01 प्रश्न 12 अंक
'नैतिक नियतिवाद' (Moral Determinism) स्पष्ट कीजिए।
Explain 'Moral determinism'.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रनैतिक नियतिवादPDF पृष्ठ 1
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सरल अर्थ
नैतिक नियतिवाद का मानना है कि मनुष्य के काम और फैसले पहले से मौजूद कारणों, परिस्थितियों, प्राकृतिक नियमों या ईश्वरीय इच्छा से तय होते हैं।
मुख्य बिंदु
1. पूर्व-निर्धारण — व्यक्ति का काम उसके अतीत और परिस्थितियों का परिणाम माना जाता है।
2. स्वतंत्र इच्छा — इस विचार के अनुसार व्यक्ति पूरी तरह स्वतंत्र होकर विकल्प नहीं चुनता, बल्कि पहले से मौजूद कारणों से प्रभावित होता है।
3. नैतिक जिम्मेदारी — यदि व्यक्ति के पास दूसरा विकल्प चुनने की स्वतंत्रता नहीं है, तो उसे अपने काम के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराने पर प्रश्न उठता है।
याद रखें
इस सिद्धांत का मुख्य सवाल है—क्या मनुष्य स्वतंत्र होकर निर्णय लेता है, या उसके निर्णय पहले से मौजूद कारणों से तय होते हैं?
02 प्रश्न 25 अंक
क्या प्रशासकीय वस्तुनिष्ठता प्रशासनिक सत्यनिष्ठा की पूर्वापेक्षा रखती है?
Does administrative objectivity necessarily presuppose administrative integrity?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रवस्तुनिष्ठता और सत्यनिष्ठाPDF पृष्ठ 1
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सरल अर्थ
वस्तुनिष्ठता का अर्थ है तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लेना। सत्यनिष्ठा का अर्थ है ईमानदार रहना और अपने नैतिक मूल्यों पर टिके रहना।
मुख्य बिंदु
1. आंतरिक चरित्र — सत्यनिष्ठा प्रशासक का आंतरिक गुण है, जबकि वस्तुनिष्ठता उसके निर्णयों में दिखाई देती है।
2. दबाव से बचाव — राजनीतिक दबाव, भाई-भतीजावाद या निजी लाभ के लालच के बावजूद सत्यनिष्ठ प्रशासक निष्पक्ष रहने की कोशिश करता है।
3. तथ्यों का सही उपयोग — सत्यनिष्ठा न हो तो कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए तथ्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत कर सकता है।
4. निर्णयों में निरंतरता — सत्यनिष्ठा प्रशासक को अलग-अलग परिस्थितियों में भी निष्पक्ष बने रहने में मदद करती है।
उदाहरण
भर्ती में अपने परिचित को अनुचित लाभ न देकर सभी अभ्यर्थियों पर समान नियम लागू करना निष्पक्षता और सत्यनिष्ठा का उदाहरण है।
निष्कर्ष
सत्यनिष्ठा निष्पक्ष निर्णय का मजबूत आधार है। जैसे मजबूत नींव भवन को संभालती है, वैसे ही सत्यनिष्ठा निर्णय को दबाव में भी निष्पक्ष बनाए रखने में मदद करती है।
03 प्रश्न 35 अंक
'गहन नैतिकता के अभाव में उच्च नागरिकी संभव नहीं है, चाहे वह इस नाम से न भी जानी जाती हो' — आर.डब्लू. इमर्सन। चर्चा कीजिए।
There can be no high Civility without a deep Morality, though it may not call itself by that name. — R.W. Emerson. Discuss.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रनैतिकता और नागरिकीPDF पृष्ठ 1–2
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सरल अर्थ
आर.डब्लू. इमर्सन का कहना है कि अच्छा व्यवहार केवल शिष्टाचार दिखाने से नहीं आता। उसके पीछे ईमानदारी, सहानुभूति और न्याय जैसे नैतिक मूल्य भी होने चाहिए।
मुख्य बिंदु
1. गहन नैतिकता — व्यक्ति के भीतर मौजूद ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, सहानुभूति और न्यायप्रियता।
2. उच्च नागरिकी — दूसरों के साथ सम्मान से व्यवहार करना और अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझना।
3. व्यवहार और चरित्र — भीतर नैतिक मूल्य न हों, तो बाहर का अच्छा व्यवहार केवल दिखावा बन सकता है।
4. सहज आचरण — जब नैतिक मूल्य स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं, तो व्यक्ति बिना दिखावे के दूसरों का सम्मान करता है।
5. सार्वजनिक हित — अच्छा समाज केवल नियमों के डर से नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और कर्तव्य-बोध से भी चलता है।
उदाहरण
किसी नागरिक से सम्मानपूर्वक बात करना अच्छी नागरिकी है। ऐसा इसलिए करना कि हर व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है, गहरे नैतिक मूल्य को दर्शाता है।
निष्कर्ष
नैतिकता पेड़ की जड़ों की तरह है और अच्छा नागरिक व्यवहार उसके पेड़ की तरह। नैतिक आधार मजबूत होगा, तो व्यवहार भी अच्छा और स्थायी होगा।
04 प्रश्न 42 अंक
संकल्प-स्वातन्त्र्य (Freedom of Will) का अर्थ क्या है?
What is the meaning of 'Freedom of will'?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रसंकल्प-स्वातन्त्र्यPDF पृष्ठ 2
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सरल अर्थ
संकल्प-स्वातन्त्र्य का अर्थ है—बाहरी दबाव या मजबूरी के बिना उपलब्ध विकल्पों में से अपनी इच्छा से चुनाव कर पाने की क्षमता।
मुख्य बिंदु
1. स्वतंत्र चुनाव — व्यक्ति के पास अलग-अलग विकल्प हों और वह उनमें से किसी एक को चुन सके।
2. दबाव का अभाव — निर्णय बाहरी दबाव या अनिवार्य आंतरिक आवेग से मजबूर होकर न लिया गया हो।
3. नैतिक जिम्मेदारी — किसी व्यक्ति को उसके काम के लिए जिम्मेदार ठहराते समय यह देखना महत्वपूर्ण है कि वह काम करने या न करने के लिए कितना स्वतंत्र था।
निष्कर्ष
स्वतंत्र चुनाव करने की क्षमता और नैतिक उत्तरदायित्व का आपस में गहरा संबंध है।
05 प्रश्न 55 अंक
'नीतिशास्त्र विविध आयामों से युक्त एक संवृत्ति है।' टिप्पणी करें।
Ethics is a phenomenon with divergent dimensions. Comment.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रनीतिशास्त्र के आयामPDF पृष्ठ 2
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सरल अर्थ
नीतिशास्त्र (Ethics) वह अध्ययन है जो सही-गलत, उचित-अनुचित और कर्तव्य-अकर्तव्य को समझने में मदद करता है। इसके कई आयाम हैं, क्योंकि नैतिकता को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखा जाता है।
मुख्य बिंदु — नीतिशास्त्र के चार आयाम
1. मानक नीतिशास्त्र (Normative Ethics) — बताता है कि हमें क्या करना चाहिए। उपयोगितावाद और कर्तव्यवाद इसके उदाहरण हैं।
2. अधि-नीतिशास्त्र (Meta-ethics) — 'शुभ', 'सत्य' और 'सही' जैसे नैतिक शब्दों के अर्थ तथा नैतिक निर्णयों के आधार को समझता है।
3. अनुप्रयुक्त नीतिशास्त्र (Applied Ethics) — वास्तविक समस्याओं में नैतिक सिद्धांतों का उपयोग करता है; जैसे जैव-नीतिशास्त्र, व्यावसायिक नीतिशास्त्र और पर्यावरणीय नीतिशास्त्र।
4. वर्णनात्मक नीतिशास्त्र (Descriptive Ethics) — अध्ययन करता है कि किसी समाज में वास्तव में कौन-से नैतिक मूल्य और व्यवहार प्रचलित हैं।
याद रखने की सरल विधि
मानक — क्या करना चाहिए?
अधि-नीतिशास्त्र — नैतिक शब्दों और विचारों का अर्थ क्या है?
अनुप्रयुक्त — सिद्धांत को व्यवहार में कैसे लागू करें?
वर्णनात्मक — समाज में वास्तव में क्या हो रहा है?
निष्कर्ष
ये चारों आयाम नैतिकता को समझने और जीवन की अलग-अलग परिस्थितियों में उसका उपयोग करने में मदद करते हैं।
06 प्रश्न 62 अंक
'सम्यक चरित्र' स्पष्ट कीजिए।
Explain 'Samyak charitra'.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रसम्यक चरित्रPDF पृष्ठ 3
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जैन धर्म के तीन रत्नों में 'सम्यक चरित्र' तीसरा रत्न है। इसका अर्थ है सही ज्ञान को व्यवहार में उतारना और अहितकर कामों से दूर रहना।
मुख्य बिंदु
1. सही आचरण — केवल सही बात जानना पर्याप्त नहीं; उसे जीवन में अपनाना भी जरूरी है।
2. पंच महाव्रत — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का पालन करना।
3. इंद्रिय-निग्रह — अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना।
4. आध्यात्मिक महत्व — सम्यक चरित्र नए कर्मों के बंधन से बचने और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करता है।
याद रखें
सही ज्ञान को सही आचरण में बदलना ही सम्यक चरित्र का सार है।
07 प्रश्न 72 अंक
'दुःख-निरोध-मार्ग' क्या है?
What is 'Dukh - Nirodh - Marga'?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रदुःख-निरोध-मार्गPDF पृष्ठ 3
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बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्यों में 'दुःख-निरोध-मार्ग' चौथा और अंतिम सत्य है। यह बताता है कि दुःख को समाप्त करने के लिए किस मार्ग पर चलना चाहिए।
मुख्य बिंदु — आर्य अष्टांगिक मार्ग
1. सम्यक दृष्टि — सही दृष्टिकोण।
2. सम्यक संकल्प — सही और कल्याणकारी विचार।
3. सम्यक वाक् — सही वाणी।
4. सम्यक कर्मान्त — सही आचरण।
5. सम्यक आजीव — उचित आजीविका।
6. सम्यक व्यायाम — सही दिशा में प्रयास करना।
7. सम्यक स्मृति — सजग रहना।
8. सम्यक समाधि — मन को एकाग्र करना।
निष्कर्ष
बौद्ध दर्शन के अनुसार अष्टांगिक मार्ग का अभ्यास दुःख से मुक्ति और निर्वाण की दिशा में ले जाता है।
08 प्रश्न 85 अंक
रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार, 'मानव का आधिक्य' (Surplus in man) क्या है?
What is 'Surplus in man' according to Tagore?
प्रशासकीय नीतिशास्त्ररवीन्द्रनाथ टैगोर — मानव का आधिक्यPDF पृष्ठ 3
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रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार, मनुष्य की सारी ऊर्जा केवल भोजन, नींद और सुरक्षा जैसी मूल जरूरतें पूरी करने में ही खर्च नहीं होती। इन जरूरतों से आगे बची क्षमता को उन्होंने 'मानव का आधिक्य' (Surplus in man) कहा।
मुख्य बिंदु
1. जरूरतों से आगे — मूल जैविक जरूरतें पूरी होने के बाद भी मनुष्य में क्षमता और ऊर्जा शेष रहती है।
2. रचनात्मकता — इस अतिरिक्त क्षमता से कला, साहित्य, संगीत और नई रचनाओं को बढ़ावा मिलता है।
3. आत्म-अभिव्यक्ति — मनुष्य प्रेम, नैतिकता और सौंदर्य के माध्यम से अपने व्यक्तित्व को व्यक्त करता है।
4. आध्यात्मिक विकास — टैगोर के विचार में यह क्षमता मनुष्य को केवल भौतिक जरूरतों से ऊपर उठाकर व्यापक मानवीय और आध्यात्मिक चेतना की ओर ले जाती है।
उदाहरण
जब कोई व्यक्ति केवल अपनी जरूरत पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि कला, प्रेम या समाज के हित में कुछ रचता है, तो यह मूल जरूरतों से आगे की मानवीय क्षमता को दर्शाता है।
निष्कर्ष
'मानव का आधिक्य' मनुष्य की अतिरिक्त रचनात्मक, नैतिक और आध्यात्मिक क्षमता को दर्शाता है।
09 प्रश्न 92 अंक
बौद्ध मत में 'उपाय-कौशल' (Upaya Kaushalya) का अभिप्राय क्या है?
What is meant by 'Upaya Kaushalya' in Buddhism?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रबौद्ध मत — उपाय-कौशलPDF पृष्ठ 3–4
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सरल अर्थ
'उपाय-कौशल' (Upaya Kaushalya) का अर्थ है सीखने वाले की समझ और स्तर के अनुसार बात समझाने का उपयुक्त तरीका चुनना।
मुख्य बिंदु
1. अर्थ — कुशल साधन या सही उपाय।
2. किसके द्वारा — बौद्ध परंपरा में बुद्ध या बोधिसत्व शिक्षार्थियों के स्तर के अनुसार शिक्षा समझाते हैं।
3. तरीका — सभी को एक ही तरीके से समझाने के बजाय उनकी मानसिक और बौद्धिक क्षमता के अनुसार शिक्षण करना।
4. उद्देश्य — व्यक्ति को अज्ञान से बाहर निकालना और धीरे-धीरे सत्य की बेहतर समझ तथा निर्वाण की दिशा में आगे बढ़ाना।
उदाहरण
किसी शुरुआती विद्यार्थी को कठिन विचार सरल उदाहरण से और अधिक समझ रखने वाले विद्यार्थी को विस्तार से समझाना, इस अवधारणा को समझने का एक तरीका है।
निष्कर्ष
उपाय-कौशल का मूल संदेश है कि शिक्षा का तरीका सीखने वाले की समझ के अनुरूप होना चाहिए।
10 प्रश्न 105 अंक
'दिव्य जीवन' (Life Divine) से अरविन्द का क्या आशय है?
What does Aurobindo mean by Life Divine?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रश्री अरविन्द — दिव्य जीवनPDF पृष्ठ 3–4
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सरल अर्थ
श्री अरविन्द के अनुसार, 'दिव्य जीवन' वह अवस्था है जिसमें मनुष्य की चेतना और जीवन आध्यात्मिक रूप से विकसित होते हैं। यह केवल संसार छोड़कर व्यक्तिगत मुक्ति पाने की बात नहीं, बल्कि धरती पर जीवन और मानवता के रूपांतरण का विचार भी है।
मुख्य बिंदु
1. चेतना का रूपांतरण — मनुष्य का विकास सत्-चित्-आनंद की आध्यात्मिक अवस्था की ओर होना।
2. अतिमानस (Supermind) — अरविन्द के दर्शन में यह उच्चतर चेतना या शक्ति है, जो मन, प्राण और शरीर के रूपांतरण से जुड़ी है।
3. पूर्ण योग (Integral Yoga) — अरविन्द ने जड़ (Matter) और चेतन (Spirit) के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए पूर्ण योग का मार्ग बताया।
4. दिव्य समाज की कल्पना — इस रूपांतरण से ऐसी अवस्था की कल्पना की गई है जहाँ अज्ञान कम हो और पृथ्वी पर दिव्य जीवन या आदर्श समाज स्थापित हो।
निष्कर्ष
अरविन्द का 'दिव्य जीवन' केवल व्यक्तिगत मोक्ष नहीं है; यह मनुष्य और व्यापक जीवन के आध्यात्मिक रूपांतरण का आदर्श है।
11 प्रश्न 112 अंक
'अहिंसा परमो धर्म:' का अर्थ क्या है?
What is meant by 'Ahimsa Parmo Dharma'?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रअहिंसा परमो धर्मPDF पृष्ठ 4
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सरल अर्थ
‘अहिंसा परमो धर्मः’ का अर्थ है—अहिंसा मनुष्य का सर्वोच्च धर्म या कर्तव्य है।
मुख्य बिंदु
1. शारीरिक हिंसा से बचना — किसी जीव को जान-बूझकर चोट या कष्ट न पहुँचाना।
2. मन, वचन और कर्म — मन में द्वेष न रखना, कटु वचन न बोलना और व्यवहार से किसी को हानि न पहुँचाना।
3. सकारात्मक पक्ष — सभी जीवों के प्रति प्रेम, करुणा और सहानुभूति रखना।
निष्कर्ष
अहिंसा केवल हिंसा का अभाव नहीं, बल्कि सभी के कल्याण और सम्मान की भावना है।
12 प्रश्न 122 अंक
'पुरुषार्थ' शब्द का अर्थ बताइए।
State the meaning of the term 'Purushartha'.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रपुरुषार्थ चतुष्टयPDF पृष्ठ 4
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सरल अर्थ
‘पुरुषार्थ’ का अर्थ है मानव जीवन के उद्देश्य या वे लक्ष्य जिनके लिए मनुष्य प्रयास करता है।
मुख्य बिंदु
1. धर्म — नैतिकता, कर्तव्य और सदाचार।
2. अर्थ — आजीविका, धन और आवश्यक संसाधन प्राप्त करना।
3. काम — उचित इच्छाओं की पूर्ति और सुख।
4. मोक्ष — जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति तथा आध्यात्मिक पूर्णता।
निष्कर्ष
पुरुषार्थ चतुष्टय भौतिक जीवन और नैतिक-आध्यात्मिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करता है।
13 प्रश्न 132 अंक
बुद्ध की कौन सी शिक्षा आज सर्वाधिक प्रासंगिक है और क्यों?
What teachings of Buddha are most relevant today and why?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रबुद्ध का मध्यम मार्गPDF पृष्ठ 5
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भगवान बुद्ध का ‘मध्यम मार्ग’ आज भी प्रासंगिक है। यह जीवन में अतिवाद और अति से बचकर संतुलन अपनाने की शिक्षा देता है।
मुख्य बिंदु
1. सामाजिक संदर्भ — धार्मिक और राजनीतिक कट्टरता को कम कर सहिष्णुता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देता है।
2. व्यक्तिगत संदर्भ — अत्यधिक उपभोग, तनाव और इच्छाओं के बीच संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
3. निर्णय क्षमता — संतुलित दृष्टिकोण व्यक्ति को जल्दबाजी के बजाय विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सहायता करता है।
निष्कर्ष
मध्यम मार्ग व्यक्ति को मानसिक शांति और समाज को समरसता की दिशा देता है।
14 प्रश्न 1410 अंक
लोकनायकों व सुधारकों के उपदेश कभी भी पुराने नहीं होते हैं। आधुनिक संदर्भ में उनकी महत्ता को उजागर कीजिए।
Teachings of leaders and reformers never grow old. Bring out their significance in modern context.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रलोकनायकों और सुधारकों की प्रासंगिकताPDF पृष्ठ 5–6
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लोकनायकों और समाज-सुधारकों के विचार सत्य, करुणा, न्याय, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्यों पर आधारित होते हैं। परिस्थितियाँ और तकनीक बदल सकती हैं, लेकिन समाज की अनेक नैतिक चुनौतियाँ बनी रहती हैं; इसलिए उनके संदेश आज भी मार्गदर्शन देते हैं।
मुख्य बिंदु
1. सामाजिक न्याय — ज्योतिबा फुले और डॉ. बी.आर. आंबेडकर के समानता तथा मानवीय गरिमा के विचार जातिगत और लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध प्रेरणा देते हैं।
2. सांप्रदायिक सद्भाव — कबीर और गुरु नानक की मानवतावादी शिक्षाएँ बाहरी आडंबर से ऊपर उठकर सहिष्णुता और भाईचारे को बढ़ावा देती हैं।
3. चरित्र निर्माण — स्वामी विवेकानंद के आत्म-संयम और चरित्र-निर्माण के विचार युवाओं को नैतिक दिशा देते हैं।
4. शांति और अहिंसा — बुद्ध और गांधी के विचार संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान और हृदय-परिवर्तन में उपयोगी हैं।
5. पर्यावरण नैतिकता — गांधी का आवश्यकताओं और लालच के बीच अंतर का विचार संसाधनों के संयमित उपयोग तथा सतत विकास का समर्थन करता है।
6. सादा जीवन — संतोष और अपरिग्रह का संदेश अत्यधिक उपभोग तथा उससे पैदा होने वाले तनाव को कम करने की सीख देता है।
7. प्रशासनिक उपयोगिता — सुधारकों के न्याय, सत्यनिष्ठा और सेवा के विचार लोक सेवकों को निष्पक्ष तथा जन-केंद्रित निर्णय लेने में मदद करते हैं।
उदाहरण
किसी प्रशासनिक अधिकारी द्वारा जाति या आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर पात्र व्यक्ति को सेवा देना समानता और मानवीय गरिमा के विचार का व्यावहारिक रूप है।
निष्कर्ष
लोकनायकों की शिक्षाएँ केवल इतिहास का हिस्सा नहीं हैं। अन्याय, हिंसा, असमानता और पर्यावरणीय संकट जैसी चुनौतियों के रहते उनके विचार समाज और प्रशासन के लिए मार्गदर्शक बने रहते हैं।
15 प्रश्न 155 अंक
औपचारिक शिक्षा अथवा सामाजिक अन्तर्निवेशन: उक्त दोनों में से उत्तम प्रशासन के लिए क्या अधिक महत्वपूर्ण है?
Formal education or social inculcation: Which of the above two is more important in creation of a good administration?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रऔपचारिक शिक्षा और सामाजिक अन्तर्निवेशनPDF पृष्ठ 5–6
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औपचारिक शिक्षा प्रशासक को ज्ञान, कानून और कार्य-कौशल देती है, जबकि सामाजिक अन्तर्निवेशन उसे नैतिक मूल्य, सहानुभूति और संवेदनशीलता सिखाता है।
मुख्य बिंदु
1. औपचारिक शिक्षा — नियमों, अधिनियमों, प्रक्रियाओं और तकनीकी समस्याओं की समझ विकसित करती है।
2. सामाजिक अन्तर्निवेशन — ईमानदारी, सहानुभूति, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और जनसेवा की भावना पैदा करता है।
3. कार्यक्षमता और लोक-कल्याण — शिक्षा अधिकारी को सक्षम बनाती है; सामाजिक मूल्य उसे अपनी क्षमता का उपयोग जनहित में करना सिखाते हैं।
4. कानून और नैतिकता — नियमों का ज्ञान आवश्यक है, पर नैतिकता के बिना प्रशासन यांत्रिक या असंवेदनशील बन सकता है।
5. नेतृत्व — जनता की समस्याओं को समझना और टीम के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना दोनों से विकसित होता है।
निष्कर्ष
उत्तम प्रशासन के लिए दोनों का समन्वय आवश्यक है। औपचारिक शिक्षा प्रशासन को ‘मस्तिष्क’ देती है और सामाजिक अन्तर्निवेशन उसे ‘हृदय’ देता है।
16 प्रश्न 165 अंक
परिवार मनुष्य के नैतिक विकास की सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
Family is the most important institution for the moral development of man. Evaluate this statement.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रपरिवार और नैतिक विकासPDF पृष्ठ 6–7
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
परिवार व्यक्ति की पहली पाठशाला है। यहीं से वह सही-गलत का प्रारंभिक ज्ञान और व्यवहार के आदर्श सीखता है।
मुख्य बिंदु
1. प्राथमिक समाजीकरण — बच्चा परिवार में अनुशासन, सम्मान और व्यवहार के प्रारंभिक नियम सीखता है।
2. मूल्यों का विकास — प्रेम, त्याग, सहिष्णुता, ईमानदारी और बड़ों के सम्मान जैसे मूल्य परिवार में विकसित होते हैं।
3. अनुकरण — बच्चे माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के आचरण से सीखते हैं।
4. नैतिक दिशा-सूचक — परिवार में विकसित मूल्य आगे चलकर कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने में मदद करते हैं।
5. समीक्षा — विद्यालय, मित्र समूह और समाज भी महत्त्वपूर्ण हैं; अतः नैतिक विकास की पूरी जिम्मेदारी केवल परिवार की नहीं है।
निष्कर्ष
परिवार नैतिक विकास की आधारशिला है। स्वस्थ और मूल्यपरक परिवार समाज के नैतिक निर्माण में बड़ा योगदान देता है, जबकि विद्यालय और समाज इन मूल्यों को आगे मजबूत करते हैं।
17 प्रश्न 175 अंक
'मनुष्य की नैतिक उन्नति समाज की सर्वांगीण उन्नति पर निर्भर करती है।' विवेचना कीजिए।
Men's moral advancement depends upon the complete advancement of society. Discuss.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रसमाज की उन्नति और नैतिक विकासPDF पृष्ठ 6–7
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसके नैतिक मूल्य सामाजिक वातावरण से बनते हैं, इसलिए समाज की समग्र स्थिति उसके नैतिक विकास को प्रभावित करती है।
मुख्य बिंदु
1. न्यायपूर्ण वातावरण — जहाँ समानता, न्याय और बंधुत्व हों, वहाँ ईमानदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा मिलता है।
2. आर्थिक सुरक्षा — बुनियादी जरूरतें पूरी होने और असमानता घटने से अभावजनित अनैतिक व्यवहार का दबाव कम हो सकता है।
3. शिक्षा — शिक्षा सही-गलत में अंतर, तार्किक सोच और व्यापक सामाजिक हित की समझ विकसित करती है।
4. विधि का शासन — निष्पक्ष कानून और जवाबदेही नैतिक आचरण को संरक्षण देते हैं।
5. परस्पर संबंध — नैतिक व्यक्ति समाज को बेहतर बनाते हैं और बेहतर सामाजिक संस्थाएँ व्यक्ति के नैतिक विकास को सहारा देती हैं।
निष्कर्ष
व्यक्ति और समाज एक-दूसरे के पूरक हैं। सामाजिक, आर्थिक और कानूनी प्रगति नैतिक उन्नति के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है।
18 प्रश्न 185 अंक
मानवीय मूल्यों के संवर्द्धन में समाज की भूमिका समझाइए।
Explain the role of society in inculcating human values.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रमानवीय मूल्यों में समाज की भूमिकाPDF पृष्ठ 7
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
समाज एक ऐसी पाठशाला है जहाँ व्यक्ति लोगों के साथ रहते हुए नैतिक नियम, व्यवहार और मानवीय मूल्य सीखता है।
मुख्य बिंदु
1. मित्र समूह — सहयोग, निष्पक्षता, सहिष्णुता और टीम भावना विकसित करता है।
2. शिक्षण संस्थान — अनुशासन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, समानता और सामाजिक जिम्मेदारी को मजबूत करते हैं।
3. सांस्कृतिक और धार्मिक समुदाय — करुणा, दान, सेवा तथा पारस्परिक सम्मान जैसे मूल्य सिखा सकते हैं।
4. मीडिया और पड़ोस — सामाजिक समस्याओं पर जागरूकता तथा परस्पर सहायता को बढ़ावा देते हैं।
5. समाजीकरण — परंपराओं, रीति-रिवाजों और मान्यताओं के माध्यम से व्यक्ति सामाजिक जीवन के नियम सीखता है।
6. प्रोत्साहन और आलोचना — अच्छे आचरण को सम्मान तथा हानिकारक आचरण की आलोचना समाज के व्यवहार को प्रभावित करती है।
निष्कर्ष
समाज व्यक्ति को मूल्य सीखने और उनका अभ्यास करने का अवसर देता है। सकारात्मक सामाजिक वातावरण मानवीय चरित्र को मजबूत करता है।
19 प्रश्न 195 अंक
समसामयिक समाज ऋण की वैदिक अवधारणा से किस प्रकार लाभान्वित हो सकता है?
How can contemporary society benefit from Vedic idea of 'Rina'?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रवैदिक ऋण की आधुनिक प्रासंगिकताPDF पृष्ठ 7–8
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सरल अर्थ
वैदिक ‘ऋण’ का आशय केवल धन के कर्ज से नहीं, बल्कि प्रकृति, ज्ञान-परंपरा और पूर्वजों के प्रति नैतिक दायित्व से है।
मुख्य बिंदु
1. देव ऋण — प्रकृति और जीवन-व्यवस्था के प्रति कृतज्ञता। आज यह पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की प्रेरणा देता है।
2. ऋषि ऋण — शिक्षकों, ज्ञान और संस्कृति से मिले योगदान के प्रति आभार। ज्ञान का प्रसार और अगली पीढ़ी को शिक्षित करना इसका आधुनिक रूप है।
3. पितृ ऋण — माता-पिता और पूर्वजों के प्रति सम्मान तथा पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह।
4. कर्तव्य-बोध — यह अवधारणा केवल अधिकार माँगने के बजाय समाज और प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों को पहचानने की प्रेरणा देती है।
5. सामूहिक कल्याण — व्यक्ति को निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और व्यापक जीवन-व्यवस्था के हित के लिए कार्य करना सिखाती है।
निष्कर्ष
ऋण की अवधारणा कृतज्ञता, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व को मजबूत करके संतुलित तथा संवेदनशील समाज के निर्माण में सहायक हो सकती है।
20 प्रश्न 202 अंक
प्रशासनिक जीवन में 'ऋण' के नैतिक आदर्श की प्रासंगिकता को स्पष्ट कीजिए।
Explain the relevance of the ethical idea of 'Rina' in administrative life.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रप्रशासन में ऋण का नैतिक आदर्शPDF पृष्ठ 8
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सरल अर्थ
प्रशासनिक जीवन में ‘ऋण’ का नैतिक आदर्श यह याद दिलाता है कि प्रशासक समाज, राष्ट्र और प्रकृति के प्रति दायित्व रखता है।
मुख्य बिंदु
1. लोक सेवा — जनता से प्राप्त अधिकारों और संसाधनों का उपयोग जनहित में करना।
2. जवाबदेही — स्वयं को जनता के प्रति उत्तरदायी मानकर निर्णयों की जिम्मेदारी लेना।
3. सामाजिक न्याय — कमजोर और वंचित वर्गों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील रहना।
निष्कर्ष
‘ऋण’ का भाव प्रशासक को निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर कर्तव्यनिष्ठ और जन-केंद्रित बनाता है।
21 प्रश्न 212 अंक
किस प्रकार 'ऋत' की धारणा प्रशासनिक उत्कृष्टता को संवर्धित करती है?
How does the concept of 'RIT' enhance administrative excellence?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रऋत और प्रशासनिक उत्कृष्टताPDF पृष्ठ 8–9
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सरल अर्थ
‘ऋत’ भारतीय दर्शन की वह धारणा है जो सत्य, व्यवस्था, संतुलन और नैतिक नियमबद्धता को दर्शाती है।
मुख्य बिंदु
1. सत्यनिष्ठा — प्रशासक को निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर सत्य और नैतिक मूल्यों के अनुसार काम करने की प्रेरणा।
2. संतुलन — विभिन्न हितों और संसाधनों के बीच न्यायपूर्ण संतुलन स्थापित करना।
3. नियमबद्धता — पारदर्शी और स्थिर नियमों के अनुसार निर्णय लेना, जिससे प्रशासन में निरंतरता और भरोसा बढ़े।
निष्कर्ष
ऋत की भावना नैतिक सुदृढ़ता, निष्पक्षता और नियम-आधारित प्रशासन को प्रोत्साहित करती है।
22 प्रश्न 225 अंक
भारतीय परम्परा में 'ऋण' की अवधारणा पर प्रकाश डालिए।
Throw light on the concept of 'Rina' in Indian tradition.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रभारतीय परंपरा में ऋणPDF पृष्ठ 9
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सरल अर्थ
भारतीय परंपरा में ‘ऋण’ व्यक्ति के उन नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक दायित्वों को बताता है जो उसे प्रकृति, ज्ञान-परंपरा तथा पूर्वजों से प्राप्त जीवन के कारण निभाने होते हैं।
मुख्य बिंदु
1. देव ऋण — प्रकृति और जीवन को बनाए रखने वाली शक्तियों के प्रति कृतज्ञता; परंपरा में यज्ञ तथा प्रकृति-संरक्षण से इसे जोड़ा जाता है।
2. ऋषि ऋण — ऋषियों, गुरुओं और ज्ञान-परंपरा के प्रति दायित्व; अध्ययन, ज्ञान का प्रसार और अनुशासित जीवन इसके रूप माने गए हैं।
3. पितृ ऋण — माता-पिता और पूर्वजों के प्रति सम्मान, परिवार की देखभाल और परंपरा के प्रति जिम्मेदारी।
4. नैतिक प्रभाव — यह व्यक्ति में विनम्रता और यह बोध पैदा करता है कि उसका जीवन केवल निजी प्रयास का परिणाम नहीं है।
5. कर्तव्य पर बल — व्यक्ति को अधिकारों के साथ अपने सामाजिक दायित्व भी पहचानने चाहिए।
निष्कर्ष
ऋण की अवधारणा व्यक्ति को समाज और सृष्टि से जोड़ती है तथा कृतज्ञता, जिम्मेदारी और सामूहिक कल्याण की भावना को मजबूत करती है।
23 प्रश्न 232 अंक
सद्गुण को माध्य (Virtue as a mean) के रूप में स्पष्ट कीजिए।
Explain Virtue as a mean.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रसद्गुण का माध्य सिद्धांतPDF पृष्ठ 9
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सरल अर्थ
अरस्तू के अनुसार सद्गुण वह संतुलित स्थिति है जो किसी गुण की अति और कमी के बीच विवेक के आधार पर चुनी जाती है। इसे ‘स्वर्ण माध्य’ (Golden Mean) कहते हैं।
मुख्य बिंदु
1. अल्पता — किसी भावना या व्यवहार की आवश्यकता से कम मात्रा।
2. अति — उसी भावना या व्यवहार की अत्यधिक मात्रा।
3. संतुलन — उचित परिस्थिति में सही मात्रा और सही ढंग अपनाना।
उदाहरण
साहस, कायरता (कमी) और दुस्साहस (अति) के बीच संतुलित गुण है। मितव्ययिता, कंजूसी और फिजूलखर्ची के बीच संतुलन का उदाहरण है।
निष्कर्ष
सद्गुण का माध्य गणितीय औसत नहीं, बल्कि परिस्थिति के अनुरूप विवेकपूर्ण संतुलन है।
24 प्रश्न 2410 अंक
'शुभ' का अर्थ क्या है? आपका शुभ-विषयक विचार एक उत्तम प्रशासन की संरचना में किस प्रकार सहायक होगा?
What is the meaning of 'Good'? How shall your idea of Good help structure a good administration?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रशुभ और उत्तम प्रशासनPDF पृष्ठ 9–10
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
नीतिशास्त्र में ‘शुभ’ वह है जिसे नैतिक रूप से उचित, न्यायपूर्ण और मानव जीवन तथा समाज के लिए कल्याणकारी माना जाता है। प्रशासन में इसका व्यावहारिक अर्थ लोक-हित है।
मुख्य बिंदु
1. नैतिक आदर्श — शुभ का संबंध सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, साहस और न्याय जैसे सद्गुणों से है।
2. सामाजिक कल्याण — भारतीय विचार में ‘बहुजन सुखाय, बहुजन हिताय’ व्यापक समाज के हित पर बल देता है।
3. साधन और साध्य — केवल लक्ष्य अच्छा होना पर्याप्त नहीं; उसे प्राप्त करने के साधन भी नैतिक होने चाहिए।
4. पारदर्शिता — निर्णय और सूचना नागरिकों के लिए सुलभ हों; इससे भ्रष्टाचार घटाने और विश्वास बढ़ाने में सहायता मिलती है।
5. अंत्योदय — नीतियों में सबसे कमजोर और वंचित व्यक्ति की जरूरतों को प्राथमिकता देना।
6. जवाबदेही — प्रशासक अपने निर्णयों और संसाधनों के उपयोग के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी हो।
7. दक्ष सेवा-वितरण — संसाधनों का उचित उपयोग, सरल प्रक्रियाएँ और ई-गवर्नेंस नागरिकों तक सेवाएँ पहुँचाने में सहायक हैं।
8. निष्पक्षता — जाति, लिंग, धर्म या निजी संबंधों के आधार पर भेदभाव से बचना।
9. सत्यनिष्ठा — अनैतिक लाभ और भ्रष्टाचार से दूर रहकर विवेक एवं नियमों के आधार पर कार्य करना।
उदाहरण
यदि कोई योजना बनाते समय अधिकारी केवल औसत लाभ के बजाय दूरस्थ और वंचित नागरिकों की पहुँच भी सुनिश्चित करता है, तो वह लोक-कल्याण को प्राथमिकता देता है।
निष्कर्ष
‘शुभ’ प्रशासन को केवल नियम लागू करने वाली व्यवस्था के बजाय नैतिक, जवाबदेह और जन-केंद्रित संस्था बनाता है।
25 प्रश्न 255 अंक
कांत किस प्रकार सापेक्ष एवं निरपेक्ष आदेश के आधार पर अंतिम शुभ की व्याख्या करता है? समझाइए।
Explain Kant's ultimate good on the basis of relative and categorical imperative.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रकांट — सापेक्ष और निरपेक्ष आदेशPDF पृष्ठ 10–11
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सरल अर्थ
कांट ने नैतिकता को कर्तव्य और विवेक से जोड़ा। उन्होंने सापेक्ष आदेश और निरपेक्ष आदेश में अंतर किया तथा ‘अंतिम शुभ’ को सद्गुण और सुख के समन्वय के रूप में समझाया।
मुख्य बिंदु
1. सापेक्ष आदेश (Hypothetical Imperative) — किसी लक्ष्य को पाने की शर्त पर दिया गया निर्देश; जैसे सम्मान चाहिए तो सत्य बोलो। यह इच्छा या लक्ष्य पर निर्भर है।
2. निरपेक्ष आदेश (Categorical Imperative) — बिना शर्त नैतिक कर्तव्य; इसका पालन पुरस्कार या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि कर्तव्य के कारण होता है।
3. सद्इच्छा — कांट के अनुसार कर्तव्य-बोध से प्रेरित शुभ संकल्प नैतिकता का आधार है।
4. सर्वोच्च शुभ — सद्गुण या नैतिक आचरण।
5. अंतिम शुभ (Summum Bonum) — सद्गुण के साथ उसके अनुरूप सुख का मेल। सद्गुणी व्यक्ति सुख का पात्र है।
निष्कर्ष
कांट के अनुसार नैतिक आचरण का आधार कर्तव्य होना चाहिए; अंतिम शुभ सद्गुण और सुख के उचित समन्वय में है।
26 प्रश्न 265 अंक
'शुभ संकल्प' (Good will) पर कांट के दृष्टिकोण को लिखिए।
Write the view of Kant on 'Good will'.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रकांट — शुभ संकल्पPDF पृष्ठ 11
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सरल अर्थ
कांट के अनुसार शुभ संकल्प (Good Will) वह इच्छा है जो कर्तव्य और नैतिक नियम के सम्मान से प्रेरित हो। यह अपने आप में शुभ है, केवल अच्छे परिणाम के कारण शुभ नहीं कहलाता।
मुख्य बिंदु
1. निरपेक्ष शुभ — शुभ संकल्प बिना किसी शर्त के शुभ है; उसकी अच्छाई बाहरी लाभ पर निर्भर नहीं करती।
2. अन्य गुणों से संबंध — बुद्धि, साहस, धन या शक्ति का उपयोग गलत उद्देश्य के लिए हो सकता है; शुभ संकल्प इन गुणों को नैतिक दिशा देता है।
3. कर्तव्य-बोध — नैतिक कार्य पुरस्कार, भय या निजी लाभ के बजाय कर्तव्य के लिए किया जाता है।
4. परिणाम से स्वतंत्रता — शुभ संकल्प से किया कार्य परिस्थिति के कारण सफल न हो, फिर भी उसकी नैतिक गुणवत्ता समाप्त नहीं होती।
उदाहरण
अधिकारी द्वारा रिश्वत के अवसर को ठुकराकर नियम के अनुसार निर्णय लेना शुभ संकल्प का उदाहरण है, चाहे उससे उसे कोई व्यक्तिगत लाभ न मिले।
निष्कर्ष
कांट के दर्शन में शुभ संकल्प नैतिकता की आधारशिला है।
27 प्रश्न 272 अंक
'प्रकृतिवादी तर्क दोष' (Naturalistic Fallacy) की अवधारणा क्या है?
What is the concept of 'Naturalistic Fallacy'?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रप्रकृतिवादी तर्क दोषPDF पृष्ठ 11
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सरल अर्थ
दार्शनिक जी.ई. मूर के अनुसार, ‘शुभ’ को किसी प्राकृतिक गुण—जैसे सुख, इच्छा या विकास—से पूरी तरह परिभाषित करने का प्रयास ‘प्रकृतिवादी तर्क दोष’ कहलाता है।
मुख्य बिंदु
1. शुभ की प्रकृति — मूर के अनुसार ‘शुभ’ एक सरल नैतिक गुण है, जिसे किसी एक प्राकृतिक तथ्य में समेटा नहीं जा सकता।
2. ‘है’ और ‘चाहिए’ — तथ्य यह बताते हैं कि क्या है; नैतिक मूल्य यह पूछते हैं कि क्या उचित होना चाहिए।
3. तर्क की समस्या — केवल प्राकृतिक तथ्य से अपने-आप नैतिक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
निष्कर्ष
प्राकृतिक स्थिति का वर्णन और नैतिक रूप से उचित होने का निर्णय अलग-अलग प्रश्न हैं।
28 प्रश्न 282 अंक
प्रशासनिक कर्तव्य के निर्वहन में 'स्थितप्रज्ञ' की संकल्पना की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
Explain the role of the concept of 'sthit pragya' in the discharge of administrative responsibility.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रस्थितप्रज्ञ और प्रशासनPDF पृष्ठ 11
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सरल अर्थ
स्थितप्रज्ञ वह व्यक्ति है जिसकी बुद्धि स्थिर रहती है और जो सुख-दुख, लाभ-हानि तथा सफलता-विफलता में संतुलन बनाए रखता है।
मुख्य बिंदु
1. निष्पक्षता — निजी पसंद, द्वेष और पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर निर्णय लेना।
2. संकट प्रबंधन — दबावपूर्ण परिस्थितियों में धैर्य रखकर विवेकपूर्ण निर्णय करना।
3. नैतिक स्थिरता — प्रशासनिक दुविधा में भावनाओं या प्रलोभन के बजाय कर्तव्य को प्राथमिकता देना।
निष्कर्ष
स्थितप्रज्ञता प्रशासक को मानसिक संतुलन, निष्पक्षता और नैतिक दृढ़ता प्रदान करती है।
29 प्रश्न 292 अंक
भगवद् गीता का 'अनासक्ति सिद्धांत' किस प्रकार किसी प्रशासक के जीवन में महत्वपूर्ण है?
In what way is the 'detachment theory' of Bhagavad Gita significant in the life of an administrator?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रगीता का अनासक्ति सिद्धांतPDF पृष्ठ 11–12
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सरल अर्थ
अनासक्ति का अर्थ है परिणाम के प्रति अत्यधिक मोह रखे बिना अपने कर्तव्य का पूर्ण निष्ठा से पालन करना।
मुख्य बिंदु
1. निष्पक्षता — निजी संबंधों, पूर्वाग्रह या लाभ से ऊपर उठकर जनहित में निर्णय।
2. मानसिक संतुलन — सफलता और असफलता दोनों में संयम बनाए रखना।
3. भ्रष्टाचार से बचाव — निजी लाभ के प्रति आसक्ति कम होने से प्रलोभनों से बचना।
4. कर्तव्यनिष्ठा — पुरस्कार के बजाय सही प्रक्रिया और लोक सेवा पर ध्यान देना।
निष्कर्ष
अनासक्ति प्रशासक को परिणाम की चिंता से मुक्त होकर ईमानदारी और निष्पक्षता से कार्य करने में मदद करती है।
30 प्रश्न 302 अंक
प्रशासन का उद्देश्य लोक-कल्याण है। गीता का कौन सा सिद्धान्त इस आशय की पुष्टि करता है?
The aim of administration is public welfare. Which principle of Gita upholds this intention?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रगीता का लोकसंग्रह सिद्धांतPDF पृष्ठ 12
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सरल अर्थ
भगवद्गीता का ‘लोकसंग्रह’ सिद्धांत प्रशासन के लोक-कल्याणकारी उद्देश्य की पुष्टि करता है।
मुख्य बिंदु
1. अर्थ — लोकसंग्रह का आशय समाज को धारण करना, सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना और जनकल्याण करना है।
2. कर्तव्य — व्यक्ति को निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के हित में कार्य करना चाहिए।
3. प्रशासनिक महत्व — नीतियों और संसाधनों का उपयोग सामाजिक न्याय तथा आम जनता की भलाई के लिए होना चाहिए।
निष्कर्ष
लोकसंग्रह प्रशासक को जनहित को सर्वोच्च लक्ष्य मानने की प्रेरणा देता है।
31 प्रश्न 3110 अंक
भगवद् गीता किस तरह अर्जुन के समक्ष द्वंद्व का निराकरण करती है? प्रशासनिक अधिकारी के रूप में आप प्रशासनिक दुविधा के निराकरण में गीता के सिद्धान्तों का प्रयोग कैसे करेंगे?
How does Bhagavad Gita resolve the dilemma of Arjun? As an administrator how will you apply the tenets of Gita when confronted with administrative dilemma?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रगीता और प्रशासनिक दुविधाPDF पृष्ठ 12–13
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सरल अर्थ
अर्जुन का द्वंद्व अपने संबंधियों के प्रति मोह और अन्याय के विरुद्ध अपने कर्तव्य के बीच था। श्रीकृष्ण ने उन्हें आत्मा की अमरता, स्वधर्म, निष्काम कर्म और समत्व का मार्ग समझाया।
अर्जुन के द्वंद्व का समाधान
1. स्वधर्म — अपने नियत कर्तव्य को पहचानना और कठिन होने पर भी उससे विमुख न होना।
2. निष्काम कर्मयोग — फल के भय या लालच के बजाय कर्तव्य पर ध्यान देना।
3. समत्व — सफलता-विफलता, लाभ-हानि और सुख-दुख में संतुलित रहना।
4. मोह से मुक्ति — निजी लगाव के कारण न्यायसंगत निर्णय से पीछे न हटना।
प्रशासनिक दुविधा में प्रयोग
1. निष्पक्षता — रिश्तेदारी, जाति, राजनीतिक दबाव या निजी पसंद को निर्णय का आधार न बनाना।
2. नियम और संविधान — कानून तथा विभागीय प्रक्रिया के अनुरूप निर्णय लेना।
3. लोकसंग्रह — निर्णय का अंतिम उद्देश्य व्यापक जनकल्याण और कमजोर वर्गों का हित रखना।
4. भावनात्मक संतुलन — संकट, आलोचना और दबाव के समय शांत रहकर तथ्य जाँचना।
5. नैतिक साहस — अनैतिक आदेश या अनुचित लाभ के दबाव का विवेकपूर्ण और नियमसम्मत प्रतिरोध करना।
6. जवाबदेही — निर्णय के कारण लिखित रूप से स्पष्ट करना और आवश्यकता होने पर वरिष्ठों से परामर्श लेना।
उदाहरण
यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के परिचित को नियमों के विरुद्ध लाभ देने का दबाव हो, तो अधिकारी को व्यक्तिगत मोह से ऊपर उठकर पात्रता और कानून के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।
निष्कर्ष
गीता का संदेश कर्तव्यनिष्ठा, अनासक्ति और लोककल्याण है। इन सिद्धांतों का संतुलित प्रयोग जटिल प्रशासनिक दुविधाओं में नैतिक निर्णय लेने में सहायता करता है।
32 प्रश्न 322 अंक
गीता के अनुसार 'परधर्म' को स्पष्ट कीजिए।
Explain 'Paradharma' according to Gita.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रपरधर्मPDF पृष्ठ 13
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सरल अर्थ
गीता में ‘परधर्म’ का अर्थ दूसरे के कर्तव्य या ऐसा आचरण है जो व्यक्ति के अपने स्वभाव और नियत भूमिका के अनुरूप न हो।
मुख्य बिंदु
1. स्वधर्म से भिन्न — यह व्यक्ति के अपने स्वभावगत कर्तव्य के बजाय दूसरे की भूमिका अपनाने को दर्शाता है।
2. अनुचित अनुकरण — केवल दूसरों की सफलता देखकर उनकी भूमिका अपनाना व्यक्ति के सहज विकास में बाधा बन सकता है।
3. गीता का संदेश — अपना स्वधर्म अपूर्ण रूप से निभाना भी दूसरे के धर्म का अनुकरण करने से श्रेष्ठ बताया गया है।
निष्कर्ष
परधर्म का विचार व्यक्ति को अपने स्वभाव, क्षमता और वास्तविक कर्तव्य को पहचानने की प्रेरणा देता है।
33 प्रश्न 335 अंक
गीता की 'लोक संग्रह' की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
Explain the concept of 'Loka Sangraha' of Gita.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रलोकसंग्रहPDF पृष्ठ 13–14
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सरल अर्थ
‘लोकसंग्रह’ का अर्थ समाज को धारण करना, सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना और लोगों को लोककल्याणकारी मार्ग पर प्रेरित करना है।
मुख्य बिंदु
1. सामाजिक संरक्षण — समाज को बिखरने से बचाना तथा नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं को बनाए रखना।
2. निष्काम कर्म — व्यक्तिगत लाभ के बजाय समाज के हित में कर्म करना।
3. आदर्श आचरण — गीता के अनुसार श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, सामान्य लोग उसका अनुसरण करते हैं।
4. नेतृत्व का दायित्व — ज्ञानवान, नेता और प्रशासक को उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए, न कि केवल उपदेश देना।
5. जनकल्याण — कार्यों का उद्देश्य सर्वजन हित तथा सामाजिक व्यवस्था को मजबूत बनाना होना चाहिए।
प्रशासनिक महत्व
लोकसंग्रह प्रशासक को व्यक्तिगत सफलता से ऊपर उठकर न्याय, सार्वजनिक सेवा और कमजोर वर्गों के उत्थान को प्राथमिकता देने की प्रेरणा देता है।
निष्कर्ष
लोकसंग्रह व्यक्तिगत कर्तव्य और सामाजिक कल्याण के बीच सेतु है।
34 प्रश्न 342 अंक
गीता के अनुसार 'स्वधर्म' को परिभाषित कीजिए।
Define 'Swadharma' according to Gita.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रस्वधर्मPDF पृष्ठ 14
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
गीता में ‘स्वधर्म’ का अर्थ व्यक्ति के स्वभाव, गुणों और भूमिका के अनुरूप उसके अपने कर्तव्य से है।
मुख्य बिंदु
1. स्वभावानुकूल कर्तव्य — ऐसा कार्य जो व्यक्ति की प्रकृति और जिम्मेदारी के अनुकूल हो।
2. अपने कर्तव्य का पालन — दूसरों की नकल करने के बजाय अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाना।
3. परधर्म से तुलना — गीता में दोषयुक्त स्वधर्म को भी दूसरे के धर्म का अनुकरण करने से श्रेष्ठ बताया गया है।
निष्कर्ष
स्वधर्म व्यक्ति को अपनी वास्तविक भूमिका पहचानकर कर्तव्यनिष्ठ रहने की शिक्षा देता है।
35 प्रश्न 355 अंक
गीता के अनुसार 'निष्काम कर्मयोग' की धारणा का वर्णन कीजिए।
Describe the notion of 'Nishkama Karma Yoga' according to Gita.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रनिष्काम कर्मयोगPDF पृष्ठ 14
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
निष्काम कर्मयोग का अर्थ है फल के प्रति आसक्ति और निजी स्वार्थ का त्याग करके अपने कर्तव्य का निरंतर पालन करना। इसमें कर्म छोड़ना नहीं, फलासक्ति छोड़ना मुख्य है।
मुख्य बिंदु
1. फलासक्ति का त्याग — व्यक्ति का अधिकार कर्म करने पर है; फल की चिंता में कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए।
2. समत्व — सफलता-असफलता, लाभ-हानि और जय-पराजय में संतुलन रखना।
3. कर्तव्य-बोध — पुरस्कार या व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा अपने नियत कर्तव्य को महत्व देना।
4. लोकसंग्रह — कर्म का उपयोग समाज और दूसरे लोगों के कल्याण के लिए करना।
5. अहंकार में कमी — कर्म को सेवा या उच्चतर उद्देश्य से जोड़ने पर निजी अहंकार कम होता है।
निष्कर्ष
निष्काम कर्मयोग मानसिक शांति, कर्तव्यनिष्ठा और लोककल्याण को बढ़ावा देता है।
36 प्रश्न 365 अंक
गांधी के अनुसार 'स्वराज' का आदर्श क्या है?
What according to Gandhi is the ideal of 'Swaraj'?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रगांधी का स्वराजPDF पृष्ठ 14–15
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
गांधी के लिए स्वराज केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि आत्म-शासन, नैतिक स्वतंत्रता और न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था है।
मुख्य बिंदु
1. आत्म-संयम — व्यक्ति अपनी इच्छाओं और व्यवहार पर नियंत्रण रखे; यही आंतरिक स्वराज है।
2. ग्राम स्वराज — सत्ता का विकेंद्रीकरण हो और गाँव निर्णय लेने में स्वायत्त तथा सहभागी इकाइयाँ बनें।
3. आर्थिक आत्मनिर्भरता — स्वदेशी, स्थानीय आजीविका और श्रम की गरिमा को महत्व देना।
4. अंत्योदय — शासन की सफलता का आकलन समाज के अंतिम व्यक्ति की स्थिति से करना।
5. नैतिक शासन — सत्य, अहिंसा, न्याय और लोककल्याण पर आधारित व्यवस्था।
निष्कर्ष
गांधी का स्वराज व्यक्ति के आत्म-विकास से लेकर राजनीतिक विकेंद्रीकरण, आर्थिक स्वावलंबन और शोषणमुक्त समाज तक फैला आदर्श है।
37 प्रश्न 3710 अंक
'अनिवार्यतः सम्बन्धित होने के कारण साधनों को साध्य से पृथक नहीं किया जा सकता, अतः वास्तविक और स्थाई सफलता के लिए दोनों का शुभ होना आवश्यक है।' गांधी नीतिशास्त्र के सन्दर्भ में स्पष्ट करें।
Necessarily related, means cannot be separated from ends. Therefore, both must be auspicious for real and lasting success. Explain in context of Gandhian ethics.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रगांधी — साध्य और साधनPDF पृष्ठ 15–16
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
गांधी के अनुसार साध्य (लक्ष्य) और साधन (लक्ष्य प्राप्त करने का तरीका) अलग नहीं किए जा सकते। अच्छे लक्ष्य तक पहुँचने के लिए नैतिक साधनों का प्रयोग आवश्यक है।
मुख्य बिंदु
1. बीज और वृक्ष का संबंध — गांधी साधन को बीज और साध्य को वृक्ष के समान मानते हैं। जैसा बीज होगा, वैसा ही वृक्ष होगा।
2. अनैतिक साधनों का विरोध — झूठ, हिंसा, छल या दमन से प्राप्त लक्ष्य भी नैतिक रूप से दूषित हो सकता है।
3. स्थायी सफलता — अनैतिक तरीके भय, प्रतिशोध और अविश्वास पैदा करते हैं; सत्य और अहिंसा दीर्घकालीन विश्वास बनाते हैं।
4. साध्य-साधन की एकता — साधन लक्ष्य का केवल रास्ता नहीं, बल्कि लक्ष्य के चरित्र को भी आकार देता है।
5. स्वतंत्रता संग्राम का उदाहरण — चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस लेना गांधी के लिए साधनों की पवित्रता की प्राथमिकता का उदाहरण है।
6. प्रशासनिक अनुप्रयोग — लोकहित के नाम पर कानून तोड़ना, झूठे आँकड़े देना या निर्दोष व्यक्ति के अधिकार दबाना सही नहीं ठहराया जा सकता।
निष्कर्ष
वास्तविक और स्थायी सफलता के लिए लक्ष्य के साथ उसे प्राप्त करने का तरीका भी न्यायपूर्ण, सत्यनिष्ठ और अहिंसक होना चाहिए।
38 प्रश्न 3810 अंक
सुशासन तथा लोक सेवाओं में नैतिकता के लक्ष्य गाँधीजी द्वारा बतायी गयी सात सामाजिक बुराइयों (Seven Social Sins) की अवधारणा को जानकर प्राप्त किए जा सकते हैं। विश्लेषण कीजिए।
The aim of good governance and morality in civil services can be achieved through following Gandhi's Seven Social Sins concept. Analyse.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रगांधी के सात सामाजिक पापPDF पृष्ठ 16–17
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
गांधी द्वारा बताए गए सात सामाजिक पाप ऐसे व्यवहार हैं जिनमें मूल्य और कर्म का संबंध टूट जाता है। इन्हें समझना सुशासन और लोक सेवा की नैतिकता को मजबूत करता है।
सात सामाजिक बुराइयाँ
1. सिद्धांत के बिना राजनीति — सत्ता के लिए नैतिक आदर्शों को छोड़ देना।
2. परिश्रम के बिना धन — श्रम या उत्पादक योगदान के बिना अनुचित तरीके से संपत्ति कमाना।
3. विवेक के बिना सुख — दूसरों के कष्ट और अंतरात्मा की आवाज की उपेक्षा करके सुख लेना।
4. चरित्र के बिना ज्ञान — नैतिकता से रहित ज्ञान या तकनीकी दक्षता।
5. नैतिकता के बिना वाणिज्य — लाभ के लिए धोखा, मिलावट या शोषण।
6. मानवता के बिना विज्ञान — मानव जीवन और गरिमा की उपेक्षा करने वाला वैज्ञानिक या तकनीकी उपयोग।
7. त्याग के बिना पूजा — सेवा और त्याग से रहित केवल बाहरी कर्मकांड।
सुशासन में उपयोग
1. पारदर्शिता और जवाबदेही — राजनीति में सिद्धांत तथा कार्य में नैतिकता होने से भ्रष्टाचार और पक्षपात कम हो सकता है।
2. न्यायपूर्ण वितरण — परिश्रम और योगदान का सम्मान आर्थिक अन्याय तथा शोषण को रोकने की प्रेरणा देता है।
3. चरित्र और दक्षता का मेल — लोक सेवक के पास ज्ञान के साथ सत्यनिष्ठा और संवेदनशीलता भी होनी चाहिए।
4. मानव-केंद्रित विकास — विज्ञान, तकनीक और नीतियों का उपयोग जनता के हित में होना चाहिए, न कि केवल सत्ता या लाभ के लिए।
5. सेवा-भाव — लोक सेवक को पद को विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सार्वजनिक जिम्मेदारी मानना चाहिए।
निष्कर्ष
गांधी के सात सामाजिक पाप व्यक्तिगत जीवन के साथ शासन और संस्थाओं को भी नैतिक कसौटी पर परखते हैं। इनके विपरीत आचरण सुशासन, लोकविश्वास और न्यायपूर्ण विकास को मजबूत करता है।
39 प्रश्न 392 अंक
'अहिंसा' गाँधी की नैतिकता का केंद्रीय मूल्य क्यों है?
Why is 'non-violence' or 'ahimsa' core value of Gandhian Ethics?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रगांधी की नैतिकता में अहिंसाPDF पृष्ठ 17
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
गांधी के लिए अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा से बचना नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और आत्मबल पर आधारित जीवन-पद्धति है।
मुख्य बिंदु
1. साधन और साध्य — सत्य गांधी का लक्ष्य है और अहिंसा उसे प्राप्त करने का आवश्यक साधन है।
2. मानवीय गरिमा — अहिंसा प्रत्येक व्यक्ति और जीव के प्रति सम्मान तथा एकता की भावना पर आधारित है।
3. हृदय-परिवर्तन — अहिंसक प्रतिरोध विरोधी को नष्ट करने के बजाय उसके विचार और व्यवहार में बदलाव लाने का प्रयास करता है।
4. सामाजिक उपयोग — अहिंसा संघर्ष को प्रतिशोध और हिंसा में बदलने से रोकती है।
निष्कर्ष
अहिंसा गांधीवादी नैतिकता का केंद्रीय मूल्य है, क्योंकि यह सत्य, न्याय और मानवीय एकता को नैतिक साधनों से प्राप्त करने का मार्ग देती है।
40 प्रश्न 405 अंक
'श्रम एक पूँजी है और जीवधारी पूँजी अक्षय है, मैं पूँजी और श्रम में न्यायसंगत संबंध की स्थापना करना चाहता हूँ।' महात्मा गाँधी के संदर्भ में व्याख्या कीजिए।
'Labour is capital and the living capital is inexhaustible...' Discuss in the context of Mahatma Gandhi.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रगांधी — श्रम और पूँजीPDF पृष्ठ 17
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
गांधी के आर्थिक विचार में मानव श्रम स्वयं एक मूल्यवान पूँजी है। धन और मशीनें तभी उपयोगी हैं जब मानव श्रम उन्हें काम में लाता है।
मुख्य बिंदु
1. श्रम की गरिमा — शारीरिक और मानसिक श्रम समाज की वास्तविक उत्पादक शक्ति है; उसे केवल मजदूरी का साधन नहीं समझना चाहिए।
2. जीवित पूँजी — धन या मशीनें नष्ट हो सकती हैं, जबकि मानव कौशल, सृजनशीलता और श्रम समाज को लगातार योगदान दे सकते हैं।
3. शरीर-श्रम — गांधी प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए श्रम करने के विचार को महत्व देते थे।
4. न्यासधारिता — संपत्ति रखने वाला व्यक्ति स्वयं को पूर्ण स्वामी के बजाय समाज की संपदा का न्यासी समझे और उसका उपयोग व्यापक हित में करे।
5. पूँजी और श्रम का सहयोग — गांधी वर्ग-संघर्ष के बजाय न्यायपूर्ण साझेदारी, उचित पारिश्रमिक, सम्मान और अहिंसक सहयोग पर बल देते थे।
6. शोषण-मुक्त व्यवस्था — श्रमिक की गरिमा और अधिकारों की रक्षा से आर्थिक संबंध अधिक न्यायसंगत बनते हैं।
निष्कर्ष
गांधी का उद्देश्य पूँजी और श्रम के बीच शत्रुता नहीं, बल्कि नैतिक सहयोग स्थापित करना था, जिसमें उत्पादन के साथ मानव गरिमा और सामाजिक कल्याण भी सुरक्षित रहें।
41 प्रश्न 412 अंक
'मेरा स्थान और तत्संबंधी कर्त्तव्य' (My station and its duties) स्पष्ट कीजिए।
Explain 'My station and its duties'.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रमेरा स्थान और तत्संबंधी कर्तव्यPDF पृष्ठ 17–18
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एफ.एच. ब्रैडली के अनुसार व्यक्ति समाज में एक विशिष्ट स्थान या भूमिका रखता है और उससे संबंधित कर्तव्यों का पालन करना उसकी नैतिक जिम्मेदारी है।
मुख्य बिंदु
1. सामाजिक स्थान — व्यक्ति पिता, पुत्र, शिक्षक, अधिकारी या नागरिक जैसी भूमिकाएँ निभाता है।
2. कर्तव्य — प्रत्येक भूमिका के साथ कुछ जिम्मेदारियाँ जुड़ी होती हैं।
3. आत्म-साक्षात्कार — अपने कर्तव्यों को निष्ठापूर्वक निभाने से व्यक्ति अपने नैतिक व्यक्तित्व का विकास करता है।
निष्कर्ष
व्यक्ति का कल्याण समाज से जुड़ा है; अपनी भूमिका के दायित्वों को ईमानदारी से निभाना सामाजिक और नैतिक जीवन का महत्त्वपूर्ण आधार है।
42 प्रश्न 425 अंक
सुखवाद किस प्रकार विरोधाभासी हो सकता है? चर्चा कीजिए।
How can Hedonism be Paradoxical? Discuss.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रसुखवाद का विरोधाभासPDF पृष्ठ 18
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सरल अर्थ
सुखवाद मानता है कि सुख मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। लेकिन ‘सुखवाद का विरोधाभास’ बताता है कि यदि व्यक्ति हर समय सीधे सुख पाने की चिंता करता रहे, तो वह स्वयं सुख से दूर हो सकता है।
मुख्य बिंदु
1. सुख सह-उत्पाद है — सुख अक्सर सार्थक कार्यों, प्रेम, रुचियों और कर्तव्यों में लगने से स्वाभाविक रूप से मिलता है।
2. अत्यधिक आत्म-निरीक्षण — लगातार यह सोचते रहना कि “क्या मैं सुखी हूँ?” व्यक्ति का ध्यान वर्तमान काम से हटा सकता है।
3. मानसिक दबाव — सुख को हर समय मापने और पाने का प्रयास चिंता तथा असंतोष पैदा कर सकता है।
4. ध्यान और तल्लीनता — किसी सार्थक गतिविधि में मन लगाना कई बार सुख की अधिक स्वाभाविक अनुभूति देता है।
उदाहरण
यदि खिलाड़ी खेलते समय केवल अपने सुख के बारे में सोचता रहे, तो उसका ध्यान खेल से हट सकता है। इसी तरह नींद के लिए अत्यधिक चिंता नींद में बाधा बन सकती है।
निष्कर्ष
सुख का सीधा पीछा करने के बजाय सार्थक कार्यों, संबंधों और कर्तव्यों में संतुलित रूप से संलग्न रहना अधिक उपयोगी हो सकता है।
43 प्रश्न 4310 अंक
'मानव संसाधन' का विचार, 'मानवता एक साध्य' (Humanity as an End) के विचार से किस प्रकार सुसंगत है? लोक-कल्याणकारी राज्य के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण कीजिए।
How is the idea of 'Human Resources' consistent with the idea of 'Humanity as an End'? Analyse in perspective of welfare state.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रमानव संसाधन और मानवता एक साध्यPDF पृष्ठ 18–19
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सरल अर्थ
‘मानव संसाधन’ का विचार शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल के माध्यम से व्यक्ति की क्षमताएँ विकसित करने पर बल देता है। कांट का ‘मानवता एक साध्य’ सिद्धांत कहता है कि हर व्यक्ति की अपनी गरिमा है और उसे केवल किसी दूसरे के उद्देश्य का साधन नहीं बनाना चाहिए।
मुख्य बिंदु
1. अवधारणात्मक अंतर — मानव संसाधन का दृष्टिकोण व्यक्ति की क्षमताओं और योगदान को देखता है; कांट का सिद्धांत व्यक्ति के आंतरिक मूल्य और गरिमा पर बल देता है।
2. सशक्तीकरण — शिक्षा और कौशल व्यक्ति को अपने निर्णय लेने तथा जीवन के लक्ष्य पाने में सक्षम बनाते हैं।
3. क्षमता निर्माण — स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशिक्षण व्यक्ति की संभावनाओं को विकसित करते हैं, ताकि वह परिस्थितियों का मात्र साधन बनकर न रह जाए।
4. कल्याणकारी राज्य — राज्य का दायित्व केवल उत्पादन या आय बढ़ाना नहीं, बल्कि नागरिकों की वास्तविक क्षमताओं और अवसरों का विस्तार करना है।
5. सामाजिक सुरक्षा — स्वास्थ्य सुविधा, खाद्य सुरक्षा और वृद्धावस्था सहायता जैसी व्यवस्थाएँ दर्शाती हैं कि नागरिक की गरिमा को महत्व दिया जाता है।
6. संवैधानिक मूल्य — न्याय, समानता और गरिमा पर आधारित नीतियाँ मानव संसाधन विकास को मानवीय उद्देश्य से जोड़ती हैं।
7. नैतिक सीमा — लोगों को केवल उत्पादकता या आर्थिक लाभ के आधार पर नहीं आँकना चाहिए; उनकी स्वतंत्रता, अधिकार और जरूरतें भी महत्त्वपूर्ण हैं।
उदाहरण
शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश केवल भविष्य के कामगार तैयार करना नहीं है; यह व्यक्ति को अधिक स्वतंत्र, जागरूक और अपने जीवन के निर्णय लेने योग्य भी बनाता है।
निष्कर्ष
मानव संसाधन विकास व्यक्ति की क्षमता बढ़ाने का साधन है, जबकि ‘मानवता एक साध्य’ उस विकास की नैतिक दिशा निर्धारित करता है। कल्याणकारी राज्य में दोनों का उद्देश्य मानवीय गरिमा और लोकहित सुरक्षित करना होना चाहिए।
44 प्रश्न 4410 अंक
परिणामनिरपेक्षवाद (Deontology) एवं परिणामसापेक्षवाद (Consequentialism) की विशेषताएँ बताइए। इन दोनों में से प्रशासक के लिए अधिक उपयुक्त कौन सा है और क्यों?
State the features of Deontology and Consequentialism. Which approach is more suitable for an administrator? Why?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रपरिणामनिरपेक्षवाद और परिणामसापेक्षवादPDF पृष्ठ 19–20
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परिणामनिरपेक्षवाद में कार्य का नैतिक मूल्य कर्तव्य और नियमों से तय होता है, जबकि परिणामसापेक्षवाद में उसके परिणामों को प्रमुख आधार माना जाता है।
1. परिणामनिरपेक्षवाद (Deontology)
- कर्तव्य के लिए कर्तव्य — कार्य सही है क्योंकि वह नैतिक कर्तव्य है, न कि केवल लाभ या परिणाम के कारण।
- साधनों की शुचिता — अनुचित साधनों से प्राप्त लक्ष्य को नैतिक नहीं माना जाता।
- सार्वभौमिक नियम — ऐसे नियमों का पालन जिनको समान परिस्थितियों में सभी पर लागू किया जा सके।
- उदाहरण — निजी या राजनीतिक दबाव के बावजूद कानून और निष्पक्ष प्रक्रिया का पालन करना।
2. परिणामसापेक्षवाद (Consequentialism)
- परिणामों पर बल — किसी कार्य की नैतिकता उसके प्रभावों के आधार पर आँकी जाती है।
- अधिकतम लोककल्याण — उपयोगितावाद इसका प्रमुख रूप है, जो अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख पर बल देता है।
- परिस्थिति के अनुसार मूल्यांकन — विभिन्न विकल्पों के लाभ, हानि और प्रभावित लोगों को ध्यान में रखना।
- सीमा — केवल कुल लाभ देखने से कभी-कभी अल्पसंख्यक या कमजोर समूहों के अधिकारों की उपेक्षा हो सकती है।
प्रशासक के लिए उपयुक्त दृष्टिकोण
1. कानून का शासन — नियम और कर्तव्य मनमानी तथा पक्षपात को रोकते हैं।
2. लोकहित — नीतियों के वास्तविक परिणाम भी देखने चाहिए ताकि सेवाएँ नागरिकों तक पहुँचें।
3. नैतिक दुविधा — जहाँ नियमों की कठोर व्याख्या से जनहित प्रभावित होता हो, वहाँ वैधानिक विवेक और मानवीय दृष्टि आवश्यक है।
4. संतुलन — प्रशासक को नैतिक साधनों और नियमों की मर्यादा में रहकर अधिकतम जनकल्याणकारी परिणाम पाने चाहिए।
निष्कर्ष
प्रशासन के लिए किसी एक सिद्धांत का अंधानुकरण पर्याप्त नहीं है। कर्तव्य और कानून की शुचिता बनाए रखते हुए परिणामों तथा लोकहित का विवेकपूर्ण मूल्यांकन अधिक उपयुक्त है।
45 प्रश्न 452 अंक
कांट के अनुसार 'शुभ-संकल्प' (Goodwill) क्या है?
What is goodwill according to Kant?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रकांट का शुभ-संकल्पPDF पृष्ठ 20
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उत्तर — सरल भाषा में
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कांट के अनुसार शुभ-संकल्प वह इच्छा है जो कर्तव्य-बोध और नैतिक नियम के सम्मान से प्रेरित होती है।
मुख्य बिंदु
1. निरपेक्ष शुभ — यह बिना किसी शर्त के अपने आप में शुभ है।
2. कर्तव्य-बोध — कार्य पुरस्कार, भय या निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि कर्तव्य के कारण किया जाता है।
3. परिणाम से स्वतंत्र — कार्य का परिणाम असफल हो जाने पर भी शुद्ध कर्तव्य-बोध का नैतिक मूल्य बना रहता है।
निष्कर्ष
शुभ-संकल्प कांट के नीतिशास्त्र में नैतिक आचरण की आधारशिला है।
46 प्रश्न 462 अंक
प्लेटो के अनुसार मुख्य सद्गुण (Cardinal Virtues) कौन से हैं?
What are cardinal virtues according to Plato?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रप्लेटो के मुख्य सद्गुणPDF पृष्ठ 20–21
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
प्लेटो ने अपनी पुस्तक ‘द रिपब्लिक’ में आदर्श व्यक्ति और राज्य के चार मुख्य सद्गुण बताए हैं।
मुख्य बिंदु
1. विवेक (Wisdom) — उचित निर्णय लेने की क्षमता।
2. साहस (Courage) — भय और कठिनाई के बीच कर्तव्य पर टिके रहना।
3. संयम (Temperance) — इच्छाओं और प्रवृत्तियों पर नियंत्रण।
4. न्याय (Justice) — सभी अंगों और वर्गों का अपने नियत कार्य करना तथा उचित सामंजस्य बनाए रखना।
निष्कर्ष
प्लेटो के अनुसार इन सद्गुणों का संतुलन व्यक्ति और राज्य दोनों में न्याय की स्थापना करता है।
47 प्रश्न 475 अंक
कांट किस प्रकार सापेक्ष एवं निरपेक्ष आदेश के आधार पर अंतिम शुभ की व्याख्या करता है, समझाइए।
Explain Kant's ultimate good on the basis of relative and categorical imperative.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रकांट — अंतिम शुभPDF पृष्ठ 21
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उत्तर — सरल भाषा में
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कांट ने नैतिक आचरण को कर्तव्य से जोड़ा और अंतिम शुभ को सद्गुण तथा सुख के उचित मेल के रूप में समझाया।
मुख्य बिंदु
1. सापेक्ष आदेश — किसी इच्छा या लक्ष्य को पाने के लिए दिया गया शर्तयुक्त निर्देश, जैसे सम्मान चाहिए तो ईमानदार बनो।
2. निरपेक्ष आदेश — बिना किसी शर्त के नैतिक कर्तव्य; व्यक्ति को ऐसा आचरण करना चाहिए जिसे वह सार्वभौमिक नियम बनते देख सके।
3. शुभ संकल्प — कर्तव्य-बोध से किया गया कार्य नैतिक मूल्य रखता है; मूल्य केवल परिणाम से तय नहीं होता।
4. सर्वोच्च शुभ — सद्गुण या नैतिकता।
5. अंतिम शुभ — सद्गुण के साथ उसके अनुरूप सुख का मेल। कांट के अनुसार सद्गुणी व्यक्ति सुख का पात्र है।
निष्कर्ष
निरपेक्ष आदेश नैतिक कर्तव्य का आधार है और अंतिम शुभ सद्गुण व सुख के समन्वय से बनता है।
48 प्रश्न 485 अंक
'शुभ संकल्प' पर कांट के दृष्टिकोण को लिखिए।
Write the view of Kant on 'Good will'.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रकांट का शुभ संकल्पPDF पृष्ठ 21
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
कांट के अनुसार शुभ संकल्प (Good Will) अपने आप में शुभ है। इसकी नैतिक गुणवत्ता बाहरी सफलता या उपयोगिता से नहीं, बल्कि कर्तव्य-बोध से तय होती है।
मुख्य बिंदु
1. निरपेक्ष शुभ — शुभ संकल्प किसी बाहरी लक्ष्य के कारण नहीं, स्वयं में मूल्यवान है।
2. अन्य गुणों से तुलना — बुद्धि, साहस, शक्ति और धन का उपयोग अच्छे या बुरे दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है; शुभ संकल्प उन्हें नैतिक दिशा देता है।
3. कर्तव्य के लिए कर्तव्य — नैतिक कार्य निजी लाभ या पुरस्कार के लिए नहीं, कर्तव्य के सम्मान में किया जाता है।
4. परिणाम-निरपेक्षता — यदि व्यक्ति ने उचित कर्तव्य-बोध से काम किया, पर परिस्थिति के कारण सफलता नहीं मिली, तो भी संकल्प का नैतिक मूल्य कम नहीं होता।
5. प्रशासनिक उदाहरण — ईमानदार अधिकारी दबाव के बावजूद सही और निष्पक्ष निर्णय लेता है, भले उसे उससे व्यक्तिगत लाभ न मिले।
निष्कर्ष
कांट के लिए शुभ संकल्प नैतिकता की मूल आधारशिला है, क्योंकि यही अन्य क्षमताओं और कार्यों को नैतिक दिशा देता है।
49 प्रश्न 492 अंक
प्लेटो न्याय को कैसे परिभाषित करते हैं?
Define justice according to Plato.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रप्लेटो का न्याय सिद्धांतPDF पृष्ठ 21–22
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सरल अर्थ
प्लेटो के अनुसार न्याय का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वाभाविक गुणों और क्षमता के अनुसार अपना नियत कार्य करे तथा दूसरों के कार्य में अनुचित हस्तक्षेप न करे।
मुख्य बिंदु
1. कार्यात्मक विशिष्टीकरण — समाज के विभिन्न वर्ग अपनी भूमिका निभाएँ।
2. सामंजस्य — विवेक, साहस और संयम के बीच उचित तालमेल हो।
3. अहस्तक्षेप — कोई वर्ग दूसरे के नियत कार्य को अनुचित रूप से न हथियाए।
निष्कर्ष
अपने कर्तव्य का उचित पालन और सामाजिक अंगों का सामंजस्य प्लेटो के न्याय की मुख्य पहचान है।
50 प्रश्न 5010 अंक
प्लेटो के न्याय सिद्धान्त में साहस और संयम अन्तर्निहित हैं। आधुनिक समाज व प्रशासन में क्या वे आज भी युक्तिसंगत हैं?
Plato's theory of justice includes courage and temperance. Are they still needed in modern society and administration?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रप्लेटो — साहस और संयमPDF पृष्ठ 22–23
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
प्लेटो के न्याय सिद्धांत में साहस और संयम, न्यायपूर्ण व्यक्ति तथा राज्य के आवश्यक गुण हैं। आधुनिक समाज और प्रशासन में भी इनकी उपयोगिता बनी हुई है।
प्लेटो के सिद्धांत में स्थान
1. साहस — कठिन परिस्थिति में उचित बात पर टिके रहने और भय के बावजूद कर्तव्य निभाने का गुण।
2. संयम — इच्छाओं और निम्न प्रवृत्तियों पर विवेक का नियंत्रण।
3. न्याय से संबंध — जब विवेक, साहस और संयम अपने-अपने उचित कार्य करें तथा एक-दूसरे में हस्तक्षेप न करें, तो सामंजस्य बनता है।
आधुनिक समाज और प्रशासन में साहस
1. नैतिक साहस — राजनीतिक दबाव या प्रलोभन के सामने निष्पक्ष और जनहितकारी निर्णय लेना।
2. भ्रष्टाचार का प्रतिरोध — अनैतिक कार्यों के विरुद्ध उचित माध्यमों से आवाज उठाना।
3. संकट प्रबंधन — आपदा या कानून-व्यवस्था की स्थिति में धैर्यपूर्वक निर्णय लेना।
आधुनिक समाज और प्रशासन में संयम
1. शक्ति का मर्यादित उपयोग — अधिकारों का दुरुपयोग और मनमाना व्यवहार रोकना।
2. स्वार्थ पर नियंत्रण — निजी लाभ, भाई-भतीजावाद और लालच से बचना।
3. धैर्य और सुनवाई — नागरिकों की शिकायतें सुनना तथा विभिन्न हितों के बीच संतुलन बनाना।
निष्कर्ष
साहस प्रशासक को निर्भीक और सिद्धांतनिष्ठ बनाता है, जबकि संयम उसकी शक्ति को मर्यादित रखता है। दोनों गुण आज भी न्याय, सुशासन और सामाजिक सामंजस्य के लिए आवश्यक हैं।
51 प्रश्न 512 अंक
सुकरात के अनुसार 'सद्गुण' (Virtue) को परिभाषित करें।
Define 'virtue' according to Socrates.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रसुकरात का सद्गुण सिद्धांतPDF पृष्ठ 23
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
सुकरात के अनुसार ‘सद्गुण ही ज्ञान है’ (Virtue is Knowledge)। यदि व्यक्ति वास्तव में उचित और अनुचित का ज्ञान रखता है, तो वह उचित आचरण की ओर बढ़ता है।
मुख्य बिंदु
1. ज्ञान और नैतिकता — सद्गुण केवल बाहरी व्यवहार नहीं, बल्कि सही-गलत की वास्तविक समझ है।
2. सद्गुणों की एकता — साहस, न्याय और संयम जैसे गुण ज्ञान के विभिन्न रूप माने जा सकते हैं।
3. सीखने की संभावना — शिक्षा और तर्क-विचार से नैतिक समझ विकसित की जा सकती है।
4. अज्ञान और बुराई — सुकरात के अनुसार गलत आचरण का प्रमुख कारण अज्ञान है।
निष्कर्ष
सद्गुणी बनने के लिए सही ज्ञान और आत्म-परीक्षण आवश्यक हैं।
52 प्रश्न 522 अंक
प्लेटो के मुख्य सद्गुणों (Cardinal Virtues) के नाम लिखिए।
Write the name of 'Cardinal Virtues' of Plato.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रप्लेटो के चार मुख्य सद्गुणPDF पृष्ठ 23
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उत्तर — सरल भाषा में
प्लेटो के चार मुख्य सद्गुण
1. विवेक (Wisdom) — सही निर्णय और मार्गदर्शन।
2. साहस (Courage) — कठिनाइयों और भय के बीच कर्तव्य निभाना।
3. संयम (Temperance) — इच्छाओं पर नियंत्रण और संतुलन।
4. न्याय (Justice) — प्रत्येक अंग का अपना कार्य करना और सभी के बीच सामंजस्य।
निष्कर्ष
प्लेटो के अनुसार इन सद्गुणों का समन्वय आदर्श व्यक्ति और न्यायपूर्ण राज्य का आधार है।
53 प्रश्न 532 अंक
जे.एस. मिल के अनुसार 'उपयोगितावाद' (Utilitarianism) का क्या अर्थ है?
What is the meaning of 'Utilitarianism' according to J.S. Mill?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रजे.एस. मिल का उपयोगितावादPDF पृष्ठ 23
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
जे.एस. मिल के अनुसार उपयोगितावाद वह नैतिक सिद्धांत है जिसमें सही कार्य वह है जो अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख को बढ़ाए और दुःख को कम करे।
मुख्य बिंदु
1. अधिकतम सुख — कार्यों का मूल्यांकन उनके सुख और दुःख पर प्रभाव से किया जाता है।
2. गुणात्मक अंतर — मिल ने माना कि बौद्धिक, नैतिक और मानसिक सुख केवल शारीरिक सुख से उच्चतर हो सकते हैं।
निष्कर्ष
मिल का उपयोगितावाद सुख की मात्रा के साथ उसकी गुणवत्ता को भी महत्व देता है।
54 प्रश्न 542 अंक
कांट के अनुसार 'निरपेक्ष आदेश' (Categorical Imperative) के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
Explain the meaning of 'Categorical Imperatives' according to Kant.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रकांट का निरपेक्ष आदेशPDF पृष्ठ 23–24
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
कांट का ‘निरपेक्ष आदेश’ ऐसा नैतिक नियम है जो किसी इच्छा, निजी लाभ या परिणाम पर निर्भर नहीं होता; वह बिना शर्त लागू होता है।
मुख्य बिंदु
1. कर्तव्य के लिए कर्तव्य — सही कार्य इसलिए करना कि वह कर्तव्य है।
2. सार्वभौमिकता — व्यक्ति को ऐसा नियम अपनाना चाहिए जिसे वह सभी के लिए सामान्य नैतिक कानून बनते हुए स्वीकार कर सके।
3. परिणाम से स्वतंत्रता — नैतिकता का आधार केवल लाभ या सफलता नहीं, बल्कि कर्तव्य-बोध है।
निष्कर्ष
निरपेक्ष आदेश कांट के नैतिक दर्शन में सार्वभौमिक और बिना शर्त कर्तव्य का सिद्धांत है।
55 प्रश्न 555 अंक
कांट के अनुसार नैतिकता की पूर्वमान्यताएँ (Postulates of Morality) स्पष्ट कीजिए।
Explain the postulates of morality according to Kant.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रकांट की नैतिकता की पूर्वमान्यताएँPDF पृष्ठ 24
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
कांट के अनुसार नैतिक जीवन को अर्थपूर्ण बनाने के लिए कुछ पूर्वमान्यताओं को स्वीकार करना आवश्यक है। इन्हें सैद्धांतिक रूप से सिद्ध करना संभव न हो, फिर भी वे व्यावहारिक नैतिकता से जुड़ी हैं।
मुख्य बिंदु
1. संकल्प की स्वतंत्रता — यदि व्यक्ति के पास चुनाव की स्वतंत्रता न हो, तो उसे नैतिक या अनैतिक कार्यों के लिए उत्तरदायी ठहराना कठिन होगा।
2. आत्मा की अमरता — नैतिक पूर्णता की ओर निरंतर प्रगति की धारणा आत्मा के निरंतर अस्तित्व से जुड़ी है।
3. ईश्वर का अस्तित्व — कांट के अनुसार सद्गुण और सुख के बीच अंतिम सामंजस्य की संभावना को समझाने के लिए न्यायपूर्ण सर्वोच्च सत्ता की मान्यता आवश्यक है।
4. परस्पर संबंध — स्वतंत्रता नैतिक उत्तरदायित्व का आधार देती है; अमरता नैतिक प्रगति को निरंतरता देती है; ईश्वर की मान्यता सद्गुण और सुख के अंतिम सामंजस्य से जुड़ती है।
निष्कर्ष
कांट की तीन पूर्वमान्यताएँ हैं—संकल्प की स्वतंत्रता, आत्मा की अमरता और ईश्वर का अस्तित्व। ये उनकी नैतिक व्यवस्था को आधार प्रदान करती हैं।
56 प्रश्न 5610 अंक
प्रशासन के लिए प्रेरणा के रूप में उपयोगितावाद, सर्वोदय तथा लोक-संग्रह का तुलनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत कीजिए।
Present a comparative evaluation of Utilitarianism, Sarvodaya and Loka-samgraha as an inspiration for administration.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रउपयोगितावाद, सर्वोदय और लोकसंग्रहPDF पृष्ठ 24–25
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
उपयोगितावाद, सर्वोदय और लोकसंग्रह तीनों लोककल्याण पर बल देते हैं, लेकिन इनके दृष्टिकोण अलग हैं।
1. उपयोगितावाद (Utilitarianism)
- आधार — अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख।
- प्रशासनिक उपयोग — नीतियों के लाभ, लागत और परिणामों का आकलन कर व्यापक जनहित बढ़ाना।
- सीमा — केवल बहुसंख्यक लाभ देखने पर अल्पसंख्यक या कमजोर समूहों की जरूरतें अनदेखी हो सकती हैं।
2. सर्वोदय (Sarvodaya)
- अर्थ — सभी का उदय और कल्याण; गांधी तथा विनोबा भावे के विचार में अंतिम व्यक्ति का उत्थान विशेष महत्त्व रखता है।
- आधार — अहिंसा, सहयोग, न्यासधारिता, विकेंद्रीकरण और सामाजिक समानता।
- प्रशासनिक उपयोग — विकास का लाभ केवल बहुसंख्यक तक सीमित न रहे; सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुँचे।
3. लोकसंग्रह (Loka-samgraha)
- अर्थ — समाज को धारण करना, सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना और लोककल्याण के लिए कर्म करना।
- आधार — निष्काम कर्म तथा श्रेष्ठ व्यक्तियों का आदर्श आचरण।
- प्रशासनिक उपयोग — अधिकारी व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर कर्तव्य निभाए और अपने व्यवहार से सार्वजनिक विश्वास बनाए।
तुलनात्मक मूल्यांकन
1. उपयोगितावाद नीति के कुल परिणामों पर ध्यान देता है।
2. सर्वोदय समावेशिता और अंतिम व्यक्ति के कल्याण को प्रमुखता देता है।
3. लोकसंग्रह कर्तव्य, सामाजिक व्यवस्था और आदर्श आचरण को महत्व देता है।
4. व्यावहारिक प्रशासन में इनका संतुलित उपयोग आवश्यक है—लाभ-हानि का मूल्यांकन हो, कमजोर वर्गों की उपेक्षा न हो और अधिकारी नैतिक कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्ध रहे।
निष्कर्ष
केवल अधिकतम कुल लाभ पर्याप्त नहीं। न्यायपूर्ण प्रशासन को उपयोगितावाद की परिणाम-दृष्टि, सर्वोदय की समावेशिता और लोकसंग्रह के कर्तव्य-बोध का संतुलित समन्वय करना चाहिए।
57 प्रश्न 5710 अंक
नैतिक द्वंद्व (Moral Dilemma) से आप क्या समझते हैं? क्या किसी नैतिक संघर्ष की स्थिति में वैयक्तिक नैतिकता को वृत्तिपरक (व्यावसायिक) नैतिकता पर वरीयता दी जानी चाहिए?
What do you mean by moral dilemma? Should personal ethics take precedence over professional ethics in a situation of moral conflict?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रनैतिक द्वंद्व और व्यक्तिगत बनाम व्यावसायिक नैतिकताPDF पृष्ठ 25–26
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
नैतिक द्वंद्व वह स्थिति है जहाँ दो या अधिक महत्त्वपूर्ण नैतिक मूल्य या कर्तव्य आपस में टकराते हैं और एक को चुनने पर दूसरे की उपेक्षा होने की आशंका रहती है।
वैयक्तिक और व्यावसायिक नैतिकता
1. वैयक्तिक नैतिकता — व्यक्ति के अंतःकरण, अनुभव, विश्वास और व्यक्तिगत मूल्यों से जुड़ी होती है।
2. व्यावसायिक नैतिकता — पेशे के नियमों, आचार संहिता, कानून, निष्पक्षता और सार्वजनिक जिम्मेदारी से जुड़ी होती है।
3. टकराव — कभी-कभी निजी करुणा या विश्वास किसी प्रशासनिक नियम या आदेश के साथ संघर्ष कर सकता है।
वरीयता का संतुलित दृष्टिकोण
1. सामान्य स्थिति — लोक सेवक को कानून, संविधान, नियमों और पेशेवर कर्तव्य का पालन करना चाहिए; केवल निजी मान्यता के आधार पर निर्णय लेने से पक्षपात और अव्यवस्था हो सकती है।
2. संवैधानिक नैतिकता — समानता, न्याय, गरिमा और मानवाधिकारों जैसे मूल्यों को निर्णय का आधार बनाना चाहिए।
3. अंतरात्मा की भूमिका — यदि आदेश स्पष्ट रूप से अवैध, अमानवीय या मौलिक अधिकारों के विरुद्ध हो, तो अधिकारी को उचित संस्थागत माध्यम से आपत्ति उठानी चाहिए।
4. प्रक्रिया — वरिष्ठों से परामर्श, तथ्य दर्ज करना, कानूनी सलाह लेना और उपलब्ध वैधानिक विवेक का प्रयोग करना चाहिए।
5. जवाबदेही — निर्णय व्यक्तिगत सुविधा से नहीं, सार्वजनिक हित और न्यायसंगत तर्क से उचित ठहराया जाना चाहिए।
उदाहरण
यदि पात्र वृद्ध महिला पहचान दस्तावेज खो जाने के कारण पेंशन से वंचित हो रही हो, तो अधिकारी नियमों को पूरी तरह त्यागने के बजाय वैधानिक सत्यापन की व्यवस्था कर उसकी सहायता का रास्ता खोज सकता है।
निष्कर्ष
सामान्यतः व्यावसायिक कर्तव्य और कानून को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, पर उन्हें संवैधानिक नैतिकता और मानवीय गरिमा के अनुरूप समझना जरूरी है। आदर्श स्थिति दोनों प्रकार की नैतिकता में सामंजस्य है।
58 प्रश्न 582 अंक
नैतिक द्वंद्व से आप क्या समझते हैं?
What do you understand about ethical dilemmas?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रनैतिक द्वंद्वPDF पृष्ठ 26
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
नैतिक द्वंद्व वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति को दो या अधिक परस्पर विरोधी नैतिक मूल्यों या कर्तव्यों के बीच चुनाव करना पड़ता है।
मुख्य बिंदु
1. यह केवल सही और गलत का चुनाव नहीं, बल्कि कई बार ‘सही बनाम सही’ का संघर्ष होता है।
2. एक विकल्प चुनने पर दूसरे नैतिक मूल्य की उपेक्षा हो सकती है।
3. उदाहरण — सच बताने के कर्तव्य और किसी निर्दोष व्यक्ति की सुरक्षा के बीच टकराव।
निष्कर्ष
नैतिक द्वंद्व में निर्णय लेने के लिए मूल्यों, परिणामों, कानून और सार्वजनिक हित का विवेकपूर्ण मूल्यांकन जरूरी है।
59 प्रश्न 595 अंक
एक स्वस्थ और उत्पादक जीवन जीने के लिए व्यक्ति की न्यूनतम बुनियादी जरूरतें क्या मानी गयी हैं? इन्हें सुनिश्चित करने में प्रशासक की क्या जिम्मेदारी है?
What are generally considered to be the minimum basic needs of an individual? What is the administrator's responsibility?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रबुनियादी जरूरतें और प्रशासक की जिम्मेदारीPDF पृष्ठ 26–27
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
स्वस्थ और उत्पादक जीवन के लिए व्यक्ति को कुछ बुनियादी सुविधाएँ चाहिए, जिनके बिना स्वास्थ्य, गरिमा और विकास प्रभावित होते हैं।
मुख्य बिंदु — बुनियादी जरूरतें
1. पर्याप्त पोषण और भोजन।
2. स्वच्छ पेयजल तथा स्वच्छता।
3. सुरक्षित आवास और वस्त्र।
4. प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ।
5. बुनियादी शिक्षा।
प्रशासक की जिम्मेदारी
1. योजनाओं का क्रियान्वयन — सार्वजनिक वितरण प्रणाली, पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना।
2. न्यायपूर्ण वितरण — जाति, लिंग, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव से बचना।
3. अंतिम छोर तक पहुँच — दूरस्थ और वंचित नागरिकों तक सेवाओं की पहुँच सुनिश्चित करना।
4. जवाबदेही — संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता रखना और भ्रष्टाचार रोकना।
5. शिकायत निवारण — पात्र व्यक्ति को सेवा न मिलने पर समयबद्ध समाधान करना।
निष्कर्ष
प्रशासक नीति और नागरिक के बीच सेतु है। उसका दायित्व है कि बुनियादी जरूरतों से जुड़ी सेवाएँ गरिमा, समानता और समयबद्धता के साथ उपलब्ध हों।
60 प्रश्न 605 अंक
प्रशासनिक अधिकारी के मानसिक तनाव के क्या मुख्य कारण होते हैं? समझाइए।
What are the main causes of mental stress in an administrator? Explain.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रप्रशासनिक अधिकारी का मानसिक तनावPDF पृष्ठ 27
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
प्रशासनिक अधिकारी को सीमित संसाधनों, बड़ी जिम्मेदारियों और अनेक पक्षों की अपेक्षाओं के बीच काम करना पड़ता है। इससे मानसिक तनाव उत्पन्न हो सकता है।
मुख्य बिंदु
1. संगठनात्मक कारण — अत्यधिक कार्यभार, समय-सीमा, सीमित बजट या स्टाफ, वरिष्ठों का दबाव और भूमिका-संघर्ष।
2. बाहरी कारण — राजनीतिक हस्तक्षेप, स्थानांतरण का भय, जनता की ऊँची अपेक्षाएँ और मीडिया की निगरानी।
3. संकट की स्थितियाँ — आपदा, कानून-व्यवस्था और त्वरित निर्णयों में गलती के गंभीर परिणामों की आशंका।
4. व्यक्तिगत कारण — कार्य-जीवन असंतुलन, आराम की कमी और निजी स्वास्थ्य के लिए समय न मिलना।
5. नैतिक द्वंद्व — जब नियम, आदेश, अंतरात्मा और जनहित में टकराव हो, तो मानसिक दबाव बढ़ सकता है।
6. उत्तरदायित्व — व्यापक सार्वजनिक जिम्मेदारी और निर्णयों के परिणामों का भार भी तनाव का कारण है।
निष्कर्ष
तनाव केवल काम की अधिकता से नहीं, बल्कि अधिकार और जिम्मेदारी के असंतुलन, राजनीतिक दबाव और नैतिक दुविधाओं से भी पैदा होता है।
61 प्रश्न 6110 अंक
'नैतिक निर्णय' लेने में महत्त्वपूर्ण कारकों को समझाइए। यदि नैतिक निर्णय प्रशासनिक निर्णय के विरुद्ध हो, आप दोनों में किस प्रकार समन्वय करेंगे? सोदाहरण समझाइए।
Explain the factors essential in 'Ethical decision' making. In case of ethical decisions being against administrative decisions, how will you harmonise them?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रनैतिक निर्णय और प्रशासनिक निर्णय में समन्वयPDF पृष्ठ 27–28
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
नैतिक निर्णय वह है जिसमें सही-गलत का मूल्यांकन करके न्यायपूर्ण और जिम्मेदार विकल्प चुना जाता है। प्रशासन में यह निर्णय कानून तथा लोकहित दोनों से जुड़ा होता है।
नैतिक निर्णय के महत्त्वपूर्ण कारक
1. अंतरात्मा — सही और गलत के प्रति आंतरिक चेतना।
2. व्यक्तिगत एवं सामाजिक मूल्य — ईमानदारी, करुणा, समानता और न्याय।
3. संविधान और कानून — निर्णय कानूनी तथा संवैधानिक सीमाओं के अनुरूप हो।
4. आचार संहिता — सेवा और विभाग के व्यावसायिक नियम।
5. लोकहित — निर्णय से प्रभावित सभी समूहों, विशेषकर कमजोर वर्गों, के हित पर विचार।
6. वस्तुनिष्ठता — तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित निर्णय, पूर्वाग्रह से मुक्त।
7. पारदर्शिता और जवाबदेही — निर्णय के कारण स्पष्ट हों और अधिकारी उसकी जिम्मेदारी ले।
समन्वय के तरीके
1. नियम की भावना समझना — केवल शब्दशः पालन नहीं, बल्कि नियम का उद्देश्य और संवैधानिक मूल्य भी देखना।
2. वैधानिक विवेकाधिकार — कानून के भीतर उपलब्ध विकल्पों का उचित उपयोग।
3. परामर्श — जटिल स्थिति में वरिष्ठों या कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेना।
4. तर्क दर्ज करना — निर्णय के कारण और सत्यापन का रिकॉर्ड रखना।
5. संवैधानिक नैतिकता — यदि आदेश स्पष्ट रूप से न्याय, गरिमा या मौलिक अधिकारों के विरुद्ध हो, तो उचित आधिकारिक माध्यम से आपत्ति उठाना।
उदाहरण
यदि एक पात्र वृद्ध महिला के पहचान दस्तावेज घर जलने से नष्ट हो गए हों और वह पेंशन चाहती हो, तो अधिकारी केवल मना करने के बजाय स्थानीय सत्यापन, दस्तावेज पुनः बनवाने या नियमों के अंतर्गत उपलब्ध अस्थायी प्रक्रिया का रास्ता खोज सकता है।
निष्कर्ष
प्रशासनिक नियम साधन हैं और लोककल्याण प्रमुख उद्देश्य है। पारदर्शी, वैधानिक और मानवीय विवेक से दोनों के बीच उचित समन्वय किया जा सकता है।
62 प्रश्न 625 अंक
क्या आपके विचार में प्रशासनिक निर्णय राजनीतिक पूर्वाग्रह से मुक्त होते हैं?
Do you think that Administrative Decisions are free of political bias?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रप्रशासनिक निर्णय और राजनीतिक पूर्वाग्रहPDF पृष्ठ 28
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सरल अर्थ
सिद्धांततः प्रशासनिक निर्णय संविधान, कानून और जनहित पर आधारित होने चाहिए। लेकिन व्यवहार में प्रशासन और राजनीति के संबंध के कारण राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त होना कठिन है।
मुख्य बिंदु
1. आदर्श स्थिति — लोक सेवक को राजनीतिक दल या विचारधारा के बजाय निष्पक्षता और लोकहित के आधार पर कार्य करना चाहिए।
2. राजनीतिक प्रभाव — तबादले, पदोन्नति, मनचाही पोस्टिंग और नियमों से हटकर काम करने का दबाव निर्णय को प्रभावित कर सकता है।
3. व्यक्तिगत कारण — अधिकारी भी कभी व्यक्तिगत लाभ या किसी विचारधारा के प्रति झुकाव के कारण पक्षपात कर सकता है।
4. संस्थागत सुरक्षा — सेवा-सुरक्षा, स्पष्ट नियम, उचित स्थानांतरण व्यवस्था और जवाबदेही मनमाने राजनीतिक दबाव को कम कर सकती है।
5. पारदर्शिता — निर्णयों के लिखित कारण और समान मानदंड निष्पक्षता को मजबूत करते हैं।
निष्कर्ष
प्रशासनिक निर्णय हमेशा राजनीतिक पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं होते, लेकिन संवैधानिक मूल्यों, पारदर्शी प्रक्रिया और पेशेवर तटस्थता से उनके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
63 प्रश्न 635 अंक
राजनीतिक तटस्थता सुशासन सुनिश्चित करती है। व्याख्या कीजिए।
Political neutrality brings better administration. Discuss.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रराजनीतिक तटस्थता और सुशासनPDF पृष्ठ 29
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
राजनीतिक तटस्थता का अर्थ है कि लोक सेवक किसी विशेष राजनीतिक दल के बजाय संविधान, कानून और जनहित के प्रति प्रतिबद्ध रहें।
मुख्य बिंदु
1. निष्पक्ष निर्णय — फैसले राजनीतिक दबाव या पक्षपात के बजाय तथ्यों और योग्यता पर आधारित होते हैं।
2. भ्रष्टाचार पर नियंत्रण — तटस्थता भाई-भतीजावाद और सत्ताधारी दल के पक्ष में अनुचित लाभ की संभावना को कम करती है।
3. प्रशासनिक निरंतरता — सरकार बदलने पर भी लोक सेवाएँ स्थिर और नियमित रूप से चलती रहती हैं।
4. समान सेवा — सभी नागरिकों और समुदायों को बिना राजनीतिक भेदभाव के सेवाएँ मिलती हैं।
5. जनविश्वास — निष्पक्ष व्यवहार से प्रशासन की विश्वसनीयता बढ़ती है।
निष्कर्ष
राजनीतिक तटस्थता सुशासन का एक महत्त्वपूर्ण आधार है, बशर्ते उसका अर्थ निष्क्रियता नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों के अनुसार निष्पक्ष सेवा हो।
64 प्रश्न 6410 अंक
समाज सुधार की दिशा में प्रशासन की भूमिका की चर्चा करें।
Discuss the role of administration in bringing about social reform.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रसमाज सुधार में प्रशासन की भूमिकाPDF पृष्ठ 29–30
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सरल अर्थ
समाज सुधार का उद्देश्य सामाजिक अन्याय, भेदभाव और हानिकारक प्रथाओं को कम करके समानता, गरिमा और न्याय को बढ़ावा देना है। प्रशासन कानून लागू करने, सेवाएँ पहुँचाने और जागरूकता बढ़ाने के माध्यम से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मुख्य बिंदु
1. कानून का क्रियान्वयन — भेदभाव, शोषण और हिंसा के विरुद्ध बने कानूनों को निष्पक्ष रूप से लागू करना।
2. शिक्षा और जागरूकता — सामाजिक कुरीतियों, लैंगिक समानता, स्वास्थ्य और नागरिक अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाना।
3. कमजोर वर्गों का सशक्तीकरण — महिलाओं, बच्चों, दिव्यांगजनों, अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य वंचित समूहों तक योजनाओं की पहुँच बनाना।
4. कल्याणकारी योजनाएँ — शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास और सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन।
5. महिला और बाल सुरक्षा — कार्यस्थल पर उत्पीड़न रोकना तथा महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कानूनों का पालन सुनिश्चित करना।
6. जनभागीदारी — पंचायतों, स्थानीय संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों और समुदायों को सुधार प्रक्रिया में शामिल करना।
7. जवाबदेही — शिकायत निवारण, सामाजिक अंकेक्षण और सेवा-प्रदाय के मूल्यांकन से योजनाओं के प्रभाव को जाँचना।
8. संवेदनशील प्रशासन — रीति-रिवाजों का सम्मान करते हुए भी संविधान-विरोधी भेदभाव के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई करना।
चुनौतियाँ
सामाजिक रूढ़ियाँ, जागरूकता की कमी, संसाधनों की कमी और स्थानीय प्रभावशाली समूहों का दबाव सुधार की गति को धीमा कर सकते हैं।
निष्कर्ष
प्रशासन अकेले समाज नहीं बदल सकता, लेकिन कानून, शिक्षा, कल्याणकारी योजनाओं और जनभागीदारी के माध्यम से सामाजिक सुधार को संस्थागत आधार देता है।
65 प्रश्न 655 अंक
अतिवाद घातक है। हम इससे कैसे बच सकते हैं?
Extremism is dangerous. How can we avoid it?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रअतिवाद और उससे बचावPDF पृष्ठ 30–31
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
अतिवाद किसी विचार या विश्वास को इस तरह चरम रूप में अपनाना है कि दूसरे विचारों के लिए सम्मान न रहे और विचार बलपूर्वक थोपे जाने लगें।
अतिवाद के दुष्परिणाम
1. सामाजिक सद्भाव में कमी — समाज ‘हम’ और ‘वे’ में बँट सकता है।
2. हिंसा और अस्थिरता — कट्टरता संघर्ष, भय और अविश्वास को बढ़ा सकती है।
3. लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान — संवाद, विविधता और असहमति के अधिकार कमजोर होते हैं।
4. विकास में बाधा — अस्थिरता के कारण संसाधन विकास के बजाय संघर्ष-नियंत्रण में खर्च हो सकते हैं।
बचाव के उपाय
1. मध्यम मार्ग — संतुलित सोच और विचारों के बीच संवाद को महत्व देना।
2. मूल्यपरक शिक्षा — वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आलोचनात्मक सोच विकसित करना।
3. सहिष्णुता — असहमति के अधिकार और विभिन्न समुदायों के सम्मान को स्वीकार करना।
4. समावेशी विकास — अन्याय, वंचना और भेदभाव को कम करना।
5. निरंतर संवाद — समस्याओं का समाधान हिंसा के बजाय शांतिपूर्ण चर्चा से खोजना।
निष्कर्ष
शिक्षा, न्याय, समावेशिता और संवाद अतिवाद को कम करने तथा शांतिपूर्ण समाज बनाने में मदद कर सकते हैं।
66 प्रश्न 665 अंक
समाज में निर्बल वर्गों के प्रति लोक सेवकों को अधिक करुणामय बनाने हेतु तीन सुझाव दें।
Give three suggestions to make civil servants more compassionate towards the weaker sections of society.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रनिर्बल वर्गों के प्रति करुणाPDF पृष्ठ 31
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
करुणा का अर्थ है दूसरों की पीड़ा को समझना और उसे कम करने के लिए संवेदनशील तथा जिम्मेदार कार्रवाई करना।
तीन सुझाव
1. मूल्य-आधारित प्रशिक्षण — प्रशिक्षण में समानुभूति, करुणा, भेदभाव-विरोध और वंचित वर्गों की वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित केस स्टडी तथा भूमिका-अभिनय शामिल हों।
2. प्रत्यक्ष क्षेत्रीय अनुभव — अधिकारियों को ग्रामीण, पिछड़े और शहरी वंचित इलाकों में लोगों से सीधे संवाद और क्षेत्रीय प्रवास का अवसर मिले, ताकि वे वास्तविक समस्याओं को समझ सकें।
3. कार्य-निष्पादन मूल्यांकन — कमजोर वर्गों की समस्याओं के समाधान, संवेदनशील व्यवहार और सेवाओं की पहुँच को प्रदर्शन मूल्यांकन में शामिल किया जाए; अच्छे कार्य को मान्यता भी मिले।
निष्कर्ष
प्रशिक्षण, प्रत्यक्ष अनुभव और मूल्यांकन में करुणा को महत्व देने से लोक सेवकों में मानवीय और जन-केंद्रित प्रशासन विकसित किया जा सकता है।
67 प्रश्न 6710 अंक
'एक दूसरे की सफलता बेहतर प्रशासन के लिए सीख देती है।' इस कथन का विश्लेषण उदाहरणों द्वारा कीजिए।
'Each other's success teaches a lesson for better governance.' Analyse this statement with examples.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रसफल प्रशासनिक प्रयोगों से सीखPDF पृष्ठ 31–32
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
जब कोई प्रशासनिक इकाई किसी समस्या का सफल समाधान खोजती है, तो दूसरी इकाइयाँ उससे सीखकर अपनी सेवाएँ बेहतर बना सकती हैं। इसे सर्वोत्तम अभ्यासों (Best Practices) का आदान-प्रदान कहा जाता है।
महत्त्व
1. समय और संसाधनों की बचत — पहले से परखी गई विधि अपनाने से हर विभाग को वही प्रयोग शुरू से करने की जरूरत नहीं रहती।
2. नवाचार — सफल उदाहरण नई प्रशासनिक सोच और सुधार को प्रोत्साहित करते हैं।
3. दक्षता — उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग और सेवा वितरण में सुधार हो सकता है।
4. पारदर्शिता और जवाबदेही — डिजिटल सेवाओं और स्पष्ट प्रक्रियाओं के सफल प्रयोग अन्य विभागों के लिए सीख बन सकते हैं।
5. सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद — राज्य और विभाग एक-दूसरे से सीखते हुए सुधार की दिशा में आगे बढ़ते हैं।
6. स्थानीय अनुकूलन — सफल मॉडल की अंधी नकल नहीं करनी चाहिए; उसे स्थानीय जरूरतों, संसाधनों और संस्कृति के अनुसार ढालना आवश्यक है।
उदाहरण
- राजस्थान की चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना को स्रोत में स्वास्थ्य सुरक्षा को लोगों तक पहुँचाने के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में शिक्षा और विद्यालयी वातावरण सुधारने के प्रयास अन्य राज्यों, जैसे पंजाब, के लिए सीख के रूप में चर्चा में आए हैं।
सीमाएँ
हर क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक परिस्थितियाँ अलग होती हैं। इसलिए किसी मॉडल को अपनाने से पहले उसके परिणाम, लागत और स्थानीय उपयुक्तता का मूल्यांकन आवश्यक है।
निष्कर्ष
प्रशासनिक सफलता का साझा अध्ययन सुधार को तेज कर सकता है। प्रभावी सीख वही है जिसमें प्रमाणित अनुभव को स्थानीय जरूरतों के अनुसार अपनाया जाए।
68 प्रश्न 685 अंक
'सुशासन' (Good Governance) की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
What are the characteristic features of 'good governance'?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रसुशासन की विशेषताएँPDF पृष्ठ 32
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
सुशासन ऐसी शासन-व्यवस्था है जिसमें शक्ति का प्रयोग न्यायपूर्ण, सहभागी, पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से जनता के कल्याण के लिए किया जाता है।
मुख्य विशेषताएँ
1. जन-सहभागिता — निर्णय प्रक्रिया में नागरिकों और विभिन्न समूहों की भागीदारी।
2. विधि का शासन — सभी पर कानून का समान और निष्पक्ष लागू होना तथा अधिकारों की रक्षा।
3. पारदर्शिता — निर्णय, प्रक्रिया और सूचना नागरिकों के लिए सुलभ होना।
4. जवाबदेही — अधिकारी और संस्थाएँ अपने निर्णय तथा परिणामों के लिए उत्तरदायी हों।
5. संवेदनशीलता — नागरिकों की समस्याओं का उचित समय में समाधान।
6. समानता और समावेशिता — कमजोर तथा वंचित वर्गों को विकास से बाहर न छोड़ा जाए।
7. प्रभावशीलता और दक्षता — संसाधनों का उचित उपयोग करके अपेक्षित परिणाम प्राप्त करना।
8. सहमति-उन्मुखता — विभिन्न हितों और समूहों के बीच संवाद द्वारा संतुलित निर्णय लेना।
निष्कर्ष
सुशासन नागरिकों के अधिकारों की रक्षा, सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता, सामाजिक न्याय और सतत विकास को मजबूत करता है।
69 प्रश्न 695 अंक
भारत में नागरिक अधिकार-पत्र (Citizen's Charter) के क्षेत्र में क्या प्रगति हुई है? इसके सकारात्मक प्रभाव तथा सीमाओं की व्याख्या करें।
What has been the progress in the realm of Citizen's Charters in India? Discuss the positive impact and limitations.
प्रशासकीय नीतिशास्त्रनागरिक अधिकार-पत्रPDF पृष्ठ 33
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
नागरिक अधिकार-पत्र (Citizen's Charter) किसी विभाग की सेवाओं, सेवा-मानकों, समय-सीमा और शिकायत प्रक्रिया की जानकारी नागरिकों तक पहुँचाने का साधन है।
भारत में प्रगति
1. मई 1997 में प्रभावी और उत्तरदायी सरकार के लिए कार्ययोजना के संदर्भ में नागरिक अधिकार-पत्र की औपचारिक शुरुआत हुई।
2. प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (DARPG) ने विभागों को चार्टर तैयार करने में मार्गदर्शन दिया।
3. सेवोत्तम (Sevottam) मॉडल में नागरिक अधिकार-पत्र, सेवा-वितरण क्षमता और शिकायत निवारण को महत्त्व दिया गया।
4. कई राज्यों में लोक सेवा गारंटी कानूनों ने कुछ सेवाओं की समयबद्ध उपलब्धता को कानूनी आधार दिया।
सकारात्मक प्रभाव
1. पारदर्शिता — सेवाओं, मानकों और शुल्कों की स्पष्ट जानकारी।
2. जवाबदेही — घोषित सेवा-मानकों के अनुसार कार्य करने की अपेक्षा।
3. समयबद्धता — निर्धारित समय-सीमा से देरी और लालफीताशाही कम करने में मदद।
4. नागरिक सशक्तीकरण — नागरिक अपने अधिकार और शिकायत के रास्ते बेहतर समझ सकते हैं।
सीमाएँ
1. अनेक चार्टर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते; उल्लंघन पर कार्रवाई सीमित हो सकती है।
2. नागरिकों में चार्टर के बारे में जागरूकता की कमी।
3. स्थानीय जरूरतों और कर्मचारियों से परामर्श के बिना एक जैसे प्रारूप बनाना।
4. अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण और संवेदनशीलता न मिलना।
निष्कर्ष
नागरिक अधिकार-पत्र उपयोगी तभी है जब सेवा-मानक स्पष्ट हों, नागरिक जागरूक हों, शिकायत निवारण प्रभावी हो और घोषित वादों के पालन की जवाबदेही तय हो।
70 प्रश्न 705 अंक
यदि आपको भारतीय लोक सेवकों के लिये 'नैतिक आचार संहिता' निर्मित करने के लिए कहा जाए, तो आप किन पांच सिद्धांतों को प्राथमिकता प्रदान करेंगे?
If you were asked to prepare a 'Code of Ethics' for the civil servants of India, which five important principles will you prioritise?
प्रशासकीय नीतिशास्त्रलोक सेवकों की नैतिक आचार संहिताPDF पृष्ठ 33–34
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
लोक सेवकों की नैतिक आचार संहिता का उद्देश्य प्रशासन में जनता का विश्वास, निष्पक्षता और लोकहित सुनिश्चित करना है।
पाँच प्राथमिक सिद्धांत
1. सत्यनिष्ठा (Integrity) — कथनी और करनी में एकरूपता; रिश्वत और अनुचित दबाव से दूर रहना।
2. वस्तुनिष्ठता (Objectivity) — निर्णय तथ्यों, प्रमाणों, योग्यता और स्थापित मानदंडों पर आधारित हों।
3. निष्पक्षता एवं गैर-पक्षपात (Impartiality and Non-partisanship) — राजनीतिक दल, जाति, धर्म या निजी संबंधों के आधार पर भेदभाव न करना।
4. जवाबदेही (Accountability) — अपने निर्णयों और परिणामों की जिम्मेदारी लेना तथा उनका उचित स्पष्टीकरण देना।
5. लोक सेवा के प्रति समर्पण (Dedication to Public Service) — व्यक्तिगत हित से ऊपर सार्वजनिक हित और कमजोर वर्गों के कल्याण को रखना।
निष्कर्ष
इन सिद्धांतों पर आधारित आचार संहिता लोक सेवक को केवल प्रशासनिक कर्मचारी नहीं, बल्कि जनता के प्रति उत्तरदायी सार्वजनिक सेवक बनाती है।
71 प्रश्न 712 अंक
(क) ठोस कार्बन डाई-ऑक्साइड को 'शुष्क बर्फ' क्यों कहा जाता है? (ख) भ्रमर/मधुमक्खी का डंक दर्द एवं जलन क्यों पैदा करता है?
(a) Why is solid carbon dioxide known as 'dry ice'? (b) Why does a bee-sting cause pain and irritation?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीशुष्क बर्फ और मधुमक्खी का डंकPDF पृष्ठ 34
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
(क) शुष्क बर्फ — ठोस कार्बन डाइऑक्साइड सामान्य वायुमंडलीय दाब पर द्रव बने बिना सीधे गैस में बदल जाती है। इस प्रक्रिया को ऊर्ध्वपातन (Sublimation) कहते हैं, इसलिए यह पिघलकर सतह को गीला नहीं करती।
(ख) मधुमक्खी का डंक — PDF के उत्तर के अनुसार, डंक के माध्यम से मेथेनोइक/फॉर्मिक अम्ल प्रवेश करता है, जिससे दर्द और जलन होती है।
याद रखें
ठोस से सीधे गैस में बदलना = ऊर्ध्वपातन।
72 प्रश्न 725 अंक
पूर्ण आंतरिक परावर्तन से आप क्या समझते हैं? हीरे की चमक को पूर्ण आंतरिक परावर्तन के आधार पर समझाइए।
What do you understand by total internal reflection? Explain the brilliance of diamond on this basis.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीपूर्ण आंतरिक परावर्तनPDF पृष्ठ 34–35
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम की ओर जाता है और आपतन कोण क्रांतिक कोण से अधिक हो जाता है, तो प्रकाश बाहर अपवर्तित होने के बजाय उसी माध्यम में परावर्तित हो जाता है। इसे पूर्ण आंतरिक परावर्तन (Total Internal Reflection) कहते हैं।
आवश्यक शर्तें
1. प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम की ओर जाए।
2. आपतन कोण क्रांतिक कोण से अधिक हो।
हीरे की चमक
1. हीरे का अपवर्तनांक बहुत अधिक और क्रांतिक कोण कम होता है।
2. हीरे के भीतर प्रवेश करने वाली प्रकाश किरणें उसकी कटाई से बनी सतहों पर बार-बार पूर्ण आंतरिक परावर्तन करती हैं।
3. प्रकाश बाहर निकलने से पहले कई बार परावर्तित होता है, जिससे हीरा अत्यधिक चमकदार दिखाई देता है।
निष्कर्ष
हीरे की चमक का प्रमुख कारण उसके भीतर प्रकाश का बार-बार पूर्ण आंतरिक परावर्तन है।
73 प्रश्न 732 अंक
एक हल्की व एक भारी वस्तु का संवेग समान है। इनमें से किसकी गतिज ऊर्जा अधिक होगी?
A light and a heavy body have the same momentum. Which has greater kinetic energy?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीसंवेग और गतिज ऊर्जाPDF पृष्ठ 35
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उत्तर — सरल भाषा में
उत्तर: हल्की वस्तु की गतिज ऊर्जा अधिक होगी।
व्याख्या
गतिज ऊर्जा = संवेग² ÷ (2 × द्रव्यमान)। जब दोनों वस्तुओं का संवेग समान हो, तो गतिज ऊर्जा द्रव्यमान के व्युत्क्रमानुपाती होती है। इसलिए कम द्रव्यमान वाली हल्की वस्तु की गतिज ऊर्जा अधिक होगी।
74 प्रश्न 742 अंक
वाहनों में पश्च दृश्य हेतु उत्तल दर्पण उपयोग में क्यों लिये जाते हैं?
Why are convex mirrors used as rear-view mirrors in vehicles?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीउत्तल दर्पणPDF पृष्ठ 35
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उत्तर — सरल भाषा में
मुख्य कारण
1. उत्तल दर्पण वस्तु का सीधा और आभासी प्रतिबिंब बनाता है।
2. प्रतिबिंब छोटा बनता है, इसलिए पीछे के अधिक क्षेत्र का दृश्य एक साथ दिखाई देता है।
3. इसका दृष्टि-क्षेत्र समतल दर्पण की तुलना में व्यापक होता है, जिससे चालक पीछे आने वाले वाहनों को बेहतर देख पाता है।
निष्कर्ष
व्यापक दृष्टि-क्षेत्र के कारण उत्तल दर्पण पश्च-दृश्य दर्पण के रूप में उपयोगी है।
75 प्रश्न 755 अंक
गुरुत्वीय लेंसिंग (Gravitational Lensing) क्या है? यह कैसे घटित होता है? समझाइए।
What is gravitational lensing? How does it occur?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीगुरुत्वीय लेंसिंगPDF पृष्ठ 35–36
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
गुरुत्वीय लेंसिंग वह खगोलीय घटना है जिसमें किसी विशाल द्रव्यमान वाले पिंड—जैसे आकाशगंगा, आकाशगंगा-पुंज या ब्लैक होल—के गुरुत्वीय प्रभाव से उसके पीछे स्थित दूरस्थ प्रकाश-स्रोत का प्रकाश मुड़ जाता है। विशाल पिंड लेंस की तरह काम करता है।
घटित होने की प्रक्रिया
1. आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार द्रव्यमान अंतरिक्ष-समय को वक्र करता है।
2. दूरस्थ स्रोत से आने वाला प्रकाश इस वक्रित अंतरिक्ष-समय से गुजरते समय अपना पथ बदलता है।
3. प्रेक्षक को स्रोत का स्थान बदला हुआ, अधिक चमकीला, विकृत या कभी-कभी अनेक प्रतिबिंबों में दिखाई दे सकता है।
महत्त्व
1. बहुत दूर की आकाशगंगाओं के अध्ययन में सहायता।
2. दृश्य पदार्थ के साथ-साथ ब्रह्मांड में द्रव्यमान के वितरण का अनुमान।
3. दूरस्थ प्रकाश स्रोतों का प्राकृतिक आवर्धन।
निष्कर्ष
गुरुत्वीय लेंसिंग विशाल द्रव्यमान द्वारा प्रकाश-पथ के मुड़ने की घटना है, जो ब्रह्मांड का अध्ययन करने का उपयोगी साधन है।
76 प्रश्न 762 अंक
केप्लर की ग्रहीय गति का द्वितीय नियम लिखिए। यह किस संरक्षण सिद्धांत पर आधारित है?
Write Kepler's second law of planetary motion. On which conservation principle is it based?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीकेप्लर का द्वितीय नियमPDF पृष्ठ 36
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उत्तर — सरल भाषा में
केप्लर का द्वितीय नियम (क्षेत्रफल का नियम)
सूर्य और ग्रह को जोड़ने वाली काल्पनिक रेखा समान समय-अंतराल में समान क्षेत्रफल तय करती है। इसलिए ग्रह का क्षेत्रीय वेग स्थिर रहता है।
आधार
यह कोणीय संवेग संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है। सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल केंद्रीय बल है, इसलिए ग्रह पर बल-आघूर्ण शून्य रहता है और कोणीय संवेग संरक्षित रहता है।
77 प्रश्न 775 अंक
ग्रहीय गति के केप्लर के नियमों को लिखिए।
Write Kepler's laws of planetary motion.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीकेप्लर के ग्रह गति नियमPDF पृष्ठ 36–37
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उत्तर — सरल भाषा में
केप्लर के तीन नियम
1. कक्षाओं का नियम — ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्ताकार (Elliptical) कक्षाओं में घूमते हैं और सूर्य दीर्घवृत्त के एक फोकस पर स्थित होता है।
2. क्षेत्रफल का नियम — सूर्य और ग्रह को जोड़ने वाली रेखा समान समय में समान क्षेत्रफल तय करती है। इसलिए ग्रह सूर्य के निकट तेज और दूर होने पर धीमा चलता है।
3. आवर्तकाल का नियम — ग्रह के परिक्रमा-काल का वर्ग उसकी कक्षा के अर्ध-दीर्घ-अक्ष के घन के समानुपाती होता है: (T^2 \propto a^3)。
निष्कर्ष
ये नियम ग्रहों की कक्षा, उनकी बदलती गति और परिक्रमा-काल के बीच संबंध स्पष्ट करते हैं।
78 प्रश्न 7810 अंक
मानव आँख की कार्यप्रणाली का वर्णन करें और दृष्टि के किसी एक अपवर्तक दोष एवं उसके सुधारात्मक उपाय की व्याख्या करें।
Describe the functioning of the human eye and explain one refractive defect of vision and its correction.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीमानव आँख और दृष्टि दोषPDF पृष्ठ 37–38
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उत्तर — सरल भाषा में
मानव आँख की कार्यप्रणाली
मानव आँख कैमरे की तरह प्रकाश को ग्रहण करके रेटिना पर प्रतिबिंब बनाती है।
1. कॉर्निया — प्रकाश सबसे पहले पारदर्शी कॉर्निया से प्रवेश करता है; अधिकांश अपवर्तन यहीं होता है।
2. परितारिका और पुतली — परितारिका पुतली का आकार नियंत्रित करती है। पुतली आँख में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा घटाती-बढ़ाती है।
3. अभिनेत्र लेंस — उत्तल लेंस प्रकाश को अपवर्तित करता है। पक्ष्माभी पेशियाँ इसकी वक्रता बदलती हैं, ताकि अलग-अलग दूरी की वस्तुओं का प्रतिबिंब रेटिना पर बने।
4. रेटिना — प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ प्रकाश को तंत्रिका संकेतों में बदलती हैं।
5. दृष्टि तंत्रिका — संकेत मस्तिष्क तक पहुँचाती है, जहाँ दृश्य का अर्थ समझा जाता है।
दृष्टि दोष: निकटदृष्टि (Myopia)
- व्यक्ति पास की वस्तुएँ स्पष्ट, लेकिन दूर की वस्तुएँ धुँधली देखता है।
- दूर की वस्तु का प्रतिबिंब रेटिना के आगे बनता है।
- कारण आँख के गोलक का अधिक लंबा होना या आँख के लेंस की अभिसारी शक्ति अधिक होना हो सकता है।
- सुधार: उपयुक्त अवतल (Concave) लेंस किरणों को अपसारित करके प्रतिबिंब को रेटिना पर बनाने में मदद करता है।
निष्कर्ष
कॉर्निया और लेंस प्रकाश को रेटिना पर केंद्रित करते हैं; उपयुक्त सुधारात्मक लेंस अपवर्तक दोष को ठीक करने में सहायता करता है।
79 प्रश्न 792 अंक
दूरदृष्टि दोष (Hypermetropia) क्या होता है? इस दोष को कैसे सुधारा जा सकता है?
What is hypermetropia? How can it be corrected?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीदूरदृष्टि दोषPDF पृष्ठ 38
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उत्तर — सरल भाषा में
दूरदृष्टि दोष
इसमें व्यक्ति दूर की वस्तुएँ अपेक्षाकृत स्पष्ट, लेकिन पास की वस्तुएँ धुँधली देखता है। निकट वस्तु का प्रतिबिंब रेटिना के पीछे बनता है।
सुधार
उपयुक्त क्षमता वाला उत्तल (Convex) लेंस प्रकाश किरणों को अभिसारित करके प्रतिबिंब को रेटिना पर केंद्रित करने में मदद करता है।
80 प्रश्न 802 अंक
प्रथम ऊष्मागतिक नियम के उपप्रमेय हैस के नियम (Hess's Law) का उदाहरण सहित उल्लेख करें।
State Hess's law, a corollary of the first law of thermodynamics, with an example.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीहैस का नियमPDF पृष्ठ 38–39
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उत्तर — सरल भाषा में
हैस का स्थिर ऊष्मा-संकलन नियम
किसी अभिक्रिया का कुल एन्थैल्पी परिवर्तन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि अभिक्रिया सीधे एक चरण में हुई या कई चरणों में। यह केवल प्रारंभिक और अंतिम अवस्थाओं पर निर्भर करता है।
उदाहरण
कार्बन के पूर्ण दहन से CO₂ सीधे बने या पहले CO और फिर CO₂ बने—दोनों मार्गों में समान प्रारंभिक और अंतिम अवस्था के लिए कुल एन्थैल्पी परिवर्तन समान रहेगा।
आधार
यह ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत से जुड़ा है।
81 प्रश्न 815 अंक
एमसीबी (MCB) क्या है? इसकी कार्यप्रणाली समझाइए।
What is MCB? Explain its working.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीMCB और विद्युत सुरक्षाPDF पृष्ठ 39
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
MCB का पूरा नाम Miniature Circuit Breaker है। यह विद्युत परिपथ को अतिभार (Overload) और लघुपथन (Short Circuit) से होने वाली क्षति से बचाता है। फ्यूज की तरह इसे हर बार बदलना नहीं पड़ता; दोष दूर करने के बाद इसे फिर चालू किया जा सकता है।
कार्यप्रणाली
1. अतिभार पर तापीय क्रिया — निर्धारित सीमा से अधिक धारा लंबे समय तक बहने पर द्विधात्विक पट्टी गर्म होकर मुड़ती है और ट्रिपिंग तंत्र को सक्रिय करती है।
2. शॉर्ट सर्किट पर चुंबकीय क्रिया — अत्यधिक धारा से विद्युतचुंबकीय तंत्र तुरंत सक्रिय होकर संपर्क अलग कर देता है।
3. परिपथ विच्छेद — संपर्क खुलने से धारा रुकती है और तारों तथा उपकरणों को संभावित नुकसान से बचाव मिलता है।
निष्कर्ष
MCB असामान्य धारा के समय परिपथ को स्वतः बंद करके विद्युत सुरक्षा प्रदान करता है।
82 प्रश्न 822 अंक
दो बिल्कुल समान द्रव्यमान के समरूप धातु के गोले A व B लिए जाते हैं। यदि A को +Q और B को −Q आवेश दिया जाए, तो आवेशन के पश्चात कौन-सा गोला भारी होगा और क्यों?
Two identical metallic spheres A and B are charged +Q and −Q. Which sphere will be heavier after charging and why?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीआवेश और द्रव्यमानPDF पृष्ठ 39–40
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उत्तर — सरल भाषा में
उत्तर: गोला B (ऋणावेशित) थोड़ा भारी होगा।
व्याख्या
1. +Q आवेश पाने के लिए गोला A इलेक्ट्रॉन खोता है, इसलिए उसका द्रव्यमान बहुत थोड़ा कम होता है।
2. −Q आवेश पाने के लिए गोला B अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन ग्रहण करता है, इसलिए उसका द्रव्यमान बहुत थोड़ा बढ़ता है।
निष्कर्ष
इलेक्ट्रॉनों के स्थानांतरण के कारण ऋणावेशित गोले B का द्रव्यमान गोले A से थोड़ा अधिक होगा।
83 प्रश्न 8310 अंक
ठोस के बैंड सिद्धांत के आधार पर चालक, अर्धचालक व कुचालक में भेद कीजिए।
Distinguish between conductors, semiconductors and insulators on the basis of band theory of solids.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीठोसों का बैंड सिद्धांतPDF पृष्ठ 40–41
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उत्तर — सरल भाषा में
बैंड सिद्धांत
ठोस में परमाणुओं के ऊर्जा स्तर मिलकर ऊर्जा-बैंड बनाते हैं। संयोजी बैंड (Valence Band) में संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं और चालन बैंड (Conduction Band) में पहुँचने वाले इलेक्ट्रॉन विद्युत चालन में भाग लेते हैं। इनके बीच का अंतर वर्जित ऊर्जा अंतराल (Band Gap) कहलाता है।
1. चालक (Conductor)
- संयोजी और चालन बैंड एक-दूसरे पर चढ़े होते हैं या चालन के लिए उपलब्ध ऊर्जा-अवस्थाएँ पास होती हैं।
- इलेक्ट्रॉन आसानी से गति करते हैं, इसलिए विद्युत चालकता अधिक होती है।
- उदाहरण: ताँबा, एल्युमिनियम।
2. अर्धचालक (Semiconductor)
- संयोजी और चालन बैंड के बीच छोटा ऊर्जा-अंतराल होता है।
- ताप या थोड़ी ऊर्जा मिलने पर कुछ इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में पहुँच जाते हैं।
- चालकता चालक से कम, पर कुचालक से अधिक होती है।
- उदाहरण: सिलिकॉन, जर्मेनियम।
3. कुचालक (Insulator)
- दोनों बैंड के बीच बड़ा ऊर्जा-अंतराल होता है।
- सामान्य परिस्थितियों में बहुत कम इलेक्ट्रॉन चालन बैंड तक पहुँचते हैं, इसलिए विद्युत प्रवाह बहुत कम होता है।
- उदाहरण: काँच, रबर।
निष्कर्ष
इन पदार्थों का विद्युत व्यवहार मुख्यतः उनके बैंड-अंतराल और उपलब्ध मुक्त इलेक्ट्रॉनों पर निर्भर करता है।
84 प्रश्न 845 अंक
(क) सूक्ष्म-तरंगों (माइक्रोवेव) की लगभग तरंगदैर्ध्य सीमा क्या है? (ख) माइक्रोवेव ओवन का सिद्धांत समझाइए।
(a) What is the approximate wavelength range of microwaves? (b) Explain the principle of a microwave oven.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीमाइक्रोवेव और माइक्रोवेव ओवनPDF पृष्ठ 41
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उत्तर — सरल भाषा में
(क) तरंगदैर्ध्य सीमा
माइक्रोवेव की तरंगदैर्ध्य लगभग 1 मिलीमीटर से 1 मीटर के बीच मानी जाती है। संबंधित आवृत्ति लगभग 300 MHz से 300 GHz तक होती है।
(ख) माइक्रोवेव ओवन का सिद्धांत
1. ओवन माइक्रोवेव उत्पन्न करता है, जो भोजन में मौजूद जल के ध्रुवीय अणुओं पर प्रभाव डालती हैं।
2. बदलते विद्युत क्षेत्र के कारण ये अणु बार-बार अपनी दिशा बदलने का प्रयास करते हैं।
3. अणुओं की गति और परस्पर क्रिया से ऊष्मा पैदा होती है, जो भोजन को गर्म करती है।
निष्कर्ष
माइक्रोवेव ओवन मुख्यतः परावैद्युत तापन (Dielectric Heating) के सिद्धांत पर काम करता है।
85 प्रश्न 852 अंक
एनालॉग और डिजिटल सिग्नल के बीच अंतर करें।
Distinguish between analog and digital signals.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीएनालॉग और डिजिटल सिग्नलPDF पृष्ठ 41
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उत्तर — सरल भाषा में
मुख्य अंतर
1. प्रकृति — एनालॉग सिग्नल निरंतर बदलता है; डिजिटल सिग्नल निश्चित असतत स्तरों में होता है।
2. निरूपण — एनालॉग संकेत को सामान्यतः साइन वेव, जबकि डिजिटल संकेत को वर्गाकार तरंग और बाइनरी 0 तथा 1 से दर्शाया जाता है।
3. उदाहरण — पारंपरिक ध्वनि/रेडियो संकेत एनालॉग हो सकते हैं; कंप्यूटर डेटा और डिजिटल घड़ी डिजिटल संकेतों के उदाहरण हैं।
86 प्रश्न 862 अंक
टोकामैक (Tokamak) क्या है? यह किस सिद्धांत पर आधारित है?
What is Tokamak? On what principle is it based?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीटोकामैकPDF पृष्ठ 41–42
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उत्तर — सरल भाषा में
टोकामैक
यह एक प्रयोगात्मक चुंबकीय परिरोधन युक्ति है, जिसमें अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को टोरस/डोनट के आकार में चुंबकीय क्षेत्र की सहायता से सीमित रखा जाता है।
सिद्धांत
यह नियंत्रित नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) पर आधारित है। इसमें हल्के नाभिक अत्यधिक उच्च ताप पर मिलकर भारी नाभिक बनाते हैं और ऊर्जा मुक्त होती है।
87 प्रश्न 872 अंक
नाभिकीय विखण्डन एवं संलयन को विभेदित कीजिए।
Differentiate between nuclear fission and fusion.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीनाभिकीय विखंडन और संलयनPDF पृष्ठ 42
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उत्तर — सरल भाषा में
1. विखंडन (Fission) — भारी नाभिक, जैसे यूरेनियम-235, टूटकर हल्के नाभिक बनाता है; इसे नाभिकीय रिएक्टरों में नियंत्रित रूप से उपयोग किया जाता है।
2. संलयन (Fusion) — दो हल्के नाभिक मिलकर भारी नाभिक बनाते हैं; इसके लिए अत्यधिक उच्च ताप और दाब चाहिए। सूर्य तथा तारों की ऊर्जा का स्रोत संलयन है।
मुख्य अंतर
विखंडन में भारी नाभिक टूटता है, जबकि संलयन में हल्के नाभिक जुड़ते हैं।
88 प्रश्न 882 अंक
β(−) व β(+) क्षय के लिए मूलभूत नाभिकीय प्रक्रियाओं को लिखिए।
Write the basic nuclear processes underlying β(−) and β(+) decay.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीबीटा क्षयPDF पृष्ठ 42
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उत्तर — सरल भाषा में
1. बीटा-ऋण क्षय (β⁻): न्यूट्रॉन, प्रोटॉन में बदलता है और इलेक्ट्रॉन तथा एंटी-न्यूट्रिनो उत्सर्जित होते हैं। समीकरण: n → p + e⁻ + ν̄ₑ
2. बीटा-धन क्षय (β⁺): प्रोटॉन, न्यूट्रॉन में बदलता है और पॉजिट्रॉन तथा न्यूट्रिनो उत्सर्जित होते हैं। समीकरण: p → n + e⁺ + νₑ
89 प्रश्न 8910 अंक
एम.आर.आई. (MRI) के सिद्धांत एवं कार्यप्रणाली की संक्षिप्त विवेचना कीजिए। इसे एक्स-रे टोमोग्राफी की तुलना में अधिक सुरक्षित क्यों माना जाता है?
Discuss the principle and working of MRI. Why is it considered safer than X-ray tomography?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीMRI और एक्स-रे टोमोग्राफीPDF पृष्ठ 42–43
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उत्तर — सरल भाषा में
सरल अर्थ
MRI (Magnetic Resonance Imaging) शरीर के अंदरूनी अंगों की विस्तृत छवियाँ बनाने की तकनीक है। यह नाभिकीय चुंबकीय अनुनाद (Nuclear Magnetic Resonance, NMR) के सिद्धांत पर आधारित है।
सिद्धांत और कार्यप्रणाली
1. मानव शरीर में जल की मात्रा अधिक होने के कारण हाइड्रोजन प्रोटॉन पर्याप्त संख्या में मौजूद रहते हैं।
2. शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र में प्रोटॉन एक व्यवस्थित दिशा में संरेखित होने लगते हैं।
3. रेडियो-आवृत्ति (RF) ऊर्जा देने पर प्रोटॉन ऊर्जा ग्रहण करते हैं। ऊर्जा हटने पर वे संकेत छोड़ते हैं।
4. उपकरण इन संकेतों को ग्रहण करके कंप्यूटर की मदद से शरीर के अंगों की छवि बनाता है।
5. अलग-अलग ऊतकों से मिलने वाले संकेत अलग होते हैं, इसलिए उनकी छवियाँ अलग दिखाई देती हैं।
एक्स-रे टोमोग्राफी की तुलना में सुरक्षा
1. MRI में आयनीकरण विकिरण (Ionizing Radiation) का उपयोग नहीं होता, जबकि X-ray/CT में होता है।
2. इसलिए विकिरण-जनित जोखिम से बचने के संदर्भ में MRI को लाभ मिलता है।
3. यह मस्तिष्क, रीढ़, मांसपेशियों और कई कोमल ऊतकों की विस्तृत छवियाँ देता है।
सीमा
MRI सभी व्यक्तियों या परिस्थितियों में स्वतः सुरक्षित नहीं है; कुछ धातु-आधारित प्रत्यारोपणों और विशिष्ट स्थितियों में जाँच की आवश्यकता होती है।
निष्कर्ष
MRI का प्रमुख आधार चुंबकीय क्षेत्र और रेडियो-आवृत्ति संकेत हैं, आयनीकरण विकिरण नहीं।
90 प्रश्न 905 अंक
सोडा-वाटर बोतल खोलने पर गैस सनसनाहट के साथ बाहर क्यों आती है?
Why does gas fizz out when a soda-water bottle is opened?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीसोडा-वाटर और हेनरी का नियमPDF पृष्ठ 43
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उत्तर — सरल भाषा में
वैज्ञानिक कारण
1. सोडा-वाटर में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) गैस उच्च दाब पर घुली होती है।
2. हेनरी के नियम के अनुसार स्थिर ताप पर द्रव में गैस की विलेयता उसके ऊपर गैस के आंशिक दाब के समानुपाती होती है।
3. बोतल खोलने पर अंदर का दाब घटकर वायुमंडलीय दाब के पास आ जाता है।
4. दाब कम होने पर CO₂ की विलेयता घटती है और अतिरिक्त गैस बुलबुलों के रूप में बाहर निकलती है।
निष्कर्ष
बोतल खोलने पर दाब में अचानक कमी के कारण घुली हुई CO₂ बाहर निकलती है, जिससे सनसनाहट और बुलबुले बनते हैं।
91 प्रश्न 9110 अंक
'विलयन' (Solution) शब्द की परिभाषा दीजिए। विलयन कितने प्रकार के होते हैं? प्रत्येक प्रकार को उदाहरण सहित लिखिए।
Define a solution. How many types of solutions are there? Briefly explain each with an example.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीविलयन और उसके प्रकारPDF पृष्ठ 44–45
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
दो या दो से अधिक पदार्थों का समांगी मिश्रण (Homogeneous Mixture) विलयन कहलाता है। इसमें हर भाग का संघटन समान होता है।
मुख्य घटक
1. विलायक (Solvent) — सामान्यतः अधिक मात्रा में उपस्थित घटक, जिसमें दूसरा पदार्थ घुलता है।
2. विलेय (Solute) — वह घटक जो विलायक में घुलता है।
भौतिक अवस्था के आधार पर विलयन
1. गैसीय विलयन — विलायक गैस होता है। उदाहरण: वायु में गैसों का मिश्रण; वायु में नमी; धुएँ में सूक्ष्म ठोस कण।
2. द्रव विलयन — विलायक द्रव होता है। उदाहरण: पानी में CO₂ (गैस-द्रव), पानी में अल्कोहल (द्रव-द्रव), पानी में नमक (ठोस-द्रव)।
3. ठोस विलयन — विलायक ठोस होता है। उदाहरण: पैलेडियम में हाइड्रोजन (गैस-ठोस), ठोस धातु में पारा/अमलगम (द्रव-ठोस), पीतल (ठोस-ठोस मिश्रधातु)।
इन तीनों श्रेणियों में विलेय की अवस्था गैस, द्रव या ठोस हो सकती है, इसलिए परंपरागत वर्गीकरण में नौ संयोजन बताए जाते हैं।
निष्कर्ष
विलयन समांगी मिश्रण है; उसका भौतिक प्रकार मुख्यतः विलायक की अवस्था के आधार पर पहचाना जाता है।
92 प्रश्न 922 अंक
फलों को कृत्रिम रूप से पकाने में कैल्शियम कार्बाइड की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
Explain the role of calcium carbide in artificial ripening of fruits.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीकैल्शियम कार्बाइड से फल पकानाPDF पृष्ठ 44
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उत्तर — सरल भाषा में
कैल्शियम कार्बाइड (CaC₂) नमी से अभिक्रिया करके एसिटिलीन गैस बनाता है। इस गैस का प्रभाव फल पकाने वाले हार्मोन एथिलीन जैसा बताया जाता है, जिससे फल जल्दी पकते दिखाई देते हैं।
महत्त्वपूर्ण सावधानी
कैल्शियम कार्बाइड से अशुद्ध तथा हानिकारक गैसें भी बन सकती हैं; इसलिए इसका उपयोग खाद्य फलों को पकाने के लिए सुरक्षित तरीका नहीं माना जाना चाहिए।
93 प्रश्न 932 अंक
साबुन व अपमार्जक (Detergent) के बीच दो अंतर बताइए।
Give two differences between soap and detergents.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीसाबुन और अपमार्जकPDF पृष्ठ 45
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उत्तर — सरल भाषा में
मुख्य अंतर
1. संरचना — साबुन उच्च वसा-अम्लों के सोडियम या पोटैशियम लवण होते हैं; अपमार्जक सामान्यतः सल्फोनेट या सल्फेट समूह वाले कृत्रिम सफाई पदार्थ होते हैं।
2. कठोर जल में व्यवहार — साबुन कैल्शियम और मैग्नीशियम आयनों के साथ अघुलनशील मैल/अवक्षेप बनाते हैं, इसलिए सफाई कम प्रभावी होती है। अपमार्जक सामान्यतः कठोर जल में भी अधिक प्रभावी रहते हैं।
94 प्रश्न 942 अंक
बहुलक (Polymers) की परिभाषा दीजिए। जैव-बहुलक के दो उदाहरण दीजिए।
Define polymers. Give two examples of bio-polymers.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीबहुलक और जैव-बहुलकPDF पृष्ठ 45
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उत्तर — सरल भाषा में
बहुलक
वे बड़े अणु जो अनेक छोटी संरचनात्मक इकाइयों (एकलक/Monomers) के बार-बार जुड़ने से बनते हैं, बहुलक कहलाते हैं।
जैव-बहुलक के उदाहरण
1. प्रोटीन — अमीनो अम्लों से बनते हैं।
2. सेलुलोज — ग्लूकोज इकाइयों से बना पौधों का संरचनात्मक बहुलक है।
अन्य उदाहरण: स्टार्च, DNA और RNA।
95 प्रश्न 952 अंक
रबड़ का वल्कीनीकरण (Vulcanization) क्या है?
What is vulcanization of rubber?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीरबड़ का वल्कीनीकरणPDF पृष्ठ 45
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उत्तर — सरल भाषा में
वल्कीनीकरण
प्राकृतिक रबड़ को सल्फर के साथ गर्म करके उसके गुणों में सुधार करने की प्रक्रिया वल्कीनीकरण कहलाती है। स्रोत PDF में लगभग 373–415 K तापमान का उल्लेख है।
इस प्रक्रिया में रबड़ की बहुलक शृंखलाओं के बीच सल्फर के तिर्यक बंध (Cross-links) बनते हैं। इससे रबड़ की प्रत्यास्थता, मजबूती, कठोरता और ताप सहने की क्षमता बढ़ती है तथा चिपचिपापन कम होता है।
96 प्रश्न 962 अंक
परफ्लोरोकार्बन (PFC) के गुणों तथा उपयोग के बारे में लिखें।
Name the properties and uses of perfluorocarbons (PFCs).
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीपरफ्लोरोकार्बनPDF पृष्ठ 45–46
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उत्तर — सरल भाषा में
गुण
परफ्लोरोकार्बन कार्बन और फ्लोरीन से बने यौगिक हैं। ये सामान्यतः रासायनिक रूप से स्थिर, निष्क्रिय और कई परिस्थितियों में ताप-सहिष्णु होते हैं।
उपयोग
1. कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं तथा विशेष शीतलन/ऊष्मा-स्थानांतरण अनुप्रयोगों में।
2. चिकित्सा अनुसंधान में कुछ PFC द्रवों का उपयोग ऑक्सीजन और गैसों को घोलने की क्षमता के कारण किया गया है।
याद रखें
PFC का गुण और उपयोग उसके विशिष्ट यौगिक पर निर्भर करता है।
97 प्रश्न 972 अंक
ब्रोमीन (परमाणु संख्या 35, द्रव्यमान संख्या 80) में प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन एवं न्यूट्रॉन की संख्या की गणना करें।
Calculate the number of protons, electrons and neutrons in bromine with atomic number 35 and mass number 80.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीपरमाणु संख्या और द्रव्यमान संख्याPDF पृष्ठ 46
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उत्तर — सरल भाषा में
दिया गया: परमाणु संख्या (Z=35), द्रव्यमान संख्या (A=80)।
1. प्रोटॉन = परमाणु संख्या = 35।
2. उदासीन परमाणु में इलेक्ट्रॉन = प्रोटॉन = 35।
3. न्यूट्रॉन = द्रव्यमान संख्या − परमाणु संख्या = 80 − 35 = 45।
उत्तर: 35 प्रोटॉन, 35 इलेक्ट्रॉन और 45 न्यूट्रॉन।
98 प्रश्न 982 अंक
जूल-थॉमसन प्रभाव (Joule-Thomson Effect) से आप क्या समझते हैं?
What do you understand by the Joule–Thomson effect?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीजूल-थॉमसन प्रभावPDF पृष्ठ 46
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उत्तर — सरल भाषा में
जूल-थॉमसन प्रभाव
जब वास्तविक गैस को ऊष्मा का आदान-प्रदान नगण्य रखते हुए उच्च दाब से निम्न दाब की ओर छिद्रयुक्त अवरोध/वाल्व से फैलाया जाता है, तो उसके तापमान में परिवर्तन हो सकता है।
कई गैसों में उपयुक्त ताप-सीमा पर इस प्रसार से ठंडक पैदा होती है। इस प्रभाव का उपयोग गैसों को ठंडा करने और द्रवीकरण की प्रक्रियाओं में किया जाता है।
99 प्रश्न 995 अंक
अम्ल और क्षार की लुइस अवधारणा दीजिए। एक अम्ल HA के लिए A की विद्युतऋणता अम्ल के सामर्थ्य को कैसे प्रभावित करती है? उदाहरण दीजिए।
Give the Lewis concept of acid and base. For an acid HA, how does the electronegativity of A affect acid strength? Give examples.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीलुइस अम्ल-क्षार अवधारणाPDF पृष्ठ 46–47
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उत्तर — सरल भाषा में
लुइस अवधारणा
1. लुइस अम्ल — वह कण जो इलेक्ट्रॉन-युग्म स्वीकार करता है। उदाहरण: BF₃, AlCl₃, H⁺।
2. लुइस क्षार — वह कण जो इलेक्ट्रॉन-युग्म दान करता है। उदाहरण: NH₃, H₂O, OH⁻।
HA अम्ल में A की विद्युतऋणता
एक ही आवर्त में A की विद्युतऋणता बढ़ने से H–A बंध अधिक ध्रुवीय हो सकता है और अम्लीय प्रवृत्ति बढ़ सकती है। हालांकि अम्ल की शक्ति पर बंध की मजबूती तथा विलयन में बने आयनों की स्थिरता भी प्रभाव डालती है।
निष्कर्ष
लुइस अम्ल इलेक्ट्रॉन-युग्म स्वीकारता है, जबकि लुइस क्षार उसे दान करता है।
100 प्रश्न 1005 अंक
अम्लीय वर्षा क्या है? इसकी रचना के कारण लिखें।
What is acid rain? Write the causes of its formation.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीअम्लीय वर्षाPDF पृष्ठ 47–48
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
जब वर्षा के जल का pH लगभग 5.6 से कम हो जाता है, तो उसे अम्लीय वर्षा (Acid Rain) कहते हैं।
मुख्य कारण
1. सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) — कोयला/पेट्रोलियम के दहन, ताप विद्युत संयंत्रों तथा उद्योगों से निकलती है।
2. नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ) — वाहन, औद्योगिक भट्टियों और अन्य दहन प्रक्रियाओं से निकलते हैं।
3. वायुमंडलीय अभिक्रिया — ये गैसें हवा में ऑक्सीकरण होकर जल के साथ सल्फ्यूरिक और नाइट्रिक अम्ल बना सकती हैं।
4. अवक्षेपण — बने अम्ल वर्षा, हिम या कोहरे के साथ पृथ्वी पर आते हैं।
प्रभाव
मिट्टी और जल की अम्लता बढ़ सकती है, वनस्पति/जलीय जीव प्रभावित हो सकते हैं और इमारतों व स्मारकों का क्षरण हो सकता है।
101 प्रश्न 1012 अंक
अम्लराज (Aqua Regia) क्या होता है?
What is aqua regia?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीअम्लराजPDF पृष्ठ 48
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उत्तर — सरल भाषा में
अम्लराज
यह सांद्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) और सांद्र नाइट्रिक अम्ल (HNO₃) का ताजा तैयार किया गया मिश्रण है। इनका आयतन अनुपात 3:1 होता है (तीन भाग HCl और एक भाग HNO₃)।
विशेषता
यह अत्यंत संक्षारक मिश्रण है और सोना तथा प्लैटिनम जैसी कुछ उत्कृष्ट धातुओं को घोल सकता है।
102 प्रश्न 10210 अंक
खाद्य परिरक्षण (Food Preservation) के क्या सिद्धांत हैं? इसके लिए प्रयुक्त विभिन्न विधियों को समझाइए।
What are the principles of food preservation? Explain the various methods used.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीखाद्य परिरक्षणPDF पृष्ठ 48–49
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
खाद्य परिरक्षण भोजन को सूक्ष्मजीवों और अन्य कारणों से खराब होने से बचाने तथा उसकी भंडारण अवधि बढ़ाने की प्रक्रिया है।
मुख्य सिद्धांत
1. सूक्ष्मजीवों को नष्ट करना या उनकी वृद्धि रोकना।
2. भोजन में उपस्थित एंजाइमों को निष्क्रिय करना।
3. नमी, तापमान, ऑक्सीजन या अम्लता जैसी परिस्थितियों को इस प्रकार नियंत्रित करना कि भोजन जल्दी खराब न हो।
प्रमुख विधियाँ
1. ताप उपचार — पाश्चुरीकरण, उबालना या डिब्बाबंदी द्वारा सूक्ष्मजीवों की संख्या कम करना।
2. निम्न ताप — प्रशीतन और जमाना, जिससे सूक्ष्मजीवों की वृद्धि धीमी होती है।
3. सुखाना — पानी कम करके सूक्ष्मजीवों की वृद्धि रोकना।
4. नमक/चीनी — अचार, जैम आदि में अधिक नमक या चीनी का उपयोग।
5. रासायनिक परिरक्षक — उपयुक्त खाद्य-ग्रेड परिरक्षकों का नियमानुसार प्रयोग।
6. वायुरोधी पैकिंग — हवा/नमी के संपर्क को सीमित करना।
7. किण्वन — उपयोगी सूक्ष्मजीवों से अम्ल या अन्य पदार्थ बनाकर भोजन को सुरक्षित रखना।
निष्कर्ष
परिरक्षण की विधि भोजन के प्रकार के अनुसार चुनी जाती है; उद्देश्य सुरक्षा और गुणवत्ता बनाए रखना है।
103 प्रश्न 1035 अंक
सोडा-वाटर बोतल खोलने पर गैस सनसनाहट के साथ बाहर क्यों आती है? (हेनरी नियम)
Why does gas fizz out when a soda-water bottle is opened? Explain using Henry's law.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीहेनरी का नियमPDF पृष्ठ 49
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उत्तर — सरल भाषा में
हेनरी का नियम
स्थिर ताप पर किसी द्रव में गैस की विलेयता, द्रव के ऊपर गैस के आंशिक दाब के समानुपाती होती है।
सोडा-वाटर में
1. बोतल बंद रहते समय CO₂ उच्च दाब पर पानी में अधिक मात्रा में घुली रहती है।
2. ढक्कन खोलते ही बोतल का दाब तेजी से घट जाता है।
3. दाब घटने से CO₂ की विलेयता कम हो जाती है और अतिरिक्त गैस बुलबुलों के रूप में बाहर निकलती है।
4. बुलबुलों के तेज निकलने से सनसनाहट की आवाज सुनाई देती है।
निष्कर्ष
बोतल खोलने पर दबाव घटने के कारण घुली CO₂ बाहर निकलती है।
104 प्रश्न 1045 अंक
अम्लीय और क्षारीय बफर में क्या अंतर है? प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए। ज्ञात pH का बफर विलयन कैसे तैयार किया जा सकता है?
What is the difference between an acidic and a basic buffer? Give an example of each. How can a buffer of known pH be prepared?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीअम्लीय और क्षारीय बफरPDF पृष्ठ 49–50
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उत्तर — सरल भाषा में
बफर विलयन
ऐसा विलयन जो थोड़ी मात्रा में अम्ल या क्षार मिलाने पर pH में होने वाले परिवर्तन का प्रतिरोध करता है।
अंतर
1. अम्लीय बफर — दुर्बल अम्ल और उसके संयुग्मी क्षार/लवण का मिश्रण; pH 7 से कम। उदाहरण: एसिटिक अम्ल और सोडियम एसिटेट।
2. क्षारीय बफर — दुर्बल क्षार और उसके संयुग्मी अम्ल/लवण का मिश्रण; pH 7 से अधिक। उदाहरण: अमोनिया/अमोनियम हाइड्रॉक्साइड और अमोनियम क्लोराइड।
ज्ञात pH का बफर
1. चुने गए बफर युग्म के pKa और वांछित pH के आधार पर आवश्यक अनुपात निर्धारित करें।
2. गणना के अनुसार दोनों घटकों को मापकर उपयुक्त विलायक में मिलाएँ।
3. pH मीटर से मापकर आवश्यकतानुसार समायोजित करें।
105 प्रश्न 10510 अंक
(क) pH स्केल क्या है? इसके आविष्कारक वैज्ञानिक का नाम बताइए। (ख) pH परिवर्तन से दंत क्षय की व्याख्या करें। (ग) ताजे दूध में बेकिंग सोडा मिलाने पर दही जमने के समय पर क्या प्रभाव होगा?
(a) What is the pH scale and who developed it? (b) Explain tooth decay with pH change. (c) How does baking soda affect curd setting in fresh milk?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीpH स्केल, दंत क्षय और दही जमनाPDF पृष्ठ 50–51
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उत्तर — सरल भाषा में
(क) pH स्केल
pH किसी विलयन की अम्लीयता या क्षारीयता दर्शाता है और हाइड्रोजन आयन की सांद्रता से संबंधित है। सामान्य pH स्केल 0–14 तक समझाया जाता है: 7 उदासीन, 7 से कम अम्लीय और 7 से अधिक क्षारीय। इसका विकास डेनिश रसायनज्ञ एस.पी.एल. सोरेनसेन (S. P. L. Sørensen) ने 1909 में किया।
(ख) दंत क्षय
1. मुँह के जीवाणु भोजन में बची शर्करा को तोड़कर अम्ल बनाते हैं।
2. जब मुँह का pH लगभग 5.5 से नीचे गिरता है, तो दाँतों के इनेमल का खनिज क्षरण बढ़ सकता है।
3. नियमित सफाई और अम्लीय वातावरण का समय कम करना दाँतों की सुरक्षा में मदद करता है।
(ग) दूध में बेकिंग सोडा
बेकिंग सोडा अम्ल को निष्प्रभावी करने की प्रवृत्ति रखता है। इसे ताजे दूध में मिलाने से लैक्टिक अम्ल बढ़ने और दही जमने की प्रक्रिया में देरी हो सकती है।
निष्कर्ष
pH भोजन, दंत स्वास्थ्य और किण्वन जैसी प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है।
106 प्रश्न 1065 अंक
पेय पदार्थ के नमूने में हाइड्रोजन आयन की सान्द्रता 4.0 × 10⁻³ M है। इसका pH मान क्या होगा? (log 2 = 0.301)
The hydrogen ion concentration of a beverage is 4.0 × 10⁻³ M. What is its pH? (log 2 = 0.301)
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीpH की गणनाPDF पृष्ठ 51
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उत्तर — सरल भाषा में
सूत्र
pH = −log₁₀[H⁺]
दिया है: [H⁺] = 4.0 × 10⁻³ M
गणना
pH = −log(4 × 10⁻³)
= −[log 4 + log 10⁻³]
= −[2 log 2 − 3]
= −[2 × 0.301 − 3]
= −[0.602 − 3]
= 2.398
उत्तर
pH ≈ 2.40 (विलयन अम्लीय है)।
107 प्रश्न 10710 अंक
(क) कार्बन का कौन-सा गुण बड़ी संख्या में यौगिकों के निर्माण के लिए उत्तरदायी है? (ख) कार्बन यौगिकों के अनुप्रयोग लिखिए। (ग) कृत्रिम मधुरक, खाद्य संरक्षक व जिंक अयस्क के उदाहरण दीजिए।
(a) Which property of carbon is responsible for the large number of compounds? (b) State applications of carbon compounds. (c) Give examples of artificial sweeteners, food preservatives and zinc ores.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीकार्बन के यौगिक, मधुरक और परिरक्षकPDF पृष्ठ 51–52
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उत्तर — सरल भाषा में
(क) कार्बन के विशेष गुण
1. चतुसंयोजकता (Tetravalency) — कार्बन चार सहसंयोजक बंध बना सकता है।
2. शृंखलन (Catenation) — कार्बन अपने ही परमाणुओं के साथ लंबी शृंखलाएँ, शाखाएँ और वलय बना सकता है।
इन गुणों के कारण कार्बन यौगिकों की संख्या बहुत अधिक है।
(ख) कार्बन यौगिकों के अनुप्रयोग
ईंधन, औषधियों, प्लास्टिक/बहुलकों, विलायकों, साबुन-अपमार्जक, वस्त्रों और अनेक औद्योगिक रसायनों के निर्माण में।
(ग) उदाहरण
1. कृत्रिम मधुरक — सैकरिन या एस्पार्टेम।
2. खाद्य परिरक्षक — सोडियम बेंजोएट।
3. जिंक अयस्क — जिंक ब्लेंड/स्फैलेराइट (ZnS) या कैलामाइन।
निष्कर्ष
कार्बन की चतुसंयोजकता और शृंखलन उसे विशाल संख्या में यौगिक बनाने में सक्षम बनाते हैं।
108 प्रश्न 1082 अंक
समस्थानिक (Isotopes) को परिभाषित करें। इसके दो उदाहरण दें।
Define isotopes. Give two examples.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीसमस्थानिकPDF पृष्ठ 52
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उत्तर — सरल भाषा में
समस्थानिक
एक ही तत्व के ऐसे परमाणु जिनकी परमाणु संख्या समान, लेकिन द्रव्यमान संख्या अलग-अलग होती है, समस्थानिक कहलाते हैं। इनमें प्रोटॉन समान पर न्यूट्रॉन की संख्या भिन्न होती है।
उदाहरण
1. हाइड्रोजन — प्रोटियम, ड्यूटेरियम और ट्रिटियम।
2. कार्बन — कार्बन-12 और कार्बन-14।
109 प्रश्न 1092 अंक
नाभिकीय पदार्थ का घनत्व नाभिक के आकार पर किस प्रकार निर्भर करता है? क्या परमाणु का घनत्व भी इसी नियम का पालन करता है?
How does nuclear-matter density depend on nucleus size? Does atomic density follow the same rule?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीनाभिकीय और परमाणु घनत्वPDF पृष्ठ 52–53
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उत्तर — सरल भाषा में
नाभिकीय घनत्व
नाभिकीय पदार्थ का घनत्व लगभग सभी नाभिकों के लिए स्थिर रहता है; यह नाभिक के आकार पर उल्लेखनीय रूप से निर्भर नहीं करता। कारण यह है कि नाभिक का द्रव्यमान और आयतन दोनों लगभग द्रव्यमान संख्या के समानुपाती होते हैं।
परमाणु घनत्व
नहीं। परमाणु का आकार और इलेक्ट्रॉनिक संरचना तत्वों के अनुसार बदलते हैं, इसलिए परमाणु का औसत घनत्व समान नियम का पालन नहीं करता।
110 प्रश्न 1102 अंक
अर्धचालकों और ज़र्कोनियम/टाइटेनियम उत्पादित करने के लिए प्रयुक्त परिष्करण (Refining) की विधियों के नाम दीजिए।
Name the refining methods used for producing semiconductors and zirconium/titanium.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीधातुओं का परिष्करणPDF पृष्ठ 53
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उत्तर — सरल भाषा में
1. अर्धचालक पदार्थों (जैसे सिलिकॉन और जर्मेनियम) की उच्च शुद्धता के लिए — क्षेत्र परिष्करण (Zone Refining)।
2. ज़र्कोनियम और टाइटेनियम जैसी धातुओं के लिए — वॉन आर्केल विधि (Van Arkel Method), जो वाष्प-प्रावस्था परिष्करण का उदाहरण है।
111 प्रश्न 1115 अंक
अफीम पोस्त (Opium Poppy) की औषधीय महत्ता एवं ड्रग दुरुपयोग को सूचीबद्ध कीजिए।
Enumerate the medicinal significance and drug abuse of opium poppy.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीअफीम पोस्त की औषधीय महत्ता और दुरुपयोगPDF पृष्ठ 53–54
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उत्तर — सरल भाषा में
औषधीय महत्त्व
अफीम पोस्त (Papaver somniferum) के कच्चे फल से प्राप्त लैटेक्स में कई एल्कलॉइड पाए जाते हैं।
1. मॉर्फिन (Morphine) — चिकित्सकीय निगरानी में तीव्र दर्द कम करने के लिए।
2. कोडीन (Codeine) — कुछ औषधियों में खाँसी दबाने और दर्द कम करने के लिए।
3. पैपावेरिन (Papaverine) — कुछ स्थितियों में मांसपेशियों की ऐंठन कम करने तथा रक्त वाहिकाएँ फैलाने के लिए।
4. थीबेन/थीबाइन (Thebaine) — कुछ औषधीय यौगिकों के निर्माण में उपयोगी कच्चा पदार्थ।
दुरुपयोग और जोखिम
1. अनियंत्रित सेवन से निर्भरता/लत विकसित हो सकती है।
2. अत्यधिक मात्रा से श्वसन-दमन, बेहोशी और जीवन-घातक स्थिति हो सकती है।
3. बिना चिकित्सकीय निर्देश के प्रयोग स्वास्थ्य तथा सामाजिक समस्याएँ पैदा कर सकता है।
निष्कर्ष
अफीम पोस्त से महत्त्वपूर्ण औषधियाँ मिलती हैं, लेकिन इसके पदार्थों का उपयोग नियंत्रित मात्रा और चिकित्सकीय निगरानी में ही किया जाना चाहिए।
112 प्रश्न 1125 अंक
प्रमस्तिष्क (Forebrain) के भागों का उल्लेख कीजिए एवं प्रत्येक भाग के कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए।
Mention the parts of the forebrain and list the functions of each part.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीअग्र-मस्तिष्क के भाग और कार्यPDF पृष्ठ 54
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उत्तर — सरल भाषा में
अग्र-मस्तिष्क के प्रमुख भाग
1. प्रमस्तिष्क (Cerebrum) — मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग; बुद्धि, स्मृति, तर्क, सीखने, चेतना, संवेदनाओं की व्याख्या और ऐच्छिक गतिविधियों के नियंत्रण से जुड़ा है।
2. थैलेमस (Thalamus) — अधिकांश संवेदी सूचनाओं को मस्तिष्क के उपयुक्त भागों तक पहुँचाने में रिले केंद्र की भूमिका निभाता है।
3. हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) — शरीर का तापमान, भूख, प्यास, नींद तथा अन्य स्वायत्त क्रियाओं के नियमन में सहायक है; यह पीयूष ग्रंथि के माध्यम से हार्मोन नियंत्रण से भी जुड़ा है।
निष्कर्ष
अग्र-मस्तिष्क सोच, स्मृति, संवेदनाओं की प्रक्रिया और शरीर के आंतरिक संतुलन के नियमन में महत्त्वपूर्ण है।
113 प्रश्न 1135 अंक
मानव के आहार-नाल से सम्बद्ध पाचक ग्रन्थियों एवं उनके स्रावण का वर्णन कीजिए।
Describe the digestive glands and their secretions associated with the human alimentary canal.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीपाचक ग्रंथियाँ और उनके स्रावPDF पृष्ठ 54–55
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उत्तर — सरल भाषा में
मुख्य पाचक ग्रंथियाँ और स्राव
1. लार ग्रंथियाँ — लार स्रावित करती हैं। लार एमाइलेज स्टार्च के पाचन की शुरुआत करता है।
2. आमाशय की ग्रंथियाँ — जठर रस स्रावित करती हैं; इसमें हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, पेप्सिन से संबंधित घटक और श्लेष्मा शामिल हैं। यह प्रोटीन पाचन की शुरुआत और रोगाणुओं से सुरक्षा में मदद करता है।
3. यकृत — पित्त रस बनाता है, जो पित्ताशय में संचित हो सकता है। पित्त में पाचक एंजाइम नहीं होता; यह वसा के इमल्सीकरण में मदद करता है।
4. अग्न्याशय — अग्न्याशयी रस स्रावित करता है, जिसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा के पाचन के एंजाइम होते हैं।
5. आंत्र ग्रंथियाँ — आंत्र रस स्रावित करती हैं, जो पाचन की अंतिम प्रक्रियाओं में मदद करता है।
निष्कर्ष
इन ग्रंथियों के स्राव भोजन के जटिल घटकों को अवशोषण योग्य सरल पदार्थों में बदलने में सहायता करते हैं।
114 प्रश्न 1145 अंक
विटामिन A के स्रोत क्या हैं? इसकी कमी से होने वाली बीमारियों के नाम लिखें।
What are the sources of vitamin A? List diseases caused by its deficiency.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीविटामिन A के स्रोत और कमीPDF पृष्ठ 55
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उत्तर — सरल भाषा में
विटामिन A के स्रोत
1. पादप स्रोत — गाजर, शकरकंद, कद्दू, पपीता, पका आम और हरी पत्तेदार सब्जियाँ। इनमें बीटा-कैरोटीन पाया जाता है, जिसे शरीर विटामिन A में बदल सकता है।
2. जंतु स्रोत — अंडे की जर्दी, दूध, मक्खन, पनीर और मछली के यकृत का तेल।
कमी से होने वाली समस्याएँ
1. रतौंधी (Night Blindness) — कम प्रकाश में देखने में कठिनाई।
2. आँखों में शुष्कता (Xerophthalmia)।
3. कॉर्निया को नुकसान और गंभीर स्थिति में दृष्टि-हानि।
4. वृद्धि और रोग-प्रतिरोधक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव।
निष्कर्ष
विटामिन A स्वस्थ दृष्टि, वृद्धि और प्रतिरक्षा के लिए आवश्यक है।
115 प्रश्न 11510 अंक
विधि विज्ञान में नार्को विश्लेषण, मस्तिष्क मानचित्रण (Brain Mapping) और DNA बारकोडिंग की महत्ता पर निबंध लिखें तथा इनकी सीमाएँ बताएं।
Write about the importance and limitations of narco-analysis, brain mapping and DNA barcoding in forensic science.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीफॉरेंसिक विज्ञान की तकनीकेंPDF पृष्ठ 55–56
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उत्तर — सरल भाषा में
भूमिका
फॉरेंसिक विज्ञान वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से अपराध-जाँच में मिले साक्ष्यों का विश्लेषण करता है। नार्को-विश्लेषण, मस्तिष्क मानचित्रण और DNA बारकोडिंग अलग-अलग प्रकार की जानकारी दे सकते हैं, पर उनकी अपनी सीमाएँ हैं।
1. नार्को-विश्लेषण (Narco-analysis)
- कुछ दवाओं के प्रभाव में व्यक्ति से पूछताछ की जाती है, इस आशा से कि वह कम रोक-टोक के साथ जानकारी दे।
- महत्त्व: जाँच के लिए नए सुराग मिल सकते हैं।
- सीमाएँ: व्यक्ति की कही बात स्वतः सत्य या प्रमाणित साक्ष्य नहीं मानी जा सकती; दवा, सुझाव और कल्पना उत्तरों को प्रभावित कर सकते हैं। सहमति, मानवाधिकार और कानूनी स्वीकार्यता भी महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं।
2. मस्तिष्क मानचित्रण (Brain Mapping)
- मस्तिष्क की गतिविधि/प्रतिक्रिया का अध्ययन करके कुछ उत्तेजनाओं के प्रति प्रतिक्रिया मापने का प्रयास।
- महत्त्व: जाँच में सहायक संकेत या अतिरिक्त जानकारी दे सकता है।
- सीमाएँ: परिणामों की व्याख्या जटिल होती है; प्रतिक्रिया किसी तथ्य की निश्चित पुष्टि नहीं करती और निजता/सहमति संबंधी प्रश्न उठाती है।
3. DNA बारकोडिंग (DNA Barcoding)
- DNA के छोटे मानकीकृत हिस्से की तुलना से जैविक नमूने या प्रजाति की पहचान में मदद मिलती है।
- महत्त्व: अज्ञात जैविक नमूनों की पहचान, वन्यजीव अपराध और प्रजाति-सत्यापन में उपयोगी।
- सीमाएँ: नमूना दूषित या क्षतिग्रस्त हो सकता है; परिणाम की गुणवत्ता संदर्भ-डेटाबेस और प्रयोगशाला पद्धति पर निर्भर करती है।
निष्कर्ष
ये तकनीकें जाँच में सहायक हो सकती हैं, लेकिन परिणामों को अन्य साक्ष्यों, वैज्ञानिक सीमाओं, नैतिक मानकों और लागू कानूनी प्रक्रिया के साथ परखना आवश्यक है।
116 प्रश्न 1162 अंक
रुधिर पट्टिकाणुओं (Blood Platelets) के क्या कार्य होते हैं?
What are the functions of blood platelets?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीरुधिर पट्टिकाणुPDF पृष्ठ 56
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उत्तर — सरल भाषा में
रुधिर पट्टिकाणुओं (Platelets/Thrombocytes) के मुख्य कार्य
1. रक्त का थक्का जमाने में सहायता करना, जिससे चोट लगने पर रक्तस्राव कम हो।
2. क्षतिग्रस्त रक्त वाहिका पर प्लेटलेट प्लग बनाना।
3. रक्त-स्कंदन की प्रक्रिया को सक्रिय करने वाले रसायन छोड़ना और वाहिका की मरम्मत में मदद करना।
117 प्रश्न 1172 अंक
मानव रक्त में हीमोग्लोबिन की भूमिका क्या है?
What is the role of haemoglobin in human blood?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीहीमोग्लोबिनPDF पृष्ठ 57
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उत्तर — सरल भाषा में
हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाने वाला लौह-युक्त प्रोटीन है। इसके प्रमुख कार्य
1. फेफड़ों से ऑक्सीजन बाँधकर शरीर के ऊतकों तक पहुँचाना।
2. कार्बन डाइऑक्साइड के परिवहन में कुछ योगदान देना।
3. रक्त के अम्ल-क्षार संतुलन को बनाए रखने में बफर के रूप में सहायता करना।
118 प्रश्न 1185 अंक
मानव में ABO रक्त समूहों की वंशागति को समझाइए।
Explain the inheritance of ABO blood groups in humans.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीABO रक्त समूहों की वंशागतिPDF पृष्ठ 57–58
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उत्तर — सरल भाषा में
ABO रक्त समूह तीन प्रमुख एलील से नियंत्रित होता है: Iᴬ, Iᴮ और i।
मुख्य नियम
1. Iᴬ एलील A प्रतिजन बनाने से संबंधित है; Iᴮ एलील B प्रतिजन से संबंधित है।
2. Iᴬ और Iᴮ सह-प्रभावी (Codominant) हैं; दोनों साथ हों तो AB रक्त समूह बनता है।
3. i एलील अप्रभावी (Recessive) है; ii जीनोटाइप O रक्त समूह देता है।
जीनोटाइप
- समूह A: IᴬIᴬ या Iᴬi
- समूह B: IᴮIᴮ या Iᴮi
- समूह AB: IᴬIᴮ
- समूह O: ii
निष्कर्ष
संतान का रक्त समूह माता-पिता से प्राप्त एलीलों के संयोजन से तय होता है।
119 प्रश्न 11910 अंक
एकक्लोनीय प्रतिरक्षी (Monoclonal Antibodies) क्या होते हैं? इन्हें किस प्रकार उत्पादित किया जाता है?
What are monoclonal antibodies? How are they produced?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीएकक्लोनीय प्रतिरक्षीPDF पृष्ठ 58–59
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
एकक्लोनीय प्रतिरक्षी (Monoclonal Antibodies) ऐसे प्रतिरक्षी हैं जो एक ही प्रकार की प्रतिरक्षा कोशिका/क्लोन से बनाए जाते हैं और किसी विशिष्ट प्रतिजन (Antigen) के एक विशेष भाग से जुड़ते हैं।
उत्पादन की सामान्य प्रक्रिया (Hybridoma तकनीक)
1. प्रतिजन देना — इच्छित प्रतिजन से प्रयोगात्मक पशु में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न की जाती है।
2. B-लिम्फोसाइट लेना — प्रतिरक्षी बनाने वाली कोशिकाएँ, सामान्यतः प्लीहा से, प्राप्त की जाती हैं।
3. मायलोमा कोशिकाओं से संलयन — B-कोशिकाओं को लगातार विभाजित हो सकने वाली मायलोमा कोशिकाओं से मिलाकर हाइब्रिडोमा बनाया जाता है।
4. चयन — उपयुक्त चयन माध्यम द्वारा संलयित कोशिकाएँ चुनी जाती हैं।
5. क्लोनिंग और परीक्षण — वांछित प्रतिरक्षी बनाने वाले क्लोन की पहचान करके उसका संवर्धन किया जाता है।
6. शुद्धिकरण — तैयार प्रतिरक्षी को अलग करके उपयोग के लिए शुद्ध किया जाता है।
उपयोग
रोग-निदान, जैव-चिकित्सकीय अनुसंधान, कुछ कैंसरों और प्रतिरक्षा-संबंधी स्थितियों के उपचार में।
निष्कर्ष
एकक्लोनीय प्रतिरक्षी विशिष्ट पहचान और लक्ष्य-आधारित निदान/उपचार के महत्त्वपूर्ण जैव-प्रौद्योगिकी उपकरण हैं।
120 प्रश्न 1205 अंक
रक्तदाब (Blood Pressure) क्या होता है? सामान्य रक्तदाब की परास क्या है तथा इसका मापन किस उपकरण से किया जाता है?
What is blood pressure? What is its normal range and which instrument measures it?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीरक्तदाबPDF पृष्ठ 58–59
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
रक्तदाब वह दबाव है जो बहता हुआ रक्त रक्त वाहिकाओं, विशेषकर धमनियों, की दीवारों पर डालता है।
मुख्य बिंदु
1. सिस्टोलिक रक्तदाब — हृदय के संकुचन के समय।
2. डायस्टोलिक रक्तदाब — हृदय के शिथिल होने के समय।
3. सामान्य संदर्भ मान — वयस्कों में लगभग 120/80 mmHg को सामान्य संदर्भ मान के रूप में लिया जाता है; वास्तविक मान उम्र और स्वास्थ्य के अनुसार बदल सकते हैं।
4. मापन उपकरण — स्फिग्मोमैनोमीटर (Sphygmomanometer); डिजिटल यंत्र भी उपयोग किए जाते हैं।
निष्कर्ष
रक्तदाब को सिस्टोलिक/डायस्टोलिक मान में दर्ज किया जाता है और mmHg में व्यक्त करते हैं।
121 प्रश्न 12110 अंक
'श्री अन्न' क्या है? इन्हें पोषक-धान्य (Nutri-cereals) क्यों माना जाता है? मानव आहार-नाल की पाचक ग्रंथियों का वर्णन करें।
What is 'Shree Anna'? Why are they considered nutri-cereals? Describe the digestive glands in humans.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीश्री अन्न और पाचन ग्रंथियाँPDF पृष्ठ 59–60
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उत्तर — सरल भाषा में
(क) श्री अन्न
‘श्री अन्न’ से आशय मोटे अनाज/मिलेट्स से है, जैसे बाजरा, ज्वार, रागी, कोदो, कंगनी, सांवा और कुटकी जैसे धान्य।
(ख) पोषक-धान्य क्यों?
1. आहार फाइबर की अच्छी मात्रा, जो पाचन में सहायक है।
2. कई मिलेट्स में लौह, कैल्शियम तथा अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं।
3. कुछ किस्मों का ग्लाइसेमिक प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है; इनके पोषण-मूल्य किस्म और प्रसंस्करण से बदलते हैं।
4. ये सूखा-सहिष्णु परिस्थितियों में उगाए जा सकते हैं और फसल विविधता को बढ़ाते हैं।
(ग) पाचक ग्रंथियाँ
1. लार ग्रंथियाँ — लार और एमाइलेज; स्टार्च के पाचन की शुरुआत।
2. जठर ग्रंथियाँ — जठर रस; अम्लीय वातावरण और प्रोटीन पाचन में सहायता।
3. यकृत — पित्त रस बनाता है, जो वसा के इमल्सीकरण में मदद करता है।
4. अग्न्याशय — पाचक एंजाइमों से युक्त अग्न्याशयी रस।
5. आंत्र ग्रंथियाँ — आंत्र रस, जो पाचन को पूरा करने में मदद करता है।
निष्कर्ष
श्री अन्न पोषक विविधता के लिए महत्त्वपूर्ण हैं और पाचक ग्रंथियों के स्राव भोजन को शरीर द्वारा अवशोषित किए जाने योग्य बनाते हैं।
122 प्रश्न 1222 अंक
'डी.एन.ए. वैक्सीन' क्या होती है? विश्व की प्रथम कोविड-19 DNA वैक्सीन का नाम बताइए।
What is a DNA vaccine? Name the world's first COVID-19 DNA vaccine.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीDNA वैक्सीनPDF पृष्ठ 60
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उत्तर — सरल भाषा में
DNA वैक्सीन
इसमें रोगजनक के किसी प्रतिजन के लिए आनुवंशिक निर्देश वाला DNA शरीर में पहुँचाया जाता है। शरीर की कोशिकाएँ उस प्रतिजन को बनाती हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली प्रतिक्रिया विकसित करती है।
उत्तर
स्रोत PDF के अनुसार, विश्व की प्रथम कोविड-19 DNA वैक्सीन **ZyCoV-D (जायकोव-D)** थी, जिसे भारत में Zydus Cadila ने विकसित किया।
123 प्रश्न 1235 अंक
(क) संक्रमणीय बीमारियों के क्या कारण हैं? (ख) अल्जाइमर, ट्रेकोमा, हैजा, दमा और रेबीज को संचारी व गैर-संचारी में वर्गीकृत कीजिए।
(a) What causes communicable diseases? (b) Classify Alzheimer's, trachoma, cholera, asthma and rabies as communicable or non-communicable.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीसंचारी और गैर-संचारी रोगPDF पृष्ठ 60–61
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उत्तर — सरल भाषा में
(क) संचारी रोगों के कारण
रोगजनक जैसे विषाणु, जीवाणु, कवक और परजीवी संक्रमित व्यक्ति/जीव, दूषित भोजन-पानी, वायु या वाहकों के माध्यम से फैल सकते हैं।
(ख) वर्गीकरण
- अल्जाइमर — गैर-संचारी।
- ट्रेकोमा — संचारी; जीवाणु संक्रमण से।
- हैजा — संचारी; दूषित जल/भोजन से फैलने वाला जीवाणुजनित रोग।
- दमा — गैर-संचारी; यह सामान्यतः दीर्घकालिक श्वसन स्थिति है।
- रेबीज — संचारी; संक्रमित स्तनधारी के काटने/लार से फैलने वाला विषाणुजनित रोग।
निष्कर्ष
संचारी रोगों में रोगजनक का एक स्रोत से दूसरे मेजबान तक पहुँचना होता है; गैर-संचारी रोग इस प्रकार सामान्य संक्रमण से नहीं फैलते।
124 प्रश्न 1245 अंक
उपार्जित प्रतिरक्षा (Acquired Immunity) तथा उसके प्रकारों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
Give a brief account of acquired immunity and its types.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीउपार्जित प्रतिरक्षाPDF पृष्ठ 61
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
उपार्जित प्रतिरक्षा वह विशिष्ट प्रतिरक्षा है जो जीवन के दौरान किसी प्रतिजन के संपर्क, संक्रमण या टीकाकरण से विकसित होती है।
विशेषताएँ
1. विशिष्टता — विशेष रोगजनक/प्रतिजन के विरुद्ध प्रतिक्रिया।
2. प्रतिरक्षात्मक स्मृति — दोबारा संपर्क पर तेज प्रतिक्रिया हो सकती है।
3. स्व और पराये में भेद — अपनी कोशिकाओं और बाहरी प्रतिजनों को पहचानना।
प्रकार
1. सक्रिय प्रतिरक्षा (Active) — शरीर स्वयं प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया बनाता है। यह प्राकृतिक संक्रमण या टीकाकरण से मिल सकती है।
2. निष्क्रिय प्रतिरक्षा (Passive) — तैयार प्रतिरक्षी बाहर से मिलते हैं। यह माता से शिशु को या प्रतिरक्षी-युक्त औषधि/सीरम से मिल सकती है।
निष्कर्ष
सक्रिय प्रतिरक्षा में शरीर स्वयं प्रतिक्रिया बनाता है; निष्क्रिय प्रतिरक्षा में तैयार प्रतिरक्षी प्राप्त होते हैं।
125 प्रश्न 1252 अंक
डेंगू बुखार के कारक जीव तथा इसके वाहक का नाम लिखिए।
Name the causal organism and vector of dengue fever.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीडेंगू का कारक और वाहकPDF पृष्ठ 61
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उत्तर — सरल भाषा में
कारक जीव: डेंगू वायरस (Dengue virus, DENV)।
मुख्य वाहक: संक्रमित मादा एडीज इजिप्टी (Aedes aegypti) मच्छर। एडीज एल्बोपिक्टस भी कुछ क्षेत्रों में वाहक हो सकता है।
126 प्रश्न 12610 अंक
मानवों में गुणसूत्री विकार (Chromosomal Disorders) क्या होते हैं? किन्हीं दो विकारों के कारण व लक्षण लिखिए।
What are chromosomal disorders in humans? Give the causes and symptoms of any two.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीगुणसूत्री विकारPDF पृष्ठ 61–62
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
गुणसूत्रों की संख्या या संरचना में असामान्यता के कारण होने वाली स्थितियों को गुणसूत्री विकार कहते हैं। मनुष्य की सामान्य देह कोशिका में 23 जोड़े यानी 46 गुणसूत्र होते हैं।
कारण
कोशिका विभाजन, विशेषकर अर्धसूत्री विभाजन के दौरान गुणसूत्रों का अलग न होना (Non-disjunction) एक महत्त्वपूर्ण कारण है।
दो उदाहरण
1. डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome)
- कारण — सामान्यतः 21वें गुणसूत्र की अतिरिक्त प्रति (Trisomy 21)।
- लक्षण — विकास और सीखने में अलग-अलग स्तर की कठिनाइयाँ, विशिष्ट शारीरिक लक्षण तथा कुछ स्वास्थ्य समस्याओं का बढ़ा जोखिम।
2. टर्नर सिंड्रोम (Turner Syndrome)
- कारण — महिलाओं में एक X गुणसूत्र की पूर्ण या आंशिक कमी; सामान्य रूप 45,X।
- लक्षण — कम लंबाई, अंडाशय के विकास/कार्य में समस्या तथा प्रजनन-संबंधी कठिनाइयाँ।
निष्कर्ष
गुणसूत्री विकार गुणसूत्रों की संख्या/संरचना में परिवर्तन से उत्पन्न हो सकते हैं; इनके लक्षण विकार के प्रकार पर निर्भर करते हैं।
127 प्रश्न 1272 अंक
स्वपोषित पोषण (Autotrophic Nutrition) को परिभाषित कीजिए एवं इसके प्रकारों के नाम बताइए।
Define autotrophic nutrition and name its types.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीस्वपोषित पोषणPDF पृष्ठ 62
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उत्तर — सरल भाषा में
स्वपोषित पोषण
जिस प्रक्रिया में जीव सरल अकार्बनिक पदार्थों, जैसे CO₂ और पानी, से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, उसे स्वपोषित पोषण कहते हैं।
प्रकार
1. प्रकाश-स्वपोषी — सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा से भोजन बनाना; उदाहरण: हरे पौधे और शैवाल।
2. रसायन-स्वपोषी — अकार्बनिक पदार्थों की रासायनिक अभिक्रियाओं से ऊर्जा लेकर भोजन बनाना; उदाहरण: कुछ जीवाणु।
128 प्रश्न 1282 अंक
छत्र प्रजातियाँ (Umbrella Species) क्या हैं? इसका एक उदाहरण दीजिए।
What are umbrella species? Give an example.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीछत्र प्रजातियाँPDF पृष्ठ 62–63
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उत्तर — सरल भाषा में
छत्र प्रजातियाँ
ऐसी प्रजातियाँ जिनके संरक्षण के लिए बड़े आवास-क्षेत्र को सुरक्षित करना पड़ता है; इससे उसी क्षेत्र में रहने वाली अनेक अन्य प्रजातियों का भी अप्रत्यक्ष संरक्षण होता है।
उदाहरण
बाघ — बाघ के आवास को संरक्षित करने से अनेक अन्य वन्यजीवों, पौधों और पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र को लाभ मिलता है।
129 प्रश्न 1295 अंक
पारिस्थितिक तंत्र के विभिन्न पोषी स्तरों (Trophic Levels) को सूचीबद्ध कीजिए तथा प्रत्येक का उदाहरण दीजिए।
List the trophic levels in an ecosystem and give an example of each.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीपोषी स्तरPDF पृष्ठ 63
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उत्तर — सरल भाषा में
पोषी स्तर खाद्य शृंखला में जीव की स्थिति दर्शाते हैं।
1. प्रथम पोषी स्तर — उत्पादक: हरे पौधे, घास, शैवाल।
2. द्वितीय पोषी स्तर — प्राथमिक उपभोक्ता/शाकाहारी: हिरण, खरगोश, टिड्डा।
3. तृतीय पोषी स्तर — द्वितीयक उपभोक्ता: मेंढक या छोटे मांसाहारी, जो प्राथमिक उपभोक्ताओं को खाते हैं।
4. चतुर्थ पोषी स्तर — उच्च उपभोक्ता: साँप या शिकारी पक्षी, जो अन्य उपभोक्ताओं को खाते हैं।
अपघटक
जीवाणु और कवक मृत जैव पदार्थों को तोड़कर पोषक तत्त्वों को पर्यावरण में लौटाते हैं।
निष्कर्ष
ऊर्जा उत्पादकों से उपभोक्ताओं की ओर खाद्य शृंखला के माध्यम से प्रवाहित होती है।
130 प्रश्न 1305 अंक
औषधीय पौधे—गुडूची/गिलोय के कोई पाँच लाभ लिखिए।
Write any five benefits attributed to the medicinal plant Guduchi/Giloy.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीगुडूची/गिलोयPDF पृष्ठ 63–64
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उत्तर — सरल भाषा में
गुडूची/गिलोय (Tinospora cordifolia) आयुर्वेद में पारंपरिक रूप से प्रयुक्त औषधीय पौधा है। स्रोत PDF में इसके पाँच लाभ बताए गए हैं
1. रोग प्रतिरोधक क्षमता — PDF इसे प्रतिरक्षा प्रणाली को सहारा देने से जोड़ता है।
2. ज्वर-संबंधी पारंपरिक उपयोग — बुखार की कुछ स्थितियों में इसका उपयोग बताया गया है।
3. पाचन — कब्ज, एसिडिटी, गैस और पेट की शिकायतों से जुड़े पारंपरिक उपयोग।
4. रक्त शर्करा — PDF में मधुमेह/रक्त शर्करा नियंत्रण से संबंधित संभावित उपयोग का उल्लेख है।
5. जोड़ों की सूजन/दर्द — सूजनरोधी और गठिया-संबंधी पारंपरिक उपयोग बताए गए हैं।
सावधानी
ये बिंदु स्रोत PDF में दिए गए पारंपरिक/औषधीय दावों का सार हैं, इलाज की गारंटी नहीं। गिलोय सहित हर्बल उत्पादों का सेवन, विशेषकर बीमारी या दवाएँ लेने की स्थिति में, चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं करना चाहिए।
131 प्रश्न 1315 अंक
'गोल्डन राइस' (Golden Rice) पर एक टिप्पणी लिखिए।
Write a note on Golden Rice.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीगोल्डन राइसPDF पृष्ठ 64
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
गोल्डन राइस चावल की आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) किस्म है, जिसे खाने योग्य दाने में बीटा-कैरोटीन (Pro-vitamin A) की मात्रा बढ़ाने के उद्देश्य से विकसित किया गया।
मुख्य विशेषताएँ
1. दानों का हल्का सुनहरा रंग बीटा-कैरोटीन की उपस्थिति से जुड़ा है।
2. जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा बीटा-कैरोटीन के निर्माण से जुड़े जीन चावल में लाए गए, ताकि खाने योग्य एंडोस्पर्म में यह बन सके।
3. इसका प्रमुख उद्देश्य विटामिन A की कमी से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को कम करने में मदद करना है।
महत्त्व
यह पोषण-सुधार के लिए आनुवंशिक अभियांत्रिकी के उपयोग का उदाहरण है। इसकी उपयोगिता का मूल्यांकन पोषण, सुरक्षा, पर्यावरण और स्थानीय कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाता है।
132 प्रश्न 13210 अंक
भारत के विशेष संदर्भ में जैव विविधता के यथास्थान संरक्षण (In-situ Conservation) का वर्णन कीजिए।
Describe in-situ conservation of biodiversity with special reference to India.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीजैव विविधता का यथास्थान संरक्षणPDF पृष्ठ 64–65
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
यथास्थान संरक्षण (In-situ Conservation) में वनस्पतियों, वन्यजीवों और अन्य प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित किया जाता है। इसमें केवल एक प्रजाति नहीं, बल्कि उसके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण महत्त्वपूर्ण है।
महत्त्व
1. प्रजातियों को प्राकृतिक वातावरण में रहने, प्रजनन करने और अनुकूलन का अवसर मिलता है।
2. खाद्य शृंखलाओं, आवास और पारिस्थितिक संबंधों की रक्षा होती है।
3. बड़े क्षेत्रों में अनेक प्रजातियों का एक साथ संरक्षण किया जा सकता है।
भारत में प्रमुख साधन
1. राष्ट्रीय उद्यान — प्राकृतिक आवास और वन्यजीवों का संरक्षण; उदाहरण: रणथंभौर, काजीरंगा।
2. वन्यजीव अभयारण्य — वन्यजीवों और उनके आवास की सुरक्षा; उदाहरण: गिर, केवलादेव।
3. जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserves) — जैव विविधता संरक्षण के साथ शोध और सतत उपयोग पर बल; उदाहरण: नीलगिरि।
4. संरक्षण/सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र — स्थानीय समुदायों की भागीदारी से आवास और प्रजातियों की रक्षा।
5. पवित्र उपवन (Sacred Groves) — समुदायों द्वारा परंपरागत रूप से संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र।
कानूनी और संस्थागत आधार
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और जैव विविधता अधिनियम, 2002 भारत में संरक्षण के महत्त्वपूर्ण कानूनी आधारों में शामिल हैं।
चुनौतियाँ
आवास खंडन, अवैध शिकार, आक्रामक प्रजातियाँ, प्रदूषण, मानव-वन्यजीव संघर्ष और जलवायु परिवर्तन संरक्षण को कठिन बनाते हैं।
निष्कर्ष
यथास्थान संरक्षण प्रजातियों और उनके प्राकृतिक आवास दोनों की रक्षा करता है। भारत में संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क और समुदाय की भागीदारी इसके प्रमुख साधन हैं।
133 प्रश्न 1335 अंक
आनुवंशिकतः अभियांत्रित इंसुलिन (Genetically Engineered Insulin) पर टिप्पणी लिखिए।
Write a note on genetically engineered insulin.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीआनुवंशिकतः अभियांत्रित इंसुलिनPDF पृष्ठ 65
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उत्तर — सरल भाषा में
परिचय
आनुवंशिकतः अभियांत्रित इंसुलिन को रिकॉम्बिनेंट DNA तकनीक से बनाया जाता है। इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण Humulin है। यह मधुमेह के उपचार में उपयोग होने वाले मानव इंसुलिन के समान उत्पाद है।
उत्पादन के मुख्य चरण
1. मानव इंसुलिन की A और B शृंखलाओं के अनुरूप DNA अनुक्रम तैयार किए जाते हैं।
2. DNA अनुक्रमों को उपयुक्त वाहक, जैसे प्लास्मिड, में जोड़ा जाता है।
3. आनुवंशिक सामग्री को सूक्ष्मजीवों (जैसे E. coli) में पहुँचाया जाता है।
4. सूक्ष्मजीवों द्वारा उत्पादित घटकों को अलग कर शुद्ध किया जाता है और आवश्यक इंसुलिन संरचना बनाई जाती है।
महत्त्व
1. नियंत्रित और बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव।
2. पशु-अवयवों से प्राप्त इंसुलिन पर निर्भरता कम हुई।
3. औषधि की गुणवत्ता और उपलब्धता में सुधार संभव हुआ।
निष्कर्ष
रिकॉम्बिनेंट DNA तकनीक ने इंसुलिन उत्पादन को आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी का महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग बनाया।
134 प्रश्न 1345 अंक
प्रतिरूपण (Cloning) क्या है? इसकी उपयोगिता के बारे में लिखें।
What is cloning? Write about its applications.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीप्रतिरूपण/क्लोनिंगPDF पृष्ठ 66
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
क्लोनिंग वह प्रक्रिया है जिसमें किसी जीन, कोशिका, ऊतक या जीव की आनुवंशिक रूप से बहुत समान प्रतिलिपि तैयार की जाती है।
उपयोग
1. चिकित्सा अनुसंधान — कोशिकाओं और रोग-प्रक्रियाओं का अध्ययन; स्टेम-सेल अनुसंधान में उपयोग।
2. कृषि एवं पशुपालन — उच्च उपयोगी गुणों वाले पौधों या पशुओं की समान प्रतियाँ बनाने का अनुसंधान।
3. संरक्षण — संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण-संबंधी अनुसंधान में संभावित उपयोग।
4. जैव-प्रौद्योगिकी — जीन या कोशिका की प्रतिलिपि बनाकर जैविक उत्पादों और प्रक्रियाओं का अध्ययन।
सीमाएँ
क्लोनिंग में सफलता-दर, स्वास्थ्य-संबंधी समस्याएँ, लागत और नैतिक प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं। क्लोनिंग सभी आनुवंशिक या पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान नहीं है।
निष्कर्ष
क्लोनिंग अनुसंधान, चिकित्सा और कृषि में संभावनाएँ रखती है, लेकिन इसका उपयोग सावधानी, नैतिक मानकों और वैज्ञानिक मूल्यांकन के साथ होना चाहिए।
135 प्रश्न 1355 अंक
सूचना संग्रहण, औषध तथा शल्य में जैव संवेदक (Biosensors) तथा जैव चिप्स के उपयोगों का वर्णन करें।
Describe the uses of biosensors and biochips in information storage, medicine and surgery.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीजैव संवेदक और जैव चिप्सPDF पृष्ठ 66–67
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
जैव संवेदक (Biosensor) जैविक घटक और संकेत मापने वाले उपकरण का संयोजन है, जो जैविक प्रतिक्रिया को मापने योग्य संकेत में बदलता है। जैव चिप (Biochip) छोटे आकार के मंच पर अनेक जैविक परीक्षण/प्रतिक्रियाएँ करने में सक्षम होती है।
उपयोग
1. सूचना-संग्रहण — DNA आधारित डेटा स्टोरेज और आणविक स्तर पर सूचना संग्रह के अनुसंधान में जैव चिपों की संभावना।
2. औषध/निदान — ग्लूकोमीटर जैसे संवेदक रक्त में ग्लूकोज मापते हैं; अन्य बायोसेंसर जैविक नमूनों या रोगजनकों की पहचान में सहायक हैं।
3. चिकित्सा अनुसंधान — जैव चिपों से एक साथ कई नमूनों या जैविक प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण किया जा सकता है।
4. शल्य चिकित्सा — जैविक संकेतों की निगरानी और कुछ विशिष्ट निदान प्रणालियों में सेंसर उपयोगी हो सकते हैं।
5. तेज विश्लेषण — कम नमूने में अनेक परीक्षण एक साथ करने की क्षमता।
निष्कर्ष
जैव संवेदक जैविक संकेतों का मापन करते हैं, जबकि जैव चिपें एक छोटे मंच पर कई परीक्षणों/विश्लेषणों को संभव बनाती हैं।
136 प्रश्न 1365 अंक
आनुवंशिकतः परिवर्धित फसलें (GM Crops) क्या हैं? भारतीय कृषि से सम्बन्धित उदाहरण दें।
What are genetically modified crops? Give examples related to Indian agriculture.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीGM फसलेंPDF पृष्ठ 67
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
GM फसलें वे पौधे हैं जिनके DNA में आनुवंशिक अभियांत्रिकी से इच्छित गुण विकसित करने के लिए बदलाव किया गया हो।
उद्देश्य
1. कीट या रोग के प्रति प्रतिरोध बढ़ाना।
2. सूखा, लवणता या प्रतिकूल परिस्थितियों को सहने की क्षमता विकसित करना।
3. पोषण गुणवत्ता या उत्पादकता में सुधार।
उदाहरण
1. Bt कपास — इसमें Bacillus thuringiensis के जीन का उपयोग कीट-प्रतिरोध के लिए किया गया।
2. DMH-11 सरसों — भारत में विकसित आनुवंशिक रूप से परिवर्धित सरसों का उदाहरण, जिसकी नियामक स्थिति/उपयोग पर अलग से विचार किया जाता रहा है।
3. गोल्डन राइस — बीटा-कैरोटीन बढ़ाने के उद्देश्य से विकसित GM चावल का अंतरराष्ट्रीय उदाहरण।
निष्कर्ष
GM फसलें विशिष्ट कृषि-लक्षण विकसित करने का साधन हैं; इनके उपयोग में जैव-सुरक्षा, पर्यावरण और नियामक मूल्यांकन महत्त्वपूर्ण है।
137 प्रश्न 1372 अंक
आई.पी. (IP) एड्रेस तथा मैक (MAC) एड्रेस में कोई दो अंतर बताइए।
Give any two differences between an IP address and a MAC address.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीIP और MAC एड्रेसPDF पृष्ठ 67
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उत्तर — सरल भाषा में
मुख्य अंतर
1. प्रकृति — IP एड्रेस तार्किक (Logical) नेटवर्क पता है; MAC एड्रेस नेटवर्क इंटरफेस का भौतिक/हार्डवेयर पता है।
2. उपयोग — IP एड्रेस नेटवर्कों के बीच डेटा पहुँचाने में काम आता है; MAC एड्रेस स्थानीय नेटवर्क पर फ्रेम को सही इंटरफेस तक पहुँचाने में उपयोगी है।
3. परिवर्तनशीलता — IP एड्रेस नेटवर्क कॉन्फ़िगरेशन के अनुसार बदल सकता है; MAC एड्रेस सामान्यतः नेटवर्क इंटरफेस से संबद्ध होता है, हालांकि इसे सॉफ्टवेयर से बदला/स्पूफ किया जा सकता है।
138 प्रश्न 13810 अंक
स्काई वेव और स्पेस वेव प्रसार में अंतर स्पष्ट करें।
Distinguish between sky-wave and space-wave propagation.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीस्काई वेव और स्पेस वेव प्रसारPDF पृष्ठ 68
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उत्तर — सरल भाषा में
1. स्काई वेव प्रसार (Sky-wave Propagation)
- रेडियो तरंगें आयनमंडल (Ionosphere) से अपवर्तित/वापस मुड़कर दूरस्थ स्थानों तक पहुँच सकती हैं।
- यह पृथ्वी की वक्रता के कारण सीधे न दिखने वाले क्षेत्रों तक संचार में सहायक हो सकता है।
- पारंपरिक रूप से HF बैंड की कई दूर-दूरी संचार सेवाओं में उपयोगी।
- प्रसार आयनमंडल की स्थिति, दिन-रात और सौर गतिविधि से प्रभावित हो सकता है।
2. स्पेस वेव प्रसार (Space-wave Propagation)
- तरंगें प्रेषक और ग्राही एंटीना के बीच लगभग सीधी दृष्टि-रेखा (Line of Sight) से चलती हैं।
- पृथ्वी की सतह की वक्रता और अवरोध इसकी दूरी सीमित करते हैं; ऊँचे एंटीना/रिपीटर से सीमा बढ़ाई जा सकती है।
- VHF/UHF तथा टीवी, FM और कई आधुनिक वायरलेस संचार प्रणालियों में उपयोगी।
मुख्य अंतर
स्काई वेव आयनमंडल की सहायता से क्षितिज से आगे जा सकती है; स्पेस वेव मुख्यतः दृष्टि-रेखा पर निर्भर करती है।
निष्कर्ष
प्रसार का चुनाव आवृत्ति, दूरी, वातावरण और संचार की आवश्यकता पर निर्भर करता है।
139 प्रश्न 1392 अंक
अनुरूप (Analog) और अंकीय (Digital) संकेत के मध्य अंतर करें।
Distinguish between analog and digital signals.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीअनुरूप और अंकीय संकेतPDF पृष्ठ 68
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उत्तर — सरल भाषा में
1. एनालॉग संकेत — समय के साथ निरंतर बदलता है और मानों की सतत शृंखला ले सकता है।
2. डिजिटल संकेत — निश्चित असतत स्तरों में सूचना दर्शाता है; डिजिटल प्रणालियों में सामान्यतः 0 और 1 का उपयोग होता है।
3. शोर का प्रभाव — डिजिटल संकेतों में सही सीमा के भीतर होने पर शोर को पहचानना/सुधारना आसान हो सकता है; एनालॉग संकेत में शोर मूल संकेत के साथ जुड़ जाता है।
140 प्रश्न 14010 अंक
संचार निकाय (Communication System) से आप क्या समझते हैं? इसका ब्लॉक चित्र देते हुए अवयवों को समझाइए।
What is a communication system? Give a block diagram and explain its components.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीसंचार निकाय और ब्लॉक आरेखPDF पृष्ठ 69–70
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
संचार निकाय वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से सूचना/संदेश को एक स्थान से दूसरे स्थान तक संकेत के रूप में भेजा जाता है।
ब्लॉक आरेख
सूचना स्रोत → इनपुट ट्रांसड्यूसर → ट्रांसमीटर → संचार चैनल (+ शोर) → रिसीवर → आउटपुट ट्रांसड्यूसर → गंतव्य
अवयव
1. सूचना स्रोत — मूल संदेश उत्पन्न करता है, जैसे आवाज या डेटा।
2. इनपुट ट्रांसड्यूसर — संदेश को विद्युत संकेत में बदल सकता है; उदाहरण माइक्रोफोन।
3. ट्रांसमीटर — संकेत को प्रसारण योग्य बनाता है; इसमें प्रवर्धन/मॉड्यूलेशन हो सकता है।
4. संचार चैनल — वह माध्यम जिससे संकेत गुजरता है, जैसे तार, ऑप्टिकल फाइबर या मुक्त अंतरिक्ष।
5. शोर — अवांछित संकेत जो संदेश को प्रभावित कर सकते हैं।
6. रिसीवर — प्राप्त संकेत को चुनता, प्रवर्धित और डिमॉड्यूलेट करके मूल संदेश के अनुकूल बनाता है।
7. आउटपुट ट्रांसड्यूसर/गंतव्य — संकेत को उपयोगी रूप में बदलकर प्राप्तकर्ता तक पहुँचाता है; उदाहरण स्पीकर।
निष्कर्ष
एक प्रभावी संचार निकाय में संदेश को सही ढंग से प्रेषित, ग्रहण और पुनः प्राप्त करना आवश्यक है।
141 प्रश्न 1412 अंक
बिग डेटा के संदर्भ में अपाचे हडूप (Apache Hadoop) के मुख्य घटकों के नाम क्या हैं?
Name the main components of Apache Hadoop in the context of big data.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीअपाचे हडूपPDF पृष्ठ 70
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उत्तर — सरल भाषा में
Apache Hadoop के मुख्य घटक
1. HDFS (Hadoop Distributed File System) — बड़े डेटा को अनेक मशीनों पर वितरित रूप से संग्रहित करता है।
2. YARN — क्लस्टर के संसाधनों का प्रबंधन और कार्य-निर्धारण करता है।
3. MapReduce — डेटा को वितरित रूप से संसाधित करने का प्रोग्रामिंग मॉडल।
4. Hadoop Common — अन्य घटकों के लिए सामान्य लाइब्रेरी और सहायक सुविधाएँ।
142 प्रश्न 1422 अंक
'डिजिटल रुपया' (e₹) क्या है? यह UPI से कैसे भिन्न है?
What is the Digital Rupee (e₹)? How is it different from UPI?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीडिजिटल रुपया और UPIPDF पृष्ठ 70
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उत्तर — सरल भाषा में
डिजिटल रुपया (e₹)
यह भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) है—रुपये का डिजिटल रूप।
UPI से अंतर
1. e₹ — स्वयं डिजिटल मुद्रा है और RBI की देनदारी है।
2. UPI — भुगतान का माध्यम/प्रणाली है जो बैंक खातों के बीच धन-हस्तांतरण की सुविधा देती है।
3. इसलिए e₹ डिजिटल नकदी के समान है, जबकि UPI सामान्यतः बैंक खाते में मौजूद रुपये को स्थानांतरित करने का तरीका है।
143 प्रश्न 14310 अंक
भारत सरकार द्वारा भारतीय आवश्यकताओं को संबोधित करने वाले कौन-से AI और लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLMs) विकसित किए जा रहे हैं? इनकी विशेषताएँ बताएं।
Which AI and large language models addressing Indian needs are being facilitated by the Government of India? Specify their features.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीभारत-केंद्रित AI और LLMPDF पृष्ठ 70–71
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उत्तर — सरल भाषा में
परिचय
स्रोत PDF में भारत की भाषाई विविधता और सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं के लिए कई AI/LLM पहलों का उल्लेख है।
प्रमुख पहलें
1. भाषिणी (BHASHINI) — भारतीय भाषाओं में अनुवाद और डिजिटल सेवाओं तक पहुँच बढ़ाने वाला AI-आधारित भाषा मंच।
2. भारतGPT (BharatGPT) — भारतीय संदर्भ के लिए विकसित बहुभाषी मॉडल पहल।
3. AIRAWAT — AI प्रशिक्षण और जटिल गणनाओं के लिए उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग अवसंरचना।
4. Hanooman और अन्य स्थानीय मॉडल — स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट कार्यों के लिए मॉडल पहलें।
प्रमुख विशेषताएँ
1. बहुभाषी समर्थन — भारतीय भाषाओं में सेवा देने का लक्ष्य।
2. भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ — स्थानीय बोलियों, मुहावरों और संदर्भों के अनुसार प्रशिक्षण/अनुकूलन।
3. मल्टीमोडालिटी — पाठ के साथ ध्वनि और छवि संसाधित करने की क्षमता।
4. भाषा डेटा — BHASHINI की ‘भाषा दान’ जैसी पहलें कम-संसाधन वाली भाषाओं का डेटा बढ़ाने में सहायक।
5. डेटा संप्रभुता — देश के भीतर सुरक्षित बुनियादी ढाँचे और डेटा प्रबंधन पर बल।
उपयोग
स्थानीय भाषा में सरकारी सेवाएँ, शिक्षा-सामग्री, कृषि सलाह, अनुवाद और डिजिटल समावेशन बेहतर बनाना।
निष्कर्ष
भारत-केंद्रित AI पहलों का उद्देश्य भाषा की बाधा कम करना और सेवाओं को अधिक लोगों तक पहुँचाना है।
144 प्रश्न 14410 अंक
(क) AIRAWAT का पूर्ण रूप एवं चार ढांचागत आवश्यकताएँ लिखिए। (ख) ChatGPT पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें। (ग) AI के संदर्भ में न्यूरल नेटवर्क क्या है?
(a) Give the full form of AIRAWAT and four infrastructure requirements. (b) Write a short note on ChatGPT. (c) What is a neural network in AI?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीAIRAWAT, ChatGPT और न्यूरल नेटवर्कPDF पृष्ठ 71–72
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उत्तर — सरल भाषा में
(क) AIRAWAT
पूर्ण रूप: AI Research, Analytics and Knowledge Assimilation Platform.
चार ढांचागत आवश्यकताएँ
1. High-Performance Computing (HPC) — AI मॉडल प्रशिक्षण के लिए शक्तिशाली कंप्यूटिंग/GPU।
2. विशाल डेटा स्टोरेज — बड़े डेटासेट को सुरक्षित संग्रहित और तेजी से उपलब्ध कराने के लिए।
3. हाई-स्पीड इंटरकनेक्ट — कंप्यूटिंग नोड्स के बीच तीव्र डेटा हस्तांतरण।
4. उन्नत कूलिंग और ऊर्जा प्रबंधन — उपकरणों की गर्मी नियंत्रित करना और निर्बाध बिजली उपलब्ध कराना।
(ख) ChatGPT
यह OpenAI द्वारा विकसित संवादात्मक AI प्रणाली है। यह बड़े भाषा मॉडल (LLM) पर आधारित है और प्राकृतिक भाषा में प्रश्नों के उत्तर, लेखन, अनुवाद, सारांश, विचार-संगठन और कोडिंग जैसे कार्यों में सहायता कर सकता है। इसके उत्तरों की तथ्य-जाँच आवश्यक हो सकती है।
(ग) Neural Network
यह मशीन लर्निंग मॉडल है जिसकी संरचना मानव मस्तिष्क के न्यूरॉन्स से प्रेरित होती है। इसकी सामान्य परतें
1. Input layer — डेटा ग्रहण करती है।
2. Hidden layer(s) — डेटा पर गणनाएँ/विश्लेषण करती हैं।
3. Output layer — अंतिम परिणाम या अनुमान देती है।
निष्कर्ष
AIRAWAT कंप्यूटिंग अवसंरचना, ChatGPT संवादात्मक AI और न्यूरल नेटवर्क AI मॉडल का एक प्रमुख ढाँचा है।
145 प्रश्न 1452 अंक
ओ.टी.टी. (OTT) प्लेटफॉर्म क्या है?
What is an OTT platform?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीOTT प्लेटफॉर्मPDF पृष्ठ 72
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उत्तर — सरल भाषा में
OTT (Over-the-Top) प्लेटफॉर्म इंटरनेट के माध्यम से सीधे उपयोगकर्ता तक वीडियो, ऑडियो या अन्य डिजिटल सामग्री पहुँचाते हैं। इसके लिए पारंपरिक केबल या सैटेलाइट प्रसारण की आवश्यकता नहीं होती। उदाहरण: इंटरनेट आधारित वीडियो स्ट्रीमिंग सेवाएँ।
146 प्रश्न 1462 अंक
आर.एफ.आई.डी. (RFID) प्रचालन का मूल सिद्धांत क्या है? इसके दो उपयोग दीजिए।
What is the basic principle of RFID? Give two applications.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीRFIDPDF पृष्ठ 72
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उत्तर — सरल भाषा में
मूल सिद्धांत
RFID (Radio Frequency Identification) रेडियो तरंगों से टैग में संग्रहीत पहचान-सूचना को पढ़ने की तकनीक है। रीडर रेडियो संकेत भेजता है और टैग उससे ऊर्जा/संकेत प्राप्त कर अपनी पहचान-सूचना भेजता है।
उपयोग
1. वस्तुओं/स्टॉक और माल का पता लगाना।
2. पहचान-पत्र, प्रवेश नियंत्रण, पुस्तकालय या परिवहन टोल प्रणालियाँ।
147 प्रश्न 1472 अंक
क्रिप्टोकरेंसी क्या है? इसके फायदे और नुकसान क्या हैं?
What is cryptocurrency? What are its advantages and disadvantages?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीक्रिप्टोकरेंसीPDF पृष्ठ 72–73
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उत्तर — सरल भाषा में
क्रिप्टोकरेंसी
यह डिजिटल परिसंपत्ति/मुद्रा का एक रूप है जिसमें लेन-देन के सत्यापन और रिकॉर्ड के लिए क्रिप्टोग्राफी तथा प्रायः वितरित लेजर/ब्लॉकचेन तकनीक उपयोग होती है।
फायदे
1. इंटरनेट पर सीमा-पार लेन-देन की संभावना।
2. कुछ प्रणालियों में मध्यस्थों पर निर्भरता कम हो सकती है।
नुकसान
1. कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव।
2. धोखाधड़ी, साइबर सुरक्षा और वॉलेट खोने का जोखिम।
3. विनियमन और उपभोक्ता संरक्षण संबंधी अनिश्चितताएँ।
4. कुछ प्रणालियों में ऊर्जा की अधिक खपत।
निष्कर्ष
क्रिप्टोकरेंसी तकनीकी अवसर देती है, लेकिन वित्तीय और सुरक्षा जोखिमों के कारण सावधानी जरूरी है।
148 प्रश्न 1482 अंक
साइबर युद्धनीति (Cyber Warfare) क्या है? युद्ध में इसका उपयोग कैसे होता है?
What is cyber warfare? How is it used in war?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीसाइबर युद्धनीतिPDF पृष्ठ 73
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उत्तर — सरल भाषा में
साइबर युद्धनीति
यह किसी देश या संगठन द्वारा डिजिटल नेटवर्क, कंप्यूटर और सूचना प्रणालियों का उपयोग करके विरोधी की प्रणालियों को बाधित करने, सूचना प्राप्त करने या क्षमता को नुकसान पहुँचाने की गतिविधि है।
युद्ध में उपयोग
1. सैन्य संचार और कमान प्रणालियों को बाधित करने का प्रयास।
2. महत्त्वपूर्ण अवसंरचना या सूचना नेटवर्क पर साइबर हमला।
3. जासूसी, डेटा चोरी या दुष्प्रचार अभियान।
साइबर सुरक्षा, निगरानी और सुरक्षित बैकअप ऐसे जोखिमों को कम करने में मदद करते हैं।
149 प्रश्न 1495 अंक
पिछली पीढ़ियों के मोबाइल नेटवर्क और 5G नेटवर्क में क्या अंतर है?
What are the differences between previous generations of mobile networks and 5G?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी5G और पिछली मोबाइल पीढ़ियाँPDF पृष्ठ 73–74
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उत्तर — सरल भाषा में
मुख्य अंतर
1. गति — 5G में अनुकूल परिस्थितियों में पिछली पीढ़ियों की तुलना में बहुत अधिक डेटा गति संभव है।
2. विलंबता (Latency) — 5G का लक्ष्य कम विलंबता है, जिससे रियल-टाइम सेवाएँ बेहतर हो सकती हैं।
3. क्षमता — एक ही क्षेत्र में अधिक उपकरणों को जोड़ने की क्षमता बेहतर बनाई गई है।
4. अनुप्रयोग — 5G ब्रॉडबैंड के साथ IoT, स्मार्ट उद्योग, दूरस्थ निगरानी और कुछ रियल-टाइम सेवाओं को समर्थन दे सकता है।
5. स्पेक्ट्रम और तकनीक — 5G विभिन्न बैंड, उन्नत एंटीना तकनीक तथा नेटवर्क प्रबंधन सुविधाओं का उपयोग करता है।
निष्कर्ष
5G का प्रमुख लाभ तेज डेटा, कम विलंबता और अधिक उपकरणों को जोड़ने की क्षमता है; वास्तविक प्रदर्शन कवरेज, बैंड और नेटवर्क भार पर निर्भर करता है।
150 प्रश्न 15010 अंक
नैनोपदार्थ क्या होते हैं? नैनोपदार्थ के रूप में प्रयुक्त हो रहे कार्बन के किन्हीं दो अपररूपों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
What are nanomaterials? Briefly describe two carbon allotropes used as nanomaterials.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीनैनोपदार्थ और कार्बन अपररूपPDF पृष्ठ 74
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उत्तर — सरल भाषा में
नैनोपदार्थ
ऐसे पदार्थ जिनकी कम-से-कम एक प्रमुख विमा सामान्यतः लगभग 1–100 नैनोमीटर की सीमा में हो, नैनोपदार्थ कहलाते हैं। बहुत छोटे आकार के कारण इनके भौतिक, रासायनिक, प्रकाशीय और विद्युत गुण सामान्य आकार के पदार्थों से अलग हो सकते हैं।
कार्बन के दो नैनो-अपररूप
1. कार्बन नैनोट्यूब (Carbon Nanotubes)
- कार्बन परमाणुओं की षट्कोणीय जालक-संरचना से बनी नलिका जैसी संरचना।
- कम भार के साथ उच्च यांत्रिक मजबूती और कुछ प्रकारों में अच्छी विद्युत/ऊष्मीय चालकता।
- उपयोग: उन्नत मिश्रित पदार्थ, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और संवेदकों के अनुसंधान में।
2. ग्रेफीन (Graphene)
- कार्बन परमाणुओं की एक-परमाणु-मोटी षट्कोणीय परत।
- मजबूत, हल्का और अच्छी विद्युत तथा ऊष्मीय चालकता वाला पदार्थ।
- उपयोग: इलेक्ट्रॉनिक्स, संवेदक, ऊर्जा भंडारण और मिश्रित पदार्थों के अनुसंधान में।
निष्कर्ष
नैनो-आकार पर कार्बन नैनोट्यूब और ग्रेफीन के विशिष्ट गुण उन्हें आधुनिक सामग्री-विज्ञान के लिए उपयोगी बनाते हैं।
151 प्रश्न 1515 अंक
क्लासिकल कम्प्यूटिंग एवं क्वांटम कम्प्यूटिंग के बीच कोई दो अंतर लिखिए।
Write any two differences between classical computing and quantum computing.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीक्लासिकल और क्वांटम कम्प्यूटिंगPDF पृष्ठ 74–75
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उत्तर — सरल भाषा में
मुख्य अंतर
1. सूचना इकाई — क्लासिकल कंप्यूटर बिट (0 या 1) का उपयोग करते हैं; क्वांटम कंप्यूटर क्यूबिट (Qubit) का उपयोग करते हैं, जो मापन से पहले सुपरपोज़िशन की अवस्था में हो सकता है।
2. कार्यप्रणाली — क्लासिकल गणना सामान्य लॉजिक गेटों से होती है; क्वांटम गणना क्वांटम अवस्थाओं और क्वांटम गेटों का उपयोग करती है।
3. क्वांटम विशेषताएँ — सुपरपोज़िशन और एंटैंगलमेंट कुछ विशिष्ट समस्याओं में लाभ दे सकते हैं।
4. उपयोगिता — क्वांटम कंप्यूटर हर कार्य में तेज नहीं होते; संभावित लाभ विशेष प्रकार की गणनाओं, सिमुलेशन और कुछ अनुकूलित समस्याओं में हैं।
निष्कर्ष
क्लासिकल और क्वांटम कंप्यूटिंग सूचना को संसाधित करने के आधारभूत तरीके में भिन्न हैं।
152 प्रश्न 15210 अंक
रीयल टाइम-PCR (RT-PCR) की अवधारणा की व्याख्या करें। कोविड-19 टेस्ट में 'Ct value' क्या है?
Explain real-time PCR. What is the Ct value in an RT-PCR test for COVID-19?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीRT-PCR और Ct ValuePDF पृष्ठ 75–76
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उत्तर — सरल भाषा में
RT-PCR की अवधारणा
Real-time reverse transcription PCR एक प्रयोगशाला तकनीक है, जिसमें RNA जैसे आनुवंशिक पदार्थ को पहले DNA की पूरक प्रति (cDNA) में बदला जाता है और फिर विशिष्ट DNA अनुक्रम की मात्रा को बढ़ाकर/मापकर जाँचा जाता है।
कार्यप्रणाली
1. नमूना — नाक/गले आदि से लिया गया नमूना तैयार किया जाता है।
2. Reverse transcription — RNA को cDNA में बदला जाता है।
3. Amplification — विशिष्ट लक्ष्य DNA की प्रतियाँ PCR चक्रों द्वारा बढ़ाई जाती हैं।
4. Fluorescence — हर चक्र में लक्ष्य की मात्रा बढ़ने पर फ्लोरोसेंट संकेत मापा जाता है।
5. परिणाम — यदि लक्ष्य अनुक्रम उपयुक्त सीमा तक बढ़ता है, तो परीक्षण में उसकी उपस्थिति का संकेत मिलता है।
Ct value
Ct (Cycle threshold) वह चक्र संख्या है जिस पर फ्लोरोसेंट संकेत निर्धारित पहचान-सीमा को पार करता है।
व्याख्या
1. समान परीक्षण परिस्थितियों में कम Ct का अर्थ नमूने में प्रारंभिक लक्ष्य RNA की अधिक मात्रा का संकेत हो सकता है।
2. अधिक Ct का अर्थ लक्ष्य की शुरुआती मात्रा कम हो सकती है।
3. Ct की तुलना नमूने की गुणवत्ता, परीक्षण-किट और प्रयोगशाला परिस्थितियों को ध्यान में रखकर करनी चाहिए; इसे अकेले रोग की गंभीरता या संक्रामकता का निश्चित माप नहीं मानना चाहिए।
निष्कर्ष
RT-PCR आनुवंशिक पदार्थ की पहचान/मात्रात्मक निगरानी में उपयोगी है, जबकि Ct value लक्ष्य संकेत के सीमा पार करने वाले चक्र को दर्शाती है।
153 प्रश्न 1535 अंक
भारत का नैनो-मिशन व उसके उद्देश्य क्या हैं?
What is India's Nano Mission and what are its objectives?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीभारत का नैनो मिशनPDF पृष्ठ 76
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उत्तर — सरल भाषा में
परिचय
भारत का Nano Mission विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत नैनो-विज्ञान और नैनो-प्रौद्योगिकी अनुसंधान को बढ़ावा देने की राष्ट्रीय पहल है। इसे 2007 में शुरू किया गया।
मुख्य उद्देश्य
1. नैनो-विज्ञान में आधारभूत अनुसंधान को प्रोत्साहित करना।
2. नैनो-प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों को विकसित करना—जैसे स्वास्थ्य, ऊर्जा, जल-शुद्धिकरण और सामग्री विज्ञान।
3. उन्नत उपकरणों, प्रयोगशालाओं और अनुसंधान केंद्रों जैसी अवसंरचना विकसित करना।
4. वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और तकनीकी मानव संसाधन का प्रशिक्षण।
5. विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग के बीच सहयोग बढ़ाना।
6. अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग को प्रोत्साहन देना।
निष्कर्ष
नैनो मिशन का लक्ष्य नैनो-विज्ञान में शोध क्षमता और उपयोगी तकनीकी अनुप्रयोगों को मजबूत करना है।
154 प्रश्न 15420 अंक
ई-प्रशासन, ई-व्यापार तथा अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति में सूचना तकनीकों के उपयोग का वर्णन करें।
Give an account of the use of information technology in e-governance, e-commerce and international diplomacy.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीई-प्रशासन, ई-व्यापार और डिजिटल कूटनीतिPDF पृष्ठ 76–77
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उत्तर — सरल भाषा में
भूमिका
सूचना प्रौद्योगिकी ने शासन, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सूचना के आदान-प्रदान, सेवा-प्रदान तथा निर्णय प्रक्रिया को तेज और अधिक व्यापक बनाया है।
1. ई-प्रशासन (E-Governance)
- ऑनलाइन सेवाएँ — प्रमाण-पत्र, आवेदन, कर, लाइसेंस और अन्य नागरिक सेवाओं को डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराना।
- पारदर्शिता — पोर्टल पर नियम, आवेदन की स्थिति, खर्च और योजनाओं की जानकारी देना।
- जवाबदेही — डिजिटल रिकॉर्ड, समय-सीमा तथा ट्रैकिंग से सेवा-प्रदान की निगरानी।
- जनभागीदारी — ऑनलाइन शिकायत, सुझाव, परामर्श और सूचना तक पहुँच।
- चुनौतियाँ — डिजिटल विभाजन, डेटा गोपनीयता, साइबर सुरक्षा और तकनीकी साक्षरता की कमी।
2. ई-व्यापार (E-Commerce)
- डिजिटल बाजार — इंटरनेट के माध्यम से वस्तुओं और सेवाओं का प्रदर्शन, खरीद-बिक्री और ऑर्डर प्रबंधन।
- भुगतान — डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन बैंकिंग और इलेक्ट्रॉनिक बिलिंग से लेन-देन आसान होता है।
- आपूर्ति शृंखला — स्टॉक, परिवहन, डिलीवरी और ग्राहक सेवा का डिजिटल प्रबंधन।
- बाजार का विस्तार — छोटे व्यापारी भी व्यापक क्षेत्र के ग्राहकों तक पहुँच सकते हैं।
- चुनौतियाँ — साइबर धोखाधड़ी, नकली उत्पाद, उपभोक्ता डेटा सुरक्षा और ऑनलाइन विवाद।
3. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति (Digital Diplomacy)
- संवाद — डिजिटल मंचों से देशों, दूतावासों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के बीच तेज संचार।
- सार्वजनिक कूटनीति — सोशल मीडिया तथा डिजिटल सामग्री से देश की नीतियों, संस्कृति और दृष्टिकोण की जानकारी।
- संकट प्रबंधन — आपात स्थितियों में नागरिकों को सूचना देना और समन्वय बनाना।
- डेटा आधारित नीति — वैश्विक घटनाओं, जनमत और आर्थिक प्रवृत्तियों पर जानकारी से निर्णय प्रक्रिया को सहायता।
- चुनौतियाँ — दुष्प्रचार, साइबर हमले, गलत सूचना और संवेदनशील डेटा की सुरक्षा।
समग्र मूल्यांकन
सूचना प्रौद्योगिकी कार्यक्षमता, पहुँच और पारदर्शिता बढ़ा सकती है, लेकिन डिजिटल सेवाओं की विश्वसनीयता के लिए मजबूत सुरक्षा, गोपनीयता, समावेशन और मानव निगरानी आवश्यक हैं।
निष्कर्ष
ई-प्रशासन में IT नागरिक सेवा और जवाबदेही को, ई-व्यापार में बाजार एवं लेन-देन को और डिजिटल कूटनीति में अंतरराष्ट्रीय संवाद को अधिक सक्षम बनाती है।
155 प्रश्न 1555 अंक
नैनोकण का आकार क्या है? इनकी उपयोगिता के दो उदाहरण दें।
What is the size of nanoparticles? Give two examples of their applications.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीनैनोकणों का आकार और उपयोगPDF पृष्ठ 77
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उत्तर — सरल भाषा में
आकार
नैनोकण ऐसे कण होते हैं जिनका कम-से-कम एक आयाम सामान्यतः 1 से 100 नैनोमीटर (nm) के बीच होता है।
उपयोग के उदाहरण
1. औषधि-वितरण और निदान — नैनो-आधारित वाहक दवा को लक्षित स्थान तक पहुँचाने या जैविक पहचान में सहायक हो सकते हैं।
2. उत्प्रेरक — बड़े सतही क्षेत्र के कारण कुछ नैनो-सामग्री रासायनिक अभिक्रियाओं को अधिक प्रभावी बना सकती हैं।
3. अन्य उपयोग — सनस्क्रीन, संवेदक, ऊर्जा भंडारण तथा इलेक्ट्रॉनिक सामग्री।
निष्कर्ष
बहुत छोटे आकार और बड़े सतही क्षेत्र के कारण नैनोकणों के गुण उपयोगी हो सकते हैं।
156 प्रश्न 1565 अंक
क्वांटम बिंदु (Quantum Dots) क्या हैं? इनकी उपयोगिता के बारे में लिखें।
What are quantum dots? Write about their applications.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीक्वांटम बिंदुPDF पृष्ठ 77–78
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उत्तर — सरल भाषा में
परिभाषा
क्वांटम बिंदु अर्धचालक पदार्थों के अत्यंत छोटे नैनो-क्रिस्टल होते हैं। इनके छोटे आकार के कारण इनके प्रकाशीय और इलेक्ट्रॉनिक गुण आकार के अनुसार बदल सकते हैं।
उपयोग
1. डिस्प्ले तकनीक — अलग आकार के क्वांटम डॉट अलग रंगों का प्रकाश उत्सर्जित कर सकते हैं; इसलिए उन्नत स्क्रीन में उपयोग।
2. जैव-इमेजिंग — कुछ क्वांटम डॉट जैविक नमूनों में चमकीले संकेतक के रूप में उपयोगी हो सकते हैं।
3. सौर ऊर्जा — प्रकाश अवशोषण और ऊर्जा रूपांतरण पर आधारित अनुसंधान में उपयोग।
4. संवेदक — प्रकाशीय/रासायनिक पहचान की कुछ तकनीकों में संभावित उपयोग।
निष्कर्ष
क्वांटम डॉट के आकार-निर्भर गुण उन्हें डिस्प्ले, जैव-इमेजिंग और ऊर्जा-संबंधी अनुसंधान के लिए उपयोगी बनाते हैं।
157 प्रश्न 1575 अंक
2024 में ड्राफ्ट की गई राजस्थान पर्यटन नीति के तहत पर्यटन विभाग द्वारा कौन-सी नई डिजिटल पहलों की योजना बनाई जा रही है?
Which new digital initiatives are being planned by the Department of Tourism under the draft Rajasthan Tourism Policy 2024?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीराजस्थान पर्यटन नीति 2024 की डिजिटल पहलेंPDF पृष्ठ 78
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उत्तर — सरल भाषा में
स्रोत PDF में उल्लिखित प्रमुख डिजिटल पहलें
1. AI चैटबॉट और वर्चुअल असिस्टेंट — पर्यटकों के प्रश्नों, यात्रा योजना और चौबीसों घंटे सहायता के लिए।
2. VR/AR अनुभव — किलों और महलों के इतिहास को डिजिटल/आभासी अनुभव के रूप में प्रस्तुत करना।
3. एकीकृत राजस्थान पर्यटन ऐप — टिकट, मान्यता प्राप्त गाइड, नेविगेशन और आपातकालीन सहायता जैसी सुविधाएँ।
4. स्मार्ट डेस्टिनेशन प्रबंधन — भीड़ प्रबंधन और संसाधनों के उपयोग के लिए डेटा एनालिटिक्स/IoT।
5. डिजिटल भुगतान और QR कोड — कैशलेस लेन-देन और स्मारकों के बारे में तुरंत जानकारी।
6. डिजिटल मार्केटिंग — सोशल मीडिया और लक्षित डिजिटल प्रचार से पर्यटन स्थलों का प्रसार।
निष्कर्ष
इन पहलों का लक्ष्य पर्यटक अनुभव को सहज बनाना और राजस्थान को स्मार्ट पर्यटन गंतव्य के रूप में बढ़ावा देना है।
158 प्रश्न 15810 अंक
राजस्थान सरकार के पशुपालन विभाग द्वारा चलाये जा रहे नस्ल सुधार कार्यक्रम की विवेचना कीजिए।
Discuss the breed improvement programme undertaken by the Department of Animal Husbandry, Government of Rajasthan.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीराजस्थान पशुपालन विभाग का नस्ल सुधार कार्यक्रमPDF पृष्ठ 78–79
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उत्तर — सरल भाषा में
उद्देश्य
1. दूध, मांस और ऊन की प्रति-पशु उत्पादकता बढ़ाना।
2. आनुवंशिक रूप से बेहतर पशु विकसित करना।
3. पशुपालकों की आय और आजीविका में सुधार।
4. राजस्थान की स्थानीय जलवायु के अनुकूल देशी नस्लों का संरक्षण।
प्रमुख तकनीकें
1. कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Insemination) — उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले सांडों के वीर्य से प्रजनन।
2. लिंग-वर्गीकृत वीर्य (Sex-sorted Semen) — मादा बछड़ों की संभावना बढ़ाने हेतु।
3. भ्रूण प्रत्यारोपण (Embryo Transfer Technology) — श्रेष्ठ नस्ल के भ्रूण को दूसरी मादा में प्रत्यारोपित करना।
4. संतति परीक्षण (Progeny Testing) — पशु की आनुवंशिक क्षमता का आकलन उसकी संतति के उत्पादन रिकॉर्ड से करना।
राजस्थान की नस्लें
- गोवंश: थारपारकर, राठी, गिर और कांकरेज।
- भैंस: मुर्रा सहित बेहतर उत्पादक नस्लों का सुधार।
- भेड़: चोकला और मारवाड़ी।
- बकरी: सिरोही।
स्रोत में उल्लिखित संस्थागत समर्थन
बस्सी (जयपुर), कुम्हेर (भरतपुर), डग (झालावाड़) और नागौर जैसे राजकीय प्रजनन फार्म नस्ल सुधार और तकनीकी सहायता से जुड़े हैं।
महत्त्व और चुनौतियाँ
नस्ल सुधार से उत्पादकता और आय बढ़ सकती है; इसके लिए गुणवत्तापूर्ण पशु-स्वास्थ्य सेवाएँ, चारा, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप चयन और कार्यक्रम की निगरानी आवश्यक है।
निष्कर्ष
नस्ल सुधार कार्यक्रम उन्नत प्रजनन तकनीक तथा देशी नस्लों के संरक्षण को जोड़कर राजस्थान के पशुपालन क्षेत्र की उत्पादकता और आजीविका बेहतर बनाने का प्रयास करता है।
159 प्रश्न 15910 अंक
भारत के रक्षा उत्पादन, विशेष रूप से मिसाइल और अंतरिक्ष तकनीकों में स्वदेशीकरण के रणनीतिक और प्रौद्योगिकीय महत्त्व का समालोचनात्मक मूल्यांकन करें।
Critically evaluate the strategic and technological importance of indigenization in Indian defence production, especially missile and space technologies.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीरक्षा उत्पादन और अंतरिक्ष तकनीक में स्वदेशीकरणPDF पृष्ठ 79–80
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उत्तर — सरल भाषा में
अर्थ
रक्षा और अंतरिक्ष तकनीकों में स्वदेशीकरण का मतलब है देश के भीतर ही प्रणालियों का डिजाइन, विकास और निर्माण करना।
रणनीतिक महत्त्व
1. सामरिक स्वायत्तता — संकट के समय विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम होती है।
2. आपूर्ति शृंखला सुरक्षा — स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और तकनीकी सहायता की उपलब्धता पर घरेलू नियंत्रण बढ़ता है।
3. संवेदनशीलता और सुरक्षा — महत्त्वपूर्ण प्रणालियों, सॉफ्टवेयर और डेटा पर अधिक नियंत्रण संभव होता है।
4. प्रतिरोधक क्षमता — स्वदेशी मिसाइल प्रणाली देश की रक्षा क्षमता को मजबूत कर सकती है।
प्रौद्योगिकीय महत्त्व
1. अनुसंधान एवं विकास — DRDO, ISRO, सार्वजनिक क्षेत्र और निजी उद्योग के बीच अनुसंधान को प्रोत्साहन।
2. कौशल और रोजगार — उच्च तकनीकी उत्पादन, परीक्षण और विनिर्माण में क्षमता निर्माण।
3. नागरिक उपयोग — रक्षा/अंतरिक्ष में विकसित तकनीकें सामग्री विज्ञान, संचार, मौसम, टेलीमेडिसिन और आपदा प्रबंधन में सहायक हो सकती हैं।
4. उदाहरण — अग्नि, पृथ्वी, ब्रह्मोस, PSLV, GSLV और NavIC जैसे कार्यक्रम स्वदेशी क्षमता के अलग-अलग पहलू दिखाते हैं।
चुनौतियाँ
भारत कुछ उन्नत इंजन, उच्च-स्तरीय चिप, सामग्री और अन्य उप-प्रणालियों में आयात पर निर्भर रह सकता है। लागत, अनुसंधान समय, परीक्षण, गुणवत्ता और तकनीकी साझेदारी भी महत्त्वपूर्ण हैं।
निष्कर्ष
स्वदेशीकरण सामरिक स्वायत्तता और तकनीकी क्षमता को मजबूत करता है, लेकिन सतत अनुसंधान, गुणवत्ता, निजी क्षेत्र की भागीदारी और प्रमुख तकनीकी निर्भरताओं को कम करने पर ध्यान देना आवश्यक है।
160 प्रश्न 1605 अंक
आदित्य-L1 (ADITYA-L1) मिशन पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।
Write a brief note on the Aditya-L1 mission.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीआदित्य-L1 मिशनPDF पृष्ठ 80
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परिचय
आदित्य-L1 भारत का सूर्य-अध्ययन मिशन है, जिसे ISRO ने सूर्य के बाहरी वातावरण और अंतरिक्ष मौसम से जुड़ी प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए भेजा।
मुख्य बिंदु
1. उद्देश्य — सूर्य के प्रकाशमंडल, वर्णमंडल, कोरोना, सौर पवन और सौर गतिविधियों का अध्ययन।
2. स्थान — यह पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किलोमीटर दूर सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के L1 लैग्रांज बिंदु के आसपास हेलो कक्षा में काम करने के लिए बनाया गया।
3. लाभ — L1 के आसपास से सूर्य का अपेक्षाकृत निरंतर अवलोकन किया जा सकता है।
4. उपकरण — मिशन पर सूर्य के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करने वाले कई वैज्ञानिक उपकरण हैं; इनमें कोरोना और सौर विकिरण/कणों के अध्ययन के उपकरण शामिल हैं।
5. उपयोगिता — सौर ज्वालाओं, कोरोनल मास इजेक्शन और अंतरिक्ष मौसम को समझने में सहायता, जो उपग्रहों और संचार प्रणालियों को प्रभावित कर सकते हैं।
निष्कर्ष
आदित्य-L1 भारत की सौर भौतिकी और अंतरिक्ष मौसम अनुसंधान क्षमता को आगे बढ़ाने वाला मिशन है।
161 प्रश्न 1612 अंक
ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV) और भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV) में क्या अंतर है?
What is the difference between the Polar Satellite Launch Vehicle and Geosynchronous Satellite Launch Vehicle?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीPSLV और GSLVPDF पृष्ठ 81
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उत्तर — सरल भाषा में
मुख्य अंतर
1. PSLV — मुख्यतः ध्रुवीय और सूर्य-समकालिक कक्षाओं में उपग्रह भेजने के लिए उपयोग किया जाता है; पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों के प्रक्षेपण में विशेष रूप से उपयोगी।
2. GSLV — भारी उपग्रहों को भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा में भेजने के लिए विकसित किया गया; संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण में उपयोगी।
3. प्रणोदन — GSLV के विन्यास में क्रायोजेनिक ऊपरी चरण का उपयोग रहा है; PSLV का चरण-विन्यास अलग है।
162 प्रश्न 1625 अंक
निम्नलिखित मिसाइलों के मुख्य बिंदुओं को लिखिए: (क) QRSAM (ख) ASTRA
Write the salient features of (a) QRSAM and (b) ASTRA missiles.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीQRSAM और ASTRA मिसाइलPDF पृष्ठ 81–82
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उत्तर — सरल भाषा में
(क) QRSAM (Quick Reaction Surface-to-Air Missile)
1. यह सतह से हवा में मार करने वाली त्वरित प्रतिक्रिया वाली मिसाइल प्रणाली है।
2. इसे DRDO ने भारतीय उद्योगों के सहयोग से विकसित किया।
3. चलते हुए सैन्य काफिले को हवाई खतरों से सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाया गया।
4. स्रोत PDF में इसकी मारक दूरी लगभग 25–30 किमी बताई गई है।
5. इसमें स्वदेशी रडार/गाइडेंस तकनीक की भूमिका है।
(ख) ASTRA
1. यह भारत की स्वदेशी हवा-से-हवा में मार करने वाली मिसाइल है।
2. इसे Beyond Visual Range (BVR) श्रेणी में रखा जाता है।
3. स्रोत PDF में ASTRA Mk-1 की दूरी 100 किमी से अधिक बताई गई है।
4. यह सक्रिय रडार होमिंग जैसी तकनीक का उपयोग करती है।
5. इसे भारतीय लड़ाकू विमानों के साथ एकीकृत करने का कार्य किया गया है।
निष्कर्ष
QRSAM भूमि-आधारित हवाई रक्षा के लिए है, जबकि ASTRA लड़ाकू विमान से हवा में लक्ष्य पर प्रहार करने के लिए बनाई गई है।
163 प्रश्न 1635 अंक
मिसाइल और सामरिक प्रणाली (MSS) का उद्देश्य लिखें। MSS क्लस्टर में शामिल प्रयोगशालाओं के नाम लिखिए।
State the objectives of the Missiles and Strategic Systems (MSS) cluster and name its laboratories.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीमिसाइल और सामरिक प्रणाली क्लस्टरPDF पृष्ठ 82
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उत्तर — सरल भाषा में
उद्देश्य
1. मिसाइल प्रणालियों का डिजाइन, विकास और परीक्षण।
2. रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक बढ़ाना और आयात पर निर्भरता घटाना।
3. अलग-अलग मारक दूरी/प्रकार की मिसाइलों से राष्ट्रीय रक्षा और सामरिक निवारण क्षमता मजबूत करना।
स्रोत PDF में उल्लिखित प्रमुख प्रयोगशालाएँ
1. DRDL — Defence Research and Development Laboratory, हैदराबाद।
2. RCI — Research Centre Imarat, हैदराबाद।
3. ASL — Advanced Systems Laboratory, हैदराबाद।
4. ITR — Integrated Test Range, चाँदीपुर।
5. TBRL — Terminal Ballistics Research Laboratory, चंडीगढ़।
निष्कर्ष
MSS क्लस्टर मिसाइल डिजाइन, मार्गदर्शन, परीक्षण और संबंधित रक्षा प्रणालियों के विकास को समन्वित करता है।
164 प्रश्न 1645 अंक
राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM) क्या है? इस मिशन की कोई तीन प्रमुख उपलब्धियाँ लिखिए।
What is the National Supercomputing Mission (NSM)? Write three major achievements.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीराष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशनPDF पृष्ठ 82–83
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उत्तर — सरल भाषा में
परिचय
राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM) भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी गणना क्षमता बढ़ाने की पहल है। इसे 2015 में शुरू किया गया। स्रोत PDF के अनुसार, इसका संयुक्त संचालन DST और MeitY तथा कार्यान्वयन C-DAC और IISc द्वारा किया जाता है।
मुख्य उद्देश्य
शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों को उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग अवसंरचना और सुपरकंप्यूटिंग प्रणालियाँ उपलब्ध कराना।
तीन उपलब्धियों के उदाहरण
1. स्वदेशी सुपरकंप्यूटिंग प्रणालियों का विकास और स्थापना।
2. ‘रुद्र’ सर्वर तथा स्वदेशी सुपरकंप्यूटिंग तकनीकी क्षमता विकसित करने पर काम।
3. संस्थानों में ‘परम शिवाय’, ‘परम शक्ति’, ‘परम ब्रह्म’ और ‘परम संगणक’ जैसी प्रणालियों की स्थापना।
निष्कर्ष
NSM का लक्ष्य वैज्ञानिक अनुसंधान, मौसम, सामग्री विज्ञान, स्वास्थ्य और अन्य क्षेत्रों के लिए देश में उच्च-प्रदर्शन गणना क्षमता तैयार करना है।
165 प्रश्न 16510 अंक
भारतीय वैज्ञानिकों, हरिदत्त एवं पंचानन माहेश्वरी की वैज्ञानिक उपलब्धियों की विवेचना कीजिए।
Discuss the scientific achievements of Indian scientists Haridatta and Panchanan Maheshwari.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीहरिदत्त और पंचानन माहेश्वरीPDF पृष्ठ 83–84
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उत्तर — सरल भाषा में
1. हरिदत्त (Haridatta)
- वे प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्री और गणितज्ञ माने जाते हैं।
- स्रोत PDF उनकी ‘परहित’ (Parahita) प्रणाली के विकास का उल्लेख करता है, जिसका उद्देश्य ग्रहों की स्थिति की गणना को सरल बनाना था।
- ‘ग्रहचारनिबन्धन’ (Grahacaranibandhana) को उनकी प्रमुख कृतियों में गिना गया है।
- ग्रहों की गति और खगोलीय गणना को अधिक सुगम बनाने में उनका योगदान बताया गया है।
2. पंचानन माहेश्वरी (Panchanan Maheshwari)
- वे भारतीय वनस्पति वैज्ञानिक थे और पादप भ्रूण-विज्ञान (Plant Embryology) के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान के लिए जाने जाते हैं।
- पुष्पी पौधों में निषेचन, भ्रूण-विकास और प्रजनन प्रक्रियाओं पर उनके अनुसंधान का विशेष महत्त्व है।
- पादप भ्रूण-विज्ञान को आगे बढ़ाने तथा प्रयोगशाला तकनीकों/अध्ययन को विकसित करने में उनकी भूमिका रही।
- उनके कार्य से वनस्पति विज्ञान और पादप प्रजनन संबंधी अनुसंधान को आधार मिला।
निष्कर्ष
हरिदत्त का योगदान खगोल-गणना में और पंचानन माहेश्वरी का योगदान वनस्पति विज्ञान, विशेषकर पादप भ्रूण-विज्ञान, में उल्लेखनीय है।
166 प्रश्न 1665 अंक
(क) 'बर्डमैन ऑफ इंडिया' के नाम से जाने जाने वाले वैज्ञानिक का नाम व योगदान लिखिए। (ख) 'मिल्कमैन ऑफ इंडिया' किसे कहा जाता है? उनका योगदान बताइए।
(a) Name the scientist known as the Birdman of India and his contributions. (b) Who is called the Milkman of India and what were his contributions?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीबर्डमैन और मिल्कमैन ऑफ इंडियाPDF पृष्ठ 84
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उत्तर — सरल भाषा में
(क) बर्डमैन ऑफ इंडिया — डॉ. सलीम अली
1. भारत में पक्षियों का व्यवस्थित सर्वेक्षण किया और पक्षी-विज्ञान को लोकप्रिय बनाया।
2. उनकी पुस्तक *The Book of Indian Birds* पक्षियों की पहचान और अध्ययन के लिए प्रसिद्ध है।
3. पक्षी आवास और संरक्षण से जुड़े कार्यों में योगदान; केवलादेव/भरतपुर क्षेत्र तथा साइलेंट वैली संरक्षण से उनके जुड़ाव का उल्लेख किया जाता है।
(ख) मिल्कमैन ऑफ इंडिया — डॉ. वर्गीज कुरियन
1. श्वेत क्रांति और ऑपरेशन फ्लड का नेतृत्व किया।
2. अमूल सहकारी दुग्ध मॉडल को सफल बनाने में प्रमुख भूमिका निभाई।
3. राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) और सहकारी दुग्ध ढाँचे के विकास से जुड़े रहे।
निष्कर्ष
सलीम अली का योगदान पक्षी-विज्ञान और संरक्षण में, जबकि वर्गीज कुरियन का योगदान दुग्ध सहकारिता और श्वेत क्रांति में प्रमुख है।
167 प्रश्न 16710 अंक
निम्नलिखित भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान का उल्लेख करें: होमी जहाँगीर भाभा, सर एम. विश्वेश्वरैया, सत्येंद्र नाथ बोस, मेघनाद साहा और हरगोविंद खुराना।
Mention the contributions of Homi Jehangir Bhabha, Sir M. Visvesvaraya, Satyendra Nath Bose, Meghnad Saha and Har Gobind Khorana.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीप्रमुख भारतीय वैज्ञानिकों के योगदानPDF पृष्ठ 84–85
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उत्तर — सरल भाषा में
1. होमी जहाँगीर भाभा
- भारत के परमाणु कार्यक्रम के विकास में अग्रणी भूमिका।
- टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) और परमाणु ऊर्जा संस्थागत ढाँचे के विकास में योगदान।
- भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की रूपरेखा।
2. सर एम. विश्वेश्वरैया
- प्रख्यात अभियंता और सिंचाई/जल-प्रबंधन विशेषज्ञ।
- मैसूर के कृष्णराज सागर बाँध और बाढ़ नियंत्रण प्रणालियों से जुड़े योगदान।
- इंजीनियरिंग और औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया।
3. सत्येंद्र नाथ बोस
- क्वांटम सांख्यिकी में योगदान; बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी और बोसॉन नाम उनसे जुड़ा है।
- आधुनिक क्वांटम भौतिकी के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका।
4. मेघनाद साहा
- साहा आयनीकरण समीकरण दिया, जिससे तारों के स्पेक्ट्रम और तापमान/आयनीकरण की स्थिति समझने में सहायता मिली।
- भारतीय खगोल-भौतिकी के विकास में योगदान।
5. हरगोविंद खुराना
- आनुवंशिक कोड की व्याख्या तथा प्रोटीन संश्लेषण में उसकी भूमिका के अध्ययन में योगदान।
- 1968 का शरीरक्रिया/चिकित्सा नोबेल पुरस्कार साझा रूप से प्राप्त किया।
निष्कर्ष
इन वैज्ञानिकों ने परमाणु विज्ञान, अभियांत्रिकी, क्वांटम भौतिकी, खगोल-भौतिकी और आणविक जीवविज्ञान जैसे क्षेत्रों में भारत तथा विश्व के वैज्ञानिक विकास में योगदान दिया।
168 प्रश्न 16810 अंक
भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कार्यक्रम में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के योगदान पर एक टिप्पणी लिखिए।
Write a note on the contribution of Dr. A.P.J. Abdul Kalam to India's science and technology programme.
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीडॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलामPDF पृष्ठ 85–86
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उत्तर — सरल भाषा में
भूमिका
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भारत के प्रमुख वैज्ञानिकों में थे। उन्होंने अंतरिक्ष प्रक्षेपण, मिसाइल विकास और रक्षा प्रौद्योगिकी में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
1. अंतरिक्ष कार्यक्रम
- ISRO में SLV-III परियोजना के परियोजना निदेशक रहे।
- उनके नेतृत्व में 1980 में रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने में सफलता मिली।
- इस कार्य ने भारत की स्वदेशी उपग्रह-प्रक्षेपण क्षमता को मजबूत किया।
2. मिसाइल और रक्षा प्रौद्योगिकी
- DRDO में मिसाइल विकास से जुड़े कार्यक्रमों का नेतृत्व किया।
- एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) में महत्त्वपूर्ण भूमिका।
- अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइल प्रणालियों के विकास से जुड़ी उपलब्धियाँ।
3. प्रौद्योगिकी आत्मनिर्भरता
- स्वदेशी रक्षा प्रणालियों, परीक्षण और तकनीकी मानव संसाधन के विकास को बढ़ावा दिया।
- वैज्ञानिक अनुसंधान को राष्ट्रीय विकास से जोड़ने पर बल दिया।
4. विज्ञान-शिक्षा और प्रेरणा
- युवाओं में विज्ञान, नवाचार और राष्ट्र-विकास के प्रति रुचि बढ़ाने में योगदान।
- विज्ञान एवं तकनीक को समाज की समस्याओं के समाधान से जोड़ने की दृष्टि प्रस्तुत की।
निष्कर्ष
डॉ. कलाम का योगदान भारत की अंतरिक्ष और रक्षा प्रौद्योगिकी को सुदृढ़ करने तथा वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता की प्रेरणा देने में उल्लेखनीय रहा।
169 प्रश्न 1692 अंक
सी.वी. रमन तथा हरगोविन्द खुराना को किस क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार दिया गया?
In which fields were C.V. Raman and Har Gobind Khorana awarded the Nobel Prize?
सामान्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीसी.वी. रमन और हरगोविंद खुराना के नोबेल पुरस्कारPDF पृष्ठ 86
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उत्तर — सरल भाषा में
1. सी.वी. रमन — 1930 में भौतिकी (Physics) का नोबेल पुरस्कार; प्रकाश के प्रकीर्णन और रमन प्रभाव की खोज के लिए।
2. हरगोविंद खुराना — 1968 में शरीरक्रिया विज्ञान/चिकित्सा (Physiology or Medicine) का नोबेल पुरस्कार, आनुवंशिक कोड और प्रोटीन संश्लेषण में उसकी भूमिका पर कार्य के लिए।
170 प्रश्न 1705 अंक
कार्बोनिफेरस काल के समय और अन्तराल तथा इसकी प्रमुख विशिष्टताओं का वर्णन कीजिए।
(Describe the time and duration of carboniferous period and its chief characteristics.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानकार्बोनिफेरस काल के समय और अन्तराल तथा इसकी प्रमुख विशिष्टताओं का वर्णनPDF पृष्ठ 86
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उत्तर — सरल भाषा में
कार्बोनिफेरस काल (Carboniferous Period) पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास में पेलियोजोइक महाकल्प (Paleozoic Era) का एक अत्यंत
महत्वपूर्ण कालखंड है। इसकी मुख्य विशेषताओं का विवरण निम्नलिखित है
1. समय और अवधि (Time and Duration)
समय सीमा: यह काल आज से लगभग 359 मिलियन वर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ और 299 मिलियन वर्ष पूर्व समाप्त हुआ।
अवधि: इसकी कु ल समयावधि लगभग 60 मिलियन वर्ष थी।
यह डिवोनियन काल के बाद और परमियन काल से पहले आता है।
2. भूवैज्ञानिक विशेषताएँ और कोयला निर्माण
कोयला युग: इस काल को 'कोयला युग' (Age of Coal) कहा जाता है। 'कार्बोनिफेरस' शब्द का अर्थ ही 'कोयला धारण करने वाला' है।
कोयला निक्षेप: सघन दलदली वनों के भूमिगत होने और ताप व दाब के प्रभाव से वर्तमान के अधिकांश कोयला भंडारों का निर्माण इसी काल में
हुआ।
पर्वत निर्माण: इस काल में हर्सिनियन पर्वत निर्माण (Hercynian Orogeny) की प्रक्रिया शुरू हुई।
पेंजिया का एकीकरण: विभिन्न भू-खंडों के निकट आने से महामहाद्वीप 'पेंजिया' (Pangea) का निर्माण पूर्णता की ओर बढ़ा।
3. जैविक विशेषताएँ
वनस्पति: गर्म और आर्द्र जलवायु के कारण विशाल फर्न (Ferns), लाइकोपोड्स (Lycopods), और ऊँचे वृक्षों (जैसे लेपिडोडेंड्रोन और
सिजिलैरिया) के सघन वन विकसित हुए।
उभयचरों का प्रभुत्व: इसे 'उभयचरों का युग' (Age of Amphibians) कहा जाता है क्योंकि इस दौरान उभयचर प्रजातियों का अत्यधिक
विस्तार हुआ।
सरीसृपों का उदय: इसी काल में पहले सरीसृपों (Reptiles) का विकास हुआ, जिन्होंने स्थल पर अंडे देने की क्षमता विकसित की।
विशाल कीट: ऑक्सीजन की उच्च सांद्रता के कारण विशालकाय कीट (जैसे मेगानेउरा ड्रैगनफ्लाई) इस काल की पहचान थे।
4. जलवायु
इस काल के प्रारंभिक और मध्य भाग में जलवायु उष्ण (Warm) और आर्द्र (Humid) थी।
काल के उत्तरार्ध में दक्षिण गोंडवानालैंड के क्षेत्रों में हिमीकरण (Glaciation) के साक्ष्य मिलते हैं, जिससे वैश्विक जलवायु में परिवर्तन आया।
171 प्रश्न 1712 अंक
मेसोजोइक युग (Mesozoic Era) की समय सीमा लिखिए।
(Write about the time range of the Mesozoic era.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानमेसोजोइक युग की समय सीमा लिखिए।PDF पृष्ठ 87
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उत्तर — सरल भाषा में
भूवैज्ञानिक समय सारणी के अनुसार, मेसोजोइक युग (जिसे 'मध्यजीवी महाकल्प' भी कहा जाता है) की समय सीमा निम्नलिखित है
प्रारंभ: लगभग 252 मिलियन वर्ष पूर्व (पर्मियन-ट्राइएसिक विलुप्ति घटना के बाद)।
अंत: लगभग 66 मिलियन वर्ष पूर्व (क्रिटेशियस-पैलियोजीन विलुप्ति घटना के साथ)।
यह युग लगभग 186 मिलियन वर्षों तक चला। इसे मुख्य रूप से तीन कल्पों (Periods) में विभाजित किया गया है
(क) ट्राइएसिक (Triassic)
(ख) जुरासिक (Jurassic)
(ग) क्रिटेशियस (Cretaceous)
मूल्यांकन की दृष्टि से, 250 मिलियन वर्ष पूर्व से 65 मिलियन वर्ष पूर्व तक की समय सीमा को भी सही माना जाता है।
172 प्रश्न 1722 अंक
सियाल (Sial) की संरचना के बारे में लिखिए।
(Write about the structure of Sial.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानसियाल की संरचना के बारे में लिखिए।PDF पृष्ठ 87
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उत्तर — सरल भाषा में
एडवर्ड स्वेस (Eduard Suess) द्वारा किए गए पृथ्वी के रासायनिक वर्गीकरण के अनुसार सियाल (Sial) की संरचना और विशेषताएं निम्नलिखित
हैं
रासायनिक संघटन: 'सियाल' शब्द सिलिका (Silica) और एल्युमीनियम (Aluminium) तत्वों के मेल से बना है। इस परत में इन दोनों तत्वों
की प्रधानता पाई जाती है।
भौतिक विशेषताएं
घनत्व: इसका औसत घनत्व लगभग 2.7 से 2.9 g/cm³ होता है।
चट्टानी संरचना: इसमें मुख्य रूप से ग्रेनाइट चट्टानों की बहुलता होती है और इसकी प्रकृति अम्लीय (Acidic) होती है।
अवस्थिति: यह पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत है जो मुख्य रूप से महाद्वीपीय क्रस्ट (Continental Crust) का निर्माण करती है।
173 प्रश्न 1735 अंक
पृथ्वी सतह पर पैलियोज़ोइक कल्प के प्रमुख महत्त्वपूर्ण विकास का विवेचन कीजिए।
(Elucidate landmark developments during Palaeozoic era on earth's surface.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानपृथ्वी सतह पर पैलियोज़ोइक कल्प के प्रमुख महत्त्वपूर्ण विकास का विवेचन कीPDF पृष्ठ 87
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उत्तर — सरल भाषा में
पृथ्वी के भू-वैज्ञानिक इतिहास में पैलियोज़ोइक (प्राचीनजीवी) कल्प एक अत्यंत महत्वपूर्ण समय रहा है, जो लगभग 541 मिलियन वर्ष पूर्व से 252
मिलियन वर्ष पूर्व तक विस्तृत था। इस कल्प को विकास की दृष्टि से छह प्रमुख अवधियों में विभाजित किया गया है: केंब्रियन, ओर्डोविशियन,
सिलुरियन, डेवोनियन, कार्बोनिफेरस और परमियन।
पैलियोज़ोइक कल्प के प्रमुख विकासवादी मील के पत्थर निम्नलिखित हैं
1. जैविक और वानस्पतिक विकास
केंब्रियन विस्फोट: कल्प के प्रारंभ में समुद्री अकशेरुकी जीवों (Invertebrates) की विविधता में अचानक तीव्र वृद्धि हुई, जिसे 'केंब्रियन
विस्फोट' कहा जाता है।
मछलियों का युग: डेवोनियन काल को 'मछलियों का युग' माना जाता है क्योंकि इस दौरान मछलियों का अत्यधिक विकास और विस्तार हुआ।
स्थल पर जीवन का संक्रमण: इसी कल्प में जीवन जल से स्थल की ओर बढ़ा। प्रथम स्थलीय पौधों और उभयचरों (Amphibians) का
प्रादुर्भाव हुआ।
कोयला निक्षेप: कार्बोनिफेरस काल के दौरान पृथ्वी पर सघन दलदली वनों का विस्तार हुआ, जिनके दबने से आज के विशाल कोयला भंडार
(Coal Deposits) निर्मित हुए।
2. भू-वैज्ञानिक और विवर्तनिक घटनाक्रम
पेंजिया का निर्माण: विभिन्न महाद्वीपीय खंडों के विस्थापन और जुड़ाव के परिणामस्वरूप एक विशाल महामहाद्वीप 'पेंजिया' (Pangea) का
निर्माण हुआ।
पर्वत निर्माण (Orogeny): इस कल्प के दौरान दो प्रमुख पर्वत निर्माणकारी हलचलें हुईं - कै लेडोनियन (सिलुरियन-डेवोनियन में) और
हर्सीनियन (कार्बोनिफेरस-परमियन में)। इन्ही हलचलों से अप्लेशियन और यूराल जैसे पर्वतों की नींव पड़ी।
सामूहिक विलोपन: कल्प का अंत 'परमियन विलोपन' के साथ हुआ, जो पृथ्वी के इतिहास का सबसे बड़ा सामूहिक विलोपन था, जिसमें
लगभग 90-95% समुद्री प्रजातियाँ विलुप्त हो गईं।
174 प्रश्न 1745 अंक
भूगर्भिक समय सारणी के मध्यजीवी महाकल्प (Mesozoic era) की विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
(Discuss characteristics of Mesozoic era of geological time scale.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभूगर्भिक समय सारणी के मध्यजीवी महाकल्प की विशेषताओं की विवेचना कीजिए।PDF पृष्ठ 88
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उत्तर — सरल भाषा में
भूगर्भिक समय सारणी में मध्यजीवी महाकल्प (Mesozoic Era) को 'मध्य जीवन' के काल के रूप में जाना जाता है। इसकी प्रमुख विशेषताओं का
विवरण निम्नलिखित है
1. परिचय और कालानुक्रमिक विभाजन
यह महाकल्प लगभग 252 मिलियन वर्ष पूर्व प्रारंभ होकर 66 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा। इसे तीन प्रमुख कल्पों (Periods) में विभाजित किया गया
है
ट्राइऐसिक (Triassic): महाकल्प का सबसे पुराना काल।
जुरासिक (Jurassic): वह काल जब विशालकाय जीवों का प्रभुत्व रहा।
क्रिटेशियस (Cretaceous): महाकल्प का अंतिम और सबसे लंबा काल।
2. जैविक विशेषताएँ (प्राणीजात और वनस्पतिजात)
प्राणीजात: इसे 'सरीसृपों का युग' (Age of Reptiles) कहा जाता है क्योंकि इस दौरान डायनासोर स्थल, जल और आकाश में हावी थे।
इसी काल में प्रथम स्तनधारियों और पक्षियों (जैसे आर्कियोप्टेरिक्स) का उद्भव हुआ।
वनस्पतिजात: प्रारंभ में शंकु धारी वनों (Conifers) और साइकै ड्स की प्रधानता थी, लेकिन क्रिटेशियस काल के दौरान आवृतबीजी
(Angiosperms) यानी फू लों वाले पौधों का तेजी से विकास हुआ।
3. भूगर्भिक घटनाएँ और सामूहिक विलुप्ति
भूगर्भिक हलचल: इस युग में विशाल महाद्वीप पैंजिया (Pangea) का विखंडन प्रारंभ हुआ, जिससे गोंडवानालैंड और लौरेशिया अलग हुए।
इसी समय टेथिस सागर का विस्तार हुआ।
जलवायु: इस महाकल्प के दौरान जलवायु सामान्यतः उष्ण और शुष्क रही, जिसमें ध्रुवों पर बर्फ का अभाव था।
सामूहिक विलुप्ति: मध्यजीवी महाकल्प का अंत क्रिटेशियस-पेलियोजीन (K-Pg) सामूहिक विलुप्ति के साथ हुआ। माना जाता है कि एक
विशाल क्षुद्रग्रह (Asteroid) के पृथ्वी से टकराने के कारण डायनासोर सहित लगभग 75% प्रजातियाँ विलुप्त हो गईं।
175 प्रश्न 17510 अंक
भूगर्भिक समय सारणी के विभाजनों को स्पष्ट कीजिए।
(Explain the divisions of the Geological Time Scale.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभूगर्भिक समय सारणी के विभाजनों को स्पष्ट कीजिए।PDF पृष्ठ 88
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उत्तर — सरल भाषा में
भूगर्भिक समय सारणी (Geological Time Scale) पृथ्वी के इतिहास को उसकी उत्पत्ति से लेकर वर्तमान तक कालानुक्रमिक रूप से विभाजित
करने की एक वैज्ञानिक प्रणाली है। यह सारणी पृथ्वी की लगभग 4.6 अरब वर्षों की आयु को विभिन्न कालखंडों में व्यवस्थित करती है।
भूगर्भिक समय सारणी का आधार और महत्व
आधार: इसका निर्माण मुख्य रूप से चट्टानों के स्तरों (Stratigraphy) और उनमें संरक्षित जीवाश्मों (Fossils) के आधार पर किया गया है।
जैविक विकास और बड़े पैमाने पर हुए विलोपन (Extinction) की घटनाएँ इन विभाजनों की सीमाएँ निर्धारित करती हैं।
महत्व: यह भूवैज्ञानिकों और जीवविज्ञानियों को पृथ्वी की जलवायु, महाद्वीपीय विस्थापन और जीवन के विकास के इतिहास को समझने में
मदद करती है।
पदानुक्रमित विभाजन (Hierarchical Divisions)
भूगर्भिक समय सारणी को पदानुक्रम के आधार पर निम्नलिखित चार मुख्य इकाइयों में विभाजित किया गया है
(क) इओन (Eon): यह समय सारणी की सबसे बड़ी इकाई है। पृथ्वी के इतिहास को मुख्य रूप से दो बड़े इओन में बाँटा जाता है: 'प्री-कै म्ब्रियन'
और 'फे नेरोजोइक'।
(ख) महाकल्प (Era): इओन को आगे महाकल्पों में विभाजित किया जाता है। यह विभाजन जीवन के प्रमुख स्वरूपों में आए बदलावों पर आधारित
होता है।
(ग) कल्प/अवधि (Period): महाकल्पों को कल्पों में बाँटा जाता है। यह विभाजन विशिष्ट चट्टानी प्रणालियों और जीवाश्मों की उपस्थिति पर
आधारित होता है।
(घ) युग (Epoch): यह कल्प की तुलना में छोटी समय इकाई है, जिसे मुख्य रूप से हाल के 'सेनोजोइक' महाकल्प के सूक्ष्म अध्ययन के लिए
उपयोग किया जाता है।
भूगर्भिक समय सारणी का प्रवाह आरेख (Flowchart)
इओन → महाकल्प → कल्प → युग
प्रमुख विभाजनों का विवरण और उदाहरण
महाकल्प (Era) प्रमुख कल्प (Period) प्रमुख विशेषताएँ/घटनाएँ
पुराजीवी कै म्ब्रियन, डेवोनियन, कार्बोनिफेरस, जल में जीवन का विस्तार, उभयचरों और रेंगने वाले जीवों का उदय। कोयला
(Paleozoic) परमियन परतों का निर्माण।
मध्यजीवी 'डायनासोर का युग'; सरीसृपों की प्रधानता और प्रथम स्तनधारी व पक्षियों का
ट्राइऐसिक, जुरासिक, क्रीटेशियस
(Mesozoic) उदय।
नूतनजीवी 'स्तनधारियों का युग'; हिमालय का निर्माण और मानव का विकास (होलोसीन
पेलियोजीन, नियोजीन, क्वाटरनरी
(Cenozoic) युग)।
महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक काल
प्री-कै म्ब्रियन काल: यह पृथ्वी के इतिहास का लगभग 88% भाग कवर करता है। इस दौरान वायुमंडल का निर्माण और आदिम कोशिकीय
जीवन की शुरुआत हुई।
जुरासिक कल्प: मेसोजोइक महाकल्प का यह समय डायनासोरों के प्रभुत्व के लिए प्रसिद्ध है।
होलोसीन युग: यह वर्तमान युग है जिसमें मानव सभ्यता का विकास हुआ है।
निष्कर्षतः, भूगर्भिक समय सारणी पृथ्वी की भौतिक और जैविक यात्रा का एक विस्तृत लेखा-जोखा है, जो हमें अतीत की घटनाओं के आधार पर
भविष्य की संभावनाओं को समझने में सक्षम बनाती है।
176 प्रश्न 1762 अंक
वसंत विषुव (Spring/Vernal Equinox) क्या है? यह कै से होता है?
(What is Spring/Vernal Equinox? How does it happen?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानवसंत विषुव क्या है? यह कै से होता है?PDF पृष्ठ 89
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उत्तर — सरल भाषा में
वसंत विषुव (Spring Equinox) एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना है जिसे निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है
परिभाषा और तिथि
वसंत विषुव वह स्थिति है जब सूर्य सीधे भूमध्य रेखा (Equator) के ऊपर होता है। यह घटना प्रतिवर्ष 21 मार्च (या इसके आसपास) को होती है।
इस समय पूरी पृथ्वी पर दिन और रात की अवधि लगभग बराबर (12-12 घंटे ) होती है। उत्तरी गोलार्ध में इस दिन से वसंत ऋतु का प्रारंभ माना जाता
है।
होने का कारण और वैज्ञानिक प्रक्रिया
(क) पृथ्वी का झुकाव और परिक्रमा: यह घटना पृथ्वी के अपनी धुरी पर 23.5 डिग्री झुकाव और सूर्य के चारों ओर उसकी परिक्रमा (Revolution)
के कारण होती है।
(ख) ध्रुवों की स्थिति: विषुव के समय पृथ्वी का कोई भी ध्रुव (उत्तरी या दक्षिणी) सूर्य की ओर झुका हुआ नहीं होता है।
(ग) सौर किरणें: इस विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण सूर्य की किरणें विषुवत रेखा (भूमध्य रेखा) पर लंबवत (Perpendicular) पड़ती हैं,
जिससे दोनों गोलार्धों को समान प्रकाश प्राप्त होता है।
177 प्रश्न 1772 अंक
उल्का झीलें (Meteoric Lakes) क्या हैं?
(What are the meteoric lakes?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानउल्का झीलें क्या हैं?PDF पृष्ठ 90
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उत्तर — सरल भाषा में
उल्का झीलें (Meteoric Lakes) वे झीलें होती हैं जिनका निर्माण पृथ्वी की सतह पर विशाल उल्कापिंडों के प्रभाव (Meteorite Impact) के
कारण होता है।
निर्माण प्रक्रिया
जब कोई विशाल उल्कापिंड तीव्र गति से पृथ्वी की सतह से टकराता है, तो टक्कर के प्रभाव से सतह पर एक विशाल गर्त या क्रे टर (Crater) बन
जाता है। कालांतर में, इस गर्त में वर्षा का जल या भूजल भर जाने से जिस झील का विकास होता है, उसे उल्का झील कहा जाता है।
प्रासंगिक उदाहरण
भारत के महाराष्ट्र राज्य के बुलढाणा जिले में स्थित लोनार झील (Lonar Lake) उल्कापिंड के प्रभाव से बनी एक विश्व प्रसिद्ध झील है।
178 प्रश्न 1782 अंक
निम्नलिखित महाद्वीपों के सर्वोच्च पर्वत शिखरों के नाम बताइए: (A) उत्तरी अमेरिका (B) दक्षिणी अमेरिका (C) अफ्रीका (D) ऑस्ट्रेलिया
(Name highest mountain peaks of: North America, South America, Africa, Australia.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञाननिम्नलिखित महाद्वीपों के सर्वोच्च पर्वत शिखरों के नाम बताइए: उत्तरी अमेरPDF पृष्ठ 90
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उत्तर — सरल भाषा में
विभिन्न महाद्वीपों के सर्वोच्च पर्वत शिखर निम्नलिखित हैं
(A) उत्तरी अमेरिका: डेनाली (Denali) - इसे पहले माउंट मैकिनले के नाम से जाना जाता था।
(B) दक्षिणी अमेरिका: अकांकागुआ (Aconcagua) - यह एंडीज पर्वत श्रृंखला में स्थित है।
(C) अफ्रीका: किलिमंजारो (Kilimanjaro) - यह तंजानिया में स्थित एक स्वतंत्र खड़ा पर्वत है।
(D) ऑस्ट्रेलिया: माउंट कोसियस्को (Mount Kosciuszko) - यह ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप की मुख्य भूमि का सबसे ऊं चा शिखर है।
179 प्रश्न 1795 अंक
रॉकी पर्वत श्रेणी की भौगोलिक विशेषताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
(Discuss in brief the geographical features of the Rocky Mountain range.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानरॉकी पर्वत श्रेणी की भौगोलिक विशेषताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।PDF पृष्ठ 90
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उत्तर — सरल भाषा में
रॉकी पर्वत श्रेणी उत्तरी अमेरिका की सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषता है। इसकी मुख्य विशेषताओं का विवरण निम्नलिखित है
1. भौगोलिक अवस्थिति और विस्तार
स्थिति: यह उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के पश्चिमी भाग में स्थित एक विशाल पर्वत श्रृंखला है।
विस्तार: इसका विस्तार उत्तर में कनाडा (ब्रिटिश कोलंबिया) से लेकर दक्षिण में संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण-पश्चिम (न्यू मैक्सिको) तक
लगभग 4,800 किलोमीटर की लंबाई में है। यह उत्तर-दक्षिण दिशा में समानांतर श्रेणियों के रूप में फै ली है।
2. भूगर्भिक संरचना और उत्पत्ति
पर्वत का प्रकार: रॉकी एक नवीन वलित पर्वत (Young Fold Mountain) श्रेणी है।
उत्पत्ति: इसकी उत्पत्ति मुख्य रूप से लारामी विवर्तनिकी (Laramide Orogeny) के परिणामस्वरूप हुई। लगभग 80 से 55 मिलियन वर्ष
पूर्व प्लेट विवर्तनिकी प्रक्रियाओं के कारण प्रशांत महासागरीय प्लेट और उत्तरी अमेरिकी प्लेट के अभिसरण से इस पर्वतमाला का निर्माण हुआ।
3. प्रमुख भौतिक लक्षण
शिखर और घाटियाँ: यहाँ अनेक ऊँ ची चोटियाँ और गहरी घाटियाँ पाई जाती हैं। माउंट एल्बर्ट (Mount Elbert) रॉकी पर्वत श्रेणी की सबसे
ऊँ ची चोटी है।
महाद्वीपीय जल-विभाजक (Continental Divide): यह पर्वत श्रेणी उत्तरी अमेरिका के लिए एक प्रमुख जल-विभाजक की भूमिका
निभाती है। इसके पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ (जैसे कोलंबिया, कोलोराडो) प्रशांत महासागर में गिरती हैं, जबकि पूर्व की ओर बहने वाली
नदियाँ (जैसे मिसिसिपी-मिसौरी, रियो ग्रांडे) अटलांटिक महासागर या मैक्सिको की खाड़ी में गिरती हैं।
4. जलवायु और वनस्पति
यहाँ शीतकाल के अंत में पूर्वी ढालों पर चलने वाली गर्म और शुष्क चिनूक (Chinook) पवनें चलती हैं, जिन्हें 'हिमभक्षी' पवन भी कहा जाता
है क्योंकि ये बर्फ को पिघला देती हैं।
यह क्षेत्र खनिज संसाधनों (जैसे सोना, चाँदी, ताँबा) और जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।
180 प्रश्न 1802 अंक
विश्व में चार पर्वत निर्माणकारी घटनाओं (Orogenies) तथा उनके मुख्य पर्वतों के नाम बताइए।
(Name four orogenies and its main mountains in the world.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानविश्व में चार पर्वत निर्माणकारी घटनाओं तथा उनके मुख्य पर्वतों के नाम बताPDF पृष्ठ 91
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उत्तर — सरल भाषा में
भू-वैज्ञानिक इतिहास में पर्वत निर्माण की प्रक्रिया को चार प्रमुख युगों या हलचलों में विभाजित किया गया है। विश्व की चार प्रमुख पर्वत निर्माणकारी
घटनाएँ (Orogenies) और उनके मुख्य पर्वत निम्नलिखित हैं
(क) प्री-कै म्ब्रियन या चर्नियन हलचल (Pre-Cambrian/Charnian Orogeny)
(i) यह पृथ्वी के इतिहास की सबसे प्राचीन हलचल है।
(ii) मुख्य पर्वत: भारत की अरावली श्रेणी, उत्तरी अमेरिका का लॉरेशियन पर्वत और अल्गोमन पर्वत।
(ख) कै लेडोनियन हलचल (Caledonian Orogeny)
(i) यह हलचल पेलियोजोइक युग (सिलुरियन और डेवोनियन कल्प) में हुई थी।
(ii) मुख्य पर्वत: स्कैं डिनेवियाई पर्वत, स्कॉटलैंड के हाइलैंड्स और उत्तरी अप्लेशियन पर्वत।
(ग) हर्सीनियन हलचल (Hercynian Orogeny)
(i) यह ऊपरी पेलियोजोइक युग (परमियन कल्प) के दौरान हुई थी।
(ii) मुख्य पर्वत: रूस का यूराल पर्वत, जर्मनी का ब्लैक फॉरेस्ट, फ्रांस का वोसजेस और मध्य अप्लेशियन पर्वत।
(घ) अल्पाइन हलचल (Alpine Orogeny)
(i) यह सबसे नवीनतम पर्वत निर्माणकारी घटना है जो टर्शियरी युग (सेनोजोइक) में हुई।
(ii) मुख्य पर्वत: एशिया का हिमालय, यूरोप का आल्प्स, उत्तरी अमेरिका का रॉकीज और दक्षिण अमेरिका का एंडीज पर्वत।
181 प्रश्न 1815 अंक
'वलित पर्वत' (Fold Mountains) क्या हैं? वलित पर्वतों के कु छ उदाहरण उनकी अवस्थिति के साथ दीजिए।
(What are 'fold mountains'? Give examples of folded mountains with location.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञान'वलित पर्वत' क्या हैं? वलित पर्वतों के कु छ उदाहरण उनकी अवस्थिति के साथPDF पृष्ठ 91
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उत्तर — सरल भाषा में
वलित पर्वत (Fold Mountains): परिभाषा एवं अवधारणा
वलित पर्वत पृथ्वी की वे पर्वत श्रृंखलाएं हैं जिनका निर्माण पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के कारण उत्पन्न विवर्तनिक प्लेटों के संपीड़न
(Compression) बल से होता है। जब दो विवर्तनिक प्लेटें एक-दूसरे की ओर गति करती हैं (अभिसरण सीमा पर), तो उनके मध्य स्थित भू-सन्नति
में जमा अवसादी चट्टानों की परतों में अत्यधिक दबाव के कारण मोड़ या वलन (Folds) पड़ जाते हैं। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप धरातल ऊपर की
ओर उठ जाता है और विशाल पर्वत श्रेणियों का निर्माण होता है।
इन पर्वतों की प्रमुख विशेषता यह है कि इनमें शिखरों (Anticlines) और घाटियों (Synclines) की एक श्रृंखला पाई जाती है। इन्हें विश्व के सबसे
नवीन और ऊँचे पर्वत माना जाता है (जैसे 'युवा वलित पर्वत')।
प्रमुख वलित पर्वतों के उदाहरण एवं उनकी अवस्थिति
विश्व के प्रमुख वलित पर्वत और उनकी भौगोलिक अवस्थिति का विवरण निम्नलिखित है
(क) हिमालय पर्वत श्रृंखला (Himalayas): यह एशिया महाद्वीप (विशेषकर भारत, नेपाल, चीन और भूटान) में स्थित है। यह विश्व का सबसे ऊँ चा
युवा वलित पर्वत है।
(ख) एंडीज पर्वत श्रृंखला (Andes): यह दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित है। यह विश्व की सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला है।
(ग) रॉकीज पर्वत श्रृंखला (Rockies): यह उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के पश्चिमी भाग में स्थित है।
(घ) आल्प्स पर्वत श्रृंखला (Alps): यह मध्य यूरोप (फ्रांस, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया और इटली) में स्थित है।
(ङ) यूराल पर्वत (Urals): यह रूस (यूरेशिया) में स्थित है, जो भौगोलिक रूप से एशिया और यूरोप को अलग करता है।
(च) अरावली पर्वतमाला (Aravalli): यह भारत (एशिया) में स्थित है, जो विश्व के सबसे प्राचीन वलित पर्वतों में से एक है।
निष्कर्ष
वलित पर्वत विवर्तनिक गतिविधियों के प्रत्यक्ष परिणाम हैं और ये मुख्य रूप से महाद्वीपीय किनारों या प्लेटों के टकराव वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
182 प्रश्न 1825 अंक
उत्तरी अमेरिका की महान झीलों (Great Lakes) की अवस्थिति, नाम एवं महत्त्व को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
(Explain location, names and importance of great lakes of North America.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानउत्तरी अमेरिका की महान झीलों की अवस्थिति, नाम एवं महत्त्व को संक्षेप मेंPDF पृष्ठ 91
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उत्तर — सरल भाषा में
उत्तरी अमेरिका की महान झीलें (Great Lakes) विश्व का सबसे बड़ा ताजे पानी का समूह हैं, जो महाद्वीप के मध्य-पूर्वी भाग में स्थित हैं। इनका
विवरण निम्नलिखित है
1. झीलों के नाम (पश्चिम से पूर्व के क्रम में)
महान झीलों के अंतर्गत पाँच विशाल झीलें सम्मिलित हैं
सुपीरियर झील (Lake Superior): यह क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व की सबसे बड़ी ताजे पानी की झील है।
मिशिगन झील (Lake Michigan): यह एकमात्र ऐसी झील है जो पूरी तरह से संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) की सीमा के भीतर स्थित है।
ह्यूरन झील (Lake Huron)
इरी झील (Lake Erie)
ओन्टारियो झील (Lake Ontario): यह आकार में सबसे छोटी है और सेंट लॉरेंस नदी के माध्यम से अटलांटिक महासागर से जुड़ी है।
2. भौगोलिक अवस्थिति
ये झीलें उत्तरी अमेरिका के मध्य-पूर्वी भाग में संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा की सीमा पर स्थित हैं।
मिशिगन को छोड़कर शेष चार झीलें दोनों देशों के मध्य प्राकृ तिक सीमा बनाती हैं।
ये झीलें आपस में नहरों और नदियों (जैसे 'सू' नहर और 'वेलैंड' नहर) द्वारा जुड़ी हुई हैं, जिससे एक विशाल जल तंत्र का निर्माण होता है।
3. महान झीलों का महत्त्व
अंतःस्थलीय जलमार्ग: सेंट लॉरेंस जलमार्ग के माध्यम से ये झीलें अटलांटिक महासागर से जुड़ी हैं, जो इन्हें विश्व का सबसे व्यस्त अंतःस्थलीय
जलमार्ग बनाता है, जिससे व्यापार और परिवहन सुगम होता है।
औद्योगिक क्लस्टर: इस क्षेत्र में लौह-अयस्क (मेसाबी श्रेणी) और कोयले की प्रचुरता के कारण भारी उद्योगों, विशेषकर लौह-इस्पात उद्योग का
अत्यधिक विकास हुआ है। शिकागो, गैरी, डुलुथ और डेट्रायट (ऑटोमोबाइल हेतु प्रसिद्ध) प्रमुख औद्योगिक कें द्र हैं।
ताजे पानी का विशाल भंडार: ये झीलें विश्व के कु ल सतही ताजे पानी का लगभग 21% हिस्सा संचित रखती हैं, जो पेयजल, सिंचाई और
पारिस्थितिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है।
जलवायु एवं कृषि: ये विशाल जल निकाय आसपास के क्षेत्रों की जलवायु को मध्यम बनाए रखते हैं, जिससे 'झील प्रभाव' (Lake Effect) के
कारण यहाँ अंगूर और अन्य फलों की खेती के लिए अनुकू ल परिस्थितियाँ बनती हैं।
183 प्रश्न 1832 अंक
'मेसा' (Mesa) को परिभाषित करें।
(Define 'Mesa'.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञान'मेसा' को परिभाषित करें।PDF पृष्ठ 92
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उत्तर — सरल भाषा में
मेसा (Mesa) एक ऐसी विशिष्ट स्थलाकृ ति है जिसका ऊपरी भाग मेज (Table) की तरह समतल होता है और इसके किनारे अत्यंत तीव्र या खड़े
ढाल वाले होते हैं।
इसके निर्माण की प्रक्रिया और संरचना निम्नलिखित है
भू-वैज्ञानिक संरचना: यह क्षैतिज रूप से व्यवस्थित कठोर प्रतिरोधी चट्टानों (कै प रॉक) से ढकी होती है।
निर्माण प्रक्रिया: जब जल या वायु द्वारा होने वाले अपरदन से ऊपरी कठोर परत के नीचे स्थित कोमल चट्टानें कट जाती हैं, तो यह कठोर शीर्ष
भाग शेष रह जाता है जो अपने आस-पास के क्षेत्र से ऊं चा दिखाई देता है।
184 प्रश्न 1842 अंक
ऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले किन्हीं 6 मरुस्थलों के नाम लिखिए।
(Write names of any 6 deserts found in Australia.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले किन्हीं 6 मरुस्थलों के नाम लिखिए।PDF पृष्ठ 92
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उत्तर — सरल भाषा में
ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के पश्चिमी और मध्य भागों में कई विशाल मरुस्थल पाए जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया में स्थित 6 प्रमुख मरुस्थलों के नाम निम्नलिखित हैं
(क) ग्रेट विक्टोरिया मरुस्थल (Great Victoria Desert)
(ख) ग्रेट सैंडी मरुस्थल (Great Sandy Desert)
(ग) तनामी मरुस्थल (Tanami Desert)
(घ) सिम्पसन मरुस्थल (Simpson Desert)
(ङ) गिब्सन मरुस्थल (Gibson Desert)
(च) लिटिल सैंडी मरुस्थल (Little Sandy Desert)
(नोट: इनके अतिरिक्त स्ट्रेलेकी, स्टर्ट स्टोनी और तिरारी भी ऑस्ट्रेलिया के अन्य महत्वपूर्ण मरुस्थल हैं।)
185 प्रश्न 1855 अंक
ज्वालामुखी की परि-प्रशांत मेखला (Circum-Pacific Belt) का वर्णन कीजिए।
(Describe the Circum-Pacific belt of Volcanoes.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानज्वालामुखी की परि-प्रशांत मेखला का वर्णन कीजिए।PDF पृष्ठ 92
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उत्तर — सरल भाषा में
ज्वालामुखी की परि-प्रशांत मेखला (Circum-Pacific Belt) प्रशांत महासागर के बेसिन के चारों ओर स्थित एक विशाल और सक्रिय ज्वालामुखी
श्रृंखला है। इसे इसकी अत्यधिक ज्वालामुखीय सक्रियता के कारण 'अग्नि वलय' (Ring of Fire) भी कहा जाता है।
भौगोलिक अवस्थिति और परिचय
यह मेखला प्रशांत महासागर के किनारों पर एक घोड़े की नाल (Horseshoe) के आकार में विस्तृत है। इसका विस्तार दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी
तटों (एंडीज पर्वतमाला) से उत्तर की ओर उत्तर अमेरिका के पश्चिमी तटों (रॉकीज पर्वतमाला) तक है। पश्चिमी प्रशांत में यह बेल्ट अलास्का के
एल्यूशियन द्वीप समूह से शुरू होकर रूस के कामचटका प्रायद्वीप, जापान, फिलीपींस और इंडोनेशिया होते हुए दक्षिण-पश्चिम में न्यूजीलैंड तक फै ली
हुई है।
भू-वैज्ञानिक कारण और प्रक्रिया
इस मेखला में ज्वालामुखीय सक्रियता का मुख्य कारण प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) के अंतर्गत अभिसारी (Convergent) प्लेट सीमाएं
हैं
सबडक्शन जोन (Subduction Zones): यहाँ भारी प्रशांत महासागरीय प्लेट का विभिन्न महाद्वीपीय प्लेटों (जैसे उत्तर अमेरिकी और दक्षिण
अमेरिकी प्लेट) तथा अन्य महासागरीय प्लेटों (जैसे फिलीपीन प्लेट) के नीचे प्रविष्ठन (Subduction) होता है।
जब यह प्लेट एस्थेनोस्फीयर (दुर्बलतामंडल) में गहराई तक जाती है, तो अत्यधिक तापमान के कारण चट्टानें पिघलकर मैग्मा का निर्माण करती
हैं। यही मैग्मा छिद्रों के माध्यम से तीव्र विस्फोट के रूप में सतह पर आता है।
विशेषताएँ और तीव्रता
यह विश्व की सबसे सक्रिय ज्वालामुखी पट्टी है, जहाँ दुनिया के लगभग 75% से 80% सक्रिय ज्वालामुखी पाए जाते हैं।
यह क्षेत्र भूकं पीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है; विश्व के अधिकांश विनाशकारी भूकं प और सुनामी इसी मेखला में उत्पन्न होते हैं।
यहाँ गहरे समुद्री गर्त (जैसे मारियाना गर्त) और चापाकार द्वीप समूहों की अधिकता है।
क्षेत्रीय उदाहरण
एंडीज पर्वतमाला (दक्षिण अमेरिका): माउंट कोटोपैक्सी और चिम्बोरैजो।
जापान: माउंट फ्यूजी।
फिलीपींस: माउंट मेयोन और माउंट पिनाटुबो।
अन्य: एल्यूशियन द्वीप समूह और उत्तर अमेरिका की कै स्के ड रेंज (माउंट सेंट हेलेंस)।
(नोट: उत्तर को प्रभावी बनाने के लिए प्रशांत महासागर के चारों ओर ज्वालामुखियों को दर्शाने वाला एक मानचित्र रेखांकित किया जाना चाहिए।)
186 प्रश्न 1865 अंक
दरारी ज्वालामुखी उद्वेदन (Fissure Eruption) क्या है? विश्व में इनकी उपस्थिति के क्षेत्रों के बारे में बताइए।
(What is a fissure volcanic eruption? Give regions of occurrence in the world.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानदरारी ज्वालामुखी उद्वेदन क्या है? विश्व में इनकी उपस्थिति के क्षेत्रों कPDF पृष्ठ 93
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उत्तर — सरल भाषा में
दरारी ज्वालामुखी उद्वेदन (Fissure Eruption)
जब मैग्मा धरातल पर किसी एक कें द्रीय नली या छिद्र के बजाय पृथ्वी की पपड़ी में स्थित लंबी दरारों, भ्रंशों या चटकाव के माध्यम से बाहर निकलता
है, तो इसे दरारी ज्वालामुखी उद्वेदन कहा जाता है।
इस प्रक्रिया की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
प्रक्रिया: इसमें मैग्मा शांत रूप से बिना किसी बड़े विस्फोट के बाहर निकलता है। कें द्रीय उद्वेदन के विपरीत, इसमें गैसों का निष्कासन धीरे-धीरे
होता है, जिससे विस्फोटक गतिविधि का अभाव रहता है।
लावे की प्रकृति: इस उद्वेदन से निकलने वाला लावा मुख्य रूप से बेसाल्टिक (क्षारीय) प्रकृति का होता है। इस लावे की श्यानता (Viscosity)
बहुत कम और तरलता अधिक होती है।
निर्मित भू-आकृ तियाँ: अत्यधिक तरल होने के कारण यह लावा ठण्डा होने से पहले विस्तृत क्षेत्रों में फै ल जाता है, जिससे विशाल लावा पठार
(Lava Plateaus) और लावा मैदानों का निर्माण होता है।
विश्व में उपस्थिति के प्रमुख क्षेत्र
दरारी उद्वेदन के प्रमुख वैश्विक उदाहरण और क्षेत्र निम्नलिखित हैं
(क) भारत का दक्कन ट्रैप (Deccan Trap): भारत के प्रायद्वीपीय पठार का उत्तर-पश्चिमी भाग इसी प्रकार के लावा प्रवाह से बना है।
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका का कोलंबिया-स्नेक पठार: यह उत्तरी अमेरिका में दरारी उद्वेदन का एक विशाल क्षेत्र है।
(ग) आइसलैंड (Iceland): यह मध्य-अटलांटिक कटक पर स्थित है, जहाँ वर्तमान में भी दरारी उद्गार सामान्य घटना है।
(घ) ब्राजील का पारणा पठार (Parana Plateau): दक्षिण अमेरिका में स्थित एक प्रमुख लावा पठार।
(ङ) मध्य महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridges): सागरों के नीचे होने वाला सबसे व्यापक दरारी उद्वेदन, जो नई समुद्री परपटी का निर्माण
करता है।
187 प्रश्न 1872 अंक
'सिण्डर शंकु ' (Cinder Cone) ज्वालामुखी क्या है?
(What is 'Cinder Cone' Volcano?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञान'सिण्डर शंकु ' ज्वालामुखी क्या है?PDF पृष्ठ 94
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उत्तर — सरल भाषा में
सिण्डर शंकु ज्वालामुखी का वह लघु रूप है जिसका निर्माण ज्वालामुखी उद्गार के दौरान निकलने वाले विखंडित पदार्थों (पायरोक्लास्टिक मटेरियल)
जैसे कि राख, सिण्डर और स्कोरिया के एक ही निकास द्वार के चारों ओर एकत्रित होने से होता है।
इसकी मुख्य भौतिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
इसकी आकृ ति शंक्वाकार होती है जिसकी ढाल अत्यंत खड़ी होती है।
इसके शीर्ष पर एक कटोरे के आकार का गर्त (क्रे टर) उपस्थित होता है।
चूँकि ये विखंडित पदार्थों के ढीले जमाव से बनते हैं, इसलिए इनका आकार आमतौर पर अन्य ज्वालामुखियों की तुलना में छोटा होता है।
188 प्रश्न 18810 अंक
विश्व में भूकम्पों के वितरण का वर्णन कीजिए।
(Describe the distribution of earthquakes in the world.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानविश्व में भूकम्पों के वितरण का वर्णन कीजिए।PDF पृष्ठ 94
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उत्तर — सरल भाषा में
विश्व में भूकम्पों का वितरण
विश्व में भूकं पों का वितरण यादृच्छिक (Random) नहीं है, बल्कि यह एक निश्चित भौगोलिक प्रतिरूप का अनुसरण करता है। भूकं पीय घटनाओं का
सीधा संबंध पृथ्वी की प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) गतिविधियों से है। अधिकांश भूकं प प्लेटों की सीमाओं पर कें द्रित होते हैं, जहाँ प्लेटों के
बीच अभिसरण (Convergent), अपसरण (Divergent) या रूपांतरित (Transform) अंतःक्रियाएँ होती हैं।
विश्व में भूकं पों के प्रमुख वितरण क्षेत्रों का विवरण निम्नलिखित है
1. परि-प्रशांत महासागरीय मेखला (Circum-Pacific Belt)
यह विश्व की सबसे विस्तृत भूकं पीय मेखला है, जिसे 'अग्नि वलय' (Ring of Fire) के नाम से भी जाना जाता है।
विश्व के लगभग 65% से 70% भूकं प इसी क्षेत्र में आते हैं।
यह मेखला प्रशांत महासागर के चारों ओर तटीय क्षेत्रों, जैसे चिली, कै लिफोर्निया, अलास्का, जापान, फिलीपींस और न्यूजीलैंड तक विस्तृत है।
तकनीकी कारण: यहाँ भूकं प मुख्य रूप से उपभोग/प्रविष्टन क्षेत्रों (Subduction Zones) के कारण आते हैं, जहाँ भारी समुद्री प्लेटें (जैसे
प्रशांत प्लेट) हल्की महाद्वीपीय प्लेटों के नीचे धँसती हैं। यहाँ गहरी समुद्री खाइयाँ और नवीन वलित पर्वत (एंडीज और रॉकीज) स्थित हैं।
2. मध्य-महाद्वीपीय मेखला (Mid-Continental Belt)
यह मेखला यूरोप के आल्प्स पर्वत से शुरू होकर भूमध्य सागर, तुर्की, काके शस, ईरान, हिमालय पर्वतमाला और म्यांमार की पहाड़ियों से होते
हुए दक्षिण-पूर्वी एशिया तक फै ली है।
विश्व के लगभग 21% भूकं प इसी मेखला में दर्ज किए जाते हैं।
तकनीकी कारण: यह क्षेत्र मुख्य रूप से महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसरण (जैसे यूरेशियन प्लेट और इंडियन प्लेट का टकराव) का क्षेत्र है। इस
टकराव के कारण वलन की प्रक्रिया होती है, जिससे उच्च तीव्रता वाले भूकं प उत्पन्न होते हैं।
3. मध्य-अटलांटिक मेखला (Mid-Atlantic Belt)
यह मेखला अटलांटिक महासागर के मध्य में उत्तर से दक्षिण तक फै ली हुई है।
तकनीकी कारण: यह एक अपसारी सीमा (Divergent Boundary) का उदाहरण है, जहाँ प्लेटें एक-दूसरे से विपरीत दिशा में अलग हो
रही हैं। यहाँ दरारी उद्भेदन के कारण मैग्मा बाहर आता है, जिससे मध्यम तीव्रता वाले उथले कें द्र के भूकं प आते हैं।
4. अन्य गौण क्षेत्र (Other Minor Zones)
इसमें पूर्वी अफ्रीकी भ्रंश घाटी (East African Rift Valley) क्षेत्र शामिल है जहाँ भू-पर्पटी के टूटने के कारण भूकं प आते हैं।
इसके अतिरिक्त हिंद महासागर की भूकं पीय रेखाएं और अंतरा-प्लेट (Intra-plate) क्षेत्र (जैसे प्रायद्वीपीय भारत का कोयना क्षेत्र) भी
भूकं पीय गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं।
विश्व में इन भूकं पीय मेखलाओं के वितरण को निम्न मानचित्र के माध्यम से समझा जा सकता है
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निष्कर्ष
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि भूकं पीय गतिविधियाँ मुख्य रूप से प्लेटों के अस्थिर किनारों पर कें द्रित होती हैं। जहाँ अभिसारी सीमाओं पर
विनाशकारी भूकं प आते हैं, वहीं अपसारी सीमाओं पर मध्यम तीव्रता के भूकं प देखे जाते हैं।
189 प्रश्न 1892 अंक
अधिके न्द्र (Epicentre) क्या है?
(What is Epicentre?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानअधिके न्द्र क्या है?PDF पृष्ठ 95
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अधिके न्द्र (Epicentre) की व्याख्या निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से की जा सकती है
भौगोलिक परिभाषा: अधिके न्द्र पृथ्वी की सतह पर स्थित वह बिंदु है, जो भूकं प के उद्गम कें द्र जिसे अवके न्द्र (Focus या Hypocenter)
कहा जाता है, के ठीक लंबवत (vertically) ऊपर स्थित होता है।
भूकं पीय प्रभाव: भूकं प के दौरान ऊर्जा के मुक्त होने पर भूकं पीय तरंगें पृथ्वी की सतह पर सबसे पहले इसी बिंदु (अधिके न्द्र) पर पहुँचती हैं।
अतः, सतह पर भूकं प का अनुभव सबसे पहले इसी स्थान पर होता है और यहाँ भूकं प की तीव्रता व प्रभाव सामान्यतः सर्वाधिक होता है।
190 प्रश्न 19010 अंक
रूस-यूक्रे न संघर्ष की पृष्ठभूमि के भू-राजनीतिक कारकों की विवेचना कीजिए।
(Discuss the geopolitical factors behind the Russia-Ukraine struggle.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानरूस-यूक्रे न संघर्ष की पृष्ठभूमि के भू-राजनीतिक कारकों की विवेचना कीजिए।PDF पृष्ठ 95
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उत्तर — सरल भाषा में
रूस-यूक्रे न संघर्ष आधुनिक विश्व राजनीति का एक अत्यंत जटिल और बहुआयामी संकट है। यह संघर्ष के वल दो देशों के बीच का भूमि विवाद नहीं है,
बल्कि शीतयुद्ध के बाद की वैश्विक व्यवस्था, प्रभाव क्षेत्रों (Spheres of Influence) के विस्तार और सुरक्षा चिंताओं का परिणाम है। इस संघर्ष की
पृष्ठभूमि में निहित प्रमुख भू-राजनीतिक कारकों का विवेचन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है
1. सामरिक और सुरक्षा संबंधी कारक
नाटो (NATO) का पूर्व की ओर विस्तार: रूस के लिए सबसे बड़ी भू-राजनीतिक चिंता नाटो का निरंतर पूर्व की ओर विस्तार रहा है। सोवियत
संघ के विघटन के बाद, रूस यूक्रे न को अपनी सुरक्षा के लिए एक अनिवार्य 'बफर जोन' मानता है। रूस का तर्क है कि यूक्रे न का नाटो में
शामिल होना उसकी पश्चिमी सीमा पर पश्चिमी मिसाइलों और सैनिकों की उपस्थिति सुनिश्चित करेगा, जो उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक 'रेड
लाइन' है।
क्रीमिया का विलय (2014) और डोनबास क्षेत्र: 2014 में क्रीमिया का रूस में विलय काला सागर (Black Sea) में रूस की प्रभुता बनाए
रखने और सेवस्तोपोल (Sevastopol) जैसे रणनीतिक नौसैनिक अड्डे पर नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए किया गया था। इसके साथ ही पूर्वी
यूक्रे न के डोनबास (डोनेट्स्क और लुहान्स्क) क्षेत्र में अलगाववादी आंदोलनों को समर्थन देना रूस की उस रणनीति का हिस्सा है जिससे यूक्रे न
को अस्थिर रखकर उसे पश्चिमी गठबंधन से दूर रखा जा सके ।
2. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारक
साझा विरासत और 'कीवन रूस': रूस और यूक्रे न एक साझा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत साझा करते हैं, जिसकी जड़ें 9वीं शताब्दी
के 'कीवन रूस' साम्राज्य में हैं। रूसी नेतृत्व यूक्रे न को रूसी सभ्यता के अभिन्न अंग के रूप में देखता है।
नृजातीय और भाषाई विभाजन: यूक्रे न के पूर्वी हिस्से में एक बड़ी आबादी रूसी भाषी है और रूसी संस्कृ ति से जुड़ी है। सोवियत संघ के पतन के
बाद, यूक्रे न की आंतरिक राजनीति पश्चिमी समर्थक (पश्चिम यूक्रे न) और रूस समर्थक (पूर्व यूक्रे न) गुटों में विभाजित रही है। रूस ने अक्सर इन
रूसी भाषी नागरिकों के हितों की रक्षा को अपने हस्तक्षेप का नैतिक आधार बनाया है।
3. आर्थिक और ऊर्जा भू-राजनीति
ऊर्जा पारगमन (Energy Transit): यूक्रे न ऐतिहासिक रूप से रूस से यूरोप को निर्यात होने वाली प्राकृ तिक गैस के लिए एक प्रमुख
पारगमन मार्ग रहा है। रूस ने यूक्रे न पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए नॉर्ड स्ट्रीम 1 और 2 जैसी पाइपलाइनों का निर्माण किया, जबकि
यूक्रे न ने पारगमन शुल्क और ऊर्जा सुरक्षा के माध्यम से अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश की।
संसाधनों पर नियंत्रण: यूक्रे न के पास उपजाऊ भूमि (यूरोप का अन्न भंडार) और समृद्ध खनिज संसाधन (विशेष रूप से पूर्व में कोयला और
लोहा) हैं। इन संसाधनों पर प्रभाव बनाए रखना भी एक बड़ा आर्थिक कारक है।
4. वैश्विक शक्ति संतुलन
यह संघर्ष अमेरिका के नेतृत्व वाले एकध्रुवीय विश्व और रूस-चीन समर्थित बहुध्रुवीय विश्व की अवधारणाओं के बीच का टकराव है। रूस इस
युद्ध के माध्यम से अपनी खोई हुई महाशक्ति की स्थिति को पुनः प्राप्त करने और यूरोपीय सुरक्षा संरचना में अपनी निर्णायक भूमिका सुनिश्चित
करने का प्रयास कर रहा है।
निष्कर्ष
रूस-यूक्रे न संघर्ष ने वैश्विक भू-राजनीति को पूरी तरह से बदल दिया है। इसने न के वल शीतयुद्ध काल की यादें ताजा कर दी हैं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति
श्रृंखला, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इस संघर्ष का समाधान के वल क्षेत्रीय समझौतों में नहीं,
बल्कि रूस और पश्चिम के बीच एक नई सुरक्षा वास्तुकला (Security Architecture) के निर्माण में निहित है जो सभी पक्षों की सुरक्षा चिंताओं को
संतुलित कर सके ।
191 प्रश्न 1915 अंक
वर्तमान परिदृश्य में 'चिकन नेक' (Siliguri Corridor) की अवस्थिति एवं सामरिक महत्ता का वर्णन कीजिए।
(Describe location and strategic importance of 'Chicken Neck' in present scenario.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानवर्तमान परिदृश्य में 'चिकन नेक' की अवस्थिति एवं सामरिक महत्ता का वर्णन कPDF पृष्ठ 96
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उत्तर — सरल भाषा में
वर्तमान परिदृश्य में 'चिकन नेक' या सिलीगुड़ी कॉरिडोर की अवस्थिति एवं सामरिक महत्ता का विवरण निम्नलिखित है
भौगोलिक अवस्थिति एवं पहचान
अवस्थिति: 'चिकन नेक' पश्चिम बंगाल राज्य के सिलीगुड़ी शहर के आसपास स्थित एक अत्यंत संकीर्ण भूमि पट्टी है।
विस्तार: इसकी चौड़ाई मात्र 20 से 22 किलोमीटर है, जो भारत के मुख्य भू-भाग को आठ उत्तर-पूर्वी राज्यों (सिक्किम सहित) से जोड़ने वाला
एकमात्र स्थलीय मार्ग है।
पड़ोसी देश: यह उत्तर में नेपाल और भूटान तथा दक्षिण में बांग्लादेश की सीमाओं से घिरा हुआ है, जो इसे भौगोलिक रूप से अत्यंत संवेदनशील
बनाता है।
सामरिक एवं सुरक्षा संबंधी महत्व
राष्ट्रीय अखंडता: यह गलियारा उत्तर-पूर्व भारत की 'जीवन रेखा' (Lifeline) है। किसी भी संघर्ष की स्थिति में इस मार्ग के बाधित होने से
उत्तर-पूर्वी राज्यों का शेष भारत से संपर्क कटने का गंभीर खतरा रहता है।
चीन की चुनौती: तिब्बत में स्थित चीन की 'चुम्बी घाटी' और डोकलाम क्षेत्र इस गलियारे के अत्यधिक निकट (लगभग 100-130 किमी) हैं।
सामरिक विशेषज्ञों के अनुसार, चीन युद्ध की स्थिति में इस संकीर्ण मार्ग को अवरुद्ध कर भारत के लिए बड़ी चुनौती उत्पन्न कर सकता है।
सैन्य रसद (Logistics): भारतीय सेना के लिए उत्तर-पूर्वी सीमाओं (विशेषकर एलएसी) तक भारी हथियार, रसद और सैनिकों की आपूर्ति
सुनिश्चित करने के लिए यह गलियारा अनिवार्य है।
वर्तमान परिदृश्य
एक्ट ईस्ट पॉलिसी: भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' की सफलता और दक्षिण-पूर्वी एशिया के साथ आर्थिक एकीकरण के लिए सिलीगुड़ी
कॉरिडोर का सुरक्षित और विकसित होना आवश्यक है।
वैकल्पिक मार्ग का विकास: सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए भारत सरकार अब बांग्लादेश के माध्यम से चटगांव बंदरगाह और कालादान मल्टी-
मोडल प्रोजेक्ट जैसे वैकल्पिक संपर्क मार्ग विकसित कर रही है।
बुनियादी ढांचा: हालिया भारत-चीन गतिरोध के बाद, इस क्षेत्र में सड़क और रेल नेटवर्क का आधुनिकीकरण तीव्र गति से किया जा रहा है ताकि
किसी भी आपात स्थिति में त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया दी जा सके ।
192 प्रश्न 19210 अंक
दक्षिण-पूर्वी एशिया की भू-राजनीतिक समस्याओं की विवेचना कीजिए।
(Describe the problems of Geopolitics in the context of South East Asian countries.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानदक्षिण-पूर्वी एशिया की भू-राजनीतिक समस्याओं की विवेचना कीजिए।PDF पृष्ठ 96
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उत्तर — सरल भाषा में
दक्षिण-पूर्वी एशिया वर्तमान में वैश्विक राजनीति और सुरक्षा का एक अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण कें द्र बना हुआ है। इस क्षेत्र की भू-राजनीतिक
समस्याओं को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है
1. भौगोलिक एवं रणनीतिक महत्व
दक्षिण-पूर्वी एशिया, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के मिलन स्थल पर स्थित होने के कारण भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र 11
देशों का समूह है जो वैश्विक व्यापार की धमनियों, जैसे मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) को नियंत्रित करता है। वर्तमान में 'हिंद-
प्रशांत' (Indo-Pacific) की उभरती अवधारणा ने इस क्षेत्र को वैश्विक शक्तियों की भू-राजनीतिक बिसात का कें द्र बना दिया है।
2. दक्षिण चीन सागर विवाद
यह इस क्षेत्र की सबसे प्रमुख और जटिल भू-राजनीतिक समस्या है
चीन के दावे: चीन ऐतिहासिक 'नाइन-डैश लाइन' के आधार पर दक्षिण चीन सागर के लगभग 80-90% हिस्से पर अपना संप्रभु दावा करता
है।
समुद्री सीमा विवाद: फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया और ब्रुनेई जैसे देशों के साथ चीन का विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) को लेकर निरंतर विवाद
बना रहता है।
द्वीपों का सैन्यीकरण: चीन द्वारा स्प्राटली और पारसेल द्वीप समूहों पर कृ त्रिम द्वीपों का निर्माण और वहां सैन्य अड्डों की स्थापना ने क्षेत्र में युद्ध
जैसी स्थिति पैदा कर दी है।
अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन: चीन द्वारा UNCLOS (समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र संधि) के प्रावधानों और 2016 के अंतरराष्ट्रीय
मध्यस्थता न्यायालय के फै सले को मानने से इनकार करना क्षेत्रीय अस्थिरता का मुख्य कारण है।
3. महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता और प्रभाव
दक्षिण-पूर्वी एशिया संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते प्रभाव की होड़ का मुख्य मंच है
प्रभाव की प्रतिस्पर्धा: अमेरिका की 'फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक' नीति और चीन की 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के कारण क्षेत्रीय
देशों पर किसी एक पक्ष को चुनने का दबाव बढ़ रहा है।
सुरक्षा समूह: क्वाड (QUAD) और ऑकस (AUKUS) जैसे समूहों के गठन ने क्षेत्रीय ध्रुवीकरण को बढ़ाया है।
आसियान कें द्रीयता को चुनौती: आसियान (ASEAN) के भीतर देशों के अलग-अलग हितों (जैसे कं बोडिया का चीन की ओर झुकाव) ने
'आसियान कें द्रीयता' और क्षेत्रीय एकता को कमजोर किया है।
4. आंतरिक अस्थिरता एवं गैर-पारंपरिक चुनौतियाँ
क्षेत्रीय शांति को प्रभावित करने वाले अन्य महत्वपूर्ण कारक निम्नलिखित हैं
म्यांमार संकट: 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद म्यांमार में जारी राजनीतिक अस्थिरता और नागरिक संघर्ष ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को प्रभावित
किया है।
रोहिंग्या मुद्दा: म्यांमार से रोहिंग्या शरणार्थियों का बड़े पैमाने पर पलायन बांग्लादेश, भारत और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के लिए एक गंभीर
मानवीय और सुरक्षा चुनौती बन गया है।
समुद्री डकै ती एवं आतंकवाद: सुलु सागर और मलक्का जलडमरूमध्य में समुद्री डकै ती तथा कट्टरपंथी समूहों की सक्रियता क्षेत्रीय व्यापार और
सुरक्षा के लिए निरंतर खतरा बनी हुई है।
निष्कर्ष
दक्षिण-पूर्वी एशिया की भू-राजनीतिक समस्याओं का समाधान के वल नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से ही
संभव है। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए दक्षिण चीन सागर हेतु एक प्रभावी 'आचार संहिता' (Code of Conduct) का निर्माण और आसियान
की एकजुटता अनिवार्य है। भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' भी इस क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
193 प्रश्न 1935 अंक
विश्व के किन्हीं दस जैव-विविधता तप्त स्थलों (Biodiversity Hotspots) के नाम लिखिए।
(Write names of any ten biodiversity hotspots of the world.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानविश्व के किन्हीं दस जैव-विविधता तप्त स्थलों के नाम लिखिए।PDF पृष्ठ 97
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उत्तर — सरल भाषा में
जैव-विविधता तप्त स्थल (Biodiversity Hotspots) ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ स्थानिक प्रजातियों की उच्च सघनता पाई जाती है, लेकिन ये क्षेत्र आवास
विनाश और मानवीय गतिविधियों के कारण गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं।
विश्व के किन्हीं दस प्रमुख जैव-विविधता तप्त स्थलों के नाम निम्नलिखित हैं
(क) हिमालय (Himalaya): इसमें संपूर्ण भारतीय हिमालयी क्षेत्र के साथ-साथ पाकिस्तान, तिब्बत, नेपाल, भूटान और म्यांमार के कु छ हिस्से
शामिल हैं।
(ख) पश्चिमी घाट और श्रीलंका (Western Ghats and Sri Lanka): यह दक्षिण-पश्चिम भारत के पर्वत शृंखलाओं और पड़ोसी देश श्रीलंका को
समाहित करता है।
(ग) इंडो-बर्मा (Indo-Burma): इसमें उत्तर-पूर्वी भारत (ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिण का क्षेत्र), म्यांमार, लाओस, वियतनाम, थाईलैंड और कं बोडिया
शामिल हैं।
(घ) सुंडालैंड (Sundaland): इस क्षेत्र में दक्षिण-पूर्वी एशिया के द्वीप समूह (जैसे बोर्नियो, सुमात्रा, जावा) और भारत का निकोबार द्वीप समूह
शामिल है।
(ङ) मेडागास्कर और हिंद महासागर के द्वीप (Madagascar and Indian Ocean Islands): इसमें मेडागास्कर द्वीप के साथ-साथ मॉरीशस,
सेशेल्स और कोमोरोस जैसे द्वीप शामिल हैं।
(च) फिलीपींस (Philippines): यह दक्षिण-पूर्वी एशिया का एक प्रमुख द्वीप राष्ट्र है जो अपनी अद्वितीय स्थानिक प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध है।
(छ) कै रिबियन द्वीप समूह (Caribbean Islands): इसमें बहामास, ग्रेटर एंटिल्स और लेसर एंटिल्स जैसे द्वीप समूह शामिल हैं।
(ज) भूमध्यसागरीय बेसिन (Mediterranean Basin): भूमध्य सागर के चारों ओर स्थित यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और पश्चिम एशिया के देश इसमें
शामिल हैं।
(झ) ब्राजील का अटलांटिक वन (Atlantic Forest, Brazil): यह दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट पर स्थित है, जो अपनी समृद्ध जैव-विविधता के
लिए जाना जाता है।
(ञ) मध्य अमेरिका (Mesoamerica): इसमें मध्य अमेरिका के देश जैसे मेक्सिको, ग्वाटेमाला, पनामा और कोस्टा रिका आदि शामिल हैं।
194 प्रश्न 19410 अंक
विश्व में ओजोन परत के क्षरण के कारणों एवं प्रभावों की विवेचना कीजिए।
(Discuss causes and effects of Ozone layer depletion in the world.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानविश्व में ओजोन परत के क्षरण के कारणों एवं प्रभावों की विवेचना कीजिए।PDF पृष्ठ 98
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उत्तर — सरल भाषा में
ओजोन परत क्षरण एक गंभीर वैश्विक पर्यावरणीय समस्या है। नीचे इसका विस्तृत विवरण दिया गया है
ओजोन परत: परिचय और अवधारणा
ओजोन (O 3 ) ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बना एक अणु है। वायुमंडल में ओजोन परत मुख्य रूप से समताप मंडल (Stratosphere) में
पृथ्वी की सतह से लगभग 15 से 30 किलोमीटर की ऊँ चाई पर पाई जाती है। यह परत एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करती है, जो सूर्य से आने
वाली हानिकारक पराबैंगनी विकिरणों (UV-B और UV-C) को अवशोषित कर उन्हें पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से रोकती है। यदि यह विकिरण
सीधे पृथ्वी पर पहुँच जाए, तो यह समस्त जीवमंडल के लिए विनाशकारी हो सकता है।
ओजोन परत के क्षरण के प्रमुख कारण
ओजोन परत के पतला होने या नष्ट होने के पीछे मानवीय और प्राकृ तिक दोनों कारक उत्तरदायी हैं
(क) मानवीय कारक (Human Factors)
(i) क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs): यह ओजोन क्षरण का सबसे प्रमुख कारण है। इनका उपयोग रेफ्रिजरेटर, एयर कं डीशनिंग, और एयरसोल
स्प्रे में शीतलक के रूप में किया जाता है। जब CFCs समताप मंडल में पहुँचते हैं, तो पराबैंगनी किरणें इन्हें तोड़कर क्लोरीन परमाणु
मुक्त करती हैं, जो ओजोन अणुओं को नष्ट कर देते हैं।
(ii) हैलोन (Halons): इनका उपयोग अग्निशामक यंत्रों (Fire Extinguishers) में किया जाता है। इनमें ब्रोमीन होता है, जो क्लोरीन की
तुलना में ओजोन के लिए कहीं अधिक घातक है।
(iii) नाइट्रोजन ऑक्साइड (N Ox ): जेट विमानों से निकलने वाला धुआँ और उर्वरकों के उपयोग से निकलने वाली गैसें भी ओजोन परत को
नुकसान पहुँचाती हैं।
(iv) मिथाइल ब्रोमाइड: यह एक कीटनाशक है जिसका उपयोग कृषि में मृदा उपचार के लिए किया जाता है।
(ख) प्राकृ तिक कारक (Natural Factors)
(i) ज्वालामुखी गतिविधियाँ: बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों से निकलने वाले सल्फे ट एरोसोल समताप मंडल में पहुँचकर ओजोन परत को नुकसान
पहुँचाने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं को बढ़ावा देते हैं।
(ii) ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल (PSCs): शीत ऋतु में ध्रुवों पर बनने वाले ये बादल क्लोरीन यौगिकों को सक्रिय करने के लिए सतह प्रदान
करते हैं, जिससे ओजोन छिद्र का निर्माण होता है।
ओजोन परत क्षरण के प्रभाव
ओजोन परत के क्षरण के परिणाम अत्यंत व्यापक और हानिकारक हैं
(क) मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव
(i) त्वचा कैं सर: UV विकिरण के बढ़ने से मनुष्यों में त्वचा कैं सर (मेलानोमा) की संभावना बढ़ जाती है।
(ii) नेत्र विकार: इससे आँखों में मोतियाबिंद (Cataract) और अन्य दृष्टि संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
(iii) प्रतिरक्षा प्रणाली: पराबैंगनी किरणें मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) को कमजोर कर देती हैं, जिससे बीमारियों
से लड़ने की क्षमता घट जाती है।
(ख) वनस्पति और कृषि पर प्रभाव
(i) यह पौधों के विकास चक्र को प्रभावित करता है और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में बाधा डालता है।
(ii) फसलों की उपज में गिरावट आती है और बीजों की गुणवत्ता खराब हो सकती है।
(ग) पारिस्थितिकी तंत्र और समुद्री जीवन पर प्रभाव
(i) फाइटोप्लांकटन की क्षति: समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार 'फाइटोप्लांकटन' UV विकिरण के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। इनकी
कमी से संपूर्ण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।
(ii) यह मछलियों, के कड़ों और अन्य समुद्री जीवों के अंडों और लार्वा को नष्ट कर देता है।
निष्कर्ष एवं वैश्विक प्रयास
ओजोन परत के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol) पर हस्ताक्षर किए गए, जिसका उद्देश्य
ओजोन क्षयकारी पदार्थों (ODS) के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना है। यह संधि अत्यंत सफल रही है और हाल के वर्षों में
ओजोन परत में सुधार के सकारात्मक संके त देखे गए हैं। भविष्य में भी स्थायी विकास और पर्यावरण अनुकू ल तकनीकों को अपनाकर ही हम इस
जीवन रक्षक परत को सुरक्षित रख सकते हैं।
195 प्रश्न 1952 अंक
भारत के दिए गए रेखा-मानचित्र पर निम्न स्थानों को चिह्नित कीजिए: (a) थाल घाट (b) पाल घाट (c) नाथूला (d) शिपकी ला
(Mark following places on map of India: Thal Ghat, Pal Ghat, Nathu La, Shipki La.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत के दिए गए रेखा-मानचित्र पर निम्न स्थानों को चिह्नित कीजिए: थाल घाटPDF पृष्ठ 98
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत के रेखा-मानचित्र पर पूछे गए भौगोलिक स्थानों की सही अवस्थिति और विवरण निम्नलिखित है
भारत का रेखा-मानचित्र इन स्थानों के साथ यहाँ दर्शाया गया है
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दिए गए स्थानों का भौगोलिक विवरण
(a) थाल घाट
यह दर्रा महाराष्ट्र राज्य में पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) पर्वत श्रेणी में स्थित है। यह भौगोलिक रूप से मुंबई को नासिक से जोड़ने वाले प्रमुख सड़क और रेल
मार्ग का हिस्सा है। मानचित्र पर इसे महाराष्ट्र के पश्चिमी भाग में अंकित किया जाना चाहिए।
(b) पाल घाट
इसे 'पलक्कड़ गैप' के नाम से भी जाना जाता है। यह दक्षिण भारत में नीलगिरी पहाड़ियों (उत्तर में) और अन्नामलाई पहाड़ियों (दक्षिण में) के बीच
स्थित एक बड़ा अंतराल है। यह के रल और तमिलनाडु राज्यों की सीमा के निकट स्थित है और इन दोनों राज्यों के बीच संचार का प्रमुख मार्ग प्रदान
करता है।
(c) नाथूला
यह दर्रा सिक्किम राज्य के पूर्वी भाग में हिमालय की ऊं चाइयों पर स्थित है। यह भारत और चीन (तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र) के बीच एक प्रमुख सीमा चौकी
और व्यापारिक मार्ग है। मानचित्र पर इसे सिक्किम के छोटे उभरे हुए हिस्से के पूर्वी किनारे पर चिह्नित किया जाना चाहिए।
(d) शिपकी ला
यह दर्रा हिमाचल प्रदेश राज्य में भारत-चीन सीमा पर स्थित है। यह हिमालय की ज़स्कर श्रेणी का हिस्सा है। सतलुज नदी इसी दर्रे के पास से होकर
तिब्बत से भारत में प्रवेश करती है। मानचित्र पर इसे हिमाचल प्रदेश के सुदूर पूर्व में चीन की सीमा पर अंकित किया जाना चाहिए।
196 प्रश्न 1962 अंक
शिवालिक हिमालय का निर्माण कै से हुआ?
(How was Shivalik Himalaya formed?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानशिवालिक हिमालय का निर्माण कै से हुआ?PDF पृष्ठ 99
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उत्तर — सरल भाषा में
शिवालिक हिमालय के निर्माण की प्रक्रिया को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है
निक्षेपण एवं अवसादी स्रोत: शिवालिक का निर्माण उत्तर में स्थित महान और लघु हिमालय श्रेणियों से निकलने वाली नदियों द्वारा लाए गए
असंपीडित अवसादों (नदी-जन्य निक्षेपों) जैसे कं कड़, पत्थर और गाद के जमाव से हुआ है।
विवर्तनिक उत्थान और वलन: लगभग प्लियो-प्लीस्टोसिन काल के दौरान, भारतीय प्लेट के उत्तर की ओर निरंतर खिसकने से उत्पन्न संपीडन
बल के कारण इन जमा हुए अवसादों में वलन (folding) की प्रक्रिया हुई, जिससे इनका उत्थान हुआ और शिवालिक श्रेणी का निर्माण हुआ।
197 प्रश्न 1972 अंक
पश्चिमी घाट की पर्वत श्रेणियों/पहाड़ियों के नाम लिखें।
(Write name of mountains Range/Hills of Western Ghats?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानपश्चिमी घाट की पर्वत श्रेणियों/पहाड़ियों के नाम लिखें।PDF पृष्ठ 99
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उत्तर — सरल भाषा में
पश्चिमी घाट (जिसे सह्याद्रि भी कहा जाता है) की प्रमुख पर्वत श्रेणियाँ और पहाड़ियाँ निम्नलिखित हैं
सह्याद्रि श्रेणी: इसे उत्तरी और दक्षिणी सह्याद्रि में विभाजित किया गया है।
नीलगिरि पहाड़ियाँ: जहाँ पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट आपस में मिलते हैं।
अन्नामलाई पहाड़ियाँ: यहाँ दक्षिण भारत की सबसे ऊँ ची चोटी 'अनाईमुडी' स्थित है।
कार्डमम (इलायची) पहाड़ियाँ: यह भारत की सबसे दक्षिणी पर्वत श्रेणियों में से एक है।
पालनी पहाड़ियाँ: यह अन्नामलाई श्रेणी का ही पूर्वी विस्तार है।
अगस्त्यमलाई पहाड़ियाँ: यह के रल और तमिलनाडु की सीमा पर स्थित है।
बाबा बुदन पहाड़ियाँ: यह कर्नाटक में स्थित अपनी उच्च गुणवत्ता वाली कॉफी और लौह अयस्क के लिए प्रसिद्ध है।
198 प्रश्न 1982 अंक
छोटा नागपुर पठार का क्या महत्त्व है?
(What is the importance of Chota Nagpur plateau?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानछोटा नागपुर पठार का क्या महत्त्व है?PDF पृष्ठ 99
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उत्तर — सरल भाषा में
छोटा नागपुर पठार भारत के पूर्वी भाग (मुख्यतः झारखंड और आसपास के राज्यों) में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र है। इसका महत्व
निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है
1. खनिज संसाधनों की प्रचुरता (भारत का रूर)
खनिज संसाधनों की अत्यधिक विविधता और प्रचुरता के कारण इसे 'भारत का रूर' (Ruhr of India) कहा जाता है। यहाँ कोयला, लौह अयस्क,
अभ्रक (माइका), बॉक्साइट, तांबा, चूना पत्थर और यूरेनियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के विशाल भंडार पाए जाते हैं। झरिया और रानीगंज जैसे क्षेत्र
कोयला उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।
2. औद्योगिक और आर्थिक महत्व
यह पठार भारत के औद्योगिक विकास की रीढ़ है। खनिजों की निकटता के कारण यहाँ लौह एवं इस्पात उद्योग (जैसे जमशेदपुर, बोकारो और कु ल्टी-
बर्नपुर) का भारी संकें द्रण हुआ है। इसके अतिरिक्त, दामोदर नदी घाटी परियोजना (DVC) के माध्यम से जल विद्युत और ताप विद्युत कें द्रों ने इस क्षेत्र
को ऊर्जा उत्पादन का कें द्र बना दिया है, जो देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
199 प्रश्न 1995 अंक
छोटा नागपुर पठार के विस्तार एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।
(Explain the extent and importance of Chota Nagpur Plateau.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानछोटा नागपुर पठार के विस्तार एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।PDF पृष्ठ 100
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उत्तर — सरल भाषा में
छोटा नागपुर पठार भारत के प्रायद्वीपीय पठार का उत्तर-पूर्वी भाग है, जिसे अपनी खनिज संपन्नता के कारण 'भारत का रूर' भी कहा जाता है।
इसका वर्णन निम्न बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है
1. भौगोलिक विस्तार एवं क्षेत्रीय अवस्थिति
क्षेत्रीय विस्तार: यह मुख्य रूप से झारखंड राज्य में फै ला हुआ है। इसके अतिरिक्त इसका विस्तार ओडिशा (उत्तरी भाग), छत्तीसगढ़ (उत्तरी-
पूर्वी भाग), पश्चिम बंगाल (पुरुलिया जिला) और बिहार के दक्षिणी हिस्सों में है।
सीमाएं: इसके उत्तर-पूर्व में राजमहल की पहाड़ियाँ और उत्तर-पश्चिम में सोन नदी स्थित है।
उप-विभाजन: यह पठार कई छोटे पठारों और पहाड़ियों का समूह है, जिसमें राँची का पठार, हजारीबाग का पठार, कोडरमा का पठार और
पलामू का पठार प्रमुख हैं।
अपवाह तंत्र: दामोदर, सुवर्णरेखा, बराकर और कोयल यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं।
2. महत्त्व (आर्थिक, खनिज एवं औद्योगिक)
खनिज संसाधन: यह क्षेत्र खनिजों का भंडार है। यहाँ प्रचुर मात्रा में कोयला (झरिया, रानीगंज), लौह-अयस्क (सिंहभूम), अभ्रक (कोडरमा -
जिसे विश्व की अभ्रक राजधानी कहा जाता है), बॉक्साइट, तांबा और चूना पत्थर पाया जाता है।
औद्योगिक कें द्र: खनिजों की उपलब्धता के कारण यहाँ भारी उद्योगों का विकास हुआ है, जैसे जमशेदपुर (टाटा स्टील), बोकारो स्टील प्लांट और
दुर्गापुर-आसनसोल औद्योगिक क्षेत्र।
ऊर्जा संसाधन: दामोदर घाटी निगम (DVC) के माध्यम से यहाँ जल-विद्युत और ताप-विद्युत का भारी मात्रा में उत्पादन होता है, जो देश के
औद्योगिक विकास में सहायक है।
वन एवं जनजातीय संस्कृ ति: यह क्षेत्र सघन वनों और समृद्ध जनजातीय संस्कृ ति (संथाल, मुंडा, हो, उरांव जनजातियाँ) के लिए भी अत्यंत
महत्वपूर्ण है।
200 प्रश्न 2005 अंक
भारत के पश्चिमी और पूर्वी तटीय मैदानों में अंतर कीजिए।
(Differentiate between Western and Eastern Coastal Plains.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत के पश्चिमी और पूर्वी तटीय मैदानों में अंतर कीजिए।PDF पृष्ठ 100
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत के प्रायद्वीपीय पठार के दोनों ओर स्थित तटीय मैदानों की भौगोलिक संरचना, अपवाह तंत्र और आर्थिक विशेषताओं में महत्वपूर्ण भिन्नता पाई
जाती है। पश्चिमी और पूर्वी तटीय मैदानों के मध्य मुख्य अंतर निम्नलिखित सारणी के माध्यम से स्पष्ट किए जा सकते हैं
आधार पश्चिमी तटीय मैदान पूर्वी तटीय मैदान
विस्तार एवं यह मैदान संकीर्ण हैं (औसत चौड़ाई लगभग 64 किमी)। यह मैदान पश्चिमी मैदानों की तुलना में काफी चौड़े और समतल हैं
चौड़ाई नर्मदा और तापी के मुहाने पर यह अधिक चौड़े हैं। (औसत चौड़ाई 80-120 किमी)।
निर्माण की यह तट निमज्जित (Submerged) तट का उदाहरण है, यह मुख्य रूप से उन्मज्जित (Emergent) तट का उदाहरण है,
प्रकृति जिसके कारण यह अत्यधिक कटा-फटा है। जो अधिक नियमित और सीधा है।
आधार पश्चिमी तटीय मैदान पूर्वी तटीय मैदान
अपवाह तंत्र एवं यहाँ की नदियाँ छोटी और तीव्रगामी हैं, जो मुहाने पर यहाँ बहने वाली नदियाँ (महानदी, गोदावरी, कृ ष्णा, कावेरी) धीमी
आकृ तियाँ ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती हैं। गति की हैं और विशाल डेल्टा बनाती हैं।
विशिष्ट भू- के रल के तट पर विशिष्ट 'कयाल' (लैगून) पाए जाते हैं, जो यहाँ चिल्का, कोलेरू और पुलिकट जैसी महत्वपूर्ण लैगून झीलें पाई
आकृ तियाँ मछली पकड़ने और नौकायन के लिए प्रसिद्ध हैं। जाती हैं।
इसे उत्तर से दक्षिण तक कोंकण (महाराष्ट्र-गोवा), कन्नड़
इसे उत्तर में उत्तरी सरकार (ओडिशा-आंध्र प्रदेश) और दक्षिण में
क्षेत्रीय विभाजन (कर्नाटक) और मालाबार (के रल) तट में विभाजित किया
कोरोमंडल तट (तमिलनाडु ) के नाम से जाना जाता है।
गया है।
कम कटे -फटे तट के कारण यहाँ कृ त्रिम बंदरगाह अधिक हैं।
आर्थिक महत्व तट के अधिक कटा-फटा होने के कारण यहाँ प्राकृ तिक
उपजाऊ डेल्टा के कारण यह क्षेत्र कृषि (धान उत्पादन) हेतु
एवं बंदरगाह बंदरगाहों (जैसे- मुंबई, मर्मगाओ) की अधिकता है।
अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
पश्चिमी तटीय मैदान अपनी जलविद्युत क्षमता और प्राकृ तिक बंदरगाहों के लिए जाना जाता है, जबकि पूर्वी तटीय मैदान अपनी कृषि उत्पादकता
(भारत का चावल का कटोरा) और डेल्टाई पारिस्थितिकी तंत्र के लिए प्रसिद्ध है।
201 प्रश्न 20110 अंक
भारत के तटीय मैदानों को उप-विभागों में विभाजित कीजिए तथा उनकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
(Divide coastal plains of India into sub-divisions and explain characteristics.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत के तटीय मैदानों को उप-विभागों में विभाजित कीजिए तथा उनकी विशेषताओंPDF पृष्ठ 101
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत के तटीय मैदान प्रायद्वीपीय पठार के किनारों पर अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के समांतर स्थित हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित
किया जा सकता है: पश्चिमी तटीय मैदान और पूर्वी तटीय मैदान।
1. तटीय मैदानों का वर्गीकरण एवं उप-विभाजन
तटीय मैदानों का भौगोलिक स्थिति के आधार पर उप-विभाजन निम्नलिखित है
पश्चिमी तटीय मैदान
कच्छ और काठियावाड़ तट: गुजरात का तटीय क्षेत्र।
कोंकण तट: दमन से गोवा तक का क्षेत्र (महाराष्ट्र और गोवा)।
कन्नड़ तट: गोवा से मैंगलोर तक का क्षेत्र (कर्नाटक)।
मालाबार तट: मैंगलोर से कन्याकु मारी तक का क्षेत्र (के रल)।
पूर्वी तटीय मैदान
उत्कल का मैदान: ओडिशा का तटीय भाग।
उत्तरी सरकार: महानदी और कृ ष्णा नदियों के बीच का क्षेत्र (ओडिशा और आंध्र प्रदेश)।
कोरोमंडल तट: कृ ष्णा नदी से कन्याकु मारी तक का क्षेत्र (आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु )।
भारत के तटीय मैदानों की स्थिति को निम्न मानचित्र द्वारा समझा जा सकता है
{{fig_1}}
2. पश्चिमी तटीय मैदान की भौगोलिक विशेषताएँ
पश्चिमी तटीय मैदान अरब सागर और पश्चिमी घाट के मध्य स्थित हैं। इनकी मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं
संकीर्ण चौड़ाई: यह मैदान पूर्वी तटीय मैदान की तुलना में अत्यधिक संकीर्ण हैं। इनकी औसत चौड़ाई लगभग 64 किमी है। नर्मदा और तापी के
मुहाने पर यह सर्वाधिक चौड़े हैं।
जलमग्न (Submerged) प्रकृति: यह तट 'निम्मजित' या जलमग्न तट का उदाहरण है, जिसके कारण यहाँ प्राकृ तिक बंदरगाहों (जैसे मुंबई,
कांडला) के विकास के लिए अनुकू ल परिस्थितियाँ उपलब्ध हैं।
ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण: यहाँ बहने वाली नदियाँ (नर्मदा, तापी, पेरियार आदि) तीव्र ढाल के कारण बहुत तेज़ बहती हैं और डेल्टा
न बनाकर ज्वारनदमुख (Estuary) बनाती हैं।
कयाल (Kayals): मालाबार तट की एक विशिष्ट विशेषता यहाँ पाए जाने वाले लैगून हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'कयाल' कहा जाता है (जैसे
वेम्बनाड झील)। इनका उपयोग मछली पकड़ने और अंतर्देशीय जलमार्ग के लिए किया जाता है।
वर्षा: यहाँ दक्षिण-पश्चिम मानसून से अत्यधिक वर्षा होती है।
3. पूर्वी तटीय मैदान की भौगोलिक विशेषताएँ
पूर्वी तटीय मैदान बंगाल की खाड़ी और पूर्वी घाट के मध्य स्थित हैं। इनकी विशेषताएँ इस प्रकार हैं
अधिक चौड़ाई: यह पश्चिमी मैदानों की तुलना में काफी चौड़े और समतल हैं। इनकी औसत चौड़ाई 80 से 120 किमी के बीच है।
उभरा हुआ (Emergent) तट: यह तट 'उन्मज्जित' या उभरे हुए तट का उदाहरण है। यहाँ समुद्र की गहराई कम होने के कारण बड़े जहाजों
के लिए प्राकृ तिक बंदरगाहों की कमी है।
विशाल डेल्टाओं का निर्माण: महानदी, गोदावरी, कृ ष्णा और कावेरी जैसी बड़ी नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले यहाँ बहुत बड़े और
उपजाऊ डेल्टा बनाती हैं। इसी कारण इसे 'दक्षिण भारत के अन्न का कटोरा' भी कहा जाता है।
लैगून झीलें: यहाँ भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की झील 'चिल्का' (ओडिशा) और 'पुलिकट' झील (आंध्र प्रदेश-तमिलनाडु सीमा) स्थित हैं।
कृषि और वर्षा: यहाँ जलोढ़ मिट्टी की प्रधानता के कारण चावल की खेती प्रचुर मात्रा में होती है। यहाँ पश्चिमी तट की तुलना में मानसून के दौरान
अपेक्षाकृ त कम वर्षा होती है, लेकिन कोरोमंडल तट पर शीतकालीन वर्षा (लौटते मानसून से) होती है।
202 प्रश्न 2022 अंक
दक्कन लावा पठार की 'मलनाड' और 'मैदान' भू-आकृ तियों के मध्य अन्तर बताइए।
(Differentiate between 'Malnad' and 'Maidan' topography of Deccan Lava Plateau.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानदक्कन लावा पठार की 'मलनाड' और 'मैदान' भू-आकृ तियों के मध्य अन्तर बताइए।PDF पृष्ठ 102
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उत्तर — सरल भाषा में
कर्नाटक के पठार (दक्कन लावा पठार का हिस्सा) को दो प्रमुख भू-आकृ तिक इकाइयों में विभाजित किया जाता है, जिनके मध्य मुख्य अंतर
निम्नलिखित हैं
मलनाड (Malnad): यह एक पहाड़ी, ऊबड़-खाबड़ और विच्छेदित (dissected) उच्च भूमि है। यह क्षेत्र पश्चिमी घाट के किनारे स्थित है,
जिसकी औसत चौड़ाई लगभग 35 किमी है। यह क्षेत्र अपनी घनी वनस्पति और सघन वनाच्छादित ढलानों के लिए जाना जाता है।
मैदान (Maidan): यह मलनाड के पूर्व में स्थित एक विस्तृत और लहरदार मैदान (rolling plain) या कम ऊँ चाई वाला पठारी क्षेत्र है।
मलनाड की तुलना में यह एक अपेक्षाकृ त समतल क्षेत्र है जो मुख्य रूप से कृषि प्रधान है और यहाँ वर्षा की मात्रा भी कम होती है।
203 प्रश्न 2032 अंक
सह्याद्रि कहाँ स्थित हैं?
(Where are the 'Sahyadris'?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानसह्याद्रि कहाँ स्थित हैं?PDF पृष्ठ 102
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उत्तर — सरल भाषा में
सह्याद्रि की भौगोलिक स्थिति और विस्तार का विवरण निम्नलिखित है
भौगोलिक अवस्थिति: सह्याद्रि भारत के पश्चिमी तट के समानांतर अरब सागर के किनारे स्थित एक निरंतर पर्वत श्रृंखला है, जिसे 'पश्चिमी घाट'
के नाम से भी जाना जाता है। यह प्रायद्वीपीय भारत के पश्चिमी किनारे पर एक महत्वपूर्ण भौगोलिक बाधा के रूप में स्थित है।
विस्तार: इसका विस्तार उत्तर में तापी नदी की घाटी (गुजरात-महाराष्ट्र सीमा) से लेकर दक्षिण में कन्याकु मारी (के प कोमोरिन) तक लगभग
1600 किलोमीटर की लंबाई में है।
संबंधित राज्य: यह पर्वत श्रृंखला मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, के रल और तमिलनाडु राज्यों में फै ली हुई है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में
इसे विशेष रूप से 'सह्याद्रि' कहा जाता है।
204 प्रश्न 20410 अंक
भारत में 'दक्कन ट्रैप' (Deccan Trap) के प्रमुख क्षेत्रों का विस्तार से विवेचन कीजिए।
(Describe in detail the major areas of 'Deccan Trap' in India.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत में 'दक्कन ट्रैप' के प्रमुख क्षेत्रों का विस्तार से विवेचन कीजिए।PDF पृष्ठ 102
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत में 'दक्कन ट्रैप' (Deccan Trap) एक प्रमुख भू-आकृ तिक इकाई है, जो प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित है। इसका विस्तृत
विवेचन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है
1. दक्कन ट्रैप की उत्पत्ति और परिभाषा
दक्कन ट्रैप का निर्माण मेसोजोइक महाकल्प के क्रे टेशियस काल (लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व) के अंत में हुआ था। इसकी उत्पत्ति का मुख्य कारण
'दरारी उद्भेदन' (Fissure Eruption) की प्रक्रिया थी, जिसमें पृथ्वी के आंतरिक भाग से तरल बेसाल्टिक लावा दरारों के माध्यम से सतह पर आया
और परतों के रूप में जमा हो गया।
'ट्रैप' शब्द का अर्थ: यह स्वीडिश शब्द 'Trappa' से लिया गया है, जिसका अर्थ 'सीढ़ी' होता है। लावा के क्रमिक जमाव और बाद में हुए
अपरदन के कारण यहाँ की स्थलाकृ ति सीढ़ीनुमा दिखाई देती है, इसलिए इसे 'दक्कन ट्रैप' कहा जाता है।
2. प्रमुख क्षेत्रों का भौगोलिक विस्तार
दक्कन ट्रैप भारत के लगभग 5 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फै ला हुआ है। इसके मुख्य विस्तार वाले क्षेत्र निम्नलिखित हैं
महाराष्ट्र: दक्कन ट्रैप का सर्वाधिक विस्तार (लगभग 75-80%) महाराष्ट्र में है। कोंकण तट और सह्याद्रि के पूर्वी ढालों सहित लगभग पूरा
महाराष्ट्र पठार इसी से निर्मित है।
गुजरात: गुजरात के सौराष्ट्र (काठियावाड़) और कच्छ प्रायद्वीपीय भागों में लावा की मोटी परतें पाई जाती हैं।
मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश का पश्चिमी भाग, विशेषकर मालवा का पठार, दक्कन ट्रैप की बेसाल्टिक चट्टानों से बना है।
कर्नाटक: उत्तरी कर्नाटक के जिले जैसे बेलगाम, बीजापुर, धारवाड़ और गुलबर्गा में इसका महत्वपूर्ण विस्तार है।
तेलंगाना और आंध्र प्रदेश: तेलंगाना का पश्चिमी हिस्सा और आंध्र प्रदेश के कु छ सीमावर्ती क्षेत्रों में लावा के अवशेष मिलते हैं।
3. भू-आकृ तिक एवं भूगर्भीय विशेषताएं
स्तरित संरचना: लावा का जमाव क्षैतिज परतों के रूप में हुआ है। इन परतों की मोटाई पश्चिम (मुंबई के पास लगभग 2000 मीटर) में सर्वाधिक
है और पूर्व तथा उत्तर की ओर कम होती जाती है।
काली मृदा (रेगुर): बेसाल्टिक चट्टानों के लंबे समय तक अपक्षय (Weathering) और अपरदन के कारण यहाँ अत्यंत उपजाऊ काली मिट्टी का
निर्माण हुआ है, जिसे 'रेगुर मृदा' भी कहा जाता है।
उच्चावच: यहाँ की पहाड़ियों के शिखर प्रायः सपाट हैं और ढाल सीढ़ीनुमा हैं, जो लावा प्रवाह की विशिष्टता है।
4. आर्थिक एवं कृषि संबंधी महत्व
कृषि: काली मिट्टी अपनी जल-धारण क्षमता के कारण कपास की खेती के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त यहाँ सोयाबीन, गन्ना, मिर्च
और मूंगफली का भी बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है।
खनिज संसाधन: बेसाल्टिक चट्टानों के रासायनिक अपक्षय से यहाँ बॉक्साइट (एल्युमीनियम का अयस्क) के निक्षेप मिलते हैं। साथ ही, यहाँ की
कठोर चट्टानें भवन निर्माण और सड़क निर्माण के लिए उत्तम सामग्री प्रदान करती हैं।
भू-जल: चट्टानों की सघनता के कारण यहाँ भू-जल स्तर की स्थिति जटिल होती है, जहाँ के वल दरारों और जोड़ों में ही जल संचित हो पाता है।
5. दक्कन ट्रैप का मानचित्र
भारत के मानचित्र पर दक्कन ट्रैप की स्थिति निम्नलिखित है
{{fig_1}}
205 प्रश्न 2055 अंक
भारत में बांगर एवं खादर क्षेत्रों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
(Differentiate between Bangar and Khadar regions of India.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत में बांगर एवं खादर क्षेत्रों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।PDF पृष्ठ 103
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत के उत्तरी विशाल मैदानों में जलोढ़ मृदा के निक्षेपण और आयु के आधार पर इसे दो प्रमुख भागों, बांगर और खादर, में विभाजित किया जाता है।
इन दोनों क्षेत्रों के मध्य मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं
1. जलोढ़ की आयु और उत्पत्ति
बांगर: यह पुरानी जलोढ़ मिट्टी से निर्मित क्षेत्र है। इसका निर्माण प्राचीन काल में नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेपण से हुआ था।
खादर: यह नवीन जलोढ़ मिट्टी से निर्मित क्षेत्र है। खादर का प्रत्येक वर्ष बाढ़ के माध्यम से नया जमाव और नवीनीकरण होता रहता है।
2. भौगोलिक स्थिति और बाढ़ की आवृत्ति
बांगर: यह क्षेत्र नदियों के वर्तमान बाढ़ के स्तर से ऊँ चाई पर स्थित होता है। यहाँ बाढ़ का पानी सामान्यतः नहीं पहुँच पाता है, इसलिए इसे
'पुराने बाढ़ के मैदान' भी कहा जाता है।
खादर: यह क्षेत्र नदी के प्रवाह मार्ग के निकट निचले इलाकों और बाढ़ के मैदानों में स्थित होता है। यहाँ प्रतिवर्ष बाढ़ आती है, जिससे नई मिट्टी
की परत जम जाती है।
3. मृदा संरचना और संघटन
बांगर: इस मृदा में चूनेदार निक्षेपों की अधिकता होती है, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'कं कड़' कहा जाता है। इसकी प्रकृति थोड़ी शुष्क और सघन
होती है।
खादर: खादर मृदा की बनावट अत्यंत महीन होती है। इसमें गाद (silt), मृत्तिका (clay) और महीन बालू की अधिकता पाई जाती है, जिसके
कारण यह अधिक नमी सोखने में सक्षम होती है।
4. मृदा उर्वरता और कृषि उपयुक्तता
बांगर: प्राकृ तिक रूप से नवीनीकृ त न होने के कारण यह खादर की तुलना में कम उर्वर होती है। यहाँ सफल कृषि के लिए रासायनिक उर्वरकों
और गहन सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है।
खादर: यह मिट्टी अत्यधिक उपजाऊ होती है। प्रतिवर्ष होने वाले प्राकृ तिक नवीनीकरण के कारण यह गहन कृषि के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है
और इसमें खाद की कम आवश्यकता पड़ती है।
206 प्रश्न 20610 अंक
हिमालयी एवं प्रायद्वीपीय नदियों के अंतर की विवेचना कीजिए: उद्भव स्थल, प्रवाह की प्रकृति, अपवाह प्रकार, नदी प्रकृति एवं जलग्रहण क्षेत्र।
(Explain difference between Himalayan and Peninsular Rivers: Origin, Flow Nature, Drainage Type, River Nature, Catchment.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानहिमालयी एवं प्रायद्वीपीय नदियों के अंतर की विवेचना कीजिए: उद्भव स्थल, प्PDF पृष्ठ 104
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उत्तर — सरल भाषा में
भारतीय अपवाह तंत्र को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है: हिमालयी नदियाँ और प्रायद्वीपीय नदियाँ। इन दोनों प्रणालियों के
बीच प्रमुख अंतर निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर स्पष्ट किए जा सकते हैं
1. उद्भव स्थल (Origin)
हिमालयी नदियाँ: इनका उद्गम उत्तर में स्थित उच्च हिमालयी पर्वतों से होता है। ये नदियाँ मुख्य रूप से हिमच्छादित चोटियों और विशाल हिमनदों
(ग्लेशियरों) से निकलती हैं। उदाहरण के लिए, गंगा नदी का उद्गम गंगोत्री हिमनद से और सिंधु नदी का मानसरोवर झील के निकट के हिमनदों
से होता है।
प्रायद्वीपीय नदियाँ: इनका उद्गम प्रायद्वीपीय पठार, पश्चिमी घाट या मध्य भारतीय उच्च भूमि से होता है। ये अपेक्षाकृ त कम ऊँ चाई वाले क्षेत्रों से
निकलती हैं। उदाहरण के लिए, गोदावरी नदी नासिक (पश्चिमी घाट) से और नर्मदा नदी अमरकं टक की पहाड़ियों से निकलती है। यहाँ जल का
मुख्य स्रोत वर्षा है, न कि बर्फ ।
2. प्रवाह की प्रकृति (Flow Nature)
हिमालयी नदियाँ: ये नदियाँ 'बारहमासी' (Perennial) प्रकृति की होती हैं। इन्हें ग्रीष्म ऋतु में हिमनदों (बर्फ ) के पिघलने से और वर्षा ऋतु में
मानसून से जल प्राप्त होता है, जिससे इनमें वर्ष भर जल का प्रवाह बना रहता है।
प्रायद्वीपीय नदियाँ: ये नदियाँ 'मौसमी' (Seasonal) प्रकृति की होती हैं। इनका प्रवाह पूरी तरह से मानसूनी वर्षा पर निर्भर करता है। शुष्क
मौसम या ग्रीष्म ऋतु के दौरान इन नदियों का जल स्तर काफी कम हो जाता है या छोटी नदियाँ सूख भी जाती हैं।
3. अपवाह प्रकार एवं प्रतिरूप (Drainage Type & Pattern)
हिमालयी नदियाँ: ये नदियाँ 'पूर्वर्ती अपवाह' (Antecedent Drainage) का उत्कृ ष्ट उदाहरण हैं, क्योंकि इन्होंने हिमालय के उत्थान के
बावजूद अपना मार्ग बनाए रखने के लिए पर्वतों को काटकर गहरे गार्ज बनाए हैं। इनका अपवाह प्रतिरूप मुख्य रूप से 'वृक्षाकार'
(Dendritic) होता है।
प्रायद्वीपीय नदियाँ: ये नदियाँ 'अध्यारोपित अपवाह' (Superimposed Drainage) या अनुवर्ती अपवाह का अनुसरण करती हैं। कठोर
चट्टानी संरचना के कारण ये जालीदार (Trellis) या आयताकार (Rectangular) प्रतिरूप बनाती हैं। ये नदियाँ अपने भूवैज्ञानिक इतिहास में
ढाल का अनुसरण करती हैं।
4. नदी की प्रकृति एवं अवस्था (River Nature & Stage)
हिमालयी नदियाँ: ये नदियाँ अभी अपनी 'युवावस्था' में हैं। ये तीव्र गति से बहती हैं और अत्यधिक अपरदन (Erosion) करती हैं। ये नदियाँ
गहरे गार्ज, 'V' आकार की घाटियाँ और मैदानी भागों में बड़े-बड़े 'विसर्प' (Meanders) का निर्माण करती हैं। इनका मार्ग परिवर्तनशील
होता है।
प्रायद्वीपीय नदियाँ: ये नदियाँ अपनी 'प्रौढ़ावस्था' में हैं। इनका ढाल मंद है और अपरदन क्षमता कम हो चुकी है। ये नदियाँ उथली घाटियों में
बहती हैं और इनके तटबंध स्थिर हैं। ये नदियाँ सामान्यतः विसर्प नहीं बनातीं और इनका मार्ग निश्चित होता है।
5. जलग्रहण क्षेत्र (Catchment Area)
हिमालयी नदियाँ: इनका जलग्रहण क्षेत्र (Basin) अत्यंत विशाल होता है। उदाहरण के लिए, गंगा नदी का बेसिन भारत का सबसे बड़ा
जलग्रहण क्षेत्र है, जो लाखों वर्ग किलोमीटर में फै ला है।
प्रायद्वीपीय नदियाँ: इनका जलग्रहण क्षेत्र हिमालयी नदियों की तुलना में अपेक्षाकृ त छोटा और सीमित होता है। उदाहरण के लिए, प्रायद्वीपीय
भारत की सबसे बड़ी नदी गोदावरी का बेसिन भी गंगा बेसिन की तुलना में काफी छोटा है।
207 प्रश्न 2072 अंक
कृ ष्णा नदी की किन्हीं 8 मुख्य सहायक नदियों के नाम बताइए।
(Name any 8 tributaries of river Krishna.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानकृ ष्णा नदी की किन्हीं 8 मुख्य सहायक नदियों के नाम बताइए।PDF पृष्ठ 104
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उत्तर — सरल भाषा में
कृ ष्णा नदी प्रायद्वीपीय भारत की एक अत्यंत महत्वपूर्ण नदी है। इसकी 8 प्रमुख सहायक नदियाँ निम्नलिखित हैं
(क) तुंगभद्रा: यह कृ ष्णा की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण सहायक नदी है।
(ख) भीमा: यह कृ ष्णा की एक प्रमुख बाईं तट की सहायक नदी है जो महाराष्ट्र और कर्नाटक में बहती है।
(ग) कोयना: इसे महाराष्ट्र के सतारा जिले में कृ ष्णा की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी माना जाता है।
(घ) घटप्रभा: यह कर्नाटक राज्य में कृ ष्णा नदी से मिलने वाली एक प्रमुख दाहिने तट की सहायक नदी है।
(ङ) मालप्रभा: यह भी कर्नाटक में कृ ष्णा की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है।
(च) मूसी: इस नदी के किनारे प्रसिद्ध हैदराबाद शहर स्थित है, जो तेलंगाना में कृ ष्णा से मिलती है।
(छ) पंचगंगा: यह महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में बहने वाली कृ ष्णा की एक सहायक नदी है।
(ज) दूधगंगा: यह महाराष्ट्र और कर्नाटक की सीमा के पास कृ ष्णा नदी में विलीन हो जाती है।
अंकन योजना के अनुसार, प्रत्येक दो सही सहायक नदियों के नामों के उल्लेख पर 0.5 अंक देय हैं। अतः 8 सही नाम लिखने पर पूर्ण 2.0 अंक प्राप्त
होंगे।
208 प्रश्न 2082 अंक
भारत के किन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षापात की अधिकतम और न्यूनतम परिवर्तनशीलता मिलती है?
(In which areas of India highest and lowest variability of annual rainfall is found?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत के किन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षापात की अधिकतम और न्यूनतम परिवर्तनPDF पृष्ठ 105
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत में वार्षिक वर्षा की परिवर्तनशीलता वर्षा की मात्रा के व्युत्क्रमानुपाती (Inversely Proportional) होती है। इसके प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं
अधिकतम वर्षा परिवर्तनशीलता (Highest Variability): यह उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ वार्षिक वर्षा बहुत कम और अनिश्चित होती है
(परिवर्तनशीलता 50% से अधिक)।
क्षेत्र: पश्चिमी राजस्थान, गुजरात का कच्छ क्षेत्र और उत्तरी कश्मीर (लद्दाख)।
न्यूनतम वर्षा परिवर्तनशीलता (Lowest Variability): यह उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ वर्षा की मात्रा अधिक और नियमित होती है
(परिवर्तनशीलता 15-25% से कम)।
क्षेत्र: पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलान, उत्तर-पूर्वी भारत (मुख्य रूप से मेघालय, असम और अरुणाचल प्रदेश) तथा गंगा का डेल्टा।
209 प्रश्न 20910 अंक
निम्नलिखित में से किन्हीं दो पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए: (a) एल-नीनो का भारतीय मानसून पर प्रभाव (b) भारतीय मानसून एवं तिब्बत का पठार (c) भारत में पश्चिमी विक्षोभ
(Write short notes on any two: (a) El-Nino effect on Indian monsoon (b) Indian monsoon and Tibet plateau (c) Western Disturbances.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञाननिम्नलिखित में से किन्हीं दो पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए: एल-नीनो का भPDF पृष्ठ 105
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उत्तर — सरल भाषा में
प्रश्नानुसार किन्हीं दो विषयों पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ निम्नलिखित हैं
(a) एल-नीनो का भारतीय मानसून पर प्रभाव (El-Nino effect on Indian monsoon)
संकल्पनात्मक स्पष्टता: एल-नीनो एक जटिल मौसम प्रणाली है, जिसके अंतर्गत मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में सतही जल सामान्य से
अधिक गर्म हो जाता है। यह घटना 'दक्षिण दोलन' (Southern Oscillation) से संबद्ध है, जिसे सम्मिलित रूप से ENSO कहा जाता है।
यह सामान्यतः 3 से 7 वर्षों के अंतराल पर घटित होती है।
भारतीय मानसून पर प्रभाव
(क) वायुदाब में परिवर्तन: सामान्य परिस्थितियों में, पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र (ऑस्ट्रेलिया के पास) में निम्न दाब होता है जो मानसून पवनों को भारत
की ओर आकर्षित करता है। एल-नीनो के दौरान, यह निम्न दाब का क्षेत्र पूर्वी प्रशांत (पेरू के तट) की ओर स्थानांतरित हो जाता है।
(ख) पवन संचार में अवरोध: इसके परिणामस्वरूप, दक्षिण-पश्चिम मानसून की व्यापारिक पवनें (Trade Winds) कमजोर हो जाती हैं,
जिससे भारतीय उपमहाद्वीप की ओर नमी का प्रवाह कम हो जाता है।
(ग) वर्षा का वितरण: एल-नीनो के कारण भारत में मानसूनी वर्षा में भारी कमी आती है, जिससे देश में अक्सर सूखे (Drought) की स्थिति
उत्पन्न होती है।
भौगोलिक शब्दावली और महत्व: एल-नीनो का प्रभाव वॉकर परिसंचरण (Walker Circulation) में बदलाव के कारण होता है। इसका
भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह खरीफ की फसलों के उत्पादन को कम कर देता है।
(c) भारत में पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances)
संकल्पनात्मक स्पष्टता: पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागरीय क्षेत्र (Mediterranean Sea) में उत्पन्न होने वाले शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात
(Extratropical Cyclones) हैं। ये विक्षोभ 'उपोष्णकटिबंधीय पछु आ जेट स्ट्रीम' (Subtropical Westerly Jet Stream) के साथ
पूर्व की ओर यात्रा करते हुए भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश करते हैं।
भारतीय जलवायु पर प्रभाव
(क) शीतकालीन वर्षा: ये विक्षोभ शीत ऋतु (दिसंबर से फरवरी) के दौरान भारत के उत्तर-पश्चिमी राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हल्की से मध्यम वर्षा लाते हैं।
(ख) हिमालयी बर्फ बारी: इनके प्रभाव से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भारी हिमपात होता है, जो उत्तर भारतीय नदियों (जैसे गंगा, सिंधु) में जल के
बारहमासी प्रवाह को सुनिश्चित करता है।
(ग) तापमान में गिरावट: विक्षोभ के गुजरने के बाद, उत्तर भारत में 'शीत लहर' (Cold Wave) की स्थिति बनती है और रात के तापमान में
अचानक गिरावट आती है।
भौगोलिक शब्दावली और महत्व: राजस्थान में इस शीतकालीन वर्षा को स्थानीय भाषा में 'मावट' कहा जाता है। यह वर्षा रबी की फसलों,
विशेषकर गेहूं की पैदावार के लिए अत्यंत लाभकारी (अमृत के समान) मानी जाती है। विक्षोभ के आने से पहले आसमान में बादलों की
उपस्थिति और रात के तापमान में वृद्धि इसके आगमन के प्राथमिक संके त हैं।
210 प्रश्न 2105 अंक
भारत में वर्षा के वितरण पर पर्वतीय प्रभाव (Orographic Effect) का विवेचन कीजिए।
(Discuss orographic impact on rainfall distribution in India.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत में वर्षा के वितरण पर पर्वतीय प्रभाव का विवेचन कीजिए।PDF पृष्ठ 106
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत में वर्षा का वितरण काफी हद तक यहाँ की स्थलाकृ ति और पर्वतों की अवस्थिति से निर्धारित होता है। पर्वतीय प्रभाव (Orographic Effect)
वह प्रक्रिया है जहाँ पहाड़ मानसूनी हवाओं के मार्ग में अवरोध उत्पन्न कर वर्षा के वितरण में विषमता पैदा करते हैं।
पर्वतीय वर्षा की वैज्ञानिक प्रक्रिया
जब समुद्र से आने वाली आर्द्र हवाएँ किसी पर्वत श्रृंखला से टकराती हैं, तो वे पर्वत के ढाल के सहारे ऊपर उठने को मजबूर हो जाती हैं। ऊपर उठती
हुई हवा में रूद्धोष्म ताप ह्रास (Adiabatic cooling) के कारण तापमान गिरता है, जिससे जलवाष्प का संघनन होता है और वर्षा होती है।
पवन अभिमुख ढाल (Windward Side): वह ढाल जहाँ हवाएँ टकराती हैं, यहाँ अत्यधिक वर्षा होती है।
पवन विमुख ढाल (Leeward Side): पर्वत पार करने के बाद हवाएँ नीचे उतरती हैं, जिससे वे गर्म हो जाती हैं और उनकी आर्द्रता सोखने की
क्षमता बढ़ जाती है। फलस्वरूप यहाँ वर्षा नहीं होती, जिसे वृष्टि छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area) कहा जाता है।
भारत के संदर्भ में विशिष्ट उदाहरण
भारत में पर्वतीय प्रभाव के प्रभाव को निम्नलिखित क्षेत्रों में देखा जा सकता है
पश्चिमी घाट: दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढालों से टकराकर वहाँ भारी वर्षा (250 सेमी से अधिक)
करती है। इसके विपरीत, पश्चिमी घाट के पूर्वी ढाल (जैसे पुणे और दक्कन का पठार) वृष्टि छाया क्षेत्र में आते हैं, जहाँ वर्षा बहुत कम होती है।
उत्तर-पूर्वी पहाड़ियाँ (मेघालय): गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियाँ अपनी कीपाकार आकृ ति के कारण मानसूनी हवाओं को अचानक ऊपर
की ओर धके लती हैं। इसी कारण खासी पहाड़ियों के दक्षिण में स्थित मासिनराम और चेरापूंजी में विश्व की सर्वाधिक वर्षा होती है।
हिमालय पर्वतमाला: हिमालय एक महान अवरोधक के रूप में कार्य करता है। यह बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसूनी पवनों को उत्तर की
ओर जाने से रोकता है, जिससे उत्तरी भारत के मैदानों में पर्याप्त वर्षा होती है।
वर्षा वितरण की विषमता और अरावली का प्रभाव
पर्वतों की दिशा भी वर्षा वितरण को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए, अरावली पर्वतमाला दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा के
समानांतर स्थित है। चूंकि हवाएँ पहाड़ियों से टकराए बिना सीधे निकल जाती हैं, इसलिए राजस्थान का पश्चिमी भाग एक शुष्क मरुस्थल बना रहता है।
पर्वतीय वर्षा की प्रक्रिया को निम्नलिखित आरेख द्वारा समझा जा सकता है
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211 प्रश्न 2112 अंक
भारत की 'Bshw' प्रकार की जलवायु का वर्णन करें।
(Describe the 'Bshw' type of climate of India.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत की 'Bshw' प्रकार की जलवायु का वर्णन करें।PDF पृष्ठ 106
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उत्तर — सरल भाषा में
कोपेन के जलवायु वर्गीकरण के अनुसार 'Bshw' का तात्पर्य गर्म अर्ध-शुष्क स्टेपी जलवायु से है। इसकी मुख्य विशेषताएँ और विस्तार निम्नलिखित
हैं
भौगोलिक विस्तार: यह जलवायु मुख्य रूप से अरावली पर्वतमाला के पश्चिम में स्थित अर्ध-शुष्क राजस्थान, हरियाणा, दक्षिण-पश्चिमी पंजाब
और गुजरात के कु छ हिस्सों में पाई जाती है। इसके अलावा, यह पश्चिमी घाट के पूर्व में दक्कन के पठार के वृष्टि छाया क्षेत्र में भी विस्तृत है।
जलवायु संबंधी विशेषताएँ: यहाँ औसत वार्षिक तापमान उच्च (18°C से अधिक) रहता है। वर्षा की मात्रा कम और अनिश्चित होती है। इस
जलवायु में शीत ऋतु शुष्क ('w' = winter dry) रहती है और वनस्पति मुख्य रूप से स्टेपी या छोटी घास के रूप में पाई जाती है।
212 प्रश्न 2122 अंक
भारतीय मानसून पर ला-नीना (La-Nina) के प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
(Discuss the impact of La-Nina on Indian Monsoon.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारतीय मानसून पर ला-नीना के प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।PDF पृष्ठ 106
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उत्तर — सरल भाषा में
ला-नीना (La-Nina) भारतीय मानसून के लिए एक अनुकू ल और सकारात्मक कारक है। इसके प्रभावों का विवरण निम्न प्रकार है
सकारात्मक संबंध: ला-नीना के दौरान मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का सतही तापमान सामान्य से कम (ठं डा) हो जाता है। इससे भारतीय
उपमहाद्वीप के ऊपर निम्न वायुदाब की स्थिति अत्यधिक सुदृढ़ हो जाती है, जो दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं को अधिक तीव्रता से अपनी
ओर खींचती है।
वर्षा पर प्रभाव: इसके परिणामस्वरूप भारत में सामान्य से अधिक वर्षा होती है और मानसून की अवधि लंबी हो जाती है। यह स्थिति खरीफ की
फसलों और भारतीय कृषि के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध होती है।
तापमान और अन्य प्रभाव: ला-नीना के प्रभाव से शीत ऋतु के दौरान उत्तर भारत में तापमान में भारी गिरावट आती है, जिससे तीव्र 'शीत लहर'
(Cold Wave) की स्थिति उत्पन्न होती है। इसके अतिरिक्त, इससे बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों की आवृत्ति भी बढ़ सकती है।
213 प्रश्न 2132 अंक
भूमध्य सागरीय जलवायु प्रदेश में नम शीत ऋतु तथा शुष्क ग्रीष्म ऋतु के क्या कारण हैं?
(What causes rainy winter and dry summer in Mediterranean climatic region?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभूमध्य सागरीय जलवायु प्रदेश में नम शीत ऋतु तथा शुष्क ग्रीष्म ऋतु के क्याPDF पृष्ठ 107
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उत्तर — सरल भाषा में
भूमध्य सागरीय जलवायु प्रदेश में नम शीत ऋतु और शुष्क ग्रीष्म ऋतु का मुख्य कारण वायुदाब पेटियों का मौसमी स्थानांतरण है
ग्रीष्म ऋतु (शुष्क): सूर्य की आभासी उत्तरवर्ती गति के कारण वायुदाब पेटियाँ उत्तर की ओर खिसक जाती हैं। परिणामस्वरूप, यह क्षेत्र उपोष्ण
उच्च वायुदाब पेटी (Subtropical High) के प्रभाव में आ जाता है। यहाँ शुष्क व्यापारिक पवनें स्थल से समुद्र की ओर (अपतटीय) चलती हैं,
जिससे वर्षा नहीं होती।
शीत ऋतु (नम): सूर्य के दक्षिणायन होने पर वायुदाब पेटियाँ दक्षिण की ओर खिसक जाती हैं। इससे यह क्षेत्र पछु आ पवनों (Westerlies) के
प्रभाव में आ जाता है। ये पवनें समुद्र से स्थल की ओर (अभितटीय) नमी लेकर आती हैं, जिससे इस क्षेत्र में चक्रवातीय वर्षा होती है।
214 प्रश्न 2145 अंक
भारत में ओडिशा, गुजरात एवं झारखंड के प्रमुख बॉक्साइट खनन क्षेत्र कौन से हैं?
(Which are the important Bauxite mining areas of Odisha, Gujarat and Jharkhand in India?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत में ओडिशा, गुजरात एवं झारखंड के प्रमुख बॉक्साइट खनन क्षेत्र कौन सेPDF पृष्ठ 107
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत में बॉक्साइट (एल्युमीनियम का प्रमुख अयस्क) के वितरण के संदर्भ में ओडिशा, गुजरात और झारखंड महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन राज्यों के
प्रमुख खनन क्षेत्र निम्नलिखित हैं
1. ओडिशा के प्रमुख खनन क्षेत्र
ओडिशा भारत का सबसे बड़ा बॉक्साइट उत्पादक राज्य है, जो देश के कु ल उत्पादन के आधे से अधिक का योगदान देता है। इसके मुख्य क्षेत्र हैं
कोरापुट: यहाँ स्थित पंचपटमाली खान देश की सबसे महत्वपूर्ण और विशाल बॉक्साइट खानों में से एक है।
कालाहांडी: यहाँ का लांजीगढ़ क्षेत्र खनन गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध है।
अन्य क्षेत्र: रायगड़ा, संबलपुर और बोलंगीर जिलों में भी बॉक्साइट के समृद्ध निक्षेप पाए जाते हैं।
2. गुजरात के प्रमुख खनन क्षेत्र
गुजरात बॉक्साइट उत्पादन में देश में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके प्रमुख उत्पादक जिले हैं
जामनगर: यहाँ का कल्याणपुर क्षेत्र बॉक्साइट खनन का मुख्य कें द्र है।
देवभूमि द्वारका: यहाँ उच्च गुणवत्ता वाले बॉक्साइट का खनन किया जाता है।
अन्य जिले: कच्छ, जूनागढ़, भावनगर और अमरेली जिलों में भी बॉक्साइट के पर्याप्त भंडार मौजूद हैं।
3. झारखंड के प्रमुख खनन क्षेत्र
झारखंड में उच्च कोटि के बॉक्साइट निक्षेप पाए जाते हैं। यहाँ के मुख्य खनन कें द्र निम्नलिखित हैं
लोहरदगा: यह झारखंड का सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक बॉक्साइट खनन जिला है।
गुमला: यहाँ भी बड़े पैमाने पर बॉक्साइट का उत्पादन होता है।
अन्य क्षेत्र: लातेहार और पलामू जिलों के विभिन्न क्षेत्रों में बॉक्साइट का खनन किया जाता है।
215 प्रश्न 2155 अंक
भारत के उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों की भौगोलिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
(Discuss the geographical characteristics of Tropical evergreen forest of India.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत के उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों की भौगोलिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।PDF पृष्ठ 107
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत के उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों की मुख्य भौगोलिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. जलवायु एवं भौगोलिक आवश्यकताएँ
वर्षा: इन वनों के विकास के लिए भारी वर्षा की आवश्यकता होती है। यहाँ वार्षिक वर्षा 200 सेमी से अधिक होती है।
तापमान: इन क्षेत्रों में औसत वार्षिक तापमान 22 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहता है।
आर्द्रता: यहाँ की जलवायु गर्म और अत्यधिक आर्द्र होती है, जो वनस्पतियों की तीव्र वृद्धि में सहायक है।
2. भौतिक एवं संरचनात्मक विशेषताएँ
बहु-स्तरीय संरचना (स्तरीकरण): इन वनों में वनस्पतियों की विभिन्न परतें पाई जाती हैं। धरातल के पास झाड़ियाँ और लताएँ होती हैं, जिसके
ऊपर मध्य स्तर के वृक्ष और सबसे ऊपर ऊँ चे वृक्ष होते हैं।
वृक्षों की ऊँ चाई: अनुकू ल परिस्थितियों के कारण वृक्षों की ऊँ चाई अत्यधिक होती है, जो प्रायः 60 मीटर या उससे अधिक तक पहुँच जाती है।
सदाबहार प्रकृति: इन वनों में विभिन्न प्रजातियों के वृक्ष पाए जाते हैं, जिनके पत्तियां गिराने का समय अलग-अलग होता है। अतः, किसी भी
समय पूरा वन एक साथ पत्तियां नहीं गिराता, जिससे ये वर्ष भर हरे-भरे दिखाई देते हैं।
सघन वितान (Canopy): वनों की सघनता इतनी अधिक होती है कि सूर्य का प्रकाश धरातल तक मुश्किल से पहुँच पाता है।
3. क्षेत्रीय वितरण एवं प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ
प्रमुख क्षेत्र: भारत में ये वन मुख्य रूप से पश्चिमी घाट की पश्चिमी ढलान, उत्तर-पूर्वी भारत की पहाड़ियाँ (जैसे मेघालय, असम, त्रिपुरा) और
अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह में पाए जाते हैं।
प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ: इन वनों में व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें रोजवुड, महोगनी, एबोनी (आबनूस), रबर और
सिनकोना प्रमुख हैं।
216 प्रश्न 2162 अंक
हुंगरीजन-मोरेन (Hugrijan Moran) की क्या महत्ता है?
(What is the significance of Hugrijan Moran?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानहुंगरीजन-मोरेन की क्या महत्ता है?PDF पृष्ठ 108
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उत्तर — सरल भाषा में
हुंगरीजन-मोरेन (Hugrijan Moran) की महत्ता निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर स्पष्ट की जा सकती है
भौगोलिक स्थिति और संसाधन: यह ऊपरी असम (ब्रह्मपुत्र घाटी) में स्थित भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण खनिज तेल (पेट्रोलियम) और
प्राकृ तिक गैस क्षेत्र है। यह मुख्य रूप से लखीमपुर और शिवसागर जिलों के क्षेत्र में आता है।
आर्थिक एवं औद्योगिक महत्व: यह क्षेत्र नाहरकटिया-हुंगरीजन-मोरेन तेल बेल्ट का एक प्रमुख हिस्सा है। यहाँ से उत्पादित कच्चे तेल की आपूर्ति
पाइपलाइनों के माध्यम से असम की प्रमुख रिफाइनरियों जैसे दिगबोई, नूनमती (गुवाहाटी) और नूमलीगढ़ के साथ-साथ बिहार की बरौनी
रिफाइनरी को भी की जाती है।
ऊर्जा सुरक्षा: भारत के सबसे पुराने तेल क्षेत्रों में से एक होने के नाते, यह देश की घरेलू तेल उत्पादन और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से रणनीतिक
महत्व रखता है।
217 प्रश्न 21720 अंक
भारत में पारिस्थितिक संकट के कारणों का वर्णन कीजिए।
(Describe the causes of ecological crisis in India.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत में पारिस्थितिक संकट के कारणों का वर्णन कीजिए।PDF पृष्ठ 108
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत में पारिस्थितिक संकट एक अत्यंत गंभीर और बहुआयामी समस्या बन गया है। यह संकट तब उत्पन्न होता है जब प्राकृ तिक संसाधनों का दोहन
उनकी पुनरुद्धार क्षमता से अधिक हो जाता है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है। भारत वर्तमान में वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय
गिरावट और जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे संवेदनशील देशों में से एक है।
भारत में पारिस्थितिक संकट के प्रमुख कारणों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है
1. मानवजनित और सामाजिक-आर्थिक कारण
जनसंख्या विस्फोट: भारत की विशाल और बढ़ती जनसंख्या प्राकृ तिक संसाधनों पर भारी दबाव डाल रही है। भोजन, आवास और ऊर्जा की
बढ़ती मांग के कारण भूमि, जल और वनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ा है।
तीव्र शहरीकरण: अनियोजित और तीव्र शहरीकरण के कारण कं क्रीट के जंगलों का विस्तार हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप प्राकृ तिक जल
निकायों (जैसे तालाब और झीलें) का अतिक्रमण हुआ है, जिससे 'अर्बन हीट आइलैंड' और बाढ़ जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।
अनियंत्रित औद्योगिकीकरण: उद्योगों से निकलने वाला अनुपचारित अपशिष्ट, जहरीली गैसें और रासायनिक बहिःस्राव नदियों और वायु को
प्रदूषित कर रहे हैं। गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियाँ आज गंभीर प्रदूषण का सामना कर रही हैं।
वनों की कटाई (Deforestation): कृषि विस्तार, ईंधन और लकड़ी की मांग के कारण बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हुई है। इससे न के वल
जैव विविधता का ह्रास हुआ है, बल्कि मृदा अपरदन और वर्षा चक्र में अनिश्चितता भी आई है।
आधुनिक कृषि पद्धतियाँ: हरित क्रांति के बाद उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर दिया है और
भूजल को प्रदूषित किया है। साथ ही, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में धान जैसी जल-गहन फसलों के कारण भूजल स्तर में भारी गिरावट
आई है।
उपभोक्तावादी संस्कृ ति: एकल उपयोग प्लास्टिक (Single-use plastic) और इलेक्ट्रॉनिक कचरे (e-waste) के बढ़ते उत्पादन ने अपशिष्ट
प्रबंधन की गंभीर चुनौती पैदा की है, जो मृदा और जल पारिस्थितिकी तंत्र को दीर्घकालिक नुकसान पहुँचा रही है।
2. विकासात्मक और बुनियादी ढांचागत कारक
संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण: हिमालयी क्षेत्र और पश्चिमी घाट जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में सड़कों (जैसे चार धाम परियोजना)
और होटलों का अनियंत्रित निर्माण भूस्खलन और पारिस्थितिक अस्थिरता का कारण बन रहा है। जोशीमठ में भू-धंसाव इसका एक जीवंत
उदाहरण है।
बड़े बाँधों का निर्माण: नदियों पर बने विशाल बाँध न के वल स्थानीय समुदायों को विस्थापित करते हैं, बल्कि नदी के प्राकृ तिक प्रवाह को रोककर
जलीय पारिस्थितिकी को नष्ट कर देते हैं। इससे भूकं पीय गतिविधियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
खनन गतिविधियाँ: अरावली पर्वतमाला और मध्य भारत के जनजातीय क्षेत्रों में अवैध और अनियंत्रित खनन ने पहाड़ियों को नष्ट कर दिया है
और जैव विविधता के गलियारों को खंडित कर दिया है। इससे वन्यजीव-मानव संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ी हैं।
प्राकृ तिक आपदाओं का प्रभाव: हाल के वर्षों में के रल की बाढ़, उत्तराखंड की त्रासदियाँ और चक्रवातों की बढ़ती तीव्रता भारत में पारिस्थितिक
असंतुलन के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में देखी जा सकती हैं।
निष्कर्ष
भारत में पारिस्थितिक संकट के वल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है जो देश की खाद्य सुरक्षा
और स्वास्थ्य पर प्रतिकू ल प्रभाव डाल रही है। इस संकट के समाधान के लिए 'सतत विकास' (Sustainable Development) के मॉडल को
अपनाना अनिवार्य है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48A और 51A(g) के अनुरूप पर्यावरण का संरक्षण करना राज्य और नागरिक दोनों का परम
कर्तव्य है। भविष्य की राह में नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना, वनीकरण अभियानों में जनभागीदारी सुनिश्चित करना और पर्यावरण अनुकू ल नीतियों
का सख्ती से कार्यान्वयन शामिल होना चाहिए। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व के लिए
खतरा बन सकता है।
218 प्रश्न 2185 अंक
भारत में जनसंख्या की उच्च वृद्धि के साथ गिरावट की प्रवृत्ति (1981-2011) की विवेचना कीजिए।
(Discuss the period of high growth of population with declining trend (1981-2011) in India.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत में जनसंख्या की उच्च वृद्धि के साथ गिरावट की प्रवृत्ति की विवेचना कPDF पृष्ठ 109
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत में जनसंख्या की उच्च वृद्धि के साथ गिरावट की प्रवृत्ति (1981-2011)
भारतीय जनसांख्यिकी के इतिहास में 1981 से 2011 की अवधि को 'उच्च वृद्धि दर के साथ गिरावट की प्रवृत्ति' के चरण के रूप में पहचाना जाता है।
इस चरण की मुख्य विशेषता यह रही कि जहाँ एक ओर देश की कु ल जनसंख्या निरंतर बढ़ती रही, वहीं दूसरी ओर जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर में
क्रमिक रूप से कमी दर्ज की गई। यह संके त देता है कि भारत ने जनसंख्या विस्फोट के चरम स्तर को पार कर लिया था और स्थिरता की ओर बढ़ना
शुरू कर दिया था।
सांख्यिकीय साक्ष्य (जनगणना डेटा)
विभिन्न जनगणना वर्षों के दौरान दशकीय वृद्धि दर में गिरावट को निम्नलिखित आंकड़ों के माध्यम से समझा जा सकता है
1981 की जनगणना: इस दौरान दशकीय वृद्धि दर लगभग 24.66% थी।
1991 की जनगणना: यह दर गिरकर 23.87% रह गई।
2001 की जनगणना: इसमें और अधिक गिरावट देखी गई और यह 21.54% पर आ गई।
2011 की जनगणना: इस दशक में सबसे महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज की गई, जहाँ वृद्धि दर घटकर 17.7% (सटीक रूप से 17.64%) हो गई।
वृद्धि दर में गिरावट के प्रमुख कारण
इस अवधि के दौरान जनसंख्या वृद्धि की गति धीमी होने के पीछे निम्नलिखित सामाजिक-आर्थिक कारक उत्तरदायी रहे हैं
(क) स्त्री साक्षरता और शिक्षा में सुधार: महिलाओं की शिक्षा के स्तर में सुधार ने उनमें परिवार के आकार और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाई,
जिससे कु ल प्रजनन दर में कमी आई।
(ख) परिवार नियोजन कार्यक्रमों का प्रभाव: सरकारी नीतियों और 'छोटा परिवार, सुखी परिवार' जैसे जागरूकता अभियानों के कारण लोगों ने परिवार
नियोजन के साधनों को व्यापक रूप से अपनाया।
(ग) विवाह की औसत आयु में वृद्धि: सामाजिक सुधारों और बढ़ते शहरीकरण के कारण विवाह की औसत आयु बढ़ गई, जिससे प्रभावी प्रजनन काल
में कमी आई।
(घ) शिशु मृत्यु दर में कमी: स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के कारण शिशु मृत्यु दर में गिरावट आई, जिससे माता-पिता में अधिक बच्चे पैदा करने की
असुरक्षा की भावना कम हुई।
निष्कर्ष
1981-2011 की यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि भारत जनसांख्यिकीय संक्रमण (Demographic Transition) की तीसरी अवस्था में प्रवेश कर चुका है।
वृद्धि दर में यह निरंतर गिरावट भविष्य में जनसंख्या स्थिरीकरण की संभावना को पुष्ट करती है। वर्तमान में भारत एक विशाल कार्यशील जनसंख्या
(जनसांख्यिकीय लाभांश) के साथ खड़ा है, जिसका कौशल विकास के माध्यम से सही उपयोग देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने में सहायक सिद्ध हो
सकता है।
219 प्रश्न 2195 अंक
भारत में सन् 1901 से 2011 के बीच की जनसंख्या वृद्धि की विशिष्ट प्रावस्थाओं का वर्णन कीजिए।
(Describe the distinct phases of population growth in India from 1901 to 2011.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत में सन् 1901 से 2011 के बीच की जनसंख्या वृद्धि की विशिष्ट प्रावस्थाPDF पृष्ठ 110
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत में वर्ष 1901 से 2011 के बीच की जनसंख्या वृद्धि के इतिहास को चार विशिष्ट प्रावस्थाओं (Phases) में विभाजित किया जा सकता है
1. प्रावस्था I (1901-1921): रुद्ध या स्थिर वृद्धि की अवधि
विशेषता: इस अवधि में जनसंख्या वृद्धि अत्यंत मंद थी। 1911-1921 के दशक में भारत की जनसंख्या में -0.31% की ऋणात्मक वृद्धि दर दर्ज
की गई।
कारक: इस चरण में जन्म दर और मृत्यु दर दोनों ही बहुत ऊँ ची थीं। खराब स्वास्थ्य सेवाएँ, स्वच्छता का अभाव, व्यापक अकाल और
इन्फ्लुएंजा जैसी महामारियों के कारण मृत्यु दर उच्च बनी रही, जिससे जनसंख्या स्थिर रही।
2. प्रावस्था II (1921-1951): निरंतर वृद्धि की अवधि
विशेषता: इसे स्थिर वृद्धि की प्रावस्था माना जाता है। वर्ष 1921 को जनसांख्यिकीय इतिहास में 'महान विभाजक वर्ष' कहा जाता है क्योंकि
इसके बाद जनसंख्या में कभी गिरावट नहीं आई।
कारक: स्वास्थ्य और स्वच्छता सुविधाओं में सुधार के कारण मृत्यु दर में कमी आई, जबकि जन्म दर उच्च बनी रही। परिवहन और संचार के
सुधार से अकाल के दौरान खाद्यान्न वितरण आसान हुआ, जिससे मृत्यु दर नियंत्रित हुई।
3. प्रावस्था III (1951-1981): जनसंख्या विस्फोट की अवधि
विशेषता: यह तीव्र जनसंख्या वृद्धि का दौर था। इसमें मृत्यु दर में भारी गिरावट आई लेकिन जन्म दर उच्च स्तर पर ही बनी रही, जिसके कारण
जनसंख्या में अत्यधिक तीव्र वृद्धि हुई।
कारक: स्वतंत्रता के बाद शुरू की गई पंचवर्षीय योजनाओं और विकासात्मक कार्यों से जीवन स्तर में सुधार हुआ। चिकित्सा सुविधाओं के
विस्तार से संक्रामक रोगों पर नियंत्रण पाया गया और पोषण स्तर में सुधार हुआ।
4. प्रावस्था IV (1981-2011): घटती वृद्धि दर के साथ उच्च वृद्धि की प्रावस्था
विशेषता: हालांकि कु ल जनसंख्या में वृद्धि जारी रही, लेकिन वार्षिक वृद्धि दर में निरंतर गिरावट की प्रवृत्ति देखी गई।
कारक: इस अवधि में परिवार नियोजन कार्यक्रमों की प्रभावशीलता, महिला साक्षरता और शिक्षा में वृद्धि, विवाह की औसत आयु में बढ़ोत्तरी
तथा जीवन की गुणवत्ता के प्रति बढ़ती जागरूकता जैसे कारकों ने जन्म दर को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
220 प्रश्न 2205 अंक
भारत में जनसंख्या वृद्धि के वर्ष 1900 से अब तक के रुझानों/परिवर्तनों को वर्णित कीजिए।
(Discuss about the trends of population growth in India after the year 1900 to till date.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभारत में जनसंख्या वृद्धि के वर्ष 1900 से अब तक के रुझानों/परिवर्तनों कोPDF पृष्ठ 110
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उत्तर — सरल भाषा में
भारत में वर्ष 1901 से वर्तमान तक जनसंख्या वृद्धि के रुझानों को जनसांख्यिकीय संक्रमण के आधार पर निम्नलिखित चार स्पष्ट चरणों में वर्गीकृ त
किया जा सकता है
1. स्थिर जनसंख्या की अवधि (1901-1921)
इस चरण में भारत की जनसंख्या वृद्धि अत्यंत धीमी और छिटपुट रही। जन्म दर और मृत्यु दर दोनों ही बहुत ऊँ ची थीं, जिसके कारण जनसंख्या
लगभग स्थिर बनी रही। 1911-1921 के दशक में भारत की जनसंख्या में -0.31% की ऋणात्मक वृद्धि दर्ज की गई। इसका मुख्य कारण भीषण
अकाल, प्लेग और इन्फ्लुएंजा जैसी महामारियाँ थीं। वर्ष 1921 को भारतीय जनसांख्यिकी के इतिहास में 'महान विभाजक वर्ष' (Year of Great
Divide) कहा जाता है।
2. निरंतर वृद्धि की अवधि (1921-1951)
1921 के बाद देश की जनसंख्या में निरंतर वृद्धि शुरू हुई। इस अवधि में स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं में क्रमिक सुधार होने से मृत्यु दर में कमी
आई, जबकि जन्म दर उच्च बनी रही। यह चरण मध्यम जनसंख्या वृद्धि का सूचक था।
3. जनसंख्या विस्फोट की अवधि (1951-1981)
स्वतंत्रता के पश्चात इस अवधि को 'जनसंख्या विस्फोट' के रूप में जाना जाता है। विकासात्मक कार्यों, स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक सुधार और खाद्य
सुरक्षा सुनिश्चित होने के कारण मृत्यु दर में तीव्र गिरावट आई, लेकिन जन्म दर में कोई विशेष कमी नहीं हुई। इसके परिणामस्वरूप जनसंख्या में
अभूतपूर्व वृद्धि हुई। 1971-1981 के दशक में भारत की वृद्धि दर अपने उच्चतम स्तर (लगभग 24.66%) पर थी।
4. घटती वृद्धि दर की अवधि (1981 से अब तक)
1981 के बाद से भारत की दशकीय वृद्धि दर में गिरावट का रुझान देखा गया है। यद्यपि कु ल जनसंख्या बढ़ रही है, लेकिन इसकी रफ्तार धीमी हो गई
है। इसका मुख्य कारण बढ़ती साक्षरता (विशेषकर महिला शिक्षा), परिवार नियोजन कार्यक्रमों का प्रभाव और विवाह की औसत आयु में वृद्धि है।
2011 की जनगणना के अनुसार दशकीय वृद्धि दर घटकर 17.7% रह गई है।
निष्कर्ष
वर्तमान में भारत जनसांख्यिकीय संक्रमण के उस चरण में है जहाँ जन्म दर और मृत्यु दर दोनों में गिरावट आ रही है और देश प्रतिस्थापन स्तर की
प्रजनन दर (Replacement Level Fertility) प्राप्त करने की ओर अग्रसर है।
221 प्रश्न 2212 अंक
चित्तौड़गढ़ और कोटा के मध्य अवस्थित किन्हीं चार जलप्रपातों के नाम लिखिए।
(Write name of any four waterfalls located between Chittorgarh and Kota.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानचित्तौड़गढ़ और कोटा के मध्य अवस्थित किन्हीं चार जलप्रपातों के नाम लिखिए।PDF पृष्ठ 111
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उत्तर — सरल भाषा में
चित्तौड़गढ़ और कोटा के मध्य तथा उनके समीपवर्ती क्षेत्रों में स्थित चार प्रमुख जलप्रपात निम्नलिखित हैं
(क) चूलिया जलप्रपात: यह चित्तौड़गढ़ जिले के रावतभाटा में चंबल नदी पर स्थित है।
(ख) भीमलत जलप्रपात: यह बूंदी जिले में मांगली नदी पर स्थित है, जो चित्तौड़गढ़ और कोटा के मध्य मार्ग के निकट आता है।
(ग) मेनाल जलप्रपात: यह चित्तौड़गढ़ जिले के मेनाल में स्थित है।
(घ) गेपरनाथ जलप्रपात: यह कोटा जिले में स्थित एक प्रसिद्ध जलप्रपात है।
(वैकल्पिक रूप से पाड़ाझर जलप्रपात जो रावतभाटा, चित्तौड़गढ़ में स्थित है, का नाम भी दिया जा सकता है।)
222 प्रश्न 2225 अंक
शेखावाटी प्रदेश की मुख्य भौतिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
(Describe the main physical characteristics of Shekhawati region.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानशेखावाटी प्रदेश की मुख्य भौतिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।PDF पृष्ठ 111
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उत्तर — सरल भाषा में
शेखावाटी प्रदेश, जिसे राजस्थान के 'बांगर प्रदेश' के रूप में भी जाना जाता है, राजस्थान के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित एक महत्वपूर्ण भौतिक इकाई
है। इसकी मुख्य भौतिक विशेषताएं निम्नलिखित हैं
1. भौगोलिक स्थिति और विस्तार
यह क्षेत्र राजस्थान के अर्ध-शुष्क रेतीले मैदान का हिस्सा है। इसका विस्तार मुख्यतः सीकर, झुंझुनूं और चूरू जिलों में है, साथ ही इसमें उत्तरी नागौर
का कु छ हिस्सा भी सम्मिलित है। इसे अरावली पर्वतमाला और पश्चिमी मरुस्थल के मध्य का संक्रमणकालीन क्षेत्र माना जाता है।
2. भू-आकृ तिक विशेषताएँ (धरातलीय स्वरूप)
इस क्षेत्र का धरातल रेतीला और ऊबड़-खाबड़ है, जो बालुका स्तूपों से ढका हुआ है।
यहाँ 'बरखान' (अर्धचंद्राकार बालुका स्तूप) बहुतायत में पाए जाते हैं।
स्थानीय भाषा में यहाँ के ऊँचे रेतीले टीलों को 'टिब्या' कहा जाता है।
3. अपवाह तंत्र और जल संसाधन
शेखावाटी प्रदेश की सबसे विशिष्ट विशेषता इसकी 'अंतःप्रवाह प्रणाली' (Inland Drainage) है। यहाँ की नदियाँ समुद्र तक न पहुँचकर
मरुस्थल में ही विलीन हो जाती हैं।
कांतली नदी यहाँ की प्रमुख नदी है, जिसका प्रवाह क्षेत्र 'तोरावटी' कहलाता है।
जल संरक्षण हेतु यहाँ घास के मैदानों में खोदे गए कच्चे कु ओं को 'जोहड़' तथा पक्के जल स्रोतों को 'नाडा' कहा जाता है।
4. जलवायु और वनस्पति
यहाँ की जलवायु अर्ध-शुष्क है, जहाँ वार्षिक वर्षा का औसत लगभग 40 से 50 सेंटीमीटर रहता है।
वनस्पति में मुख्यतः खेजड़ी (समी), रोहिड़ा, कै र और कं टीली झाड़ियाँ पाई जाती हैं। खेजड़ी की प्रचुरता के कारण इसे इस क्षेत्र का मुख्य वृक्ष
माना जाता है।
223 प्रश्न 2232 अंक
पश्चिमी राजस्थान भारत का अत्यधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र क्यों है?
(What makes Western Rajasthan an extreme drought affected area of India?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानपश्चिमी राजस्थान भारत का अत्यधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र क्यों है?PDF पृष्ठ 111
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उत्तर — सरल भाषा में
पश्चिमी राजस्थान के भारत का अत्यधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र होने के निम्नलिखित प्रमुख कारण हैं
अरावली पर्वतमाला की स्थिति और मानसून का प्रभाव: अरावली पर्वतमाला अरब सागर से आने वाली मानसूनी पवनों की दिशा के समानांतर
स्थित है, जिसके कारण ये आर्द्र पवनें बिना किसी अवरोध (अवरोधी पर्वतीय ढाल) के सीधे निकल जाती हैं। इसके अतिरिक्त, यह क्षेत्र बंगाल
की खाड़ी के मानसून मार्ग से अत्यधिक दूर स्थित है और उसके लिए वृष्टि छाया क्षेत्र में पड़ता है।
जलवायुविक और स्थलाकृ तिक कारक: यहाँ ग्रीष्म ऋतु में अत्यधिक उच्च तापमान रहता है, जिससे वाष्पीकरण की दर वर्षा की मात्रा से कहीं
अधिक हो जाती है। वायुमंडल में आर्द्रता की कमी और सघन वनस्पति का अभाव इस शुष्कता को और अधिक बढ़ा देता है।
224 प्रश्न 2242 अंक
राजस्थान के 'डांग क्षेत्र' की विशेषताएं बताइए।
(Give the characteristics of 'Dang region' of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान के 'डांग क्षेत्र' की विशेषताएं बताइए।PDF पृष्ठ 112
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान के डांग क्षेत्र की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं
भौगोलिक अवस्थिति और विस्तार: डांग क्षेत्र राजस्थान के पूर्वी भाग में चंबल नदी बेसिन में स्थित है। इसमें मुख्य रूप से धौलपुर, करौली और
सवाई माधोपुर जिले शामिल हैं।
भौतिक विशेषता (बीहड़): इस क्षेत्र की सबसे प्रमुख विशेषता चंबल नदी द्वारा निर्मित गहरे 'बीहड़' (Ravines) या 'उत्खात भूमि'
(Badland Topography) है। यह विश्व में अपनी विशिष्ट स्थलाकृ ति के लिए जाना जाता है।
दुर्गमता और सामाजिक-आर्थिक स्थिति: यह क्षेत्र अत्यधिक ऊबड़-खाबड़ और दुर्गम होने के कारण कृषि के लिए अनुपजाऊ है। इस क्षेत्र के
आर्थिक उत्थान के लिए राजस्थान सरकार द्वारा 'डांग विकास कार्यक्रम' भी चलाया जा रहा है।
225 प्रश्न 2255 अंक
राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र की भौगोलिक सांस्कृतिक पहचान का चित्रण कीजिए।
(Portray the geographic-cultural identity of Shekhawati region of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र की भौगोलिक सांस्कृतिक पहचान का चित्रण कीजिएPDF पृष्ठ 112
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान का शेखावाटी क्षेत्र अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण विश्व स्तर पर एक विशिष्ट पहचान रखता है।
इस क्षेत्र की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान का विवरण निम्नलिखित है
1. भौगोलिक पहचान (भौगोलिक विस्तार एवं भौतिक विशेषताएँ)
भौगोलिक विस्तार: शेखावाटी क्षेत्र राजस्थान के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित है। इसके अंतर्गत मुख्यतः सीकर, झुंझुनू, चूरू और नवगठित जिला
नीम का थाना शामिल हैं।
भौतिक स्वरूप: इस क्षेत्र को 'बांगर' प्रदेश के नाम से भी जाना जाता है, जो अरावली पर्वतमाला और थार मरुस्थल के मध्य का अर्ध-शुष्क
संक्रमणकालीन क्षेत्र है।
अपवाह तंत्र: यहाँ कांतली जैसी अंतःप्रवाही (Inland drainage) नदी प्रणाली पाई जाती है। कांतली नदी के प्रवाह क्षेत्र को 'तोरावटी' कहा
जाता है।
जलवायु व मृदा: यहाँ की जलवायु अर्ध-शुष्क है और धरातल पर रेतीले धोरों (विशेषकर बरखान टीले) की प्रधानता पाई जाती है।
2. सांस्कृतिक पहचान (सांस्कृतिक एवं स्थापत्य विरासत)
स्थापत्य कला (हवेलियाँ): शेखावाटी अपनी विशाल एवं कलात्मक हवेलियों के लिए प्रसिद्ध है। इन हवेलियों की दीवारों पर किए गए शानदार
भित्ति चित्रों (Frescoes) के कारण इस पूरे क्षेत्र को विश्व की 'ओपन आर्ट गैलरी' (खुली कला दीर्घा) कहा जाता है। मंडावा, नवलगढ़,
फतेहपुर और रामगढ़ इसकी कला के प्रमुख कें द्र हैं।
लोक नृत्य: यहाँ की लोक संस्कृ ति में गीदड़, चंग और ढप नृत्यों का विशेष महत्व है, जो मुख्य रूप से होली के पर्व पर आयोजित किए जाते हैं।
बोली: इस क्षेत्र की मुख्य बोली 'शेखावाटी' है, जो मारवाड़ी की एक प्रमुख उप-बोली है।
ऐतिहासिक महत्त्व: यह क्षेत्र अपनी वीरता, शौर्य और साहसी व्यापारिक समुदायों (मारवाड़ी व्यवसायियों) के लिए भी जाना जाता है, जिन्होंने
देश-विदेश में इस क्षेत्र का नाम रोशन किया है।
निष्कर्षतः, शेखावाटी का अर्ध-शुष्क रेतीला परिदृश्य और इसकी कलात्मक हवेलियों का सामंजस्य इसे राजस्थान की एक अद्वितीय भौगोलिक-
सांस्कृतिक इकाई बनाता है।
226 प्रश्न 2265 अंक
राजस्थान के हाड़ौती पठार की भौतिक विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
(Discuss the physical features of the Hadoti plateau of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान के हाड़ौती पठार की भौतिक विशेषताओं की विवेचना कीजिए।PDF पृष्ठ 112
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उत्तर — सरल भाषा में
हाड़ौती का पठार, जिसे 'दक्षिण-पूर्वी राजस्थान पठार' के नाम से भी जाना जाता है, राज्य के विशिष्ट भौतिक प्रदेशों में से एक है। इसकी मुख्य
भौतिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. भौगोलिक स्थिति एवं परिचय
स्थिति: यह राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग में कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ जिलों में विस्तृत है। यह राज्य के कु ल क्षेत्रफल का लगभग
6.89% भाग घेरता है।
उत्पत्ति: यह भौगोलिक रूप से मालवा के पठार का उत्तरी विस्तार है। इसकी उत्पत्ति मेसोजोइक महाकल्प में ज्वालामुखी के दरारी उद्भेदन से
निकले बेसाल्टिक लावा के जमाव से हुई है।
सीमा: यह क्षेत्र उत्तर-पश्चिम में अरावली पर्वतमाला से 'महान सीमा भ्रंश' (Great Boundary Fault) द्वारा अलग होता है।
2. क्षेत्रीय एवं भू-गर्भिक वर्गीकरण
भू-गर्भिक संरचना के आधार पर इसे दो उप-इकाइयों में बाँटा गया है
विंध्यन कगार भूमि: यह बलुआ पत्थरों (Sandstone) से निर्मित क्षेत्र है, जो चंबल और बनास नदियों के बीच स्थित है। इसका ढाल दक्षिण-
पूर्व की ओर है।
दक्कन लावा पठार: यह बेसाल्टिक लावा से निर्मित उपजाऊ पठारी भाग है। इसे स्थानीय भाषा में 'ऊपरमाल' का पठार भी कहा जाता है, जो
चित्तौड़गढ़ के भैंसरोडगढ़ से भीलवाड़ा के बिजौलिया तक फै ला है।
3. धरातलीय विशेषताएँ, मृदा एवं अपवाह
मृदा: यहाँ 'मध्यम काली मिट्टी' (रेगुर या वर्टीसोल्स) पाई जाती है, जो कपास, सोयाबीन और संतरे की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
अपवाह तंत्र: यह प्रदेश चंबल नदी और उसकी सहायक नदियों जैसे काली सिंध, पार्वती, आहू और परवन द्वारा अपवाहित है। यहाँ नदियों ने
गहरी घाटियों और कन्दराओं का निर्माण किया है।
उच्चावच: यहाँ मुकुं दरा की पहाड़ियाँ (कोटा-झालावाड़) और बूंदी की पहाड़ियाँ प्रमुख भौतिक आकृ तियाँ हैं। मुकुं दरा की पहाड़ियाँ
अर्द्धचन्द्राकार रूप में विस्तृत हैं।
4. अन्य विशेषताएँ
यह राजस्थान का सर्वाधिक वर्षा वाला भौतिक प्रदेश है (औसत वर्षा 80-100 सेमी)।
यहाँ की जलवायु 'अति-आर्द्र ' श्रेणी में आती है।
227 प्रश्न 2272 अंक
राजस्थान के किन जिलों में साबरमती नदी प्रवाहित होती है? इसकी सहायक नदियों के नाम लिखिए।
(Sabarmati river flows in which districts of Rajasthan? Name its tributaries.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान के किन जिलों में साबरमती नदी प्रवाहित होती है? इसकी सहायक नदियोPDF पृष्ठ 113
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान में साबरमती नदी का प्रवाह और इसकी सहायक नदियों का विवरण निम्नलिखित है
प्रवाह वाले जिले
साबरमती नदी का उद्गम उदयपुर जिले के झाडोल तहसील में अरावली की पहाड़ियों (पादरला गाँव के निकट) से होता है। राजस्थान में यह मुख्य रूप
से उदयपुर जिले में प्रवाहित होती है और इसके बाद गुजरात राज्य में प्रवेश कर जाती है।
सहायक नदियाँ
साबरमती की प्रमुख सहायक नदियाँ निम्नलिखित हैं
वाकल
सेई
हथमती
मेश्वा
वेतरक
माजम
228 प्रश्न 2285 अंक
राजस्थान की नदी प्रणालियों का वर्णन करें।
(Describe river systems of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान की नदी प्रणालियों का वर्णन करें।PDF पृष्ठ 113
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान की भौगोलिक संरचना और अरावली पर्वतमाला की स्थिति ने यहाँ के अपवाह तंत्र को विशिष्ट रूप प्रदान किया है। अरावली पर्वत श्रेणी यहाँ
मुख्य जल विभाजक का कार्य करती है। राजस्थान की नदी प्रणालियों को जल विसर्जन के आधार पर निम्नलिखित तीन श्रेणियों में वर्गीकृ त किया जा
सकता है
1. आंतरिक अपवाह तंत्र (लगभग 60% क्षेत्र)
यह राजस्थान का सबसे बड़ा अपवाह तंत्र है। इसमें वे नदियाँ आती हैं जो अपना जल किसी समुद्र तक नहीं ले जा पातीं और मरुस्थलीय भाग में ही
विलीन हो जाती हैं।
घग्घर: इसे 'मृत नदी' के नाम से जाना जाता है, जो हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर में बहती है।
कांतली: सीकर और झुंझुनू जिले की प्रमुख नदी, जो मरुस्थल में विलुप्त हो जाती है।
साबी: सेवर की पहाड़ियों (जयपुर) से निकलकर हरियाणा की ओर बहती है।
कांकनेय (मसूरदी): जैसलमेर की यह छोटी नदी 'बुझ झील' का निर्माण करती है।
मेंथा और रूपनगढ़: ये नदियाँ अपना जल सांभर झील में गिराती हैं।
2. बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र (लगभग 23% क्षेत्र)
अरावली के पूर्वी भाग में बहने वाली नदियाँ जो अपना जल यमुना में गिराती हैं और अंततः गंगा के माध्यम से बंगाल की खाड़ी तक पहुँचती हैं।
चंबल: राजस्थान की एकमात्र बारहमासी नदी, जो बीहड़ों और जल विद्युत उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।
बनास: इसे 'वन की आशा' कहा जाता है। यह पूर्णतः राजस्थान में बहने वाली सबसे लंबी नदी है।
बाणगंगा: इसे 'अर्जुन की गंगा' भी कहते हैं, जो जयपुर से निकलकर यमुना में मिलती है।
बेड़च और काली सिंध: ये इस तंत्र की अन्य सहायक और महत्वपूर्ण नदियाँ हैं जो मेवाड़ और हाड़ौती क्षेत्र को सिंचित करती हैं।
3. अरब सागर का अपवाह तंत्र (लगभग 17% क्षेत्र)
अरावली के दक्षिण-पश्चिम और पश्चिम में बहने वाली नदियाँ जो कच्छ के रन या खंभात की खाड़ी में गिरती हैं।
लूनी: पश्चिमी राजस्थान की जीवन रेखा, जिसका जल बालोतरा के बाद खारा हो जाता है। इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ जोजरी, बांडी और
जवाई हैं।
माही: यह मध्य प्रदेश से निकलकर राजस्थान के बाँसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों में बहती है तथा कर्क रेखा को दो बार पार करती है।
साबरमती: उदयपुर की पहाड़ियों से निकलकर गुजरात की मुख्य नदी बनती है।
पश्चिमी बनास: सिरोही जिले से निकलकर गुजरात के कच्छ के रन में विलीन हो जाती है।
229 प्रश्न 2295 अंक
राजस्थान में मक्का उत्पादन के लिए उपयुक्त दशाओं तथा इसके प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों को स्पष्ट कीजिए।
(Explain suitable production conditions of Maize and its main production areas in Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान में मक्का उत्पादन के लिए उपयुक्त दशाओं तथा इसके प्रमुख उत्पादनPDF पृष्ठ 114
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान में मक्का एक महत्वपूर्ण खरीफ फसल है, जो विशेष रूप से राज्य के दक्षिणी भाग की अर्थव्यवस्था और आहार का मुख्य आधार है। मक्का
उत्पादन के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ और प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं
1. मक्का उत्पादन के लिए उपयुक्त भौगोलिक दशाएँ
तापमान: मक्का की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। इसके अंकु रण और वृद्धि के लिए आदर्श तापमान 21°C से
27°C के मध्य होना चाहिए।
वर्षा: मक्का के लिए औसत वार्षिक वर्षा 50 सेमी से 100 सेमी के बीच होनी चाहिए। फसल के पकने के समय शुष्क मौसम लाभदायक होता
है, जबकि फू ल आते समय वर्षा आवश्यक है।
मिट्टी: इसके लिए जल निकासी वाली गहरी और उपजाऊ मिट्टी आवश्यक है। राजस्थान के दक्षिणी भाग में पाई जाने वाली लाल-लोमी (Red-
loamy) मिट्टी मक्का के उत्पादन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। इसके अतिरिक्त, नाइट्रोजन युक्त दोमट मिट्टी में भी इसका अच्छा
उत्पादन होता है।
2. राजस्थान के प्रमुख मक्का उत्पादन क्षेत्र
राजस्थान में मक्का का उत्पादन मुख्य रूप से राज्य के दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी पहाड़ी क्षेत्रों में कें द्रित है। इसके प्रमुख उत्पादक जिले निम्नलिखित हैं
प्रमुख जिले: उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, बांसवाड़ा, डूंगरपुर और राजसमंद।
अन्य क्षेत्र: इसके अलावा बूंदी, झालावाड़ और प्रतापगढ़ जिलों में भी मक्का की खेती की जाती है।
भौगोलिक अवस्थिति: मक्का का सर्वाधिक संकें द्रण दक्षिणी अरावली श्रेणियों और मेवाड़ के पठारी क्षेत्रों में पाया जाता है।
राजस्थान के बांसवाड़ा स्थित कृषि अनुसंधान कें द्र द्वारा विकसित 'माही कं चन' और 'माही धवल' मक्का की उन्नत किस्में हैं, जो इस क्षेत्र में अत्यधिक
लोकप्रिय हैं।
230 प्रश्न 2302 अंक
'वालरा' (Walra) से आपका क्या आशय है?
(What do you mean by 'Walra'?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञान'वालरा' से आपका क्या आशय है?PDF पृष्ठ 115
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उत्तर — सरल भाषा में
वालरा (Walra) राजस्थान के दक्षिणी भाग में जनजातियों द्वारा की जाने वाली एक स्थानांतरित कृषि (Shifting Cultivation) है, जिसे 'काटो
और जलाओ' (Slash and Burn) पद्धति भी कहा जाता है।
इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
प्रक्रिया: इसमें वनों एवं झाड़ियों को काटकर और जलाकर भूमि साफ की जाती है तथा उस पर कृषि की जाती है। मिट्टी की उर्वरता कम होने
पर स्थान बदल दिया जाता है।
जनजातियाँ: यह मुख्यतः भील और गरासिया जनजातियों द्वारा की जाती है।
क्षेत्र: यह प्रमुखतः दक्षिणी राजस्थान के जिलों जैसे उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ में प्रचलित है।
विशिष्ट रूप
(क) चिमाता: पहाड़ी ढलानों पर वनों को जलाकर की जाने वाली कृषि।
(ख) दजिया: मैदानी भागों में वनों को साफ करके की जाने वाली कृषि।
231 प्रश्न 23120 अंक
राजस्थान को कृषि-जलवायु क्षेत्रों में विभाजित कीजिए तथा किसी एक का सविस्तार वर्णन कीजिए।
(Divide Rajasthan into Agro-climatic regions and describe any one in detail.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान को कृषि-जलवायु क्षेत्रों में विभाजित कीजिए तथा किसी एक का सविस्PDF पृष्ठ 115
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान की विविधतापूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों, मृदा के प्रकार और वर्षा के वितरण के आधार पर राज्य को कु ल 10 कृषि-जलवायु क्षेत्रों (Agro-
climatic Zones) में विभाजित किया गया है। यह वर्गीकरण कृषि योजना और क्षेत्रीय विकास के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
राजस्थान के कृषि-जलवायु क्षेत्रों का वर्गीकरण
राजस्थान के 10 कृषि-जलवायु क्षेत्रों का विवरण निम्नानुसार है
(क) क्षेत्र I-A: शुष्क पश्चिमी मैदानी क्षेत्र (Arid Western Plain Zone): इसमें मुख्य रूप से बाड़मेर और जोधपुर जिले का अधिकांश भाग
शामिल है।
(ख) क्षेत्र I-B: उत्तर-पश्चिमी सिंचित मैदानी क्षेत्र (Irrigated North-Western Plain Zone): इसमें श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले आते हैं।
(ग) क्षेत्र I-C: अति शुष्क आंशिक सिंचित क्षेत्र (Hyper Arid Partial Irrigated Zone): इसमें जैसलमेर, बीकानेर और चुरू (कु छ भाग)
जिले सम्मिलित हैं। यह क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा कृषि-जलवायु खंड है।
(घ) क्षेत्र II-A: अंतःप्रवाही जलोत्सरण का संक्रमणकालीन मैदान (Transitional Plain of Inland Drainage Zone): इसमें नागौर, सीकर
और झुंझुनूं जिले शामिल हैं।
(ङ) क्षेत्र II-B: लूनी बेसिन का संक्रमणकालीन मैदान (Luni Basin Transitional Plain Zone): इसमें जालौर, पाली और सिरोही जिले का
कु छ भाग आता है।
(च) क्षेत्र III-A: अर्द्ध -शुष्क पूर्वी मैदानी क्षेत्र (Semi-Arid Eastern Plain Zone): इसमें जयपुर, अजमेर, दौसा और टोंक जिले शामिल हैं।
(छ) क्षेत्र III-B: बाढ़ संभाव्य पूर्वी मैदानी क्षेत्र (Flood Prone Eastern Plain Zone): इसमें अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली और सवाई
माधोपुर जिले आते हैं।
(ज) क्षेत्र IV-A: उप-आर्द्र दक्षिणी मैदान एवं अरावली पहाड़ियाँ (Sub-Humid Southern Plain and Aravalli Hills): इसमें भीलवाड़ा,
राजसमंद, सिरोही और चित्तौड़गढ़ का कु छ भाग शामिल है।
(झ) क्षेत्र IV-B: आर्द्र दक्षिणी मैदानी क्षेत्र (Humid Southern Plain Zone): इसमें डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और उदयपुर जिले सम्मिलित
हैं।
(ञ) क्षेत्र V: आर्द्र दक्षिण-पूर्वी मैदानी क्षेत्र (Humid South-Eastern Plain Zone): इसमें कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ जिले (हाड़ौती
क्षेत्र) शामिल हैं।
राजस्थान के कृषि-जलवायु क्षेत्रों का मानचित्र
राजस्थान के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति को नीचे दिए गए मानचित्र के माध्यम से समझा जा सकता है
{{fig_1}}
किसी एक कृषि-जलवायु क्षेत्र का विस्तृत विवरण
यहाँ क्षेत्र V: आर्द्र दक्षिण-पूर्वी मैदानी क्षेत्र (Humid South-Eastern Plain Zone) का सविस्तार वर्णन किया गया है
यह क्षेत्र राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित है, जिसे 'हाड़ौती के पठार' के नाम से भी जाना जाता है।
(क) संबंधित जिले
इस कृषि-जलवायु खंड के अंतर्गत राज्य के चार प्रमुख जिले आते हैं
कोटा
बूंदी
बारां
झालावाड़
इसके अतिरिक्त सवाई माधोपुर जिले का कु छ हिस्सा भी इस क्षेत्र की विशेषताओं से मेल खाता है।
(ख) औसत वार्षिक वर्षा और तापमान की स्थिति
वर्षा: यह राजस्थान का सर्वाधिक वर्षा वाला कृषि-जलवायु क्षेत्र है। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 650 मिमी से 1000 मिमी के मध्य होती है।
झालावाड़ जिला राज्य में सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला जिला है।
तापमान: ग्रीष्म ऋतु में यहाँ का अधिकतम तापमान 42°C से 45°C तक पहुँच जाता है, जबकि शीत ऋतु में न्यूनतम तापमान 3°C से
10°C के मध्य रहता है। यहाँ की जलवायु आर्द्र से अति-आर्द्र श्रेणी की है।
(ग) मृदा की विशेषताएं
इस क्षेत्र में मुख्य रूप से मध्यम काली मिट्टी (Medium Black Soil) पाई जाती है, जिसे वैज्ञानिक शब्दावली में 'वर्टिसोल्स' (Vertisols)
कहा जाता है।
यह मिट्टी अत्यधिक उपजाऊ होती है और इसमें नमी धारण करने की क्षमता (Moisture retention capacity) बहुत अधिक होती है।
नदी घाटियों में कछारी (Alluvial) मिट्टी भी पाई जाती है।
(घ) उगाई जाने वाली मुख्य फसलें
यहाँ की अनुकू ल जलवायु और समृद्ध मृदा के कारण विभिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं
खरीफ फसलें: सोयाबीन (प्रमुख), मक्का, उड़द, और धान। राजस्थान में सोयाबीन का सर्वाधिक उत्पादन इसी क्षेत्र में होता है।
रबी फसलें: गेहूँ, सरसों, चना और अलसी।
नकद एवं बागवानी फसलें: झालावाड़ में संतरे का उत्पादन (इसे 'राजस्थान का नागपुर' कहा जाता है), कोटा और बारां में धनिया एवं लहसुन
का भारी उत्पादन होता है। साथ ही, झालावाड़ में अफीम की खेती भी की जाती है।
यह क्षेत्र चंबल, काली सिंध और पार्वती जैसी नदियों द्वारा सिंचित है, जिससे यहाँ कृषि उत्पादकता राज्य के अन्य क्षेत्रों की तुलना में काफी बेहतर है।
232 प्रश्न 23210 अंक
राजस्थान में सहरिया जनजाति के आवास, अर्थव्यवस्था तथा समाज का वर्णन कीजिए एवं सहरिया जनजाति के उत्थान के लिए सरकार की नीतियों की विवेचना कीजिए।
(Describe habitat, economy and society of Saharia tribe in Rajasthan and discuss government policies for upliftment.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान में सहरिया जनजाति के आवास, अर्थव्यवस्था तथा समाज का वर्णन कीजिएPDF पृष्ठ 116
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उत्तर — सरल भाषा में
सहरिया जनजाति राजस्थान की एकमात्र 'आदिम जनजाति समूह' (PVTG) है, जो अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान के लिए जानी
जाती है। इनका विस्तृत विवरण निम्नलिखित है
1. भौगोलिक वितरण एवं आवास
निवास क्षेत्र: राजस्थान में सहरिया जनजाति मुख्य रूप से बारां जिले की शाहबाद और किशनगंज तहसीलों में निवास करती है। राज्य की 99%
से अधिक सहरिया आबादी इसी क्षेत्र में कें द्रित है।
आवास की विशेषताएं
टापरी: सहरिया परिवारों के छोटे मिट्टी, पत्थर और घास-फू स से बने घरों को 'टापरी' कहा जाता है।
सहराना: सहरियाओं की छोटी बस्ती को 'सहराना' कहते हैं।
हताई/बंगला: बस्ती के बीचों-बीच एक सामूहिक स्थान होता है जहाँ पंचायत की बैठकें होती हैं, इसे 'हताई' या 'सहराना का बीच का
स्थान' कहा जाता है।
राजस्थान के मानचित्र में सहरिया क्षेत्र का प्रदर्शन नीचे दिया गया है
{{fig_1}}
2. अर्थव्यवस्था एवं आजीविका
सहरिया जनजाति की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से वनों और श्रम पर आधारित है
वनोपज संग्रहण: ये लोग शहद, महुआ, तेंदू पत्ता, गोंद और औषधीय जड़ी-बूटियों के संग्रहण पर निर्भर हैं।
कृषि: अतीत में ये 'वाल्दा' (स्थानांतरित कृषि) करते थे, किंतु अब स्थायी कृषि और बटाईदारी (हाली प्रथा) अपना ली है।
दैनिक मजदूरी: वर्तमान में आजीविका का बड़ा हिस्सा मनरेगा और कृषि मजदूरी से आता है।
आर्थिक चुनौतियाँ: निम्न साक्षरता और संसाधनों के अभाव के कारण यह समुदाय आज भी आर्थिक रूप से पिछड़ा है।
3. सामाजिक संरचना एवं सांस्कृतिक विशेषताएं
सामाजिक ढांचा: इनका समाज पितृसत्तात्मक है और ये विभिन्न गोत्रों में विभाजित हैं।
पंचायत व्यवस्था: सहरिया समाज में विवाद सुलझाने हेतु त्रि-स्तरीय पंचायत व्यवस्था है: कु श्या (5 गाँव), एकदेशिया (11 गाँव) और चौरसिया
(84 गाँव)।
मुखिया: गाँव के मुखिया को 'कोतवाल' कहा जाता है, जिसका पद अत्यंत सम्मानित होता है।
प्रमुख संस्कार व मेले
धारी संस्कार: पुनर्जन्म की मान्यता से जुड़ा एक विशिष्ट संस्कार है।
सीताबाड़ी मेला (के लवाड़ा): इसे 'सहरियाओं का कुं भ' कहा जाता है, जहाँ वे अपने पूर्वजों की अस्थियाँ विसर्जित करते हैं।
4. सहरिया जनजाति के उत्थान के लिए सरकारी नीतियां
भारत सरकार ने सहरिया जनजाति को राजस्थान की एकमात्र 'आदिम जनजाति समूह' (PVTG) की श्रेणी में रखा है, जिसके तहत विशेष विकास
प्रयास किए जा रहे हैं
सहरिया विकास कार्यक्रम (1977-78): बारां जिले में इस समुदाय के समग्र आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए संचालित है।
रोजगार सुरक्षा: सहरिया परिवारों को मनरेगा के तहत 100 अतिरिक्त कार्य दिवस (कु ल 200 दिन) का रोजगार प्रदान किया जाता है।
शिक्षा के प्रयास: समुदाय में साक्षरता बढ़ाने हेतु 'माँ-बाड़ी' कें द्र और विशेष 'आश्रम छात्रावास' संचालित हैं।
खाद्य सुरक्षा व स्वास्थ्य: कु पोषण दूर करने के लिए विशेष पोषण पैके ज (जैसे मुफ्त घी, तेल और दालें) वितरण की योजना है।
आवास योजना: प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY-G) के तहत सहरिया परिवारों को पक्के मकान बनाने हेतु प्राथमिकता और अतिरिक्त
सहायता दी जाती है।
निष्कर्ष
सहरिया जनजाति राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग है। यद्यपि सरकारी नीतियों से इनके जीवन स्तर में सुधार हो रहा है, तथापि शिक्षा
और आधुनिक कौशल विकास के माध्यम से इन्हें मुख्यधारा से और अधिक मजबूती से जोड़ने की आवश्यकता है।
233 प्रश्न 23310 अंक
राजस्थान के जनसंख्या वितरण पर भू-आकृ ति एवं जलवायु के प्रभावों की विवेचन कीजिए।
(Discuss the impact of physiography and climate on population distribution of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान के जनसंख्या वितरण पर भू-आकृ ति एवं जलवायु के प्रभावों की विवेचनPDF पृष्ठ 117
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान भारत का भौगोलिक दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य है, जहाँ जनसंख्या का वितरण अत्यधिक असमान पाया जाता है। 2011 की जनगणना के
अनुसार, राज्य का औसत जनसंख्या घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर इसमें भारी भिन्नता दिखाई देती है। इस असमान
वितरण के लिए राज्य की विशिष्ट भू-आकृ ति (Physiography) और जलवायु (Climate) प्राथमिक रूप से उत्तरदायी हैं।
1. भू-आकृ ति का प्रभाव (Impact of Physiography)
राजस्थान की भू-आकृ ति को चार प्रमुख भागों में बाँटा गया है, जिनका जनसंख्या घनत्व पर सीधा प्रभाव पड़ता है
पूर्वी मैदानी भाग: यह राज्य का सर्वाधिक सघन बसा हुआ क्षेत्र है। बनास, बाणगंगा और चम्बल बेसिन द्वारा निर्मित जलोढ़ मिट्टी के कारण यह
क्षेत्र कृषि की दृष्टि से अत्यंत उपजाऊ है। समतल भू-भाग होने के कारण यहाँ परिवहन, उद्योगों और नगरीकरण का तीव्र विकास हुआ है,
जिससे यहाँ जनसंख्या का संकें द्रण अधिक है।
पश्चिमी रेतीला मैदान (थार मरुस्थल): राज्य के लगभग 61% भू-भाग पर फै ले इस क्षेत्र में विशाल रेतीले टीले और विषम धरातल पाए जाते हैं।
कृषि योग्य भूमि की कमी और दुर्गम रास्तों के कारण यहाँ जनसंख्या बहुत विरल है। हालांकि, इंदिरा गांधी नहर के आगमन से कु छ क्षेत्रों में
बसाव बढ़ा है।
अरावली पर्वतमाला: यह एक प्राचीन वलित पर्वत श्रृंखला है। इसकी ऊबड़-खाबड़ चोटियाँ, तीव्र ढाल और पथरीली भूमि बड़े पैमाने पर कृषि
और परिवहन में बाधक हैं। अतः यहाँ जनसंख्या मुख्य रूप से घाटियों और तलहटी क्षेत्रों तक ही सीमित है।
दक्षिण-पूर्वी पठार (हाड़ौती): यहाँ की काली मिट्टी कृषि (विशेषकर नकदी फसलों) के लिए उपयुक्त है, जिसके कारण यहाँ मध्यम जनसंख्या
घनत्व पाया जाता है।
2. जलवायु का प्रभाव (Impact of Climate)
जलवायु जनसंख्या के वितरण को निर्धारित करने वाला सबसे शक्तिशाली कारक है
वर्षा का वितरण: राजस्थान में 50 सेमी की समवर्षा रेखा जनसंख्या वितरण की एक विभाजक रेखा है। इसके पूर्व में पर्याप्त वर्षा (60-100
सेमी) होती है, जो स्थायी कृषि और जल सुरक्षा सुनिश्चित करती है, जिससे सघन आबादी निवास करती है। इसके विपरीत, पश्चिमी राजस्थान में
वर्षा बहुत कम (25 सेमी से कम) और अनिश्चित होती है, जो जनसंख्या के विरल होने का मुख्य कारण है।
तापमान की चरम सीमा: पश्चिमी राजस्थान में गर्मियों में अत्यधिक उच्च तापमान (कभी-कभी 50°C तक) और शुष्क हवाएँ (लू) मानव स्वास्थ्य
और कार्यक्षमता पर प्रतिकू ल प्रभाव डालती हैं, जबकि पूर्वी और दक्षिणी भागों की जलवायु अपेक्षाकृ त सुखद और मानव बसाव के अनुकू ल है।
जल संसाधनों की उपलब्धता: जल की उपलब्धता ही जीवन का आधार है। जहाँ बारहमासी नदियाँ (जैसे चम्बल और माही) या सिंचाई की
सुविधाएँ हैं, वहाँ बस्तियाँ सघन हैं। शुष्क क्षेत्रों में जल की भारी कमी के कारण लोग दूर-दूर बिखरे हुए ढाणियों में रहते हैं।
क्षेत्रीय तुलनात्मक उदाहरण
न्यूनतम घनत्व: जैसलमेर (17 व्यक्ति/वर्ग किमी) और बीकानेर (78 व्यक्ति/वर्ग किमी) जैसे जिले अपनी कठोर जलवायु और रेतीली भू-
आकृ ति के कारण सबसे कम आबादी वाले हैं।
अधिकतम घनत्व: जयपुर (595 व्यक्ति/वर्ग किमी), भरतपुर (503 व्यक्ति/वर्ग किमी) और अलवर जैसे जिले अपनी अनुकू ल जलवायु और
मैदानी भू-भाग के कारण सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व रखते हैं।
निष्कर्ष
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि राजस्थान में जनसंख्या का वितरण प्रकृति प्रदत्त भौतिक सीमाओं द्वारा निर्देशित है। उपजाऊ मैदान और अनुकू ल
जलवायु वाले पूर्वी भाग मानव जीवन के लिए आदर्श परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं, जबकि विषम भू-आकृ ति और कठोर जलवायु वाले पश्चिमी व
पहाड़ी क्षेत्र आबादी के फै लाव को सीमित करते हैं।
234 प्रश्न 23410 अंक
राजस्थान की 'गरासिया' जनजाति की सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
(Discuss the socio-economic characteristics of 'Garasia' tribe of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान की 'गरासिया' जनजाति की सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।PDF पृष्ठ 118
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान की गरासिया जनजाति सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध और विशिष्ट परंपराओं वाली जनजाति है। यह मीणा और भील के बाद राजस्थान
की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति है।
1. भौगोलिक वितरण एवं परिचय
निवास क्षेत्र: गरासिया मुख्य रूप से राजस्थान के दक्षिण-पश्चिमी भाग में निवास करते हैं। इनका सर्वाधिक संकें द्रण सिरोही जिले की आबू रोड
और पिंडवाड़ा तहसीलों में है। इसके अतिरिक्त ये उदपुर (गोगुंदा और कोटड़ा तहसील) तथा पाली (बाली तहसील) जिलों में भी पाए जाते हैं।
उत्पत्ति: विद्वानों के अनुसार 'गरासिया' शब्द की उत्पत्ति संस्कृ त के शब्द 'गिरावस' या 'गवास' (Gavas) से मानी जाती है, जिसका अर्थ
'बस्ती का स्वामी' होता है।
2. सामाजिक विशेषताएँ एवं परंपराएँ
गरासिया समाज अपनी विशिष्ट सामाजिक संरचना और रीति-रिवाजों के लिए जाना जाता है
सामाजिक संरचना: इनका समाज पितृसत्तात्मक होता है। सामाजिक स्तर पर ये तीन वर्गों में विभाजित हैं: 1. मोटी न्यात (बाबरिया - उच्च वर्ग),
2. नैनकी न्यात (मध्यम वर्ग), और 3. निचली न्यात (निम्न वर्ग)।
प्रशासनिक इकाई: इनके गाँव की सबसे छोटी इकाई या मोहल्ले को 'फालिया' कहा जाता है। गाँव के मुखिया को 'सहलोत' या 'पालवी' कहते
हैं, जिसका निर्णय समाज में सर्वमान्य होता है।
विवाह पद्धतियाँ: इनमें विवाह के विविध स्वरूप प्रचलित हैं
मोर बंधिया: ब्रह्म विवाह के समान, जिसमें विधिवत फे रे होते हैं।
पहरावणा: इसमें नाममात्र के फे रे (ब्राह्मण के बिना) होते हैं।
ताणना: इसमें वर पक्ष द्वारा कन्या पक्ष को 'दापा' (कन्या मूल्य) देकर विवाह किया जाता है।
मेलबो: विवाह का खर्च बचाने हेतु लड़की को लड़के के घर छोड़ दिया जाता है।
सांस्कृतिक मान्यताएँ: गरासिया सफे द पक्षियों और सफे द रंग को पवित्र मानते हैं। इनके मृतक स्मारकों को 'हुरे' (घरे) कहा जाता है। मेले इनके
जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं (जैसे सियवा का गौर मेला), जहाँ अक्सर युवक-युवती अपने जीवनसाथी का चयन करते हैं।
3. आर्थिक विशेषताएँ एवं आजीविका
गरासिया जनजाति की अर्थव्यवस्था मुख्यतः प्रकृति और सामुदायिक सहयोग पर आधारित है
प्रमुख व्यवसाय: इनकी आजीविका का मुख्य साधन कृषि, पशुपालन और वनोपज संग्रह है। ये मक्का, ज्वार और बाजरा जैसी फसलों की खेती
करते हैं।
हारी-भांवरी: यह गरासियों में प्रचलित सामूहिक/सहकारी कृषि का एक रूप है, जिसमें समुदाय के लोग मिलकर खेती करते हैं और उत्पादन को
आपस में बाँट लेते हैं।
हेलरू (Helru): यह इस जनजाति की एक महत्वपूर्ण सहकारी संस्था है, जो समुदाय के सामाजिक-आर्थिक उत्थान, खेती में सहायता और
संकट के समय ग्रामीणों को आर्थिक सहयोग प्रदान करने का कार्य करती है।
वनोपज: शहद, गोंद और लकड़ियाँ इकट्ठा करना भी इनकी आय का एक पूरक स्रोत है।
निष्कर्ष
गरासिया जनजाति अपनी प्राचीन परंपराओं और आधुनिक विकास के बीच एक संतुलन बनाए हुए है। 'हेलरू' जैसी सामुदायिक संस्थाएं उनकी
आर्थिक सुदृढ़ता का आधार हैं। वर्तमान में शिक्षा के प्रसार और सरकारी योजनाओं के माध्यम से यह जनजाति राजस्थान की मुख्यधारा में अपनी
विशिष्ट पहचान के साथ तेजी से आगे बढ़ रही है।
235 प्रश्न 23510 अंक
राजस्थान में भील जनजाति के आवास, अर्थव्यवस्था एवं समाज का वर्णन कीजिए।
(Describe habitat, economy and society of Bhil tribe in Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान में भील जनजाति के आवास, अर्थव्यवस्था एवं समाज का वर्णन कीजिए।PDF पृष्ठ 119
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उत्तर — सरल भाषा में
भील जनजाति राजस्थान की सबसे प्राचीन और राज्य की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है। इनका मुख्य विस्तार राज्य के दक्षिणी भाग में है। भील
जनजाति के आवास, अर्थव्यवस्था और समाज का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है
1. भौगोलिक विस्तार एवं आवास (Habitat)
क्षेत्र: भील मुख्य रूप से राजस्थान के दक्षिणी अरावली क्षेत्र में निवास करते हैं। इनका सर्वाधिक जमाव उदयपुर, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा और
प्रतापगढ़ जिलों में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त ये चित्तौड़गढ़, सिरोही और राजसमंद में भी निवास करते हैं।
आवास की बनावट: भीलों के घरों को स्थानीय भाषा में 'कु ' या 'टापरा' कहा जाता है। ये घर सामान्यतः घास-फू स, मिट्टी, पत्थर और लकड़ी से
बने होते हैं।
बस्तियों के प्रकार
भीलों की बस्तियाँ अक्सर बिखरी हुई होती हैं ताकि वे अपने खेतों की निगरानी कर सकें ।
छोटे गाँव या बस्तियों के मोहल्ले को 'फला' कहा जाता है।
कई फला मिलकर एक बड़े गाँव का निर्माण करते हैं, जिसे 'पाल' कहा जाता है।
विशेषता: सुरक्षा की दृष्टि से इनके घर पहाड़ियों की ढलानों या ऊँ चे स्थानों पर बनाए जाते हैं।
2. अर्थव्यवस्था (Economy)
भील जनजाति की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि और प्राकृ तिक संसाधनों पर आधारित है
कृषि: भीलों की आजीविका का मुख्य आधार कृषि है। ये दो प्रकार की स्थानांतरित कृषि (Jhumming) करते हैं
(क) चिमाता: पहाड़ियों पर वनों को जलाकर की जाने वाली खेती।
(ख) दजिया: मैदानी भागों में वनों को काटकर की जाने वाली खेती।
वनोपज संग्रहण: ये वनों से महुआ के फू ल (शराब बनाने हेतु), शहद, गोंद, मोम, जलाऊ लकड़ी और औषधियाँ एकत्र कर उन्हें बाजार में बेचते
हैं।
पशुपालन: भील परिवार गाय, भैंस और बकरियाँ पालते हैं, जो उनके दूध और आय का स्रोत होती हैं।
मजदूरी: वर्तमान समय में भील युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं और निर्माण कार्यों तथा खदानों में श्रमिक के रूप में कार्य कर रहे हैं।
3. सामाजिक संरचना एवं सांस्कृतिक विशेषताएँ (Society and Culture)
सामाजिक ढांचा: भील समाज पितृसत्तात्मक होता है। समाज विभिन्न बहिर्विवाही गोत्रों में बंटा होता है, जिसे 'अटक' कहा जाता है।
मुखिया: पाल (बड़े गाँव) के मुखिया को 'गमेती' कहा जाता है, जबकि एक छोटी बस्ती (फला) के मुखिया को 'पालवी' कहते हैं। गमेती का
निर्णय सामाजिक विवादों में अंतिम माना जाता है।
विवाह प्रथाएँ: इनमें विवाह के कई रूप प्रचलित हैं
दापा प्रथा: वर पक्ष द्वारा वधू के पिता को दिया जाने वाला कन्या मूल्य।
नातरा प्रथा: विधवा या विवाहित महिला का दूसरे पुरुष के साथ पुनर्विवाह।
गोल गधेड़ो: उत्सवों के दौरान वीरता का प्रदर्शन कर युवती को चुनने की प्रथा।
धार्मिक विश्वास: ये हिंदू धर्म के अनुयायी हैं और महादेव, भैरूजी एवं ऋषभदेव (के सरिया जी) के अनन्य भक्त हैं। इनका पवित्र नारा 'फायरे-
फायरे' है, जो युद्ध के समय रणघोष के रूप में उपयोग होता है।
मेले: डूंगरपुर में सोम, माही और जाखम नदियों के संगम पर आयोजित होने वाला 'बेणेश्वर मेला' भीलों का सबसे बड़ा सांस्कृतिक उत्सव है,
जिसे 'वागड़ का कुं भ' भी कहा जाता है।
236 प्रश्न 2362 अंक
सन् 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में पुरुष एवं स्त्री साक्षरता की दरें क्या हैं?
(What are the male and female literacy rates in Rajasthan as per Census-2011?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानसन् 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में पुरुष एवं स्त्री साक्षरता की दPDF पृष्ठ 119
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उत्तर — सरल भाषा में
सन् 2011 की जनगणना के अंतिम आंकड़ों के अनुसार राजस्थान की साक्षरता दरें निम्नलिखित हैं
पुरुष साक्षरता दर: 79.19% (लगभग 79.2%)
स्त्री (महिला) साक्षरता दर: 52.12% (लगभग 52.1%)
राजस्थान की कु ल साक्षरता दर 66.11% दर्ज की गई थी। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में साक्षरता दर अधिक पाई गई है।
237 प्रश्न 2372 अंक
जनगणना 2011 के आधार पर राजस्थान में 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से अधिक घनत्व वाले जिलों के नाम लिखिए।
(Write names of districts having density > 400 persons/sq km in Rajasthan as per Census-2011.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानजनगणना 2011 के आधार पर राजस्थान में 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से अधिकPDF पृष्ठ 120
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उत्तर — सरल भाषा में
जनगणना 2011 के अनुसार, राजस्थान में 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से अधिक जनसंख्या घनत्व वाले जिले निम्नलिखित हैं
(क) जयपुर (595 व्यक्ति/वर्ग किमी)
(ख) भरतपुर (503 व्यक्ति/वर्ग किमी)
(ग) दौसा (476 व्यक्ति/वर्ग किमी)
(घ) अलवर (438 व्यक्ति/वर्ग किमी)
राजस्थान के के वल इन्हीं चार जिलों का जनसंख्या घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से अधिक दर्ज किया गया था।
238 प्रश्न 2382 अंक
राजस्थान के प्रमुख रॉकफॉस्फे ट उत्पादक क्षेत्रों के नाम दीजिए और इसका उपयोग बताइए।
(Name the major rock phosphate producing areas of Rajasthan and mention its use.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान के प्रमुख रॉकफॉस्फे ट उत्पादक क्षेत्रों के नाम दीजिए और इसका उपPDF पृष्ठ 120
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान भारत में रॉकफॉस्फे ट का प्रमुख उत्पादक राज्य है। इसके प्रमुख उत्पादक क्षेत्र और उपयोग निम्नलिखित हैं
राजस्थान के प्रमुख रॉकफॉस्फे ट उत्पादक क्षेत्र
उदयपुर जिला: झामर-कोटरा (देश का सबसे बड़ा भंडार), माटोन, कानपूर, और करबरिया-का-गुढ़ा।
जैसलमेर जिला: बिरमानिया और लाठी क्षेत्र।
अन्य: सीकर (अचरोल) और जयपुर (अचरोल क्षेत्र)।
रॉकफॉस्फे ट के प्रमुख उपयोग
रासायनिक उर्वरक: इसका मुख्य उपयोग सुपर फास्फे ट और अन्य फास्फोरस युक्त रासायनिक उर्वरकों के निर्माण में किया जाता है।
मृदा सुधार: अम्लीय भूमि (Acidic Soil) की उर्वरता सुधारने और उसके उपचार के लिए रॉकफॉस्फे ट का प्रत्यक्ष उपयोग किया जाता है।
औद्योगिक उपयोग: फास्फोरिक एसिड और विभिन्न फास्फोरस रसायनों के निर्माण में।
239 प्रश्न 2392 अंक
राजस्थान के जस्ता (Zinc) उत्पादक क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए।
(Write the zinc producing areas of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान के जस्ता उत्पादक क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए।PDF पृष्ठ 120
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान में जस्ता (सामान्यतः सीसा-जस्ता मिश्रित रूप में) के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र और उनसे संबंधित जिले निम्नलिखित हैं
जावर क्षेत्र (उदयपुर): यह राजस्थान का सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें मोचिया मगरा, बलारिया, जावर माला और बारोई खानें
शामिल हैं।
रामपुरा-अगुचा (भीलवाड़ा): यह जस्ते का देश का सबसे समृद्ध और बड़ा भंडार क्षेत्र माना जाता है।
राजपुरा-दरीबा और सिंदेसर खुर्द (राजसमंद): इन क्षेत्रों में आधुनिक तकनीकों से जस्ता अयस्क का खनन किया जाता है।
चौथ का बरवाड़ा (सवाई माधोपुर): यहाँ भी सीसा और जस्ता के महत्वपूर्ण निक्षेप पाए जाते हैं।
कायर और घूघरा (अजमेर): यह हाल के वर्षों में विकसित एक अन्य महत्वपूर्ण उत्पादक क्षेत्र है।
240 प्रश्न 2405 अंक
राजस्थान में प्रमुख धात्विक खनिजों के वितरण की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
(Discuss the distribution of major metallic minerals of Rajasthan in brief.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान में प्रमुख धात्विक खनिजों के वितरण की संक्षेप में विवेचना कीजिएPDF पृष्ठ 120
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान को खनिजों की विविधता के कारण 'खनिजों का अजायबघर' कहा जाता है। राज्य में धात्विक खनिजों का वितरण मुख्य रूप से अरावली
पर्वत श्रृंखला और उसके आसपास के क्षेत्रों में पाया जाता है।
प्रमुख धात्विक खनिजों का वितरण निम्नलिखित है
1. सीसा और जस्ता (Lead-Zinc)
राजस्थान भारत में सीसा-जस्ता के उत्पादन में एकाधिकार रखता है। यह खनिज अक्सर मिश्रित अवस्था में (गैलेना अयस्क के रूप में) मिलता है।
प्रमुख क्षेत्र: जावर (उदयपुर), रामपुरा-आगुचा (भीलवाड़ा), राजपुरा-दरीबा (राजसमंद), चौथ का बरवाड़ा (सवाई माधोपुर) और कायड़
(अजमेर)।
2. तांबा (Copper)
राज्य में तांबे के भंडार मुख्य रूप से अरावली की प्री-कै म्ब्रियन चट्टानों में पाए जाते हैं।
प्रमुख क्षेत्र: खेतड़ी-सिंघाना (झुंझुनू), खो-दरीबा (अलवर), नीम का थाना (सीकर), अंजनी-सलूंबर (उदयपुर) और बीदासर (बीकानेर)। झुंझुनू
को 'ताम्र जिला' भी कहा जाता है।
3. लौह अयस्क (Iron Ore)
राजस्थान में मुख्य रूप से हेमेटाइट किस्म का लोहा पाया जाता है।
प्रमुख क्षेत्र: मोरीजा-बानोल (जयपुर), नीमला-रायसेला (दौसा), डाबला-सिंघाना (झुंझुनू), और नाथरा-की-पाल एवं थूर-हुंडेर (उदयपुर)।
4. टंगस्टन (Tungsten)
यह एक रणनीतिक महत्व का खनिज है जिसका गलनांक बहुत उच्च होता है।
प्रमुख क्षेत्र: डेगाना की रेवत पहाड़ी (नागौर) और बलदा क्षेत्र (सिरोही)। नागौर का डेगाना क्षेत्र भारत की सबसे बड़ी टंगस्टन खान रही है।
5. मैंगनीज (Manganese)
मैंगनीज का उपयोग मुख्य रूप से इस्पात उद्योग में किया जाता है।
प्रमुख क्षेत्र: मुख्य वितरण बांसवाड़ा जिले में है (लीलावानी, कालाखूंटा, तलवाड़ा, इटाला, तामेसरा)। इसके अलावा उदयपुर के कु छ क्षेत्रों में भी
इसके भंडार मिलते हैं।
निष्कर्ष
राजस्थान के धात्विक खनिज न के वल राज्य के राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, बल्कि यह क्षेत्र हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड और हिंदुस्तान कॉपर
लिमिटेड जैसे प्रमुख उद्योगों का आधार भी हैं। अधिकांश धात्विक खनिज धारवाड़ और अरावली सुपरग्रुप की चट्टानों में कें द्रित हैं।
241 प्रश्न 2415 अंक
राजस्थान में सीमेण्ट उद्योग की अवस्थिति के कारकों एवं वृद्धि की व्याख्या कीजिए।
(Elucidate location factors and growth of cement industry in Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान में सीमेण्ट उद्योग की अवस्थिति के कारकों एवं वृद्धि की व्याख्याPDF पृष्ठ 121
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान भारत में सीमेण्ट उत्पादन के क्षेत्र में एक अग्रणी राज्य है। राज्य में इस उद्योग की अवस्थिति और निरंतर हो रही वृद्धि के मुख्य कारण
निम्नलिखित हैं
सीमेण्ट उद्योग की अवस्थिति के प्रमुख कारक
कच्चे माल की उपलब्धता: सीमेण्ट एक भार-ह्रास वाला उद्योग है, जिसके लिए चूना पत्थर (Limestone), जिप्सम और कोयला मुख्य कच्चे
माल हैं। राजस्थान में उच्च श्रेणी के चूना पत्थर के विशाल भंडार (चित्तौड़गढ़, नागौर, जैसलमेर और झुंझुनू जिलों में) उपलब्ध हैं। बीकानेर और
जैसलमेर से जिप्सम की आसान उपलब्धता इसे और सुदृढ़ बनाती है।
परिवहन सुविधाएँ: राज्य में रेलवे (विशेषकर ब्रॉड गेज) और राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तृत जाल बिछा हुआ है। यह भारी सीमेण्ट को दिल्ली,
गुजरात और पंजाब जैसे बड़े बाजारों तक पहुँचाने में सहायक होता है।
विद्युत और शक्ति के स्रोत: राज्य में थर्मल पावर स्टेशनों और सौर ऊर्जा के विकास से उद्योगों को निरंतर बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित हुई है।
बाजार की मांग: उत्तर भारत में तीव्र शहरीकरण और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के कारण सीमेण्ट की निरंतर मांग बनी रहती है।
उद्योग की वृद्धि और वर्तमान परिदृश्य
ऐतिहासिक विकास: राजस्थान में सीमेण्ट उद्योग की शुरुआत 1915-17 में लाखेरी (बूंदी) में 'क्लिक निक्सन कं पनी' द्वारा प्रथम संयंत्र की
स्थापना से हुई थी।
अग्रणी उत्पादक: वर्तमान में राजस्थान देश के सबसे बड़े सीमेण्ट उत्पादक राज्यों में से एक है। चित्तौड़गढ़ को राज्य की 'सीमेण्ट नगरी' कहा
जाता है, जहाँ सर्वाधिक बड़े कारखाने स्थापित हैं।
सफे द सीमेण्ट: राजस्थान सफे द सीमेण्ट के उत्पादन में भी अग्रणी है। इसके मुख्य कें द्र गोटन (नागौर) और खारिया खंगार (जोधपुर) हैं।
प्रमुख कें द्र: राज्य के मुख्य सीमेण्ट उत्पादक कें द्रों में निंबाहेड़ा, ब्यावर, मोडक, कोटपुतली और सवाई माधोपुर शामिल हैं। आधुनिक तकनीक
और नई निवेश नीतियों के कारण जे.के . सीमेंट, अल्ट्राटेक और श्री सीमेंट जैसे बड़े समूह यहाँ कार्यरत हैं।
राजस्थान की भौगोलिक स्थिति और खनिज संपन्नता इसे भविष्य में सीमेण्ट उत्पादन का सबसे बड़ा कें द्र बनाए रखने की क्षमता प्रदान करती है।
242 प्रश्न 2425 अंक
राजस्थान में सीसा एवं जस्ता उत्पादन क्षेत्रों के वितरण को स्पष्ट कीजिए।
(Describe the distribution of lead and zinc production areas in Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान में सीसा एवं जस्ता उत्पादन क्षेत्रों के वितरण को स्पष्ट कीजिए।PDF पृष्ठ 121
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान भारत में सीसा और जस्ता (Lead and Zinc) के उत्पादन में लगभग एकाधिकार (100% उत्पादन) रखता है। यह खनिज मुख्य रूप से
अरावली पर्वत श्रृंखला की प्राचीन चट्टानों में 'गैलेना' अयस्क के रूप में पाया जाता है। सीसा और जस्ता को उनके सह-अस्तित्व के कारण 'जुड़वां
खनिज' भी कहा जाता है।
राजस्थान में प्रमुख सीसा-जस्ता उत्पादन क्षेत्रों का जिलावार वितरण निम्नलिखित है
भीलवाड़ा जिला
रामपुरा-अगुचा: यह विश्व के सबसे समृद्ध और उच्च श्रेणी के सीसा-जस्ता भंडारों में से एक है। यहाँ से देश का सर्वाधिक उत्पादन प्राप्त
होता है।
उदयपुर जिला (जावर क्षेत्र)
यह भारत की सबसे प्राचीन और बड़ी खानों में से एक है। इसके अंतर्गत मोचिया मगरा, बलारिया, जावरमाला, और बड़ोद पहाड़ी जैसे
प्रमुख खनन क्षेत्र आते हैं।
राजसमंद जिला
राजपुरा-दरीबा और सिंदेसर खुर्द : यह क्षेत्र उच्च गुणवत्ता वाले सीसा-जस्ता के साथ-साथ चांदी के उत्पादन के लिए भी प्रसिद्ध है।
सवाई माधोपुर जिला
चौथ का बरवाड़ा: यहाँ बरवाड़ा पहाड़ी क्षेत्र में सीसा-जस्ता का निक्षेप पाया जाता है।
अजमेर जिला
कायड़ (Kayad): यह हाल के वर्षों में विकसित एक महत्वपूर्ण और आधुनिक खनन क्षेत्र है।
अलवार जिला
गुढ़ा किशोरीदास: यहाँ भी सीसा-जस्ता के भंडार पाए गए हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
इन खनिजों का शोधन हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) द्वारा किया जाता है, जिसके स्मेल्टर प्लांट चंदेरिया (चित्तौड़गढ़) और देबारी (उदयपुर)
में स्थित हैं।
राजस्थान में इन क्षेत्रों का वितरण दक्षिण-मध्य अरावली पट्टी के साथ संकें द्रित है।
243 प्रश्न 2432 अंक
राजस्थान के मुख्य अधात्विक खनिजों के नाम लिखिए।
(Write the names of major non-metallic minerals of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान के मुख्य अधात्विक खनिजों के नाम लिखिए।PDF पृष्ठ 122
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान अधात्विक खनिजों की दृष्टि से एक अत्यंत समृद्ध राज्य है। यहाँ पाए जाने वाले प्रमुख अधात्विक खनिज निम्नलिखित हैं
(क) रॉक फॉस्फे ट: राजस्थान देश का प्रमुख उत्पादक है (मुख्यतः झामर-कोटड़ा, उदयपुर)।
(ख) जिप्सम: बीकानेर, नागौर और जैसलमेर जिलों में बहुतायत में पाया जाता है।
(ग) चूना पत्थर (लाइमस्टोन): यह सीमेंट उद्योग का मुख्य आधार है और चित्तौड़गढ़, सिरोही तथा जैसलमेर में प्रचुर मात्रा में मिलता है।
(घ) अभ्रक (माइका): भीलवाड़ा राजस्थान का मुख्य अभ्रक उत्पादक जिला है।
(ङ) वोलास्टोनाइट: राजस्थान भारत में वोलास्टोनाइट का एकमात्र उत्पादक राज्य है।
(च) गारनेट (तामड़ा): टोंक और अजमेर जिलों में इसके महत्वपूर्ण भंडार हैं।
(छ) फे ल्डस्पार: अजमेर जिला देश के अधिकांश फे ल्डस्पार का उत्पादन करता है।
(ज) घिया पत्थर (स्टीटाइट/सोपस्टोन): उदयपुर और डूंगरपुर क्षेत्र में विस्तृत रूप से पाया जाता है।
244 प्रश्न 2442 अंक
राजस्थान में इमारती पत्थरों के प्रकार एवं वितरण को संक्षेप में समझाइए।
(Discuss in brief the types and distribution of building stones in Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान में इमारती पत्थरों के प्रकार एवं वितरण को संक्षेप में समझाइए।PDF पृष्ठ 122
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान इमारती पत्थरों के उत्पादन में भारत का अग्रणी राज्य है। यहाँ पाए जाने वाले प्रमुख पत्थर और उनका वितरण निम्न प्रकार है
संगमरमर (Marble): यह मुख्य रूप से मकराना (नागौर), राजसमंद, उदयपुर, बांसवाड़ा और किशनगढ़ (अजमेर) में पाया जाता है। मकराना
का सफे द संगमरमर विश्व प्रसिद्ध है।
ग्रेनाइट (Granite): जालौर को 'ग्रेनाइट सिटी' कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सिरोही, बाड़मेर और पाली में भी ग्रेनाइट के विशाल भंडार हैं।
बलुआ पत्थर (Sandstone): जोधपुर (बादामी पत्थर), धौलपुर (लाल पत्थर), करौली और भरतपुर इसके प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं।
कोटा स्टोन (Kota Stone): यह चूना पत्थर का एक प्रकार है, जो मुख्य रूप से कोटा और झालावाड़ (रामगंज मंडी) जिलों में प्रचुरता से
मिलता है।
स्लेट (Slate): इसके भंडार मुख्य रूप से अलवर और भरतपुर जिलों में पाए जाते हैं।
245 प्रश्न 2452 अंक
राजस्थान में लिग्नाइट कोयले के वितरण एवं औद्योगिक उपयोग के बारे में लिखिए।
(Write about the distribution and industrial uses of lignite coal in Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान में लिग्नाइट कोयले के वितरण एवं औद्योगिक उपयोग के बारे में लिखिPDF पृष्ठ 123
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान में टर्शियरी काल के लिग्नाइट कोयले के निक्षेप प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसका वितरण और औद्योगिक उपयोग निम्न प्रकार है
वितरण (Distribution)
राजस्थान में लिग्नाइट मुख्य रूप से तीन जिलों में कें द्रित है
बाड़मेर: कपूरड़ी, जालीपा, गिरल, शिव और भाड़का प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं।
बीकानेर: पलाना (यहाँ का लिग्नाइट सर्वश्रेष्ठ माना जाता है), बरसिंगसर, बिठनोक, हाड़ला और गुढ़ा।
नागौर: मेड़ता रोड, मातासुख, कसनाऊ और इग्यार प्रमुख क्षेत्र हैं।
औद्योगिक उपयोग (Industrial Uses)
ताप विद्युत संयंत्र: लिग्नाइट का सर्वाधिक उपयोग ताप विद्युत परियोजनाओं (जैसे- गिरल, बरसिंगसर और भादरेस) में बिजली उत्पादन के लिए
ईंधन के रूप में किया जाता है।
सीमेंट उद्योग: यहाँ की सीमेंट भट्टियों में ऊर्जा स्रोत के रूप में लिग्नाइट का प्रयोग होता है।
अन्य: ईंट भट्टों, रासायनिक उद्योगों और लघु इकाइयों में ऊष्मीय ऊर्जा प्राप्त करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है।
246 प्रश्न 2465 अंक
राजस्थान की 'एकीकृ त स्वच्छ ऊर्जा नीति 2024' की विवेचना कीजिए।
(Discuss the 'Integrated Clean Energy Policy - 2024' of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान की 'एकीकृ त स्वच्छ ऊर्जा नीति 2024' की विवेचना कीजिए।PDF पृष्ठ 123
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान सरकार द्वारा राज्य को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों में योगदान देने के उद्देश्य से 'एकीकृ त स्वच्छ
ऊर्जा नीति-2024' लागू की गई है। इस नीति की प्रमुख विवेचना निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत की जा सकती है
1. नीति का परिचय एवं संदर्भ
यह नीति राजस्थान को देश के 'स्वच्छ ऊर्जा कें द्र' (Clean Energy Hub) के रूप में स्थापित करने के विजन के साथ लाई गई है। इसका मुख्य
उद्देश्य पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता कम करना, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना और राज्य में निवेश के नए अवसरों को सृजित करना है।
2. प्रमुख लक्ष्य एवं क्षमता निर्धारण
कु ल लक्ष्य: राज्य ने वर्ष 2030 तक कु ल 100 गीगावाट (1,00,000 मेगावाट) स्वच्छ ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा
है।
विशिष्ट विभाजन: इस लक्ष्य के अंतर्गत लगभग 80,000 मेगावाट सौर ऊर्जा और 20,000 मेगावाट पवन एवं हाइब्रिड ऊर्जा की क्षमता
विकसित करने की योजना है।
यह लक्ष्य राजस्थान को ऊर्जा अधिशेष (Energy Surplus) राज्य बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
3. मुख्य प्रावधान एवं प्रोत्साहन
पम्प्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स (PSP): नीति में ऊर्जा भंडारण समाधानों, विशेषकर पम्प्ड स्टोरेज को प्राथमिकता दी गई है ताकि ग्रिड स्थिरता बनी
रहे।
ग्रीन हाइड्रोजन हब: राजस्थान को ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के अनुकू ल बनाने के लिए विशेष रियायतें और बुनियादी ढाँचा विकसित करने का
प्रावधान है।
हाइब्रिड सिस्टम: सौर और पवन ऊर्जा के संयुक्त (Hybrid) संयंत्रों को बढ़ावा दिया गया है ताकि भूमि का इष्टतम उपयोग हो सके ।
निवेशक अनुकू ल सुविधाएँ: निवेश को सरल बनाने हेतु 'सिंगल विंडो क्लीयरेंस' प्रणाली को सुदृढ़ किया गया है और स्टाम्प ड्यूटी तथा भूमि
आवंटन शुल्क में महत्वपूर्ण छू ट का प्रावधान है।
4. निष्कर्ष
एकीकृ त स्वच्छ ऊर्जा नीति-2024 राजस्थान के सतत विकास के लिए एक रोडमैप है। यह न के वल स्थानीय रोजगार के अवसर पैदा करेगी, बल्कि
वैश्विक 'नेट-जीरो' (Net-Zero) उत्सर्जन लक्ष्यों को प्राप्त करने में राजस्थान की भूमिका को निर्णायक बनाएगी।
247 प्रश्न 2475 अंक
राजस्थान में बायोमास परियोजनाओं का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
(Give a brief account of Biomass projects of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान में बायोमास परियोजनाओं का संक्षिप्त विवरण दीजिए।PDF पृष्ठ 124
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान में कृषि अवशेषों और वानस्पतिक संपदा की प्रचुरता के कारण बायोमास ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। राज्य में बायोमास परियोजनाओं
का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत दिया जा सकता है
1. उपलब्धता और क्षमता
राजस्थान में बायोमास से विद्युत उत्पादन की कु ल अनुमानित क्षमता लगभग 1000 मेगावाट (MW) से अधिक है। राज्य की कृषि प्रधान प्रकृति के
कारण यहाँ बायोमास ऊर्जा एक सतत स्रोत के रूप में उपलब्ध है। वर्तमान में राज्य में विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से लगभग 120-125 मेगावाट
क्षमता के बायोमास ऊर्जा संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं।
2. कच्चे माल के प्रमुख स्रोत
राज्य में बायोमास उत्पादन के लिए निम्नलिखित स्रोतों का उपयोग प्रमुखता से किया जाता है
सरसों की भूसी (Mustard Husk): राजस्थान देश का अग्रणी सरसों उत्पादक राज्य है, इसलिए सरसों की भूसी यहाँ बायोमास का सबसे
महत्वपूर्ण और प्राथमिक स्रोत है।
विलायती बबूल (जूलीफ्लोरा): पश्चिमी राजस्थान के बंजर क्षेत्रों में पाया जाने वाला यह पौधा ईंधन के रूप में प्रयुक्त होता है।
अन्य स्रोत: चावल की भूसी (Rice Husk), कपास के डंठल, ग्वार की तूड़ी और अन्य फसल अवशेष।
3. प्रमुख परियोजनाएं और संयंत्र
राज्य के विभिन्न जिलों में बायोमास आधारित विद्युत संयंत्र संचालित हैं, जिनमें से प्रमुख स्थान निम्नलिखित हैं
अलवर (खैरली): यहाँ सरसों की भूसी पर आधारित संयंत्र स्थापित है।
श्रीगंगानगर (पदमपुर): यहाँ चावल की भूसी और कृषि अवशेषों का उपयोग किया जाता है।
टोंक (देवली): सरसों की भूसी आधारित महत्वपूर्ण परियोजना।
जयपुर (कोटपूतली): औद्योगिक और कृषि अवशेषों पर आधारित संयंत्र।
अन्य जिले: कोटा, हनुमानगढ़, बारां (अंता) और धौलपुर में भी बायोमास परियोजनाओं का विस्तार हुआ है।
4. संस्थागत ढांचा और नीतिगत प्रयास
नोडल एजेंसी: राजस्थान में बायोमास और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए राजस्थान अक्षय ऊर्जा निगम लिमिटेड
(RRECL) प्रमुख नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करती है।
नीतिगत प्रोत्साहन: राज्य सरकार ने 'राजस्थान बायोमास नीति' के माध्यम से निवेश को प्रोत्साहित किया है। साथ ही, राजस्थान अक्षय ऊर्जा
नीति-2023 के तहत बायोमास को सौर ऊर्जा के साथ हाइब्रिड मॉडल के रूप में विकसित करने पर भी बल दिया जा रहा है।
इन परियोजनाओं से न के वल स्वच्छ ऊर्जा प्राप्त हो रही है, बल्कि किसानों को उनके कृषि अपशिष्ट का उचित मूल्य भी मिल रहा है, जिससे ग्रामीण
अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो रही है।
248 प्रश्न 24810 अंक
राजस्थान में गैर-परम्परागत ऊर्जा के विकास का विवरण दीजिए।
(Describe the development of non-conventional energy in Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान में गैर-परम्परागत ऊर्जा के विकास का विवरण दीजिए।PDF पृष्ठ 124
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति और प्रचुर प्राकृ तिक संसाधनों के कारण भारत में गैर-परम्परागत (अक्षय) ऊर्जा के विकास में एक अग्रणी
राज्य के रूप में उभरा है। गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत वे हैं जो प्रकृति में अक्षय हैं और पर्यावरण के अनुकू ल हैं।
1. भौगोलिक महत्व और परिचय
राजस्थान में गैर-परम्परागत ऊर्जा की अपार संभावनाओं के पीछे मुख्य कारण इसकी भौगोलिक स्थिति है
सौर विकिरण: राज्य में वर्ष में 325 से अधिक दिन तीव्र धूप रहती है और सौर विकिरण की तीव्रता (6-7 kWh/m²/day) देश में सर्वाधिक
है।
विशाल बंजर भूमि: थार मरुस्थल में सौर और पवन फार्मों की स्थापना के लिए प्रचुर मात्रा में अनुपयोगी भूमि उपलब्ध है।
पवन की गति: पश्चिमी राजस्थान के रेतीले धोरों में पवन ऊर्जा के लिए अनुकू ल वायु प्रवाह उपलब्ध है।
2. सौर ऊर्जा विकास और उपलब्धियाँ
सौर ऊर्जा राजस्थान के अक्षय ऊर्जा क्षेत्र का मुख्य आधार है
प्रथम स्थान: राजस्थान सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता (लगभग 19,000 मेगावाट से अधिक) के मामले में पूरे देश में प्रथम स्थान पर है।
प्रमुख सोलर पार्क
भादला सोलर पार्क (जोधपुर): यह 2245 मेगावाट क्षमता के साथ विश्व के सबसे बड़े सोलर पार्कों में से एक है।
फलोदी-पोकरण सोलर पार्क : 750 मेगावाट की क्षमता।
नोख सोलर पार्क (जैसलमेर): 925 मेगावाट की निर्माणाधीन परियोजना।
पीएम-कु सुम (PM-KUSUM) योजना: इस योजना के 'घटक-ए' के तहत सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने में राजस्थान देश में अग्रणी राज्य
है।
3. पवन, बायोमास एवं हाइब्रिड ऊर्जा स्रोत
पवन ऊर्जा: राजस्थान की कु ल पवन ऊर्जा स्थापित क्षमता लगभग 5,204 मेगावाट है। इसके प्रमुख कें द्र जैसलमेर, प्रतापगढ़, जोधपुर, बाड़मेर
और सीकर (हर्ष पर्वत) हैं। जैसलमेर को 'पंखों के शहर' के रूप में जाना जाता है।
बायोमास ऊर्जा: राज्य में सरसों की तूड़ी, चावल की भूसी और विलायती बबूल (जूलीफ्लोरा) बायोमास के मुख्य स्रोत हैं। पदमपुर (गंगानगर),
खातोली (कोटा) और चंदेरिया (चित्तौड़गढ़) में प्रमुख संयंत्र स्थित हैं।
हाइब्रिड ऊर्जा: सौर और पवन ऊर्जा के संयुक्त उपयोग को बढ़ावा देने के लिए हाइब्रिड परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिससे
ग्रिड स्थिरता सुनिश्चित होती है।
4. नीतिगत ढांचा और संस्थागत प्रयास
राज्य सरकार ने इस क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं
संस्थागत ढांचा: राजस्थान अक्षय ऊर्जा निगम लिमिटेड (RRECL) राज्य में नवीकरणीय ऊर्जा के विकास के लिए नोडल एजेंसी है।
प्रमुख नीतियां
राजस्थान सौर ऊर्जा नीति, 2019: इसका लक्ष्य 2024-25 तक 30,000 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का है।
राजस्थान पवन एवं हाइब्रिड ऊर्जा नीति, 2019: निवेशकों के लिए रियायती दरों पर भूमि आवंटन और स्टांप ड्यूटी में छू ट का प्रावधान।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर: पश्चिमी राजस्थान से उत्पादित बिजली को अन्य राज्यों तक पहुँचाने के लिए विशेष ट्रांसमिशन नेटवर्क विकसित किया गया
है।
निष्कर्ष
राजस्थान अपनी रणनीतिक नीतियों और प्राकृ तिक संसाधनों के बल पर "भारत के ऊर्जा हब" के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहा है। भविष्य में 90
गीगावाट (Vision 2030) के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में बढ़ते हुए राजस्थान न के वल ऊर्जा में आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि भारत के 2070
तक 'नेट जीरो' (Net Zero) उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी निर्णायक भूमिका निभाएगा।
249 प्रश्न 2492 अंक
राजस्थान में सौर ऊर्जा हेतु कौन सी उपयुक्त दशाएँ पायी जाती हैं?
(What are the suitable conditions prevailing in Rajasthan for solar energy?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान में सौर ऊर्जा हेतु कौन सी उपयुक्त दशाएँ पायी जाती हैं?PDF पृष्ठ 125
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान में सौर ऊर्जा के विकास के लिए निम्नलिखित अनुकू ल और उपयुक्त दशाएँ पाई जाती हैं
उच्च सौर विकिरण और साफ आकाश: राजस्थान में सौर विकिरण की तीव्रता भारत में सर्वाधिक (लगभग 6-7 kWh/m²/दिवस) है। यहाँ वर्ष
में लगभग 300 से 325 दिनों तक बादलरहित साफ आकाश रहता है, जिससे सूर्य के प्रकाश की निरंतर और प्रचुर उपलब्धता बनी रहती है।
विशाल बंजर भूमि की उपलब्धता: पश्चिमी राजस्थान, विशेष रूप से थार मरुस्थल में सौर संयंत्रों और बड़े सौर पार्कों की स्थापना के लिए विशाल
अनुपयोगी बंजर भूमि (Wasteland) उपलब्ध है।
अनुकू ल वातावरणीय कारक: यहाँ की जलवायु में आर्द्रता (Humidity) का स्तर बहुत कम रहता है, जो सौर फोटोवोल्टिक पैनलों की ऊर्जा
उत्पादन क्षमता और दक्षता को बढ़ाने में सहायक होता है।
विरल जनसंख्या घनत्व: मरुस्थलीय क्षेत्रों में जनसंख्या का कम घनत्व बड़े पैमाने पर परियोजनाओं के क्रियान्वयन को सुगम बनाता है।
250 प्रश्न 25020 अंक
ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोत कौन से हैं? राजस्थान के विशेष सन्दर्भ में किन्हीं दो गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों का वर्णन करें।
(What are non-conventional sources of energy? Describe any two with special reference to Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोत कौन से हैं? राजस्थान के विशेष सन्दर्भ में कPDF पृष्ठ 125
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उत्तर — सरल भाषा में
गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों की अवधारणा
गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत (Non-conventional sources of energy) वे ऊर्जा के स्रोत हैं जिनका उपयोग मानव ने हाल के वर्षों में व्यापक
रूप से करना शुरू किया है। इन्हें 'अक्षय ऊर्जा' या 'नवीकरणीय ऊर्जा' के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि ये स्रोत प्रकृति में असीमित मात्रा में
उपलब्ध हैं और निरंतर पुनर्जीवित होते रहते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ
अक्षय प्रकृति: ये स्रोत कभी समाप्त नहीं होते (जैसे सूर्य, वायु)।
पर्यावरण अनुकू लता: इनके उपयोग से कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण नगण्य होता है, जो ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में सहायक है।
स्थिरता: ये ऊर्जा सुरक्षा और दीर्घकालिक ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए टिकाऊ विकल्प हैं।
विविधता: इसमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोमास, भूतापीय ऊर्जा, और ज्वारीय ऊर्जा जैसे विभिन्न स्रोत शामिल हैं।
1. सौर ऊर्जा (राजस्थान के विशेष सन्दर्भ में)
राजस्थान अपनी भौगोलिक स्थिति और जलवायु के कारण भारत में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी राज्य है।
भौगोलिक उपयुक्तता: राजस्थान में वर्ष भर औसतन 300 से 325 दिन तेज धूप (Clear Skies) रहती है। यहाँ सौर विकिरण की तीव्रता
लगभग 5-7 kWh/sq.m/day है, जो देश में सर्वाधिक है। राज्य में विशाल बंजर भूमि उपलब्ध है, जो सोलर पैनल लगाने के लिए आदर्श है।
प्रमुख परियोजनाएँ
भड़ला सोलर पार्क (जोधपुर): यह विश्व का सबसे बड़ा सोलर पार्क है जिसकी कु ल क्षमता लगभग 2245 मेगावाट (MW) है।
अन्य पार्क : फलोदी-पोकरण सोलर पार्क , फतेहगढ़ सोलर पार्क और नोख सोलर पार्क (जैसलमेर)।
नीतिगत प्रयास: राज्य सरकार ने 'राजस्थान सौर ऊर्जा नीति-2019' लागू की है, जिसका लक्ष्य 2024-25 तक 30,000 मेगावाट सौर ऊर्जा
उत्पादन करना है।
वर्तमान स्थिति: राजस्थान वर्तमान में प्रस्थापित सौर ऊर्जा क्षमता (20 GW से अधिक) के मामले में भारत में प्रथम स्थान पर है। यहाँ 'कु सुम
योजना' के तहत किसानों को सौर पंप भी प्रदान किए जा रहे हैं।
2. पवन ऊर्जा (राजस्थान के विशेष सन्दर्भ में)
राजस्थान में पवन ऊर्जा के विकास की भी अत्यधिक संभावनाएँ हैं, विशेषकर पश्चिमी रेतीले क्षेत्रों में।
संभावित क्षेत्र: राजस्थान में पवन ऊर्जा के मुख्य कें द्र जैसलमेर, प्रतापगढ़, जोधपुर और बाड़मेर जिले हैं। जैसलमेर को इसकी उच्च क्षमता के
कारण 'पंखों का शहर' (City of Windmills) भी कहा जाता है।
सरकारी प्रयास एवं नीति: 'राजस्थान पवन और हाइब्रिड ऊर्जा नीति-2019' के माध्यम से पवन ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सरकार निवेशकों को सब्सिडी और भूमि आवंटन में रियायतें प्रदान करती है।
प्रमुख पवन ऊर्जा पार्क
जैसलमेर विंड पार्क (अमर सागर, बड़ा बाग़, सोडा-बन्धन)।
प्रतापगढ़ में देवगढ़ पवन ऊर्जा परियोजना।
जोधपुर में फलोदी क्षेत्र।
चुनौतियाँ और विकास: यद्यपि पवन की गति में मौसमी उतार-चढ़ाव एक चुनौती है, लेकिन हाइब्रिड मॉडल (पवन + सौर) अपनाकर इस
समस्या का समाधान किया जा रहा है। राजस्थान पवन ऊर्जा उत्पादन में देश के शीर्ष पाँच राज्यों में शामिल है।
तथ्यात्मक विवरण एवं निष्कर्ष
राजस्थान सरकार की 'राजस्थान अक्षय ऊर्जा निगम लिमिटेड' (RRECL) इन गैर-परम्परागत स्रोतों के विकास के लिए नोडल एजेंसी के रूप में कार्य
कर रही है। राज्य न के वल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की ओर अग्रसर है, बल्कि 'ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर' के माध्यम से अन्य राज्यों को भी
बिजली निर्यात करने की क्षमता रखता है। इन स्रोतों का विकास राजस्थान की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ पर्यावरणीय संरक्षण के लिए भी मील का
पत्थर साबित हो रहा है।
251 प्रश्न 2515 अंक
राजस्थान में सौर ऊर्जा की विपुल सम्भावनायें हैं। समझाइये।
(Rajasthan has immense potential of solar energy. Explain.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान में सौर ऊर्जा की विपुल सम्भावनायें हैं। समझाइये।PDF पृष्ठ 126
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान अपनी विशिष्ट भौगोलिक अवस्थिति और प्राकृ तिक संसाधनों के कारण भारत में सौर ऊर्जा के सबसे बड़े कें द्र के रूप में उभरा है। यहाँ सौर
ऊर्जा की विपुल संभावनाओं के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
1. भौगोलिक एवं प्राकृ तिक अनुकू लता
राजस्थान में वर्ष भर में लगभग 325 से अधिक दिन बादलरहित (आसमान साफ) रहते हैं, जो सौर ऊर्जा संग्रहण के लिए आदर्श हैं।
यहाँ सौर विकिरण (Insolation) की तीव्रता भारत में सर्वाधिक है, जो लगभग 6 से 7 kWh/वर्ग मीटर/प्रतिदिन है।
शुष्क जलवायु और उच्च तापमान यहाँ सौर पैनलों की कार्यक्षमता को बढ़ाने में सहायक होते हैं।
2. भूमि की प्रचुर उपलब्धता
राज्य के पश्चिमी भाग (थार मरुस्थल) में विशाल बंजर और अनुपयोगी भूमि उपलब्ध है।
कम जनसंख्या घनत्व के कारण बड़े पैमाने पर सौर पार्कों की स्थापना के लिए सस्ती और निर्बाध भूमि आसानी से मिल जाती है।
3. नीतिगत प्रोत्साहन एवं वर्तमान स्थिति
राजस्थान सौर ऊर्जा नीति-2019 के माध्यम से सरकार ने निवेश के लिए अनुकू ल वातावरण तैयार किया है, जिसमें कर छू ट और सिंगल विंडो
क्लीयरेंस जैसी सुविधाएँ शामिल हैं।
वर्तमान में राजस्थान स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता में देश में प्रथम स्थान पर है। जोधपुर स्थित भादला सोलर पार्क विश्व के सबसे बड़े सौर पार्कों में
से एक है।
भविष्य में यहाँ सौर-पवन हाइब्रिड ऊर्जा परियोजनाओं की भी व्यापक संभावनाएँ हैं, जिससे राज्य 'ग्रीन एनर्जी हब' बन सकता है।
252 प्रश्न 2525 अंक
पुनःनवीनीकृ त ऊर्जा तथा राजस्थान के आर्थिक विकास में इसकी भूमिका पर एक टिप्पणी लिखें।
(Write a note on Renewable Energy and its role in economic development of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानपुनःनवीनीकृ त ऊर्जा तथा राजस्थान के आर्थिक विकास में इसकी भूमिका पर एक टPDF पृष्ठ 127
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उत्तर — सरल भाषा में
पुनःनवीनीकृ त ऊर्जा और राजस्थान का आर्थिक विकास
पुनःनवीनीकृ त (अक्षय) ऊर्जा वे ऊर्जा स्रोत हैं जो प्राकृ तिक रूप से पुनर्भरण योग्य होते हैं, जैसे सौर, पवन और बायोमास ऊर्जा। राजस्थान अपनी
विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भारत का 'अक्षय ऊर्जा हब' बनकर उभरा है।
राजस्थान में क्षमता और भौगोलिक उपयुक्तता
सौर ऊर्जा: राजस्थान में प्रति वर्ष 325 से अधिक धूप वाले दिन और उच्च सौर विकिरण (6.0-7.0 kWh/m²) उपलब्ध है। राज्य की विशाल
अनुपयोगी बंजर भूमि (थार मरुस्थल) सौर संयंत्रों के लिए आदर्श है। जोधपुर का भादला सोलर पार्क इसका प्रमुख उदाहरण है।
पवन ऊर्जा: जैसलमेर, बाड़मेर और प्रतापगढ़ जैसे जिलों में उच्च पवन वेग उपलब्ध है, जो पवन चक्कियों के लिए अनुकू ल है।
बायोमास: कृषि अवशेषों (जैसे सरसों की तूड़ी) की प्रचुरता के कारण बायोमास ऊर्जा की भी यहाँ अच्छी संभावना है।
आर्थिक विकास में भूमिका
(क) भारी निवेश का आकर्षण: 'राजस्थान सौर ऊर्जा नीति, 2019' और अनुकू ल निवेश वातावरण के कारण राज्य ने रिलायंस, अडानी और ग्रीनको
जैसे बड़े औद्योगिक समूहों से अरबों रुपये का निजी निवेश और एफडीआई (FDI) आकर्षित किया है।
(ख) रोजगार के अवसर: इन परियोजनाओं के निर्माण, संचालन और रखरखाव में स्थानीय स्तर पर तकनीकी और गैर-तकनीकी कौशल वाले हज़ारों
युवाओं को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार मिला है।
(ग) राज्य राजस्व में वृद्धि: बंजर भूमि के उपयोग के बदले मिलने वाले पट्टा शुल्क (Lease money), उपकर (Cess) और अन्य करों से राज्य
सरकार के खजाने में वृद्धि हुई है।
(घ) ऊर्जा आत्मनिर्भरता और औद्योगिक विकास: सौर और पवन ऊर्जा के माध्यम से राज्य बिजली के क्षेत्र में न के वल आत्मनिर्भर बन रहा है, बल्कि
उद्योगों को सस्ती और निर्बाध बिजली उपलब्ध होने से विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector) को भी गति मिल रही है।
(ङ) ग्रामीण विकास: विकें द्रीकृ त सौर ऊर्जा परियोजनाओं (जैसे कु सुम योजना) से किसानों की आय में वृद्धि हुई है और ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की
गुणवत्ता में सुधार हुआ है।
अतः, अक्षय ऊर्जा न के वल राजस्थान की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर रही है, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को एक 'हरित अर्थव्यवस्था' (Green
Economy) के रूप में रूपांतरित कर रही है।
253 प्रश्न 2535 अंक
राजस्थान के दिए गए रेखा-मानचित्र पर संरक्षित क्षेत्रों को चिह्नित कीजिए: (A) सोरसन (B) आखरगाँव (C) गोगेलाव (D) जोड़ बीड़ गाडावाला
(Mark Conservation Reserves on map of Rajasthan: Sorsan, Akhargaon, Gogelav, Jod Beed Goadwale.)
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उत्तर — सरल भाषा में
राजस्थान के विभिन्न जिलों में स्थित इन संरक्षित क्षेत्रों (Conservation Reserves) की सही भौगोलिक स्थिति और उनके संबंधित जिले नीचे दिए
गए हैं। मानचित्र पर इनका अंकन करते समय इन जिलों की सीमाओं का ध्यान रखना आवश्यक है
संरक्षित क्षेत्रों की सूची और संबंधित जिले
(A) सोरसन (Sorsan): यह संरक्षित क्षेत्र राजस्थान के बारां जिले में स्थित है। यह मुख्य रूप से गोडावण (Great Indian Bustard) के
संरक्षण के लिए जाना जाता है। मानचित्र पर इसे राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग (हाड़ौती क्षेत्र) में बारां जिले की सीमा के भीतर चिह्नित किया
जाना चाहिए।
(B) आखरगाँव (Akhargaon): यह संरक्षित क्षेत्र राजस्थान के बूंदी जिले में स्थित है। मानचित्र पर इसकी स्थिति बारां के पश्चिम में और
कोटा के उत्तर में बूंदी जिले के अंतर्गत दर्शाई जानी चाहिए।
(C) गोगेलाव (Gogelav): यह संरक्षित क्षेत्र राजस्थान के नागौर जिले में स्थित है। भौगोलिक रूप से यह राजस्थान के मध्य भाग में स्थित है।
मानचित्र पर इसे नागौर जिले के मध्यवर्ती क्षेत्र में चिह्नित करें।
(D) जोड़ बीड़ गाडावाला (Jod Beed Goadwale): यह राजस्थान के बीकानेर जिले में स्थित है। यह क्षेत्र विशेष रूप से गिद्धों
(Vultures) के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है। मानचित्र पर इसे राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी मरुस्थलीय भाग में बीकानेर जिले के भीतर चिह्नित
किया जाना चाहिए।
राजस्थान के मानचित्र पर इन चारों स्थानों का सही अंकन निम्न प्रकार है
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254 प्रश्न 25410 अंक
भू-धरोहर स्थल (Geo-heritage site) की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए तथा राजस्थान में इसकी संभाव्यता पर प्रकाश डालिए।
(Explain the concept of Geo-heritage and highlight its potentialities in Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानभू-धरोहर स्थल की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए तथा राजस्थान में इसकी संभाव्यताPDF पृष्ठ 128
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उत्तर — सरल भाषा में
भू-धरोहर (Geo-heritage) की अवधारणा
भू-धरोहर से तात्पर्य उन भूवैज्ञानिक स्थलों, संरचनाओं या क्षेत्रों से है जिनका वैज्ञानिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक या सौंदर्य की दृष्टि से
असाधारण महत्व होता है। यह अवधारणा निम्नलिखित बिंदुओं पर आधारित है
पृथ्वी के इतिहास का दस्तावेजीकरण: ये स्थल पृथ्वी के अरबों वर्षों के विकास, विवर्तनिक गतिविधियों (Tectonic activities) और जलवायु
परिवर्तन के प्रत्यक्ष प्रमाण होते हैं।
वैज्ञानिक और शैक्षिक मूल्य: ये भू-वैज्ञानिकों को पृथ्वी की आंतरिक संरचना और बाहरी प्रक्रियाओं को समझने के लिए प्रयोगशाला के रूप में
अवसर प्रदान करते हैं।
जैव-विविधता से संबंध: कई भू-धरोहर स्थल विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र का आधार होते हैं, जहाँ दुर्लभ जीवाश्म या खनिज पाए जाते हैं।
अक्षय विरासत: ये स्थल गैर-नवीकरणीय संसाधन हैं, जिनका संरक्षण भावी पीढ़ियों के लिए पृथ्वी के क्रमिक विकास को समझने हेतु आवश्यक
है।
राजस्थान की भूवैज्ञानिक विशिष्टता
राजस्थान को विश्व स्तर पर 'भू-वैज्ञानिकों का स्वर्ग' (Geologists' Paradise) माना जाता है। इसकी विशिष्टता के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं
प्राचीनतम संरचनाएँ: यहाँ विश्व की सबसे प्राचीन वलित पर्वत श्रृंखला 'अरावली' स्थित है, जो प्री-कै म्ब्रियन काल की भूवैज्ञानिक हलचलों का
परिणाम है।
विविध खनिज संपदा: राजस्थान खनिजों का अजायबघर है, जहाँ बेसाल्ट, ग्रेनाइट, सैंडस्टोन और संगमरमर जैसी चट्टानों के साथ-साथ विविध
धात्विक खनिज मिलते हैं।
जीवाश्मों की उपलब्धता: यहाँ मरुस्थलीय क्षेत्रों में करोड़ों वर्ष पुराने समुद्री जीवाश्मों और वनस्पतियों के अवशेष मिलते हैं, जो इस क्षेत्र के पुरा-
जलवायु इतिहास को दर्शाते हैं।
विविध भू-आकृ तियाँ: यहाँ ज्वालामुखी गतिविधियों (जैसे जोधपुर वेल्डेड टफ) से लेकर उल्कापिंड के प्रभाव (रामगढ़ क्रे टर) तक के प्रमाण
मिलते हैं।
राजस्थान के प्रमुख भू-धरोहर स्थल और उनकी संभाव्यता
राजस्थान में वर्तमान में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) द्वारा कई स्थलों को राष्ट्रीय भू-धरोहर स्मारक के रूप में पहचाना गया है
(क) रामगढ़ क्रे टर (बारां): यह एक उल्कापिंड प्रभाव संरचना है। इसे विश्व का 200वां 'क्रे टर' घोषित किया गया है। यह भू-पर्यटन और ब्रह्मांडीय
अनुसंधान की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(ख) आकल वुड फॉसिल पार्क (जैसलमेर): यहाँ जुरासिक काल (लगभग 18 करोड़ वर्ष पुराने) के जीवाश्म लकड़ी के अवशेष मिलते हैं। यह थार
मरुस्थल की प्राचीन हरियाली और पुरा-जलवायु का साक्षात प्रमाण है।
(ग) सेंदड़ा ग्रेनाइट (पाली): यहाँ ग्रेनाइट की चट्टानों पर पवन अपरदन के कारण विचित्र और कलात्मक आकृ तियाँ (जैसे सांप, मेंढक आदि की
आकृ ति) बनी हुई हैं, जो इसे एक प्राकृ तिक मूर्तिशिल्प स्थल बनाती हैं।
(घ) भोजुंडा स्ट्रोमेटोलाइट पार्क (चित्तौड़गढ़): यहाँ प्री-कै म्ब्रियन काल की शैवाल संरचनाएँ (Algal structures) चट्टानों में संरक्षित हैं, जो जीवन
की प्रारंभिक उत्पत्ति को समझने में सहायक हैं।
(ङ) जोधपुर वेल्डेड टफ (मालानी आग्नेय चट्टानें): यह जोधपुर के मेहरानगढ़ किले के पास स्थित है, जो प्राचीन ज्वालामुखी गतिविधि का परिणाम है।
(च) झामर कोटरा स्ट्रोमेटोलाइट पार्क (उदयपुर): यहाँ फॉस्फे ट निक्षेपों के साथ जुड़ी प्राचीन जैविक संरचनाएं मिलती हैं।
संभाव्यता और निष्कर्ष
राजस्थान में भू-धरोहरों के संरक्षण और विकास से भू-पर्यटन (Geo-tourism) को बढ़ावा मिल सकता है। इससे न के वल स्थानीय स्तर पर रोजगार
के अवसर पैदा होंगे, बल्कि वैश्विक स्तर पर राजस्थान की पहचान एक शैक्षिक कें द्र के रूप में भी बनेगी। इन स्थलों का उचित प्रबंधन, बुनियादी ढांचे
का विकास और जन-जागरूकता राजस्थान को वैश्विक 'जियो-पार्क ' मानचित्र पर स्थापित कर सकती है। भविष्य में, यूनेस्को (UNESCO) ग्लोबल
जियोपार्क की मान्यता प्राप्त करने की दिशा में राजस्थान में अपार संभावनाएं मौजूद हैं।
255 प्रश्न 2555 अंक
राजस्थान के 'पवित्र उपवन' (Sacred Groves) स्थलों का वर्णन कीजिए।
(Explain 'Sacred Groves' of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान के 'पवित्र उपवन' स्थलों का वर्णन कीजिए।PDF पृष्ठ 129
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राजस्थान में 'पवित्र उपवन' (Sacred Groves) सदियों पुरानी सामुदायिक संरक्षण की एक अनूठी परंपरा है। इनका विस्तृत विवरण निम्नलिखित
है
अवधारणा एवं परिभाषा
राजस्थान के संदर्भ में 'पवित्र उपवन' वे प्राकृ तिक वन क्षेत्र हैं, जिन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा अपने धार्मिक विश्वास और श्रद्धा के कारण संरक्षित किया
गया है। ये क्षेत्र किसी विशिष्ट देवी-देवता, लोक देवता या संतों (जैसे- पाबूजी, रामदेवजी, गोगाजी, या स्थानीय कु लदेवी) को समर्पित होते हैं। इन
स्थलों पर सामुदायिक प्रबंधन होता है और यहाँ से हरे वृक्षों को काटना या वन्यजीवों का शिकार करना धार्मिक रूप से वर्जित (पाप) माना जाता है।
सांस्कृतिक एवं पारिस्थितिक महत्व
सांस्कृतिक महत्व: ये स्थल लोक संस्कृ ति और परंपराओं के कें द्र हैं। यहाँ लगने वाले मेले और धार्मिक अनुष्ठान स्थानीय समुदाय को प्रकृति से
जोड़ते हैं। "खेजड़ी" और "पीपल" जैसे वृक्षों को पूजनीय मानकर उनकी रक्षा करना यहाँ की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है।
पारिस्थितिक महत्व: ये क्षेत्र 'जैव-विविधता के हॉटस्पॉट' के रूप में कार्य करते हैं, जहाँ स्थानीय वनस्पतियों और दुर्लभ जीव-जंतुओं को
सुरक्षित आवास मिलता है। ये मृदा अपरदन को रोकते हैं, मरुस्थलीकरण के प्रभाव को कम करते हैं और भू-जल पुनर्भरण (Groundwater
recharge) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि इनके पास अक्सर पारंपरिक जल स्रोत (नाडी या तालाब) स्थित होते हैं।
स्थानीय शब्दावली एवं प्रमुख उदाहरण
राजस्थान के विभिन्न अंचलों में इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है
ओरण (Oran): मुख्य रूप से पश्चिमी राजस्थान (जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर) में प्रचलित। उदाहरण- भादरिया राय ओरण (जैसलमेर) और
देगराय माता ओरण।
बणी या देव-बणी (Bani): अलवर और मेवात क्षेत्र में।
बीड़ (Beed): शेखावाटी क्षेत्र (सीकर, झुंझुनूं) में घास के मैदानों या चारागाहों के लिए प्रसिद्ध।
अन्य नाम: कं कड़, माल, जोगमाया, देव-वन आदि।
ये पवित्र उपवन राजस्थान में पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने और स्व-प्रेरित सामुदायिक संरक्षण के सर्वश्रेष्ठ जीवंत उदाहरण हैं।
256 प्रश्न 2565 अंक
राजस्थान के दक्षिणी अरावली प्रदेश की प्रमुख संकटग्रस्त वन्यजीव प्रजातियों के नाम लिखिए। वन्यजीव हानि के मुख्य कारण क्या हैं?
(Name major endangered species in Southern Aravalli. What are reasons for wildlife loss?)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान के दक्षिणी अरावली प्रदेश की प्रमुख संकटग्रस्त वन्यजीव प्रजातियोPDF पृष्ठ 129
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राजस्थान का दक्षिणी अरावली प्रदेश (मुख्यतः सिरोही, उदयपुर, राजसमंद और चित्तौड़गढ़ जिले) जैव-विविधता की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है, किंतु
वर्तमान में मानवीय हस्तक्षेप के कारण यहाँ की कई प्रजातियाँ संकट में हैं।
दक्षिणी अरावली की प्रमुख संकटग्रस्त वन्यजीव प्रजातियाँ
दक्षिणी अरावली के प्रमुख क्षेत्रों जैसे माउंट आबू, कुं भलगढ़ और सीतामाता अभयारण्य में निम्नलिखित संकटग्रस्त प्रजातियाँ पाई जाती हैं
स्लॉथ बियर (रीछ): विशेष रूप से माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य में पाए जाने वाले रीछ आवास विनाश के कारण संकट में हैं।
उड़न गिलहरी (Flying Squirrel): यह सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य की एक विशिष्ट और दुर्लभ प्रजाति है।
चौसिंगा (Four-horned Antelope): जिसे स्थानीय भाषा में 'भेंडेल' कहा जाता है, यह भी इस क्षेत्र की संकटग्रस्त प्रजाति है।
बघेरा (Panther/Leopard): कुं भलगढ़ और जवाई क्षेत्र में निवास करने वाले बघेरे अवैध शिकार और आवास की कमी का सामना कर रहे
हैं।
धूसर जंगली मुर्गा (Grey Jungle Fowl): यह मुख्य रूप से माउंट आबू के ऊँ चे पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है।
वन्यजीव हानि के मुख्य कारण
दक्षिणी अरावली क्षेत्र में वन्यजीवों की संख्या में निरंतर गिरावट के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं
(क) अनियंत्रित खनन: अरावली पहाड़ियों में पत्थरों और खनिजों के लिए होने वाले व्यापक खनन ने वन्यजीवों के प्राकृ तिक आवासों को नष्ट कर दिया
है और उनके गलियारों (corridors) को बाधित किया है।
(ख) वनों की अवैध कटाई: जलाऊ लकड़ी और व्यावसायिक उपयोग के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई से वन्यजीवों का आश्रय स्थल खत्म हो रहा है।
(ग) अवैध शिकार (पोचिंग): वन्यजीवों के अंगों, खाल और मांस के लिए होने वाला अवैध शिकार उनकी संख्या में कमी का एक बड़ा कारण है।
(घ) दावानल (जंगल की आग): गर्मियों के दौरान अरावली के शुष्क वनों में लगने वाली आग से छोटे जीव, पक्षी और वनस्पतियाँ भारी मात्रा में नष्ट हो
जाते हैं।
(ङ) कृषि भूमि का विस्तार: जनसंख्या वृद्धि के कारण वन भूमि का अतिक्रमण कर उसे कृषि भूमि में बदला जा रहा है, जिससे 'मानव-वन्यजीव
संघर्ष' बढ़ गया है।
(च) पारिस्थितिक असंतुलन: जल स्रोतों का सूखना और बाहरी प्रजातियों (जैसे लैंटाना) का प्रसार भी स्थानीय जैव-विविधता के लिए खतरा बन गया
है।
257 प्रश्न 2572 अंक
राजस्थान के कोई आठ संरक्षित क्षेत्रों (Conservation Reserves) के नाम लिखिए।
(Name any eight conservation reserves of Rajasthan.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानराजस्थान के कोई आठ संरक्षित क्षेत्रों के नाम लिखिए।PDF पृष्ठ 130
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राजस्थान के आठ प्रमुख संरक्षित क्षेत्रों (Conservation Reserves) के नाम निम्नलिखित हैं
(क) बीसलपुर (टोंक)
(ख) जोहड़बीड (बीकानेर)
(ग) सुंधा माता (जालौर-सिरोही)
(घ) गुढ़ा विश्नोइयान (जोधपुर)
(ङ) शाकं भरी (सीकर-झुंझुनू)
(च) गोगेलाव (नागौर)
(छ) बीड़ (झुंझुनू)
(ज) रोटू (नागौर)
मूल्यांकन के मुख्य बिंदु
राजस्थान में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत कई संरक्षित क्षेत्र घोषित किए गए हैं।
उपरोक्त सूची में पहले चार नाम (1-4) और अगले चार नाम (5-8) सभी राजस्थान सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से अधिसूचित संरक्षित क्षेत्र
हैं।
प्रत्येक सही समूह (चार-चार के समूह) के लिए 1.0 अंक निर्धारित है।
258 प्रश्न 2585 अंक
जैव-विविधता क्या है? किसी पारिस्थितिक तंत्र में इसके प्रसार व संवर्धन के लिए उपयोगी तकनीकों के नाम उपयुक्त उदाहरणों सहित लिखें।
(What is Biodiversity? Name technologies for propagation and conservation.)
पृथ्वी विज्ञान / भूगोल एवं भू-विज्ञानजैव-विविधता क्या है? किसी पारिस्थितिक तंत्र में इसके प्रसार व संवर्धन केPDF पृष्ठ 130
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जैव-विविधता (Biodiversity)
जैव-विविधता से तात्पर्य पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों के बीच विद्यमान विविधता और परिवर्तनशीलता से है। यह जीवों के भीतर आनुवंशिक
(Genetic), विभिन्न प्रजातियों (Species) और उनके पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) के स्तर पर जीवन के विभिन्न रूपों की बहुलता और
उनकी जटिलता को प्रदर्शित करती है।
पारिस्थितिक तंत्र में इसके प्रसार व संवर्धन के लिए उपयोगी तकनीकें एवं उदाहरण
(क) ऊतक संवर्धन (Tissue Culture)
(i) यह तकनीक पौधों के प्रसार के लिए अत्यंत उपयोगी है, जिसमें पौधे के किसी छोटे भाग (एक्सप्लांट) से प्रयोगशाला की नियंत्रित
स्थितियों में नए पौधों को उगाया जाता है।
(ii) उदाहरण: संकटग्रस्त औषधीय पौधों या दुर्लभ ऑर्किड (Orchids) का तेजी से प्रसार करना।
(ख) क्रायोप्रिजर्वेशन (Cryopreservation)
(i) इसमें जीवित कोशिकाओं, ऊतकों या युग्मकों को बहुत कम तापमान (-196°C पर तरल नाइट्रोजन में) पर संरक्षित किया जाता है ताकि
उनकी जैविक गतिविधि रुक जाए और वे भविष्य के लिए सुरक्षित रहें।
(ii) उदाहरण: विलुप्तप्राय वन्यजीवों के शुक्राणु और अंडों (Gametes) का संरक्षण।
(ग) जीन बैंक और बीज बैंक (Gene and Seed Banks)
(i) विभिन्न प्रजातियों के आनुवंशिक पदार्थों (DNA) और बीजों को एक नियंत्रित वातावरण में लंबी अवधि के लिए भंडारित किया जाता है।
(ii) उदाहरण: भारत में राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) द्वारा विभिन्न फसल किस्मों के बीजों का भंडारण।
(घ) जीआईएस और रिमोट सेंसिंग (GIS and Remote Sensing)
(i) इन तकनीकों का उपयोग जैव-विविधता वाले क्षेत्रों (Hotspots) की निगरानी, आवास मानचित्रण और पारिस्थितिक तंत्र में हो रहे
परिवर्तनों का विश्लेषण करने के लिए किया जाता है।
(ii) उदाहरण: उपग्रह चित्रों के माध्यम से वनों के कटाव और वन्यजीव गलियारों (Wildlife Corridors) की मैपिंग करना।