📋 इस अध्याय में
- वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था — अवधारणा एवं सैद्धांतिक दृष्टिकोण
- ब्रेटन वुड्स व्यवस्था — स्वर्ण मानक से डॉलर मानक तक
- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) — संरचना, कार्य एवं आलोचना
- विश्व बैंक — संरचना, कार्य एवं आलोचना
- 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट — कारण, प्रभाव एवं सबक
- वैश्विक ऋण संकट — 1980 के दशक से श्रीलंका-ज़ाम्बिया तक (2022-25)
- वैश्विक असमानता एवं धन-संकेंद्रण
- वैश्विक आपूर्ति शृंखला एवं व्यापार-युद्ध
- क्षेत्रीय व्यापार समझौते एवं मेगा-FTAs — RCEP, CPTPP एवं भारत
- आर्थिक अस्त्रीकरण — प्रतिबंध एवं परस्पर-निर्भरता का हथियारीकरण
- डिजिटल अर्थव्यवस्था, डेटा गवर्नेंस एवं डिजिटल कर
- वैश्विक कर सुधार — OECD वैश्विक न्यूनतम कर
- सॉवरेन वेल्थ फंड्स एवं वैश्विक पूंजी प्रवाह
- वैश्विक आर्थिक शासन में सुधार की मांग — कोटा सुधार, G7 से G20 तक
- वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका
📖 🌟 आरंभिक कहानी (Hook Story)
अप्रैल 2022 की एक शाम, श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए — पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें थीं, बिजली घंटों गायब रहती थी, और दवाइयां तक दुकानों से गायब हो चुकी थीं। कुछ ही हफ्तों बाद, जुलाई 2022 में गुस्साई भीड़ ने राष्ट्रपति भवन में घुसकर राष्ट्रपति के स्विमिंग पूल में छलांग लगा दी — यह तस्वीर पूरी दुनिया में वायरल हो गई। यह कोई फ़िल्म का दृश्य नहीं था, बल्कि एक पूरे देश के आर्थिक दिवालियेपन का नतीजा था — श्रीलंका ने पहली बार अपने इतिहास में विदेशी कर्ज़ चुकाने से इनकार कर दिया। लेकिन असली सवाल यह है — एक छोटे से द्वीप-राष्ट्र का आर्थिक संकट अचानक चीन, भारत, अमेरिका एवं IMF के बीच एक बड़ी भू-राजनीतिक रस्साकशी का मैदान कैसे बन गया? यही है "वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था" — जहाँ हर देश की आर्थिक नीति, कर्ज़ एवं व्यापार सीधे वैश्विक शक्ति-संतुलन से जुड़ जाते हैं। यही इस अध्याय की कहानी है।
1 वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था — अवधारणा एवं सैद्धांतिक दृष्टिकोण (Concept & Theoretical Perspectives)
सरल भाषा में समझें — "वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था" (Global Political Economy — GPE) वह अध्ययन-क्षेत्र है, जो यह समझने की कोशिश करता है कि राजनीति एवं अर्थव्यवस्था एक-दूसरे को किस तरह प्रभावित करते हैं — यानी कौन सा देश किससे व्यापार करेगा, कर्ज़ कौन देगा, किन शर्तों पर, एवं आर्थिक फैसलों के पीछे कौन-सी राजनीतिक-रणनीतिक मंशा छिपी होती है। जैसे परिवार में पैसों के फैसले अक्सर रिश्तों की ताकत तय करते हैं, वैसे ही देशों के बीच आर्थिक संबंध वैश्विक शक्ति-संतुलन तय करते हैं।
संरचना — GPE को समझने के तीन प्रमुख सैद्धांतिक दृष्टिकोण
- यथार्थवादी दृष्टिकोण (Realist/Mercantilist View) — इसके अनुसार राज्य अपनी आर्थिक नीतियों का उपयोग सापेक्ष शक्ति (Relative Power) बढ़ाने के लिए करते हैं — व्यापार, निवेश एवं तकनीक सभी राष्ट्रीय सुरक्षा के औज़ार माने जाते हैं (जैसे अमेरिका-चीन चिप-युद्ध, अध्याय 2)।
- उदारवादी दृष्टिकोण (Liberal View) — यह मानता है कि खुला व्यापार एवं आर्थिक परस्पर-निर्भरता (Interdependence) सभी देशों के लिए लाभदायक होती है तथा संघर्ष की आशंका घटाती है — WTO, IMF जैसी संस्थाएं इसी सोच पर आधारित हैं।
- मार्क्सवादी/निर्भरता सिद्धांत (Marxist/Dependency Theory) — यह तर्क देता है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था अमीर "केंद्र" (Core) देशों को गरीब "परिधीय" (Periphery) देशों के शोषण से फ़ायदा पहुँचाने के लिए बनाई गई है — यह विकासशील देशों के ऋण-संकट (टॉपिक 6) को समझने का एक महत्वपूर्ण नज़रिया है।
💡 उदाहरण — तीनों दृष्टिकोणों का व्यावहारिक उपयोग
जब कोई छात्र यह विश्लेषण करता है कि "अमेरिका ने चीन पर शुल्क क्यों लगाया?" — तो यथार्थवादी दृष्टिकोण कहेगा "शक्ति-संतुलन के लिए", उदारवादी कहेगा "यह अल्पकालिक राजनीतिक दबाव है, दीर्घकाल में व्यापार से ही फ़ायदा है", और निर्भरता सिद्धांतकार कहेगा "यह वैश्विक आर्थिक पदानुक्रम बनाए रखने की कोशिश है" — तीनों दृष्टिकोण मिलकर ही पूरी तस्वीर बनाते हैं।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था (GPE) ◆ यथार्थवादी दृष्टिकोण ◆ उदारवादी दृष्टिकोण ◆ निर्भरता सिद्धांत ◆ सापेक्ष शक्ति ◆ परस्पर-निर्भरता
2 ब्रेटन वुड्स व्यवस्था — स्वर्ण मानक से डॉलर मानक तक (Bretton Woods System — From Gold Standard to Dollar Standard)
पृष्ठभूमि — जुलाई 1944 में, द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने से पहले ही, 44 देशों के प्रतिनिधि अमेरिका के "ब्रेटन वुड्स" नामक स्थान पर एकत्र हुए, ताकि युद्धोत्तर वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की नींव रखी जा सके। इसी सम्मेलन से IMF एवं विश्व बैंक (टॉपिक 3 व 4) का जन्म हुआ, तथा एक नई मौद्रिक व्यवस्था तय हुई।
संरचना/कार्यप्रणाली — स्वर्ण-विनिमय मानक (Gold-Exchange Standard)
इस व्यवस्था के तहत अमेरिकी डॉलर को सोने से जोड़ा गया (35 डॉलर प्रति औंस सोना), तथा बाकी सभी देशों की मुद्राओं को डॉलर के सापेक्ष एक निश्चित (पर समायोज्य) विनिमय दर पर बांधा गया। इस तरह डॉलर अप्रत्यक्ष रूप से "सोने जितना विश्वसनीय" माना जाने लगा, जिसने अमेरिकी डॉलर को वैश्विक व्यापार की केंद्रीय मुद्रा बना दिया (अध्याय 2, टॉपिक 1 में वर्णित डॉलर-वर्चस्व की यही मूल नींव है)।
निक्सन शॉक — 15 अगस्त 1971
1960 के दशक तक अमेरिका वियतनाम युद्ध एवं घरेलू सामाजिक-कल्याण योजनाओं पर भारी खर्च कर रहा था, जिससे बाज़ार में डॉलर की मात्रा अमेरिका के सोने के भंडार से कहीं अधिक हो गई। 15 अगस्त 1971 को राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अचानक घोषणा की कि डॉलर को अब सोने में नहीं बदला जा सकेगा — इसे "निक्सन शॉक" (Nixon Shock) कहा जाता है। इसके बाद मार्च 1973 तक अधिकांश बड़े देशों ने स्थिर विनिमय दर व्यवस्था को पूरी तरह छोड़ दिया, और दुनिया "अस्थिर/तैरती विनिमय दर व्यवस्था" (Floating Exchange Rate System) में प्रवेश कर गई, जो आज तक जारी है।
📌 ब्रेटन वुड्स व्यवस्था की समयरेखा
- जुलाई 1944 — ब्रेटन वुड्स सम्मेलन : IMF एवं विश्व बैंक की स्थापना की नींव, डॉलर-स्वर्ण मानक तय
- 15 अगस्त 1971 — निक्सन शॉक : डॉलर की सोने में परिवर्तनीयता समाप्त
- मार्च 1973 — तैरती विनिमय दर व्यवस्था लागू : स्थिर विनिमय दर व्यवस्था का औपचारिक अंत
⚠️ महत्वपूर्ण तथ्य
निक्सन शॉक के बाद भी डॉलर की वैश्विक केंद्रीयता खत्म नहीं हुई, बल्कि 1970 के दशक में अमेरिका-सऊदी अरब समझौते से "पेट्रोडॉलर व्यवस्था" (Petrodollar System) बनी — जिसमें दुनिया भर का तेल व्यापार डॉलर में होने से डॉलर की मांग बनी रही। यही वजह है कि आज भी अमेरिकी डॉलर स्वर्ण-समर्थन के बिना भी विश्व की सबसे भरोसेमंद मुद्रा बना हुआ है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ ब्रेटन वुड्स सम्मेलन 1944 ◆ स्वर्ण-विनिमय मानक ◆ निक्सन शॉक 1971 ◆ तैरती विनिमय दर व्यवस्था ◆ पेट्रोडॉलर व्यवस्था
3 अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) — संरचना, कार्य एवं आलोचना (IMF — Structure, Functions & Criticism)
पृष्ठभूमि — ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (टॉपिक 2) से जन्मा IMF आज 190 से अधिक सदस्य देशों वाली संस्था है, जिसका मुख्य उद्देश्य है वैश्विक मौद्रिक सहयोग सुनिश्चित करना, वित्तीय स्थिरता बनाए रखना, तथा भुगतान-संतुलन संकट (जैसा भारत ने 1991 में झेला — अध्याय 1) में फँसे देशों को अल्पकालिक कर्ज़ देना।
संरचना — कोटा प्रणाली एवं निर्णय-प्रक्रिया
IMF में हर सदस्य देश का एक "कोटा" (Quota) होता है, जो उसकी अर्थव्यवस्था के आकार के अनुसार तय होता है — यही कोटा वोटिंग शक्ति एवं कर्ज़ लेने की सीमा दोनों तय करता है। अमेरिका के पास इतनी बड़ी वोटिंग हिस्सेदारी (लगभग 16-17%) है कि उसके पास अकेले ही किसी भी बड़े फैसले पर "प्रभावी वीटो" (महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए 85% बहुमत ज़रूरी) है — यह अमेरिकी वर्चस्व (अध्याय 2) का एक संस्थागत उदाहरण है।
IMF की शर्तें — "कंडीशनैलिटी" (Conditionality)
IMF जब किसी संकटग्रस्त देश को कर्ज़ देता है, तो वह आमतौर पर कड़ी आर्थिक शर्तें (Conditionalities) लगाता है — जैसे सरकारी खर्च घटाना, सब्सिडी हटाना, मुद्रा का अवमूल्यन करना। भारत ने भी 1991 में IMF से कर्ज़ लेते समय ऐसी ही शर्तों के तहत LPG सुधार लागू किए थे (अध्याय 1, टॉपिक 11)।
⚠️ आलोचना
आलोचकों का कहना है कि IMF की सख़्त शर्तें अक्सर गरीब देशों में स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी ज़रूरी सेवाओं में कटौती करवा देती हैं, जिससे आम जनता पर बोझ बढ़ता है — इसे "IMF की कड़वी दवा" (IMF Medicine) भी कहा जाता है। साथ ही विकासशील देश लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि IMF में उनकी वोटिंग हिस्सेदारी उनकी बढ़ती अर्थव्यवस्था के अनुरूप बढ़ाई जाए (विस्तार से टॉपिक 14 में)।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ IMF ◆ कोटा प्रणाली ◆ वोटिंग शक्ति ◆ कंडीशनैलिटी ◆ भुगतान संतुलन सहायता ◆ IMF की कड़वी दवा
4 विश्व बैंक — संरचना, कार्य एवं आलोचना (World Bank — Structure, Functions & Criticism)
पृष्ठभूमि — IMF का "जुड़वां भाई" कहा जाने वाला विश्व बैंक भी ब्रेटन वुड्स सम्मेलन से जन्मा, लेकिन इसका उद्देश्य IMF से अलग है — जहाँ IMF अल्पकालिक मौद्रिक संकट में मदद करता है, वहीं विश्व बैंक दीर्घकालिक विकास परियोजनाओं (सड़कें, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य ढांचा) के लिए कर्ज़ एवं तकनीकी सहायता देता है।
संरचना — पाँच प्रमुख अंग
IBRD (पुनर्निर्माण एवं विकास हेतु अंतर्राष्ट्रीय बैंक) — मध्यम-आय वाले देशों को कर्ज़।
IDA (अंतर्राष्ट्रीय विकास संगठन) — सबसे गरीब देशों को अत्यंत रियायती शर्तों पर कर्ज़/अनुदान।
IFC (अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम) — निजी क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा।
MIGA — विदेशी निवेश को राजनीतिक जोखिम बीमा प्रदान करना।
ICSID — निवेश-संबंधी अंतर्राष्ट्रीय विवादों का निपटान।
⚠️ आलोचना
विश्व बैंक की भी IMF जैसी ही आलोचना होती है — 1980-90 के दशक में इसके "संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम" (Structural Adjustment Programmes, अध्याय 1) को अफ्रीकी एवं लैटिन अमेरिकी देशों में असमानता बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। साथ ही विश्व बैंक के अध्यक्ष पद पर परंपरागत रूप से हमेशा एक अमेरिकी नागरिक की नियुक्ति होती रही है (जैसे IMF प्रमुख हमेशा यूरोपीय होता है) — विकासशील देश इस अलिखित परंपरा को असमान वैश्विक शासन-व्यवस्था का प्रतीक मानते हैं।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ विश्व बैंक ◆ IBRD ◆ IDA ◆ IFC ◆ MIGA ◆ संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम
5 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट — कारण, प्रभाव एवं सबक (2008 Global Financial Crisis — Causes, Impact & Lessons)
पृष्ठभूमि — 2000 के दशक में अमेरिका में घरों की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं, और बैंकों ने बिना ठोस जांच-पड़ताल के भी लाखों कम-आय वाले लोगों को घर खरीदने के लिए भारी कर्ज़ ("सबप्राइम मॉर्टगेज" — Subprime Mortgage) दिए। इन जोखिम-भरे कर्ज़ों को जटिल वित्तीय उत्पादों (Mortgage-Backed Securities) में बदलकर दुनिया भर के बैंकों एवं निवेशकों को बेच दिया गया — जिससे एक देश के घरेलू बाज़ार का जोखिम पूरी दुनिया में फैल गया।
संरचना/कार्यप्रणाली — संकट का विस्फोट
- 2006-07 — अमेरिका में घरों की कीमतें गिरनी शुरू हुईं, तथा सबप्राइम कर्ज़दारों की चूक (Default) की दर तेज़ी से बढ़ी।
- मार्च 2008 — अमेरिका का पाँचवां सबसे बड़ा निवेश बैंक "बेयर स्टर्न्स" (Bear Stearns) लगभग दिवालिया होकर सिर्फ 2 डॉलर प्रति शेयर की कीमत पर JP मॉर्गन चेज़ को बेचा गया।
- 7 सितंबर 2008 — अमेरिकी सरकार को "फैनी मे" एवं "फ्रेडी मैक" (जो लगभग 5 ट्रिलियन डॉलर के बंधक-ऋणों की गारंटी देती थीं) को अपने नियंत्रण में लेना पड़ा।
- 15 सितंबर 2008 — अमेरिका के चौथे सबसे बड़े निवेश बैंक "लेहमैन ब्रदर्स" (Lehman Brothers, 639 अरब डॉलर की संपत्ति) ने दिवालियेपन के लिए आवेदन किया — यह अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा दिवालियापन था, तथा इसी घटना ने एक "नियंत्रित" संकट को एक वैश्विक वित्तीय दहशत में बदल दिया।
- 16 सितंबर 2008 — अमेरिकी फेडरल रिज़र्व को दुनिया की सबसे बड़ी बीमा कंपनी AIG को डूबने से बचाने के लिए 85 अरब डॉलर का आपातकालीन ऋण देना पड़ा — "बहुत बड़ा कि गिरने न दिया जाए" (Too Big to Fail) की अवधारणा इसी संकट से लोकप्रिय हुई।
💡 उदाहरण — भारत पर असर — "डीकपलिंग" का मिथक टूटा
संकट से पहले कई अर्थशास्त्री मानते थे कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं अमेरिकी बाज़ार से "अलग-थलग" (Decoupled) हैं। लेकिन 2008-09 में भारतीय शेयर बाज़ार में भारी गिरावट, निर्यात में कमी एवं विदेशी निवेश की वापसी ने साबित किया कि वैश्वीकरण के दौर में कोई भी बड़ी अर्थव्यवस्था पूरी तरह अलग-थलग नहीं रह सकती — भारत सरकार को भी राजकोषीय प्रोत्साहन पैकेज (Fiscal Stimulus) देने पड़े।
⚠️ दीर्घकालिक सबक एवं परिणाम
इस संकट के तीन बड़े दीर्घकालिक परिणाम हुए — पहला, केंद्रीय बैंकों ने "मात्रात्मक सहजता" (Quantitative Easing — QE) जैसी अभूतपूर्व मौद्रिक नीतियां अपनाईं; दूसरा, बैंकिंग नियमन को सख़्त किया गया (जैसे "बासेल-III" मानक); और तीसरा, जैसा टॉपिक 14 में देखा जाएगा, इसी संकट ने G7 की जगह G20 को वैश्विक आर्थिक नीति के केंद्रीय मंच के रूप में स्थापित किया, क्योंकि बिना उभरती अर्थव्यवस्थाओं को शामिल किए वैश्विक समाधान संभव नहीं था।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ सबप्राइम मॉर्टगेज संकट ◆ लेहमैन ब्रदर्स ◆ बेयर स्टर्न्स ◆ टू बिग टू फेल ◆ मात्रात्मक सहजता (QE) ◆ बासेल-III
6 वैश्विक ऋण संकट — 1980 के दशक से श्रीलंका-ज़ाम्बिया तक (Global Debt Crises — From the 1980s to Sri Lanka-Zambia, 2022-25)
पृष्ठभूमि — विकासशील देशों में ऋण-संकट कोई नई बात नहीं — 1980 के दशक में मेक्सिको, ब्राज़ील, अर्जेंटीना जैसे लैटिन अमेरिकी देश भारी विदेशी कर्ज़ न चुका पाने की स्थिति में पहुँच गए थे, जिसे "लैटिन अमेरिकी ऋण संकट" कहा जाता है। लेकिन 2020 के बाद कोविड-19 महामारी, बढ़ती ब्याज दरों एवं यूक्रेन युद्ध (अध्याय 2) से बढ़ी खाद्य-ऊर्जा कीमतों ने एक नई "ऋण-संकट लहर" पैदा की है।
संरचना/कार्यप्रणाली — 2022-25 की ऋण-संकट लहर
- श्रीलंका — अप्रैल 2022 में श्रीलंका ने पहली बार अपने इतिहास में विदेशी कर्ज़ चुकाने से इनकार किया (Default), जिसके बाद मार्च 2023 में IMF से 3 अरब डॉलर का "विस्तारित निधि सुविधा" (Extended Fund Facility) बेलआउट मिला।
- ज़ाम्बिया — जून 2020 में ही ऋण-भुगतान में चूक करने वाला यह अफ्रीकी देश ज़ाम्बिया का लगभग 24% सार्वजनिक कर्ज़ अकेले चीन का है — चीन जैसे बड़े द्विपक्षीय ऋणदाताओं की "पुनर्गठन वार्ता में देरी" (Foot-dragging) ने बेलआउट प्रक्रिया को वर्षों तक खींचा।
- घाना — दिसंबर 2022 में डिफ़ॉल्ट कर, IMF से 3 अरब डॉलर की "विस्तारित ऋण सुविधा" (Extended Credit Facility) प्राप्त की।
- 2024 तक — घाना एवं ज़ाम्बिया का ऋण-पुनर्गठन G20 की "साझा ढांचा" (Common Framework) व्यवस्था के तहत पूरा हुआ, जबकि श्रीलंका ने इस ढांचे से बाहर अलग से बॉन्डधारकों से समझौता किया — यह दिखाता है कि G20 की साझा ढांचा व्यवस्था अभी भी पूरी तरह प्रभावी नहीं बन पाई है।
💡 उदाहरण — श्रीलंका में भारत-चीन की भू-राजनीतिक रस्साकशी
श्रीलंका संकट के दौरान भारत ने लगभग 4 अरब डॉलर की तत्काल सहायता (ऋण, मुद्रा-अदला-बदली, ईंधन आपूर्ति) दी — जो किसी एक देश द्वारा दी गई सबसे बड़ी सहायताओं में से एक थी — जबकि चीन, जो श्रीलंका का सबसे बड़ा द्विपक्षीय ऋणदाता है, कर्ज़-पुनर्गठन में धीमा रहा। इससे स्पष्ट है कि छोटे देशों के ऋण-संकट भी कैसे बड़ी शक्तियों के बीच प्रभाव-क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा का मैदान बन जाते हैं।
⚠️ "ऋण-जाल कूटनीति" पर बहस
पश्चिमी विश्लेषक अक्सर चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (अध्याय 2) से जुड़े कर्ज़ों को "ऋण-जाल कूटनीति" (Debt-Trap Diplomacy) कहते हैं, यह तर्क देते हुए कि चीन जानबूझकर देशों को कर्ज़ के जाल में फँसाकर रणनीतिक संपत्तियों (जैसे बंदरगाह) पर नियंत्रण हासिल करता है। हालांकि कई अर्थशास्त्री इस सिद्धांत पर सवाल उठाते हैं, यह तर्क देते हुए कि अधिकांश ऋण-संकट वैश्विक ब्याज-दर वृद्धि एवं घरेलू कुप्रबंधन का परिणाम हैं, न कि किसी सुनियोजित "जाल" का — परीक्षा में दोनों पक्षों को संतुलित रूप से समझना ज़रूरी है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ लैटिन अमेरिकी ऋण संकट 1980s ◆ श्रीलंका डिफॉल्ट 2022 ◆ ज़ाम्बिया ◆ घाना ◆ G20 साझा ढांचा (Common Framework) ◆ ऋण-जाल कूटनीति
7 वैश्विक असमानता एवं धन-संकेंद्रण (Global Inequality & Wealth Concentration)
पृष्ठभूमि — वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था का एक बेहद महत्वपूर्ण किंतु असहज पहलू है असमानता — यानी दुनिया की संपत्ति एवं आय किस तरह बँटी है। फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी (Thomas Piketty) की चर्चित पुस्तक "Capital in the Twenty-First Century" (2013) ने इस बहस को वैश्विक स्तर पर फिर से केंद्र में ला दिया।
संरचना/कार्यप्रणाली — असमानता के आयाम
(A) देशों के बीच असमानता (Inter-country Inequality) — विकसित बनाम विकासशील देशों के बीच आय का अंतर, जो निर्भरता सिद्धांत (टॉपिक 1) का केंद्रीय सरोकार है।
(B) देशों के भीतर असमानता (Intra-country Inequality) — किसी एक देश के भीतर अमीर एवं गरीब के बीच बढ़ता फ़ासला — विकसित एवं विकासशील दोनों तरह के देशों में यह प्रवृत्ति देखी गई है।
(C) वैश्विक अरबपति वर्ग का उदय — ऑक्सफैम जैसी संस्थाओं की वार्षिक रिपोर्टों के अनुसार विश्व की शीर्ष 1% आबादी के पास निचली 50% आबादी से कहीं अधिक संपत्ति केंद्रित होती जा रही है, विशेषकर कोविड-19 महामारी के बाद के वर्षों में।
💡 उदाहरण — असमानता एवं वैश्वीकरण का जटिल रिश्ता
दिलचस्प बात यह है कि वैश्वीकरण (अध्याय 1) ने देशों के बीच असमानता घटाई है — जैसे भारत, चीन जैसे देश गरीबी से बाहर निकले — लेकिन कई विकसित देशों के भीतर असमानता बढ़ी है, क्योंकि विनिर्माण नौकरियां सस्ते श्रम वाले देशों में स्थानांतरित हुईं। यही विरोधाभास पश्चिमी देशों में "वैश्वीकरण-विरोधी" राजनीतिक लहर (जैसे ट्रंप सिद्धांत, अध्याय 2) की एक बड़ी वजह माना जाता है।
⚠️ नीतिगत बहस
असमानता घटाने के लिए विश्व बैंक-IMF (टॉपिक 3-4) जैसी संस्थाएं तथा राष्ट्रीय सरकारें कई उपाय सुझाती हैं — प्रगतिशील कराधान (Progressive Taxation), वैश्विक न्यूनतम कर (टॉपिक 12), सामाजिक सुरक्षा योजनाएं एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच। भारत में भी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) एवं वित्तीय समावेशन योजनाएं (जैसे जन-धन योजना) असमानता घटाने के इसी प्रयास का हिस्सा मानी जाती हैं।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ थॉमस पिकेटी ◆ वैश्विक असमानता ◆ ऑक्सफैम रिपोर्ट ◆ प्रगतिशील कराधान ◆ वैश्वीकरण-विरोधी लहर
8 वैश्विक आपूर्ति शृंखला एवं व्यापार-युद्ध (Global Supply Chains & Trade Wars)
पृष्ठभूमि — पिछले तीन दशकों में कंपनियों ने उत्पादन-लागत घटाने के लिए अपनी आपूर्ति-शृंखला (Supply Chain) को दुनिया भर में फैलाया — जैसे एक स्मार्टफ़ोन में लगे कल-पुर्जे़ दर्जनों देशों से आते हैं। लेकिन कोविड-19 महामारी (2020-21) एवं अमेरिका-चीन व्यापार-तनाव ने इस अत्यधिक जुड़ी हुई व्यवस्था की कमज़ोरियां उजागर कर दीं।
संरचना/कार्यप्रणाली — आपूर्ति-शृंखला के पुनर्गठन के तरीके
(A) रीशोरिंग (Reshoring) — उत्पादन को वापस अपने ही देश में लाना, ताकि विदेशी निर्भरता घटे।
(B) फ्रेंड-शोरिंग (Friend-shoring) — उत्पादन को राजनीतिक रूप से "भरोसेमंद" मित्र-देशों में स्थानांतरित करना (अध्याय 2 में चीन+1 रणनीति के तहत भारत को मिलने वाला लाभ इसी का हिस्सा है)।
(C) नियर-शोरिंग (Nearshoring) — भौगोलिक रूप से नज़दीकी देशों में उत्पादन ले जाना (जैसे अमेरिकी कंपनियों का मेक्सिको की ओर रुख)।
⚠️ कोविड-19 का सबक
महामारी के दौरान दुनिया को अचानक एहसास हुआ कि जीवन-रक्षक दवाओं के सक्रिय दवा घटकों (API) एवं PPE किट जैसी बुनियादी चीज़ों के लिए भी दुनिया कुछ गिने-चुने देशों (मुख्यतः चीन) पर बेहद निर्भर थी। इसी सबक ने "आपूर्ति-शृंखला सुरक्षा" (Supply Chain Security) को राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बना दिया।
भारत की भूमिका — भारत ने "आत्मनिर्भर भारत" अभियान एवं PLI योजनाओं (अध्याय 1, 2) के ज़रिए महत्वपूर्ण दवा-घटकों, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सेमीकंडक्टर के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया है, ताकि आपूर्ति-शृंखला में भारत की भेद्यता (Vulnerability) कम हो सके।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ आपूर्ति शृंखला ◆ रीशोरिंग ◆ फ्रेंड-शोरिंग ◆ नियर-शोरिंग ◆ आपूर्ति-शृंखला सुरक्षा ◆ सक्रिय दवा घटक (API)
9 क्षेत्रीय व्यापार समझौते एवं मेगा-FTAs — RCEP, CPTPP एवं भारत (Regional Trade Agreements & Mega-FTAs)
पृष्ठभूमि — WTO (अध्याय 1, विस्तार से अध्याय 12) के बहुपक्षीय वार्ता-दौर (जैसे दोहा दौर) के दशकों तक अटके रहने के बाद, दुनिया भर के देशों ने क्षेत्रीय एवं बहु-देशीय "मेगा मुक्त व्यापार समझौतों" (Mega-FTAs) का रुख किया, जो WTO से बाहर, कम देशों के बीच तेज़ी से गहरे व्यापार-एकीकरण की अनुमति देते हैं।
संरचना — दो प्रमुख मेगा-FTA एवं भारत की दुविधा
RCEP ("क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी" — Regional Comprehensive Economic Partnership) — आसियान (अध्याय 1, टॉपिक 9) के नेतृत्व में बना यह समझौता चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूज़ीलैंड सहित 15 देशों का विश्व का सबसे बड़ा मुक्त-व्यापार समूह है (नवंबर 2020 में हस्ताक्षरित)। भारत भी वार्ता में शामिल था, लेकिन नवंबर 2019 में भारत ने अंतिम क्षण में इससे बाहर होने का फैसला किया।
भारत ने RCEP से बाहर क्यों रहा?
- चीन के साथ पहले से बड़ा व्यापार-घाटा — बिना पर्याप्त पारस्परिक बाज़ार-पहुंच के शुल्क घटाने से यह घाटा और चौड़ा होने की आशंका थी।
- डेयरी एवं कृषि क्षेत्र की चिंता — ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड जैसे बड़े डेयरी निर्यातकों को बाज़ार खोलने से घरेलू लघु किसानों को नुकसान का डर था।
- "मूल-नियम" (Rules of Origin) की कमज़ोरी — भारत को आशंका थी कि तीसरे देशों के उत्पाद किसी सदस्य-देश के रास्ते सस्ते में भारत में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे घरेलू उद्योगों की सुरक्षा कमज़ोर पड़ जाती।
CPTPP ("व्यापक एवं प्रगतिशील ट्रांस-पैसिफिक साझेदारी समझौता") — यह 11 देशों (जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, मलेशिया सहित, मार्च 2018 में हस्ताक्षरित) का समझौता है, जिसमें चीन एवं अमेरिका दोनों शामिल नहीं — मूलतः अमेरिका के नेतृत्व में शुरू हुआ यह समझौता अमेरिका के 2017 में बाहर होने के बाद शेष देशों ने आगे बढ़ाया। भारत अभी इसका सदस्य नहीं है, लेकिन 2025-26 में अमेरिकी शुल्क-नीतियों (अध्याय 1) से बढ़ती व्यापार-अनिश्चितता के बीच भारत में CPTPP में शामिल होने पर नए सिरे से विचार-विमर्श शुरू हुआ है।
| समझौता | सदस्य देश (मुख्य) | भारत की स्थिति |
|---|
| RCEP | आसियान+चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड | 2019 में बाहर हुआ, फिर से जुड़ने पर पुनर्विचार जारी |
| CPTPP | जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, मलेशिया आदि (11 देश) | सदस्य नहीं, 2025-26 में शामिल होने पर विचार-विमर्श |
⚠️ रणनीतिक दुविधा
मेगा-FTAs से बाहर रहने से भारत को अल्पकालिक रूप से घरेलू उद्योगों की रक्षा का लाभ मिलता है, लेकिन दीर्घकाल में भारत वैश्विक आपूर्ति-शृंखलाओं (टॉपिक 8) एवं "चीन+1" (अध्याय 2) जैसे अवसरों से भी सीमित रह सकता है, क्योंकि बड़ी कंपनियां अक्सर उन्हीं देशों में निवेश करना पसंद करती हैं जो बड़े मुक्त-व्यापार नेटवर्क का हिस्सा हों।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ RCEP ◆ CPTPP ◆ मेगा-FTA ◆ मूल-नियम (Rules of Origin) ◆ भारत की RCEP वापसी 2019
10 आर्थिक अस्त्रीकरण — प्रतिबंध एवं परस्पर-निर्भरता का हथियारीकरण (Economic Statecraft — Sanctions & Weaponization of Interdependence)
पृष्ठभूमि — जैसा अध्याय 2 में देखा, डॉलर-आधारित वित्तीय व्यवस्था पर नियंत्रण अमेरिका को असाधारण आर्थिक ताकत देता है। हाल के वर्षों में महाशक्तियां सैन्य बल के बजाय आर्थिक उपकरणों — प्रतिबंध, निर्यात-नियंत्रण, टैरिफ — का उपयोग विदेश-नीति के हथियार के रूप में कहीं अधिक करने लगी हैं, जिसे विद्वान "आर्थिक अस्त्रीकरण" (Economic Statecraft) या "परस्पर-निर्भरता का हथियारीकरण" (Weaponization of Interdependence) कहते हैं।
संरचना — आर्थिक अस्त्रों के प्रकार
वित्तीय प्रतिबंध — किसी देश/व्यक्ति की विदेशी संपत्तियां फ्रीज़ करना (जैसे रूस पर 2022 के बाद, अध्याय 2)।
स्विफ्ट (SWIFT) से बहिष्कार — किसी देश के बैंकों को अंतर्राष्ट्रीय भुगतान प्रणाली से काटना।
निर्यात-नियंत्रण — महत्वपूर्ण तकनीक (जैसे सेमीकंडक्टर, अध्याय 2) की बिक्री पर रोक।
द्वितीयक प्रतिबंध (Secondary Sanctions) — किसी तीसरे देश की कंपनियों को भी दंडित करना यदि वे प्रतिबंधित देश से व्यापार करती हैं — यह अक्सर भारत जैसे देशों के लिए कूटनीतिक चुनौती बन जाता है (जैसे रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव)।
💡 उदाहरण — चीन के खनिज-निर्यात नियंत्रण
ठीक जैसे अमेरिका चिप-तकनीक को हथियार बनाता है, चीन ने भी गैलियम-जर्मेनियम (अध्याय 2) एवं अन्य दुर्लभ मृदा खनिजों (Rare Earth Elements) के निर्यात पर नियंत्रण लगाकर दिखाया कि आर्थिक अस्त्रीकरण दोनों तरफ से हो सकता है — यह आधुनिक भू-राजनीति की सबसे नई एवं शक्तिशाली प्रवृत्ति बन चुकी है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ आर्थिक अस्त्रीकरण ◆ परस्पर-निर्भरता का हथियारीकरण ◆ SWIFT बहिष्कार ◆ द्वितीयक प्रतिबंध ◆ दुर्लभ मृदा खनिज
11 डिजिटल अर्थव्यवस्था, डेटा गवर्नेंस एवं डिजिटल कर (Digital Economy, Data Governance & Digital Taxation)
पृष्ठभूमि — 21वीं सदी की वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था में "डेटा" तेल जितना ही मूल्यवान संसाधन बन चुका है। गूगल, मेटा, अमेज़न जैसी बड़ी टेक कंपनियां अरबों उपयोगकर्ताओं का डेटा एकत्र कर उससे भारी मुनाफ़ा कमाती हैं, जिससे डेटा पर नियंत्रण एवं इसके शासन (Governance) को लेकर देशों के बीच नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है।
संरचना/कार्यप्रणाली — डेटा-शासन के तीन मॉडल
(A) अमेरिकी मॉडल — बाज़ार-संचालित, न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप, डेटा का स्वतंत्र सीमा-पार प्रवाह, निजी कंपनियों को अधिक स्वायत्तता।
(B) यूरोपीय मॉडल — नागरिक-अधिकार केंद्रित, "GDPR" (अध्याय 2, टॉपिक 5 — ब्रसेल्स प्रभाव) जैसे सख़्त गोपनीयता-कानून, डेटा को "मौलिक अधिकार" मानना।
(C) चीनी मॉडल — राज्य-नियंत्रित, "डेटा संप्रभुता" (Data Sovereignty) पर बल, विदेशी कंपनियों के डेटा को देश के भीतर ही संग्रहीत करना अनिवार्य (Data Localization)।
भारत की राह — भारत ने 2023 में "डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम" (DPDP Act) पारित किया, जो यूरोपीय एवं चीनी मॉडल के बीच का एक "मध्यम मार्ग" अपनाता है — नागरिकों की गोपनीयता की रक्षा करते हुए भी डिजिटल अर्थव्यवस्था के विकास को बाधित न करने का प्रयास करता है। साथ ही भारत "डेटा स्थानीयकरण" (कुछ संवेदनशील वित्तीय डेटा को भारत में ही संग्रहीत करने) पर भी ज़ोर देता रहा है।
डिजिटल कराधान की चुनौती
पारंपरिक कर-व्यवस्था किसी कंपनी की "भौतिक उपस्थिति" (Physical Presence) पर आधारित होती है, लेकिन गूगल-फ़ेसबुक जैसी कंपनियां बिना किसी बड़े भौतिक कार्यालय के भी किसी भी देश में भारी कमाई कर सकती हैं। इसी समस्या के समाधान हेतु भारत ने 2016 में "समकरण शुल्क" (Equalisation Levy, अनौपचारिक रूप से "गूगल टैक्स") लगाया — जो अब OECD के वैश्विक कर-समझौते (टॉपिक 12) के "स्तंभ-एक" (Pillar One) से जुड़ी बड़ी वार्ता का हिस्सा बन चुका है।
⚠️ डिजिटल विभाजन (Digital Divide)
डेटा-अर्थव्यवस्था की एक बड़ी चिंता यह भी है कि इसके लाभ मुख्यतः अमेरिका एवं चीन की बड़ी टेक कंपनियों तक सीमित रह जाते हैं, जबकि भारत सहित अधिकांश विकासशील देश अभी भी "डेटा उपभोक्ता" ही बने हुए हैं, "डेटा उत्पादक/लाभार्थी" कम — भारत का UPI/DPI मॉडल (टॉपिक 15 में विस्तार से) इसी असंतुलन को ठीक करने का एक स्वदेशी प्रयास माना जाता है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ डेटा गवर्नेंस ◆ डेटा संप्रभुता ◆ डेटा स्थानीयकरण ◆ DPDP Act 2023 ◆ समकरण शुल्क (गूगल टैक्स) ◆ डिजिटल विभाजन
12 वैश्विक कर सुधार — OECD वैश्विक न्यूनतम कर (Global Tax Reform — OECD Global Minimum Tax)
पृष्ठभूमि — दशकों से बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां (जैसे बड़ी टेक कंपनियां) अपने मुनाफ़े को कम-कर वाले देशों/"टैक्स हैवन" में दिखाकर भारी टैक्स-बचत करती रही हैं। इससे वे देश जहाँ असल में व्यापार होता है, राजस्व से वंचित रह जाते थे — यह वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था में असमानता का एक बड़ा कारण माना जाता है।
संरचना/कार्यप्रणाली — दो-स्तंभीय समाधान
अक्टूबर 2021 में आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) की मध्यस्थता से 140 से अधिक देशों ने एक ऐतिहासिक समझौते पर सहमति दी — "वैश्विक न्यूनतम कर" (Global Minimum Tax, "स्तंभ-दो"/Pillar Two), जिसके तहत बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों (750 मिलियन यूरो से अधिक राजस्व वाली) पर न्यूनतम 15% प्रभावी कर दर लागू होगी, चाहे वे कहीं भी अपना मुख्यालय दिखाएं। यह व्यवस्था 2024 से "आय-समावेशन नियम" (Income Inclusion Rule) के साथ लागू होनी शुरू हुई।
⚠️ वर्तमान स्थिति (2025-26)
जनवरी 2026 में OECD ने अमेरिकी-मूल कंपनियों के लिए कुछ विशेष छूट ("साइड-बाय-साइड" व्यवस्था) की घोषणा की, जो 2026 से लागू होने वाले वित्त-वर्षों पर लागू होगी — जबकि 2024-25 के वित्त-वर्षों पर पूरे नियम लागू रहेंगे। कई देशों ने "अंडर-टैक्स्ड प्रॉफिट रूल" (UTPR, "स्तंभ-दो" का दूसरा हिस्सा) के क्रियान्वयन को तकनीकी जटिलताओं के कारण टाल दिया है — यह दिखाता है कि वैश्विक कर-सुधार पर पूर्ण सहमति बनाना कितना जटिल है, खासकर जब अमेरिका जैसी बड़ी शक्ति की चिंताएं शामिल हों।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ OECD ◆ वैश्विक न्यूनतम कर ◆ स्तंभ-दो (Pillar Two) ◆ आय-समावेशन नियम ◆ टैक्स हैवन
13 सॉवरेन वेल्थ फंड्स एवं वैश्विक पूंजी प्रवाह (Sovereign Wealth Funds & Global Capital Flows)
पृष्ठभूमि — कई देश, विशेषकर तेल-समृद्ध खाड़ी राष्ट्र (सऊदी अरब, UAE, कतर) एवं व्यापार-अधिशेष वाले देश (चीन, सिंगापुर), अपने विदेशी मुद्रा भंडार के एक बड़े हिस्से को केवल बचाकर रखने के बजाय, एक विशेष सरकारी निवेश-कोष के ज़रिए दुनिया भर में निवेश करते हैं — इन्हें "सॉवरेन वेल्थ फंड" (Sovereign Wealth Fund — SWF) कहा जाता है।
संरचना/कार्यप्रणाली — SWFs की भू-राजनीतिक भूमिका
विश्व के सबसे बड़े सॉवरेन वेल्थ फंडों में नॉर्वे का "गवर्नमेंट पेंशन फंड ग्लोबल", नॉर्वे एवं UAE के तेल-कोष, तथा सिंगापुर का "टेमासेक" एवं "GIC" शामिल हैं। ये फंड सिर्फ आर्थिक रिटर्न के लिए ही नहीं, बल्कि कभी-कभी रणनीतिक/भू-राजनीतिक उद्देश्यों (जैसे किसी देश की महत्वपूर्ण कंपनी में हिस्सेदारी लेकर प्रभाव बढ़ाना) के लिए भी निवेश करते हैं — इसी वजह से कई देश विदेशी SWF निवेश की सुरक्षा-समीक्षा (National Security Review) करते हैं।
💡 उदाहरण — भारत में SWF निवेश
खाड़ी देशों एवं सिंगापुर के सॉवरेन वेल्थ फंड भारत के बुनियादी ढांचे (सड़क, नवीकरणीय ऊर्जा), स्टार्ट-अप एवं रियल एस्टेट क्षेत्रों में बड़े निवेशक बनकर उभरे हैं — भारत सरकार ने भी ऐसे दीर्घकालिक निवेशकों को कर-रियायतें देकर आकर्षित करने की नीति अपनाई है, क्योंकि SWF निवेश आमतौर पर अल्पकालिक "गर्म धन" (Hot Money) की तुलना में कहीं अधिक स्थिर माना जाता है।
⚠️ पूंजी-प्रवाह का दोधारी प्रभाव
सॉवरेन वेल्थ फंड एवं अन्य विदेशी पूंजी-प्रवाह विकासशील देशों के लिए ज़रूरी निवेश लाते हैं, लेकिन "गर्म धन" के अचानक बाहर निकलने (Capital Flight) से मुद्रा-संकट भी पैदा हो सकता है — जैसा 1997 के एशियाई वित्तीय संकट (अध्याय 1, टॉपिक 9) में देखा गया था। इसीलिए केंद्रीय बैंक (जैसे भारतीय रिज़र्व बैंक) पूंजी-प्रवाह पर सतर्क निगरानी रखते हैं।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ सॉवरेन वेल्थ फंड (SWF) ◆ टेमासेक ◆ GIC सिंगापुर ◆ राष्ट्रीय सुरक्षा समीक्षा ◆ कैपिटल फ्लाइट ◆ गर्म धन (Hot Money)
14 वैश्विक आर्थिक शासन में सुधार की मांग — कोटा सुधार, G7 से G20 तक (Demand for Reform in Global Economic Governance)
पृष्ठभूमि — द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक आर्थिक संस्थाएं (IMF, विश्व बैंक) आज भी बड़े पैमाने पर पश्चिमी देशों के प्रभाव में हैं, जबकि विश्व अर्थव्यवस्था में भारत, चीन, ब्राज़ील जैसे उभरते देशों (टॉपिक 8, अध्याय 2) की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है — इस असंतुलन को ठीक करने की मांग दशकों से उठ रही है।
संरचना — G7 से G20 की ओर बदलाव
1970 के दशक में बना "G7" (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, इटली, कनाडा) दशकों तक वैश्विक आर्थिक नीति का मुख्य मंच रहा। लेकिन 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद यह स्पष्ट हो गया कि बिना भारत, चीन, ब्राज़ील जैसे बड़े उभरते बाज़ारों को शामिल किए वैश्विक आर्थिक समस्याओं का समाधान संभव नहीं — इसीलिए "G20" (जिसमें भारत भी संस्थापक सदस्य है) को शिखर-स्तरीय मंच के रूप में स्थापित किया गया, जो आज वैश्विक आर्थिक शासन का सबसे महत्वपूर्ण मंच माना जाता है (विस्तार से अध्याय 14 में)।
| G7 (पुराना पश्चिमी-केंद्रित मंच) | G20 (नया समावेशी मंच) |
|---|
| ✓ सिर्फ धनी पश्चिमी लोकतंत्र शामिल | ✗ विकसित एवं विकासशील दोनों तरह के देश शामिल |
| ✓ विश्व GDP का घटता हिस्सा प्रतिनिधित्व | ✗ विश्व GDP का लगभग 85% प्रतिनिधित्व |
| ✓ शीत युद्ध काल की विरासत | ✗ भारत की G-20 अध्यक्षता (2023) से नई ऊर्जा |
IMF कोटा सुधार की मांग — भारत सहित कई विकासशील देश लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि IMF में कोटा (वोटिंग शक्ति) की समीक्षा वर्तमान आर्थिक हकीकत के अनुरूप की जाए, ताकि चीन, भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को उनके आर्थिक आकार के अनुपात में अधिक वोटिंग शक्ति मिले, न कि 1944 की पुरानी व्यवस्था के अनुसार।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ G7 ◆ G20 ◆ कोटा सुधार ◆ वैश्विक आर्थिक शासन ◆ भारत की G20 अध्यक्षता 2023
15 वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका (India Role in Global Political Economy)
पृष्ठभूमि — 1991 के LPG सुधारों (अध्याय 1) के बाद से भारत वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था में एक हाशिए के खिलाड़ी से एक महत्वपूर्ण एवं मुखर आवाज़ में बदल चुका है।
भारत की भूमिका के प्रमुख आयाम
- डिजिटल सार्वजनिक ढांचे (DPI) का निर्यात — भारत की "एकीकृत भुगतान इंटरफ़ेस" (UPI) प्रणाली को कई देशों (जैसे फ्रांस, सिंगापुर, UAE, श्रीलंका) ने अपनाया या अपनाने में रुचि दिखाई है — G-20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने DPI को वैश्विक दक्षिण के लिए एक "डिजिटल सार्वजनिक वस्तु" के रूप में प्रस्तुत किया, जो पारंपरिक बैंकिंग ढांचे के बिना भी लाखों लोगों को वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) से जोड़ सकता है।
- IMF/विश्व बैंक सुधार की मुखर मांग — भारत लगातार कोटा-सुधार (टॉपिक 14) एवं बहुपक्षीय विकास बैंकों के आधुनिकीकरण (MDB Reform) का समर्थन करता है, ताकि विकासशील देशों को जलवायु-वित्त एवं बुनियादी ढांचे के लिए अधिक सुलभ कर्ज़ मिल सके।
- प्रवासी भारतीयों का प्रेषण (Remittances) — भारत विश्व में सबसे अधिक विदेशी प्रेषण प्राप्त करने वाला देश है (लगभग 120-130 अरब डॉलर वार्षिक), जो भारत के भुगतान-संतुलन (अध्याय 1) को मज़बूत बनाए रखने में एक बड़ी भूमिका निभाता है।
- क्षेत्रीय ऋण-सहायता में भूमिका — जैसा टॉपिक 6 में देखा, भारत ने श्रीलंका के आर्थिक संकट में सबसे बड़े सहायताकर्ता के रूप में उभरकर अपनी "पड़ोसी प्रथम" नीति (अध्याय 17 में विस्तार से) को आर्थिक कूटनीति के ज़रिए साबित किया।
⚠️ चुनौती — वैश्विक अनिश्चितता के बीच संतुलन
भारत को एक साथ कई चुनौतियों का सामना करना है — अमेरिकी शुल्क-नीतियों (अध्याय 1) से निर्यात पर असर, वैश्विक ऋण-संकट में फँसे पड़ोसी देशों को संभालना, तथा साथ ही अपनी खुद की तेज़ आर्थिक वृद्धि बनाए रखना — यह दिखाता है कि वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका अब सिर्फ एक "प्राप्तकर्ता" (Recipient) की नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी की बन चुकी है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ डिजिटल सार्वजनिक ढांचा (DPI) ◆ UPI का वैश्विक विस्तार ◆ IMF कोटा सुधार की मांग ◆ प्रेषण (Remittances) ◆ पड़ोसी प्रथम नीति
📌 अध्याय सार (Chapter Summary)
- 1. वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था को यथार्थवादी, उदारवादी एवं निर्भरता सिद्धांत — तीन दृष्टिकोणों से समझा जाता है, जो मिलकर राजनीति-अर्थव्यवस्था के आपसी संबंध की पूरी तस्वीर बनाते हैं।
- 2. 1944 की ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ने डॉलर को सोने से जोड़ा, परंतु 1971 के निक्सन शॉक ने इसे समाप्त कर तैरती विनिमय दर व्यवस्था एवं पेट्रोडॉलर व्यवस्था को जन्म दिया।
- 3. IMF (अल्पकालिक मौद्रिक स्थिरता) एवं विश्व बैंक (दीर्घकालिक विकास वित्त) दोनों ब्रेटन वुड्स की संतान हैं, लेकिन दोनों की कोटा-आधारित संरचना एवं कठोर शर्तें विकासशील देशों में आलोचना का विषय रही हैं।
- 4. 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट — लेहमैन ब्रदर्स के पतन से शुरू होकर — वैश्विक बैंकिंग नियमन एवं आर्थिक शासन-व्यवस्था (G7 से G20 की ओर बदलाव) में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
- 5. श्रीलंका (2022), ज़ाम्बिया एवं घाना (2022) की सोवरेन ऋण-चूक 2020 के दशक की एक बड़ी वैश्विक ऋण-संकट लहर का हिस्सा हैं, जिसमें चीन जैसे नए बड़े ऋणदाताओं की भूमिका पुनर्गठन को और जटिल बना रही है।
- 6. थॉमस पिकेटी जैसे अर्थशास्त्रियों के अनुसार वैश्वीकरण ने देशों के बीच असमानता घटाई है, परंतु कई देशों के भीतर धन-संकेंद्रण बढ़ाया है — यही विरोधाभास वैश्वीकरण-विरोधी राजनीतिक लहरों की एक बड़ी वजह है।
- 7. कोविड-19 एवं भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक आपूर्ति-शृंखलाओं को रीशोरिंग, फ्रेंड-शोरिंग एवं नियर-शोरिंग की दिशा में पुनर्गठित करने पर मजबूर किया है — भारत इसका एक बड़ा लाभार्थी बनकर उभरा है (अध्याय 2)।
- 8. भारत ने व्यापार-घाटे एवं घरेलू कृषि-चिंताओं के कारण 2019 में RCEP से बाहर होने का फैसला किया, जबकि CPTPP में शामिल होने पर 2025-26 में नए सिरे से विचार जारी है — यह भारत की मेगा-FTA रणनीति की जटिलता दिखाता है।
- 9. प्रतिबंध, SWIFT-बहिष्कार एवं निर्यात-नियंत्रण जैसे "आर्थिक अस्त्र" आज सैन्य बल जितने ही महत्वपूर्ण कूटनीतिक औज़ार बन चुके हैं — चीन के दुर्लभ खनिज-नियंत्रण इसका ताज़ा उदाहरण हैं।
- 10. डेटा आज तेल जितना ही मूल्यवान संसाधन बन चुका है — अमेरिकी, यूरोपीय एवं चीनी डेटा-गवर्नेंस मॉडल के बीच भारत का DPDP Act एक संतुलित मध्यम मार्ग अपनाने का प्रयास है।
- 11. 2021 के OECD वैश्विक न्यूनतम कर समझौते ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कर-बचाव पर लगाम लगाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया, भले ही इसका पूर्ण क्रियान्वयन अभी जटिल एवं अधूरा है।
- 12. सॉवरेन वेल्थ फंड एवं अन्य वैश्विक पूंजी-प्रवाह विकासशील देशों के लिए ज़रूरी निवेश लाते हैं, परंतु "गर्म धन" के अचानक निकलने का जोखिम भी साथ लाते हैं, जैसा 1997 के एशियाई वित्तीय संकट में देखा गया।
- 13. 2008 के बाद G7 से G20 की ओर बदलाव तथा IMF कोटा-सुधार की मांग दिखाती है कि वैश्विक आर्थिक शासन-व्यवस्था में उभरती शक्तियों को उचित प्रतिनिधित्व देने का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
- 14. भारत आज डिजिटल सार्वजनिक ढांचे (UPI) के वैश्विक निर्यात, संस्थागत सुधार की मुखर मांग एवं पड़ोसी देशों (श्रीलंका) की आर्थिक सहायता के ज़रिए वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था में एक ज़िम्मेदार एवं प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है।
- 15. यह अध्याय दिखाता है कि आर्थिक फैसले कभी भी शुद्ध रूप से "आर्थिक" नहीं होते — हर बड़ा वित्तीय निर्णय गहरे राजनीतिक-रणनीतिक निहितार्थ रखता है, जो आगे के अध्यायों (विशेषकर अध्याय 12 — WTO, एवं अध्याय 14 — BRICS-G20) में और विस्तार से देखा जाएगा।