कल्पना कीजिए — आप राजस्थान की यात्रा पर निकले हैं। सुबह आप माउंट आबू की ठंडी पहाड़ियों में दिलवाड़ा के जैन मंदिर में खड़े हैं, जहाँ संगमरमर इतना बारीक तराशा गया है कि वह कपड़े जैसा पारदर्शी लगता है। दोपहर होते-होते आप चित्तौड़गढ़ के विशाल दुर्ग की प्राचीर पर हैं, जहाँ हर पत्थर में जौहर और शौर्य की कहानी दफ़न है। शाम को आप जयपुर के हवा महल के सामने खड़े हैं, जहाँ 953 झरोखों से राजपरिवार की स्त्रियाँ कभी बिना दिखे शहर का जीवन देखा करती थीं। और रात होते-होते आप शेखावाटी की किसी हवेली की दीवार पर बनी रंग-बिरंगी चित्रकारी में खो जाते हैं। यही है राजस्थान की वास्तुकला — मंदिर जो आस्था बोलते हैं, दुर्ग जो शौर्य की गवाही देते हैं, महल जो वैभव दिखाते हैं, और हवेलियाँ जो व्यापार व कला के संगम की कहानी सुनाती हैं। इस अध्याय में हम इन चारों को क्रमबद्ध, गहराई से और सरल भाषा में समझेंगे — ताकि हर मंदिर, हर दुर्ग, हर महल आपके दिमाग में एक तस्वीर की तरह बस जाए।
"राजपूताना में शायद ही कोई छोटी रियासत हो जिसका अपना "थर्मोपाइले" न हो, और शायद ही कोई नगर हो जिसने अपना "लियोनिदास" पैदा न किया हो।" — कर्नल जेम्स टॉड, "Annals and Antiquities of Rajasthan"
भारत में मंदिर निर्माण की परंपरा का सुव्यवस्थित विकास गुप्तकाल (चौथी-छठी शताब्दी ईस्वी) में हुआ। प्रारंभिक चरण में मंदिर लकड़ी और ईंट जैसी नाशवान सामग्रियों से बनाए जाते थे, किंतु कालांतर में पत्थर एवं बलुआ पत्थर जैसी टिकाऊ सामग्री का प्रयोग बढ़ता गया, जिससे मंदिर स्थायी स्मारकों का रूप लेने लगे। राजस्थान में जो मंदिर मिलते हैं, उनकी एक निश्चित संरचना (structure) होती है — मानो हर मंदिर एक ही खाके पर बना हो, बस आकार और सजावट में अंतर हो।
A. मंदिर के प्रमुख भाग (Parts of a Temple)
तोरण द्वार मुख्य गेट जैसा है, सभा मंडप बैठक कक्ष (drawing room) जैसा जहाँ सब इकट्ठा होते हैं, और गर्भगृह घर के सबसे भीतरी, सबसे निजी कक्ष जैसा — जहाँ केवल परिवार का सबसे सम्मानित सदस्य (यहाँ देवता) विराजते हैं। ऊपर बना शिखर मानो घर की छत पर सजा हुआ मुकुट है, और प्रदक्षिणा पथ वह गलियारा है जो पूरे घर का चक्कर लगाकर वापस दरवाज़े तक ले आता है। एक बार यह ढांचा समझ लें, तो आगे कोई भी मंदिर पढ़ते समय आप उसकी बनावट को तुरंत पहचान पाएंगे।
भारतीय मंदिर स्थापत्य को सामान्यतः तीन प्रमुख शैलियों में वर्गीकृत किया जाता है — नागर शैली (उत्तर भारत), द्राविड़ शैली (दक्षिण भारत) और बेसर शैली (इन दोनों का मिश्रण, मध्य भारत)। राजस्थान मुख्यतः नागर शैली के प्रभाव क्षेत्र में आता है, परंतु पुष्कर के रंगनाथ जी मंदिर जैसे कुछ अपवाद द्राविड़ शैली में भी बने हैं।
| बिंदु | नागर शैली (Nagara) | द्राविड़ शैली (Dravida) | बेसर शैली (Vesara) |
|---|---|---|---|
| क्षेत्र | हिमालय से विंध्याचल (उत्तर भारत) | कृष्णा नदी से कन्याकुमारी (दक्षिण भारत) | विंध्याचल से कृष्णा नदी (मध्य भारत) |
| मूल स्वरूप | उत्तर भारतीय शैली | दक्षिण भारतीय शैली | नागर + द्राविड़ का मिश्रण |
| शिखर | वक्राकार (curvilinear) | पिरामिड आकार | मिश्रित व संतुलित |
| गर्भगृह | चौकोर | विशाल प्रांगण के साथ | कॉम्पैक्ट संरचना |
| प्रमुख विशेषता | सूक्ष्म नक्काशी | विशाल परिसर, गोपुरम (प्रवेश मीनार) | सरल व संतुलित डिज़ाइन |
| भारत में सबसे प्राचीन उदाहरण | भीतरगांव विष्णु मंदिर (उत्तर प्रदेश) | लाडखान मंदिर, ऐहोल (कर्नाटक) | मीनाक्षी मंदिर (मदुरै), बृहदेश्वर मंदिर (तंजावुर) |
| राजस्थान में उदाहरण | सोमेश्वर मंदिर (किराड़ू), अंबिका मंदिर (जगत), दधिमाता मंदिर (नागौर), ओसियां मंदिर समूह | रंगनाथ जी मंदिर, पुष्कर (अजमेर) — अपने गोपुरम के लिए प्रसिद्ध | — |
राजस्थान में मंदिर निर्माण की परंपरा कई शताब्दियों में चरणबद्ध ढंग से विकसित हुई। हर कालखंड की अपनी विशेष शैली और अपने विशिष्ट मंदिर रहे हैं। नीचे दी गई तालिका इस पूरे विकासक्रम को एक नज़र में दिखाती है —
| कालखंड | शैली/विकास | प्रमुख मंदिर |
|---|---|---|
| 300 ईपू. – 300 ई. (मौर्य से गुप्तकाल प्रारंभ) | इस काल के मंदिर स्थापत्य के केवल अवशेष ही मिलते हैं | — |
| 7वीं – 10वीं शताब्दी | मंदिर स्थापत्य का विकास काल — राजस्थान में मंदिर निर्माण के स्पष्ट प्रमाण मिलने लगते हैं | बाड़ौली का मंदिर, नागदा का सास-बहू मंदिर, जगत का अंबिका मंदिर (ये गुर्जर-प्रतिहार शैली में होते हुए भी उस राजवंश द्वारा नहीं बनवाए गए) |
| 8वीं शताब्दी | क्षेत्रीय शैली का विकास — गुर्जर-प्रतिहार/महामारू शैली उदित होती है | ओसियां (सूर्य मंदिर, हरिहर मंदिर, महावीर जैन मंदिर, सच्चियाय माता मंदिर), आभानेरी (हर्षत माता मंदिर), चित्तौड़ (कालिका माता मंदिर), नागौर (दधिमाता मंदिर) |
| 10वीं – 11वीं शताब्दी | गुर्जर-प्रतिहार शैली अपने चरमोत्कर्ष पर, साथ ही सोलंकी शैली का उदय | नीलकंठेश्वर मंदिर (जसनगर, मेड़ता), हर्षनाथ मंदिर (सीकर), सोमेश्वर मंदिर किराड़ू (1016 ई. — गुर्जर-प्रतिहार शैली का अंतिम व सर्वश्रेष्ठ उदाहरण) |
| 11वीं – 13वीं शताब्दी | मंदिर स्थापत्य का स्वर्णकाल — सोलंकी व मारु-गुर्जर शैली | समिधेश्वर/त्रिभुवन नारायण मंदिर (चित्तौड़ दुर्ग), दिलवाड़ा जैन मंदिर समूह (माउंट आबू) |
| 13वीं शताब्दी के बाद | स्थापत्य में सामान्य गिरावट, बड़े मंदिरों का निर्माण घटा | जगदीश मंदिर (उदयपुर), एकलिंगजी मंदिर, केशोरायपाटन मंदिर, जगत शिरोमणि मंदिर (आमेर) |
| 16वीं शताब्दी के बाद | धार्मिक असहिष्णुता व विध्वंस की आशंका के कारण मंदिरों को हवेली जैसा सामान्य रूप दिया जाने लगा — हवेली-मंदिर स्थापत्य का विकास | अनेक हवेलीनुमा मंदिर, विशेषकर वल्लभ संप्रदाय के मंदिर (जैसे श्रीनाथजी मंदिर, नाथद्वारा) |
B. राजस्थान की प्रमुख मंदिर उप-शैलियाँ (Sub-styles)
राजस्थान के मंदिरों में गर्भगृह और सहायक देवालयों की व्यवस्था के आधार पर कुछ विशिष्ट उप-शैलियाँ विकसित हुईं। ये उप-शैलियाँ परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनके नाम व उदाहरण अक्सर पूछे जाते हैं।
| उप-शैली | विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| पंचायतन शैली | एक मुख्य देवालय (प्रायः विष्णु) + चार कोनों पर चार सहायक देवालय (सूर्य, शक्ति, शिव, गणेश) तथा एक परिक्रमा पथ | हरिहर मंदिर (ओसियां) — राजस्थान में इस शैली का प्रथम उदाहरण; भंडदेवरा (बारां), बूढ़ादीत मंदिर (कोटा), जगदीश मंदिर (उदयपुर), बाड़ोली मंदिर समूह (चित्तौड़) |
| भूमिज शैली | नागर शैली की ही एक उपशैली, जिसमें खुला प्रदक्षिणा पथ होता है | सेवाड़ी जैन मंदिर, पाली (1010-1020 ई. — राजस्थान का सबसे प्राचीन भूमिज शैली मंदिर), उंडेश्वर मंदिर (बिजोलिया), महानालेश्वर मंदिर (मेनाल), भंडदेवरा (रामगढ़) |
| एकायतन शैली | मंदिर में केवल एक ही मुख्य देवता होते हैं, कोई सहायक देवालय नहीं | विभिन्न एकदेवालय मंदिर |
| कच्छपघाट शैली | विशाल शिखर, मेरु-मंडोवर शैली के स्तंभ, घटपल्लव व पंचशाखा द्वार-सज्जा | शांतिनाथ जैन मंदिर व पद्मनाभ मंदिर (झालरापाटन) |
राजस्थान में सैकड़ों ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मंदिर हैं। नीचे पहले सबसे अधिक परीक्षा-प्रासंगिक मंदिरों की विस्तृत प्रोफाइल दी गई है, उसके बाद शेष मंदिरों को संभाग/जिलेवार तालिकाओं में व्यवस्थित किया गया है ताकि कुछ भी छूटे नहीं।
A. प्रमुख मंदिरों की विस्तृत प्रोफाइल
⏰ काल/निर्माता: 11वीं-13वीं शताब्दी, सोलंकी (चालुक्य) स्थापत्य काल
⭐ विशेषता: संगमरमर पर विश्व की सबसे बारीक नक्काशी के लिए प्रसिद्ध — इतनी महीन कि पत्थर कपड़े जैसा पारदर्शी प्रतीत होता है। पाँच मंदिरों का समूह है, जिनमें विमल वसाही (सबसे प्राचीन, 1031 ई., मंत्री विमल शाह द्वारा निर्मित, शिल्पी कीर्तिधर) और लूणवसाही (नेमिनाथ मंदिर, 1230 ई., वस्तुपाल-तेजपाल द्वारा, शिल्पी शोभनदेव) सबसे प्रसिद्ध हैं। कर्नल जेम्स टॉड ने इसे "ताजमहल के बाद सबसे श्रेष्ठ भवन" कहा था। ध्यान रहे — दिलवाड़ा मंदिर अभी UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल नहीं है, यह केवल राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित स्मारक है।
⏰ काल/निर्माता: 15वीं शताब्दी, महाराणा कुंभा के मंत्री धरणकशाह द्वारा, शिल्पी देपाक
⭐ विशेषता: मगही/मथाई नदी के किनारे स्थित यह मंदिर अपनी बेजोड़ स्तंभ-वास्तुकला के लिए विश्वप्रसिद्ध है — 24 मंडप, 84 शिखर, 1444 स्तंभ (जिनमें से कोई भी दो स्तंभ पूरी तरह एक-जैसे तराशे नहीं गए हैं), 426 खंभे, 89 गुंबद और 29 हॉल हैं। इसे "स्तंभों का वन" (महाकवि माघ), "खंभों का अजायबघर" तथा "त्रिलोक दीपक" जैसे नामों से भी जाना जाता है। मुख्य गर्भगृह में आदिनाथ की चौमुखी (चार दिशाओं में मुख वाली) प्रतिमा स्थापित है।
⏰ काल/निर्माता: 8वीं-12वीं शताब्दी, प्रतिहार वंश के संरक्षण में
⭐ विशेषता: जैन, वैष्णव व शाक्त — तीनों परंपराओं के मंदिरों का अनूठा समूह, महामारू शैली में निर्मित। सूर्य मंदिर, हरिहर मंदिर (विष्णु-शिव के संयुक्त रूप को समर्पित, राजस्थान में पंचायतन शैली का प्रथम उदाहरण), महावीर जैन मंदिर (8वीं सदी, प्रतिहार राजा वत्सराज द्वारा निर्मित — राजस्थान का अब तक का सबसे प्राचीन जैन मंदिर), तथा सच्चियाय माता मंदिर (शाक्त परंपरा का प्रमुख केंद्र) यहाँ स्थित हैं। इसे "राजस्थान का भुवनेश्वर" भी कहा जाता है।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण 734 ई. में बप्पा रावल द्वारा; वर्तमान स्वरूप महाराणा रायमल के समय
⭐ विशेषता: काले पत्थर से निर्मित चौमुखा (चार मुख वाला) शिवलिंग यहाँ प्रतिष्ठित है। मेवाड़ के शासक स्वयं को एकलिंगजी का "दीवान" (प्रतिनिधि शासक) मानते थे, और भगवान एकलिंगजी को ही मेवाड़ का वास्तविक शासक। परिसर में शैव धर्म के लकुलीश संप्रदाय के संस्थापक लकुलीश (शिव का 27वां अवतार माना गया) का मंदिर भी स्थित है।
⏰ काल/निर्माता: 8वीं-10वीं शताब्दी, प्रतिहार/गुहिल कालीन (महामारू शैली)
⭐ विशेषता: अपनी उत्कृष्ट कोटि की मूर्तिकला के कारण यह मंदिर "मेवाड़ का खजुराहो" कहलाता है। यह मातृदेवियों को समर्पित एक प्राचीन शक्तिपीठ है। मंदिर के शिल्प में नारी जीवन के नृत्य, श्रृंगार, क्रीड़ा व प्रेम जैसे भावों का अत्यंत सुंदर व सजीव अंकन मिलता है।
⏰ काल/निर्माता: बर्बरीक (श्रीकृष्ण के "श्याम" स्वरूप) को समर्पित
⭐ विशेषता: मान्यता है कि महाभारत युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने भीम-पौत्र बर्बरीक की शीश-दान की इच्छा परखकर उनका शीश दान में ले लिया था, इसीलिए बर्बरीक "शीश के दानी" के नाम से पूजे जाते हैं और श्याम जी कहलाते हैं। फाल्गुन माह में यहाँ विशाल लक्खी मेला भरता है, जिसमें भक्त गुलाब चढ़ाने की परंपरा निभाते हैं।
⏰ काल/निर्माता: राव बीका के काल से संबद्ध; वर्तमान भवन महाराजा गंगा सिंह के समय पुनर्निर्मित
⭐ विशेषता: हजारों काले चूहों (जिन्हें "काबा" कहा जाता है) की पूजा के लिए विश्वप्रसिद्ध — इन्हें करणी माता की संतान माना जाता है। मंदिर के संगमरमर व चांदी से बने द्वारों की नक्काशी अद्भुत है। करणी माता चारण कुल की देवी हैं तथा राठौड़ शासकों (बीकानेर व जोधपुर) की कुलदेवी मानी जाती हैं।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण महाराणा राज सिंह के शासनकाल में
⭐ विशेषता: वल्लभ (पुष्टिमार्गीय) संप्रदाय की सात पीठों में से एक तथा इस संप्रदाय का सबसे प्रमुख केंद्र। यहाँ का संगीत विशिष्ट रूप से "हवेली संगीत" कहलाता है। श्रीनाथजी को "सप्त ध्वजा का स्वामी" भी कहा जाता है। नाथद्वारा को "मेवाड़ का हरिद्वार" भी कहा जाता है।
⏰ काल/निर्माता: 1016 ई., गुर्जर-प्रतिहार शैली का अंतिम एवं सर्वाधिक भव्य उदाहरण
⭐ विशेषता: किराड़ू के मंदिरों को "राजस्थान का खजुराहो" तथा "मूर्तियों का खजाना" भी कहा जाता है — यहाँ मैथुन मूर्तियों व पौराणिक कथाओं के दृश्यों का सुंदर अंकन मिलता है। सोमेश्वर मंदिर यहाँ का सबसे बड़ा व प्रमुख मंदिर है।
⏰ काल/निर्माता: 10वीं शताब्दी, चौहान शासक सिंहराज द्वारा (विग्रहराज-II के शासनकाल में)
⭐ विशेषता: अपनी भव्य वास्तुकला के कारण इसे "राजस्थान का कोणार्क" और "ब्लैक पैगोडा" कहा जाता है।
⏰ काल/निर्माता: 8वीं-9वीं शताब्दी, गुर्जर-प्रतिहार कालीन (महामारू शैली, पंचायतन प्रकार)
⭐ विशेषता: हर्षत माता को "उल्लास की देवी" भी कहा जाता है। मंदिर के ठीक पास विश्वप्रसिद्ध चांद बावड़ी स्थित है, जो भारत की सबसे गहरी व सुंदर बावड़ियों में गिनी जाती है (यह बावड़ी अध्याय 2 में विस्तार से पढ़ी जाएगी)।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण 1651 ई., महाराणा जगत सिंह प्रथम द्वारा
⭐ विशेषता: पिछोला झील के किनारे ऊँचे चबूतरे पर स्थित यह विष्णु (जगन्नाथ राय) मंदिर इंडो-आर्यन शैली (पंचायतन — चार लघु मंदिरों से घिरा) में बना है। गर्भगृह के सामने गरुड़ की विशाल प्रतिमा स्थापित है।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण राजा दिग्विजय सिंह द्वारा, मेवाड़ राणा संग्राम सिंह के शासनकाल में
⭐ विशेषता: द्राविड़ शैली में निर्मित यह मंदिर अपने ऊँचे गोपुरम (प्रवेश-मीनार) के लिए प्रसिद्ध है — राजस्थान में द्राविड़ शैली का यह एक दुर्लभ किंतु महत्वपूर्ण उदाहरण है, जो इसे परीक्षा की दृष्टि से विशेष बनाता है।
⏰ काल/निर्माता: श्रीकृष्ण के सांवले (सांवलिया) स्वरूप को समर्पित
⭐ विशेषता: राजस्थान का सर्वाधिक चढ़ावा प्राप्त करने वाला मंदिर माना जाता है। यहाँ जलझूलनी एकादशी पर विशाल मेला आयोजित होता है।
ध्यान दें: दिलवाड़ा और रणकपुर दोनों जैन मंदिर हैं और अक्सर परीक्षा में एक-दूसरे से भ्रमित कराए जाते हैं — याद रखें, दिलवाड़ा माउंट आबू (सिरोही) में है और संगमरमर की नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है, जबकि रणकपुर पाली जिले में है और अपने 1444 स्तंभों के लिए प्रसिद्ध है।
B. संभाग/जिलेवार अन्य प्रमुख मंदिर
ऊपर बताए गए प्रमुख मंदिरों के अतिरिक्त, राजस्थान के हर संभाग में अनेक ऐतिहासिक व धार्मिक मंदिर हैं। इन्हें संभागवार तालिकाओं में नीचे व्यवस्थित किया गया है।
| मंदिर | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| मीराबाई मंदिर | चित्तौड़गढ़ दुर्ग | कुंभा द्वारा निर्मित विष्णु मंदिर, महामारू शैली, मीराबाई की भक्ति-स्थली |
| कुंभश्याम मंदिर | चित्तौड़गढ़ दुर्ग | मूलतः शिव मंदिर, राणा कुंभा ने वैष्णव रूप प्रदान किया |
| काली माता मंदिर (मूलतः सूर्य मंदिर) | चित्तौड़गढ़ दुर्ग | 8वीं सदी, मानमोरी राजाओं द्वारा निर्मित मूलतः सूर्य मंदिर |
| तुलजा भवानी मंदिर | चित्तौड़गढ़ दुर्ग | गुहिलों की आराध्य देवी, तुलजा भवानी शिवाजी महाराज की भी आराध्य देवी मानी जाती हैं |
| सास-बहू मंदिर | नागदा, उदयपुर | 10वीं शताब्दी, विष्णु को समर्पित, सास मंदिर का शिखर ईंटों का व शेष संगमरमर का |
| आदिवराह मंदिर व बाण माता मंदिर | आहड़, उदयपुर | गुर्जर-प्रतिहार कालीन, वराह अवतार को समर्पित; बाण माता गुहिल वंश की कुलदेवी |
| महानालेश्वर/गुप्तेश्वर महादेव मंदिर | मेनाल, चित्तौड़गढ़ | "मेवाड़ का अमरनाथ", शैव लकुलीश संप्रदाय का प्रमुख केंद्र, भूमिज शैली |
| समिधेश्वर/त्रिभुवन नारायण मंदिर | चित्तौड़गढ़ दुर्ग | 11वीं सदी, मालवा परमार राजा भोज द्वारा, मारु-गुर्जर शैली |
| द्वारकाधीश मंदिर | कांकरोली, राजसमंद | महाराणा राज सिंह द्वारा निर्मित, वल्लभ संप्रदाय की सात पीठों में एक |
| चारभुजा मंदिर | गढ़बोर, राजसमंद | मेवाड़ का "वारीनाथ", मेवाड़ के चार धामों में से एक |
| घोटिया अंबा माता मंदिर | घोटिया, बांसवाड़ा | आदिवासियों का प्रमुख मंदिर, चैत्र अमावस्या को विशाल भील मेला |
| बेणेश्वर धाम | नवाटापरा, डूंगरपुर | सोम-माही-जाखम त्रिवेणी संगम पर, आदिवासियों का कुंभ, माघ पूर्णिमा मेला |
| कुंतेश्वर महादेव मंदिर | फरारा, डूंगरपुर | संत मावजी की जन्मस्थली से संबद्ध, निष्कलंक संप्रदाय की परंपरा |
| सीता माता मंदिर | सीतामाता अभयारण्य, प्रतापगढ़ | अभयारण्य क्षेत्र में स्थित, सीता माता को समर्पित |
| मंदिर | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| कंसुआ शिव मंदिर | कोटा | 8वीं सदी का गुप्तकालीन शिव मंदिर, तिथि-अंकित — राजस्थान का सबसे प्राचीन तिथि-युक्त मंदिर, गुर्जर-प्रतिहार शैली |
| शीतलेश्वर/चंद्रमौलेश्वर महादेव मंदिर | झालरापाटन, झालावाड़ | गुप्तकालीन, फर्ग्युसन के अनुसार हिंदू मंदिरों में सबसे प्राचीन तथा स्थापत्य दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ |
| सूर्य/चारभुजा मंदिर (विभीषण मंदिर परिसर) | कैथून, कोटा | भारत का एकमात्र विभीषण मंदिर इसी परिसर में स्थित, सप्तरथ शैली |
| बूढ़ादीत सूर्य मंदिर | झालरापाटन | 9वीं सदी, पंचायतन शैली |
| भंडदेवरा शिव मंदिर | रामगढ़, बारां | 10वीं सदी मेदवंशीय राजा मलयवर्मा द्वारा, "हाड़ौती का खजुराहो"/"राजस्थान का मिनी खजुराहो", भूमिज शैली |
| केशवराय जी मंदिर | केशोरायपाटन, बूंदी | 1601 ई., राजा शत्रुशाल द्वारा, चंबल नदी तट पर विष्णु मंदिर |
| चांदखेड़ी जैन मंदिर व गड़गच्च देवालय समूह | झालावाड़ | खजुराहो शैली से प्रभावित मंदिर समूह |
| मंदिर | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| गोविंद देव जी मंदिर | जयपुर | गौड़ीय संप्रदाय की प्रथम पीठ; जयपुर के शासक स्वयं को इनका दीवान मानते हैं |
| गलताजी सूर्य मंदिर | जयपुर | सवाई जय सिंह द्वितीय के काल में राव कृपाराम द्वारा निर्माण |
| बिड़ला मंदिर (लक्ष्मीनारायण मंदिर) | जयपुर | एशिया का प्रथम वातानुकूलित मंदिर, हिंदू-ईसाई-मुस्लिम डिज़ाइन का मिश्रण |
| जगत शिरोमणि मंदिर व अंबिकेश्वर महादेव मंदिर | आमेर, जयपुर | मिर्जा राजा जय सिंह द्वारा जीर्णोद्धार; कछवाहाओं का सबसे प्राचीन देवप्रासाद |
| नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर | सरिस्का, अलवर | बड़गूजर राजा अजयपाल द्वारा निर्मित बताया जाता है |
| भर्तृहरि मंदिर | अलवर | कनफटे साधुओं (नाथ संप्रदाय) का प्रमुख तीर्थ, वैशाख-भाद्रपद में लक्खी मेला |
| मेहंदीपुर बालाजी | दौसा | भूत-प्रेत बाधा निवारण हेतु प्रसिद्ध, चैत्र पूर्णिमा (हनुमान जयंती) पर विशाल मेला |
| नारायणी माता मंदिर | झुंझुनू | नाइयों की कुलदेवी; परिसर में सूर्य कुंड, सूर्य मंदिर व हनुमान मंदिर भी स्थित |
| हर्षनाथ मंदिर | सीकर | ऊपर विस्तार से वर्णित — "राजस्थान का कोणार्क" |
| खाटू श्याम जी | खाटू, सीकर | ऊपर विस्तार से वर्णित |
| मंदिर | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| लक्ष्मीनाथ मंदिर | जैसलमेर दुर्ग | जैसलमेर के भाटी शासक स्वयं को इनका दीवान मानते हैं |
| रावण मंदिर | मंडोर, जोधपुर | उत्तर भारत का प्रथम रावण मंदिर माना जाता है |
| रामदेवरा मंदिर (बाबा रामदेव) | रामदेवरा, जैसलमेर | बाबा रामदेव का समाधि-स्थल, भादवा माह में विशाल मेला |
| सुंधा माता मंदिर | सुंडा पर्वत, जालौर | प्राचीन तांत्रिक शक्तिपीठ; राजस्थान का प्रथम रोप-वे यहीं स्थापित |
| सेवाड़ी जैन मंदिर | पाली | राजस्थान का सबसे प्राचीन भूमिज शैली मंदिर (1010-1020 ई.) |
| नाकोड़ा पार्श्वनाथ जैन मंदिर | बाड़मेर | आचार्य कीर्ति रत्न सूरी द्वारा स्थापना; पास में नाकोड़ा भैरव/अचलेश्वर महादेव |
| सारणेश्वर महादेव मंदिर | सिरोही | देवड़ा राजाओं की कुलदेवी का मंदिर, दुर्गनुमा परकोटा |
| ओसियां का सच्चियाय माता मंदिर | ओसियां, जोधपुर | ऊपर मंदिर-समूह में विस्तार से वर्णित |
| सोमेश्वर मंदिर, किराड़ू | किराड़ू, बाड़मेर | ऊपर विस्तार से वर्णित — "राजस्थान का खजुराहो" |
| मंदिर | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| करणी माता मंदिर | देशनोक, बीकानेर | ऊपर विस्तार से वर्णित |
| कोडमदेसर भैरूजी मंदिर | कोडमदेसर, बीकानेर | राव बीका मंडोर से भैरव प्रतिमा लेकर आए थे; यह राव बीका की प्रथम राजधानी रही |
| सालासर बालाजी | सालासर, चूरू | "दाढ़ी-मूँछ वाले हनुमान" की प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध, भाद्रपद में मेला |
| गोगामेड़ी मंदिर | हनुमानगढ़ | गोगाजी की जन्मस्थली, भाद्रपद शुक्ल नवमी को मेला |
| मंदिर | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| कैला देवी मंदिर | करौली | कैला देवी की 16 भुजाओं वाली मूर्ति; त्रिकूट पर्वत पर काली सिंध नदी किनारे |
| गंगा मंदिर | भरतपुर | राजपूत-मुगल-द्राविड़ स्थापत्य शैली का सुंदर मिश्रण |
| त्रिनेत्र गणेश मंदिर | रणथंभौर दुर्ग, सवाई माधोपुर | भारत का एकमात्र त्रिनेत्र गणेश मंदिर; विवाह/मांगलिक कार्यों में प्रथम निमंत्रण की परंपरा |
| श्री महावीर जी मंदिर | करौली | 24वें जैन तीर्थंकर महावीर को समर्पित, चौरासी खम्भों वाला मंदिर, गंभीर नदी तट पर |
| ऊषा मंदिर | बयाना दुर्ग परिसर, भरतपुर | राजस्थान का एकमात्र मंदिर जहाँ गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है |
| मंदिर | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| ब्रह्मा मंदिर | पुष्कर, अजमेर | भारत का एकमात्र प्रमुख ब्रह्मा मंदिर; निर्माण परशुराम द्वारा 1844 ई. में |
| सोनी जी की नसियां | अजमेर | लाल पत्थर से निर्मित जैन मंदिर, स्वर्णनगरी हॉल (स्वर्ण कलश), मूलचंद व टीकमचंद सोनी द्वारा निर्माण |
| सावित्री माता मंदिर | पुष्कर, अजमेर | ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री को समर्पित, पहाड़ी पर स्थित, रोपवे सुविधा उपलब्ध |
| रंगनाथ जी मंदिर | पुष्कर, अजमेर | ऊपर विस्तार से वर्णित — द्राविड़ शैली |
| बागोर साहिब गुरुद्वारा | भीलवाड़ा | गुरु गोविंद सिंह जी की पंजाब यात्रा के दौरान विश्राम-स्थल |
| उंडेश्वर महादेव मंदिर | बिजोलिया, भीलवाड़ा | राजस्थान में गुप्तकालीन मंदिर, भूमिज शैली — यहाँ तीन शिव मंदिरों का समूह है |
राजस्थान में महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के बाद सर्वाधिक दुर्ग स्थित हैं — यहाँ का भौगोलिक स्वरूप (पहाड़, रेगिस्तान, नदियाँ, घने वन) दुर्ग-निर्माण के लिए बेहद अनुकूल रहा है। प्राचीन ग्रंथों में दुर्गों को उनकी भौगोलिक स्थिति के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बाँटा गया है — जैसे कौटिल्य के अर्थशास्त्र में 4 प्रकार तथा शुक्रनीति में 9 प्रकार के दुर्गों का उल्लेख मिलता है। राजस्थान के संदर्भ में व्यावहारिक रूप से प्रयुक्त होने वाला वर्गीकरण नीचे दिया गया है —
| दुर्ग का प्रकार | परिभाषा/विशेषता | राजस्थान में उदाहरण |
|---|---|---|
| गिरि दुर्ग (पर्वत दुर्ग) | ऊँची दुर्गम पहाड़ी पर स्थित दुर्ग | मेहरानगढ़ (जोधपुर), रणथंभौर, चित्तौड़गढ़ (गिरि दुर्ग की श्रेणी में भी आता है) |
| जल दुर्ग (औदक दुर्ग) | चारों ओर जलराशि से घिरा दुर्ग | गागरोन का किला (झालावाड़) |
| धान्वन दुर्ग (मरु दुर्ग) | चारों ओर मरुस्थल से घिरा दुर्ग | सोनारगढ़/जैसलमेर दुर्ग, जूनागढ़ दुर्ग (बीकानेर) |
| वन दुर्ग | सघन व बीहड़ वन में बसा दुर्ग | सिवाणा दुर्ग (बालोतरा), रणथंभौर (वन दुर्ग का उदाहरण भी माना जाता है) |
| पारिख दुर्ग | जिसके चारों ओर गहरी खाई हो | भरतपुर का लोहागढ़ दुर्ग, जूनागढ़ दुर्ग (बीकानेर) |
| पारिघ दुर्ग | चारों ओर ऊँची व मोटी दीवार के परकोटे से घिरा दुर्ग | कुंभलगढ़, चित्तौड़गढ़, बीकानेर (जूनागढ़) |
| एरण दुर्ग | खाई, कांटेदार झाड़ियों व पत्थरों के कारण जहाँ पहुँचना दुर्गम हो | चित्तौड़गढ़, जालौर दुर्ग |
| सैन्य दुर्ग | जिसमें स्थायी सैन्य टुकड़ी निवास करती हो | चित्तौड़गढ़, गागरोन |
| सहाय दुर्ग | जो राजा को आपातकाल में सहायता प्रदान करने हेतु बनाया गया हो | — |
21 जून 2013 को यूनेस्को (UNESCO) ने राजस्थान के 6 प्रमुख पहाड़ी दुर्गों को संयुक्त रूप से "Hill Forts of Rajasthan" के नाम से विश्व धरोहर सूची में शामिल किया। यह निर्णय कंबोडिया की राजधानी नोम पेन्ह में आयोजित विश्व धरोहर समिति के 37वें सत्र में लिया गया। इन 6 दुर्गों को याद रखने के लिए "चीकू-गाजर-आम" जैसी स्मृति-सूत्र (mnemonic trick) प्रचलित है।
⏰ काल/निर्माता: परंपरा अनुसार मौर्यवंशी राजा चित्रांगद द्वारा प्रारंभिक निर्माण (7वीं सदी के आसपास)
⭐ विशेषता: मेसा पठार पर स्थित, क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा दुर्ग। यहाँ 3 प्रसिद्ध साके (जौहर) हुए — 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण पर रानी पद्मिनी, 1534 ई. में गुजरात के बहादुरशाह के आक्रमण पर रानी कर्णावती, तथा 1568 ई. में अकबर के आक्रमण पर रानी फूलकंवर का जौहर। यहाँ महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित विजय स्तंभ (9 मंजिला, सारंगपुर युद्ध में महमूद खिलजी प्रथम पर विजय की स्मृति में) तथा जैन व्यापारी जीजा द्वारा निर्मित कीर्ति स्तंभ (7 मंजिला, आदिनाथ को समर्पित) स्थित हैं। कर्नल जेम्स टॉड ने इसे "कुतुबमीनार से भी बेहतरीन इमारत" कहा। इसे "गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया" कहावत से भी जाना जाता है।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण महाराणा कुंभा द्वारा 15वीं शताब्दी में (मुख्य शिल्पी मंडन)
⭐ विशेषता: मेवाड़-मारवाड़ सीमा पर सादड़ी गाँव के समीप गोडवाड़ क्षेत्र की सुरक्षा हेतु निर्मित। इसकी परकोटा-दीवार लगभग 36 किलोमीटर लंबी है, जिसे विश्व की दूसरी सबसे लंबी सतत (continuous) दीवार माना जाता है — चीन की महान दीवार के बाद। यहीं महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। इतिहासकार रायबहादुर हरविलास शारदा ने इसे "कुंभा की सैनिक प्रतिभा का प्रतीक" कहा। अबुल फज़ल ने लिखा — "इतनी बुलंदी पर बना है कि नीचे से ऊपर देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है।"
⏰ काल/निर्माता: निर्माण डोड़ राजवंश द्वारा; बाद में खींची राजवंश के संस्थापक देवन सिंह द्वारा
⭐ विशेषता: परवन एवं आहू नदियों के संगम पर कोषवर्धन पहाड़ी पर स्थित यह दुर्ग जल दुर्ग एवं गिरि दुर्ग का अद्भुत संगम है। यह राजस्थान का एकमात्र ऐसा दुर्ग है जो बिना किसी नींव के सीधे एक ठोस चट्टान पर खड़ा है। संत पीपा जी (राजा प्रताप राव, जो संत रामानंद के शिष्य थे और जिन्होंने राजसी वैभव त्यागकर भक्ति मार्ग अपनाया) की समाधि यहीं स्थित है।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण 1155-56 ई. में भाटी शासक रावल जैसल द्वारा प्रारंभ, पूर्णता शालिवाहन द्वितीय द्वारा
⭐ विशेषता: त्रिकुट पहाड़ी पर स्थित, पीले बलुआ पत्थर से निर्मित होने के कारण "सोनार किला" (Golden Fort) कहलाता है। यह भारत के गिने-चुने "लिविंग फोर्ट्स" (जीवंत दुर्गों) में से एक है — आज भी हज़ारों लोग किले की प्राचीर के भीतर बसते हैं। भाटी शासक स्वयं को यदुवंशी श्रीकृष्ण का वंशज मानते हैं। सत्यजीत रे की प्रसिद्ध फिल्म "सोनार किला" इसी दुर्ग पर आधारित है। रुडयार्ड किपलिंग ने इसे "परियों व देवताओं द्वारा निर्मित" कहा था।
⏰ काल/निर्माता: रण की घाटी में स्थित; चौहान शासकों से संबद्ध, विशेषकर हम्मीरदेव चौहान
⭐ विशेषता: यह वन दुर्ग की श्रेणी में आता है। इसे "रणस्तंभपुर" या "दुर्गाधिराज" भी कहा जाता है। 1301 ई. में अलाउद्दीन खिलजी व हम्मीरदेव चौहान के बीच हुए युद्ध में यहाँ प्रथम साका हुआ। परिसर में भारत का एकमात्र त्रिनेत्र गणेश मंदिर स्थित है। अमीर खुसरो ने हम्मीरदेव की वीरता को "विषम घाटी पंचानन" कहकर वर्णित किया।
⏰ काल/निर्माता: मूल निर्माण मिर्जा राजा मानसिंह प्रथम द्वारा; विस्तार सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा
⭐ विशेषता: कछवाहा वंश की प्रारंभिक राजधानी रहा यह दुर्ग अपनी शीशमहल, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास व गणेशपोल (जिसे फर्ग्युसन ने "विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्रवेश द्वार" कहा) के लिए प्रसिद्ध है। परिसर में शिला देवी मंदिर तथा जगत शिरोमणि मंदिर भी स्थित हैं। पौराणिक नाम — आम्बेर, अंबिकापुर, अंबरीश आदि।
UNESCO — स्मृति सूत्र: 6 पहाड़ी दुर्गों को याद रखने के लिए "चीकू-गाजर-आम" ट्रिक प्रयोग होती है — चीकू (चित्तौड़गढ़), गाजर (गागरोन), आम (आमेर) — बाकी तीन (कुंभलगढ़, जैसलमेर, रणथंभौर) आसानी से याद रह जाते हैं। ध्यान रहे — दिलवाड़ा मंदिर, हवा महल, सिटी पैलेस आदि UNESCO सूची में नहीं हैं; केवल जयपुर शहर (6 जुलाई 2019, समग्र नगर के रूप में) व यह 6 दुर्ग-समूह (21 जून 2013) राजस्थान से UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं।
उपर्युक्त 6 UNESCO दुर्गों के अतिरिक्त राजस्थान में अनेक ऐतिहासिक दुर्ग हैं, जिनका परीक्षा की दृष्टि से समान महत्व है। इन्हें संभागवार तालिकाओं में नीचे दिया गया है।
| दुर्ग | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| तारागढ़ दुर्ग | अजमेर | निर्माण 7वीं सदी में अजयपाल चौहान द्वारा (कर्नल टॉड के अनुसार); डॉ. हरविलास शारदा — "भारत का प्रथम गिरि दुर्ग"; बिशप हैबर — "राजस्थान का जिब्राल्टर"; लॉर्ड विलियम बैंटिक — "दुनिया का दूसरा जिब्राल्टर" |
| अकबर का किला (दौलतखाना/मैगजीन दुर्ग) | अजमेर | निर्माण 1570 ई., अकबर द्वारा ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के सम्मान में; राजस्थान का एकमात्र दुर्ग जो पूर्णतः मुस्लिम स्थापत्य शैली में निर्मित है; 1616 में सर टॉमस रो की जहाँगीर से यहीं भेंट हुई थी |
| मांडलगढ़ दुर्ग | भीलवाड़ा | लोककथा अनुसार भील सरदार मांडलिया के नाम पर नामकरण; बाद में महाराणा कुंभा द्वारा पुनर्निर्माण; अकबर ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध अभियान इसी किले से आरंभ किए |
| टॉडगढ़ दुर्ग | ब्यावर | जेम्स टॉड द्वारा निर्मित करवाया गया; गोपाल सिंह खरवा व विजय सिंह पथिक को यहाँ नज़रबंद रखा गया था |
| दुर्ग | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| जयगढ़ दुर्ग | जयपुर | निर्माण सवाई जय सिंह द्वारा; यहाँ स्थित जयबाण तोप (202 फुट नली, 22 मील मारक क्षमता) एशिया की सबसे बड़ी पहियों पर चलित तोप है |
| नाहरगढ़ दुर्ग | जयपुर | अन्य नाम — सुदर्शनगढ़, तारागढ़; निर्माण 1734 ई. सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा (मराठों के विरुद्ध); नामकरण नाहर सिंह भोमिया के नाम पर |
| भानगढ़ दुर्ग | अलवर | निर्माण 1574 ई. में आमेर के राजा भगवंतदास द्वारा; भारत के सबसे रहस्यमयी/भूतहा स्थलों में गिना जाता है |
| बाला किला (अलवर का दुर्ग) | अलवर | अन्य नाम — बड़ा किला; निर्माण 1049 ई. में अलघुराय द्वारा; उपनाम "आँखवाला किला" (दीवार में बंदूक के छेदों के कारण) |
| तिमनगढ़/त्रिभुवनगढ़ दुर्ग | करौली | निर्माण बयाना के राजा त्रिभुवनपाल द्वारा; त्रिभुवनगिरि पहाड़ी पर स्थित |
| बयाना दुर्ग | भरतपुर | ऊषा मंदिर परिसर में स्थित, प्राचीन ऐतिहासिक दुर्ग |
| दुर्ग | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| बूंदी का तारागढ़ दुर्ग | बूंदी | निर्माण राव बरसिंह हाड़ा द्वारा; यहाँ छत्र महल, फूल महल, रंग महल, चित्रशाला जैसे भवन स्थित हैं |
| शेरगढ़ दुर्ग | बारां | निर्माण शेरशाह सूरी द्वारा पुनर्निर्माण के बाद नामकरण; कोषवर्धन पहाड़ी पर स्थित |
| शाहबाद दुर्ग | बारां | निर्माण 1521 ई., चौहान राजा मुकुट मणिदेव द्वारा; उपनाम "हाड़ौती का लाल किला" |
| कोटा दुर्ग (गढ़ पैलेस परिसर) | कोटा | कोटा नगर के मध्य स्थित, कोटा रियासत का मुख्य दुर्ग-परिसर, चंबल नदी के किनारे |
| दुर्ग | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| सज्जनगढ़ दुर्ग | उदयपुर | फतेहसागर झील के पास बांसदरा पहाड़ी पर स्थित; उपनाम "मेवाड़ का मुकुटमणि"; वर्तमान में "मानसून पैलेस" के नाम से प्रसिद्ध |
| सिवाणा दुर्ग | बालोतरा | मूल नाम कुम्थाना/कुम्टाना; वन दुर्ग व गिरि दुर्ग का उदाहरण; मारवाड़ शासकों की शरणस्थली रहा |
| अचलगढ़ दुर्ग | सिरोही (माउंट आबू) | मूल निर्माण लगभग 900 ई. में परमार शासकों द्वारा; भग्नावशेषों पर 1452 ई. में महाराणा कुंभा द्वारा पुनर्निर्माण |
| दुर्ग | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| मेहरानगढ़ दुर्ग | जोधपुर | निर्माण 1459 ई., राव जोधा द्वारा लाल बलुआ पत्थर से; चिड़ियाटूँक पहाड़ी पर स्थित; राजस्थान का दूसरा सबसे प्राचीन दुर्ग (चित्तौड़गढ़ के बाद); तुजुक-ए-तैमूरी में "इतना मजबूत व सुरक्षित किला पूरे हिन्दुस्तान में कहीं नहीं देखा" कहा गया |
| मंडोर दुर्ग | जोधपुर | मारवाड़ रियासत की प्राचीन राजधानी; प्राचीन नाम मंडोवर/मांडव्यपुर; प्रारंभ में नागवंश, फिर प्रतिहारों व चौहानों के अधिकार में रहा |
| सोनारगढ़ (जैसलमेर दुर्ग) | जैसलमेर | ऊपर UNESCO दुर्गों में विस्तार से वर्णित |
| दुर्ग | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| जूनागढ़ दुर्ग | बीकानेर | निर्माण 1589 ई. के बाद राय सिंह द्वारा, मंत्री कर्मचंद की देखरेख में; समतल भूमि पर बना पारिख दुर्ग; यह दुर्ग कभी शत्रु द्वारा युद्ध में विजित नहीं हुआ; अन्य नाम — चिंतामणि, ताराम णि |
| भटनेर दुर्ग | हनुमानगढ़ | घग्घर नदी किनारे 295 ई. में राजा भूपत भाटी द्वारा निर्मित; राजस्थान का सबसे प्राचीन दुर्ग माना जाता है (एक मत अनुसार); "चांदी के गोले बरसाने वाला किला" के नाम से प्रसिद्ध (युद्ध में सीसा समाप्त होने पर चांदी के गोले दागे गए) |
| दुर्ग | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| लोहागढ़ दुर्ग | भरतपुर | निर्माण 1733 ई., सूरजमल जाट द्वारा; पारिख दुर्ग (चारों ओर गहरी खाई, मोती झील से जल-आपूर्ति); अंग्रेज़ इसे कभी युद्ध में नहीं जीत सके; कर्नल टॉड — "यदि मुझे राजस्थान में कोई जागीर दी जाए तो मैं इसी गढ़ को चुनूँगा" |
दुर्ग जहाँ सुरक्षा व युद्ध की आवश्यकता से बने, वहीं महल राजसी वैभव, कला और सुख-सुविधा के प्रतीक रहे। राजस्थान के महलों में राजपूत, मुगल तथा बाद में यूरोपीय स्थापत्य शैलियों का सुंदर सम्मिश्रण देखने को मिलता है।
A. प्रमुख महलों की विस्तृत प्रोफाइल
⏰ काल/निर्माता: निर्माण 1799 ई., सवाई प्रताप सिंह द्वारा; वास्तुकार लालचंद उस्ता
⭐ विशेषता: बिना किसी नींव के खड़ी पाँच मंजिला इमारत — कृष्ण के मुकुट के समान आकृति में बनी है। इसमें 953 झरोखे व 365 खिड़कियाँ हैं, जो गुलाबी-लाल बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। इसका निर्माण विशेष रूप से राजपरिवार की महिलाओं के लिए हुआ था, ताकि वे बिना पर्दा-प्रथा तोड़े शहर के उत्सव व दैनिक जीवन को देख सकें। पाँच मंज़िलों के नाम हैं — शरद मंदिर (प्रथम), रत्न मंदिर, विचित्र मंदिर, प्रकाश मंदिर व हवा मंदिर (सबसे ऊपरी)। शैली — राजपूत-मुगल-यूरोपीय मिश्रित।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण 1729-32 ई., सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा; वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य
⭐ विशेषता: इस विशाल परिसर में चंद्र महल (7 मंजिला राजनिवास), मुबारक महल (अतिथि-निवास हेतु, अब वस्त्रालय संग्रहालय), दीवान-ए-आम (निर्माण 1749 ई., ईश्वरी सिंह द्वारा — यहाँ विश्व के सबसे बड़े दो चाँदी के गंगाजल-पात्र रखे हैं, जिन्हें माधो सिंह द्वितीय इंग्लैंड यात्रा पर अपने साथ ले गए थे) तथा दीवान-ए-खास (सर्वतोभद्र चौक) जैसे भवन शामिल हैं। परिसर में 7 प्रवेश द्वार हैं। यह जयपुर शहर के UNESCO विश्व धरोहर क्षेत्र (6 जुलाई 2019) का भाग है।
⏰ काल/निर्माता: मानसागर झील का निर्माण मानसिंह प्रथम द्वारा (बांध); वर्तमान महल-स्वरूप सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा
⭐ विशेषता: मानसागर झील के बीचोंबीच स्थित यह पाँच मंजिला महल इस प्रकार बना है कि सामान्य जलस्तर पर केवल एक मंजिल ही पानी के ऊपर दिखाई देती है, शेष चार मंजिलें जलमग्न रहती हैं। मुगल शैली का उद्यान भी परिसर में है।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण 1559 ई. में महाराणा उदय सिंह द्वारा प्रारंभ; बाद के शासकों द्वारा विस्तार
⭐ विशेषता: पिछोला झील के तट पर स्थित यह महल-समूह मोर चौक (मयूर अलंकरण के लिए प्रसिद्ध), चीनी चित्रशाला, जनाना महल, सिल्वर गैलरी व प्रताप संग्रहालय के लिए जाना जाता है। फर्ग्युसन ने इसकी तुलना लंदन के "विंडसर महल" से की है।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण 1746 ई., महाराणा जगत सिंह द्वितीय द्वारा
⭐ विशेषता: पिछोला झील के मध्य स्थित यह भव्य महल वर्तमान में "ताज लेक पैलेस" नामक विलासी होटल के रूप में प्रसिद्ध है। यह मूलतः राजपरिवार का ग्रीष्मकालीन निवास था।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण महाराणा करण सिंह द्वारा प्रारंभ, महाराणा जगत सिंह प्रथम द्वारा पूर्ण (1620-52 ई.)
⭐ विशेषता: पिछोला झील के मध्य स्थित यह महल तब चर्चा में आया जब शाहजहाँ (तत्कालीन राजकुमार खुर्रम) ने अपने पिता जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह के दौरान यहाँ शरण ली थी। एक मान्यता के अनुसार जगमंदिर से प्रेरित होकर ही शाहजहाँ ने आगे चलकर ताजमहल का निर्माण करवाया।
⏰ काल/निर्माता: 19वीं शताब्दी में एक खगोलीय केंद्र (वेधशाला) के रूप में निर्मित
⭐ विशेषता: बांसदरा पहाड़ी पर स्थित यह महल वर्षा ऋतु में बादलों को देखने के लिए बनाया गया था, इसीलिए इसे "मानसून पैलेस" कहा जाता है। यह सज्जनगढ़ दुर्ग परिसर का ही भाग है।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण 1929-43 ई., महाराजा उम्मेद सिंह द्वारा अकाल राहत कार्य (drought relief) के रूप में; वास्तुकार हेनरी वॉघन लैंचेस्टर
⭐ विशेषता: छतर पहाड़ी पर स्थित इसे "छतर महल" भी कहा जाता है। यह विश्व के सबसे बड़े रिहायशी (निजी आवासीय) महलों में से एक है। शैली — इंडो-सारसेनिक क्लासिकल रिवाइवल तथा पश्चिमी आर्ट डेको का मिश्रण। वर्तमान में इसका एक भाग शाही परिवार का निवास, एक भाग हेरिटेज होटल तथा एक भाग संग्रहालय है।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण महाराजा गंगा सिंह द्वारा, अपने पिता महाराजा लाल सिंह की स्मृति में; वास्तुकार सैमुअल स्विंटन जैकब
⭐ विशेषता: लाल पत्थरों से निर्मित इस महल में यूरोपीय स्थापत्य शैली का स्पष्ट प्रभाव दिखता है। परिसर में अनूप संस्कृत लाइब्रेरी तथा सादुल संग्रहालय भी स्थित है।
⏰ काल/निर्माता: निर्माण महाराजा सूरजमल तथा बदन सिंह द्वारा
⭐ विशेषता: डीग को "जलमहलों की नगरी" कहा जाता है (प्राचीन नाम दीघपुर)। यहाँ सावन-भादों महल (वर्षा ऋतु के अनुभव हेतु विशेष जल-प्रबंधन के साथ निर्मित) व गोपाल महल प्रमुख हैं। यह मुगल व राजपूत स्थापत्य शैली के मिश्रण का सुंदर उदाहरण है।
B. संभागवार अन्य प्रमुख महल
| महल | स्थान (जिला) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| जंतर मंतर | जयपुर | निर्माण 1724-34 ई., सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा निर्मित 5 खगोलीय वेधशालाओं में से एक (दिल्ली सबसे पहली, जयपुर सबसे विशाल); 19 खगोलीय यंत्र, विश्व की सबसे बड़ी सूर्य घड़ी (वृहत् सम्राट यंत्र); UNESCO विश्व धरोहर घोषित — 31 जुलाई 2010 |
| अल्बर्ट हॉल संग्रहालय | जयपुर | निर्माण राम सिंह द्वितीय द्वारा; वास्तुकार सर सैमुअल स्विंटन जैकब; शैली इंडो-सारसेनिक; राजस्थान का सबसे पुराना संग्रहालय (स्थापना 1887) |
| विजय मंदिर पैलेस | अलवर | निर्माण 1918 ई., महाराजा जय सिंह (अलवर) द्वारा; विजय सागर झील किनारे स्थित |
| सिलीसेढ़ पैलेस | अलवर | सिलीसेढ़ झील के किनारे स्थित; वर्तमान में RTDC होटल |
| सिटी पैलेस, अलवर | अलवर | निर्माण 1793 ई., महाराजा बख्तावर सिंह द्वारा; राजपरिवार का निवास स्थल रहा |
| जसवंत थड़ा | जोधपुर | निर्माण 1899 ई., सरदार सिंह द्वारा अपने पिता महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय की स्मृति में; श्वेत संगमरमर से निर्मित; उपनाम "मारवाड़ का ताजमहल" |
| एक थम्बा महल | मंडोर, जोधपुर | महाराजा अजीत सिंह द्वारा निर्मित; अन्य नाम — प्रहरी मीनार |
| छत्र महल व अभेड़ा महल | कोटा | महाराव अभय सिंह हाड़ा द्वारा निर्मित; अभेड़ा महल को "हाड़ौती का हवामहल" भी कहा जाता है |
| सुख महल | बूंदी | जैतसागर झील के किनारे स्थित; 1773 ई. में राजा विष्णु सिंह द्वारा निर्मित |
| गढ़ पैलेस (सिटी पैलेस, कोटा) | कोटा | कोटा रियासत का मुख्य राजप्रासाद, चंबल नदी किनारे स्थित |
| मेयो कॉलेज भवन | अजमेर | स्थापना 1875 ई., रिचर्ड बॉक द्वारा; डिज़ाइन सैमुअल स्विंटन जैकब; श्वेत संगमरमर से निर्मित |
| किशोरी महल | भरतपुर | भरतपुर के राजपरिवार से संबद्ध महल |
राजस्थान में तीन अलग-अलग महलों को "राजस्थान का ताजमहल" या इससे मिलते-जुलते नाम से पुकारा जाता है, जो अक्सर परीक्षा में उलझा देते हैं — (1) जसवंत थड़ा, जोधपुर — "मारवाड़ का ताजमहल", (2) अबली मीणी का महल, कोटा — "हाड़ौती का ताजमहल"/"राजस्थान का दूसरा ताजमहल" (नोट: कुछ स्रोतों में यह उपनाम जसवंत थड़ा को भी दिया गया है, इसलिए प्रश्न में दिए गए संदर्भ को ध्यान से पढ़ें), और (3) अभेड़ा महल/छत्र महल, कोटा — "हाड़ौती का हवामहल"। इन तीनों नामों को गड्डमड्ड न करें।
शेखावाटी क्षेत्र — जिसमें आज के झुंझुनू, सीकर व चूरू जिले शामिल हैं — 18वीं से 20वीं शताब्दी के बीच राजस्थान के सबसे समृद्ध व्यापारी-मार्गों में से एक था। यहाँ के मारवाड़ी व्यापारियों ने, जब व्यापार के सिलसिले में कलकत्ता, मुंबई व अन्य महानगरों की ओर पलायन किया, तो अपनी समृद्धि और सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाने के लिए अपने पैतृक गाँवों-कस्बों में भव्य व रंग-बिरंगी हवेलियाँ बनवाईं। इन हवेलियों की बाहरी व भीतरी दीवारों पर बनी चित्रकारी (भित्तिचित्र/फ्रेस्को) इतनी समृद्ध व विविध है कि पूरे शेखावाटी क्षेत्र को "राजस्थान की खुली आर्ट गैलरी" (Open Air Art Gallery of Rajasthan) कहा जाता है।
A. भित्तिचित्रों (Fresco Paintings) के विषय
B. प्रमुख हवेली-कस्बे
| कस्बा | जिला | विशेषता |
|---|---|---|
| मंडावा | झुंझुनू | शेखावाटी की सबसे प्रसिद्ध हवेली-नगरी में से एक; अनेक हवेलियाँ अब हेरिटेज होटलों में परिवर्तित |
| नवलगढ़ | झुंझुनू | पोद्दार हवेली (अब हवेली संग्रहालय), मोरारका हवेली सहित अनेक भव्य हवेलियाँ |
| फतेहपुर | सीकर | गोयनका हवेली सहित कई रंग-बिरंगी हवेलियों के लिए प्रसिद्ध |
| रामगढ़ | सीकर | पोद्दार व्यापारियों द्वारा बसाया गया कस्बा, घनी हवेलियों के लिए प्रसिद्ध |
| डूंडलोद | झुंझुनू | डूंडलोद हवेली एवं डूंडलोद किला दोनों के लिए प्रसिद्ध |
| महनसर | झुंझुनू | सोने-चांदी की चित्रकारी वाली "सोने-चांदी की दुकान" हवेली के लिए विशेष प्रसिद्ध |
| चिड़ावा, खेतड़ी, लक्ष्मणगढ़ | झुंझुनू/सीकर | अन्य महत्वपूर्ण हवेली-केंद्र, स्वामी विवेकानंद खेतड़ी महल में 1891 में ठहरे थे |
ताज़ा जानकारी (Latest Update): राजस्थान सरकार के 2025-26 के बजट में "शेखावाटी हवेली संरक्षण योजना" की घोषणा की गई है, जिसके अंतर्गत झुंझुनू, सीकर व चूरू जिलों में लगभग 662 ऐतिहासिक हवेलियों को चिन्हित कर उन्हें हेरिटेज वॉक, सांस्कृतिक केंद्र, आर्ट गैलरी व होमस्टे में परिवर्तित करने की योजना है। रामगढ़, नवलगढ़, मंडावा, खेतड़ी, लक्ष्मणगढ़, फतेहपुर व महनसर के लिए संयुक्त संरक्षण समितियाँ गठित की गई हैं।
1. भारत में मंदिर स्थापत्य का सुव्यवस्थित विकास गुप्तकाल (4थी-6ठी शताब्दी) में हुआ। 2. भारतीय मंदिर स्थापत्य तीन प्रमुख शैलियों में बँटा है — नागर (उत्तर भारत), द्राविड़ (दक्षिण भारत), बेसर (मिश्रित, मध्य भारत)। 3. राजस्थान में मंदिर स्थापत्य की मुख्य क्षेत्रीय शैली महामारू/गुर्जर-प्रतिहार शैली (8वीं सदी से) कहलाती है। 4. ओसियां का महावीर जैन मंदिर राजस्थान का सबसे प्राचीन जैन मंदिर माना जाता है; ओसियां का हरिहर मंदिर पंचायतन शैली का प्रथम उदाहरण है। 5. सोमेश्वर मंदिर, किराड़ू (बाड़मेर) गुर्जर-प्रतिहार शैली का अंतिम व सर्वाधिक भव्य मंदिर है, तथा इसे "राजस्थान का खजुराहो" भी कहा जाता है। 6. दिलवाड़ा जैन मंदिर (माउंट आबू) संगमरमर की नक्काशी के लिए विश्वप्रसिद्ध है, परंतु यह UNESCO सूची में शामिल नहीं है। 7. रणकपुर जैन मंदिर (पाली) में 1444 स्तंभ हैं, जिनमें से कोई भी दो एक-जैसे नहीं तराशे गए हैं। 8. 21 जून 2013 को UNESCO ने राजस्थान के 6 पहाड़ी दुर्गों (चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, गागरोन, जैसलमेर, रणथंभौर, आमेर) को "Hill Forts of Rajasthan" नाम से विश्व धरोहर घोषित किया। 9. कुंभलगढ़ दुर्ग की परकोटा-दीवार लगभग 36 किमी लंबी है — चीन की महान दीवार के बाद विश्व की दूसरी सबसे लंबी सतत दीवार। 10. चित्तौड़गढ़ दुर्ग क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा दुर्ग है, तथा यहाँ तीन साके (1303, 1534, 1568) हुए। 11. जैसलमेर दुर्ग भारत के गिने-चुने "लिविंग फोर्ट्स" में से एक है, जहाँ आज भी लोग किले के भीतर निवास करते हैं। 12. गागरोन दुर्ग बिना नींव के एक ठोस चट्टान पर खड़ा एकमात्र दुर्ग है, तथा जल व गिरि दुर्ग का संगम है। 13. भरतपुर का लोहागढ़ दुर्ग अंग्रेज़ कभी युद्ध में नहीं जीत सके — यह पारिख दुर्ग (गहरी खाई से घिरा) की श्रेणी में आता है। 14. हवा महल (जयपुर, 1799) बिना नींव की पाँच मंजिला इमारत है, जिसमें 953 झरोखे व 365 खिड़कियाँ हैं। 15. जंतर मंतर (जयपुर) को 31 जुलाई 2010 को UNESCO विश्व धरोहर घोषित किया गया — यहाँ विश्व की सबसे बड़ी सूर्य घड़ी (वृहत् सम्राट यंत्र) स्थित है। 16. जयपुर शहर (Walled City of Jaipur) को 6 जुलाई 2019 को UNESCO ने समग्र नगर के रूप में विश्व धरोहर घोषित किया। 17. उम्मेद भवन पैलेस (जोधपुर) विश्व के सबसे बड़े रिहायशी महलों में से एक है, जिसका निर्माण अकाल राहत कार्य के रूप में हुआ। 18. जसवंत थड़ा (जोधपुर) को "मारवाड़ का ताजमहल" कहा जाता है — श्वेत संगमरमर से निर्मित। 19. शेखावाटी क्षेत्र (झुंझुनू, सीकर, चूरू) की भित्तिचित्र हवेलियों के कारण इसे "राजस्थान की खुली आर्ट गैलरी" कहा जाता है। 20. राजस्थान सरकार ने 2025-26 के बजट में शेखावाटी हवेली संरक्षण योजना के तहत लगभग 662 हवेलियों के संरक्षण की घोषणा की है।
इस अध्याय में हमने राजस्थान की वास्तुकला परंपरा को चार भागों में विस्तार से समझा। सबसे पहले मंदिर स्थापत्य — इसकी संरचना (तोरण द्वार से लेकर शिखर तक), भारत की तीन मूल शैलियाँ (नागर, द्राविड़, बेसर), राजस्थान की अपनी क्षेत्रीय महामारू व सोलंकी शैली, तथा पंचायतन, भूमिज, एकायतन व कच्छपघाट जैसी उप-शैलियाँ — इन सबको हमने दिलवाड़ा, रणकपुर, ओसियां, एकलिंगजी, जगत अंबिका, खाटू श्याम, करणी माता, श्रीनाथजी, किराड़ू सोमेश्वर जैसे प्रमुख मंदिरों के उदाहरणों सहित समझा।
इसके बाद दुर्ग स्थापत्य में हमने दुर्गों के प्रकार (गिरि, जल, धान्वन, वन, पारिख, पारिघ, एरण, सैन्य, सहाय) सीखे, और फिर UNESCO द्वारा 21 जून 2013 को घोषित राजस्थान के 6 पहाड़ी दुर्गों — चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, गागरोन, जैसलमेर, रणथंभौर व आमेर — को विस्तार से पढ़ा। इनके अतिरिक्त मेहरानगढ़, जूनागढ़, लोहागढ़, नाहरगढ़, जयगढ़, तारागढ़ (अजमेर व बूंदी दोनों) जैसे अन्य महत्वपूर्ण दुर्गों को भी संभागवार व्यवस्थित किया।
तीसरे भाग महल स्थापत्य में हमने हवा महल, सिटी पैलेस (जयपुर व उदयपुर), जल महल, लेक पैलेस, जगमंदिर, सज्जनगढ़ (मानसून पैलेस), उम्मेद भवन, लालगढ़ महल तथा डीग के जलमहलों को उनकी निर्माण-कथा व विशेषताओं सहित समझा। अंत में हवेली स्थापत्य के अंतर्गत शेखावाटी क्षेत्र (झुंझुनू-सीकर-चूरू) की भित्तिचित्र हवेलियों — मंडावा, नवलगढ़, फतेहपुर, रामगढ़, डूंडलोद, महनसर — को उनकी चित्रकारी की विशिष्ट शैली व हाल की संरक्षण योजना सहित पढ़ा।
| स्थापत्य रूप | प्रमुख उदाहरण | मुख्य पहचान |
|---|---|---|
| मंदिर स्थापत्य | दिलवाड़ा, रणकपुर, ओसियां, एकलिंगजी, जगत अंबिका, किराड़ू सोमेश्वर | नागर शैली प्रधान; महामारू व सोलंकी उप-शैलियाँ; पंचायतन/भूमिज/एकायतन/कच्छपघाट वर्गीकरण |
| दुर्ग स्थापत्य (UNESCO) | चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, गागरोन, जैसलमेर, रणथंभौर, आमेर | 21 जून 2013 को "Hill Forts of Rajasthan" के नाम से विश्व धरोहर घोषित |
| अन्य प्रमुख दुर्ग | मेहरानगढ़, जूनागढ़, लोहागढ़, नाहरगढ़, जयगढ़, तारागढ़ (अजमेर/बूंदी) | गिरि/जल/धान्वन/वन/पारिख/पारिघ वर्गीकरण में विभाजित |
| महल स्थापत्य | हवा महल, सिटी पैलेस (जयपुर/उदयपुर), जल महल, उम्मेद भवन, लालगढ़, डीग | राजपूत-मुगल-यूरोपीय शैलियों का सम्मिश्रण; जंतर मंतर व जयपुर शहर UNESCO सूची में |
| हवेली स्थापत्य | मंडावा, नवलगढ़, फतेहपुर, रामगढ़, डूंडलोद, महनसर (शेखावाटी) | भित्तिचित्र (फ्रेस्को) कला के लिए विश्वप्रसिद्ध; 2025-26 में नई संरक्षण योजना घोषित |