🏛️ अध्याय 3/10 — भारतीय कला एवं संस्कृति

मध्यकालीन भारत की मंदिर वास्तुकला

Medieval Temple Architecture | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. मंदिर वास्तुकला की तीन प्रमुख शैलियाँ — परिचय
  2. नागर शैली — विस्तृत अध्ययन (उत्तर व मध्य भारत)
  3. खजुराहो मंदिर समूह (चंदेल वंश)
  4. ओडिशा-कलिंग शैली मंदिर
  5. द्राविड़ शैली — विस्तृत अध्ययन (दक्षिण भारत)
  6. पल्लव वास्तुकला (महाबलीपुरम)
  7. चोल वास्तुकला
  8. चालुक्य वास्तुकला (बादामी-ऐहोल-पट्टडकल)
  9. होयसल वास्तुकला
  10. वेसर शैली — हाइब्रिड शैली
  11. नागर बनाम द्राविड़ बनाम वेसर — तुलना
  12. पूर्वी भारत — बंगाल मंदिर शैली
  13. पश्चिमी भारत — गुजरात (सोलंकी) मंदिर शैली
  14. राजस्थान कनेक्शन — ओसियां, रणकपुर, दिलवाड़ा
  15. हालिया शोध एवं करेंट अफेयर्स

सोचो 11वीं सदी में तंजावुर में मज़दूर बिना किसी क्रेन या मशीन के 80 टन का एक विशाल पत्थर 66 मीटर ऊँचे मंदिर-शिखर पर चढ़ा रहे हैं — यह बृहदेश्वर मंदिर है, जो चोल राजा राजराज प्रथम की शक्ति व भक्ति दोनों का प्रतीक है। ठीक इसी दौर में उत्तर भारत में खजुराहो के चंदेल शासक पत्थर पर बारीक मूर्तिकला में मानव-जीवन के हर भाव को उकेर रहे हैं। यह अध्याय भारत के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ विकसित हुई मंदिर-निर्माण की तीन प्रमुख शैलियों — नागर, द्राविड़ व वेसर — का अध्ययन कराता है। जहाँ भी संभव हो, content को तालिका में रखा गया है।

1मंदिर वास्तुकला की तीन प्रमुख शैलियाँ — परिचय

भारतीय मंदिर वास्तुकला मुख्यतः तीन शैलियों में विभाजित है, जो क्षेत्र के अनुसार विकसित हुईं — नीचे तालिका में तीनों का संक्षिप्त परिचय देखें, विस्तृत अध्ययन आगे के भागों में करेंगे:

शैलीक्षेत्रमूल पहचान
नागर शैली (Nagara)उत्तर व मध्य भारतवक्ररेखीय (curvilinear) शिखर; प्रायः गोपुरम या चारदीवारी नहीं
द्राविड़ शैली (Dravida)दक्षिण भारतसीढ़ीदार पिरामिडाकार विमान; विशाल गोपुरम व चारदीवारी (प्राकार)
वेसर शैली (Vesara)दक्कन क्षेत्र (कर्नाटक)नागर व द्राविड़ के तत्वों का सम्मिश्रण — 'हाइब्रिड' शैली

#. प्रमुख वास्तुकला शब्दावली

मंदिर वास्तुकला को समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण शब्दावलियाँ नीचे दी गई हैं:

जगती (Jagati): वह ऊँचा चबूतरा जिस पर मंदिर स्थित होता है।

अंतराल (Antarala): गर्भगृह और मंडप के बीच का मार्ग।

शिखर/विमान: गर्भगृह के ऊपर का ऊँचा भाग (उत्तर भारत में शिखर, दक्षिण में विमान)।

मंडप: स्तंभयुक्त सभा-कक्ष।

गोपुरम: दक्षिण भारतीय मंदिरों के विशाल प्रवेश द्वार।

अमलक: नागर शैली के शिखर के शीर्ष पर पत्थर की चकती।

2नागर शैली — विस्तृत अध्ययन (उत्तर व मध्य भारत)

नागर शैली की शुरुआत गुप्त काल में हुई थी (Chapter 02 में पढ़ा) — मध्यकाल में यह शैली परिपक्व होकर कई उप-शैलियों व क्षेत्रीय रूपों में विकसित हुई:

उप-शैली (शिखर प्रकार)विवरण
रेखा-प्रासाद / लतीना (Latina)सबसे सामान्य प्रकार — सीधा, वक्ररेखीय व ऊपर की ओर पतला होता शिखर
फांसना (Phamsana)आयताकार आधार व ढलानदार छत — प्रायः सभा-मंडप (मंडप) के ऊपर प्रयुक्त
वल्लभी (Valabhi)अर्ध-बेलनाकार छत, आयताकार गर्भगृह — रथ के छत्र जैसी संरचना

नागर शैली के अंतर्गत भी क्षेत्रीय आधार पर कई उप-शैलियाँ विकसित हुईं, जिन्हें आगे के भागों में विस्तार से पढ़ेंगे:

क्षेत्रीय उप-शैलीक्षेत्र/संरक्षकप्रमुख उदाहरण
ओडिशा-कलिंग शैलीपूर्वी गंग वंश (ओडिशा)कोणार्क सूर्य मंदिर, लिंगराज मंदिर
खजुराहो शैलीचंदेल वंश (मध्य प्रदेश)कंदरिया महादेव मंदिर
सोलंकी शैलीचालुक्य/सोलंकी वंश (गुजरात)मोढेरा सूर्य मंदिर
बंगाल शैलीपाल-सेन/मल्ल वंश (पूर्वी भारत)विष्णुपुर के टेराकोटा मंदिर

3खजुराहो मंदिर समूह (चंदेल वंश)

मध्य प्रदेश के खजुराहो में चंदेल वंश के शासकों ने लगभग 950-1050 ई. के बीच लगभग 85 मंदिरों का निर्माण करवाया था, जिनमें से आज लगभग 25 सुरक्षित हैं।

पहलूविवरण
संरक्षक एवं कालचंदेल वंश, लगभग 950-1050 ई.
प्रमुख मंदिरकंदरिया महादेव मंदिर (शिव को समर्पित, सबसे ऊँचा शिखर)
शैली विशेषतापंचायतन शैली (मुख्य मंदिर + उप-मंदिर); ऊँचा वक्ररेखीय नागर शिखर; अत्यंत बारीक मूर्तिकला
शृंगारिक (Erotic) मूर्तियाँमंदिर की बाहरी दीवारों पर मानव-जीवन के सभी भावों (शृंगार सहित) का चित्रण — विद्वानों में इसकी व्याख्या तांत्रिक परंपरा, जीवन के पूर्ण चक्र के प्रतीक या गृहस्थ-जीवन के उत्सव के रूप में की जाती है
UNESCO मान्यता1986 में 'खजुराहो के स्मारक समूह' (Khajuraho Group of Monuments) को UNESCO विश्व धरोहर घोषित किया गया

4ओडिशा-कलिंग शैली मंदिर

ओडिशा की कलिंग शैली नागर शैली की ही एक विशिष्ट क्षेत्रीय शाखा है, जिसमें मंदिर की अलग-अलग संरचनाओं को अलग-अलग नाम दिए गए हैं:

देउल (मंदिर-भाग) प्रकारविवरण
रेखा देउल (Rekha Deula)गर्भगृह के ऊपर ऊँचा, वक्ररेखीय शिखर — मुख्य पूजा-स्थल के ऊपर
पीढ़ देउल (Pidha Deula)जगमोहन (सभा-मंडप) के ऊपर सीढ़ीदार पिरामिडाकार छत
खाखरा देउल (Khakhara Deula)आयताकार आधार व बैरल-वॉल्ट (barrel-vault) जैसी छत — प्रायः देवी मंदिरों हेतु प्रयुक्त
मंदिरस्थानविशेषता
कोणार्क सूर्य मंदिरकोणार्क, ओडिशाविशाल रथ के आकार में निर्मित (12 पहिए, 7 घोड़े); गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम द्वारा निर्मित; UNESCO धरोहर (1984)
लिंगराज मंदिरभुवनेश्वर, ओडिशाशिव को समर्पित; ओडिशा शैली का उत्कृष्ट व सबसे बड़ा उदाहरण
जगन्नाथ मंदिरपुरी, ओडिशाभगवान जगन्नाथ को समर्पित; प्रसिद्ध रथ-यात्रा परंपरा का केंद्र

5द्राविड़ शैली — विस्तृत अध्ययन (दक्षिण भारत)

द्राविड़ शैली नागर शैली से संरचनात्मक रूप से स्पष्ट रूप से भिन्न है — इसके मूल तत्वों को नीचे तालिका में समझें:

तत्व (Element)विवरण
विमान (Vimana)गर्भगृह के ऊपर सीढ़ीदार, पिरामिडाकार टावर — नागर शिखर से भिन्न सीधी-सीधी परतों वाली संरचना
गोपुरम (Gopuram)मंदिर परिसर का विशाल प्रवेश-द्वार टावर — समय के साथ यह मुख्य विमान से भी अधिक ऊँचा व अलंकृत होता गया
प्राकार (Prakara)मंदिर परिसर के चारों ओर की चारदीवारी — प्रायः कई परतों में
मंडप (Mandapa)स्तंभयुक्त सभा-कक्ष, गर्भगृह के सामने
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6पल्लव वास्तुकला (महाबलीपुरम)

तमिलनाडु में पल्लव वंश ने द्राविड़ शैली की नींव रखी — इनकी राजधानी कांचीपुरम व तटीय नगर महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) में इसके सर्वोत्तम उदाहरण मिलते हैं।

पहलूविवरण
राजधानीकांचीपुरम, तमिलनाडु
पंच रथ (Pancha Rathas)पाँच एकाश्म (monolithic) रथ-मंदिर — प्रत्येक एक ही चट्टान से तराशा गया, द्राविड़ शैली के प्रारंभिक प्रयोग
तटीय मंदिर (Shore Temple)समुद्र तट पर स्थित पत्थर से निर्मित (structural) मंदिर — पंच रथों से अलग, वास्तविक निर्माण-तकनीक का उदाहरण
गुफा-मंडप मंदिरचट्टान काटकर बनाए गए मंडप-मंदिर, जिनमें अर्जुन की तपस्या जैसे विशाल भित्ति-शिल्प (relief) शामिल
प्रमुख शासकनरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल)
UNESCO मान्यता1984 में 'महाबलीपुरम के स्मारक समूह' (Group of Monuments at Mahabalipuram) को UNESCO धरोहर घोषित किया गया

7चोल वास्तुकला

पल्लवों के बाद चोल वंश ने द्राविड़ शैली को उसके सबसे भव्य व परिपक्व रूप तक पहुँचाया — तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है:

मंदिरशासक/कालविशेषता
बृहदेश्वर मंदिर, तंजावुरराजराज प्रथम, लगभग 1010 ई.उस काल का सबसे ऊँचा विमान (लगभग 66 मीटर); शिखर पर एक ही विशाल पत्थर का शीर्ष-भाग (कहा जाता है कि ढलान बनाकर हाथियों से चढ़ाया गया)
गंगईकोंडचोलपुरम मंदिरराजेंद्र प्रथमराजराज प्रथम के पुत्र द्वारा निर्मित, बृहदेश्वर मंदिर से प्रेरित परंतु अपेक्षाकृत अधिक अलंकृत
ऐरावतेश्वर मंदिर, दारासुरमराजराज द्वितीय, 12वीं सदीअत्यंत बारीक मूर्तिकला व रथ-रूपी मंडप के लिए प्रसिद्ध

⚠️ महत्वपूर्ण (Important Note)

उपर्युक्त तीनों मंदिरों (तंजावुर, गंगईकोंडचोलपुरम, दारासुरम) को संयुक्त रूप से 'महान जीवंत चोल मंदिर' (Great Living Chola Temples) नाम से UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है — मूल सूचीकरण 1987 में (केवल तंजावुर), और 2004 में विस्तार करके अन्य दो मंदिर जोड़े गए।

8चालुक्य वास्तुकला (बादामी-ऐहोल-पट्टडकल)

कर्नाटक के बादामी चालुक्य वंश ने एक अनूठा योगदान दिया — इन्होंने एक ही क्षेत्र में नागर व द्राविड़ दोनों शैलियों में प्रयोग किए, जिससे यह क्षेत्र 'भारतीय मंदिर वास्तुकला की प्रयोगशाला' कहलाया:

स्थलविशेषता
बादामी (Badami)चट्टान काटकर बनाए गए गुफा-मंदिर — वैष्णव, शैव व जैन तीनों परंपराओं के गुफा-मंदिर एक साथ
ऐहोल (Aihole)'भारतीय मंदिर वास्तुकला की प्रयोगशाला' (Cradle of Indian Temple Architecture) कहा जाता है; दुर्गा मंदिर अपने अर्ध-वृत्ताकार (apsidal) डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध
पट्टडकल (Pattadakal)एक ही परिसर में नागर शैली (जैसे पापनाथ मंदिर) व द्राविड़ शैली (जैसे विरुपाक्ष मंदिर) के मंदिर एक साथ; UNESCO धरोहर (1987)

9होयसल वास्तुकला

कर्नाटक के होयसल वंश (12वीं-13वीं सदी) ने एक अत्यंत विशिष्ट शैली विकसित की, जिसे कुछ विद्वान 'वेसर शैली' का सर्वश्रेष्ठ रूप मानते हैं:

पहलूविवरण
सामग्रीसाबुन-पत्थर (soapstone/chloritic schist) — नरम होने के कारण अत्यंत बारीक नक्काशी संभव
आधार आकृतितारे के आकार का (stellate) ऊँचा चबूतरा (जगती), जिस पर मंदिर खड़ा होता है
प्रमुख मंदिरचेन्नकेशव मंदिर (बेलूर), होयसलेश्वर मंदिर (हलेबिड), केशव मंदिर (सोमनाथपुर)
UNESCO मान्यता18 सितंबर 2023 को 'होयसल के पवित्र समूह' (Sacred Ensembles of the Hoysalas) को UNESCO विश्व धरोहर घोषित किया गया — भारत का 42वाँ धरोहर स्थल

विशेष तथ्य: होयसल मंदिरों में 'साबुन-पत्थर' (Soapstone) का उपयोग किया गया, जो नरम होता है, जिससे अत्यंत बारीक नक्काशी संभव हुई।

10वेसर शैली — हाइब्रिड शैली

वेसर शैली को समझना थोड़ा कठिन हो सकता है, क्योंकि यह किसी एक निश्चित रूप की बजाय नागर व द्राविड़ के मिश्रण की एक 'प्रवृत्ति' (tendency) है:

💡 उदाहरण (Example)

सोचो नागर शैली एक 'सीधी नुकीली मीनार' जैसी है और द्राविड़ शैली एक 'सीढ़ीदार पिरामिड' जैसी। अब कल्पना करो कि किसी ने इन दोनों को मिलाकर एक ऐसी संरचना बना दी जो न पूरी तरह सीधी मीनार है, न पूरी तरह सीढ़ीदार पिरामिड — बल्कि दोनों के तत्वों के साथ अपेक्षाकृत कम ऊँची पर बेहद अलंकृत है। यही 'वेसर शैली' है, जो दक्कन क्षेत्र (कर्नाटक) में चालुक्य, राष्ट्रकूट व होयसल शासकों के संरक्षण में विकसित हुई।

पहलूविवरण
उत्पत्ति क्षेत्रदक्कन क्षेत्र (कर्नाटक) — चालुक्य, राष्ट्रकूट व होयसल शासकों के संरक्षण में
विशेषतानागर के वक्ररेखीय व द्राविड़ के सीढ़ीदार तत्वों का सम्मिश्रण; तुलनात्मक रूप से कम ऊँचाई परंतु अत्यधिक अलंकरण
उदाहरणपट्टडकल के कुछ मंदिर, होयसल मंदिर (बेलूर-हलेबिड)
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11नागर बनाम द्राविड़ बनाम वेसर — तुलना

RAS मुख्य परीक्षा में तीनों शैलियों की तुलना एक बहुत लोकप्रिय प्रश्न रहा है — नीचे एक ही तालिका में तीनों को साथ देखें:

विशेषतानागर शैलीद्राविड़ शैलीवेसर शैली
क्षेत्रउत्तर व मध्य भारतदक्षिण भारत (तमिलनाडु)दक्कन (कर्नाटक)
शिखर/विमान आकारवक्ररेखीय, ऊपर पतलासीढ़ीदार पिरामिडाकारदोनों का मिश्रण, अपेक्षाकृत कम ऊँचा
गोपुरमप्रायः नहींहाँ — विशाल व अलंकृतसीमित
चारदीवारी (प्राकार)प्रायः नहींहाँकभी-कभी
प्रमुख संरक्षकचंदेल, गंग, सोलंकीपल्लव, चोलचालुक्य, होयसल
उदाहरणखजुराहो, कोणार्कतंजावुर, महाबलीपुरमपट्टडकल, बेलूर-हलेबिड

#. मंदिर वास्तुकला का सामाजिक-आर्थिक महत्व

मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि तत्कालीन समाज के 'Power Hubs' थे:

आर्थिक केंद्र: मंदिर भूमि-अनुदान स्वीकार करते थे और बैंकों (ऋण प्रदाता) के रूप में कार्य करते थे।

प्रशासनिक केंद्र: मंदिर के अधिकारियों द्वारा प्रशासन का संचालन होता था।

शिक्षा व कला: वेदों, संगीत और नृत्य (देवदासी परंपरा) का प्रशिक्षण दिया जाता था।

रोजगार सृजन: निर्माण व रख-रखाव से मूर्तिकारों व कारीगरों को रोजगार मिलता था।

12पूर्वी भारत — बंगाल मंदिर शैली

पूर्वी भारत (बंगाल क्षेत्र) में पत्थर की उपलब्धता कम होने के कारण एक बिल्कुल अलग स्थानीय शैली विकसित हुई, जो झोपड़ी के आकार से प्रेरित थी:

पहलूविवरण
छत शैली'दो-चाला' व 'चार-चाला' — बांग्ला ग्रामीण झोपड़ी जैसी ढलानदार वक्र छत
सामग्रीपकी मिट्टी की ईंट व टेराकोटा (पत्थर की स्थानीय कमी के कारण)
विष्णुपुर मंदिर (पश्चिम बंगाल)मल्ल वंश के संरक्षण में निर्मित; दीवारों पर अत्यंत बारीक टेराकोटा नक्काशी (रामायण-महाभारत प्रसंग)
मुगल स्थापत्य पर प्रभावयह 'बंगला छत' शैली आगे चलकर मुगल वास्तुकला के कुछ मंडपों/छतरियों में भी अपनाई गई — इसे Chapter 04 में पढ़ेंगे

13पश्चिमी भारत — गुजरात (सोलंकी) मंदिर शैली

गुजरात में सोलंकी (चालुक्य) वंश के संरक्षण में नागर शैली का एक अत्यंत अलंकृत व जल-संरचना से जुड़ा रूप विकसित हुआ:

स्थलविवरण
मोढेरा सूर्य मंदिरराजा भीम प्रथम द्वारा 11वीं सदी में निर्मित; सामने सीढ़ीदार जलाशय 'सूर्यकुंड' — मंदिर व जल-संरचना का अनूठा संयोजन
रानी की वाव (पाटन)एक भव्य सीढ़ीदार बावड़ी (stepwell), जिसकी दीवारों पर सैकड़ों देवी-देवताओं की मूर्तियाँ; UNESCO विश्व धरोहर (2014)
सोमनाथ मंदिरअत्यंत प्राचीन शिव मंदिर, इतिहास में कई बार ध्वस्त व पुनर्निर्मित

14राजस्थान कनेक्शन — ओसियां, रणकपुर, दिलवाड़ा

राजस्थान मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से बेहद समृद्ध रहा है — विशेषकर संगमरमर पर की गई बारीक नक्काशी (जैन स्थापत्य) के लिए यह विश्व-प्रसिद्ध है।

स्थलविवरण
ओसियां (जोधपुर)'राजस्थान का खजुराहो' कहा जाता है; प्रतिहार वंश के संरक्षण में 8वीं-12वीं सदी के मध्य लगभग 100 हिन्दू व जैन मंदिर निर्मित; सचिया माता मंदिर व सूर्य मंदिर प्रमुख
रणकपुर जैन मंदिर (पाली)तीर्थंकर ऋषभनाथ को समर्पित; 15वीं सदी में सेठ धरणा शाह द्वारा निर्मित; लगभग 1444 संगमरमर स्तंभ — कोई भी दो स्तंभ एक जैसे नहीं
दिलवाड़ा मंदिर (माउंट आबू)11वीं-13वीं सदी में निर्मित जैन मंदिर समूह; मुख्य मंदिर 'विमल वसाही' तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित; संगमरमर पर अत्यंत सूक्ष्म व जटिल नक्काशी के लिए विश्व-प्रसिद्ध

15हालिया शोध एवं करेंट अफेयर्स

नीचे दी गई तालिका इस अध्याय से जुड़े हालिया शोध व करेंट अफेयर्स को एक जगह दर्शाती है:

घटना / शोधवर्षमुख्य निष्कर्ष / महत्व
होयसल मंदिर UNESCO सूची में शामिल18 सितंबर 2023बेलूर, हलेबिड व सोमनाथपुर — तीनों को संयुक्त रूप से मान्यता; भारत का 42वाँ UNESCO धरोहर स्थल
महान जीवंत चोल मंदिर सूची विस्तार2004ऐरावतेश्वर मंदिर (दारासुरम) को 1987 की मूल सूची में जोड़ा गया
रानी की वाव (पाटन) को UNESCO मान्यता2014गुजरात की सीढ़ीदार बावड़ी वास्तुकला को अंतर्राष्ट्रीय पहचान
❝ उद्धरण (Quote)
"भारतीय मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि पत्थर में उकेरी गई संपूर्ण ब्रह्मांड की अवधारणा है।" — पर्सी ब्राउन (Percy Brown), भारतीय कला-इतिहासकार — भारतीय मंदिर वास्तुकला पर उनके विश्लेषण के भावार्थ पर आधारित
✍️ उत्तर लेखन कोण (Mains Answer Angle)
🎯 5-अंक कोण (~70 शब्द): • प्रश्न जैसे 'नागर व द्राविड़ शैली में अंतर बताइए' में — पहले दोनों की एक-एक पंक्ति परिभाषा दें। • फिर 2-3 अंतर बिंदु तालिका/क्रमवार रूप में लिखें — शिखर आकार, गोपुरम की उपस्थिति/अनुपस्थिति, क्षेत्र। • अंत में एक-एक ठोस उदाहरण दें — खजुराहो (नागर) व तंजावुर (द्राविड़)। 🎯 10-अंक कोण (~120 शब्द): • प्रश्न जैसे 'मध्यकालीन भारत में मंदिर वास्तुकला की क्षेत्रीय विविधता का मूल्यांकन कीजिए' में — परिचय में तीनों प्रमुख शैलियों (नागर-द्राविड़-वेसर) का उल्लेख करें। • मुख्य भाग को क्षेत्रवार उप-शीर्षकों में बाँटें — उत्तर भारत (खजुराहो), पूर्वी भारत (ओडिशा-कलिंग, बंगाल), दक्षिण भारत (पल्लव-चोल-चालुक्य-होयसल), पश्चिमी भारत (गुजरात)। • हर क्षेत्र से एक ठोस उदाहरण व उसकी विशिष्टता जोड़ें — जैसे कोणार्क का रथ-रूप, बृहदेश्वर का ऊँचा विमान, होयसल की तारे-आकार संरचना। • निष्कर्ष में बताएँ कि यह क्षेत्रीय विविधता किस प्रकार भारत की सांस्कृतिक एकता में विविधता (unity in diversity) को प्रदर्शित करती है, और राजस्थान के योगदान (रणकपुर, दिलवाड़ा) का उल्लेख अवश्य करें।
🔑 मुख्य तथ्य (Key Facts)
✔ भारतीय मंदिर वास्तुकला मुख्यतः तीन शैलियों में बँटी है — नागर (उत्तर-मध्य भारत), द्राविड़ (दक्षिण भारत), वेसर (दक्कन)। ✔ नागर शैली की उप-शैलियाँ — रेखा-प्रासाद/लतीना, फांसना, वल्लभी। ✔ खजुराहो (चंदेल वंश, 950-1050 ई.) — पंचायतन शैली, कंदरिया महादेव मंदिर सबसे ऊँचा; UNESCO (1986)। ✔ ओडिशा-कलिंग शैली के तीन देउल प्रकार — रेखा देउल, पीढ़ देउल, खाखरा देउल। ✔ कोणार्क सूर्य मंदिर — गंग वंश के नरसिंहदेव प्रथम द्वारा निर्मित रथ-आकार मंदिर; UNESCO (1984)। ✔ द्राविड़ शैली के मूल तत्व — विमान, गोपुरम, प्राकार, मंडप। ✔ महाबलीपुरम (पल्लव, नरसिंहवर्मन प्रथम) — पंच रथ (एकाश्म) व तटीय मंदिर; UNESCO (1984)। ✔ बृहदेश्वर मंदिर, तंजावुर (चोल, राजराज प्रथम, 1010 ई.) — लगभग 66 मीटर ऊँचा विमान। ✔ बृहदेश्वर, गंगईकोंडचोलपुरम व दारासुरम मंदिर संयुक्त रूप से 'महान जीवंत चोल मंदिर' कहलाते हैं (UNESCO 1987, विस्तार 2004)। ✔ ऐहोल को 'भारतीय मंदिर वास्तुकला की प्रयोगशाला' कहा जाता है; पट्टडकल में नागर व द्राविड़ दोनों शैलियाँ एक साथ (UNESCO 1987)। ✔ होयसल मंदिर (बेलूर, हलेबिड, सोमनाथपुर) — साबुन-पत्थर की बारीक नक्काशी, तारे-आकार चबूतरा; UNESCO (18 सितंबर 2023, भारत का 42वाँ स्थल)। ✔ वेसर शैली — नागर व द्राविड़ के तत्वों का मिश्रण, दक्कन क्षेत्र (चालुक्य-राष्ट्रकूट-होयसल)। ✔ बंगाल मंदिर शैली — 'दो-चाला'/'चार-चाला' छत, टेराकोटा नक्काशी; विष्णुपुर (मल्ल वंश) प्रमुख उदाहरण। ✔ बंगला छत शैली आगे चलकर मुगल वास्तुकला में भी अपनाई गई। ✔ मोढेरा सूर्य मंदिर (गुजरात, सोलंकी, भीम प्रथम) — सूर्यकुंड सीढ़ीदार जलाशय सहित। ✔ रानी की वाव, पाटन (गुजरात) — सीढ़ीदार बावड़ी; UNESCO (2014)। ✔ ओसियां (जोधपुर) — 'राजस्थान का खजुराहो', प्रतिहार वंश, हिन्दू-जैन दोनों मंदिर। ✔ रणकपुर जैन मंदिर (पाली) — धरणा शाह, 15वीं सदी, लगभग 1444 संगमरमर स्तंभ, कोई दो एक जैसे नहीं। ✔ दिलवाड़ा मंदिर (माउंट आबू) — विमल वसाही, संगमरमर की सूक्ष्म नक्काशी हेतु विश्व-प्रसिद्ध। ✔ शृंगारिक (erotic) खजुराहो मूर्तियों की व्याख्या तांत्रिक परंपरा व जीवन-चक्र के प्रतीक के रूप में की जाती है।

प्रमुख शासक/संरक्षक एवं उनका योगदान

शासक/संरक्षकवंश/कालयोगदान
चंदेल शासकचंदेल वंश, 950-1050 ई.खजुराहो मंदिर समूह का निर्माण
नरसिंहवर्मन प्रथमपल्लव वंश, 7वीं सदीमहाबलीपुरम के पंच रथ व तटीय मंदिर
राजराज प्रथमचोल वंश, लगभग 1010 ई.बृहदेश्वर मंदिर, तंजावुर का निर्माण
राजेंद्र प्रथमचोल वंश, 11वीं सदीगंगईकोंडचोलपुरम मंदिर का निर्माण
नरसिंहदेव प्रथमपूर्वी गंग वंश, 13वीं सदीकोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण
भीम प्रथमसोलंकी वंश, 11वीं सदीमोढेरा सूर्य मंदिर का निर्माण
धरणा शाह (सेठ)15वीं सदीरणकपुर जैन मंदिर का निर्माण

📝 पूर्व वर्षों के प्रश्न (PYQs)

Q1. नागर एवं द्राविड़ मंदिर वास्तुकला शैलियों में अंतर स्पष्ट कीजिए। (10 अंक) Q2. खजुराहो मंदिर समूह की स्थापत्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (5 अंक) Q3. कोणार्क सूर्य मंदिर के स्थापत्य महत्व की विवेचना कीजिए। (10 अंक) Q4. पल्लव वास्तुकला में महाबलीपुरम के योगदान को स्पष्ट कीजिए। (5 अंक) Q5. चोल वास्तुकला की प्रमुख विशेषताओं का सोदाहरण वर्णन कीजिए। (10 अंक) Q6. वेसर शैली से आप क्या समझते हैं? इसके विकास में होयसल वंश के योगदान की विवेचना कीजिए। (10 अंक) Q7. बंगाल की मंदिर वास्तुकला शैली की विशेषताएँ बताइए। (5 अंक) Q8. गुजरात की सोलंकी मंदिर वास्तुकला की विशेषताएँ बताइए। (5 अंक) Q9. राजस्थान के रणकपुर एवं दिलवाड़ा जैन मंदिरों की स्थापत्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (10 अंक) Q10. ऐहोल को 'भारतीय मंदिर वास्तुकला की प्रयोगशाला' क्यों कहा जाता है? स्पष्ट कीजिए। (5 अंक)

नीचे दी गई तालिका इस अध्याय के महत्वपूर्ण वर्षों व घटनाओं का कालक्रम प्रस्तुत करती है — यह Revision हेतु सबसे उपयोगी है:

काल/वर्षघटना/स्थलमहत्व
लगभग 6ठी-8वीं सदीचालुक्य वास्तुकला — बादामी, ऐहोल, पट्टडकलनागर व द्राविड़ शैलियों के सह-अस्तित्व का प्रारंभिक प्रयोग
लगभग 7वीं-8वीं सदीपल्लव वास्तुकला — महाबलीपुरम निर्माणद्राविड़ शैली की नींव; पंच रथ व तटीय मंदिर
8वीं-12वीं सदीओसियां (राजस्थान) मंदिर निर्माणप्रतिहार वंश के संरक्षण में हिन्दू-जैन मंदिरों का विकास
950-1050 ई.खजुराहो मंदिर निर्माण (चंदेल वंश)नागर शैली की पराकाष्ठा; पंचायतन शैली
लगभग 1010 ई.बृहदेश्वर मंदिर, तंजावुर (राजराज प्रथम)द्राविड़ शैली का सर्वश्रेष्ठ व सबसे ऊँचा उदाहरण
11वीं सदीमोढेरा सूर्य मंदिर (भीम प्रथम, गुजरात)सोलंकी शैली व सूर्यकुंड जल-संरचना का संयोजन
11वीं-13वीं सदीदिलवाड़ा मंदिर निर्माण (माउंट आबू)जैन संगमरमर स्थापत्य की पराकाष्ठा
13वीं सदीकोणार्क सूर्य मंदिर (नरसिंहदेव प्रथम)रथ-आकार मंदिर वास्तुकला का अनूठा उदाहरण
12वीं-13वीं सदीहोयसल मंदिर निर्माण (बेलूर, हलेबिड, सोमनाथपुर)वेसर शैली की पराकाष्ठा; तारे-आकार संरचना
15वीं सदीरणकपुर जैन मंदिर निर्माण (धरणा शाह)राजस्थान की सर्वश्रेष्ठ जैन संगमरमर वास्तुकला
1984महाबलीपुरम व कोणार्क को UNESCO धरोहर घोषितद्राविड़ व कलिंग शैली को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता
1986खजुराहो को UNESCO धरोहर घोषितनागर शैली को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता
1987पट्टडकल व तंजावुर मंदिर को UNESCO धरोहर घोषितचालुक्य व चोल वास्तुकला को मान्यता
2004चोल मंदिर सूची का विस्तार (ऐरावतेश्वर मंदिर जोड़ा गया)'महान जीवंत चोल मंदिर' पूर्ण सूची बनी
2014रानी की वाव (पाटन) को UNESCO धरोहर घोषितगुजरात की बावड़ी-वास्तुकला को मान्यता
2023होयसल मंदिर समूह को UNESCO धरोहर घोषितभारत का 42वाँ UNESCO धरोहर स्थल
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