत्पत्ति राज्य | तमिलनाडु |
| मूल स्रोत | 'सदिर' नामक मंदिर-नृत्य परंपरा से विकसित; प्राचीनतम शास्त्रीय नृत्यों में गिना जाता है |
| विषय/देवता | मुख्यतः भगवान शिव (नटराज रूप) को समर्पित; मंदिर-नृत्य परंपरा से जुड़ा |
| विशेषता | ज्यामितीय शारीरिक मुद्राएँ (अराइमंडी स्थिति), स्पष्ट हस्त-मुद्राएँ व भाव-अभिनय का संतुलन |
| पुनरुद्धार | 20वीं सदी में रुक्मिणी देवी अरुंडेल द्वारा पुनर्जीवित व लोकप्रिय बनाया गया |
| कथक | विवरण |
| उत्पत्ति राज्य | उत्तर भारत (मुख्यतः उत्तर प्रदेश) |
| मूल स्रोत | 'कथक' शब्द 'कथा' से बना — मूलतः मंदिरों में कथा-वाचन की परंपरा से विकसित |
| विषय/देवता | बाद में मुगल दरबारी संरक्षण में हिन्दू भक्ति व फारसी-दरबारी दोनों तत्वों का मिश्रण |
| विशेषता | तेज़ चक्कर (चक्कर/pirouettes), पदचालन (footwork) पर घुँघरुओं की लयबद्ध थाप, अभिनय व नृत्य का संतुलन |
| घराने | लखनऊ घराना, जयपुर घराना (राजस्थान), बनारस घराना |
| कथकली | विवरण |
| उत्पत्ति राज्य | केरल |
| मूल स्रोत | मंदिर-नाट्य व मार्शल आर्ट 'कलरीपयट्टु' दोनों से प्रभावित |
| विषय/देवता | रामायण-महाभारत जैसे महाकाव्यों की कथाएँ; नृत्य-नाटिका (dance-drama) शैली |
| विशेषता | अत्यंत रंगीन व विशाल मुखौटानुमा श्रृंगार (चेहरे पर रंग-आधारित 'वेशम'), आँखों व भौंहों का सूक्ष्म संचालन, कोई संवाद नहीं — केवल मुद्रा व भाव से कथा |
| वेश-प्रकार | पच्चा (सात्विक/नायक), कत्ती (राक्षसी/खलनायक), ताड़ी, कारी आदि विभिन्न रंग-कोड चरित्र दर्शाते हैं |
| ओडिसी | विवरण |
| उत्पत्ति राज्य | ओडिशा |
| मूल स्रोत | पुरी के जगन्नाथ मंदिर की 'महारी' (देवदासी) नृत्य-परंपरा से विकसित |
| विषय/देवता | मुख्यतः भगवान जगन्नाथ (कृष्ण-रूप) को समर्पित |
| विशेषता | 'त्रिभंगी' मुद्रा (शरीर के तीन भागों — सिर, धड़, पाँव — का विपरीत मोड़) इसकी सबसे पहचानी जाने वाली भंगिमा है; अत्यंत तरल व प्रवाहमय गति |
| प्रमुख कलाकार | गुरु केलुचरण महापात्र (आधुनिक ओडिसी के पुनरुद्धारक) |
शेष चार शास्त्रीय नृत्य नीचे देखें:
| कचिपूड़ी | विवरण |
|---|---|
| उत्पत्ति राज्य | आंध्र प्रदेश |
| मूल स्रोत | कुचिपुड़ी गाँव की परंपरा से नामित; मूलतः पुरुष ब्राह्मण कलाकारों द्वारा प्रस्तुत नृत्य-नाटिका |
| विषय/देवता | भगवान कृष्ण की लीलाएँ प्रमुख विषय |
| विशेषता | 'तरंगम' — थाली के किनारे पर खड़े होकर संतुलन के साथ नृत्य करना इसकी सबसे विशिष्ट प्रस्तुति है; संवाद व गायन दोनों नृत्य के साथ |
| मणिपुरी | विवरण |
| उत्पत्ति राज्य | मणिपुर |
| मूल स्रोत | वैष्णव भक्ति परंपरा व स्थानीय मणिपुरी संस्कृति का मिश्रण |
| विषय/देवता | राधा-कृष्ण की रास-लीला प्रमुख विषय |
| विशेषता | अत्यंत कोमल, गोलाकार व प्रवाहमय गति (कोई तीखे कोण नहीं); चेहरे के भाव संयमित रखे जाते हैं, पैरों की थाप हल्की होती है — घुँघरू प्रायः नहीं पहने जाते |
| मोहिनीअट्टम | विवरण |
| उत्पत्ति राज्य | केरल |
| मूल स्रोत | 'मोहिनी' (विष्णु का मोहिनी अवतार) से नामित; एकल स्त्री-नृत्य परंपरा |
| विषय/देवता | भगवान विष्णु/कृष्ण से संबंधित भक्ति व शृंगार रस प्रधान |
| विशेषता | कोमल, लयबद्ध व झूलती हुई (swaying) गति; सफेद-सुनहरी वेशभूषा (कासावु साड़ी) इसकी पहचान |
| सत्रीया | विवरण |
|---|---|
| उत्पत्ति राज्य | असम |
| मूल स्रोत | 15वीं सदी में वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव द्वारा 'सत्र' (मठ) संस्थाओं में स्थापित |
| विषय/देवता | वैष्णव भक्ति — विशेषकर कृष्ण-लीला |
| विशेषता | परंपरागत रूप से केवल सत्र (मठ) के भिक्षुओं द्वारा प्रस्तुत; वर्ष 2000 में इसे 8वें शास्त्रीय नृत्य के रूप में मान्यता मिली — यह सबसे नवीनतम मान्यता-प्राप्त शास्त्रीय नृत्य है |
RAS मुख्य परीक्षा में सभी 8 नृत्यों को एक साथ जोड़कर या तुलनात्मक रूप से पूछा जाना बहुत सामान्य है — इसीलिए नीचे एक संक्षिप्त 'मास्टर-टेबल' दी गई है, जिसमें सभी 8 एक साथ हैं:
| नृत्य | राज्य | मुख्य पहचान |
|---|---|---|
| भरतनाट्यम | तमिलनाडु | अराइमंडी मुद्रा; प्राचीनतम शास्त्रीय नृत्य |
| कथक | उत्तर भारत | चक्कर व लयबद्ध पदचालन; एकमात्र उत्तर भारतीय शास्त्रीय नृत्य |
| कथकली | केरल | मुखौटानुमा रंगीन श्रृंगार; संवादरहित नृत्य-नाटिका |
| ओडिसी | ओडिशा | त्रिभंगी मुद्रा; जगन्नाथ भक्ति परंपरा |
| कुचिपुड़ी | आंध्र प्रदेश | तरंगम (थाली पर नृत्य); नृत्य के साथ संवाद-गायन |
| मणिपुरी | मणिपुर | कोमल-गोलाकार गति; राधा-कृष्ण रासलीला |
| मोहिनीअट्टम | केरल | झूलती हुई कोमल गति; सफेद-सुनहरी वेशभूषा |
| सत्रीया | असम | सत्र (मठ) परंपरा; वर्ष 2000 में मान्यता — सबसे नवीनतम |
भारतीय शास्त्रीय संगीत मुख्यतः दो परंपराओं में बँटा है — उत्तर भारत की हिन्दुस्तानी परंपरा व दक्षिण भारत की कर्नाटक परंपरा। पहले हिन्दुस्तानी परंपरा को समझें:
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| क्षेत्र | उत्तर भारत |
| प्रभाव | फारसी-अरबी संगीत परंपरा के साथ मिश्रण (विशेषकर मुगल दरबारी संरक्षण के दौरान) |
| आधार | राग (Raga) व ताल (Tala) पर आधारित; प्रस्तुति में सुधार/तात्कालिकता (improvisation) को अधिक महत्व |
| प्रमुख गायन-शैलियाँ | ध्रुपद (सबसे प्राचीन व गंभीर शैली), ख़याल (सर्वाधिक लोकप्रिय), ठुमरी (शृंगार-प्रधान, हल्की शैली) |
| घराना पद्धति | गुरु-शिष्य परंपरा में विकसित विशिष्ट शैलीगत 'घराने' — हिन्दुस्तानी संगीत की एक अनूठी विशेषता है, जो कर्नाटक संगीत में उतनी प्रचलित नहीं |
| घराना | केंद्र/विशेषता |
| ग्वालियर घराना | सबसे प्राचीन घरानों में से एक; ख़याल गायकी का जनक माना जाता है |
| किराना घराना | सुर की शुद्धता व आलाप पर विशेष बल |
| पटियाला घराना | तानों की तेज़ी व लयकारी के लिए प्रसिद्ध |
| आगरा घराना | ध्रुपद व ख़याल दोनों शैलियों का मिश्रित प्रभाव |
| जयपुर-अतरौली घराना | राजस्थान से जुड़ा घराना; जटिल व दुर्लभ रागों की प्रस्तुति के लिए प्रसिद्ध |
कर्नाटक संगीत दक्षिण भारत की शास्त्रीय संगीत परंपरा है — यह हिन्दुस्तानी संगीत से अपेक्षाकृत अधिक संरचित (structured) मानी जाती है:
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| क्षेत्र | दक्षिण भारत (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल) |
| आधार | अधिकांशतः पूर्व-रचित रचनाओं (compositions) पर आधारित; सुधार की गुंजाइश तुलनात्मक रूप से सीमित |
| प्रमुख रचना-रूप | 'कृति' (Kriti) — भक्ति-प्रधान रचना, जिसमें पल्लवी-अनुपल्लवी-चरणम् जैसे भाग होते हैं |
| कर्नाटक संगीत त्रिमूर्ति (Trinity) | त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितर व श्यामा शास्त्री — तीनों 18वीं-19वीं सदी के महान रचनाकार, जिन्होंने कर्नाटक संगीत को वर्तमान रूप दिया |
दोनों परंपराओं के बीच स्पष्ट अंतर परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है — नीचे देखें:
| ⚖️ हिन्दुस्तानी संगीत बनाम कर्नाटक संगीत | ⚖️ हिन्दुस्तानी संगीत बनाम कर्नाटक संगीत |
|---|---|
| हिन्दुस्तानी संगीत | कर्नाटक संगीत |
| ▸ क्षेत्र — उत्तर भारत ▸ फारसी-अरबी प्रभाव मिश्रित ▸ सुधार (improvisation) पर अधिक बल ▸ घराना पद्धति प्रमुख ▸ प्रमुख शैली — ख़याल, ध्रुपद, ठुमरी ▸ प्रमुख वाद्य — सितार, सरोद, तबला | ▸ क्षेत्र — दक्षिण भारत ▸ मूलतः स्वदेशी परंपरा, कम बाहरी प्रभाव ▸ पूर्व-रचित रचनाओं पर अधिक बल ▸ गुरुकुल पद्धति, घराना कम प्रचलित ▸ प्रमुख रचना-रूप — कृति ▸ प्रमुख वाद्य — वीणा, मृदंगम, वायलिन |
भारतीय संगीतशास्त्र में वाद्य यंत्रों (Musical Instruments) को उनकी ध्वनि-उत्पत्ति की विधि के अनुसार चार वर्गों में बाँटा गया है:
| वर्ग | ध्वनि-उत्पत्ति विधि | उदाहरण |
|---|---|---|
| तत वाद्य (Chordophones) | तार (string) के कंपन से | सितार, वीणा, सरोद, सारंगी |
| सुषिर वाद्य (Aerophones) | फूँक/हवा के प्रवाह से | बांसुरी, शहनाई, नादस्वरम् |
| अवनद्ध वाद्य (Membranophones) | चमड़े से मढ़ी सतह पर आघात से | तबला, मृदंगम, पखावज, ढोलक |
| घन वाद्य (Idiophones) | ठोस वस्तु के आपस में टकराने/आघात से | मंजीरा, घंटा, जलतरंग |
शास्त्रीय परंपराओं के साथ-साथ भारत के हर क्षेत्र की अपनी समृद्ध लोक-नाट्य (Folk Theatre) परंपरा भी है — ये आमजन की भाषा व मुहावरों में सामाजिक-धार्मिक कथाएँ प्रस्तुत करती हैं:
| परंपरा | राज्य/क्षेत्र | विशेषता |
|---|---|---|
| नौटंकी | उत्तर प्रदेश | गीत-संवाद मिश्रित लोकप्रिय लोक-नाट्य शैली |
| रामलीला | उत्तर भारत (विशेषकर उत्तर प्रदेश) | रामायण की कथा का सामूहिक मंचन; UNESCO अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (2008) |
| रासलीला | ब्रज क्षेत्र (मथुरा-वृंदावन) | कृष्ण-राधा लीलाओं का नाट्य-मंचन |
| भवाई | गुजरात-राजस्थान सीमा क्षेत्र | सिर पर कई मटके संतुलित रखकर नृत्य-अभिनय |
| तमाशा | महाराष्ट्र | गीत-नृत्य-हास्य मिश्रित लोकप्रिय लोक-नाट्य |
| यक्षगान | कर्नाटक | रंगीन वेशभूषा व मुखौटों सहित नृत्य-नाट्य, पौराणिक कथाओं पर आधारित |
| जात्रा | पश्चिम बंगाल | खुले मंच पर प्रस्तुत होने वाला संगीत-प्रधान लोक-नाट्य |
| स्वांग | हरियाणा-पंजाब-राजस्थान | गीत व संवाद मिश्रित शैली, सामाजिक-पौराणिक विषय |
भारत में कठपुतली कला की भी एक बहुत पुरानी व क्षेत्रीय रूप से विविध परंपरा है — इसे मुख्यतः चार प्रकारों में बाँटा जाता है (धागा, छाया, दस्ताना, छड़ी):
| परंपरा | राज्य | प्रकार |
|---|---|---|
| कठपुतली | राजस्थान | धागा कठपुतली (String Puppet) — भारत की सबसे प्रसिद्ध कठपुतली परंपरा; भाट समुदाय द्वारा संचालित |
| कुंढेई (Kundhei) | ओडिशा | धागा कठपुतली — लकड़ी की बनी, नृत्य-मुद्रा में लचीली |
| टोगलु गोम्बेयट्टा | कर्नाटक | चमड़े की छाया कठपुतली (Shadow Puppet) |
| तोलु बोम्मलाटा | आंध्र प्रदेश | चमड़े की छाया कठपुतली — आकार में सबसे बड़ी छाया-कठपुतलियों में से एक |
| पावाकथकली | केरल | दस्ताना कठपुतली (Glove Puppet) — कथकली से प्रेरित लघु रूप |
| राव्रन छाया | तमिलनाडु | चमड़े की छाया कठपुतली — रामायण प्रसंगों पर आधारित |
प्रदर्शनकारी कला की दृष्टि से राजस्थान स्वयं एक समृद्ध केंद्र है — कठपुतली कला से लेकर UNESCO-मान्यता प्राप्त लोक नृत्य तक:
| परंपरा | विवरण |
|---|---|
| कठपुतली कला | भाट समुदाय द्वारा संचालित धागा-कठपुतली परंपरा; राजा-रानी व लोक-कथाओं का मनोरंजक मंचन; भारत की सबसे पहचानी जाने वाली कठपुतली शैली |
| कालबेलिया नृत्य | सपेरा (साँप पकड़ने वाले) समुदाय की परंपरा; काले घाघरे में लचीली, सर्प जैसी गति; UNESCO अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल (2010) |
| घूमर नृत्य | राजस्थान का राजकीय/सर्वाधिक प्रसिद्ध लोक नृत्य; घाघरा पहन कर गोल घूमते हुए किया जाने वाला सामूहिक स्त्री-नृत्य |
| जयपुर घराना (कथक) | कथक नृत्य के तीन प्रमुख घरानों में से एक; जयपुर दरबार के संरक्षण में विकसित; तेज़ पदचालन (footwork) व लयकारी पर विशेष बल |
| गैर व तेरहताली नृत्य | गैर — होली पर पुरुषों द्वारा डंडों सहित सामूहिक नृत्य; तेरहताली — कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा शरीर पर बँधे मंजीरों से किया जाने वाला नृत्य |
नीचे दी गई तालिका इस अध्याय से जुड़े हालिया शोध व करेंट अफेयर्स को एक जगह दर्शाती है:
| घटना | वर्ष | मुख्य महत्व |
|---|---|---|
| रामलीला — UNESCO अमूर्त धरोहर सूची में शामिल | 2008 | उत्तर भारत की रामलीला परंपरा को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता |
| कालबेलिया लोक गीत-नृत्य — UNESCO अमूर्त धरोहर सूची में शामिल | 2010 | राजस्थान की सपेरा समुदाय परंपरा को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता |
| संगीत नाटक अकादमी 'अमृत पुरस्कार' | 2022 | आज़ादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत 75 वर्ष से अधिक आयु व अब तक असम्मानित 75 कलाकारों को विशेष एकबारगी सम्मान |
| SNA फेलोशिप (रत्न) व पुरस्कार — वर्ष 2024 व 2025 की संयुक्त घोषणा | हाल में | संगीत नाटक अकादमी द्वारा नामांकन प्रक्रिया व सम्मान-घोषणा नियमित रूप से जारी |
| ❝ उद्धरण (Quote) |
|---|
| "ऐसा कोई ज्ञान, कोई शिल्प, कोई विद्या, कोई कला, कोई योग और कोई कर्म नहीं है, जो नाट्य (प्रदर्शनकारी कला) में न दिखाई देता हो।" — भरत मुनि — नाट्यशास्त्र, प्रथम अध्याय (भावार्थ) |
| ✍️ उत्तर लेखन कोण (Mains Answer Angle) |
| 🎯 5-अंक कोण (~70 शब्द): • प्रश्न जैसे 'किसी एक शास्त्रीय नृत्य की विशेषताएँ बताइए' में — पहले उसका उत्पत्ति-राज्य व मूल स्रोत बताएँ। • फिर 2-3 तकनीकी विशेषताएँ क्रमवार लिखें — जैसे मुद्रा, वेशभूषा, संगीत-संगति। • अंत में एक प्रमुख कलाकार या पुनरुद्धारक का नाम उदाहरण स्वरूप दें। 🎯 10-अंक कोण (~120 शब्द): • प्रश्न जैसे 'भारतीय शास्त्रीय नृत्यों के सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व का मूल्यांकन कीजिए' में — परिचय में नाट्यशास्त्र व रस-सिद्धांत की सैद्धांतिक भूमिका बताएँ। • मुख्य भाग को उप-शीर्षकों में बाँटें — धार्मिक/भक्ति आयाम (मंदिर-नृत्य परंपरा), क्षेत्रीय विविधता (8 नृत्य अलग-अलग राज्यों से), गुरु-शिष्य परंपरा का सामाजिक महत्व, आधुनिक पुनरुद्धार (जैसे रुक्मिणी देवी अरुंडेल का योगदान)। • उदाहरण जोड़ें — ओडिसी की त्रिभंगी मुद्रा, कथकली का मुखौटानुमा श्रृंगार, कालबेलिया की UNESCO मान्यता। • निष्कर्ष में बताएँ कि यह विविधता किस प्रकार भारत की 'अनेकता में एकता' को प्रदर्शित करती है, और राजस्थान के योगदान (कठपुतली, जयपुर घराना) का उल्लेख अवश्य करें। |
प्रमुख कलाकार एवं उनका क्षेत्र
| कलाकार | क्षेत्र | योगदान |
|---|---|---|
| रुक्मिणी देवी अरुंडेल | भरतनाट्यम | 20वीं सदी में भरतनाट्यम का पुनरुद्धार व संस्थागत प्रशिक्षण |
| पंडित बिरजू महाराज | कथक | लखनऊ घराने के सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादकों में से एक |
| गुरु केलुचरण महापात्र | ओडिसी | आधुनिक ओडिसी नृत्य के पुनरुद्धारक |
| श्रीमंत शंकरदेव | सत्रीया | 15वीं सदी में सत्रीया व वैष्णव सत्र-परंपरा के प्रवर्तक |
| पंडित भीमसेन जोशी | हिन्दुस्तानी संगीत (किराना घराना) | ख़याल गायकी के महानतम कलाकारों में से एक |
| एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी | कर्नाटक संगीत | कर्नाटक शास्त्रीय गायन की सर्वाधिक सम्मानित कलाकार |
| उस्ताद बिस्मिल्लाह खान | हिन्दुस्तानी संगीत (शहनाई) | शहनाई वादन को शास्त्रीय संगीत मंच तक पहुँचाने का श्रेय |
Q1. नाट्यशास्त्र एवं रस सिद्धांत की भारतीय प्रदर्शनकारी कला में भूमिका स्पष्ट कीजिए। (10 अंक) Q2. भारत के किन्हीं दो शास्त्रीय नृत्यों की तुलना कीजिए। (10 अंक) Q3. ओडिसी नृत्य की प्रमुख विशेषताएँ बताइए। (5 अंक) Q4. हिन्दुस्तानी एवं कर्नाटक संगीत परंपराओं में अंतर स्पष्ट कीजिए। (10 अंक) Q5. भारतीय वाद्य यंत्रों के वर्गीकरण का सोदाहरण वर्णन कीजिए। (5 अंक) Q6. भारत की प्रमुख लोक-नाट्य परंपराओं का वर्णन कीजिए। (10 अंक) Q7. भारत में कठपुतली कला की क्षेत्रीय विविधता को स्पष्ट कीजिए। (5 अंक) Q8. राजस्थान की प्रदर्शनकारी कला परंपराओं (नृत्य एवं कठपुतली) का वर्णन कीजिए। (10 अंक) Q9. सत्रीया नृत्य को शास्त्रीय दर्जा मिलने की पृष्ठभूमि एवं विशेषताओं की व्याख्या कीजिए। (5 अंक) Q10. कालबेलिया लोक गीत-नृत्य के UNESCO मान्यता एवं सांस्कृतिक महत्व की विवेचना कीजिए। (5 अंक)
नीचे दी गई तालिका इस अध्याय के महत्वपूर्ण वर्षों व घटनाओं का कालक्रम प्रस्तुत करती है — यह Revision हेतु सबसे उपयोगी है:
| काल/वर्ष | घटना/स्थल | महत्व |
|---|---|---|
| लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू.-दूसरी शताब्दी ई. | भरत मुनि द्वारा नाट्यशास्त्र की रचना | सभी शास्त्रीय प्रदर्शनकारी कलाओं की सैद्धांतिक नींव |
| 15वीं सदी | श्रीमंत शंकरदेव द्वारा सत्र-परंपरा व सत्रीया नृत्य की स्थापना (असम) | वैष्णव भक्ति आंदोलन से जुड़ी नृत्य-परंपरा का प्रारंभ |
| 18वीं-19वीं सदी | कर्नाटक संगीत त्रिमूर्ति (त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितर, श्यामा शास्त्री) का काल | कर्नाटक संगीत को वर्तमान संरचित रूप मिला |
| 20वीं सदी प्रारंभ | रुक्मिणी देवी अरुंडेल द्वारा भरतनाट्यम का पुनरुद्धार | मंदिर-नृत्य परंपरा को आधुनिक मंच तक लाया गया |
| 2000 | सत्रीया को 8वें शास्त्रीय नृत्य के रूप में मान्यता | संगीत नाटक अकादमी द्वारा नवीनतम शास्त्रीय नृत्य मान्यता |
| 2008 | रामलीला — UNESCO अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल | उत्तर भारत की रामलीला परंपरा को अंतर्राष्ट्रीय पहचान |
| 2010 | कालबेलिया (राजस्थान) — UNESCO अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल | राजस्थान की लोक नृत्य परंपरा को अंतर्राष्ट्रीय पहचान |
| 2022 | संगीत नाटक अकादमी 'अमृत पुरस्कार' — 75 कलाकारों का सम्मान | आज़ादी का अमृत महोत्सव अंतर्गत विशेष एकबारगी सम्मान |