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Paper-I1

New India Education (NIEd)

RAS Mains Practice Test

Paper-I — सामान्य अध्ययन-I

Total Marks: 200Time: 3 HoursDate: 10/08/2026

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महत्त्वपूर्ण निर्देश / IMPORTANT INSTRUCTIONS
  • उत्तर निर्धारित स्थान पर ही लिखें। / Answer within the prescribed space only.
  • निर्धारित शब्द सीमा से अधिक न लिखें। / Do not exceed the word limit.
  • Correction Pen का उपयोग निषिद्ध है। / Use of Correction Pen is strictly forbidden.
  • उत्तर हिंदी या अंग्रेजी में दीजिए। / Answer in Hindi or English.
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Paper-I2
📚 Model Answer Booklet
Q1. [5 Marks]
मार्टिन लूथर की '95 Theses' के ऐतिहासिक महत्व की व्याख्या कीजिए।
✅ Model Answer:मार्टिन लूथर द्वारा 31 अक्टूबर 1517 को विटेनबर्ग के कासल चर्च के द्वार पर चिपकाई गई 95 Theses (तर्क सूची) ने प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार आंदोलन का सूत्रपात किया। इसमें पोप की अमोघता तथा क्षमापत्रों (Indulgences) की बिक्री का कड़ा विरोध किया गया। प्रिंटिंग प्रेस के माध्यम से इसका तीव्र प्रसार हुआ, जिसने कैथोलिक चर्च के एकाधिकार को समाप्त कर यूरोप के धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक परिदृश्य को स्थाई रूप से बदल दिया।
Q2. [5 Marks]
16वीं सदी के कैथोलिक चर्च द्वारा जारी 'क्षमापत्र' (Indulgences) से आप क्या समझते हैं?
✅ Model Answer:क्षमापत्र 16वीं सदी में कैथोलिक चर्च द्वारा धन के बदले पापों की मुक्ति हेतु जारी किए जाने वाले आधिकारिक प्रमाण-पत्र थे। पोप लियो दशम द्वारा रोम के सेंट पीटर बेसिलिका निर्माण हेतु धन जुटाने के लिए जोहान टेटजेल को इन्हें बेचने भेजा गया। 'सिक्का पात्र में गिरते ही आत्मा स्वर्ग उड़ जाती है' जैसे नारों ने चर्च के वित्तीय भ्रष्टाचार को उजागर किया, जो धर्म-सुधार आंदोलन का तात्कालिक कारण बना।
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Paper-I3
📚 Model Answer Booklet
Q3. [5 Marks]
जॉन विक्लिफ (John Wycliffe) के धार्मिक विचारों एवं धर्म-सुधार आंदोलन में उनके योगदान की विवेचना कीजिए।
✅ Model Answer:ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के विद्वान जॉन विक्लिफ (1320-1384) को 'धर्म-सुधार आंदोलन का भोर का तारा' (Morning Star of Reformation) कहा जाता है। उन्होंने पोप की सर्वोच्चता को खारिज करते हुए बाइबिल को ही एकमात्र धार्मिक प्राधिकार माना। उन्होंने बाइबिल का अंग्रेजी में अनुवाद किया ताकि आम जनता इसे पढ़ सके। उनके अनुयायी 'लोलार्ड्स' (Lollards) कहलाए, जिन्होंने इंग्लैंड में चर्च विरोधी चेतना की मजबूत नींव रखी।
Q4. [5 Marks]
प्रति-सुधार आंदोलन के अंतर्गत आयोजित 'ट्रेंट की परिषद' (Council of Trent) के प्रमुख निर्णयों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
✅ Model Answer:पोप पॉल तृतीय द्वारा 1545-1563 के मध्य आयोजित ट्रेंट की परिषद प्रति-सुधार आंदोलन का केंद्रीय स्तंभ थी। इसके मुख्य निर्णयों में क्षमापत्रों की बिक्री पर रोक, पादरियों के नैतिक आचरण में सुधार हेतु सेमिनरी की स्थापना और लैटिन वुलगेट बाइबिल को आधिकारिक घोषित करना शामिल था। हालाँकि, इसने पोप की सर्वोच्चता और सात संस्कारों जैसे कैथोलिक सिद्धांतों की पुष्टि कर चर्च के आंतरिक अनुशासन को सुदृढ़ किया।
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Paper-I4
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Q5. [5 Marks]
1555 की 'आंग्सबर्ग की संधि' (Peace of Augsburg) के मुख्य प्रावधान एवं सीमाओं की समीक्षा कीजिए।
✅ Model Answer:सॉवरेन चार्ल्स पंचम और जर्मन प्रोटेस्टेंट राजाओं के बीच हुई आंग्सबर्ग की संधि का मूल सिद्धांत 'Cuius Regio, Eius Religio' (जिसका राज्य, उसका धर्म) था। इसके तहत जर्मन शासकों को कैथोलिक या लूथरन धर्म चुनने का अधिकार मिला और लूथरनवाद को पहली बार कानूनी मान्यता प्राप्त हुई। इसकी मुख्य सीमा यह थी कि इसमें केल्विनवाद को मान्यता नहीं दी गई, जिससे आगे चलकर तीस वर्षीय युद्ध का मार्ग प्रशस्त हुआ।
Q6. [5 Marks]
प्रति-सुधार आंदोलन के दौरान 'सोसायटी ऑफ जीसस' (Jesuits) के भारत में आगमन एवं प्रभाव पर टिप्पणी कीजिए।
✅ Model Answer:इग्नेशियस ऑफ लोयोला द्वारा स्थापित सोसायटी ऑफ जीसस के जैसुइट प्रचारक फ्रांसिस ज़ेवियर 1542 में पोर्तुगालियों के साथ गोवा पहुंचे। इन्होंने भारत में कैथोलिक धर्म का प्रसार किया और आधुनिक शिक्षण संस्थाएं स्थापित कीं। 1561 में गोवा इनक्विजिशन (विधर्म-न्यायालय) की स्थापना से धर्मांतरण एवं धार्मिक उत्पीड़न भी हुआ। 1580 में फादर एक्वाविवा के नेतृत्व में जैसुइट मिशन ने मुगल सम्राट अकबर के दरबार में ईसाई धर्म का परिचय दिया।
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Paper-I5
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Q7. [10 Marks]
16वीं शताब्दी में यूरोप में हुए धर्म-सुधार आंदोलन के प्रमुख राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक कारणों का विश्लेषणात्मक परीक्षण कीजिए।
✅ Model Answer:16वीं सदी का धर्म-सुधार आंदोलन केवल एक धार्मिक विद्रोह नहीं था, बल्कि मध्यकालीन यूरोप के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ढांचे में आया एक व्यापक परिवर्तन था। 1. राजनीतिक कारण: यूरोप के उदीयमान राष्ट्र-राज्यों के राजा पोप के राजनीतिक हस्तक्षेप और उनकी निरंकुश सत्ता से असंतुष्ट थे। राजा अपनी संप्रभुता स्थापित करने तथा चर्च की विशाल भूमि पर नियंत्रण पाना चाहते थे। इंग्लैंड के हेनरी अष्टम द्वारा 'एक्ट ऑफ सुप्रीमेसी' (1534) पारित कर एंग्लिकन चर्च की स्थापना इसका प्रमुख उदाहरण है। 2. आर्थिक कारण: कैथोलिक चर्च यूरोप की लगभग एक-तिहाई कर-मुक्त संपत्ति का स्वामी था, जिससे राजाओं के खजाने पर असर पड़ता था। उच्च पदों की खरीद-बिक्री (सिमोनी) तथा क्षमापत्रों के माध्यम से धन निष्कासन से असंतोष फैला। इसके अतिरिक्त, व्यापारी वर्ग चर्च द्वारा ब्याज लेने पर लगाए गए प्रतिबंधों से मुक्ति पाकर पूँजीवादी विकास चाहता था। 3. सामाजिक कारण: पादरियों का भ्रष्ट एवं विलासितापूर्ण जीवन, नैतिक पतन तथा सामान्य जनता से दूरी असंतोष का कारण बनी। पुनर्जागरण के कारण उदित मध्यम वर्ग ने चर्च की अंध आज्ञाकारिता को चुनौती दी तथा प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार ने बाइबिल और नवीन विचारों को जन-जन तक पहुँचाया। निष्कर्षतः, धर्म-सुधार आंदोलन ने मध्यकालीन धार्मिक एकाधिकार को तोड़कर आधुनिक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक एवं राष्ट्र-राज्य आधारित यूरोप की नींव रखी।
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Paper-I6
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Q8. [10 Marks]
जॉन केल्विन के 'पूर्वनिर्धारण के सिद्धांत' (Predestination) की व्याख्या कीजिए तथा मैक्स वेबर के अनुसार इसके और आधुनिक पूँजीवाद के मध्य संबंधों का परीक्षण कीजिए।
✅ Model Answer:फ्रांसीसी सुधारक जॉन केल्विन ने अपनी पुस्तक 'इन्स्टिट्यूट्स ऑफ द क्रिश्चियन रिलिजन' (1536) में प्रोटेस्टेंट धर्मशास्त्र को एक व्यवस्थित रूप दिया, जिसका केंद्र बिंदु उनका 'पूर्वनिर्धारण का सिद्धांत' था। 1. पूर्वनिर्धारण का सिद्धांत: केल्विन के अनुसार, ईश्वर की सर्वोच्चता निरपेक्ष है और उसने सृष्टि के निर्माण से पूर्व ही यह निश्चित कर दिया है कि कौन सी आत्माएं मोक्ष (Selected) प्राप्त करेंगी और कौन सी नरकगामी (Dropped) होंगी। चूंकि मनुष्य को अपने भाग्य का ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिए उसे ईश्वर की महिमा के लिए पृथ्वी पर अत्यंत अनुशासित, निरंतर परिश्रम और नैतिक जीवन व्यतीत करना चाहिए। 2. पूँजीवाद से संबंध (मैक्स वेबर थीसिस): प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने अपनी कृति 'द प्रोटेस्टेंट एथिक एंड द स्पिरिट ऑफ कैपिटलिज्म' में दर्शाया कि केल्विनवादी नैतिकता ने आधुनिक पूँजीवाद के विकास में प्रेरक भूमिका निभाई। केल्विनवाद ने व्यापार, कड़ी मेहनत, मितव्ययिता और धन अर्जन को पाप न मानकर 'ईश्वरीय बुलावा' (Calling) माना। इसके परिणामस्वरूप अनुशासित श्रम और अर्जित पूँजी के पुनर्निवेश की संस्कृति विकसित हुई, जिसने एम्स्टर्डम और एंटवर्प जैसे वाणिज्यिक केंद्रों के उदय को संभव बनाया। संक्षेप में, केल्विन के धार्मिक सिद्धांतों ने अनजाने में आर्थिक तर्कसंगतता और आधुनिक पूँजीवादी मनोवृत्ति की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की।
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Paper-I7
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Q9. [10 Marks]
कैथोलिक चर्च के 'प्रति-सुधार आंदोलन' (Counter-Reformation) के मुख्य स्तंभों का मूल्यांकन कीजिए। क्या यह आंदोलन चर्च के पुनरुद्धार में सफल रहा?
✅ Model Answer:प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार आंदोलन से अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा और अनुयायियों को पुनः प्राप्त करने के लिए कैथोलिक चर्च द्वारा 16वीं सदी में चलाया गया आत्म-शोधन एवं पुनर्जागरण अभियान 'प्रति-सुधार आंदोलन' कहलाता है। प्रति-सुधार आंदोलन के मुख्य तीन स्तंभ निम्नलिखित थे: 1. ट्रेंट की परिषद (1545-1563): इसने क्षमापत्रों की बिक्री पर रोक लगाई, पादरियों के नैतिक आचरण में सुधार हेतु सेमिनरी स्थापित कीं और अनुशासन कड़ा किया। हालाँकि, इसने कैथोलिक सिद्धांतों और पोप की सर्वोच्चता को यथावत रखा। 2. सोसायटी ऑफ जीसस (जैसुइट्स): इग्नेशियस ऑफ लोयोला द्वारा 1534 में गठित इस सैन्य-शैली अनुशासित संगठन ने शिक्षा, बौद्धिक श्रेष्ठता और मिशनरी कार्यों के माध्यम से यूरोप, एशिया (भारत में फ्रांसिस ज़ेवियर) और अमेरिका में कैथोलिक धर्म का व्यापक प्रसार किया। 3. इनक्विजिशन कोर्ट्स (विधर्म-न्यायालय): स्पेनिश और रोमन इनक्विजिशन के माध्यम से चर्च ने विधर्मियों एवं आलोचकों का दमन किया तथा लैटिन वुलगेट बाइबिल को एकमात्र आधिकारिक पाठ माना। मूल्यांकन: प्रति-सुधार आंदोलन कैथोलिक चर्च के पुनरुद्धार में काफी हद तक सफल रहा। इसने दक्षिणी यूरोप में प्रोटेस्टेंटवाद के प्रसार को रोका, चर्च के आंतरिक भ्रष्टाचार को समाप्त किया तथा शिक्षा और वैश्विक मिशनरी अभियानों के बल पर कैथोलिक धर्म को पुनः एक विश्वव्यापी शक्ति के रूप में स्थापित किया।
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Paper-I8
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Q10. [10 Marks]
धर्म-सुधार आंदोलन के दूरगामी परिणामों की विवेचना कीजिए। इसने आधुनिक यूरोप में राष्ट्र-राज्यों के विकास और वैचारिक चेतना को किस प्रकार प्रभावित किया?
✅ Model Answer:16वीं सदी के धर्म-सुधार आंदोलन ने न केवल ईसाई धर्म को कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेंट शाखाओं (लूथरन, केल्विनवादी, एंग्लिकन) में विभाजित किया, बल्कि यूरोप के राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए। 1. राष्ट्र-राज्यों का विकास: पोप की राजनीतिक और आर्थिक सर्वोच्चता के अंत से निरंकुश और संप्रभु राजाओं की शक्ति मजबूत हुई। चर्च की कर-मुक्त संपत्ति पर राज्यों का नियंत्रण स्थापित हुआ। तीस वर्षीय युद्ध (1618-1648) के पश्चात हुई 'वेस्टफेलिया की संधि' (1648) ने आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और संप्रभु राष्ट्र-राज्य प्रणाली (Nation-State System) को जन्म दिया। 2. वैचारिक एवं बौद्धिक चेतना: लूथर के 'सभी विश्वासियों का पादरीत्व' (Priesthood of All Believers) के सिद्धांत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समानता की अवधारणा को जन्म दिया। बाइबिल का जर्मन, अंग्रेजी आदि क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद होने से स्थानीय भाषाओं और साक्षरता का विकास हुआ। चर्च की बौद्धिक जकड़न कमजोर होने से 17वीं सदी की वैज्ञानिक क्रांति और 18वीं सदी के प्रबोधन (Enlightenment) का मार्ग प्रशस्त हुआ। 3. आर्थिक प्रभाव: केल्विनवादी नैतिकता ने परिश्रम, बचत और व्यापार को बढ़ावा देकर आधुनिक पूँजीवाद की नींव रखी। निष्कर्षतः, धर्म-सुधार आंदोलन ने मध्यकालीन धार्मिक एकाधिकार को समाप्त कर आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक एवं वैज्ञानिक यूरोप के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई।
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