सोचो 11वीं सदी में तंजावुर में मज़दूर बिना किसी क्रेन या मशीन के 80 टन का एक विशाल पत्थर 66 मीटर ऊँचे मंदिर-शिखर पर चढ़ा रहे हैं — यह बृहदेश्वर मंदिर है, जो चोल राजा राजराज प्रथम की शक्ति व भक्ति दोनों का प्रतीक है। ठीक इसी दौर में उत्तर भारत में खजुराहो के चंदेल शासक पत्थर पर बारीक मूर्तिकला में मानव-जीवन के हर भाव को उकेर रहे हैं। यह अध्याय भारत के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ विकसित हुई मंदिर-निर्माण की तीन प्रमुख शैलियों — नागर, द्राविड़ व वेसर — का अध्ययन कराता है। जहाँ भी संभव हो, content को तालिका में रखा गया है।
भारतीय मंदिर वास्तुकला मुख्यतः तीन शैलियों में विभाजित है, जो क्षेत्र के अनुसार विकसित हुईं — नीचे तालिका में तीनों का संक्षिप्त परिचय देखें, विस्तृत अध्ययन आगे के भागों में करेंगे:
| शैली | क्षेत्र | मूल पहचान |
|---|---|---|
| नागर शैली (Nagara) | उत्तर व मध्य भारत | वक्ररेखीय (curvilinear) शिखर; प्रायः गोपुरम या चारदीवारी नहीं |
| द्राविड़ शैली (Dravida) | दक्षिण भारत | सीढ़ीदार पिरामिडाकार विमान; विशाल गोपुरम व चारदीवारी (प्राकार) |
| वेसर शैली (Vesara) | दक्कन क्षेत्र (कर्नाटक) | नागर व द्राविड़ के तत्वों का सम्मिश्रण — 'हाइब्रिड' शैली |
#. प्रमुख वास्तुकला शब्दावली
मंदिर वास्तुकला को समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण शब्दावलियाँ नीचे दी गई हैं:
जगती (Jagati): वह ऊँचा चबूतरा जिस पर मंदिर स्थित होता है।
अंतराल (Antarala): गर्भगृह और मंडप के बीच का मार्ग।
शिखर/विमान: गर्भगृह के ऊपर का ऊँचा भाग (उत्तर भारत में शिखर, दक्षिण में विमान)।
मंडप: स्तंभयुक्त सभा-कक्ष।
गोपुरम: दक्षिण भारतीय मंदिरों के विशाल प्रवेश द्वार।
अमलक: नागर शैली के शिखर के शीर्ष पर पत्थर की चकती।
नागर शैली की शुरुआत गुप्त काल में हुई थी (Chapter 02 में पढ़ा) — मध्यकाल में यह शैली परिपक्व होकर कई उप-शैलियों व क्षेत्रीय रूपों में विकसित हुई:
| उप-शैली (शिखर प्रकार) | विवरण |
|---|---|
| रेखा-प्रासाद / लतीना (Latina) | सबसे सामान्य प्रकार — सीधा, वक्ररेखीय व ऊपर की ओर पतला होता शिखर |
| फांसना (Phamsana) | आयताकार आधार व ढलानदार छत — प्रायः सभा-मंडप (मंडप) के ऊपर प्रयुक्त |
| वल्लभी (Valabhi) | अर्ध-बेलनाकार छत, आयताकार गर्भगृह — रथ के छत्र जैसी संरचना |
नागर शैली के अंतर्गत भी क्षेत्रीय आधार पर कई उप-शैलियाँ विकसित हुईं, जिन्हें आगे के भागों में विस्तार से पढ़ेंगे:
| क्षेत्रीय उप-शैली | क्षेत्र/संरक्षक | प्रमुख उदाहरण |
|---|---|---|
| ओडिशा-कलिंग शैली | पूर्वी गंग वंश (ओडिशा) | कोणार्क सूर्य मंदिर, लिंगराज मंदिर |
| खजुराहो शैली | चंदेल वंश (मध्य प्रदेश) | कंदरिया महादेव मंदिर |
| सोलंकी शैली | चालुक्य/सोलंकी वंश (गुजरात) | मोढेरा सूर्य मंदिर |
| बंगाल शैली | पाल-सेन/मल्ल वंश (पूर्वी भारत) | विष्णुपुर के टेराकोटा मंदिर |
मध्य प्रदेश के खजुराहो में चंदेल वंश के शासकों ने लगभग 950-1050 ई. के बीच लगभग 85 मंदिरों का निर्माण करवाया था, जिनमें से आज लगभग 25 सुरक्षित हैं।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संरक्षक एवं काल | चंदेल वंश, लगभग 950-1050 ई. |
| प्रमुख मंदिर | कंदरिया महादेव मंदिर (शिव को समर्पित, सबसे ऊँचा शिखर) |
| शैली विशेषता | पंचायतन शैली (मुख्य मंदिर + उप-मंदिर); ऊँचा वक्ररेखीय नागर शिखर; अत्यंत बारीक मूर्तिकला |
| शृंगारिक (Erotic) मूर्तियाँ | मंदिर की बाहरी दीवारों पर मानव-जीवन के सभी भावों (शृंगार सहित) का चित्रण — विद्वानों में इसकी व्याख्या तांत्रिक परंपरा, जीवन के पूर्ण चक्र के प्रतीक या गृहस्थ-जीवन के उत्सव के रूप में की जाती है |
| UNESCO मान्यता | 1986 में 'खजुराहो के स्मारक समूह' (Khajuraho Group of Monuments) को UNESCO विश्व धरोहर घोषित किया गया |
ओडिशा की कलिंग शैली नागर शैली की ही एक विशिष्ट क्षेत्रीय शाखा है, जिसमें मंदिर की अलग-अलग संरचनाओं को अलग-अलग नाम दिए गए हैं:
| देउल (मंदिर-भाग) प्रकार | विवरण | |
|---|---|---|
| रेखा देउल (Rekha Deula) | गर्भगृह के ऊपर ऊँचा, वक्ररेखीय शिखर — मुख्य पूजा-स्थल के ऊपर | |
| पीढ़ देउल (Pidha Deula) | जगमोहन (सभा-मंडप) के ऊपर सीढ़ीदार पिरामिडाकार छत | |
| खाखरा देउल (Khakhara Deula) | आयताकार आधार व बैरल-वॉल्ट (barrel-vault) जैसी छत — प्रायः देवी मंदिरों हेतु प्रयुक्त | |
| मंदिर | स्थान | विशेषता |
| कोणार्क सूर्य मंदिर | कोणार्क, ओडिशा | विशाल रथ के आकार में निर्मित (12 पहिए, 7 घोड़े); गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम द्वारा निर्मित; UNESCO धरोहर (1984) |
| लिंगराज मंदिर | भुवनेश्वर, ओडिशा | शिव को समर्पित; ओडिशा शैली का उत्कृष्ट व सबसे बड़ा उदाहरण |
| जगन्नाथ मंदिर | पुरी, ओडिशा | भगवान जगन्नाथ को समर्पित; प्रसिद्ध रथ-यात्रा परंपरा का केंद्र |
द्राविड़ शैली नागर शैली से संरचनात्मक रूप से स्पष्ट रूप से भिन्न है — इसके मूल तत्वों को नीचे तालिका में समझें:
| तत्व (Element) | विवरण |
|---|---|
| विमान (Vimana) | गर्भगृह के ऊपर सीढ़ीदार, पिरामिडाकार टावर — नागर शिखर से भिन्न सीधी-सीधी परतों वाली संरचना |
| गोपुरम (Gopuram) | मंदिर परिसर का विशाल प्रवेश-द्वार टावर — समय के साथ यह मुख्य विमान से भी अधिक ऊँचा व अलंकृत होता गया |
| प्राकार (Prakara) | मंदिर परिसर के चारों ओर की चारदीवारी — प्रायः कई परतों में |
| मंडप (Mandapa) | स्तंभयुक्त सभा-कक्ष, गर्भगृह के सामने |
तमिलनाडु में पल्लव वंश ने द्राविड़ शैली की नींव रखी — इनकी राजधानी कांचीपुरम व तटीय नगर महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) में इसके सर्वोत्तम उदाहरण मिलते हैं।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| राजधानी | कांचीपुरम, तमिलनाडु |
| पंच रथ (Pancha Rathas) | पाँच एकाश्म (monolithic) रथ-मंदिर — प्रत्येक एक ही चट्टान से तराशा गया, द्राविड़ शैली के प्रारंभिक प्रयोग |
| तटीय मंदिर (Shore Temple) | समुद्र तट पर स्थित पत्थर से निर्मित (structural) मंदिर — पंच रथों से अलग, वास्तविक निर्माण-तकनीक का उदाहरण |
| गुफा-मंडप मंदिर | चट्टान काटकर बनाए गए मंडप-मंदिर, जिनमें अर्जुन की तपस्या जैसे विशाल भित्ति-शिल्प (relief) शामिल |
| प्रमुख शासक | नरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल) |
| UNESCO मान्यता | 1984 में 'महाबलीपुरम के स्मारक समूह' (Group of Monuments at Mahabalipuram) को UNESCO धरोहर घोषित किया गया |
पल्लवों के बाद चोल वंश ने द्राविड़ शैली को उसके सबसे भव्य व परिपक्व रूप तक पहुँचाया — तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है:
| मंदिर | शासक/काल | विशेषता |
|---|---|---|
| बृहदेश्वर मंदिर, तंजावुर | राजराज प्रथम, लगभग 1010 ई. | उस काल का सबसे ऊँचा विमान (लगभग 66 मीटर); शिखर पर एक ही विशाल पत्थर का शीर्ष-भाग (कहा जाता है कि ढलान बनाकर हाथियों से चढ़ाया गया) |
| गंगईकोंडचोलपुरम मंदिर | राजेंद्र प्रथम | राजराज प्रथम के पुत्र द्वारा निर्मित, बृहदेश्वर मंदिर से प्रेरित परंतु अपेक्षाकृत अधिक अलंकृत |
| ऐरावतेश्वर मंदिर, दारासुरम | राजराज द्वितीय, 12वीं सदी | अत्यंत बारीक मूर्तिकला व रथ-रूपी मंडप के लिए प्रसिद्ध |
⚠️ महत्वपूर्ण (Important Note)
उपर्युक्त तीनों मंदिरों (तंजावुर, गंगईकोंडचोलपुरम, दारासुरम) को संयुक्त रूप से 'महान जीवंत चोल मंदिर' (Great Living Chola Temples) नाम से UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है — मूल सूचीकरण 1987 में (केवल तंजावुर), और 2004 में विस्तार करके अन्य दो मंदिर जोड़े गए।
कर्नाटक के बादामी चालुक्य वंश ने एक अनूठा योगदान दिया — इन्होंने एक ही क्षेत्र में नागर व द्राविड़ दोनों शैलियों में प्रयोग किए, जिससे यह क्षेत्र 'भारतीय मंदिर वास्तुकला की प्रयोगशाला' कहलाया:
| स्थल | विशेषता |
|---|---|
| बादामी (Badami) | चट्टान काटकर बनाए गए गुफा-मंदिर — वैष्णव, शैव व जैन तीनों परंपराओं के गुफा-मंदिर एक साथ |
| ऐहोल (Aihole) | 'भारतीय मंदिर वास्तुकला की प्रयोगशाला' (Cradle of Indian Temple Architecture) कहा जाता है; दुर्गा मंदिर अपने अर्ध-वृत्ताकार (apsidal) डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध |
| पट्टडकल (Pattadakal) | एक ही परिसर में नागर शैली (जैसे पापनाथ मंदिर) व द्राविड़ शैली (जैसे विरुपाक्ष मंदिर) के मंदिर एक साथ; UNESCO धरोहर (1987) |
कर्नाटक के होयसल वंश (12वीं-13वीं सदी) ने एक अत्यंत विशिष्ट शैली विकसित की, जिसे कुछ विद्वान 'वेसर शैली' का सर्वश्रेष्ठ रूप मानते हैं:
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| सामग्री | साबुन-पत्थर (soapstone/chloritic schist) — नरम होने के कारण अत्यंत बारीक नक्काशी संभव |
| आधार आकृति | तारे के आकार का (stellate) ऊँचा चबूतरा (जगती), जिस पर मंदिर खड़ा होता है |
| प्रमुख मंदिर | चेन्नकेशव मंदिर (बेलूर), होयसलेश्वर मंदिर (हलेबिड), केशव मंदिर (सोमनाथपुर) |
| UNESCO मान्यता | 18 सितंबर 2023 को 'होयसल के पवित्र समूह' (Sacred Ensembles of the Hoysalas) को UNESCO विश्व धरोहर घोषित किया गया — भारत का 42वाँ धरोहर स्थल |
विशेष तथ्य: होयसल मंदिरों में 'साबुन-पत्थर' (Soapstone) का उपयोग किया गया, जो नरम होता है, जिससे अत्यंत बारीक नक्काशी संभव हुई।
वेसर शैली को समझना थोड़ा कठिन हो सकता है, क्योंकि यह किसी एक निश्चित रूप की बजाय नागर व द्राविड़ के मिश्रण की एक 'प्रवृत्ति' (tendency) है:
सोचो नागर शैली एक 'सीधी नुकीली मीनार' जैसी है और द्राविड़ शैली एक 'सीढ़ीदार पिरामिड' जैसी। अब कल्पना करो कि किसी ने इन दोनों को मिलाकर एक ऐसी संरचना बना दी जो न पूरी तरह सीधी मीनार है, न पूरी तरह सीढ़ीदार पिरामिड — बल्कि दोनों के तत्वों के साथ अपेक्षाकृत कम ऊँची पर बेहद अलंकृत है। यही 'वेसर शैली' है, जो दक्कन क्षेत्र (कर्नाटक) में चालुक्य, राष्ट्रकूट व होयसल शासकों के संरक्षण में विकसित हुई।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| उत्पत्ति क्षेत्र | दक्कन क्षेत्र (कर्नाटक) — चालुक्य, राष्ट्रकूट व होयसल शासकों के संरक्षण में |
| विशेषता | नागर के वक्ररेखीय व द्राविड़ के सीढ़ीदार तत्वों का सम्मिश्रण; तुलनात्मक रूप से कम ऊँचाई परंतु अत्यधिक अलंकरण |
| उदाहरण | पट्टडकल के कुछ मंदिर, होयसल मंदिर (बेलूर-हलेबिड) |
RAS मुख्य परीक्षा में तीनों शैलियों की तुलना एक बहुत लोकप्रिय प्रश्न रहा है — नीचे एक ही तालिका में तीनों को साथ देखें:
| विशेषता | नागर शैली | द्राविड़ शैली | वेसर शैली |
|---|---|---|---|
| क्षेत्र | उत्तर व मध्य भारत | दक्षिण भारत (तमिलनाडु) | दक्कन (कर्नाटक) |
| शिखर/विमान आकार | वक्ररेखीय, ऊपर पतला | सीढ़ीदार पिरामिडाकार | दोनों का मिश्रण, अपेक्षाकृत कम ऊँचा |
| गोपुरम | प्रायः नहीं | हाँ — विशाल व अलंकृत | सीमित |
| चारदीवारी (प्राकार) | प्रायः नहीं | हाँ | कभी-कभी |
| प्रमुख संरक्षक | चंदेल, गंग, सोलंकी | पल्लव, चोल | चालुक्य, होयसल |
| उदाहरण | खजुराहो, कोणार्क | तंजावुर, महाबलीपुरम | पट्टडकल, बेलूर-हलेबिड |
#. मंदिर वास्तुकला का सामाजिक-आर्थिक महत्व
मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि तत्कालीन समाज के 'Power Hubs' थे:
आर्थिक केंद्र: मंदिर भूमि-अनुदान स्वीकार करते थे और बैंकों (ऋण प्रदाता) के रूप में कार्य करते थे।
प्रशासनिक केंद्र: मंदिर के अधिकारियों द्वारा प्रशासन का संचालन होता था।
शिक्षा व कला: वेदों, संगीत और नृत्य (देवदासी परंपरा) का प्रशिक्षण दिया जाता था।
रोजगार सृजन: निर्माण व रख-रखाव से मूर्तिकारों व कारीगरों को रोजगार मिलता था।
पूर्वी भारत (बंगाल क्षेत्र) में पत्थर की उपलब्धता कम होने के कारण एक बिल्कुल अलग स्थानीय शैली विकसित हुई, जो झोपड़ी के आकार से प्रेरित थी:
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| छत शैली | 'दो-चाला' व 'चार-चाला' — बांग्ला ग्रामीण झोपड़ी जैसी ढलानदार वक्र छत |
| सामग्री | पकी मिट्टी की ईंट व टेराकोटा (पत्थर की स्थानीय कमी के कारण) |
| विष्णुपुर मंदिर (पश्चिम बंगाल) | मल्ल वंश के संरक्षण में निर्मित; दीवारों पर अत्यंत बारीक टेराकोटा नक्काशी (रामायण-महाभारत प्रसंग) |
| मुगल स्थापत्य पर प्रभाव | यह 'बंगला छत' शैली आगे चलकर मुगल वास्तुकला के कुछ मंडपों/छतरियों में भी अपनाई गई — इसे Chapter 04 में पढ़ेंगे |
गुजरात में सोलंकी (चालुक्य) वंश के संरक्षण में नागर शैली का एक अत्यंत अलंकृत व जल-संरचना से जुड़ा रूप विकसित हुआ:
| स्थल | विवरण |
|---|---|
| मोढेरा सूर्य मंदिर | राजा भीम प्रथम द्वारा 11वीं सदी में निर्मित; सामने सीढ़ीदार जलाशय 'सूर्यकुंड' — मंदिर व जल-संरचना का अनूठा संयोजन |
| रानी की वाव (पाटन) | एक भव्य सीढ़ीदार बावड़ी (stepwell), जिसकी दीवारों पर सैकड़ों देवी-देवताओं की मूर्तियाँ; UNESCO विश्व धरोहर (2014) |
| सोमनाथ मंदिर | अत्यंत प्राचीन शिव मंदिर, इतिहास में कई बार ध्वस्त व पुनर्निर्मित |
राजस्थान मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से बेहद समृद्ध रहा है — विशेषकर संगमरमर पर की गई बारीक नक्काशी (जैन स्थापत्य) के लिए यह विश्व-प्रसिद्ध है।
| स्थल | विवरण |
|---|---|
| ओसियां (जोधपुर) | 'राजस्थान का खजुराहो' कहा जाता है; प्रतिहार वंश के संरक्षण में 8वीं-12वीं सदी के मध्य लगभग 100 हिन्दू व जैन मंदिर निर्मित; सचिया माता मंदिर व सूर्य मंदिर प्रमुख |
| रणकपुर जैन मंदिर (पाली) | तीर्थंकर ऋषभनाथ को समर्पित; 15वीं सदी में सेठ धरणा शाह द्वारा निर्मित; लगभग 1444 संगमरमर स्तंभ — कोई भी दो स्तंभ एक जैसे नहीं |
| दिलवाड़ा मंदिर (माउंट आबू) | 11वीं-13वीं सदी में निर्मित जैन मंदिर समूह; मुख्य मंदिर 'विमल वसाही' तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित; संगमरमर पर अत्यंत सूक्ष्म व जटिल नक्काशी के लिए विश्व-प्रसिद्ध |
नीचे दी गई तालिका इस अध्याय से जुड़े हालिया शोध व करेंट अफेयर्स को एक जगह दर्शाती है:
| घटना / शोध | वर्ष | मुख्य निष्कर्ष / महत्व |
|---|---|---|
| होयसल मंदिर UNESCO सूची में शामिल | 18 सितंबर 2023 | बेलूर, हलेबिड व सोमनाथपुर — तीनों को संयुक्त रूप से मान्यता; भारत का 42वाँ UNESCO धरोहर स्थल |
| महान जीवंत चोल मंदिर सूची विस्तार | 2004 | ऐरावतेश्वर मंदिर (दारासुरम) को 1987 की मूल सूची में जोड़ा गया |
| रानी की वाव (पाटन) को UNESCO मान्यता | 2014 | गुजरात की सीढ़ीदार बावड़ी वास्तुकला को अंतर्राष्ट्रीय पहचान |
| ❝ उद्धरण (Quote) |
|---|
| "भारतीय मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि पत्थर में उकेरी गई संपूर्ण ब्रह्मांड की अवधारणा है।" — पर्सी ब्राउन (Percy Brown), भारतीय कला-इतिहासकार — भारतीय मंदिर वास्तुकला पर उनके विश्लेषण के भावार्थ पर आधारित |
| ✍️ उत्तर लेखन कोण (Mains Answer Angle) |
| 🎯 5-अंक कोण (~70 शब्द): • प्रश्न जैसे 'नागर व द्राविड़ शैली में अंतर बताइए' में — पहले दोनों की एक-एक पंक्ति परिभाषा दें। • फिर 2-3 अंतर बिंदु तालिका/क्रमवार रूप में लिखें — शिखर आकार, गोपुरम की उपस्थिति/अनुपस्थिति, क्षेत्र। • अंत में एक-एक ठोस उदाहरण दें — खजुराहो (नागर) व तंजावुर (द्राविड़)। 🎯 10-अंक कोण (~120 शब्द): • प्रश्न जैसे 'मध्यकालीन भारत में मंदिर वास्तुकला की क्षेत्रीय विविधता का मूल्यांकन कीजिए' में — परिचय में तीनों प्रमुख शैलियों (नागर-द्राविड़-वेसर) का उल्लेख करें। • मुख्य भाग को क्षेत्रवार उप-शीर्षकों में बाँटें — उत्तर भारत (खजुराहो), पूर्वी भारत (ओडिशा-कलिंग, बंगाल), दक्षिण भारत (पल्लव-चोल-चालुक्य-होयसल), पश्चिमी भारत (गुजरात)। • हर क्षेत्र से एक ठोस उदाहरण व उसकी विशिष्टता जोड़ें — जैसे कोणार्क का रथ-रूप, बृहदेश्वर का ऊँचा विमान, होयसल की तारे-आकार संरचना। • निष्कर्ष में बताएँ कि यह क्षेत्रीय विविधता किस प्रकार भारत की सांस्कृतिक एकता में विविधता (unity in diversity) को प्रदर्शित करती है, और राजस्थान के योगदान (रणकपुर, दिलवाड़ा) का उल्लेख अवश्य करें। |
प्रमुख शासक/संरक्षक एवं उनका योगदान
| शासक/संरक्षक | वंश/काल | योगदान |
|---|---|---|
| चंदेल शासक | चंदेल वंश, 950-1050 ई. | खजुराहो मंदिर समूह का निर्माण |
| नरसिंहवर्मन प्रथम | पल्लव वंश, 7वीं सदी | महाबलीपुरम के पंच रथ व तटीय मंदिर |
| राजराज प्रथम | चोल वंश, लगभग 1010 ई. | बृहदेश्वर मंदिर, तंजावुर का निर्माण |
| राजेंद्र प्रथम | चोल वंश, 11वीं सदी | गंगईकोंडचोलपुरम मंदिर का निर्माण |
| नरसिंहदेव प्रथम | पूर्वी गंग वंश, 13वीं सदी | कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण |
| भीम प्रथम | सोलंकी वंश, 11वीं सदी | मोढेरा सूर्य मंदिर का निर्माण |
| धरणा शाह (सेठ) | 15वीं सदी | रणकपुर जैन मंदिर का निर्माण |
Q1. नागर एवं द्राविड़ मंदिर वास्तुकला शैलियों में अंतर स्पष्ट कीजिए। (10 अंक) Q2. खजुराहो मंदिर समूह की स्थापत्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (5 अंक) Q3. कोणार्क सूर्य मंदिर के स्थापत्य महत्व की विवेचना कीजिए। (10 अंक) Q4. पल्लव वास्तुकला में महाबलीपुरम के योगदान को स्पष्ट कीजिए। (5 अंक) Q5. चोल वास्तुकला की प्रमुख विशेषताओं का सोदाहरण वर्णन कीजिए। (10 अंक) Q6. वेसर शैली से आप क्या समझते हैं? इसके विकास में होयसल वंश के योगदान की विवेचना कीजिए। (10 अंक) Q7. बंगाल की मंदिर वास्तुकला शैली की विशेषताएँ बताइए। (5 अंक) Q8. गुजरात की सोलंकी मंदिर वास्तुकला की विशेषताएँ बताइए। (5 अंक) Q9. राजस्थान के रणकपुर एवं दिलवाड़ा जैन मंदिरों की स्थापत्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (10 अंक) Q10. ऐहोल को 'भारतीय मंदिर वास्तुकला की प्रयोगशाला' क्यों कहा जाता है? स्पष्ट कीजिए। (5 अंक)
नीचे दी गई तालिका इस अध्याय के महत्वपूर्ण वर्षों व घटनाओं का कालक्रम प्रस्तुत करती है — यह Revision हेतु सबसे उपयोगी है:
| काल/वर्ष | घटना/स्थल | महत्व |
|---|---|---|
| लगभग 6ठी-8वीं सदी | चालुक्य वास्तुकला — बादामी, ऐहोल, पट्टडकल | नागर व द्राविड़ शैलियों के सह-अस्तित्व का प्रारंभिक प्रयोग |
| लगभग 7वीं-8वीं सदी | पल्लव वास्तुकला — महाबलीपुरम निर्माण | द्राविड़ शैली की नींव; पंच रथ व तटीय मंदिर |
| 8वीं-12वीं सदी | ओसियां (राजस्थान) मंदिर निर्माण | प्रतिहार वंश के संरक्षण में हिन्दू-जैन मंदिरों का विकास |
| 950-1050 ई. | खजुराहो मंदिर निर्माण (चंदेल वंश) | नागर शैली की पराकाष्ठा; पंचायतन शैली |
| लगभग 1010 ई. | बृहदेश्वर मंदिर, तंजावुर (राजराज प्रथम) | द्राविड़ शैली का सर्वश्रेष्ठ व सबसे ऊँचा उदाहरण |
| 11वीं सदी | मोढेरा सूर्य मंदिर (भीम प्रथम, गुजरात) | सोलंकी शैली व सूर्यकुंड जल-संरचना का संयोजन |
| 11वीं-13वीं सदी | दिलवाड़ा मंदिर निर्माण (माउंट आबू) | जैन संगमरमर स्थापत्य की पराकाष्ठा |
| 13वीं सदी | कोणार्क सूर्य मंदिर (नरसिंहदेव प्रथम) | रथ-आकार मंदिर वास्तुकला का अनूठा उदाहरण |
| 12वीं-13वीं सदी | होयसल मंदिर निर्माण (बेलूर, हलेबिड, सोमनाथपुर) | वेसर शैली की पराकाष्ठा; तारे-आकार संरचना |
| 15वीं सदी | रणकपुर जैन मंदिर निर्माण (धरणा शाह) | राजस्थान की सर्वश्रेष्ठ जैन संगमरमर वास्तुकला |
| 1984 | महाबलीपुरम व कोणार्क को UNESCO धरोहर घोषित | द्राविड़ व कलिंग शैली को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता |
| 1986 | खजुराहो को UNESCO धरोहर घोषित | नागर शैली को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता |
| 1987 | पट्टडकल व तंजावुर मंदिर को UNESCO धरोहर घोषित | चालुक्य व चोल वास्तुकला को मान्यता |
| 2004 | चोल मंदिर सूची का विस्तार (ऐरावतेश्वर मंदिर जोड़ा गया) | 'महान जीवंत चोल मंदिर' पूर्ण सूची बनी |
| 2014 | रानी की वाव (पाटन) को UNESCO धरोहर घोषित | गुजरात की बावड़ी-वास्तुकला को मान्यता |
| 2023 | होयसल मंदिर समूह को UNESCO धरोहर घोषित | भारत का 42वाँ UNESCO धरोहर स्थल |