सोचो लगभग 2300 साल पहले सम्राट अशोक कलिंग युद्ध की भीषणता देखकर पश्चाताप में डूब जाते हैं, और तय करते हैं कि अब वे तलवार से नहीं, बल्कि पत्थर पर उकेरे गए 'धम्म' के संदेश से लोगों तक पहुँचेंगे। यहीं से भारत में स्थायी पत्थर की कला (stone art) की एक नई यात्रा शुरू होती है — चमकते हुए अशोक स्तंभ, सांची के स्तूप, और आगे चलकर गांधार-मथुरा-अमरावती जैसी मूर्तिकला शैलियाँ, और अंततः गुप्त काल का 'स्वर्णयुग'। यह अध्याय मौर्य काल से लेकर गुप्तोत्तर काल तक भारतीय कला के इसी सफर को कवर करता है। जहाँ भी संभव हो, content को तालिका (table) में रखा गया है ताकि आसानी से याद हो सके।
इस अध्याय में हम लगभग 600 वर्षों की कला-यात्रा पढ़ेंगे — मौर्य काल से गुप्त काल के अंत तक। सबसे पहले सभी प्रमुख कालों को एक तालिका में देख लें, ताकि आगे का अध्ययन आसान हो जाए:
| काल | समयावधि (लगभग) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| मौर्य काल | 322 – 185 ई.पू. | प्रस्तर (पत्थर) वास्तुकला की शुरुआत; अशोक स्तंभ व स्तूप; राजकीय बौद्ध संरक्षण |
| शुंग काल | 185 – 73 ई.पू. | स्तूपों पर पत्थर की वेदिका व तोरण; अनिकोनिक (प्रतीकात्मक) मूर्तिकला |
| सातवाहन काल | लगभग 230 ई.पू. – 220 ई. | दक्षिण भारत में अमरावती शैली का उत्कर्ष; कृष्णा नदी घाटी केंद्र |
| कुषाण काल | लगभग 30 – 375 ई. | गांधार व मथुरा शैलियों का उत्कर्ष; बुद्ध की पहली मानव-रूप प्रतिमाएँ |
| गुप्त काल | लगभग 320 – 550 ई. | कला-साहित्य-विज्ञान का 'स्वर्णयुग'; नागर मंदिर शैली का प्रारंभ |
मौर्य काल (विशेषकर सम्राट अशोक के शासनकाल) में पहली बार भारत में बड़े पैमाने पर स्थायी पत्थर की कला (राजकीय संरक्षण में) देखने को मिलती है। इससे पहले लकड़ी व मिट्टी जैसी नश्वर सामग्री का प्रयोग अधिक होता था।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| राजकीय संरक्षण | सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाने के बाद कला व वास्तुकला को धम्म-प्रचार का माध्यम बनाया |
| सामग्री में बदलाव | इससे पहले लकड़ी-मिट्टी प्रधान थी; मौर्य काल में स्थायी पत्थर (stone) का बड़े पैमाने पर प्रयोग शुरू हुआ |
| मौर्य पॉलिश (Mauryan Polish) | पत्थर की सतह को शीशे जैसा चमकदार बनाने की विशिष्ट तकनीक — बाद के किसी काल में इतनी उन्नत पॉलिश नहीं मिलती |
| धार्मिक प्रेरणा | अधिकांश कला बौद्ध धर्म से प्रेरित — स्तूप, स्तंभ व स्तंभ-लेख (Pillar Edicts) |
अशोक ने अपने धम्म-संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए जगह-जगह विशाल स्तंभ स्थापित करवाए। हर स्तंभ एक ही पत्थर से तराशा गया (एकाश्म/monolith) होता था — यह उस युग की एक असाधारण तकनीकी उपलब्धि थी।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| सामग्री | चुनार (उत्तर प्रदेश) से लाया गया बलुआ पत्थर (sandstone) |
| संरचना | एकाश्म (एक ही पत्थर से निर्मित); ऊँचाई प्रायः 12-15 मीटर तक |
| स्तंभ के भाग | आधार स्तंभ (shaft) + शीर्ष (capital) — शीर्ष पर उल्टे कमल के आकार का 'एबेकस' (abacus) और उसके ऊपर पशु-आकृति |
| उद्देश्य | अशोक के धम्म-लेख (नैतिक उपदेश) खुदे होते थे — जनता को सीधे संबोधन की शैली में |
अलग-अलग स्तंभों के शीर्ष पर अलग-अलग पशु-आकृतियाँ उकेरी गई थीं — इनमें से सारनाथ स्तंभ आज भारत का राष्ट्रीय चिह्न है:
| स्तंभ स्थल | शीर्ष प्रतीक (Capital) | विशेषता |
|---|---|---|
| सारनाथ (उत्तर प्रदेश) | चार सिंह (पीठ से पीठ मिलाए) | भारत का राष्ट्रीय चिह्न (National Emblem); नीचे धर्मचक्र, हाथी, बैल, घोड़ा व सिंह उकेरे |
| संकिसा (उत्तर प्रदेश) | हाथी | बुद्ध के मायादेवी के स्वप्न-प्रसंग से संबद्ध |
| रामपुरवा (बिहार) | बैल एवं सिंह (दो अलग स्तंभ) | दो स्तंभ प्राप्त हुए — एक पर बैल, दूसरे पर सिंह शीर्ष |
| लौरिया नंदनगढ़ (बिहार) | एकल सिंह | सर्वाधिक सुरक्षित अवस्था में प्राप्त स्तंभों में से एक |
| वैशाली (बिहार) | एकल सिंह | बिना किसी लेख के; स्तूप के निकट स्थित |
स्तूप मूलतः बुद्ध या किसी बौद्ध भिक्षु के अवशेषों (relics) पर बनाया गया अर्ध-गोलाकार टीलेनुमा (mound) स्मारक है। इसके हर भाग का एक विशेष नाम व अर्थ है:
| भाग (Part) | विवरण |
|---|---|
| अंड (Anda) | अर्ध-गोलाकार गुम्बद — मुख्य संरचना, जिसके भीतर अवशेष रखे जाते थे |
| हर्मिका (Harmika) | गुम्बद के ऊपर की चौकोर रेलिंगनुमा संरचना |
| छत्र (Chhatra) | हर्मिका के ऊपर छाता जैसी संरचना — राजसत्ता/सम्मान का प्रतीक |
| वेदिका (Vedika) | स्तूप के चारों ओर की पत्थर की रेलिंग/बाड़ |
| तोरण (Torana) | प्रवेश द्वार — अलंकृत नक्काशीदार गेटवे, चार दिशाओं में |
| मेधी (Medhi) | स्तूप का आधार-चबूतरा |
| प्रदक्षिणा पथ (Pradakshina Path) | स्तूप की परिक्रमा हेतु मार्ग |
मध्य प्रदेश के सांची में स्थित स्तूप भारत का सबसे सुरक्षित व प्रसिद्ध स्तूप है — इसका निर्माण एक ही काल में नहीं, बल्कि कई शताब्दियों में चरणबद्ध ढंग से हुआ:
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| मूल निर्माण | सम्राट अशोक द्वारा तीसरी शताब्दी ई.पू. में ईंटों से निर्मित |
| शुंगकालीन विस्तार | पत्थर के आवरण (casing) व वेदिका (रेलिंग) से स्तूप को बड़ा व मज़बूत किया गया |
| सातवाहनकालीन तोरण | चारों दिशाओं के अलंकृत तोरण जोड़े गए — इन पर जातक कथाएँ (Jataka Tales) व बुद्ध के जीवन-प्रसंग उत्कीर्ण |
| विशेष शैली | इस काल में बुद्ध को सीधे मानव-रूप में नहीं, बल्कि प्रतीकों (चरण-चिह्न, बोधिवृक्ष, धर्मचक्र, रिक्त सिंहासन) से दर्शाया गया — इसे 'अनिकोनिक' (Aniconic) चरण कहते हैं |
| UNESCO मान्यता | 1989 में 'सांची के बौद्ध स्मारक' (Buddhist Monuments at Sanchi) को UNESCO विश्व धरोहर घोषित किया गया |
मौर्य काल में स्तंभों के अलावा स्वतंत्र (free-standing) मूर्तियाँ भी बनीं, जिनमें यक्ष-यक्षिणी (लोक-देवता, प्रकृति की उर्वरता से जुड़े) सबसे प्रसिद्ध हैं:
| मूर्ति | सामग्री | विशेषता |
|---|---|---|
| दीदारगंज यक्षिणी (Didarganj Yakshi) | चुनार बलुआ पत्थर, मौर्य पॉलिश युक्त | पटना (बिहार) से प्राप्त; हाथ में चंवर (fly-whisk); परंपरागत रूप से मौर्यकालीन मानी जाती रही है, परंतु कुछ आधुनिक विद्वान इसे कुषाणकालीन (लगभग 2री शताब्दी ई.) भी मानते हैं |
| पारखम यक्ष (Parkham Yaksha) | बलुआ पत्थर | मथुरा क्षेत्र से प्राप्त विशालकाय यक्ष मूर्ति — प्रारंभिक स्वतंत्र मूर्तिकला का उदाहरण |
मौर्य वंश के बाद शुंग वंश (185-73 ई.पू.) में मूर्तिकला 'राजकीय' से अधिक 'लोक-कला' (popular art) के रूप में विकसित हुई — भरहुत (मध्य प्रदेश) की वेदिका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| भरहुत स्तूप वेदिका | पत्थर की रेलिंग पर सैकड़ों जातक कथाओं व बुद्ध-जीवन प्रसंगों का उत्कीर्णन |
| अनिकोनिक चरण (Aniconic Phase) | बुद्ध को प्रत्यक्ष मानव-रूप में नहीं दिखाया गया — प्रतीकों से निरूपण (देखें अगला Example Box) |
| आख्यानात्मक शैली (Narrative Style) | एक ही फलक (panel) पर कहानी के कई दृश्य क्रमवार दिखाए जाते थे — जैसे आज की कॉमिक-स्ट्रिप |
| सांची के तोरण | यद्यपि तोरण सातवाहन काल में जुड़े, पर शैलीगत निरंतरता शुंग काल की भरहुत परंपरा से ही जुड़ी है |
सोचो शुरुआती बौद्ध कलाकार बुद्ध की सीधी तस्वीर बनाने की बजाय उनके 'संकेत' दिखाते थे — जैसे आज हम किसी बड़े नेता की तस्वीर की जगह सिर्फ उनकी कुर्सी या चश्मा दिखाकर भी पहचान करा सकते हैं। खाली सिंहासन का मतलब था 'बुद्ध यहाँ विराजमान हैं', पैरों के चिह्न का मतलब था 'बुद्ध यहाँ से गुज़रे', और बोधि वृक्ष का मतलब था 'यहाँ बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ'। बाद में कुषाण काल में गांधार व मथुरा कलाकारों ने पहली बार बुद्ध को सीधे मानव-रूप में दिखाना शुरू किया — इसे 'आइकोनिक चरण' (Iconic Phase) कहते हैं।
दक्षिण भारत में सातवाहन वंश (लगभग 230 ई.पू. – 220 ई.) के संरक्षण में आंध्र प्रदेश की कृष्णा नदी घाटी में अमरावती शैली विकसित हुई — यह उत्तर भारत की शैलियों से भिन्न व अत्यंत सजीव मानी जाती है:
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| स्थान | अमरावती स्तूप, कृष्णा नदी तट, आंध्र प्रदेश |
| सामग्री | सफेद-हरे रंग का चमकदार संगमरमर/चूना-पत्थर (limestone) |
| शैली विशेषता | पतली, लचीली व गतिमान (dynamic) मानव-आकृतियाँ; अत्यंत सघन व जटिल कथात्मक फलक |
| विषय | बुद्ध-जीवन प्रसंग, जातक कथाएँ — इस काल तक बुद्ध का मानव-रूप चित्रण भी होने लगा था |
| सांस्कृतिक प्रभाव | यह शैली श्रीलंका व दक्षिण-पूर्व एशिया (म्यांमार, थाईलैंड, इंडोनेशिया) में बौद्ध कला के प्रसार का आधार बनी |
गांधार क्षेत्र (वर्तमान पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा) में कुषाण शासकों के संरक्षण में विकसित यह शैली भारतीय व यूनानी-रोमन (Greco-Roman) कला के मेल से बनी — इसीलिए इसे 'ग्रीको-बौद्ध शैली' (Greco-Buddhist Style) भी कहा जाता है।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संरक्षक एवं काल | कुषाण शासक (विशेषकर कनिष्क), लगभग पहली-चौथी शताब्दी ई. |
| सामग्री | स्लेटी शिस्ट पत्थर (grey schist) |
| विदेशी प्रभाव | सिकंदर के आक्रमण के बाद बचे यूनानी-बैक्ट्रियन प्रभाव से यथार्थवादी (realistic) शैली विकसित |
| शारीरिक विशेषताएँ | लहरदार बाल, तीखे नाक-नक्श, यूनानी 'टोगा' जैसे भारी सिलवटदार वस्त्र |
| ऐतिहासिक महत्व | बुद्ध को पहली बार मानव-रूप में प्रतिमा के रूप में दर्शाया गया — 'आइकोनिक चरण' की शुरुआत यहीं से मानी जाती है |
मथुरा (उत्तर प्रदेश) में भी कुषाण काल में ही एक समानांतर, परंतु पूर्णतः स्वदेशी (indigenous) शैली विकसित हुई — यह गांधार से शैली में स्पष्ट रूप से अलग है।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| सामग्री | स्थानीय लाल बलुआ पत्थर (red sandstone) |
| शैली विशेषता | स्वदेशी भारतीय शैली; पुष्ट व भरा हुआ शरीर; चेहरे पर सजीव मुस्कान |
| वस्त्र-शैली | पारदर्शी व हल्के वस्त्र, जो शरीर की बनावट को उभारते हैं |
| विषय-वैविध्य | केवल बौद्ध ही नहीं, बल्कि जैन तीर्थंकर व हिन्दू देवी-देवताओं (जैसे विष्णु, शिव) की प्रतिमाएँ भी बनीं |
| प्रसिद्ध उदाहरण | कनिष्क की शीर्ष-रहित प्रतिमा (मथुरा संग्रहालय) |
RAS मुख्य परीक्षा में तीनों शैलियों की तुलना अक्सर पूछी जाती है — नीचे एक ही तालिका में तीनों को साथ देखें:
| विशेषता | गांधार शैली | मथुरा शैली | अमरावती शैली |
|---|---|---|---|
| सामग्री | स्लेटी शिस्ट पत्थर | लाल बलुआ पत्थर | सफेद-हरा संगमरमर |
| मुख्य प्रभाव | यूनानी-रोमन (विदेशी) | स्वदेशी भारतीय | स्वदेशी दक्षिण भारतीय |
| वस्त्र-शैली | भारी, सिलवटदार (टोगा जैसा) | पारदर्शी व हल्के | झीने व अत्यधिक अलंकृत |
| संरक्षक/काल | कुषाण (गांधार क्षेत्र) | कुषाण (मथुरा क्षेत्र) | सातवाहन (दक्षिण भारत) |
| विषय-वैविध्य | मुख्यतः बौद्ध | बौद्ध, जैन व हिन्दू तीनों | मुख्यतः बौद्ध |
गुप्त काल (लगभग 320-550 ई.) को भारतीय कला, साहित्य व विज्ञान का 'स्वर्णयुग' (Golden Age) कहा जाता है — इसका मुख्य कारण राजनीतिक स्थिरता व समृद्ध राजकीय संरक्षण था। मूर्तिकला में गांधार व मथुरा — दोनों शैलियों का सर्वश्रेष्ठ संश्लेषण (synthesis) देखने को मिलता है:
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| शैली-संश्लेषण | गांधार की यथार्थवादिता (realism) और मथुरा की स्वदेशी सजीवता — दोनों का सुंदर मेल |
| सारनाथ बुद्ध प्रतिमा | बैठी हुई मुद्रा, अत्यंत पारदर्शी वस्त्र (शरीर से चिपके हुए), शांत व आध्यात्मिक भाव — इसे 'क्लासिकल गुप्त शैली' का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है |
| मानकुँवर व सुल्तानगंज बुद्ध | क्रमशः पत्थर व कांस्य (bronze) में निर्मित बुद्ध प्रतिमाएँ — धातु-मूर्तिकला में दक्षता का प्रमाण |
| स्वर्ण सिक्के | समुद्रगुप्त के सिक्कों पर वीणा बजाते हुए राजा का चित्रण — कला व संगीत दोनों के संरक्षण का प्रमाण |
गुप्त काल में ही उत्तर भारत में मंदिर-निर्माण की परंपरा व्यवस्थित रूप में शुरू हुई, जिसे आगे चलकर 'नागर शैली' (Nagara Style) कहा गया — इसका विस्तृत अध्ययन Chapter 03 (मध्यकालीन मंदिर वास्तुकला) में करेंगे, यहाँ केवल इसकी शुरुआत समझेंगे:
| मंदिर/स्थल | विशेषता |
|---|---|
| देवगढ़ का दशावतार मंदिर (उत्तर प्रदेश) | नागर शैली के प्रारंभिक शिखर का उदाहरण; पंचायतन शैली (मुख्य मंदिर + 4 उप-मंदिर) का प्रारंभिक रूप |
| नचना-कुठार मंदिर (मध्य प्रदेश) | सरल गुप्तकालीन मंदिर संरचना का उदाहरण |
| भूमरा मंदिर (मध्य प्रदेश) | सपाट छत वाला प्रारंभिक शिव मंदिर |
| नागर शैली का मूल तत्व (Element) | विवरण |
| गर्भगृह (Garbhagriha) | मंदिर का सबसे भीतरी कक्ष, जहाँ मुख्य देवता की प्रतिमा स्थापित होती है |
| मंडप (Mandapa) | गर्भगृह के सामने स्तंभों वाला सभा-कक्ष |
| शिखर (Shikhara) | गर्भगृह के ऊपर वक्ररेखीय (curvilinear), ऊपर की ओर पतला होता हुआ शिखर — गोपुरम जैसी सीढ़ीदार संरचना नहीं |
| 💡 उदाहरण (Example) |
|---|
| सोचो एक मंदिर का शिखर सीधा ऊपर की तरफ, हल्का घुमावदार व नुकीला उठता है — जैसे कोई बच्चा एक मीनार जैसी रेत की पहाड़ी बनाता है, जो ऊपर जाकर एक बिंदु पर सिमट जाती है। यही उत्तर भारत की 'नागर शैली' के शिखर का आसान चित्र है। इसके उलट दक्षिण भारत की 'द्राविड़ शैली' में शिखर सीढ़ीदार (stepped) पिरामिड जैसा होता है — इसका विस्तृत अध्ययन हम Chapter 03 में करेंगे। |
| ⚠️ महत्वपूर्ण (Important Note) |
| नागर शैली की शुरुआत यहीं (गुप्त काल) से मानी जाती है, परंतु द्राविड़ शैली (दक्षिण भारत, पल्लव-चोल) व वेसर शैली (दक्कन, चालुक्य) का विस्तृत अध्ययन दोहराव से बचने हेतु Chapter 03 'मध्यकालीन मंदिर वास्तुकला' में किया जाएगा। |
मौर्य काल का सबसे महत्वपूर्ण राजस्थान-संबंधी स्थल है बैराठ (वर्तमान विराटनगर, जयपुर ज़िला) — यह प्राचीन मत्स्य महाजनपद की राजधानी भी रहा है।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| स्थान | विराटनगर, जयपुर ज़िला, राजस्थान — 'बीजक की पहाड़ी' नामक टीले पर |
| बैराठ चैत्यगृह (Bairat Chaityagriha) | भारत का एकमात्र वृत्ताकार (circular) बौद्ध चैत्य — केंद्र में स्तूप, चारों ओर स्तंभों वाला परिक्रमा-पथ व बाहरी घेरा दीवार; अशोक काल (तीसरी शताब्दी ई.पू.) में निर्मित |
| उत्खनन | 1936 में दयाराम साहनी द्वारा उत्खनन कार्य प्रारंभ किया गया |
| भाब्रू शिलालेख (Bhabru/Calcutta-Bairat Edict) | अशोक का लघु शिलालेख-III; इसमें अशोक बौद्ध भिक्षुओं को कुछ विशेष बौद्ध ग्रंथों के अध्ययन की सलाह देते हैं — यह अपनी तरह का एकमात्र शिलालेख है; वर्तमान में यह कोलकाता की एशियाटिक सोसायटी में सुरक्षित है |
नीचे दी गई तालिका इस अध्याय से जुड़े हालिया शोध व करेंट अफेयर्स को एक जगह दर्शाती है:
| घटना / शोध | वर्ष | मुख्य निष्कर्ष / महत्व |
|---|---|---|
| सांची स्तूप हेतु नई संरक्षण पहल | मई 2026 | बुद्ध जयंती से पूर्व ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा UNESCO धरोहर स्थल सांची के संरक्षण की नई पहल की घोषणा |
| सांची पूर्वी तोरण की प्रतिकृति, बर्लिन | समकालीन | जर्मनी के हम्बोल्ट फोरम (Humboldt Forum) संग्रहालय में सांची के पूर्वी तोरण की प्रतिकृति स्थापित — भारतीय कला की वैश्विक पहचान का प्रमाण |
| दीदारगंज यक्षिणी की कालनिर्धारण बहस | समकालीन शोध | कुछ विद्वान अब इसे परंपरागत मौर्यकाल के बजाय कुषाणकाल (लगभग दूसरी शताब्दी ई.) का मानते हैं — काल-निर्धारण अभी भी शोध का विषय |
| ❝ उद्धरण (Quote) |
|---|
| "जिस प्रकार मैं अपनी संतान के कल्याण की कामना करता हूँ, उसी प्रकार मैं समस्त प्रजा के कल्याण की कामना करता हूँ — यही मेरी अभिलाषा है।" — सम्राट अशोक — कलिंग शिलालेख (Kalinga Rock Edict) के भावार्थ पर आधारित |
| ✍️ उत्तर लेखन कोण (Mains Answer Angle) |
| 🎯 5-अंक कोण (~70 शब्द): • प्रश्न जैसे 'गांधार शैली की विशेषताएँ बताइए' में — पहले शैली की परिभाषा (यूनानी-भारतीय मिश्रित शैली) दें। • फिर 2-3 विशेषताएँ क्रमवार लिखें — सामग्री (स्लेटी शिस्ट), यथार्थवादी शरीर-रचना, भारी वस्त्र। • अंत में एक ठोस उदाहरण दें — जैसे बुद्ध की पहली मानव-रूप प्रतिमाएँ (आइकोनिक चरण की शुरुआत)। 🎯 10-अंक कोण (~120 शब्द): • प्रश्न जैसे 'मौर्य से गुप्त काल तक भारतीय मूर्तिकला के विकास का मूल्यांकन कीजिए' में — परिचय में काल-सीमा व मुख्य चरण बताएँ। • मुख्य भाग को उप-शीर्षकों में बाँटें — मौर्यकालीन प्रस्तर कला, शुंग-सातवाहन की अनिकोनिक/आख्यानात्मक शैली, गांधार-मथुरा की आइकोनिक शुरुआत, गुप्तकालीन संश्लेषण। • स्थल-विशेष उदाहरण जोड़ें — सारनाथ स्तंभ, सांची स्तूप, अमरावती शैली, सारनाथ बुद्ध प्रतिमा (गुप्त)। • निष्कर्ष में बताएँ कि यह विकास-यात्रा किस प्रकार भारतीय कला की 'क्रमिक परिपक्वता' (gradual maturity) को दर्शाती है — प्रतीकात्मक से मानव-रूप तक, विदेशी प्रभाव से स्वदेशी संश्लेषण तक। |
| व्यक्ति (Person) | काल | योगदान |
|---|---|---|
| जेम्स प्रिंसेप (James Prinsep) | 1837 | ब्राह्मी लिपि की व्याख्या — जिससे अशोक के शिलालेख पढ़े जा सके |
| अलेक्जेंडर कनिंघम (Alexander Cunningham) | 1851 | सांची स्तूप का पहला वैज्ञानिक सर्वेक्षण; भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संस्थापक |
| जॉन मार्शल (John Marshall) | 20वीं सदी प्रारंभ | सांची स्मारकों के व्यवस्थित संरक्षण व दस्तावेज़ीकरण का कार्य |
| दयाराम साहनी (Daya Ram Sahni) | 1936 | बैराठ (राजस्थान) में बौद्ध चैत्यगृह का उत्खनन |
Q1. अशोक स्तंभों की स्थापत्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (5 अंक) Q2. सांची स्तूप के निर्माण-चरणों एवं इसके ऐतिहासिक महत्व की विवेचना कीजिए। (10 अंक) Q3. गांधार शैली एवं मथुरा शैली की तुलना कीजिए। (10 अंक) Q4. अमरावती कला-शैली की प्रमुख विशेषताएँ बताइए। (5 अंक) Q5. बौद्ध कला में 'अनिकोनिक' एवं 'आइकोनिक' चरण से आप क्या समझते हैं? (5 अंक) Q6. गुप्त काल को भारतीय कला का 'स्वर्णयुग' क्यों कहा जाता है? विवेचना कीजिए। (10 अंक) Q7. नागर मंदिर शैली के प्रारंभिक स्वरूप का गुप्तकालीन उदाहरणों सहित वर्णन कीजिए। (10 अंक) Q8. बैराठ (विराटनगर) के बौद्ध चैत्यगृह का ऐतिहासिक एवं स्थापत्य महत्व स्पष्ट कीजिए। (10 अंक) Q9. दीदारगंज यक्षिणी मूर्ति की कला-दृष्टि से क्या विशेषताएँ हैं? (5 अंक) Q10. भाब्रू शिलालेख के विषय-वस्तु एवं महत्व की व्याख्या कीजिए। (5 अंक)
नीचे दी गई तालिका इस अध्याय के महत्वपूर्ण वर्षों व घटनाओं का कालक्रम प्रस्तुत करती है — यह Revision हेतु सबसे उपयोगी है:
| वर्ष/काल | घटना/स्थल | महत्व |
|---|---|---|
| 322 ई.पू. | मौर्य वंश की स्थापना (चंद्रगुप्त मौर्य) | भारत में पहले बड़े साम्राज्य व राजकीय कला-संरक्षण की शुरुआत |
| 268-232 ई.पू. | सम्राट अशोक का शासनकाल | अशोक स्तंभ, स्तूप-निर्माण व धम्म-लेखों का स्वर्णकाल |
| तीसरी शताब्दी ई.पू. | सांची स्तूप का मूल निर्माण एवं बैराठ चैत्यगृह का निर्माण | मौर्यकालीन बौद्ध स्थापत्य के प्रमुख उदाहरण |
| 185 ई.पू. | शुंग वंश की शुरुआत; भरहुत वेदिका | अनिकोनिक व आख्यानात्मक शैली का उत्कर्ष |
| लगभग 1री-3री शताब्दी ई. | सातवाहन काल — अमरावती शैली का उत्कर्ष | दक्षिण भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया में बौद्ध कला का प्रसार |
| लगभग 1री-4थी शताब्दी ई. | कुषाण काल — गांधार व मथुरा शैलियों का उत्कर्ष | बुद्ध की मानव-रूप प्रतिमाओं (आइकोनिक चरण) की शुरुआत |
| 1837 | जेम्स प्रिंसेप द्वारा ब्राह्मी लिपि की व्याख्या | अशोक के शिलालेख पढ़े जाने संभव हुए |
| 1851 | अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा सांची का सर्वेक्षण | सांची स्तूप का वैज्ञानिक अध्ययन प्रारंभ |
| 1917 | दीदारगंज यक्षिणी की खोज (पटना) | मौर्यकालीन (विवादित) मूर्तिकला का उत्कृष्ट उदाहरण प्राप्त |
| 320 ई. | गुप्त वंश की स्थापना | भारतीय कला-साहित्य के 'स्वर्णयुग' की शुरुआत |
| 1936 | दयाराम साहनी द्वारा बैराठ (राजस्थान) का उत्खनन | राजस्थान में मौर्यकालीन बौद्ध स्थापत्य की पुष्टि |
| 1989 | सांची को UNESCO विश्व धरोहर स्थल घोषित | अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण व मान्यता |
| मई 2026 | सांची हेतु ASI की नई संरक्षण पहल | बुद्ध जयंती से पूर्व संरक्षण कार्य को नई गति |