🇮🇳 संपूर्ण भारतीय राजव्यवस्था (Indian Polity) Master Notes

भारतीय राजव्यवस्था सम्पूर्ण Short Notes (17 अध्याय)

संविधान निर्माण, उद्देशिका, मूल अधिकार, DPSP, संसद, न्यायपालिका, आपातकाल, पंचायती राज से लेकर आंतरिक सुरक्षा तक — RAS Pre + Mains एवं सभी राज्य परीक्षाओं हेतु 2-कॉलम सघन रिवीज़न नोट्स।

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अध्याय 01 संविधान निर्मा.. अध्याय 02 उद्देशिका (Pre.. अध्याय 03 मूल अधिकार (Fu.. अध्याय 04 राज्य के नीति .. अध्याय 05 संविधान संशोधन.. अध्याय 06 संवैधानिक नैति.. अध्याय 07 संघीय कार्यपाल.. अध्याय 08 संघ विधायिका —.. अध्याय 09 न्यायपालिका — .. अध्याय 10 केंद्र-राज्य स.. अध्याय 11 स्थानीय स्वशास.. अध्याय 12 निर्वाचन प्रणा.. अध्याय 13 संवैधानिक, विध.. अध्याय 14 सुशासन, लोकपाल.. अध्याय 15 लोक नीति, नागर.. अध्याय 16 दलीय प्रणाली, .. अध्याय 17 आंतरिक सुरक्षा.. 📥 Download Center (🔒 9413)
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📑 सभी 17 अध्यायों की विषय-सूची (Quick Table of Contents)
Ch 01 संविधान निर्माण — संविधान सभा, प्रभाव-स्रोत एवं दार्शनिक आधार Ch 02 उद्देशिका (Preamble) एवं नागरिकता Ch 03 मूल अधिकार (Fundamental Rights — Art 12 to 35) Ch 04 राज्य के नीति निर्देशक तत्व (DPSP) एवं मूल कर्तव्य Ch 05 संविधान संशोधन प्रक्रिया एवं आधारभूत ढांचा सिद्धांत Ch 06 संवैधानिक नैतिकता एवं ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय Ch 07 संघीय कार्यपालिका — राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, PM व मंत्रिपरिषद Ch 08 संघ विधायिका — संसद (लोकसभा, राज्यसभा व विधायी प्रक्रिया) Ch 09 न्यायपालिका — उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय व न्यायिक समीक्षा Ch 10 केंद्र-राज्य संबंध एवं आपातकालीन प्रावधान Ch 11 स्थानीय स्वशासन — 73वां व 74वां संविधान संशोधन Ch 12 निर्वाचन प्रणाली, भारत निर्वाचन आयोग एवं चुनाव सुधार Ch 13 संवैधानिक, विधिक एवं अर्द्ध-न्यायिक निकाय Ch 14 सुशासन, लोकपाल-लोकायुक्त एवं सूचना का अधिकार (RTI) Ch 15 लोक नीति, नागरिक अधिकार पत्र (Citizen Charter) व सामाजिक अंकेक्षण Ch 16 दलीय प्रणाली, गठबंधन राजनीति, क्षेत्रवाद एवं AI का प्रभाव Ch 17 आंतरिक सुरक्षा — खतरे, CAPF, खुफिया एजेंसियां एवं सुरक्षा प्रबंधन
अध्याय 01 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 01: संविधान निर्माण — संविधान सभा, प्रभाव-स्रोत एवं दार्शनिक आधार

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, 389 सीटें, उद्देश्य प्रस्ताव, प्रारूप समिति, 394-A व प्रभाव-स्रोत

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं संविधान सभा की माँग (1934–1946)

वर्ष / घटना प्रस्तावक / संस्था विवरण एवं ऐतिहासिक परिणाम
1934 एम.एन. रॉय (M.N. Roy) सर्वप्रथम स्वतंत्र संविधान सभा (Constituent Assembly) का विचार रखा (साम्यवादी आंदोलन के प्रणेता)
1935 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) आधिकारिक रूप से संविधान निर्माण हेतु संविधान सभा की प्रथम बार माँग
1938 पं. जवाहरलाल नेहरू घोषणा: स्वतंत्र भारत का संविधान बिना बाहरी हस्तक्षेप के वयस्क मताधिकार द्वारा निर्वाचित सभा बनाएगी
1939 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) कार्यकारिणी द्वारा प्रस्ताव पारित कर नेहरू की माँग को आधिकारिक नीति बनाया
1940 अगस्त प्रस्ताव (August Offer) ब्रिटिश सरकार द्वारा संविधान सभा की माँग को सैद्धांतिक रूप से पहली बार आधिकारिक स्वीकृति
1942 क्रिप्स मिशन (Cripps Mission) सर स्टैफोर्ड क्रिप्स का प्रस्ताव: द्वितीय विश्वयुद्ध बाद निर्वाचित सभा; मुस्लिम लीग द्वारा अस्वीकृत (2 सभाओं की माँग)
1946 कैबिनेट मिशन (Cabinet Mission) 3 सदस्यीय मिशन (पैथिक लॉरेंस, स्टैफोर्ड क्रिप्स, ए.वी. अलेक्जेंडर); आगमन 24 मार्च 1946, योजना 16 मई 1946; 1 ही संविधान सभा का व्यावहारिक खाका प्रस्तुत

2. संविधान सभा की संरचना, सीट आवंटन एवं चुनाव पद्धति

💡 एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote - STV): आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली, जिसमें मतदाता वरीयता (1st, 2nd, 3rd) दर्ज करते हैं और निर्धारित कोटा पाने वाले प्रत्याशी निर्वाचित होते हैं।
इकाई / क्षेत्र सीटें प्रतिनिधित्व एवं निर्वाचन प्रक्रिया का स्वरूप
ब्रिटिश भारत (11 गवर्नर प्रांत) 292 मद्रास, बॉम्बे, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत, उड़ीसा, पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP), सिंध, बंगाल, असम; प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन
मुख्य आयुक्त प्रांत (Chief Comm.) 4 4 प्रांत (प्रत्येक से 1 सीट): दिल्ली, अजमेर-मेरवाड़ा, कूर्ग, ब्रिटिश बलूचिस्तान
देशी रियासतें (Princely States) 93 रियासतों के शासकों/प्रमुखों द्वारा सीधे मनोनीत (चुनाव में भाग नहीं लिया)
कुल मूल सदस्य संख्या 389 जनसंख्या अनुपात: प्रति 10 लाख की आबादी पर 1 सीट निर्धारित
विभाजन उपरांत सदस्य संख्या 299 भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 व विभाजन उपरांत शेष बची संख्या (229 प्रांतीय + 70 रियासती)
समुदाय सीटें सामाजिक वर्ग संख्या
हिंदू 163 अनुसूचित जातियाँ (SC) 31
मुसलमान 80 पिछड़ी जनजातियाँ (ST) 6
भारतीय ईसाई 6 महिला सदस्य (Women) 15
सिख (पंजाब में) 4 एंग्लो-इंडियन (Anglo-Indian) 3
पारसी 3 — —
विशेष तथ्य: महात्मा गांधी एवं मोहम्मद अली जिन्ना संविधान सभा के सदस्य नहीं थे। महिला सदस्यों में हंसा मेहता, सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर आदि प्रमुख।

राजस्थान प्रतिनिधित्व: राजपूताना रियासतों से कुल 13–15 प्रतिनिधि (जयपुर 3, जोधपुर 2, उदयपुर 2, बीकानेर 1, कोटा 1, अलवर 1); वी.टी. कृष्णमाचारी, हीरालाल शास्त्री, माणिक्यलाल वर्मा आदि प्रमुख।

3. कार्यप्रणाली, प्रमुख पदाधिकारी एवं स्वतंत्रता अधिनियम 1947

दायित्व / पद नाम / व्यक्तित्व दिनांक एवं ऐतिहासिक विवरण
प्रथम बैठक 207 सदस्य उपस्थित 9 दिसम्बर 1946 (मुस्लिम लीग द्वारा बहिष्कार; सेंट्रल हॉल, नई दिल्ली)
अस्थायी अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा 9 दिसम्बर 1946 (वरिष्ठतम सदस्य; फ्रांसीसी परंपरा अनुसार मनोनयन)
स्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद 11 दिसम्बर 1946 (सर्वसम्मति से निर्वाचित)
उपाध्यक्ष (दो उपाध्यक्ष) एच.सी. मुखर्जी व वी.टी. कृष्णमाचारी एच.सी. मुखर्जी (25 जनवरी 1947); वी.टी. कृष्णमाचारी (16 जुलाई 1947)
संवैधानिक सलाहकार सर बी.एन. राव (Sir B.N. Rau) संविधान का प्रारंभिक कच्चा प्रारूप तैयार करने वाले विशेषज्ञ
सभा के सचिव एच.वी.आर. आयंगर (H.V.R. Iengar) संविधान सभा के आधिकारिक सचिव
मुख्य प्रारूपकार एस.एन. मुखर्जी (S.N. Mukherjee) (Chief Draftsman) — अनुच्छेदों की कानूनी भाषा के शिल्पी
विषय / आयाम स्वतंत्रता अधिनियम 1947 से पूर्व स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के पश्चात्
निकाय का स्वरूप ब्रिटिश सरकार के प्रस्तावों से निर्मित सीमित निकाय पूर्णतः संप्रभु निकाय (Sovereign Body); ब्रिटिश कानूनों को निरस्त करने में सक्षम
सदन की दोहरी भूमिका केवल संविधान निर्माण का दायित्व दोहरा कार्य: (1) संविधान निर्माण (अध्यक्ष: डॉ. राजेंद्र प्रसाद), (2) विधायिका/संसद (अध्यक्ष: जी.वी. मावलंकर)
सदस्य संख्या कुल 389 सदस्य (अविभाजित भारत) कुल 299 सदस्य (विभाजन उपरांत पाकिस्तान क्षेत्र अलग)

4. उद्देश्य प्रस्ताव (Objectives Resolution, 1946)

💡 उद्देश्य प्रस्ताव: 13 दिसम्बर 1946 को पं. नेहरू द्वारा प्रस्तुत एवं 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से स्वीकृत। यह संविधान का मूल दार्शनिक मार्गदर्शक बना, जिसका संशोधित रूप वर्तमान प्रस्तावना (Preamble) है।
प्रमुख दार्शनिक आधार उद्देश्य प्रस्ताव में अंतर्निहित मूल प्रावधान
संप्रभु गणराज्य भारत को स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य (Independent Sovereign Republic) घोषित करना
संघीय व्यवस्था ब्रिटिश भारत, देशी रियासतों व अन्य क्षेत्रों का एक संघ (Union); स्वायत्त इकाइयाँ
जनता की सर्वोच्चता संप्रभु स्वतंत्र भारत की समस्त शक्तियाँ एवं प्राधिकार सीधे जनता से व्युत्पन्न
न्याय व स्वतंत्रता समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म व उपासना की स्वतंत्रता
सुरक्षा कवच अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों, जनजातीय क्षेत्रों एवं दलित वर्गों हेतु पर्याप्त सुरक्षात्मक उपाय (Safeguards)
विश्व शांति क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा तथा अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं मानव कल्याण में भारत का सक्रिय योगदान

5. संविधान सभा की प्रमुख समितियाँ एवं उप-समितियाँ

प्रमुख समिति (Major Committee) अध्यक्ष (Chairman) प्रमुख कार्यक्षेत्र / दायित्व
संघ शक्ति समिति (Union Powers Comm.) पं. जवाहरलाल नेहरू केंद्रीय शक्तियों व विषयों का निर्धारण
संघ संविधान समिति (Union Const. Comm.) पं. जवाहरलाल नेहरू संघीय कार्यपालिका व संसद का ढाँचा
प्रांतीय संविधान समिति (Provincial Const.) सरदार वल्लभभाई पटेल प्रांतों के संवैधानिक स्वरूप की रूपरेखा
प्रारूप समिति (Drafting Committee) डॉ. भीमराव अंबेडकर नए संविधान का वास्तविक वैधानिक प्रारूप बनाना
मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक व जनजातीय समिति सरदार वल्लभभाई पटेल नागरिक अधिकारों व संरक्षण हेतु वृहद समिति
प्रक्रिया नियम समिति (Rules of Procedure) डॉ. राजेंद्र प्रसाद सभा की कार्यप्रणाली संचालन नियम
राज्य समिति (राज्यों से वार्ता हेतु) पं. जवाहरलाल नेहरू रियासतों व राज्यों से बातचीत एवं समन्वय
संचालन समिति (Steering Committee) डॉ. राजेंद्र प्रसाद सदन के दैनिक कार्य-व्यापार का संचालन
महत्वपूर्ण उप-समिति / लघु समिति अध्यक्ष (Chairman) दायित्व / विषय
मौलिक अधिकार उप-समिति जे.बी. कृपलानी (J.B. Kripalani) मूल अधिकारों की सूची का निर्धारण
अल्पसंख्यक उप-समिति एच.सी. मुखर्जी (H.C. Mukherjee) अल्पसंख्यक वर्गों के अधिकारों की सिफारिश
उत्तर-पूर्व सीमा जनजातीय व असम क्षेत्र उप-समिति गोपीनाथ बारदोलोई (Gopinath Bardoloi) असम व पूर्वोत्तर सीमांत क्षेत्रों का प्रशासनिक प्रारूप
अपवर्जित/आंशिक अपवर्जित क्षेत्र (असम अतिरिक्त) ए.वी. ठक्कर (A.V. Thakkar) जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष प्रशासनिक उपाय
राष्ट्रीय ध्वज तदर्थ समिति (Ad-hoc on Flag) डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय ध्वज अंगीकरण संबंधी परामर्श
कार्य संचालन समिति (Order of Business) डॉ. के.एम. मुंशी दैनिक विधायी कार्यसूची का निर्धारण
सदन समिति (House Committee) बी. पट्टाभि सीतारमैया सदस्यों के आवास व अन्य व्यवस्थाएँ
प्रत्यय-पत्र समिति (Credentials Committee) अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर सदस्यों की पात्रता व प्रत्यय-पत्रों की जाँच

6. प्रारूप समिति (Drafting Committee) एवं डॉ. बी.आर. अंबेडकर

क्र. सदस्य का नाम संवैधानिक दायित्व एवं प्रतिस्थापन विवरण
1 डॉ. भीमराव अंबेडकर (अध्यक्ष) भारतीय संविधान के जनक व मुख्य वास्तुकार (Chief Architect); प्रारूप के प्रणेता
2 एन. गोपालस्वामी अय्यंगार प्रारूपण में प्रमुख प्रशासनिक व विधिक योगदान
3 अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर प्रख्यात न्यायविद्, संवैधानिक अनुच्छेदों के विशेषज्ञ
4 डॉ. के.एम. मुंशी साहित्यकार व विधिवेत्ता; कांग्रेस के सक्रिय नेता
5 सैयद मोहम्मद सादुल्ला असम के पूर्व प्रधानमंत्री; एकमात्र मुस्लिम लीग सदस्य
6 एन. माधव राव बी.एल. मित्तर के अस्वस्थता के कारण त्यागपत्र देने पर स्थान ग्रहण
7 टी.टी. कृष्णमाचारी 1948 में डी.पी. खेतान की मृत्यु के पश्चात रिक्त स्थान पर नियुक्त

कार्यकाल व प्रारूप प्रकाशन: गठन: 29 अगस्त 1947। कुल बैठकें: 141 दिन। प्रथम प्रारूप फरवरी 1948 में प्रकाशित (जनता को 8 माह का समय)। द्वितीय प्रारूप अक्टूबर 1948 में जनता की टिप्पणियों के उपरांत प्रकाशित।

🧠 प्रारूप समिति सदस्य याद रखने की युक्ति: 'अंबेडकर आए, मुंशी सादुल्ला संग; माधव-कृष्ण ने संभाला खेतान-मित्तर का रंग।'

7. संविधान निर्माण के चरण, वाचन एवं प्रमुख आँकड़े

वाचन (Reading) समयावधि प्रमुख प्रक्रिया एवं कार्य-प्रगति
प्रथम वाचन (First Reading) 4 नव. 1948 – 9 नव. 1948 डॉ. अंबेडकर द्वारा सभा में अंतिम प्रारूप पेश; 5 दिन तक सामान्य चर्चा
द्वितीय वाचन (Second Reading) 15 नव. 1948 – 17 अक्टू. 1949 खंड-दर-खंड (Clause by clause) गहन विचार; कुल 7,653 संशोधन प्रस्तावित, 2,473 पर वास्तविक चर्चा
तृतीय वाचन (Third Reading) 14 नव. 1949 – 26 नव. 1949 डॉ. अंबेडकर का प्रस्ताव पेश; 26 नवम्बर 1949 को संविधान अंगीकृत, अधिनियमित व आत्मार्पित
संविधान निर्माण सांख्यिकी आधिकारिक आँकड़ा संविधान निर्माण सांख्यिकी आधिकारिक आँकड़ा
कुल निर्माण समय 2 वर्ष 11 माह 18 दिन कुल सत्र (Sessions) 11 सत्र
कुल बैठकें (Sittings) 165 दिन प्रारूप पर विचार अवधि 114 दिन
प्रारूप समिति बैठकें 141 दिन कुल आधिकारिक व्यय लगभग ₹64 लाख
मूल संरचना प्रस्तावना + 395 अनु. + 8 अनुसूचियां अंतिम हस्ताक्षरकर्ता 284 सदस्य (299 में से उपस्थित)

8. प्रवर्तन (Enforcement), विशेष अनुच्छेद एवं सुलेखन

प्रवर्तन तिथि लागू किए गए विशिष्ट प्रावधान / अनुच्छेद ऐतिहासिक / कानूनी औचित्य
26 नवम्बर 1949 (अंगीकरण) अनुच्छेद 5, 6, 7, 8, 9 (नागरिकता); अनु. 60 (शपथ); अनु. 324 (चुनाव); अनु. 366, 367, 379, 380 (अंतरिम संसद); अनु. 388, 391, 392, 393 (संक्षिप्त नाम) तात्कालिक प्रशासनिक व चुनावी आवश्यकताओं हेतु तुरंत प्रभावी किए गए
26 जनवरी 1950 (प्रारंभ तिथि) शेष संपूर्ण संविधान पूर्ण रूप से लागू (संविधान की आधिकारिक 'Date of Commencement') 1929 लाहौर अधिवेशन के संकल्प अनुसार 26 जनवरी 1930 को मनाए गए 'पूर्ण स्वराज दिवस (Purna Swaraj)' की ऐतिहासिक स्मृति में
निरस्तीकरण प्रभाव भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 एवं भारत सरकार अधिनियम 1935 दोनों स्वतः निरस्त प्रिवी काउंसिल क्षेत्राधिकार उन्मूलन अधिनियम 1949 (Abolition of Privy Council Act) चालू रखा गया
💡 अनुच्छेद 394-A (58वाँ संशोधन, 1987): राष्ट्रपति के प्राधिकार से संविधान का हिंदी में प्रामाणिक पाठ प्रकाशित किया जाएगा, जो विधिक प्रयोजनों में अंग्रेजी पाठ के समान ही आधिकारिक व मान्य होगा।
विशिष्ट आयाम नाम / विवरण विशिष्ट आयाम नाम / विवरण
संविधान सभा की मुहर (प्रतीक) हाथी (Elephant) अंग्रेजी सुलेखक (Calligrapher) प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा (इटैलिक हस्तलिपि)
हिंदी संस्करण सुलेखक वसंत कृष्ण वैद्य पृष्ठ अलंकरण व चित्रकारी नंदलाल बोस व ब्योहार राममनोहर सिन्हा (शांतिनिकेतन)
संविधान दिवस (Constitution Day) 26 नवम्बर (19 नव. 2015 को घोषित) प्रथम राष्ट्रपति शपथ डॉ. राजेंद्र प्रसाद (26 जनवरी 1950)

9. संविधान के प्रभाव-स्रोत (Sources of the Constitution)

स्रोत विश्लेषण: डॉ. अंबेडकर अनुसार संविधान 'विश्व के ज्ञात संविधानों की गहन छानबीन (Ransacking)' के बाद बना। 250+ उपबंध 1935 के अधिनियम से लिए गए।

स्रोत देश / अधिनियम भारतीय संविधान में ग्रहण की गई प्रमुख विशेषताएँ एवं प्रावधान
1. भारत सरकार अधिनियम 1935 (सर्वाधिक प्रभाव) संघीय ढाँचा (Federal Scheme), राज्यपाल का कार्यालय, न्यायपालिका का ढाँचा, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन प्रशासनिक उपबंध, प्रशासनिक विवरण
2. ब्रिटेन (UK) संसदीय शासन प्रणाली, विधि का शासन (Rule of Law), विधायी प्रक्रिया, एकल नागरिकता, मंत्रिमंडल प्रणाली, परमाधिकार रिटें (Prerogative Writs), संसदीय विशेषाधिकार, द्विसदनवाद
3. संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) मूल अधिकार (Fundamental Rights), न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review), राष्ट्रपति पर महाभियोग (Impeachment), SC/HC न्यायाधीशों को पद से हटाना, उपराष्ट्रपति का पद
4. आयरलैंड (Ireland) राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP), राष्ट्रपति की निर्वाचन पद्धति, राज्यसभा में 12 साहित्य-कला-विज्ञान-सेवा सदस्यों का मनोनयन
5. कनाडा (Canada) सशक्त केंद्र के साथ संघीय व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) केंद्र को सौंपना, केंद्र द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति, SC का परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार (Advisory Jurisdiction)
6. ऑस्ट्रेलिया (Australia) समवर्ती सूची (Concurrent List), व्यापार, वाणिज्य एवं समागम की स्वतंत्रता, दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting)
7. जर्मनी (Weimar) आपातकाल के प्रवर्तन के दौरान मूल अधिकारों का स्थगन/निलंबन
8. सोवियत संघ (USSR / रूस) मूल कर्तव्य (Fundamental Duties) एवं प्रस्तावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय) का आदर्श
9. फ्रांस (France) गणतंत्रात्मक ढाँचा (Republic) तथा प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता एवं बंधुत्व (Liberty, Equality, Fraternity) के आदर्श
10. दक्षिण अफ्रीका (South Africa) संविधान में संशोधन की प्रक्रिया (अनुच्छेद 368) एवं राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन
11. जापान (Japan) विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure Established by Law — अनुच्छेद 21)

10. संविधान का दार्शनिक आधार (Philosophical Basis)

दार्शनिक विचारधारा संविधान में व्यावहारिक प्रतिबिंब / उपबंध संवैधानिक दर्शन एवं उद्देश्य
उदारवादी-व्यक्तिवादी धारा (Liberal-Democratic) भाग 3 (Part III: मूल अधिकार), स्वतंत्र न्यायपालिका, वयस्क मताधिकार, विधि का शासन व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समता एवं मानवीय गरिमा की संप्रभु रक्षा
समाजवादी-कल्याणकारी धारा (Socialist-Welfare) भाग 4 (Part IV: DPSP), सामाजिक-आर्थिक न्याय, समान कार्य हेतु समान वेतन, संपदा संकेंद्रण पर रोक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की स्थापना व विषमता निवारण
गांधीवादी विचारधारा (Gandhian Philosophy) अनुच्छेद 40 (ग्राम पंचायतें), कुटीर उद्योग, मद्यनिषेध, गोवंश संरक्षण, कमजोर वर्गों की उन्नति लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण, ग्राम स्वराज एवं आत्मनिर्भरता की भावना

11. संविधान सभा की प्रमुख आलोचनाएँ एवं संतुलित प्रत्युत्तर

प्रमुख आलोचना आलोचकों का प्रमुख तर्क / कथन संतुलित प्रत्युत्तर / ऐतिहासिक यथार्थ
प्रतिनिधिक निकाय नहीं (Not Representative) सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित नहीं थी अप्रत्यक्ष निर्वाचन के बावजूद हिंदू, मुस्लिम, सिख, SC, ST, पारसी, ईसाई व 15 महिलाओं सहित सभी वर्गों का संतुलित प्रतिनिधित्व था
संप्रभुता का अभाव (Not Sovereign) ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मिशन प्रस्तावों से बनी; ब्रिटिश वायसराय की अनुमति पर बैठकें भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 द्वारा सभा पूर्ण संप्रभु बनी; किसी भी ब्रिटिश कानून को रद्द करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त हुई
समय का अत्यधिक अपव्यय नज़ीरुद्दीन अहमद ने तंज कसते हुए 'ड्रिफ्टिंग समिति (Drifting Committee)' कहा (अमेरिकी संविधान 4 माह में बना) भारत की विशाल जनसंख्या, सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता, विभाजन की त्रासदी व रियासतों के एकीकरण हेतु 165 दिन की विस्तृत बहस आवश्यक थी
कांग्रेस का वर्चस्व ग्रैनविले ऑस्टिन (Granville Austin) का कथन: ('Assembly was the Congress and the Congress was India') कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का संयुक्त मंच थी; अंबेडकर व श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे गैर-कांग्रेसी भी शामिल थे
वकीलों-राजनेताओं का प्रभुत्व आईवर जेनिंग्स (Ivor Jennings) ने इसे ('Lawyer's Paradise') कहा; जटिल व विस्तृत कानूनी भाषा नवजात स्वतंत्र राष्ट्र के लिए सुदृढ़ वैधानिक ढाँचा, अधिकारों की सूक्ष्म व्याख्या व भविष्य के विवादों से बचाव हेतु विधिक दक्षता अपरिहार्य थी
हिंदू प्रभुत्व का आरोप लॉर्ड विस्काउंट साइमन का कथन ('A body of Hindus'); विंस्टन चर्चिल: केवल एक बड़े समुदाय का प्रतिनिधित्व जनसंख्या अनुपात में हिंदू बहुसंख्यक थे, किंतु अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए विशेष मौलिक अधिकार (अनु. 29-30) व सलाहकार समितियाँ गठित की गईं
अध्याय 02 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 02: उद्देशिका (Preamble) एवं नागरिकता (Citizenship) — शॉर्ट नोट्स

उद्देशिका के तत्व, बेरूबारी/केशवानंद वाद, 42वां संशोधन, अनुच्छेद 5-11, CAA 2019, OCI/NRI

1. उद्देशिका — परिचय, ऐतिहासिक आधार एवं विद्वानों के मत

प्रख्यात न्यायविद् / विद्वान उद्देशिका के संबंध में आधिकारिक मत / प्रसिद्ध कथन
एन.ए. पालकीवाला (N.A. Palkhivala) उद्देशिका — 'संविधान का पहचान-पत्र (Identity Card of the Constitution)'
पं. ठाकुर दास भार्गव संविधान का सबसे अनमोल अंग, संविधान की आत्मा, कुंजी, आभूषण व उचित पैमाना (Soul, Key, Jewel, Yardstick)
डॉ. के.एम. मुंशी (K.M. Munshi) हमारे संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य की 'जन्म-पत्री (Horoscope)'
सर अर्नेस्ट बार्कर (Sir Ernest Barker) संविधान का 'मूल-सुर (Key-note to the Constitution)' — अपनी पुस्तक में उद्धृत किया
न्यायमूर्ति एम. हिदायतुल्लाह हमारे संविधान की आत्मा — शाश्वत व अपरिवर्तनीय, जिसे केवल क्रांति ही बदल सकती है
ऐतिहासिक आयाम संवैधानिक पृष्ठभूमि एवं वैश्विक परंपरा
वैश्विक परंपरा अमेरिकी संविधान विश्व का प्रथम संविधान जिसने प्रस्तावना से शुरुआत की
उद्देश्य प्रस्ताव (1946) 13 दिसम्बर 1946 को पं. नेहरू द्वारा प्रस्तुत; 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से स्वीकृत
शाब्दिक अर्थ व सार संविधान का परिचय या भूमिका (Introduction / Preface), जिसमें संपूर्ण संविधान का सार समाहित

2. उद्देशिका का मूल पाठ, 4 घटक एवं 42वाँ संशोधन

उद्देशिका के 4 घटक संवैधानिक प्रावधान एवं अंतर्निहित मूल तत्व
1. प्राधिकार का स्रोत (Source) संविधान अपनी शक्ति भारत की जनता से प्राप्त करता है — ('We, The People of India')
2. भारतीय राज्य की प्रकृति (Nature) संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य
3. संविधान के उद्देश्य (Objectives) समस्त नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समता एवं बंधुत्व सुनिश्चित कराना
4. अंगीकृत करने की तिथि (Date) 26 नवम्बर 1949 (मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् 2006 विक्रमी) को अंगीकृत, अधिनियमित व आत्मार्पित
💡 42वाँ संशोधन 1976: उद्देशिका में अब तक केवल 1 बार संशोधन हुआ — तीन नए शब्द जोड़े गए: 'समाजवादी (Socialist)', 'पंथनिरपेक्ष (Secular)' एवं 'अखंडता (Integrity)' (सरदार स्वर्ण सिंह समिति सिफारिश)।

3. प्रमुख दार्शनिक शब्द (संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष)

संप्रभुता का आयाम संवैधानिक स्थिति एवं विधिक प्रभाव
आंतरिक व बाह्य संप्रभुता भारत किसी विदेशी शक्ति पर निर्भर या डोमिनियन नहीं; अपने मामलों में पूर्ण स्वतंत्र (26 जनवरी 1950 संप्रभु गणराज्य)
राष्ट्रमंडल (1949) ब्रिटिश क्राउन को राष्ट्रमंडल का प्रमुख मानना संविधानेतर घोषणा; संप्रभुता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं
संयुक्त राष्ट्र (UN 1945) सदस्यता से संप्रभुता अक्षुण्ण; भारत विदेशी क्षेत्र अर्जित करने अथवा अपना क्षेत्र अन्य को सौंपने में सक्षम
समाजवाद का स्वरूप सैद्धांतिक लक्षण संवैधानिक स्थिति एवं भारतीय मॉडल
लोकतांत्रिक समाजवाद मिश्रित अर्थव्यवस्था (सार्वजनिक + निजी) मार्क्सवाद व गांधीवाद का समन्वय (गांधीवादी झुकाव); अवाडी अधिवेशन (1955) 'समाजवादी ढांचा'
साम्यवादी समाजवाद पूर्ण राष्ट्रीयकरण व निजी संपत्ति उन्मूलन सोवियत मॉडल (USSR) — भारत ने इसे पूर्णतः अस्वीकार किया
डी.एस. नकारा वाद (1982) कल्याणकारी राज्य का लक्ष्य गरीबी, अज्ञानता व बीमारी निवारण; (NEP 1991) बाद भी (DPSP) में कल्याणकारी भावना जीवंत
राज्य का स्वरूप सैद्धांतिक लक्षण वैश्विक व भारतीय उदाहरण
नास्तिक राज्य (Atheist) धर्म-विरोधी, सभी धर्मों की निंदा व दमन ऐतिहासिक साम्यवादी शासन व्यवस्थाएँ
धर्मशासित राज्य (Theocratic) एक धर्म विशेष को आधिकारिक राजधर्म का दर्जा पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार
पंथनिरपेक्ष राज्य (Secular) सकारात्मक पंथनिरपेक्षता; सर्वधर्म समभाव भारत (अनु. 25–28), संयुक्त राज्य अमेरिका (USA); एस.आर. बोम्मई केस (1994) में मूल संरचना

4. प्रमुख दार्शनिक शब्द (लोकतंत्र, गणराज्य, न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व)

शासन प्रणाली प्रमुख स्वरूप संवैधानिक व्यवस्था एवं विशेषताएं
प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct) जनता सीधे शक्ति का प्रयोग करती है 4 उपकरण: जनमत संग्रह (Referendum), उपक्रम (Initiative), प्रत्याह्वान (Recall), जनमत संग्रह (Plebiscite); स्विट्जरलैंड
अप्रत्यक्ष लोकतंत्र (Indirect) प्रतिनिधि संसदीय लोकतंत्र वयस्क मताधिकार, स्वतंत्र न्यायपालिका व विधि के शासन द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों का शासन (भारत)
राजतंत्र (Monarchy) वंशानुगत राज्य-प्रमुख उत्तराधिकार से पद प्राप्त; राष्ट्राध्यक्ष निर्वाचित नहीं होता (ब्रिटेन)
गणराज्य (Republic) निर्वाचित राज्य-प्रमुख राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष निर्वाचित (5 वर्ष हेतु); राजनीतिक संप्रभुता जनता में; कोई विशेषाधिकृत वर्ग नहीं
लोकतांत्रिक आदर्श दार्शनिक संकल्पना संवैधानिक अंतर्संबंध एवं उद्घोषणा
सामाजिक लोकतंत्र राजनीतिक लोकतंत्र का आधार अंबेडकर (25 नवम्बर 1949): राजनीतिक लोकतंत्र तब तक नहीं टिकेगा जब तक सामाजिक लोकतंत्र न हो
त्रिमूर्ति सिद्धांत (Trinity) स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व ये तीनों एक अविभाज्य त्रिमूर्ति हैं; एक के बिना दूसरा एकांगी व निरर्थक हो जाता है
व्यक्ति की गरिमा (Dignity) भौतिक व आध्यात्मिक विकास के.एम. मुंशी: संविधान प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व को पवित्र व अमूल्य मानता है
मूल आदर्श विस्तार / प्रकार संवैधानिक प्रावधान एवं ऐतिहासिक स्रोत
न्याय (Justice) सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक (3 प्रकार) रूसी क्रांति (1917) से प्रेरित; अनु. 14–18, अनु. 39 (DPSP), अनु. 325–326
स्वतंत्रता (Liberty) विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना (5 प्रकार) फ्रांसीसी क्रांति (1789) से प्रेरित; अनु. 19 व 25 (मर्यादित/Qualified, लाइसेंस नहीं)
समता (Equality) प्रतिष्ठा एवं अवसर की समता (3 आयाम) नागरिक (अनु. 14–18), राजनीतिक (अनु. 325–326), आर्थिक (अनु. 39 समान कार्य हेतु समान वेतन)
बंधुत्व (Fraternity) व्यक्ति की गरिमा + राष्ट्र की एकता व अखंडता एकल नागरिकता एवं अनुच्छेद 51-A (मूल कर्तव्य); 'अखंडता' 42वें संशोधन 1976 से जोड़ा गया

5. उद्देशिका की न्यायिक स्थिति, संशोधनीयता एवं मूल संरचना

न्यायिक वाद (Case) वर्ष सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय
बेरुबाड़ी संघ मामला (Berubari Union) 1960 उद्देशिका संविधान निर्माताओं के विचारों की कुंजी है, किंतु यह संविधान का भाग नहीं है (अनु. 143 संदर्भ)
केशवानंद भारती केस (13 जज पीठ) 1973 बेरुबाड़ी निर्णय निरस्त; उद्देशिका संविधान का अभिन्न अंग (Integral Part) है; अनु. 368 से संशोधनीय
मिनर्वा मिल्स केस (Minerva Mills) 1980 संसद की सीमित संशोधन शक्ति स्वयं संविधान के मूलभूत ढांचे का भाग है
एलआईसी ऑफ इंडिया (LIC of India) 1995 पुनः पुष्टि: उद्देशिका संविधान का अभिन्न व अविभाज्य भाग है
संवैधानिक प्रश्न / विधिक आयाम सर्वोच्च न्यायालय की स्थिति एवं विधिक प्रावधान
क्या उद्देशिका संविधान का भाग है? हाँ — संविधान का अभिन्न अंग है (केशवानंद भारती 1973 द्वारा मान्य; बेरुबाड़ी 1960 का मत निरस्त)
क्या अनु. 368 से संशोधन संभव है? हाँ — संसद संशोधन कर सकती है, किंतु इसकी मूल संरचना (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकती
न्यायिक प्रवर्तनीयता (Enforceability) गैर-न्याययोग्य (Non-justiciable) — न्यायालय द्वारा सीधे प्रवर्तनीय नहीं, विधायिका की शक्ति पर प्रतिबंध नहीं
संवैधानिक व्याख्या में उपयोग जहाँ अनुच्छेदों की भाषा संदिग्ध या अस्पष्ट हो, वहाँ व्याख्या में पथ-प्रदर्शक के रूप में प्रयुक्त
💡 मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine): केशवानंद भारती (1973) अनुसार संसद अनुच्छेद 368 के तहत उद्देशिका में संशोधन कर सकती है, किंतु इसकी 'मूल संरचना' (लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता, न्याय, न्यायिक समीक्षा) को नष्ट नहीं कर सकती।

6. नागरिकता (Citizenship) — अर्थ, विदेशी वर्ग एवं अनन्य अधिकार

💡 नागरिकता (भाग 2, अनु. 5–11): राज्य की पूर्ण सदस्यता। भारत में जन्मजात व प्राकृतिकीकृत (Naturalised) दोनों नागरिक राष्ट्रपति पद हेतु पात्र हैं (USA में केवल जन्मजात नागरिक पात्र)।
विदेशी वर्ग / अधिकार आयाम संवैधानिक प्रावधान विधिक स्थिति एवं संरक्षण का स्वरूप
मित्र विदेशी (Friendly Aliens) अधिकांश नागरिक अधिकार उपलब्ध भारत से मित्रवत संबंधों वाले देशों के नागरिक; मूल अधिकार आंशिक उपलब्ध
शत्रु विदेशी (Enemy Aliens) युद्धरत देशों के नागरिक न्यूनतम अधिकार; अनुच्छेद 22 (गिरफ्तारी व निरोध से संरक्षण) प्राप्त नहीं
केवल नागरिकों को मूल अधिकार अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, 30 धर्म-जाति भेदभाव निषेध, अवसर की समता, 6 स्वतंत्रताएं, अल्पसंख्यक संरक्षण
राजनीतिक व संवैधानिक पद अनुच्छेद 326, 84, 173, 58, 66 मतदान अधिकार, सांसद/विधायक पात्रता, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, न्यायाधीश पद

7. एकल नागरिकता (कनाडा मॉडल) एवं अपवाद

विषय / आयाम भारत (एकल नागरिकता) संयुक्त राज्य अमेरिका (दोहरी नागरिकता)
नागरिकता का स्तर केवल एक राष्ट्रीय नागरिकता (कनाडा मॉडल) संघ व राज्य दोनों की पृथक-पृथक दोहरी नागरिकता (USA + State)
अधिकारों में समानता पूरे देश में समान अधिकार; बंधुत्व व एकता का आधार राज्य अपने नागरिकों के पक्ष में भेदभाव कर सकता है (मतदान/शुल्क)
संवैधानिक अपवाद निवास शर्त (अनु. 16, 371-D), जनजातीय क्षेत्र (अनु. 19) दोहरी नागरिकता ऑस्ट्रेलिया व स्विट्जरलैंड में भी प्रचलित

8. संवैधानिक प्रावधान — अनुच्छेद 5 से 11 (26 जनवरी 1950 को स्थिति)

अनुच्छेद विषय-वस्तु नागरिकता निर्धारण की प्रमुख शर्तें एवं आधार
अनुच्छेद 5 अधिवास द्वारा नागरिकता भारत में मूल निवास + भारत में जन्म / माता-पिता का जन्म / 5 वर्ष सामान्य निवास
अनुच्छेद 6 पाकिस्तान से आए व्यक्ति 19 जुलाई 1948 पूर्व आगमन (स्वतः नागरिक); बाद में आए तो 6 माह निवास + पंजीकरण
अनुच्छेद 7 पाकिस्तान जाकर लौटे व्यक्ति 1 मार्च 1947 बाद पाकिस्तान गए किंतु पुनर्वास परमिट लेकर लौटे (6 माह निवास + पंजीकरण)
अनुच्छेद 8 विदेश में भारतीय मूल के व्यक्ति अविभाजित भारत में जन्म + भारतीय दूतावास में राजनयिक पंजीकरण
अनुच्छेद 9 विदेशी नागरिकता पर समाप्ति स्वेच्छा से अन्य देश की नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त (दोहरी नागरिकता निषेध)
अनुच्छेद 10 अधिकारों की निरंतरता प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की निरंतरता संसद द्वारा बनाई गई विधि के अधीन
अनुच्छेद 11 संसद की विधि निर्माण शक्ति नागरिकता के अर्जन, समाप्ति व अन्य सभी उपबंधों हेतु संसद को कानून बनाने की संप्रभु शक्ति

9. नागरिकता अधिनियम 1955 — अर्जन के 7 मार्ग

अर्जन का मार्ग समयावधि / श्रेणी वैधानिक शर्तें एवं निर्धारित मानदंड
जन्म से (By Birth) 1950–1987 भारत में जन्म ही पर्याप्त (अपवाद: विदेशी राजनयिक/शत्रु के बच्चे)
जन्म से 1987–2004 माता या पिता में से कोई एक जन्म के समय भारतीय नागरिक हो
जन्म से 2004 के बाद दोनों नागरिक हों, या एक नागरिक व दूसरा अवैध प्रवासी (Illegal Migrant) न हो
वंशक्रम (Descent) 1950–1992 पिता नागरिक; 1992 बाद: माता/पिता में से कोई एक; 2004 बाद: 1 वर्ष में दूतावास पंजीकरण
पंजीकरण (Registration) भारतीय मूल / वैवाहिक भारतीय मूल (7 वर्ष निवास), भारतीय से विवाहित (7 वर्ष), (OCI) धारक (5 वर्ष (OCI) + 12 माह निवास); निष्ठा की शपथ
प्राकृतिकीकरण 14 में 11 वर्ष निवास 14 में 11 वर्ष निवास/सेवा, 8वीं अनुसूची भाषा ज्ञान, अच्छा चरित्र (कला-विज्ञान-सेवा में छूट संभव)
राज्यक्षेत्र समावेश विदेशी क्षेत्र विलय विदेशी क्षेत्र विलय पर केंद्र द्वारा निर्दिष्ट व्यक्ति नागरिक (जैसे पुडुचेरी आदेश 1962)
असम समझौता (1985) विशेष उपबंध 1966 पूर्व आए (नागरिक); 1966–71 बीच आए (10 वर्ष बाद मताधिकार); 25 मार्च 1971 बाद (अवैध)
सीएए 2019 आयाम अधिनियम के प्रमुख प्रावधान एवं शर्तें (10 जनवरी 2020 से लागू)
6 लक्षित समुदाय हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई (मुस्लिम समुदाय सम्मिलित नहीं)
3 पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान (धार्मिक उत्पीड़न के आधार पर)
कटऑफ तिथि व प्रभाव 31 दिसम्बर 2014 तक प्रवेश; प्राकृतिकीकरण अवधि 11 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष की गई
संवैधानिक अपवाद 6ठी अनुसूची के असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र व इनर लाइन परमिट (ILP) क्षेत्र बाहर

10. नागरिकता की क्षति एवं प्रवासी (OCI) कार्डधारक व्यवस्था

समाप्ति का प्रकार वैधानिक प्रक्रिया एवं विधिक आधार (नागरिकता अधिनियम 1955)
स्वैच्छिक त्याग (Renunciation) वयस्क नागरिक द्वारा घोषणा-पत्र (नाबालिग बच्चे भी नागरिकता खोते हैं; 18 वर्ष आयु पर 1 वर्ष में पुनः ग्रहण)
पर्यवसान (Termination) स्वेच्छा से अन्य देश की नागरिकता ग्रहण करने पर भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त (युद्धकाल में लागू नहीं)
वंचना (Deprivation) केंद्र सरकार द्वारा अनिवार्य समाप्ति: (1) फर्जीवाड़ा, (2) संविधान से द्रोह, (3) शत्रु देश से व्यापार, (4) 5 वर्ष में 2 वर्ष कैद, (5) 7 वर्ष निरंतर विदेश प्रवास
तुलनात्मक आधार अनिवासी भारतीय (NRI) प्रवासी भारतीय नागरिक (OCI Cardholder)
विधिक स्थिति वास्तविक भारतीय नागरिक (भारतीय पासपोर्ट धारक) विदेशी नागरिक (भारतीय मूल के); दोहरी नागरिकता नहीं
भारत आगमन / वीजा भारतीय पासपोर्ट से निर्बाध प्रवेश आजीवन बहु-प्रवेश वीजा (Multiple Entry Life-long Visa)
प्राप्त अधिकार समस्त नागरिक, राजनीतिक व मतदान अधिकार कृषि भूमि छोड़कर संपत्ति क्रय, व्यवसाय छूट; (FRRO) पंजीकरण मुक्त
वर्जित अधिकार कोई प्रतिबंध नहीं मतदान अधिकार नहीं, राष्ट्रपति, न्यायाधीश, संसद-विधानसभा सदस्यता वर्जित
🧠 एल.एम. सिंघवी समिति (2000–02) की सिफारिश पर (OCI) व्यवस्था शुरू; 2015 संशोधन द्वारा (PIO) व (OCI) का विलय कर एकल '(OCI Cardholder)' योजना बनाई गई।
अध्याय 03 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 03: मूल अधिकार (Fundamental Rights — अनुच्छेद 12 से 35) — शॉर्ट नोट्स

अनुच्छेद 12-35, समानता, स्वतंत्रता, शोषण विरुद्ध, धार्मिक, संस्कृति, रिट अधिकार (Art 32)

1. मूल अधिकार — संवैधानिक स्थिति, दार्शनिक आधार एवं प्रकृति

संवैधानिक आयाम संवैधानिक स्थिति एवं ऐतिहासिक स्रोत
संवैधानिक अवस्थिति संविधान के भाग (III) में अनुच्छेद 12 से 35 तक समाहित
ऐतिहासिक प्रेरणा व स्रोत अमेरिकी संविधान के 'बिल ऑफ राइट्स (Bill of Rights)' से प्रेरित; 'भारत का मैग्नाकार्टा (Magna Carta)'
मूल अधिकारों की संख्या मूलतः 7 अधिकार थे; 44वें संशोधन 1978 द्वारा संपत्ति का अधिकार विलोपित होने के बाद वर्तमान में 6 अधिकार
प्रमुख विशेषता सैद्धांतिक स्वरूप एवं विधिक प्रभाव
न्यायोचित प्रकृति न्यायोचित (Justiciable) — उल्लंघन पर नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय (अनु. 32) या उच्च न्यायालय (अनु. 226) जा सकते हैं
सुरक्षा का दायरा अधिकांश अधिकार राज्य के मनमाने कृत्यों के विरुद्ध गारंटी हैं; कुछ अधिकार निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी (अनु. 15(2), 17, 23, 24)
असीमित नहीं (मर्यादित) आत्यंतिक (Absolute) नहीं बल्कि मर्यादित (Qualified) हैं; राज्य इन पर युक्तियुक्त निर्बंधन (Reasonable Restrictions) लगा सकता है
निलंबन एवं संशोधन अनुच्छेद 20 व 21 को छोड़कर शेष आपातकाल में निलंबित हो सकते हैं; संसद मूल ढांचे (Basic Structure) को नष्ट किए बिना संशोधन कर सकती है

2. अनुच्छेद 12 (राज्य की परिभाषा) एवं अनुच्छेद 13 (न्यायिक समीक्षा)

'राज्य' के 4 घटक संवैधानिक विस्तार एवं विधिक निकाय (अनुच्छेद 12)
1. संघ सरकार व संसद भारत की सरकार (कार्यपालिका) एवं संसद (लोकसभा व राज्यसभा)
2. राज्य सरकार व विधानमंडल सभी राज्यों की सरकारें (कार्यपालिका) एवं राज्य विधानमंडल (विधानसभा व विधान परिषद)
3. स्थानीय प्राधिकारी नगर पालिकाएं, जिला बोर्ड, ग्राम पंचायतें, सुधार न्यास (Town Improvement Trusts)
4. अन्य प्राधिकारी (विस्तार) संवैधानिक व गैर-संवैधानिक सांविधिक निकाय — (LIC), (ONGC), (SAIL), (UGC), बिजली बोर्ड आदि
न्यायपालिका की स्थिति न्यायिक कार्यों में न्यायपालिका 'राज्य' नहीं है; प्रशासनिक कार्यों में 'राज्य' की परिभाषा के अधीन आती है
सिद्धांत / खंड संवैधानिक प्रावधान एवं न्यायिक सिद्धांत (अनुच्छेद 13)
अनुच्छेद 13(1) पूर्व विधियां आच्छादन का सिद्धांत (Doctrine of Eclipse) — संविधान-पूर्व की असंगत विधियां मृत नहीं होतीं, मूल अधिकारों द्वारा ढक ली जाती हैं
अनुच्छेद 13(2) परवर्ती विधियां पृथक्करणीयता का सिद्धांत (Doctrine of Severability) — मूल अधिकारों के उल्लंघन वाले अंश को अलग किया जा सकता है, संपूर्ण कानून अवैध नहीं
अनुच्छेद 13(3) 'विधि' दायरा स्थायी विधि (संसद/विधानमंडल), अस्थायी विधि (अध्यादेश), प्रत्यायोजित विधान (आदेश, उपविधि, नियम, विनियम, अधिसूचना), रूढ़ि व प्रथा
संविधान संशोधन बनाम अनु. 13 केशवानंद भारती (1973): अनुच्छेद 368 के तहत किया गया संविधान संशोधन अनु. 13 में 'विधि' नहीं है, किंतु मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं कर सकता
त्याग का सिद्धांत (Waiver) बहराम बनाम बॉम्बे राज्य (1955): भारत में कोई भी नागरिक अपने मूल अधिकारों का स्वैच्छिक त्याग (Waiver) नहीं कर सकता

3. समता का अधिकार — अनुच्छेद 14 (विधि समक्ष समता)

अवधारणा स्रोत / उत्पत्ति संवैधानिक अर्थ एवं न्यायशास्त्र
विधि के समक्ष समता ब्रिटिश परंपरा (नकारात्मक) किसी व्यक्ति को विशेष विशेषाधिकार नहीं; सभी व्यक्ति साधारण विधि व न्यायालयों के अधीन (Rule of Law)
विधियों का समान संरक्षण अमेरिकी परंपरा (सकारात्मक) समान परिस्थितियों में समान व्यवहार; समान विधियों का समान रूप से लागू होना (Like should be treated alike)
तार्किक वर्गीकरण अनुच्छेद 14 का अपवाद नहीं वर्ग विधान (Class Legislation) निषिद्ध, किंतु बोधगम्य भेदक (Intelligible Differentia) पर आधारित वर्गीकरण वैध
मनमानेपन का विरोध ई.पी. रोयप्पा वाद (1974) समता एक गतिशील अवधारणा है; समानता और मनमानापन (Arbitrariness) एक-दूसरे के घोर विरोधी हैं

4. समता का अधिकार — अनुच्छेद 15 (भेदभाव निषेध) एवं 16 (अवसर समता)

अनुच्छेद खंड प्रतिषेध का आधार संवैधानिक अपवाद एवं विशेष प्रावधान (अनुच्छेद 15)
15(1) व 15(2) केवल 5 आधार: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान दुकानों, भोजनालयों, होटलों, कुओं, तालाबों व सार्वजनिक स्थलों में प्रवेश पर भेदभाव पूर्णतः निषिद्ध
15(3) अपवाद महिलाओं एवं बालकों हेतु महिलाओं एवं बच्चों के कल्याण हेतु राज्य द्वारा विशेष उपबंध करना पूर्णतः वैध
15(4) 1st संशोधन 1951 चंपाकम दोरईराजन वाद (1951) सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों (SEBC), (SC) एवं (ST) हेतु विशेष प्रावधान
15(5) 93rd संशोधन 2005 उच्च शिक्षण संस्थान प्रवेश निजी शिक्षण संस्थानों (सहायता प्राप्त व गैर-सहायता प्राप्त) में आरक्षण (अल्पसंख्यक संस्थान अपवाद)
15(6) 103rd संशोधन 2019 आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) नागरिकों के (EWS) हेतु शिक्षण संस्थानों में अधिकतम 10% आरक्षण (जनहित अभियान वाद 2022 वैध)
अनुच्छेद खंड लोक नियोजन विषय संवैधानिक उपबंध एवं आरक्षण व्यवस्था (अनुच्छेद 16)
16(1) व 16(2) अवसर की समता (7 आधार) धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान, उद्भव (Descent) या निवास आधार पर सरकारी सेवाओं में भेदभाव निषिद्ध
16(3) अपवाद निवास शर्त की छूट संसद विधि द्वारा किसी राज्य या यूटी में लोक नियोजन हेतु निवास की शर्त तय कर सकती है (जैसे आंध्र प्रदेश)
16(4) अपवाद पिछड़े वर्ग आरक्षण राज्य के अधीन सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व वाले पिछड़े वर्ग हेतु आरक्षण प्रावधान
16(4A) व 16(4B) पदोन्नति व बैकलॉग 77वाँ संशोधन 1995: (SC/ST) पदोन्नति आरक्षण; 81वाँ संशोधन 2000: रिक्तियों का कैरी-फॉरवर्ड 50% सीमा से बाहर
16(6) 103rd संशोधन लोक नियोजन (EWS) आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को सरकारी नौकरियों में अधिकतम 10% आरक्षण

5. इंद्रा साहनी वाद 1992, अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता) एवं अनुच्छेद 18 (उपाधियाँ)

💡 इंद्रा साहनी वाद (मंडल केस 1992 — 9 जज पीठ): कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं; क्रीमी लेयर (Creamy Layer) आरक्षण से बाहर; पदोन्नति में आरक्षण नहीं; पिछड़ा वर्ग आयोग सांविधिक संस्था बने। (राजस्थान में वर्तमान कुल आरक्षण 64% 9वीं अनुसूची व विशेष प्रावधानों के अधीन)।
अनुच्छेद मूल विषय संवैधानिक प्रावधान, न्यायिक वाद एवं विधिक प्रभाव
अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का पूर्ण उन्मूलन अस्पृश्यता का आचरण दंडनीय अपराध; नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 (संशोधन 1976); निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी लागू (PUDR वाद 1982)
अनुच्छेद 18(1) उपाधियों का अंत राज्य सैन्य या शैक्षणिक सम्मान के अलावा कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा (रायबहादुर, दीवान बहादुर, महाराजा जैसी उपाधियां समाप्त)
अनुच्छेद 18(2)-(4) विदेशी उपाधि प्रतिषेध भारतीय नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा; विदेशी उपाधि/पद राष्ट्रपति की सहमति बिना वर्जित
राष्ट्रीय पुरस्कार बालाजी राघवन केस (1996) भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्मश्री उपाधि (Title) नहीं बल्कि अलंकरण हैं; इन्हें नाम के आगे-पीछे जोड़ना निषिद्ध

6. अनुच्छेद 19 — 6 मूल स्वतंत्रताएं एवं युक्तियुक्त निर्बंधन

स्वतंत्रता [अनुच्छेद] संवैधानिक विस्तार एवं अंतर्निहित अधिकार युक्तियुक्त निर्बंधन के संवैधानिक आधार (Reasonable Grounds)
19(1)(a) वाक् व अभिव्यक्ति विचार प्रकट करने, प्रेस स्वतंत्रता, व्यावसायिक विज्ञापन, जानने का अधिकार (RTI), फोन टैपिंग विरुद्ध अधिकार, मौन रहने का अधिकार भारत की संप्रभुता-अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मित्रवत संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार/सदाचार, न्यायालय की अवमानना, मानहानि, अपराध उद्दीपन [19(2)]
19(1)(b) शांतिपूर्ण सम्मेलन शांतिपूर्ण एवं बिना हथियारों के एकत्रित होने व जुलूस निकालने का अधिकार (हड़ताल या तालाबंदी का मूल अधिकार नहीं) भारत की संप्रभुता एवं अखंडता, लोक व्यवस्था (यातायात नियंत्रण सहित) [19(3)] (सीआरपीसी धारा 144 व आईपीसी 141 के अधीन)
19(1)(c) संगम या संघ राजनीतिक दल, कंपनी, क्लब, ट्रेड यूनियन, सोसायटी एवं सहकारी समिति (97वाँ संशोधन 2011) गठित करने का अधिकार भारत की संप्रभुता एवं अखंडता, लोक व्यवस्था, सदाचार [19(4)]
19(1)(d) अबाध संचरण भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र में सर्वत्र निर्बाध आवागमन का अधिकार (आंतरिक संचरण; विदेश यात्रा अनु. 21 के अधीन) साधारण जनता के हित में तथा किसी अनुसूचित जनजाति (ST) के हितों के संरक्षण हेतु [19(5)]
19(1)(e) निवास व बसना भारत के किसी भी भाग में अस्थायी रूप से रहने अथवा स्थायी रूप से बसने का अधिकार साधारण जनता के हित में तथा अनुसूचित जनजातियों के हितों, संस्कृति व भूमि संरक्षण हेतु [19(5)]
19(1)(g) व्यापार व वृत्ति कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता (अनैतिक या खतरनाक व्यवसाय का अधिकार नहीं) साधारण जनता के हित में; आवश्यक तकनीकी अर्हता निर्धारण एवं किसी उद्योग पर राज्य का पूर्ण या आंशिक एकाधिकार (Monopoly) [19(6)]
🧠 अनुच्छेद 19(1)(f) में वर्णित 'संपत्ति के अर्जन, धारण व व्ययन का मूल अधिकार' 44वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा विलोपित कर दिया गया था। अनुच्छेद 19 के अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त हैं, विदेशियों को नहीं।

7. अनुच्छेद 20 — अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण

संवैधानिक सुरक्षा कवच संवैधानिक प्रावधान एवं न्यायिक सीमाएं (अनुच्छेद 20)
20(1) कार्योत्तर विधि से संरक्षण (No Ex-post Facto Law) किसी व्यक्ति को केवल उस विधि के उल्लंघन पर दोषी ठहराया जाएगा जो अपराध करते समय प्रवृत्त थी; बाद में बने कानून से पूर्व घटित अपराध हेतु अधिक दंड नहीं दिया जा सकता (केवल आपराधिक कानूनों पर लागू; दीवानी व कर कानूनों पर भूतलक्षी प्रभाव वैध)
20(2) दोहरे दंड से मुक्ति (No Double Jeopardy) किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जाएगा (यह संरक्षण केवल न्यायिक न्यायालयों व विधिक अधिकरणों की कार्यवाही पर लागू है; विभागीय या प्रशासनिक अनुशासनात्मक कार्यवाहियों पर लागू नहीं)
20(3) आत्म-अभिशंसन से मुक्ति (No Self-incrimination) किसी अपराध के अभियुक्त को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी (गवाह) बनने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा (केवल आपराधिक मामलों में लागू; अंगूठे का निशान, हस्ताक्षर, रक्त का नमूना देने पर प्रतिबंध नहीं)
सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य वाद (2010) सर्वोच्च न्यायालय निर्णय: अभियुक्त की सहमति के बिना नार्को टेस्ट (Narco), पॉलीग्राफ (Polygraph / Lie Detector) तथा ब्रेन मैपिंग (Brain Mapping) परीक्षण कराना अनुच्छेद 20(3) व 21 का प्रत्यक्ष उल्लंघन है

8. अनुच्छेद 21 — न्यायिक व्याख्या का विकास (गोपालन से पुट्टास्वामी)

न्यायिक वाद / चरण वर्ष न्यायिक सिद्धांत एवं अनुच्छेद 21 की क्रांतिकारी व्याख्या
ए.के. गोपालन बनाम मद्रास 1950 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure Established by Law)': संकीर्ण व्याख्या — केवल कार्यपालिका के मनमाने कृत्य से संरक्षण; कानून चाहे अनुचित हो, यदि प्रक्रिया वैध है तो निरोध मान्य
मेनका गांधी बनाम भारत संघ 1978 'विधि की सम्यक प्रक्रिया (Due Process of Law)': व्यापक व्याख्या — कानून केवल वैध ही नहीं, बल्कि उचित, निष्पक्ष और न्यायसंगत (Just, Fair and Reasonable) होना अनिवार्य; कार्यपालिका + विधायिका दोनों से संरक्षण
के.एस. पुट्टास्वामी वाद (9 जज) 2017 निजता का अधिकार (Right to Privacy) अनुच्छेद 21 एवं भाग (III) के तहत स्वाभाविक, अविभाज्य व अंतर्निहित मूल अधिकार घोषित

9. अनुच्छेद 21 के अंतर्निहित अधिकार एवं 21A (शिक्षा का अधिकार)

विस्तारित अधिकार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित प्रमुख अंतर्निहित अधिकार (अनुच्छेद 21)
मानवीय गरिमा व आजीविका गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार (मेनका गांधी); आजीविका का अधिकार (ओल्गा टेलिस केस 1985)
स्वास्थ्य व पर्यावरण संरक्षण स्वच्छ पर्यावरण व प्रदूषण-मुक्त जल/वायु का अधिकार (एम.सी. मेहता); स्वास्थ्य व चिकित्सा सहायता का अधिकार (परमानंद कटारा)
न्यायिक व मानवीय अधिकार त्वरित विचारण का अधिकार (हुस्नआरा खातून); निःशुल्क विधिक सहायता (एम.एच. होसकोट); हथकड़ी लगाने व एकांत कारावास के विरुद्ध अधिकार
इच्छामृत्यु व गरिमापूर्ण मृत्यु कॉमन कॉज वाद (2018): मरणासन्न व्यक्ति को सम्मानपूर्वक मरने का अधिकार; निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) व लिविंग विल को विधिक मान्यता
अनुच्छेद 21A आयाम संवैधानिक प्रावधान एवं विधिक इतिहास (शिक्षा का मूल अधिकार)
संवैधानिक संशोधन 86वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा अनुच्छेद 21A अंतःस्थापित किया गया
मूल अधिदेश राज्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा विधि द्वारा विहित रीति से प्रदान करेगा
न्यायिक पृष्ठभूमि मोहिनी जैन वाद (1992) एवं उन्नीकृष्णन वाद (1993) में सर्वोच्च न्यायालय ने शिक्षा के अधिकार को अनुच्छेद 21 में समाहित माना था
संसदीय क्रियान्वयन निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम 2009 पारित; 1 अप्रैल 2010 से देश भर में लागू

10. अनुच्छेद 22 — गिरफ्तारी एवं निरोध से संरक्षण (साधारण बनाम निवारक निरोध)

निरोध का प्रकार संवैधानिक सुरक्षा उपाय एवं विधिक सीमाएं (अनुच्छेद 22)
साधारण दंड विधि अधीन गिरफ्तारी [22(1)-(2)] तीन अनिवार्य सुरक्षाएं: (1) गिरफ्तारी के आधार जानने का अधिकार, (2) अपनी पसंद के विधि व्यवसायी से परामर्श व प्रतिरक्षा का अधिकार, (3) 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने का अधिकार (यात्रा समय छोड़कर); मजिस्ट्रेट के प्राधिकार बिना अधिक निरोध अवैध
अपवाद [22(3)] शत्रु विदेशी (Enemy Aliens) तथा निवारक निरोध कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों को उपरोक्त तीनों सुरक्षाएं प्राप्त नहीं होतीं
निवारक निरोध (Preventive Detention) [22(4)-(7)] बिना न्यायिक परीक्षण के केवल अपराध की आशंका पर निरोध; अधिकतम अवधि 3 माह (उच्च न्यायालय के न्यायाधीश स्तर के सलाहकार बोर्ड की संस्तुति बिना 3 माह से अधिक निरोध नहीं); निरोध के आधार सूचित करना (लोकहित में तथ्य रोके जा सकते हैं); आदेश विरुद्ध अभ्यावेदन का शीघ्र अवसर
44वाँ संशोधन 1978 की स्थिति परामर्श बोर्ड की रिपोर्ट बिना निरोध की अधिकतम अवधि 3 माह से घटाकर 2 माह करने का प्रावधान किया गया था, किंतु यह प्रावधान आज तक लागू (अधिसूचित) नहीं किया गया
💡 निवारक निरोध (Preventive Detention): भारत विश्व का एकमात्र ऐसा लोकतांत्रिक देश है जहाँ शांतिकाल में भी संविधान के मूल अधिकारों के भाग में निवारक निरोध का स्पष्ट प्रावधान है (अनु. 22(4)-(7))।

11. शोषण के विरुद्ध अधिकार — अनुच्छेद 23 एवं 24

अनुच्छेद मूल प्रतिषेध संवैधानिक प्रावधान, अधिनियम एवं अपवाद
अनुच्छेद 23(1) मानव दुर्व्यापार व बेगार प्रतिषेध मानव तस्करी, बेगार तथा किसी भी रूप में बलात् श्रम (Forced Labour) निषिद्ध व दंडनीय; बंधुआ श्रम पद्धति (उन्मूलन) अधिनियम 1976, अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956
अनुच्छेद 23(2) अपवाद राज्य की अनिवार्य सेवा राज्य सार्वजनिक प्रयोजनों (सैन्य/नागरिक सेवा) हेतु अनिवार्य सेवा आरोपित कर सकता है; ऐसी सेवा में धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा
अनुच्छेद 24 बाल श्रम का पूर्ण प्रतिषेध 14 वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी कारखाने, खान या अन्य परिसंकटमय नियोजन (Hazardous Employment) में नियोजित नहीं किया जाएगा
बाल श्रम संशोधन (2016) विस्तारित प्रतिबंध ढांचा बाल श्रम (निषेध व विनियमन) संशोधन 2016: 14 वर्ष से कम बालकों के सभी व्यवसायों में नियोजन पर पूर्ण रोक; 14 से 18 वर्ष के किशोरों हेतु परिसंकटमय व्यवसायों में प्रतिबंध

12. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार — अनुच्छेद 25 से 28

अनुच्छेद धार्मिक स्वतंत्रता का आयाम संवैधानिक विषय-वस्तु एवं युक्तियुक्त सीमाएं
अनुच्छेद 25(1) अंतःकरण व धर्म की स्वतंत्रता सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक (धर्मांतरण कराने का मूल अधिकार नहीं); सीमाएं: लोक व्यवस्था, सदाचार व स्वास्थ्य
अनुच्छेद 25(2) स्पष्टीकरण सिख कृपाण व 'हिंदू' परिभाषा स्पष्टीकरण 1: सिखों द्वारा कृपाण धारण करना व लेकर चलना धार्मिक अंग मान्य; स्पष्टीकरण 2: हिंदुओं के धार्मिक संदर्भ में सिख, जैन एवं बौद्ध धर्मावलंबी सम्मिलित
अनुच्छेद 26 धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता धार्मिक संप्रदाय (Religious Denominations) को 4 अधिकार: (1) धार्मिक व पूर्त संस्थाओं की स्थापना/पोषण, (2) धर्म विषयक कार्यों का स्वयं प्रबंध, (3) संपत्ति का अर्जन व स्वामित्व, (4) विधि अनुसार प्रशासन
अनुच्छेद 27 धर्म की अभिवृद्धि हेतु कर मुक्ति किसी विशिष्ट धर्म या संप्रदाय के संवर्धन हेतु राज्य किसी नागरिक को कर (Tax) देने हेतु विवश नहीं कर सकता; कर निषिद्ध है, किंतु तीर्थयात्रियों की सुविधा/सेवाओं हेतु शुल्क (Fee) लगाना पूर्णतः वैध
अनुच्छेद 28 शैक्षणिक संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा राज्य-निधि से पूर्णतः पोषित संस्थाओं में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी; राज्य मान्यता प्राप्त या सहायता प्राप्त संस्थाओं में उपस्थित होने वाले व्यक्ति की सहमति के बिना धार्मिक शिक्षा/उपासना बाध्यकारी नहीं
संस्था की श्रेणी (अनुच्छेद 28) धार्मिक शिक्षा की संवैधानिक स्थिति
1. राज्य द्वारा पूर्णतः पोषित संस्थाएं धार्मिक शिक्षा पूर्णतः निषिद्ध (Completely Prohibited)
2. राज्य द्वारा प्रशासित किंतु किसी न्यास अधीन धार्मिक शिक्षा अनुमत (Permitted — जैसे कोई धार्मिक ट्रस्ट की संस्था)
3. राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थाएं स्वैच्छिक (Voluntary) — छात्र या संरक्षक की सहमति आवश्यक
4. राज्य से वित्तीय सहायता प्राप्त संस्थाएं स्वैच्छिक (Voluntary) — छात्र या संरक्षक की सहमति आवश्यक
💡 धर्मांतरण की स्थिति: रेवरेंड स्टेनिसलास वाद (1977) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25 में 'धर्म के प्रचार' का अर्थ किसी अन्य व्यक्ति को अपने धर्म में परिवर्तित (Convert) कराने का मूल अधिकार नहीं है।

13. संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार — अनुच्छेद 29 एवं 30

अनुच्छेद अल्पसंख्यक अधिकार आयाम संवैधानिक प्रावधान एवं न्यायिक सिद्धांत
अनुच्छेद 29(1) विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति संरक्षण भारत के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों के किसी भी अनुभाग (Section of Citizens) को अपनी बोली, भाषा, लिपि या संस्कृति सुरक्षित रखने का अधिकार (केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं)
अनुच्छेद 29(2) शिक्षण संस्थानों में भेदभाव निषेध राज्य द्वारा पोषित या राज्य-निधि से सहायता पाने वाले किसी भी शिक्षण संस्थान में प्रवेश से केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी आधार पर वंचित नहीं किया जाएगा
अनुच्छेद 30(1) अल्पसंख्यकों की संस्था स्थापना धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यकों (धार्मिक एवं भाषायी) को अपनी पसंद की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना एवं उनके प्रशासन का अनन्य अधिकार
अनुच्छेद 30(1A) 44th संशोधन अनिवार्य संपत्ति अर्जन गारंटी राज्य द्वारा अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान की संपत्ति का अनिवार्य अर्जन करने पर निर्धारित क्षतिपूर्ति ऐसी होगी जो उनके अधिकार को निर्बंधित न करे
अनुच्छेद 30(2) राज्य सहायता में समता शिक्षण संस्थाओं को सहायता देने में राज्य किसी संस्था के विरुद्ध इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगा कि वह धार्मिक/भाषायी अल्पसंख्यक के प्रबंध में है
टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन (2002) अल्पसंख्यक निर्धारण का पैमाना धार्मिक व भाषायी अल्पसंख्यक का निर्धारण राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि राज्य की जनसंख्या (State Population) के आधार पर किया जाएगा; राज्य शैक्षणिक मानक नियमन कर सकता है

14. संपत्ति के अधिकार की यात्रा (अनु. 300A) एवं रक्षात्मक उपबंध (अनु. 31A, 31B, 31C)

ऐतिहासिक चरण / संशोधन संवैधानिक स्थिति एवं विधिक स्वरूप
मूल संवैधानिक स्थिति (1950) अनुच्छेद 19(1)(f) (संपत्ति अर्जन, धारण व व्ययन) तथा अनुच्छेद 31 (विधि के प्राधिकार बिना संपत्ति से वंचित न करना) के तहत मूल अधिकार
44वाँ संशोधन अधिनियम 1978 संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों की सूची से पूर्णतः विलोपित किया गया; भाग (XII) के अध्याय (IV) में नया अनुच्छेद 300A जोड़ा गया
वर्तमान विधिक स्थिति (अनु. 300A) 'विधि के प्राधिकार के बिना किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा' — यह एक विधिक/संवैधानिक अधिकार (Legal/Constitutional Right) है, मूल अधिकार नहीं
व्यावहारिक अंतर उल्लंघन पर सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय नहीं जाया जा सकता (अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में रिट याचिका संभव)
रक्षात्मक अनुच्छेद संशोधन संरक्षण का स्वरूप एवं न्यायिक समीक्षा की सीमाएं
अनुच्छेद 31A 1st संशोधन 1951 जमींदारी उन्मूलन, संपदाओं (Estates) के राज्य द्वारा अर्जन, निगमों के समामेलन आदि से संबंधित 5 श्रेणियों की विधियों को अनुच्छेद 14 व 19 के उल्लंघन के आधार पर चुनौती से संरक्षण
अनुच्छेद 31B 1st संशोधन 1951 9वीं अनुसूची (Ninth Schedule) में शामिल किसी भी अधिनियम को मूल अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर शून्य घोषित नहीं किया जा सकता (व्यापक सुरक्षा कवच)
आई.आर. कोएल्हो वाद (2007) 9 जज ऐतिहासिक पीठ सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: 24 अप्रैल 1973 (केशवानंद भारती फैसला) के बाद 9वीं अनुसूची में शामिल सभी कानून न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन हैं (मूल संरचना परीक्षण)
अनुच्छेद 31C 25th संशोधन 1971 अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के नीति निदेशक तत्वों को लागू करने वाली विधियों को अनु. 14 व 19 के उल्लंघन पर अवैध नहीं ठहराया जाएगा; मिनर्वा मिल्स (1980): 42वें संशोधन का असीमित विस्तार निरस्त

15. अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) एवं 5 संवैधानिक रिटें

💡 अनुच्छेद 32 — 'संविधान का हृदय और आत्मा (Heart and Soul of the Constitution — डॉ. अंबेडकर)': यह स्वयं में एक मूल अधिकार है जो भाग (III) के अधिकारों के प्रवर्तन हेतु सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय मूल अधिकारों का रक्षक व गारंटर (Protector and Guarantor) है।
रिट का नाम (लैटिन नाम) शाब्दिक अर्थ जारी करने का उद्देश्य, परिस्थितियां एवं किसके विरुद्ध जारी (अनुच्छेद 32 व 226)
1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) 'शरीर प्रस्तुत करो (To have the body of)' अवैध रूप से बंदी बनाए गए व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश; निरोध की वैधता की जांच; सार्वजनिक प्राधिकारी एवं निजी व्यक्ति (Private Individual) दोनों के विरुद्ध जारी
2. परमादेश (Mandamus) 'हम आज्ञा देते हैं (We command)' सार्वजनिक अधिकारी या संस्था को उसके विधिक/संवैधानिक कर्तव्य के पालन का आदेश; केवल सार्वजनिक कर्तव्यों पर लागू; भारत के राष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपाल तथा निजी व्यक्तियों के विरुद्ध जारी नहीं
3. प्रतिषेध (Prohibition) 'प्रतिषेध करना / रोकना (To forbid)' उच्चतर न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय या अर्ध-न्यायिक अधिकरण को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकने हेतु जारी (कार्यवाही के दौरान; शुद्ध रूप से निवारक / Preventive)
4. उत्प्रेषण (Certiorari) 'पूर्णतया सूचित होना (To be certified)' अधीनस्थ न्यायालय/अधिकरण के आदेश को अधिकारिता के अभाव, अतिरेक या प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन पर निरस्त (Quash) करने हेतु जारी (निवारक एवं उपचारात्मक / Curative दोनों)
5. अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto) 'किस प्राधिकार से (By what authority)' सार्वजनिक पद पर किसी व्यक्ति के अवैध दावे की जांच; अनाधिकृत व्यक्ति को पद से हटाना; कोई भी नागरिक (पीड़ित होना आवश्यक नहीं) याचिका दायर कर सकता है
तुलनात्मक आधार सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226)
संवैधानिक प्रकृति अनुच्छेद 32 स्वयं में एक मूल अधिकार है; SC रिट जारी करने से इनकार नहीं कर सकता अनुच्छेद 226 एक संवैधानिक अधिकार है; उच्च न्यायालय का विवेकाधिकार (Discretionary) है
अधिकार क्षेत्र का दायरा केवल मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के प्रवर्तन हेतु रिट जारी कर सकता है (संकीर्ण) मूल अधिकारों के साथ-साथ अन्य किसी विधिक अधिकार (Other Legal Purpose) हेतु भी (व्यापक)
प्रादेशिक क्षेत्राधिकार संपूर्ण भारत राज्यक्षेत्र में किसी भी प्राधिकारी के विरुद्ध रिट जारी करने की शक्ति केवल अपने संबंधित राज्य राज्यक्षेत्र या जहाँ वाद हेतुक (Cause of Action) उत्पन्न हुआ हो

16. विशेष उपबंध — अनुच्छेद 33, 34 एवं 35 (संसद की अनन्य विधायी शक्तियां)

अनुच्छेद मूल विषय संवैधानिक प्रावधान एवं संसद की अनन्य शक्तियां
अनुच्छेद 33 सशस्त्र बलों के मूल अधिकार संसद विधि द्वारा सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस, आसूचना ब्यूरो (IB/RAW) एवं टेलीकॉम कर्मियों के मूल अधिकारों को सीमित या समाप्त कर सकती है (कोर्ट मार्शल अनु. 32/226 से मुक्त)
अनुच्छेद 34 मार्शल लॉ एवं मूल अधिकार जब किसी क्षेत्र में सेना विधि (Martial Law) प्रवृत्त हो, तब संसद विधि द्वारा व्यवस्था बनाए रखने वाले अधिकारियों के कृत्यों को क्षतिपूर्ति (Act of Indemnity) दे सकती है
अनुच्छेद 35 मूल अधिकारों पर विधि निर्माण मूल अधिकारों (अनु. 16(3), 32(3), 33, 34 तथा अनु. 17 व 23 के दंड) को प्रभावी करने की विधि निर्माण शक्ति केवल संसद को है, राज्य विधानमंडलों को नहीं

17. आपातकाल में मूल अधिकारों का निलंबन (अनुच्छेद 358 बनाम 359)

तुलनात्मक आधार अनुच्छेद 358 (अनुच्छेद 19 का स्वतः निलंबन) अनुच्छेद 359 (अन्य मूल अधिकारों का निलंबन)
निलंबन का विषय केवल अनुच्छेद 19 में वर्णित 6 स्वतंत्रताओं का स्वतः निलंबन राष्ट्रपति आदेश में विनिर्दिष्ट मूल अधिकारों के न्यायालयी प्रवर्तन का निलंबन
लागू होने का आधार केवल युद्ध या बाह्य आक्रमण (External Emergency) के आधार पर; सशस्त्र विद्रोह में नहीं युद्ध, बाह्य आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह (Internal Emergency) दोनों आधारों पर
अवधि व विस्तार आपातकाल की संपूर्ण अवधि हेतु संपूर्ण देश में स्वतः निलंबित राष्ट्रपति आदेश में उल्लिखित अवधि व उल्लिखित राज्यक्षेत्र तक सीमित
अनुलंघनीय अपवाद अनुच्छेद 19 स्वतः निलंबित 44वें संशोधन 1978 के बाद: अनुच्छेद 20 एवं 21 को कभी निलंबित नहीं किया जा सकता

18. मूल अधिकारों का नागरिक वर्गीकरण एवं अनुच्छेद 12–35 मास्टर संदर्भ

नागरिक स्थिति उपलब्ध अनुच्छेद संवैधानिक विवरण एवं सीमाएं
केवल भारतीय नागरिकों को अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, 30 5 अनुच्छेद: भेदभाव निषेध, अवसर समता, 6 स्वतंत्रताएं, अल्पसंख्यक भाषा/संस्कृति, शिक्षण संस्थान
सभी व्यक्तियों को प्राप्त अनुच्छेद 14, 20, 21, 21A, 22, 23, 24, 25, 26, 27, 28 11 अनुच्छेद: नागरिकों के साथ विदेशियों (विधिक व्यक्तियों/कंपनियों सहित) को उपलब्ध (शत्रु विदेशी को 22 प्राप्त नहीं)
अनु. अधिकार / विषय अनु. अधिकार / विषय
12 'राज्य' की संवैधानिक परिभाषा 24 कारखानों में बाल श्रम का प्रतिषेध
13 मूल अधिकारों से असंगत विधियां शून्य 25 अंतःकरण व धर्म की स्वतंत्रता
14 विधि समक्ष समता व समान संरक्षण 26 धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता
15 धर्म, जाति, लिंग आधार पर भेदभाव अंत 27 धर्म की अभिवृद्धि हेतु कर मुक्ति
16 लोक नियोजन में अवसर की समता 28 शैक्षणिक संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा
17 अस्पृश्यता का पूर्ण उन्मूलन व दंड 29 अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण
18 उपाधियों का अंत (सैन्य/शिक्षा छूट) 30 अल्पसंख्यकों के शिक्षण संस्थान
19 वाक्, सम्मेलन आदि 6 स्वतंत्रताएं 31 संपत्ति अधिकार (44वें संशोधन द्वारा विलोपित)
20 अपराध दोषसिद्धि संरक्षण (3 कवच) 32 संवैधानिक उपचार (5 रिट क्षेत्राधिकार)
21 प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार 33 सशस्त्र बलों के अधिकारों पर संसद शक्ति
21A 6 से 14 वर्ष निःशुल्क अनिवार्य शिक्षा 34 मार्शल लॉ लागू होने पर प्रतिबंध
22 गिरफ्तारी व निवारक निरोध संरक्षण 35 मूल अधिकारों को प्रभावी करने की विधि
अध्याय 04 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 04: राज्य नीति के निदेशक तत्व (DPSP) एवं मूल कर्तव्य (Fundamental Duties) — शॉर्ट नोट्स

Art 36-51 वर्गीकरण (समाजवादी/गांधीवादी/उदारवादी), FR vs DPSP विवाद, Art 51A (11 कर्तव्य)

1. (DPSP) — संवैधानिक पृष्ठभूमि, दार्शनिक आधार एवं विद्वानों के मत

संवैधानिक आयाम संवैधानिक स्थिति एवं ऐतिहासिक स्रोत
संवैधानिक अवस्थिति संविधान के भाग (IV) में अनुच्छेद 36 से 51 तक समाहित
ऐतिहासिक स्रोत आयरलैंड के संविधान (1937) से प्रेरित, जिसने इन्हें स्पेनिश संविधान से ग्रहण किया था
1935 अधिनियम से साम्य भारत शासन अधिनियम 1935 में उल्लिखित 'निर्देशों के साधन (Instrument of Instructions)' के समरूप
मूल अधिदेश व लक्ष्य कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की स्थापना करना तथा सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र (Socio-Economic Democracy) को धरातल पर उतारना (पुलिस राज्य की अवधारणा को समाप्त करना)
प्रख्यात विद्वान / विधिवेत्ता नीति निदेशक तत्वों के संबंध में आधिकारिक मत / प्रसिद्ध कथन
डॉ. बी.आर. अंबेडकर (DPSP) भारतीय संविधान की 'अनोखी विशेषता (Novel Features of the Constitution)' हैं
ग्रैनविल ऑस्टिन (Granville Austin) मूल अधिकार (Part III) एवं (DPSP) (Part IV) मिलकर 'संविधान की अंतरात्मा (Conscience of the Constitution)' कहलाते हैं
प्रो. के.टी. शाह (K.T. Shah) (DPSP) 'एक ऐसा चेक है जिसका भुगतान बैंक की सुविधा/इच्छा पर छोड़ दिया गया है (Cheque payable at convenience of bank)'
डॉ. एल.एम. सिंघवी (L.M. Singhvi) निदेशक तत्व संविधान को जीवन देने वाली जीवन-धाराएं (Life-giving provisions) हैं
सर आइवर जेनिंग्स (Sir Ivor Jennings) (DPSP) को 'पुण्य आकांक्षाएं (Pious aspirations)' एवं फेबियन समाजवाद का प्रतिरूप माना

2. अनुच्छेद 36, 37 एवं संशोधनों द्वारा जोड़े गए नवीन (DPSP)

आधारभूत अनुच्छेद संवैधानिक प्रावधान एवं विधिक प्रकृति
अनुच्छेद 36 ('राज्य' परिभाषा) निदेशक तत्वों के संदर्भ में 'राज्य' का वही अर्थ है जो भाग (III) के अनुच्छेद 12 में दिया गया है (केंद्र, राज्य, स्थानीय निकाय व अन्य सांविधिक प्राधिकरण)
अनुच्छेद 37 (विधिक प्रकृति) (DPSP) न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं (Non-justiciable) हैं; फिर भी ये 'देश के शासन में मूलभूत (Fundamental in governance)' हैं और कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है
संविधान संशोधन वर्ष जोड़े गए नवीन नीति निदेशक तत्व एवं संवैधानिक प्रभाव
42वाँ संशोधन 1976 4 नए अनुच्छेद जोड़े: (1) 39(f) — बच्चों का स्वस्थ विकास, (2) 39A — समान न्याय व गरीबों को निःशुल्क विधिक सहायता, (3) 43A — उद्योग प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी, (4) 48A — पर्यावरण व वन्यजीव संरक्षण
44वाँ संशोधन 1978 अनुच्छेद 38 में खंड (2) जोड़ा: राज्य आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानताओं को न्यूनतम करने का प्रयास करेगा
86वाँ संशोधन 2002 अनुच्छेद 45 की विषय-वस्तु बदली: 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की बाल्यावस्था देखरेख एवं प्रारंभिक शिक्षा (6 से 14 वर्ष शिक्षा अनु. 21A में मूल अधिकार बनी)
97वाँ संशोधन 2011 अनुच्छेद 43B जोड़ा: सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यप्रणाली, लोकतांत्रिक नियंत्रण एवं व्यावसायिक प्रबंधन को बढ़ावा देना

3. (DPSP) का वैचारिक वर्गीकरण — (1) समाजवादी सिद्धांत

अनुच्छेद समाजवादी सिद्धांत (Socialistic Principles) — सामाजिक-आर्थिक न्याय
अनुच्छेद 38 राज्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय द्वारा लोक कल्याण की अभिवृद्धि हेतु सामाजिक व्यवस्था बनाएगा; आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं की असमानता समाप्त करेगा [38(2)]
अनुच्छेद 39 6 विशिष्ट नीतिगत लक्ष्य: (a) सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधन, (b) भौतिक संसाधनों का स्वामित्व व नियंत्रण जनहित में, (c) धन और उत्पादन साधनों के संकेंद्रण की रोकथाम, (d) पुरुषों व स्त्रियों दोनों को समान कार्य हेतु समान वेतन, (e) कर्मकारों के स्वास्थ्य-शक्ति व बालकों की सुकुमार अवस्था का संरक्षण, (f) बालकों के स्वस्थ विकास के अवसर
अनुच्छेद 39A समान न्याय एवं गरीबों को निःशुल्क विधिक सहायता (Free Legal Aid) उपलब्ध कराना
अनुच्छेद 41 काम पाने, शिक्षा पाने तथा बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और निशक्तता की दशाओं में लोक सहायता पाने का अधिकार सुनिश्चित करना
अनुच्छेद 42 काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करना तथा प्रसूति सहायता (Maternity Relief) का उपबंध करना
अनुच्छेद 43 सभी कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी (Living Wage), शिष्ट जीवन-स्तर तथा अवकाश का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना
अनुच्छेद 43A उद्योगों के प्रबंधन में कर्मकारों (Workers) की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु कदम उठाना
अनुच्छेद 47 पोषाहार स्तर और जीवन-स्तर को ऊंचा उठाना तथा लोक स्वास्थ्य में सुधार करना राज्य का प्राथमिक कर्तव्य

4. (DPSP) का वैचारिक वर्गीकरण — (2) गांधीवादी सिद्धांत

अनुच्छेद गांधीवादी सिद्धांत (Gandhian Principles) — ग्राम स्वराज एवं कुटीर उद्योग
अनुच्छेद 40 ग्राम पंचायतों का गठन करना और उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों (Units of Self-Government) के रूप में कार्य करने हेतु आवश्यक शक्तियां व प्राधिकार प्रदान करना
अनुच्छेद 43 ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत अथवा सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों (Cottage Industries) को प्रोत्साहन देना
अनुच्छेद 43B सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त संचालन, लोकतांत्रिक नियंत्रण एवं व्यावसायिक प्रबंधन का संवर्धन करना (97वाँ संशोधन 2011)
अनुच्छेद 46 अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और अन्य दुर्बल वर्गों के शैक्षणिक एवं आर्थिक हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करना तथा सामाजिक अन्याय व शोषण से रक्षा करना
अनुच्छेद 47 औषधीय प्रयोजनों को छोड़कर स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह मादक पेयों (Intoxicating Drinks) तथा नशीले पदार्थों के उपभोग पर पूर्ण प्रतिषेध लगाना
अनुच्छेद 48 गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं के वध पर प्रतिबंध लगाना तथा उनकी नस्लों में सुधार के प्रयास करना

5. (DPSP) का वैचारिक वर्गीकरण — (3) उदार-बौद्धिक सिद्धांत

अनुच्छेद उदार-बौद्धिक सिद्धांत (Liberal-Intellectual Principles) — आधुनिकता व प्रगतिशील सोच
अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code — UCC): भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करना (विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना); गोवा में पुर्तगाली सिविल कोड 1867; उत्तराखंड 2024 में (UCC) लागू करने वाला स्वतंत्र भारत का प्रथम राज्य
अनुच्छेद 45 6 वर्ष से कम आयु के बालकों की बाल्यावस्था देखरेख एवं पूर्व-प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने का प्रयास करना (86वाँ संशोधन 2002 द्वारा प्रतिस्थापित)
अनुच्छेद 48 कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों (Modern & Scientific Lines) से संगठित करना
अनुच्छेद 48A पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और देश के वनों तथा वन्यजीवों की रक्षा करना (42वाँ संशोधन 1976)
अनुच्छेद 49 संसद द्वारा घोषित राष्ट्रीय महत्व वाले ऐतिहासिक स्मारकों, स्थानों और कलात्मक वस्तुओं का संरक्षण करना
अनुच्छेद 50 राज्य की लोक सेवाओं में कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण (Separation of Judiciary from Executive) सुनिश्चित करना
अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि: (a) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत संबंध, (b) अंतरराष्ट्रीय विधि व संधियों का आदर, (c) अंतरराष्ट्रीय विवादों का मध्यस्थता (Arbitration) द्वारा निपटारा

6. मूल अधिकार (FR) बनाम नीति निदेशक तत्व (DPSP) — तुलना

तुलनात्मक आधार मूल अधिकार (Fundamental Rights — भाग III) नीति निदेशक तत्व (DPSP — भाग IV)
संवैधानिक प्रकृति नकारात्मक (Negative) — राज्य के प्राधिकार को सीमित करते हैं; राज्य को कुछ करने से रोकते हैं सकारात्मक (Positive) — राज्य को जनकल्याण हेतु कुछ विशिष्ट कार्य करने का निर्देश देते हैं
न्यायिक प्रवर्तनीयता न्यायोचित (Justiciable) — हनन होने पर न्यायालय (अनु. 32/226) द्वारा सीधे लागू कराए जा सकते हैं गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) — इनके उल्लंघन पर न्यायालय द्वारा विधिक रूप से लागू नहीं कराया जा सकता
लोकतांत्रिक लक्ष्य राजनीतिक लोकतंत्र (Political Democracy) की स्थापना करते हैं सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र (Socio-Economic Democracy) की स्थापना करते हैं
प्रतिबंध / संस्वीकृति कानूनी संस्वीकृति (Legal Sanctions) प्राप्त है; उल्लंघन करने वाला कानून शून्य घोषित होता है नैतिक एवं राजनीतिक संस्वीकृति (Moral & Political Sanctions) प्राप्त है; जनमत की अदालत में जवाबदेही
कल्याणकारी दृष्टिकोण व्यक्तिवादी (Individualistic) — व्यक्ति के अधिकारों व विकास को प्राथमिकता देते हैं समुदायवादी (Socialistic) — संपूर्ण समाज के सामूहिक कल्याण और समता को बढ़ावा देते हैं
स्वतः प्रवर्तन अधिकांश अधिकार स्वतः प्रवर्तनीय (Self-executing) हैं स्वतः लागू नहीं होते; इन्हें प्रभावी करने हेतु संसद द्वारा कानून बनाना अनिवार्य है
आपातकालीन स्थिति अनुच्छेद 20 व 21 को छोड़कर राष्ट्रीय आपातकाल में निलंबित किए जा सकते हैं निलंबित नहीं होते; ये राज्य के निरंतर नीतिगत दिशा-निर्देश हैं

7. FR बनाम (DPSP) का न्यायिक संघर्ष — कालरेखा एवं ऐतिहासिक निर्णय

न्यायिक वाद / घटना वर्ष सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय एवं संवैधानिक टकराव
चंपाकम दोरईराजन वाद 1951 मूल अधिकार सर्वोच्च हैं; FR और (DPSP) में टकराव की स्थिति में FR प्रभावी होंगे, (DPSP) उनके सहायक (Subsidiary) के रूप में कार्य करेंगे (संसद ने 1st संशोधन द्वारा अनु. 15(4) जोड़ा)
गोलकनाथ बनाम पंजाब 1967 संसद मूल अधिकारों में कोई संशोधन नहीं कर सकती, (DPSP) को लागू करने के लिए भी नहीं; मूल अधिकारों को अनुल्लंघनीय व अलौकिक दर्जा दिया गया
24वाँ व 25वाँ संशोधन 1971 अनुच्छेद 31C जोड़ा गया: यदि कोई कानून अनु. 39(b) व 39(c) के (DPSP) को लागू करने हेतु बनाया जाए, तो उसे अनु. 14, 19 के उल्लंघन पर अवैध नहीं ठहराया जाएगा
केशवानंद भारती वाद 1973 अनुच्छेद 31C के प्रथम भाग को वैध माना (39b व 39c की FR पर वरीयता स्वीकार); द्वितीय भाग (न्यायिक समीक्षा पर रोक) को मूल ढांचे के आधार पर अवैध घोषित किया
42वाँ संशोधन 1976 अनुच्छेद 31C का विस्तार कर सभी (DPSP) को मूल अधिकार (अनु. 14 व 19) पर सर्वोच्चता देने का प्रयास किया
मिनर्वा मिल्स वाद 1980 सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: 42वें संशोधन का विस्तार असंवैधानिक घोषित; 'संविधान की नींव FR और (DPSP) के संतुलन पर टिकी है — ये दोनों एक रथ के दो पहिए हैं' (संतुलन मूल संरचना)

8. (DPSP) का क्रियान्वयन (संसदीय कानून, योजनाएं एवं राजस्थान)

(DPSP) अनुच्छेद प्रमुख विधायी कानून, राष्ट्रीय योजनाएं एवं राजस्थान की विशिष्ट पहल
अनुच्छेद 40 (पंचायती राज) राजस्थान के नागौर में 2 अक्टूबर 1959 को देश में सर्वप्रथम पंचायती राज का उद्घाटन (पं. जवाहरलाल नेहरू); 73वाँ व 74वाँ संविधान संशोधन 1992 द्वारा संवैधानिक दर्जा
अनुच्छेद 39(d) व 41-43 न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976, मातृत्व लाभ अधिनियम 1961, मनरेगा (MGNREGA 2005 — 100 दिन रोजगार गारंटी), कर्मकार प्रतिकर अधिनियम
अनुच्छेद 39A (विधिक सहायता) विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम (NALSA 1987) — गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता; लोक अदालतें एवं स्थाई लोक अदालतें
अनुच्छेद 47 व 48 (स्वास्थ्य/गोवंश) राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM), खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA 2013); राजस्थान गोवंश पशु (वध का प्रतिषेध और अस्थायी प्रवासन या निर्यात का विनियमन) अधिनियम 1995
अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण) वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, वन संरक्षण अधिनियम 1980, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम (NGT 2010), प्रोजेक्ट टाइगर (1973)
💡 वर्तमान संवैधानिक स्थिति: केवल अनुच्छेद 39(b) और 39(c) में उल्लिखित समाजवादी (DPSP) को अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 के मूल अधिकारों पर वरीयता प्राप्त है (अनुच्छेद 31C के तहत); शेष सभी (DPSP) मूल अधिकारों के अधीनस्थ हैं।

9. मूल कर्तव्य (Fundamental Duties) — पृष्ठभूमि, स्वर्ण सिंह समिति एवं 86वाँ संशोधन

संवैधानिक आयाम संवैधानिक प्रावधान एवं ऐतिहासिक तथ्य (अनुच्छेद 51A)
ऐतिहासिक प्रेरणा व स्रोत पूर्व सोवियत संघ (USSR) के संविधान से प्रेरित; लोकतांत्रिक विश्व में केवल जापान के संविधान में नागरिकों के कर्तव्यों का विस्तृत उल्लेख है
संवैधानिक अवस्थिति 42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा संविधान में नया भाग (IVA) एवं नया अनुच्छेद 51A अंतःस्थापित किया गया
कर्तव्यों की संख्या 1976 में 10 मूल कर्तव्य जोड़े गए थे; 86वें संविधान संशोधन 2002 द्वारा 11वाँ मूल कर्तव्य जोड़ा गया
विधिक प्रकृति एवं सीमाएं गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) — न्यायालय द्वारा सीधे दंडनीय नहीं; केवल भारतीय नागरिकों पर लागू (विदेशी नागरिकों पर लागू नहीं); नैतिक एवं नागरिक कर्तव्यों का समन्वय
सरदार स्वर्ण सिंह समिति (1976) स्वीकृत सिफारिशें एवं संसद द्वारा अस्वीकृत प्रमुख बिंदु
समिति का गठन व उद्देश्य 1976 में आपातकाल के दौरान कांग्रेस सरकार द्वारा मूल कर्तव्यों पर सिफारिश हेतु गठित; समिति ने संविधान में 8 मूल कर्तव्य जोड़ने की सिफारिश की थी (संसद ने 10 जोड़े)
अस्वीकृत: कर भुगतान कर्तव्य समिति ने सिफारिश की थी कि 'कर अदायगी (Duty to pay taxes)' नागरिकों का एक मूल कर्तव्य होना चाहिए — इसे संसद ने अस्वीकार कर दिया
अस्वीकृत: कर्तव्य उल्लंघन पर दंड कर्तव्यों का पालन न करने पर संसद द्वारा दंड या सजा का प्रावधान करने की सिफारिश की गई थी — इसे स्वीकार नहीं किया गया
अस्वीकृत: न्यायिक उन्मुक्ति दंड संबंधी कानून को किसी भी मूल अधिकार उल्लंघन के आधार पर अदालत में चुनौती न दिए जाने की सिफारिश की गई थी — इसे भी अस्वीकार कर दिया गया

10. 11 मूल कर्तव्यों की आधिकारिक सूची [अनुच्छेद 51A(a) से 51A(k)]

क्र. [खंड] मूल कर्तव्य की विषय-वस्तु [अनुच्छेद 51A] कर्तव्य की प्रकृति
1. [51A(a)] संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे नागरिक कर्तव्य
2. [51A(b)] स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे नैतिक कर्तव्य
3. [51A(c)] भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे नागरिक कर्तव्य
4. [51A(d)] देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे नागरिक कर्तव्य
5. [51A(e)] भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे; महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध कुप्रथाओं का त्याग करे नागरिक + नैतिक
6. [51A(f)] हमारी सामासिक संस्कृति (Composite Culture) की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे नैतिक कर्तव्य
7. [51A(g)] प्राकृतिक पर्यावरण की (वन, झील, नदी और वन्यजीव सहित) रक्षा करे, संवर्धन करे तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखे नागरिक कर्तव्य
8. [51A(h)] वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper), मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे नागरिक कर्तव्य
9. [51A(i)] सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे (Abjure Violence) नागरिक कर्तव्य
10. [51A(j)] व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधि के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे (ताकि राष्ट्र निरंतर नई ऊंचाइयों को छुए) नागरिक कर्तव्य
11. [51A(k)] 6 से 14 वर्ष की आयु के अपने बालक या प्रतिपाल्य को शिक्षा के अवसर प्रदान करे (86वाँ संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा अंतःस्थापित) नागरिक कर्तव्य

11. न्यायमूर्ति वर्मा समिति (1999) एवं विधिक प्रावधान

विधिक अधिनियम संबंधित मूल कर्तव्य एवं प्रवर्तन की कानूनी स्थिति
राष्ट्र गौरव अपमान निवारण अधिनियम 1971 संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का अनादर दंडनीय अपराध [51A(a) का कानूनी प्रवर्तन]
सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 जाति एवं धर्म से संबंधित भेदभाव व अस्पृश्यता के आचरण पर दंड [51A(e) का प्रवर्तन]
भारतीय दंड संहिता (IPC / BNS) राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन व सांप्रदायिक वैमनस्य पर आपराधिक दंड [51A(c) व 51A(e)]
विधि विरुद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम (UAPA 1967) सांप्रदायिक व अलगाववादी संगठनों को गैर-कानूनी घोषित करने की शक्ति [51A(c)]
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 धर्म, जाति, भाषा के आधार पर वोट मांगने या वैमनस्य फैलाने वाले प्रत्याशियों की अयोग्यता [51A(e)]
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 व वन संरक्षण 1980 दुर्लभ वनस्पतियों, वन्यजीवों के शिकार व वनों के अंधाधुंध कटान पर कठोर दंड [51A(g)]

12. भाग (IV) के बाहर संविधान में वर्णित अन्य निदेशक सिद्धांत

अनुच्छेद संविधान का भाग विषय-वस्तु एवं विधिक अधिदेश
अनुच्छेद 335 भाग (XVI) सेवाओं और पदों के लिए अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के दावों का ध्यान रखना (प्रशासन की दक्षता बनाए रखते हुए)
अनुच्छेद 350A भाग (XVII) भाषायी अल्पसंख्यक-वर्ग के बालकों को प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएं प्रदान करने का राज्य का प्रयास
अनुच्छेद 351 भाग (XVII) हिंदी भाषा के प्रसार, विकास और संवर्धन हेतु संघ का कर्तव्य, ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके

13. (DPSP) (अनुच्छेद 36–51) एवं मूल कर्तव्य (51A) मास्टर संदर्भ

अनु. विषय / अधिदेश अनु. विषय / अधिदेश
36 'राज्य' की संवैधानिक परिभाषा 44 समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करना
37 (DPSP) गैर-न्यायोचित, शासन में मूलभूत 45 6 वर्ष से कम बालकों की बाल्यावस्था देखरेख
38 सामाजिक-आर्थिक न्याय व असमानता अंत 46 SC, ST व दुर्बल वर्गों के शैक्षणिक-आर्थिक हित
39 6 नीतिगत लक्ष्य (समान कार्य समान वेतन) 47 पोषाहार स्तर, जीवन स्तर व मद्यनिषेध
39A समान न्याय व मुफ्त कानूनी सहायता 48 कृषि एवं पशुपालन का वैज्ञानिक संगठन
40 ग्राम पंचायतों का स्वायत्त गठन 48A पर्यावरण, वन एवं वन्यजीवों की रक्षा
41 काम, शिक्षा व लोक सहायता का अधिकार 49 राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों का संरक्षण
42 काम की मानवोचित दशा व प्रसूति सहायता 50 कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण
43 कर्मकारों हेतु निर्वाह मजदूरी व कुटीर उद्योग 51 अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की अभिवृद्धि
43A उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी 51A 11 मूल कर्तव्य (स्वर्ण सिंह समिति 1976)
43B सहकारी समितियों का संवर्धन (97वाँ संशोधन) — 42वें/44वें/86वें/97वें संशोधन से (DPSP) समृद्ध
अध्याय 05 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 05: संविधान संशोधन प्रक्रिया एवं आधारभूत ढांचा सिद्धांत — शॉर्ट नोट्स

अनुच्छेद 368 के 3 प्रकार, शंकरी प्रसाद से मिनर्वा मिल्स तक वाद, मूल ढांचे के 20+ घटक

1. संशोधन की आवश्यकता, कठोर बनाम लचीला समन्वय एवं भाग (XX)

संवैधानिक आयाम संवैधानिक प्रावधान एवं दार्शनिक आधार (अनुच्छेद 368)
संवैधानिक अवस्थिति संविधान के भाग (XX) में केवल एक अनुच्छेद — अनुच्छेद 368 (संविधान का संशोधन करने की संसद की शक्ति और उसके लिए प्रक्रिया)
ऐतिहासिक स्रोत दक्षिण अफ्रीका के संविधान से प्रेरित
कठोर बनाम लचीला समन्वय न अमेरिका की तरह अत्यधिक कठोर (Rigid — 3/4 राज्यों की सहमति), न ब्रिटेन की तरह अत्यधिक लचीला (Flexible — साधारण कानून समान); ग्रैनविल ऑस्टिन: कठोरता व लचीलेपन का स्वर्णिम संतुलन (Synthesis)
शक्ति व प्रक्रिया स्पष्टीकरण 24वें संविधान संशोधन 1971 द्वारा स्पष्ट किया गया कि अनुच्छेद 368 में संसद की विधायी नहीं बल्कि संविधान निर्मात्री शक्ति (Constituent Power) एवं प्रक्रिया दोनों समाहित हैं
प्रक्रिया के 7 चरण संवैधानिक अधिदेश एवं प्रक्रियात्मक नियम (अनुच्छेद 368)
1. विधेयक की प्रस्तुति संविधान संशोधन विधेयक केवल संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में प्रस्तुत किया जा सकता है; राज्य विधानमंडलों में नहीं
2. प्रस्तुतकर्ता की स्थिति विधेयक मंत्री अथवा गैर-सरकारी सदस्य (Private Member) किसी के भी द्वारा पेश किया जा सकता है
3. राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति संशोधन विधेयक प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Prior Permission) की आवश्यकता नहीं होती
4. दोनों सदनों में पारण प्रत्येक सदन में अलग-अलग विशेष बहुमत (कुल सदस्य संख्या का बहुमत + उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3) से पारित होना अनिवार्य
5. संयुक्त बैठक का अभाव दोनों सदनों के बीच असहमति होने पर गतिरोध सुलझाने हेतु संयुक्त बैठक (Joint Sitting — अनु. 108) का कोई प्रावधान नहीं (असहमति पर विधेयक समाप्त)
6. राज्यों का अनुसमर्थन यदि संशोधन संघीय ढांचे से संबंधित है, तो कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत (Simple Majority) से अनुसमर्थन आवश्यक
7. राष्ट्रपति की अनिवार्य सहमति दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति सहमति देने हेतु बाध्य हैं (24वें संशोधन 1971 द्वारा 'सहमति देगा' अनिवार्य; वीटो या पुनर्विचार की शक्ति नहीं)

2. संविधान संशोधन की 3 विधियां (अनुच्छेद 368 के बाहर एवं अधीन)

संशोधन की विधि पारित करने का बहुमत संबंधित विषय एवं संवैधानिक उपबंध
1. साधारण बहुमत (Simple Majority) उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का 50%+1 बहुमत (यह अनुच्छेद 368 के दायरे से बाहर है — अनु. 4, 169, 239A) नए राज्यों का प्रवेश/गठन/सीमा परिवर्तन (अनु. 2, 3, 4), राज्यों में विधान परिषद का सृजन/समाप्ति (अनु. 169), नागरिकता अर्जन व समाप्ति, संसद में गणपूर्ति (Quorum) व सदस्यों के वेतन/भत्ते, संसद की कार्यप्रणाली के नियम, राजभाषा का प्रयोग, 5वीं व 6वीं अनुसूची का प्रशासन
2. विशेष बहुमत (Special Majority) सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत + उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 बहुमत (अनुच्छेद 368 अधीन) मूल अधिकार (Fundamental Rights — भाग III), राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP — भाग IV), तथा अन्य सभी उपबंध जो श्रेणी 1 एवं श्रेणी 3 में शामिल नहीं हैं
3. विशेष बहुमत + आधे राज्यों का अनुसमर्थन संसद का विशेष बहुमत + कम से कम 50% राज्यों के विधानमंडलों का साधारण बहुमत (Federal Provisions) संघीय ढांचे से जुड़े उपबंध: (1) राष्ट्रपति का निर्वाचन व रीति (अनु. 54, 55), (2) संघ व राज्यों की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार (अनु. 73, 162), (3) उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय (भाग V अध्याय 4, भाग VI अध्याय 5), (4) संघ व राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण (7वीं अनुसूची), (5) संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व (4थी अनुसूची), (6) स्वयं अनुच्छेद 368 में संशोधन

3. संशोधन प्रक्रिया की प्रमुख आलोचनाएं एवं कमियां

कमियां / आलोचना का आधार संवैधानिक स्थिति एवं विधिक प्रभाव
विशेष संविधान सभा का अभाव अमेरिका की तरह संशोधन हेतु किसी पृथक संवैधानिक सम्मेलन (Constitutional Convention) या परिषद का कोई प्रावधान नहीं; संसद ही संविधान निर्मात्री शक्ति का प्रयोग करती है
राज्यों को पहल का अधिकार नहीं संविधान संशोधन की प्रक्रिया आरंभ करने का अधिकार केवल संसद को है; कोई भी राज्य विधानमंडल संशोधन विधेयक प्रस्तुत नहीं कर सकता (केवल अनु. 169 का प्रस्ताव छोड़)
राज्यों के अनुसमर्थन की समय-सीमा नहीं संविधान में यह उल्लेख नहीं है कि राज्य विधानमंडल कितने समय के भीतर संशोधन विधेयक को अपनी सहमति देंगे या अस्वीकार करेंगे
संयुक्त बैठक का अभाव संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों में गतिरोध होने पर संयुक्त बैठक नहीं बुलाई जा सकती, जिससे उच्च सदन (राज्यसभा) को भी लोकसभा के समान वीटो शक्ति प्राप्त हो जाती है
न्यायिक समीक्षा का विस्तार अस्पष्ट शब्दावली के कारण संशोधन प्रक्रिया अक्सर लंबी न्यायिक लड़ाइयों और मुकदमों में उलझ जाती है

4. आधारभूत ढांचा सिद्धांत — उद्भव की कालरेखा (1951 से 1973)

ऐतिहासिक वाद / संशोधन वर्ष सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय एवं संवैधानिक टकराव यात्रा
शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ 1951 1st संशोधन वैध ठहराया; अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन की शक्ति में मूल अधिकारों में संशोधन भी शामिल है; अनु. 368 के तहत संशोधन अनु. 13 की 'विधि' में शामिल नहीं
सज्जन सिंह बनाम राजस्थान 1965 17th संशोधन वैध; शंकरी प्रसाद निर्णय दोहराया; न्यायमूर्ति मुधोलकर ने अपने असहमति मत में प्रथम बार 'संविधान के बुनियादी तत्वों (Basic Features)' का संकेत दिया
गोलकनाथ बनाम पंजाब (11 जज) 1967 6:5 बहुमत से शंकरी प्रसाद का फैसला पलटा; संसद मूल अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती; अनु. 368 केवल प्रक्रिया है शक्ति नहीं; भावी लक्षी अधिनिर्णय (Prospective Overruling)
24वाँ संशोधन अधिनियम 1971 संसद ने अनु. 13 व 368 में संशोधन किया; अनु. 368 में संशोधन शक्ति व प्रक्रिया दोनों समाहित; अनु. 13 की कोई बात अनु. 368 पर लागू नहीं; राष्ट्रपति सहमति हेतु बाध्य
केशवानंद भारती केस (13 जज) 1973 24 अप्रैल 1973 (7:6 बहुमत, 703 पृष्ठ); 24वें संशोधन को वैध माना; निर्णय: संसद मूल अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, किंतु 'आधारभूत ढांचे (Basic Structure)' को नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकती

5. केशवानंद भारती के बाद के ऐतिहासिक वाद (मूल संरचना का विस्तार)

न्यायिक वाद वर्ष सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय एवं घोषित आधारभूत तत्व
इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राजनारायण 1975 39वें संशोधन की धारा 4 रद्द (प्रधानमंत्री चुनाव को न्यायिक समीक्षा से बाहर रखने का प्रयास); स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव, विधि का शासन एवं न्यायिक समीक्षा मूल ढांचा
मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ 1980 42वें संशोधन द्वारा अनु. 368(4) व (5) में जोड़ी गई असीमित संशोधन शक्ति रद्द; संसद की सीमित संशोधन शक्ति स्वयं मूल ढांचा; (FR) व (DPSP) का संतुलन मूल ढांचा
वामन राव बनाम भारत संघ 1981 24 अप्रैल 1973 की कटऑफ रेखा तय; इस तिथि के बाद 9वीं अनुसूची में शामिल सभी कानून मूल ढांचे के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगे
एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ 1994 पंथनिरपेक्षता (Secularism), संघवाद (Federalism) एवं लोकतंत्र को मूल ढांचा घोषित किया; अनु. 356 के तहत राज्य सरकारों की मनमानी बर्खास्तगी पर न्यायिक रोक
आई.आर. कोएल्हो वाद (9 जज) 2007 पुनः पुष्टि: 9वीं अनुसूची को पूर्ण उन्मुक्ति नहीं; मूल अधिकारों के सार (Essence of FR) का उल्लंघन करने वाले कानून न्यायिक समीक्षा में शून्य होंगे
एनजेएसी वाद (NJAC Case — 99th) 2015 99वाँ संशोधन व राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम असंवैधानिक घोषित; न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of Judiciary) मूल ढांचा

6. आधारभूत ढांचे (Basic Structure) के प्रमुख तत्व (न्यायिक निर्णयों का सार)

क्र. आधारभूत ढांचे के प्रमुख संवैधानिक तत्व प्रथम निर्धारक न्यायिक वाद
1 संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of Constitution) केशवानंद भारती (1973)
2 संप्रभु, लोकतांत्रिक एवं गणराज्यीय स्वरूप केशवानंद भारती (1973)
3 धर्मनिरपेक्षता / पंथनिरपेक्षता (Secular Character) केशवानंद (1973), बोम्मई (1994)
4 विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका में शक्ति पृथक्करण केशवानंद भारती (1973)
5 संविधान का संघीय स्वरूप (Federal Character) केशवानंद (1973), बोम्मई (1994)
6 राष्ट्र की एकता एवं अखंडता (Unity and Integrity) केशवानंद भारती (1973)
7 कल्याणकारी राज्य एवं सामाजिक-आर्थिक न्याय केशवानंद भारती (1973)
8 न्यायिक समीक्षा की शक्ति (Judicial Review — अनु. 32, 226) इंदिरा गांधी (1975), मिनर्वा मिल्स
9 व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा केशवानंद भारती (1973)
10 संसदीय शासन प्रणाली (Parliamentary System) केशवानंद भारती (1973)
11 विधि का शासन (Rule of Law) इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण (1975)
12 मूल अधिकार एवं नीति निदेशक तत्वों में संतुलन मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)
13 समता का सिद्धांत (Principle of Equality) इंदिरा गांधी (1975), मिनर्वा मिल्स
14 स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव (Free and Fair Elections) इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण (1975)
15 न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of Judiciary) द्वितीय न्यायाधीश (1993), (NJAC 2015)
16 अनुच्छेद 368 के तहत संसद की सीमित संशोधन शक्ति मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)
💡 आधारभूत ढांचा सिद्धांत का संवैधानिक सार: संसद की संविधान संशोधन शक्ति 'सृजनात्मक (Original)' नहीं बल्कि संविधान द्वारा 'प्रदत्त (Conferred)' सीमित शक्ति है। एक निर्मित निकाय अपने ही निर्माता (संविधान) के मूल दर्शन को नष्ट नहीं कर सकता।

7. प्रमुख ऐतिहासिक संविधान संशोधनों की मास्टर रिवीजन तालिका

संशोधन वर्ष प्रमुख विषय-वस्तु एवं ऐतिहासिक संवैधानिक प्रभाव
1st 1951 9वीं अनुसूची जोड़ी गई; अनु. 15(4) पिछड़ा वर्ग आरक्षण; अनु. 19(2) में लोक व्यवस्था व विदेश संबंध निर्बंधन
7th 1956 राज्य पुनर्गठन (14 राज्य व 6 UT); श्रेणियों (A,B,C,D) का अंत; दो या अधिक राज्यों हेतु एक उच्च न्यायालय
24th 1971 संसद को मूल अधिकारों में संशोधन शक्ति स्पष्ट; राष्ट्रपति संशोधन विधेयक पर सहमति देने हेतु बाध्य
42nd 1976 'मिनी संविधान': उद्देशिका में 3 शब्द (समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता); भाग (IVA) 51A मूल कर्तव्य; 39A, 43A, 48A
44th 1978 संपत्ति मूल अधिकार समाप्त (अनु. 300A विधिक); 'आंतरिक अशांति' हटाकर 'सशस्त्र विद्रोह'; अनु. 20-21 कभी निलंबित नहीं
52nd 1985 10वीं अनुसूची जोड़ी गई — दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) लागू
61st 1989 मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई (अनुच्छेद 326 में संशोधन)
73rd व 74th 1992 पंचायती राज संस्थाओं (11वीं अनुसूची — 29 विषय) एवं नगर पालिकाओं (12वीं अनुसूची — 18 विषय) को संवैधानिक दर्जा
86th 2002 अनुच्छेद 21A शिक्षा मूल अधिकार (6-14 वर्ष); अनु. 45 संशोधित; 11वाँ मूल कर्तव्य [51A(k)] जोड़ा गया

7. प्रमुख संविधान संशोधन (क्रमशः 91st से 106th)

संशोधन वर्ष प्रमुख विषय-वस्तु एवं ऐतिहासिक संवैधानिक प्रभाव
91st 2003 मंत्रिपरिषद का आकार लोकसभा/विधानसभा सदस्य संख्या के अधिकतम 15% तक सीमित (न्यूनतम 12 मंत्री)
99th 2014 राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) का गठन — 2015 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा असंवैधानिक घोषित
101st 2016 वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू किया गया (अनुच्छेद 246A, 269A, 279A अंतःस्थापित)
102nd 2018 राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को संवैधानिक दर्जा (अनुच्छेद 338B व 342A अंतःस्थापित)
103rd 2019 आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को शिक्षण संस्थानों व नौकरियों में 10% आरक्षण (अनु. 15(6) व 16(6))
104th 2020 लोकसभा व विधानसभाओं में SC/ST आरक्षण 10 वर्ष बढ़ाया; एंग्लो-इंडियन नामांकन व्यवस्था समाप्त
105th 2021 राज्यों को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों (SEBC) की पहचान करने की शक्ति पुनः बहाल
106th 2023 नारी शक्ति वंदन अधिनियम — लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण (15 वर्ष हेतु)
अध्याय 06 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 06: नवीन संवैधानिक विकास, न्यायिक निर्णय एवं संवैधानिक नैतिकता — शॉर्ट नोट्स

अंबेडकर का विज़न, सबरीमाला/नवतेज/पुट्टास्वामी वाद, कॉलेजियम, NJAC, EWS (103वां संशोधन)

1. संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) — अर्थ, उत्पत्ति एवं विकास

अवधारणा / आयाम संवैधानिक अर्थ, ऐतिहासिक उत्पत्ति एवं दार्शनिक आधार
संवैधानिक नैतिकता की परिभाषा संविधान के मूल मूल्यों — स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, न्याय, विधि का शासन, बहुलवाद तथा व्यक्ति की गरिमा के प्रति सर्वोच्च निष्ठा; भले ही यह समाज की प्रचलित पारंपरिक या बहुसंख्यक नैतिकता से टकराती हो
ऐतिहासिक उद्भव (George Grote) 19वीं सदी के ब्रिटिश इतिहासकार जॉर्ज ग्रोट ने 'हिस्ट्री ऑफ ग्रीस' में इस अवधारणा का सर्वप्रथम प्रतिपादन किया — संवैधानिक रूपों का पूर्ण आदर एवं सत्ता के अंगों में संयम
डॉ. बी.आर. अंबेडकर (1948) 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में अंबेडकर ने कहा: 'संवैधानिक नैतिकता कोई प्राकृतिक सहज भावना नहीं है, इसे विकसित करना पड़ता है; हमारे देश की जनता को अभी इसे पूरी तरह सीखना बाकी है'
न्यायिक पुनर्जीवन मनोज नरूला बनाम भारत संघ (2014) में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पुनः रेखांकित किया; 2018 के ऐतिहासिक फैसलों (नवतेज जौहर, सबरीमाला, जोसेफ शाइन) में यह न्यायपालिका का मुख्य आधार बना
तुलनात्मक आधार संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) सार्वजनिक / बहुसंख्यक नैतिकता (Popular Morality)
स्रोतों का आधार संविधान के मूल दर्शन, प्रस्तावना, मूल अधिकार (Part III) एवं मानवीय गरिमा पर आधारित समाज की स्थापित परंपराओं, रूढ़ियों, धर्म, मान्यताओं तथा बहुसंख्यक वर्ग की प्राथमिकताओं पर आधारित
परिवर्तनशीलता प्रगतिशील, जीवंत और मानवीय अधिकारों का विस्तार करने वाली (Living Tree Model) प्रायः यथास्थितिवादी, रूढ़िवादी तथा सामाजिक पूर्वाग्रहों से प्रभावित
टकराव की स्थिति में संवैधानिक नैतिकता सदैव सर्वोच्च होगी; न्यायालय जनमत या बहुसंख्यक भावना के दबाव में नहीं आ सकता बहुसंख्यक भावना को संविधान के मूलभूत अधिकारों (अनु. 14, 15, 21) पर थोपा नहीं जा सकता
न्यायिक अधिदेश न्यायालय का कर्तव्य बहुसंख्यक समाज को खुश करना नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक व हाशिए के वर्गों की गरिमा की रक्षा करना है केवल जनभावना का आदर करती है, जो समय-समय पर मनमानी और असहिष्णु हो सकती है

2. संवैधानिक नैतिकता के 4 आधार स्तंभ एवं आलोचनात्मक मूल्यांकन

स्तंभ / आलोचना संवैधानिक सिद्धांत एवं विधिक सीमाएं
1. विधि का शासन (Rule of Law) कानून के समक्ष सभी समान; सत्ता का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं, स्थापित विधिक नियमों के अनुसार ही संभव
2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता व गरिमा व्यक्ति स्वयं में एक साध्य (End) है, साधन नहीं; प्रत्येक नागरिक की गरिमा व स्वायत्तता अनुल्लंघनीय है
3. संस्थागत संयम व संतुलन संविधान के तीनों अंगों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) द्वारा अपनी संवैधानिक सीमाओं का स्वेच्छा से पालन
आलोचना: न्यायिक व्यक्तिपरकता संवैधानिक नैतिकता की कोई स्पष्ट वैधानिक परिभाषा न होने से न्यायाधीशों के व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों (Subjectivity) का खतरा
आलोचना: शक्ति पृथक्करण उल्लंघन विधायिका के नीतिगत अधिकारों में न्यायपालिका का अनुचित हस्तक्षेप; 'न्यायिक कानून-निर्माण (Judicial Legislation)' की आशंका

3. ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय (2017–2019) — संवैधानिक मूल्यों का विस्तार

ऐतिहासिक वाद / वर्ष पीठ / अनुच्छेद संवैधानिक मुद्दे, ऐतिहासिक निर्णय एवं विधिक प्रभाव
के.एस. पुट्टास्वामी वाद (2017) 9 जज संविधान पीठ [अनु. 21] निजता का अधिकार (Right to Privacy) अनुच्छेद 21 के तहत अंतर्निहित मूल अधिकार घोषित; खड़क सिंह (1962) व एम.पी. शर्मा (1954) के संकीर्ण निर्णय निरस्त; 3-स्तरीय परीक्षण (Legality, Need, Proportionality)
नवतेज सिंह जौहर वाद (2018) 5 जज पीठ [अनु. 14, 15, 19, 21] आईपीसी की धारा 377 का वह अंश असंवैधानिक घोषित जो वयस्कों के बीच सहमति से समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध मानता था; सुरेश कुमार कौशल (2013) निर्णय निरस्त; संवैधानिक नैतिकता को सामाजिक नैतिकता पर वरीयता
शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) 5 जज पीठ [अनु. 14, 21, 25] मुस्लिम समाज में प्रचलित 'तीन तलाक (Talaq-e-Biddat)' को 3:2 बहुमत से असंवैधानिक व शून्य घोषित; इसे मनमाना व समानता-विरोधी माना; संसद द्वारा मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 पारित
सबरीमाला मंदिर वाद (2018) 5 जज पीठ (4:1) [अनु. 14, 25] केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध निरस्त; मासिक धर्म के आधार पर भेदभाव अस्पृश्यता (अनु. 17) का ही एक रूप; भक्ति व ईश्वर पूजा में लिंग-आधारित विभेद वर्जित
जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2018) 5 जज पीठ [अनु. 14, 15, 21] आईपीसी की धारा 497 (व्यभिचार / Adultery) को पूर्णतः असंवैधानिक घोषित; महिला को पति की संपत्ति मानने वाली औपनिवेशिक धारणा समाप्त; व्यभिचार अब अपराध नहीं, केवल तलाक का दीवानी आधार
अयोध्या भूमि विवाद वाद (2019) 5 जज सर्वसम्मत पीठ [अनु. 142] 2.77 एकड़ विवादित भूमि का स्वामित्व रामलला विराजमान (ट्रस्ट) को सौंपा; मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण हेतु 5 एकड़ वैकल्पिक भूमि आवंटित; अनुच्छेद 142 के तहत 'पूर्ण न्याय' की शक्ति का प्रयोग

4. नवीनतम संवैधानिक निर्णय (2020–2025) — समसामयिक विधिक परिदृश्य

नवीनतम न्यायिक वाद / वर्ष पीठ / अनुच्छेद संवैधानिक प्रावधान, न्यायालय का निर्णय एवं नीतिगत प्रभाव
अनुच्छेद 370 निरसन वाद (2023) 5 जज सर्वसम्मत पीठ [अनु. 370, 356] 5 अगस्त 2019 के संवैधानिक आदेश (CO 272 व 273) को वैध ठहराया; अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था; जम्मू-कश्मीर राज्य के पास कोई आंतरिक संप्रभुता नहीं थी; लद्दाख को UT बनाना वैध; राज्य का दर्जा शीघ्र बहाल करने का निर्देश
चुनावी बॉन्ड वाद (ADR 2024) 5 जज सर्वसम्मत पीठ [अनु. 19(1)(a)] इलेक्टोरल बॉन्ड योजना (2018) पूर्णतः असंवैधानिक घोषित; कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को असीमित व गुप्त चंदा देना अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मतदाताओं के 'जानने के अधिकार' का सीधा उल्लंघन; भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को समस्त विवरण सार्वजनिक करने का आदेश
समलैंगिक विवाह वाद (2023) 5 जज पीठ (सुप्रियो वाद) [अनु. 21] 3:2 बहुमत से निर्णय: समलैंगिक व्यक्तियों को विवाह करने का कोई मूल अधिकार या विशेष विवाह अधिनियम के तहत विधिक मान्यता नहीं; विवाह को मान्यता देने का अधिकार केवल विधायिका (संसद) का है; न्यायालय ने न्यायिक संयम (Judicial Restraint) दिखाया
राज्यपाल विधेयक शक्ति वाद (2023–24) 3 जज पीठ [अनुच्छेद 200] पंजाब व तमिलनाडु राज्य संदर्भ: राज्यपाल राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को अनिश्चितकाल के लिए दबाकर नहीं बैठ सकते; यदि राज्यपाल सहमति रोकते हैं, तो उन्हें विधेयक को 'यथाशीघ्र' पुनर्विचार हेतु सदन को लौटाना होगा; राज्यपाल निर्वाचित सरकार के समानांतर शक्ति केंद्र नहीं
SC/ST कोटा उप-वर्गीकरण वाद (2024) 7 जज संविधान पीठ (6:1) [अनु. 341, 16(4)] ई.वी. चिन्नैया (2004) निर्णय निरस्त; राज्यों को अनुसूचित जातियों (SC) एवं अनुसूचित जनजातियों (ST) के भीतर सबसे पिछड़े वर्गों को प्राथमिकता देने हेतु उप-वर्गीकरण (Sub-classification) करने का अधिकार; क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू करने की संस्तुति

5. न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता एवं न्यायिक अतिरेक — तुलना

तुलनात्मक आयाम न्यायिक समीक्षा (Review) न्यायिक सक्रियता (Activism) न्यायिक अतिरेक (Overreach)
संवैधानिक स्थिति संविधान का आधारभूत ढांचा (अनु. 13, 32, 226); स्पष्ट विधिक प्राधिकार न्यायिक नवाचार (1980 के दशक से जनहित याचिका (PIL) द्वारा विकसित); संविधान-सम्मत असंवैधानिक; शक्ति पृथक्करण सिद्धांत का खुला उल्लंघन
प्रकृति व दृष्टिकोण विधायिका/कार्यपालिका के कानूनों की संवैधानिकता की निष्पक्ष जांच नागरिक अधिकारों की रक्षा व कार्यपालिका की निष्क्रियता दूर करने हेतु सक्रिय हस्तक्षेप न्यायपालिका द्वारा स्वयं कार्यपालिका या विधायिका की भूमिका अपना लेना
प्रमुख उदाहरण 99वें संशोधन (NJAC) व चुनावी बॉन्ड को असंवैधानिक घोषित करना विशाखा दिशानिर्देश (1997), कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न रोकथाम, स्वच्छ पर्यावरण निर्देश हाईवे पर शराब बिक्री प्रतिबंध, सिनेमाघरों में राष्ट्रगान अनिवार्य करना, पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध

6. जनहित याचिका (PIL) — उद्भव, विशेषताएं, लाभ एवं दुरुपयोग नियंत्रण

जनहित याचिका (PIL) के प्रमुख आयाम संवैधानिक पृष्ठभूमि, विधिक प्रक्रिया एवं न्यायिक दिशानिर्देश
उद्भव एवं जनक 1980 के दशक में न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती एवं न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर द्वारा सूत्रपात; अमेरिकी न्यायशास्त्र से प्रेरित
पारंपरिक नियम में छूट पारंपरिक 'लोकस स्टैंडाई (Locus Standi — वाद का अधिकार)' के नियम में ढील — कोई भी नागरिक या संस्था निर्धन व वंचित वर्गों के अधिकारों हेतु न्यायालय जा सकती है
प्रमुख ऐतिहासिक जनहित याचिकाएं (PIL) हुस्नआरा खातून (1979 — विचाराधीन कैदी), एस.पी. गुप्ता (1981 — जजों की नियुक्ति), विशाखा वाद (1997 — महिला सुरक्षा), एम.सी. मेहता (गंगा प्रदूषण, ताजमहल संरक्षण)
दुरुपयोग की रोकथाम दिशानिर्देश बलवंत सिंह चौटालिया वाद (2010): सर्वोच्च न्यायालय ने फर्जी व प्रचार-लोलुप याचिकाओं पर रोक हेतु 8 दिशानिर्देश जारी किए — याचिकाकर्ता की साख जांच, भारी जुर्माना व वास्तविक जनहित की पुष्टि अनिवार्य

7. प्रमुख संवैधानिक सिद्धांतों एवं ऐतिहासिक वादों की त्वरित संदर्भ तालिका

प्रमुख संवैधानिक सिद्धांत निर्णायक ऐतिहासिक वाद संवैधानिक प्रभाव एवं सार
संवैधानिक नैतिकता नवतेज जौहर (2018), सबरीमाला (2018) सामाजिक रूढ़िवादिता पर संवैधानिक मूल्यों की सर्वोच्चता
निजता का मूल अधिकार के.एस. पुट्टास्वामी वाद (2017) अनुच्छेद 21 के तहत अंतर्निहित, अविभाज्य मूल अधिकार
समानता व लैंगिक न्याय शायरा बानो (2017), जोसेफ शाइन (2018) मनमाने धार्मिक नियमों व पितृसत्तात्मक कानूनों का उन्मूलन
मतदाताओं का सूचना अधिकार चुनावी बॉन्ड वाद (ADR 2024) अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत राजनीतिक वित्तपोषण में पूर्ण पारदर्शिता
विधायिका की सर्वोच्चता में संयम सुप्रियो बनाम भारत संघ (2023) विवाह अधिकार मान्यता में नीतिगत संयम; संसद का अनन्य अधिकार

7. प्रमुख संवैधानिक सिद्धांत (क्रमशः)

प्रमुख संवैधानिक सिद्धांत निर्णायक ऐतिहासिक वाद संवैधानिक प्रभाव एवं सार
संघात्मक संतुलन राज्यपाल विधेयक शक्ति वाद (2023–24) अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल द्वारा विधानसभा की उपेक्षा असंवैधानिक
आरक्षण में उप-वर्गीकरण कोटा उप-वर्गीकरण वाद (2024) (SC/ST) में सर्वाधिक पिछड़े वर्गों हेतु अलग आरक्षण कोटा वैध
💡 न्यायिक भूमिका का मूल निष्कर्ष: न्यायपालिका को 'संविधान का संरक्षक (Protector of the Constitution)' रहना चाहिए, 'संविधान का शासक (Ruler of the Constitution)' नहीं। संवैधानिक नैतिकता, न्यायिक सक्रियता एवं शक्ति पृथक्करण का संतुलन ही भारतीय लोकतंत्र की सुदृढ़ता का स्थायी आधार है।
अध्याय 07 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 07: संघ कार्यपालिका — राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद — शॉर्ट नोट्स

राष्ट्रपति निर्वाचन/महाभियोग/वीटो/अध्यादेश, उपराष्ट्रपति, PM शक्तियां, Art 74-75, महान्यायवादी

1. राष्ट्रपति: संवैधानिक स्थिति एवं वैश्विक तुलना (अनुच्छेद 52 एवं 53)

प्रावधान / आयाम संवैधानिक स्थिति एवं विधिक विश्लेषण
संवैधानिक पद (अनु. 52) भारत का एक राष्ट्रपति होगा; वह भारत गणराज्य का राष्ट्रप्रमुख (Head of State) तथा देश का प्रथम नागरिक है
कार्यपालिका शक्ति (अनु. 53) संघ की संपूर्ण कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी, जिसका प्रयोग वह स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा करेगा
नाममात्र बनाम वास्तविक प्रमुख राष्ट्रपति केवल संवैधानिक/नाममात्र का प्रमुख (De Jure Head) है; वास्तविक कार्यपालिका शक्ति प्रधानमंत्री व मंत्रिपरिषद में निहित है
वैश्विक तुलना (भारत बनाम यूके व यूएसए) ब्रिटेन के वंशानुगत सम्राट के विपरीत भारत का राष्ट्रपति निर्वाचित (गणतंत्र) होता है; यूएसए के अध्यक्षात्मक शासन के विपरीत भारत में राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है

2. निर्वाचक मंडल (Electoral College — अनुच्छेद 54)

निर्वाचक मंडल की संरचना शामिल होने वाले सदस्य शामिल न होने वाले सदस्य (मतदान से वंचित)
संसद के सदस्य संसद के दोनों सदनों (लोकसभा + राज्यसभा) के केवल निर्वाचित सदस्य संसद के दोनों सदनों के मनोनीत सदस्य (Nominated Members)
राज्य विधानमंडल सभी राज्यों की विधानसभाओं के केवल निर्वाचित सदस्य (MLAs) विधान परिषदों (MLC) के सभी सदस्य (निर्वाचित व मनोनीत दोनों)
संघ राज्य क्षेत्र (UTs) दिल्ली एवं पुद्दुचेरी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य (70वें संशोधन 1992 द्वारा) दिल्ली, पुद्दुचेरी व अन्य केंद्रशासित प्रदेशों के मनोनीत सदस्य

3. मत मूल्य सूत्र एवं निर्वाचन पद्धति (अनुच्छेद 55)

निर्वाचन के नियम विधिक सूत्र / प्रक्रिया एवं निर्धारित संवैधानिक व्यवस्था
निर्वाचन पद्धति आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) तथा गुप्त मतदान द्वारा
1 विधायक (MLA) का मत मूल्य राज्य की कुल जनसंख्या / (राज्य विधानसभा के कुल निर्वाचित सदस्य × 1000) [जनसंख्या आधार 1971 की जनगणना]
1 सांसद (MP) का मत मूल्य सभी राज्यों के निर्वाचित विधायकों के मत मूल्यों का कुल योग / संसद के दोनों सदनों के कुल निर्वाचित सदस्य
न्यूनतम निर्वाचक कोटा कोटा = [कुल वैध मतों की संख्या / (1 + 1)] + 1 अर्थात (कुल वैध मतों का 50% + 1 मत)
जमानत राशि एवं प्रस्तावक ₹15,000 भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) में देय; 50 प्रस्तावक + 50 अनुमोदक अनिवार्य; कुल वैध मतों का 1/6 न मिलने पर जमानत जब्त

4. राष्ट्रपति पद की अर्हताएं, शपथ, शर्तें एवं उन्मुक्तियां

संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद विहित शर्तें, विधिक योग्यताएं एवं संरक्षण
अर्हताएं (Qualifications) अनु. 58 भारत का नागरिक, न्यूनतम 35 वर्ष की आयु, लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता, संघ/राज्य/स्थानीय निकाय में लाभ का पद (Office of Profit) न हो
शपथ (Oath) अनु. 60 भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या उनकी अनुपस्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा; संविधान का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण
पद की शर्तें अनु. 59 संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं होगा; यदि चुना जाए तो पद ग्रहण से सीट रिक्त मानी जाएगी; वेतन-भत्ते पदावधि में कम नहीं होंगे
विधिक उन्मुक्तियां अनु. 361 शासकीय कर्तव्यों हेतु न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं; कार्यकाल में कोई आपराधिक मामला या गिरफ्तारी नहीं; व्यक्तिगत कार्य पर 2 माह की पूर्व नोटिस पर सिविल वाद

5. कार्यकाल, पद रिक्ति एवं उत्तराधिकार क्रम (अनुच्छेद 56, 62, 65)

स्थिति / आयाम संवैधानिक नियम एवं ऐतिहासिक दृष्टांत
सामान्य कार्यकाल पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष तक; उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक पद पर बना रहता है; पुनर्निर्वाचन हेतु पात्र (अनु. 57)
त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को संबोधित स्वहस्ताक्षरित पत्र; उपराष्ट्रपति इसकी सूचना तत्काल लोकसभा अध्यक्ष को देता है
आकस्मिक पद रिक्ति मृत्यु, त्यागपत्र या निष्कासन पर रिक्ति की तिथि से 6 माह के भीतर नवीन चुनाव संपन्न कराना अनिवार्य
कार्यवाहक राष्ट्रपति क्रम उपराष्ट्रपति -> मुख्य न्यायाधीश (CJI) -> वरिष्ठतम न्यायाधीश; 1969 में डॉ. जाकिर हुसैन की मृत्यु पर वी.वी. गिरि (इस्तीफा) के बाद न्यायमूर्ति (CJI) एम. हिदायतुल्लाह कार्यवाहक बने

6. महाभियोग प्रक्रिया (Impeachment — अनुच्छेद 61)

प्रक्रिया के चरण संवैधानिक नियम, बहुमत का प्रकार एवं विशेष प्रावधान
एकमात्र संवैधानिक आधार 'संविधान का उल्लंघन / अतिक्रमण' (Violation of the Constitution); संविधान में इस शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है
प्रस्ताव की शुरुआत संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में लाया जा सकता है; संबंधित सदन के कम से कम 1/4 सदस्यों के हस्ताक्षर अनिवार्य
पूर्व लिखित नोटिस राष्ट्रपति को 14 दिन की पूर्व लिखित सूचना देना अनिवार्य; राष्ट्रपति स्वयं या विधिक प्रतिनिधि द्वारा पक्ष रख सकता है
पारित करने का बहुमत प्रथम सदन की कुल सदस्य संख्या का 2/3 बहुमत; द्वितीय सदन अन्वेषण करेगा और कुल सदस्य संख्या के 2/3 बहुमत से पारित करे तो पदमुक्त
मतदान में भागीदारी अंतर संसद के दोनों सदनों के मनोनीत सदस्य महाभियोग में भाग लेते हैं (चुनाव में नहीं); राज्य विधानसभाओं के सदस्य भाग नहीं लेते (चुनाव में लेते हैं)
💡 चुनाव विवाद (अनुच्छेद 71): राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति चुनाव से जुड़े सभी विवादों की जांच और अंतिम फैसला केवल सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) द्वारा किया जाता है। यदि न्यायालय द्वारा चुनाव अवैध घोषित हो जाए, तो उसके द्वारा पद पर रहते हुए पहले किए गए कार्य अवैध नहीं होते।

7. राष्ट्रपति की शक्तियां (कार्यकारी, विधायी एवं वित्तीय)

शक्तियों का वर्गीकरण अनुच्छेद प्रमुख अधिकार, संवैधानिक दायित्व एवं वैधानिक कार्य
कार्यकारी शक्तियां अनु. 53, 77 समस्त कार्यपालिका कार्य राष्ट्रपति के नाम; प्रधानमंत्री व मंत्रियों, राज्यपालों, महान्यायवादी, नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG), मुख्य निर्वाचन आयुक्त, संघ लोक सेवा आयोग अध्यक्ष/सदस्यों की नियुक्ति; SC/ST आयोग गठन
संसद सत्र व संबोधन अनु. 85, 87 संसद के सत्र को आहूत (Summon), सत्रावसान (Prorogue) एवं लोकसभा को भंग करना; प्रत्येक आम चुनाव के बाद व वर्ष के प्रथम सत्र में दोनों सदनों का संयुक्त अभिभाषण
संसद में मनोनयन अनु. 80, 331 राज्यसभा में साहित्य, विज्ञान, कला एवं समाज सेवा से 12 सदस्य मनोनीत; (104वें संशोधन 2019 द्वारा लोकसभा में 2 एंग्लो-इंडियन मनोनयन समाप्त)
पूर्व संस्तुति विधेयक अनु. 3, 110, 117 नए राज्यों के निर्माण/सीमा परिवर्तन विधेयक (अनु. 3), धन विधेयक (अनु. 110) एवं वित्तीय विधेयक केवल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से ही संसद में प्रस्तुत
वित्तीय शक्तियां अनु. 112, 280 वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) संसद में रखवाना; प्रत्येक 5 वर्ष में वित्त आयोग का गठन; आकस्मिकता निधि (अनु. 267) से अग्रिम धन स्वीकृति

8. राष्ट्रपति की वीटो शक्तियां (Veto Powers — अनु. 111 व 200/201)

वीटो का प्रकार संवैधानिक प्रावधान एवं विधिक प्रभाव ऐतिहासिक प्रयोग / सीमाएं
आत्यंतिक वीटो (Absolute Veto) विधेयक पर सहमति पूरी तरह रोक लेना; विधेयक समाप्त हो जाता है; केवल गैर-सरकारी विधेयकों या मंत्रिमंडल के इस्तीफे पर लागू 1954 पेप्सू (PEPSU) विनियोग विधेयक (राजेंद्र प्रसाद); 1991 संसद सदस्य वेतन विधेयक (आर. वेंकटरमण)
निलंबनकारी वीटो (Suspensive Veto) विधेयक को संसद को पुनर्विचार हेतु लौटाना; यदि संसद साधारण बहुमत से पुनः पारित कर दे, तो राष्ट्रपति सहमति देने को बाध्य धन विधेयक (Money Bill) पर लागू नहीं; 2006 लाभ का पद विधेयक पर ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा प्रयोग
पॉकेट वीटो (Pocket Veto) विधेयक पर न सहमति देना, न अस्वीकार करना और न ही लौटाना; अनिश्चितकाल हेतु लंबित रखना (भारतीय संविधान में समय-सीमा नहीं) 1986 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक पर ऐतिहासिक प्रयोग
राज्य विधेयकों पर वीटो अनुच्छेद 200 व 201: राज्यपाल द्वारा आरक्षित विधेयक पर राष्ट्रपति सहमति दे सकता है, रोक सकता है या पुनर्विचार हेतु भेज सकता है राज्य विधानमंडल द्वारा पुनः पारित किए जाने पर भी राष्ट्रपति सहमति देने के लिए बाध्य नहीं है

9. अध्यादेश निर्माण शक्ति (Ordinance Power — अनुच्छेद 123)

अध्यादेश के आयाम संवैधानिक शर्तें, न्यायिक सीमाएं एवं वैधानिक प्रभाव
जारी करने की शर्तें संसद के दोनों सदन अथवा कोई एक सदन सत्र में न हो; ऐसी तात्कालिक परिस्थितियां विद्यमान हों जिनमें तुरंत कार्रवाई आवश्यक हो
कानूनी प्रभाव व सीमा संसद द्वारा निर्मित अधिनियम के समान पूर्ण विधिक प्रभाव; केवल उन्हीं विषयों पर जिन पर संसद को कानून बनाने की शक्ति है; मूल अधिकारों का हनन नहीं कर सकता
संविधान संशोधन निषेध अध्यादेश द्वारा संविधान का संशोधन (अनुच्छेद 368) किसी भी स्थिति में नहीं किया जा सकता
संसदीय अनुमोदन व अवधि संसद के पुनः संवेद (Reassembly) होने की तिथि से 6 सप्ताह के भीतर दोनों सदनों से पारित होना अनिवार्य; अधिकतम संभावित जीवन = 6 माह + 6 सप्ताह
न्यायिक समीक्षा (आर.सी. कूपर वाद 1970) अध्यादेश जारी करने की राष्ट्रपति की संतुष्टि की न्यायिक समीक्षा संभव है; यदि शक्ति का प्रयोग दुर्भावनापूर्ण हो तो न्यायालय इसे अवैध घोषित कर सकता है
डी.सी. वाधवा वाद (1987) बिहार राज्य संदर्भ: बिना विधायिका के पटल पर रखे अध्यादेशों का बारंबार पुनः प्रख्यापन (Re-promulgation) असंवैधानिक तथा संविधान पर संस्थागत धोखा है

10. क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 72) — राष्ट्रपति बनाम राज्यपाल (अनु. 161)

क्षमादान का स्वरूप अर्थ / परिभाषा राष्ट्रपति (अनु. 72) राज्यपाल (अनु. 161)
क्षमा (Pardon) दंड एवं दोषसिद्धि दोनों को पूर्णतः मिटा देना; व्यक्ति पूर्ववत निर्दोष पूर्ण अधिकार (मृत्युदंड सहित) मृत्युदंड को क्षमा नहीं कर सकता
लघुकरण (Commutation) दंड के स्वरूप को बदलकर कम कठोर करना (उदा. मृत्युदंड को आजीवन कारावास) अधिकृत अधिकृत (मृत्युदंड का लघुकरण कर सकता है)
परिहार (Remission) दंड की प्रकृति बदले बिना अवधि कम करना (उदा. 2 वर्ष कठोर कारावास को 1 वर्ष) अधिकृत अधिकृत (राज्य विधि के तहत)
विराम (Respite) विशेष परिस्थिति (गर्भावस्था, बीमारी) में मूल निर्धारित दंड को कम करना अधिकृत अधिकृत
प्रविलंबन (Reprieve) दंड (विशेषकर मृत्युदंड) के निष्पादन पर अस्थायी रोक लगाना अधिकृत अधिकृत
सैन्य अदालत (Court Martial) सैन्य न्यायालय द्वारा दिए गए दंड के विरुद्ध क्षमादान शक्ति पूर्ण अधिकार कोई अधिकार नहीं
💡 संवैधानिक बाध्यता — शमशेर सिंह वाद (1974): राष्ट्रपति की संतुष्टि का आशय मंत्रिपरिषद की संतुष्टि है। 42वें संशोधन (1976) ने सलाह को अनिवार्य बनाया; 44वें संशोधन (1978) ने राष्ट्रपति को केवल एक बार पुनर्विचार हेतु लौटाने का अधिकार दिया, परंतु पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह मानने हेतु वे बाध्य हैं।

11. उपराष्ट्रपति: संवैधानिक स्थिति एवं शक्तियां (अनुच्छेद 63–71)

संवैधानिक विषय अनुच्छेद विहित प्रावधान, निर्वाचन विधि एवं शक्तियां
उपराष्ट्रपति पद अनु. 63 भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा; देश का द्वितीय सर्वोच्च संवैधानिक पद (पदानुक्रम में राष्ट्रपति के बाद)
पदेन सभापति अनु. 64 उपराष्ट्रपति राज्य परिषद (राज्यसभा) का पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होगा; वह राज्यसभा के सभापति का वेतन पाता है
कार्यवाहक राष्ट्रपति अनु. 65 राष्ट्रपति की मृत्यु, त्यागपत्र या पदमुक्ति पर कार्यवाहक राष्ट्रपति (अधिकतम 6 माह); इस दौरान राष्ट्रपति के वेतन-भत्ते प्राप्त होते हैं
निर्वाचन मंडल अनु. 66(1) संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य (निर्वाचित + मनोनीत); राज्य विधानसभाओं के सदस्य इसमें भाग नहीं लेते; आनुपातिक प्रतिनिधित्व
योग्यताएं अनु. 66(3) भारत का नागरिक, 35 वर्ष की आयु, राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता, किसी लाभ के पद पर न हो; 20 प्रस्तावक + 20 अनुमोदक
पदावधि एवं त्यागपत्र अनु. 67 पद ग्रहण से 5 वर्ष तक; त्यागपत्र राष्ट्रपति को संबोधित करता है; पद से हटाने हेतु महाभियोग की आवश्यकता नहीं
पद से हटाने की प्रक्रिया अनु. 67(b) राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत (प्रभावी बहुमत) द्वारा पारित संकल्प, जिसे लोकसभा सामान्य बहुमत से स्वीकार करे; 14 दिन की पूर्व नोटिस

12. उपराष्ट्रपति: भारत बनाम संयुक्त राज्य अमेरिका तुलना

तुलनात्मक आधार भारत का उपराष्ट्रपति अमेरिकी उप-राष्ट्रपति (US Vice-President)
संवैधानिक प्रेरणा अमेरिकी उपराष्ट्रपति पद के मॉडल पर आधारित (राज्यसभा/सीनेट का सभापति) अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद II के तहत सृजित
राष्ट्रपति रिक्ति की स्थिति केवल कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, जब तक कि नया राष्ट्रपति निर्वाचित न हो जाए (अधिकतम 6 माह की सीमा) राष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर शेष पूरे कार्यकाल (Full Remaining Term) हेतु स्थायी राष्ट्रपति बन जाता है
सदन की सदस्यता संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता; केवल सभापति के रूप में निर्णायक मत (Casting Vote) देता है सीनेट का पदेन अध्यक्ष होता है और केवल टाई होने पर निर्णायक मत देता है
निर्वाचन की प्रक्रिया संसद के दोनों सदनों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से पृथक निर्वाचित होता है राष्ट्रपति के साथ संयुक्त टिकट (Running Mate) पर निर्वाचित होता है

13. प्रधानमंत्री: नियुक्ति, संवैधानिक स्थिति एवं पदावधि (अनु. 74, 75, 78)

संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद विधिक प्रक्रिया, शक्तियां एवं संवैधानिक स्थिति
राष्ट्रपति को सहायता व सलाह अनु. 74 राष्ट्रपति को सलाह हेतु मंत्रिपरिषद जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा; न्यायालय में जांच नहीं हो सकती कि मंत्रियों ने क्या सलाह दी
प्रधानमंत्री की नियुक्ति अनु. 75(1) प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा (लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता); त्रिशंकु लोकसभा में राष्ट्रपति स्वविवेक से सबसे बड़े दल के नेता को नियुक्त करता है
मंत्रियों की नियुक्ति अनु. 75(1) अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति केवल प्रधानमंत्री की सिफारिश पर ही करता है; विभागों का वितरण भी प्रधानमंत्री तय करता है
मंत्रियों का उत्तरदायित्व अनु. 75(2) मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (Pleasure of the President) पद धारण करते हैं (वास्तव में प्रधानमंत्री की इच्छा तक)
सामूहिक उत्तरदायित्व अनु. 75(3) मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होगी; अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर संपूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होगा
गैर-सदस्य की नियुक्ति अनु. 75(5) कोई भी व्यक्ति बिना संसद सदस्य हुए मंत्री/प्रधानमंत्री बन सकता है, परंतु 6 माह के भीतर किसी भी सदन (LS या RS) का सदस्य बनना अनिवार्य
कर्तव्य एवं संवाद सेतु अनु. 78 संघ के प्रशासन व विधान संबंधी मंत्रिपरिषदीय निर्णयों से राष्ट्रपति को अवगत कराना; राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई जानकारी देना

14. प्रधानमंत्री की बहुआयामी शक्तियां एवं पदेन भूमिकाएं

भूमिका / कार्यक्षेत्र विशिष्ट शक्तियां, प्रशासनिक नियंत्रण एवं संवैधानिक अधिकार
मंत्रिपरिषद के प्रमुख मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता, एजेंडा तय करना; मंत्रियों के विभागों का फेरबदल; किसी भी मंत्री से त्यागपत्र मांगना
मंत्रिपरिषद का विघटन प्रधानमंत्री के त्यागपत्र या आकस्मिक मृत्यु से संपूर्ण मंत्रिपरिषद स्वतः ही विघटित (भंग) हो जाती है (अन्य मंत्री की मृत्यु पर केवल एक सीट रिक्त होती है)
संसद के संदर्भ में लोकसभा का नेता; राष्ट्रपति को संसद सत्र आहूत करने, सत्रावसान करने तथा लोकसभा को समय से पूर्व भंग करने की सिफारिश करना
पदेन अध्यक्ष (Ex-officio) नीति आयोग (NITI Aayog), राष्ट्रीय एकता परिषद, अंतर-राज्य परिषद, राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद एवं राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)
संकट प्रबंधक एवं प्रवक्ता राष्ट्र का प्रमुख नीति-निर्माता, विदेशी मामलों में देश का प्रमुख प्रवक्ता तथा आपातकाल में राजनीतिक स्तर पर आपदा प्रबंधन का मुख्य समन्वयक
💡 कार्यवाहक (Caretaker) सरकार व यू.एन.आर. राव वाद (1971): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लोकसभा भंग होने पर भी मंत्रिपरिषद पद पर बनी रहती है (अनु. 74 अनिवार्य है)। कार्यवाहक सरकार केवल दैनिक प्रशासनिक कार्य संचालित कर सकती है; वह कोई बड़ा नीतिगत फैसला, वित्तीय दायित्व या नया कानून लागू नहीं कर सकती।

15. केंद्रीय मंत्रिपरिषद — संरचना, आकार एवं उत्तरदायित्व

मंत्रिपरिषद के आयाम संवैधानिक प्रावधान, कानूनी संशोधन एवं संगठनात्मक ढांचा
मंत्रियों की 3 श्रेणियां 1. कैबिनेट मंत्री (प्रमुख मंत्रालयों के प्रभारी व नीति निर्माता), 2. राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार अथवा कैबिनेट मंत्री से संबद्ध), 3. उप-मंत्री (प्रशासनिक कार्यों में सहायता)
आकार की संवैधानिक सीमा 91वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003: मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती
सामूहिक उत्तरदायित्व सिद्धांत अनुच्छेद 75(3): मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी; 'वे एक साथ तैरते हैं और एक साथ डूबते हैं'; यदि लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित करे तो सभी को त्यागपत्र देना होगा
मंत्रिमंडल की एकजुटता यदि कोई मंत्री कैबिनेट के निर्णय से असहमत हो, तो उसे त्यागपत्र देना पड़ता है (उदा. 1951 में डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने हिंदू कोड बिल पर तथा सी.डी. देशमुख ने राज्य पुनर्गठन पर इस्तीफा दिया)
सदन में अधिकार (अनु. 88) प्रत्येक मंत्री को किसी भी सदन, संयुक्त बैठक व संसदीय समिति में बोलने व भाग लेने का अधिकार है, परंतु मतदान केवल उसी सदन में कर सकता है जिसका वह सदस्य है

16. मंत्रिमंडल (कैबिनेट) बनाम मंत्रिपरिषद एवं 'किचन कैबिनेट'

तुलनात्मक लक्षण मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) मंत्रिमंडल (Cabinet / कैबिनेट)
संवैधानिक उल्लेख मूल संविधान के अनुच्छेद 74 व 75 में विस्तृत संवैधानिक निकाय मूल संविधान में नहीं था; 44वें संशोधन 1978 द्वारा केवल अनुच्छेद 352 में जोड़ा गया
निकाय का आकार व्यापक निकाय (60 से 70 मंत्री; सभी तीन श्रेणियों के सदस्य शामिल) छोटा व संकुचित निकाय (15 से 20 अत्यंत वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री)
कार्यों की प्रकृति नीति निर्धारण हेतु सामूहिक रूप से बैठक नहीं करती; शक्तियां सैद्धांतिक सरकार की सर्वोच्च नीति-निर्माता संस्था; साप्ताहिक बैठक कर सभी नीतिगत निर्णय लेती है
निर्णयों का क्रियान्वयन मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए नीतिगत निर्णयों को लागू करने वाली संस्था मंत्रिपरिषद के कार्यों का निर्देशन, नियंत्रण व निगरानी करती है
अवधारणा: किचन कैबिनेट (Kitchen Cabinet / आंतरिक मंत्रिमंडल) विधिक व व्यावहारिक स्थिति
स्वरूप एवं संरचना प्रधानमंत्री और उनके 2 से 4 अत्यंत विश्वासपात्र मित्रों/सहयोगियों का अनौपचारिक लघु समूह (उदा. इंदिरा गांधी काल में 'किचन कैबिनेट' अत्यंत शक्तिशाली था)
संवैधानिक वैधता पूरी तरह से गैर-संवैधानिक व अनौपचारिक; किसी विधिक नियम या संविधान में इसका कोई उल्लेख नहीं है; निर्णय प्रक्रिया में अत्यधिक गोपनीयता व गतिशीलता लाता है

17. मंत्रिमंडल समितियां (Cabinet Committees)

समिति के पहलू संवैधानिक / कार्यपालिका व्यवस्था एवं प्रमुख कार्य
प्रकृति व वैधानिक आधार गैर-संवैधानिक (अतिरिक्त-संवैधानिक); भारत सरकार कार्य संचालन नियमावली (Rules of Business 1961) के तहत प्रधानमंत्री द्वारा गठित
प्रकार 2 प्रकार की होती हैं: 1. स्थायी समितियां (Standing Committees), 2. तदर्थ समितियां (Ad-hoc Committees — विशेष समस्याओं हेतु अस्थायी)
राजनीतिक मामलों की समिति अध्यक्षता: प्रधानमंत्री; 'सुपर कैबिनेट (Super Cabinet)' कहलाती है; देश के सभी महत्वपूर्ण राजनीतिक व आंतरिक/बाह्य मामलों पर निर्णय लेती है
आर्थिक मामलों की समिति (CCEA) अध्यक्षता: प्रधानमंत्री; आर्थिक क्षेत्र की दिशा तय करती है, समर्थन मूल्य (MSP) व प्रमुख निवेशों को मंजूरी देती है
नियुक्ति समिति (ACC) अध्यक्षता: प्रधानमंत्री (गृह मंत्री सदस्य); केंद्रीय सचिवालय में वरिष्ठ अधिकारियों, सरकारी बैंकों (PSB) के प्रमुखों व रक्षा बलों के उच्च पदों पर नियुक्ति
संसदीय मामलों की समिति अध्यक्षता: रक्षा मंत्री / गृह मंत्री (प्रधानमंत्री इसके सदस्य नहीं होते); संसद में सरकारी कार्यों की प्रगति तय करती है

18. भारत का महान्यायवादी (Attorney General — अनुच्छेद 76, 88)

संवैधानिक आयाम विधिक प्रावधान, योग्यताएं, अधिकार एवं सीमाएं
संवैधानिक स्थिति अनुच्छेद 76: देश का सर्वोच्च विधिक अधिकारी (Highest Law Officer of India); केंद्र सरकार का मुख्य कानूनी सलाहकार
नियुक्ति एवं योग्यता राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति; योग्यता: सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने की अर्हता (5 वर्ष HC जज या 10 वर्ष HC वकील या पारंगत विधिवेत्ता)
पदावधि एवं वेतन संविधान में निश्चित कार्यकाल नहीं; राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है; वेतन-भत्ते राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित
संसदीय विशेषाधिकार (अनु. 88) संसद के दोनों सदनों, संयुक्त बैठक व किसी भी संसदीय समिति में बोलने व कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार; परंतु मतदान (Vote) का अधिकार नहीं
अदालतों में अधिकार भारत के राज्यक्षेत्र में स्थित सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार (Right of Audience); प्रथम स्थान का अधिकार
कार्य एवं सीमाएं सरकार के विरुद्ध कानूनी सलाह या पैरवी नहीं कर सकता; भारत सरकार की अनुमति के बिना किसी आपराधिक मामले में अभियुक्त का बचाव नहीं कर सकता; निजी वकालत पर प्रतिबंध नहीं

19. संघ कार्यपालिका: त्वरित परीक्षा संदर्भ तालिका (Quick Matrix)

संवैधानिक पद अनुच्छेद नियुक्ति / चुनाव शपथ त्यागपत्र आयु
राष्ट्रपति अनु. 52, 54 संसद + विधानसभा निर्वाचित मुख्य न्यायाधीश उपराष्ट्रपति 35 वर्ष
उपराष्ट्रपति अनु. 63, 66 संसद के दोनों सदन (सभी) राष्ट्रपति राष्ट्रपति 35 वर्ष
प्रधानमंत्री अनु. 74, 75 राष्ट्रपति द्वारा (LS बहुमत) राष्ट्रपति राष्ट्रपति 25 (LS) / 30 (RS)
महान्यायवादी अनु. 76 राष्ट्रपति द्वारा (SC जज योग्यता) संवैधानिक राष्ट्रपति सीमा नहीं
💡 संसदीय संप्रभुता बनाम कार्यपालिका संतुलन: भारत में कार्यपालिका विधायिका के प्रति जवाबदेह है। वास्तविक शक्ति जनता द्वारा निर्वाचित प्रधानमंत्री व मंत्रिपरिषद में निहित है, जबकि राष्ट्रपति संविधान के संरक्षक व गणराज्य के प्रतीक के रूप में कार्य करते हैं।
अध्याय 08 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 08: संघ विधायिका — संसद (संगठन, पीठासीन अधिकारी, विधायी प्रक्रिया एवं संसदीय नियंत्रण) — शॉर्ट नोट्स

सीट आवंटन, विधायी प्रक्रिया (विधेयक प्रकार), संयुक्त बैठक (Art 108), बजट, समितियां (PAC/PUC)

1. संसद का संगठन एवं द्विसदनीय संरचना (अनुच्छेद 79, 80 एवं 81)

संवैधानिक अंग अनुच्छेद संवैधानिक प्रावधान एवं संस्थागत भूमिका
संसद के 3 अंग अनु. 79 संसद = राष्ट्रपति + राज्य परिषद (राज्यसभा) + जनता का सदन (लोकसभा); राष्ट्रपति किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता, फिर भी संसद का अभिन्न अंग है क्योंकि उसके हस्ताक्षर बिना कोई विधेयक कानून नहीं बन सकता
राज्यसभा (उच्च सदन) अनु. 80 राज्यों व संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व; स्थायी सदन (कभी भंग नहीं); 6 वर्ष कार्यकाल; 1/3 सदस्य प्रति 2 वर्ष में सेवानिवृत्त; संघीय संतुलन का प्रतीक
लोकसभा (निम्न सदन) अनु. 81 भारत की संपूर्ण जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व; लोकप्रिय सदन; सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष; समय से पूर्व विघटन संभव; कार्यपालिका इसी के प्रति सामूहिक रूप से जवाबदेह
तुलनात्मक आयाम राज्यसभा (Council of States) लोकसभा (House of the People)
अधिकतम सदस्य संख्या 250 (238 राज्यों/UTs से अप्रत्यक्ष निर्वाचित + 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत) 550 (530 राज्यों से + 20 UTs से प्रत्यक्ष निर्वाचित; 104वें संशोधन से 2 एंग्लो-इंडियन समाप्त)
वर्तमान सदस्य संख्या 245 (225 राज्यों से + 8 UTs से [दिल्ली 3, पुद्दुचेरी 1, J&K 4] + 12 मनोनीत) 543 (524 राज्यों से + 19 केंद्रशासित प्रदेशों से प्रत्यक्ष निर्वाचित)
निर्वाचन पद्धति राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व (एकल संक्रमणीय मत, खुला मतदान) प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से वयस्क मताधिकार (18 वर्ष, 61वां संशोधन 1988) द्वारा प्रत्यक्ष मतदान (First-Past-The-Post)
न्यूनतम आयु सीमा न्यूनतम 30 वर्ष (अनुच्छेद 84) न्यूनतम 25 वर्ष (अनुच्छेद 84)

2. परिसीमन आयोग एवं आरक्षण संशोधन (अनु. 82, 330, 332, 334)

संशोधन / प्रावधान वर्ष संवैधानिक प्रभाव एवं निर्धारित समय-सीमा
84वां संशोधन अधिनियम 2001 लोकसभा व राज्यों की विधानसभा सीटों की कुल संख्या को वर्ष 2026 तक के लिए स्थिर (Freeze) किया गया; जनसंख्या आधार 1971 की जनगणना
87वां संशोधन अधिनियम 2003 राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन/परिसीमन हेतु जनसंख्या का आधार वर्ष 1991 से बदलकर 2001 की जनगणना किया गया
104वां संशोधन अधिनियम 2019 अनुच्छेद 334 में संशोधन कर SC/ST आरक्षण को 2030 (10 वर्ष) तक बढ़ाया गया; लोकसभा व विधानसभाओं में 2 एंग्लो-इंडियन मनोनयन को समाप्त किया
106वां संशोधन अधिनियम 2023 नारी शक्ति वंदन अधिनियम: लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं हेतु 33% (1/3) सीटें आरक्षित; 2026 के परिसीमन के बाद 15 वर्ष हेतु प्रभावी

3. संसद की सदस्यता — अर्हताएं, शपथ एवं स्थान रिक्त होना (अनु. 84, 99, 101)

संवैधानिक विषय अनुच्छेद विहित शर्तें, विधिक प्रक्रिया एवं नियम
सदस्यता अर्हताएं अनु. 84 भारत का नागरिक; न्यूनतम आयु (LS 25 वर्ष, RS 30 वर्ष); चुनाव आयोग द्वारा अधिकृत व्यक्ति के समक्ष शपथ; जनप्रतिनिधित्व कानून (RPA 1951) की शर्तें
शपथ या प्रतिज्ञान अनु. 99 राष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति (प्रोटेम स्पीकर) के समक्ष तीसरी अनुसूची अनुसार शपथ; बिना शपथ भाग लेने पर ₹500 प्रतिदिन जुर्माना (अनु. 104)
दोहरी सदस्यता (अनु. 101) विधिक नियम 1. दोनों सदनों में चुने जाने पर 10 दिन में बताना होगा, अन्यथा राज्यसभा सीट रिक्त; 2. एक सदन में रहते दूसरे में चुने जाने पर पहला पद रिक्त; 3. संसद + राज्य विधानसभा चुने जाने पर 14 दिन में विधानसभा न छोड़ने पर संसद सीट रिक्त
त्यागपत्र एवं अनुपस्थिति अनु. 101 त्यागपत्र लोकसभा अध्यक्ष/राज्यसभा सभापति को; यदि कोई सदस्य बिना अनुमति सदन की बैठकों से लगातार 60 दिनों तक अनुपस्थित रहे, तो सदन सीट रिक्त घोषित कर सकता है

4. सांसदों की अयोग्यताएं (अनुच्छेद 102 एवं 10वीं अनुसूची — दलबदल)

अयोग्यता का आधार संवैधानिक / विधिक प्रावधान निर्णायक प्राधिकारी
सामान्य संवैधानिक अयोग्यताएं (अनु. 102(1)) संघ/राज्य में लाभ का पद (Office of Profit) धारण करना; विकृतचित्त (न्यायालय द्वारा घोषित); दिवालिया; अनिवासी/विदेशी नागरिकता ग्रहण करना राष्ट्रपति द्वारा निर्णय (चुनाव आयोग की बाध्यकारी सलाह अनुसार अनु. 103)
वैधानिक अयोग्यताएं (RPA 1951) भ्रष्ट चुनावी आचरण; 2 वर्ष या अधिक का कारावास (लिली थॉमस वाद 2013); छुआछूत, दहेज, सती प्रथा का समर्थन; सरकारी अनुबंध में हित राष्ट्रपति द्वारा निर्णय (चुनाव आयोग की बाध्यकारी सलाह अनुसार)
दलबदल निरोधक कानून (10वीं अनुसूची) 52वां संशोधन 1985 द्वारा जोड़ी गई: 1. स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ना, 2. पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करना या अनुपस्थित रहना (15 दिन में माफी न मिले), 3. निर्दलीय सदस्य का किसी दल में शामिल होना, 4. मनोनीत सदस्य का 6 माह बाद किसी दल में शामिल होना संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी (स्पीकर/सभापति) द्वारा; किहोटो होलोहन वाद (1992): पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन
💡 संसद सत्र एवं लोकसभा विघटन पर विधेयकों का व्यपगत होना (Lapsing of Bills — अनु. 107): 1. लोकसभा में लंबित सभी विधेयक समाप्त (Lapse) हो जाते हैं; 2. लोकसभा द्वारा पारित परंतु राज्यसभा में लंबित विधेयक समाप्त हो जाते हैं; 3. जो विधेयक राज्यसभा में लंबित हों परंतु लोकसभा द्वारा पारित न किए गए हों, वे समाप्त नहीं होते; 4. दोनों सदनों द्वारा पारित व राष्ट्रपति की सहमति हेतु लंबित विधेयक समाप्त नहीं होते; 5. राष्ट्रपति द्वारा पुनर्विचार हेतु लौटाए गए विधेयक समाप्त नहीं होते।

5. लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष (अनुच्छेद 93–96)

विषय / आयाम संवैधानिक प्रावधान, कार्यप्रणाली एवं विशेषाधिकार
निर्वाचन एवं पदमुक्ति लोकसभा के उपस्थित सदस्यों के साधारण बहुमत द्वारा निर्वाचन; पदमुक्ति: लोकसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत (प्रभावी बहुमत) द्वारा 14 दिन की पूर्व नोटिस पर
निर्णायक मत (Casting Vote) अनुच्छेद 100: अध्यक्ष प्रथमतः मत नहीं देता; पक्ष-विपक्ष में मत बराबर (टाई) होने की स्थिति में ही निर्णायक मत देता है (निष्पक्षता का प्रतीक)
धन विधेयक पर अंतिम निर्णय अनुच्छेद 110(3): कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इसका अंतिम व बाध्यकारी निर्णय लोकसभा अध्यक्ष का होता है; न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती
संयुक्त बैठक की अध्यक्षता अनुच्छेद 118(4): संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है (उनकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, फिर उपसभापति)
दलबदल पर न्यायाधिकरण 10वीं अनुसूची के तहत लोकसभा सदस्यों की अयोग्यता पर निर्णय अध्यक्ष करता है; किहोटो होलोहन (1992) के अनुसार अध्यक्ष न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करता है
उपाध्यक्ष एवं प्रोटेम स्पीकर उपाध्यक्ष (अनु. 93) अध्यक्ष की अनुपस्थिति में कार्य करता है (परंपरा अनुसार विपक्ष से); प्रोटेम स्पीकर (Speaker Pro-tem) राष्ट्रपति द्वारा नवनिर्वाचित लोकसभा के वरिष्ठतम सांसद को नियुक्त; नव-सांसदों को शपथ दिलाना व नए अध्यक्ष का चुनाव

6. राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी एवं सदन के पदाधिकारी

पद / संस्था संवैधानिक स्थिति, निर्वाचन एवं कार्य
राज्यसभा के सभापति (अनु. 89) उपराष्ट्रपति पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होते हैं; वे राज्यसभा के सदस्य नहीं होते; सदन में केवल टाई होने पर निर्णायक मत देते हैं; जब वे कार्यवाहक राष्ट्रपति बनते हैं तो सभापति का वेतन नहीं पाते
राज्यसभा के उपसभापति (अनु. 89) राज्यसभा के सदस्यों में से साधारण बहुमत द्वारा निर्वाचित; सभापति की अनुपस्थिति में अध्यक्षता; पदमुक्ति प्रभावी बहुमत द्वारा (14 दिन नोटिस); प्रत्यक्ष रूप से राज्यसभा के प्रति उत्तरदायी
सदन का नेता (Leader of House) लोकसभा में प्रधानमंत्री (या उनके द्वारा मनोनीत मंत्री); राज्यसभा में प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत कैबिनेट मंत्री; विधायी कार्यों के प्रबंधन हेतु उत्तरदायी
विपक्ष का नेता (Leader of Opp.) सदन के सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता, जिसके पास सदन की कुल सदस्य संख्या का कम से कम 1/10 (10%) सदस्य हों; 1977 से कैबिनेट मंत्री का विधिक दर्जा प्राप्त
सचेतक (व्हिप — Whip) ब्रिटिश संसदीय परंपरा पर आधारित संस्था (संविधान या नियम पुस्तिका में उल्लेख नहीं); प्रत्येक राजनीतिक दल द्वारा नियुक्त; सदन में सदस्यों की उपस्थिति व दल-नीति अनुसार मतदान सुनिश्चित करना

7. संसदीय कार्यवाही के प्रमुख साधन (प्रश्नकाल, शून्यकाल आदि)

संसदीय उपकरण समय-सीमा प्रकृति, प्रक्रिया एवं विशेष नियम
प्रश्नकाल (Question Hour) बैठक का प्रथम घंटा (11:00 AM से 12:00 PM) मंत्रियों से सरकार के कामकाज पर प्रश्न पूछना; 3 प्रकार के प्रश्न: 1. तारांकित (Starred — मौखिक उत्तर + पूरक प्रश्न अनुमत), 2. अतारांकित (Unstarred — लिखित उत्तर + पूरक नहीं), 3. अल्प-सूचना (Short Notice — 10 दिन से कम नोटिस, मौखिक उत्तर)
शून्यकाल (Zero Hour) प्रश्नकाल के तुरंत बाद (12:00 PM से 1:00 PM) भारतीय संसदीय नवाचार (1962 से प्रारंभ); प्रक्रिया नियमों में कोई उल्लेख नहीं; बिना किसी पूर्व सूचना के अविलंबनीय लोक महत्व के मामले उठाना
ध्यानाकर्षण प्रस्ताव (Calling Attention) पीठासीन अधिकारी की अनुमति से भारतीय नवाचार (1954 से); अविलंबनीय लोक महत्व के विषय पर मंत्री का ध्यान आकर्षित करना व आधिकारिक बयान मांगना
आधे घंटे की चर्चा सप्ताह में 3 दिन (बैठक के अंतिम 30 मिनट) पर्याप्त लोक महत्व के ऐसे मामले पर चर्चा जिसका उत्तर प्रश्नकाल में पहले दिया जा चुका हो; कोई औपचारिक मतदान नहीं

8. महत्वपूर्ण संसदीय प्रस्ताव (Parliamentary Motions)

प्रस्ताव का प्रकार सदन / नियम प्रकृति, उद्देश्य एवं संवैधानिक प्रभाव
अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) केवल लोकसभा (नियम 198) कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन अनिवार्य; कारण बताना आवश्यक नहीं; यदि पारित हो जाए तो संपूर्ण मंत्रिपरिषद को तत्काल त्यागपत्र देना पड़ता है (अनु. 75(3))
निंदा प्रस्ताव (Censure Motion) केवल लोकसभा कारण बताना अनिवार्य; किसी एक मंत्री या मंत्रियों के समूह की विशिष्ट नीतियों के विरुद्ध लाया जाता है; पारित होने पर सरकार का इस्तीफा अनिवार्य नहीं
स्थगन / काम रोको प्रस्ताव (Adjournment Motion) दोनों सदन (सामान्यतः LS) सदन की नियमित कार्यवाही रोककर अविलंबनीय लोक महत्व के निश्चित मामले पर चर्चा; 50 सदस्यों की सहमति अनिवार्य; न्यूनतम 2.5 घंटे चर्चा; सरकार की कड़ी निंदा
धन्यवाद प्रस्ताव (Motion of Thanks) दोनों सदन (अनु. 87) राष्ट्रपति के अभिभाषण पर दोनों सदनों में चर्चा व मतदान; इसका पारित होना अनिवार्य है, अन्यथा सरकार का अल्पमत माना जाता है

9. भारतीय संसद में प्रयुक्त बहुमत के प्रकार (Types of Majorities)

बहुमत का प्रकार विधिक परिभाषा / सूत्र प्रमुख संवैधानिक अनुप्रयोग
साधारण बहुमत (Simple Majority) उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का > 50% साधारण/धन/वित्त विधेयक, बजट, अविश्वास प्रस्ताव, राष्ट्रपति शासन (अनु. 356), वित्तीय आपात (अनु. 360)
प्रभावी बहुमत (Effective Majority) तत्कालीन कुल सदस्य संख्या (कुल सीटें - रिक्तियां) का > 50% लोकसभा अध्यक्ष/उपाध्यक्ष एवं राज्यसभा उपसभापति को पद से हटाना (अनु. 67(b), 94)
पूर्ण बहुमत (Absolute Majority) सदन की कुल सदस्य संख्या (स्वीकृत क्षमता) का > 50% केवल आम चुनाव के बाद सरकार बनाने/विश्वास मत आंकने में प्रयुक्त; अकेले किसी विधेयक में नहीं
विशेष बहुमत प्रकार-1 उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 अनुच्छेद 249 (राज्य सूची पर कानून बनाने की RS शक्ति) एवं अनुच्छेद 312 (नई अखिल भारतीय सेवा सृजन)
विशेष बहुमत प्रकार-2 सदन की कुल सदस्य संख्या का > 50% + उपस्थित व मतदान का 2/3 अनुच्छेद 368 (संविधान संशोधन), सर्वोच्च/उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG), मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को पद से हटाना, राष्ट्रीय आपात (अनु. 352)
विशेष बहुमत प्रकार-3 सदन की कुल सदस्य संख्या का 2/3 बहुमत (कठोरतम) अनुच्छेद 61 (राष्ट्रपति पर महाभियोग — संसद के दोनों सदनों में कुल सदस्य संख्या का 2/3)
💡 कोरम या गणपूर्ति (अनुच्छेद 100(3)): सदन की बैठक आयोजित करने हेतु न्यूनतम 1/10 (10%) सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है (लोकसभा में 55 सदस्य, राज्यसभा में 25 सदस्य)। कोरम न होने पर पीठासीन अधिकारी का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह सदन को स्थगित कर दे या बैठक को निलंबित रखे।

10. साधारण विधेयक के 5 विधायी चरण (अनुच्छेद 107 एवं 111)

विधायी चरण संसदीय प्रक्रिया एवं विधिक गतिविधियां
1. प्रथम वाचन (First Reading) सदन में विधेयक पेश करने हेतु अनुमति मांगना, शीर्षक व उद्देश्यों का वाचन तथा भारत के राजपत्र (Gazette) में प्रकाशन; इस चरण पर कोई चर्चा नहीं होती
2. द्वितीय वाचन (Second Reading) सर्वाधिक महत्वपूर्ण व विस्तृत चरण; 3 उप-चरण: (a) सामान्य चर्चा, (b) समिति चरण (प्रवर समिति या संयुक्त समिति द्वारा सूक्ष्म संवीक्षा), (c) विचारण चरण (खंडवार विचार व संशोधन मतदान)
3. तृतीय वाचन (Third Reading) विधेयक को संपूर्ण रूप से स्वीकार या अस्वीकार करने पर मतदान; कोई बड़ा संशोधन नहीं लाया जा सकता; साधारण बहुमत से पारित
4. द्वितीय सदन में प्रक्रिया विधेयक दूसरे सदन में भेजा जाता है; दूसरा सदन: 1. पारित कर सकता है, 2. संशोधनों सहित लौटा सकता है, 3. अस्वीकार कर सकता है, या 4. 6 माह तक लंबित रख सकता है
5. राष्ट्रपति की स्वीकृति (अनु. 111) सहमति दे सकता है (कानून बन जाता है), सहमति रोक सकता है (आत्यंतिक वीटो), या पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है (निलंबनकारी वीटो; पुनः पारित होने पर सहमति बाध्यकारी)

11. धन विधेयक (अनु. 110) बनाम वित्त विधेयक (अनु. 117)

तुलनात्मक आयाम धन विधेयक (Money Bill — अनु. 110) वित्त विधेयक श्रेणी-I (अनु. 117(1)) वित्त विधेयक श्रेणी-II (अनु. 117(3))
विषय-वस्तु केवल अनुच्छेद 110(1) में उल्लिखित 6 विषय (कर लगाना/हटाना, ऋण, संचित निधि से धन) अनुच्छेद 110 के मामले + अन्य सामान्य विधायी विषय केवल भारत की संचित निधि से व्यय से संबंधित उपबंध (अनु. 110 का कोई विषय नहीं)
प्रस्तुति का सदन केवल लोकसभा में प्रस्तुत (राज्यसभा में नहीं) केवल लोकसभा में प्रस्तुत (राज्यसभा में नहीं) संसद के किसी भी सदन (LS या RS) में प्रस्तुत
राष्ट्रपति की पूर्व संस्तुति अनिवार्य (केवल राष्ट्रपति की सिफारिश पर) अनिवार्य (केवल राष्ट्रपति की सिफारिश पर) प्रस्तुति हेतु नहीं; केवल विचारण (Consideration) चरण हेतु अनिवार्य
राज्यसभा की शक्तियां अत्यंत सीमित; केवल 14 दिन रोक सकती है; संशोधन केवल अनुशंसित; लोकसभा मानने को बाध्य नहीं साधारण विधेयक के समान पूर्ण शक्तियां; अस्वीकार या संशोधित कर सकती है साधारण विधेयक के समान पूर्ण शक्तियां; अस्वीकार या संशोधित कर सकती है
स्पीकर का प्रमाण पत्र लोकसभा अध्यक्ष का प्रमाणीकरण अनिवार्य व अंतिम अध्यक्ष का प्रमाण पत्र आवश्यक नहीं अध्यक्ष का प्रमाण पत्र आवश्यक नहीं
संयुक्त बैठक (अनु. 108) पूर्णतः वर्जित (कोई संयुक्त बैठक नहीं) गतिरोध होने पर संयुक्त बैठक संभव गतिरोध होने पर संयुक्त बैठक संभव

12. संसद की संयुक्त बैठक (Joint Sitting — अनुच्छेद 108)

संयुक्त बैठक के पहलू संवैधानिक प्रावधान, प्रक्रिया एवं विधिक परिणाम
आहूत करने का आधार साधारण या वित्त विधेयक पर दोनों सदनों में गतिरोध: 1. दूसरा सदन विधेयक अस्वीकार कर दे, 2. संशोधनों पर अंतिम असहमति हो, या 3. दूसरा सदन 6 माह तक अनिर्णय रखे
समनकर्ता एवं अध्यक्ष राष्ट्रपति द्वारा आहूत की जाती है; अध्यक्षता: लोकसभा अध्यक्ष (अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, फिर राज्यसभा उपसभापति; सभापति कभी अध्यक्षता नहीं करते)
विधेयक पारित करने का नियम उपस्थित एवं मतदान करने वाले दोनों सदनों के कुल सदस्यों के साधारण बहुमत द्वारा; लोकसभा की सदस्य संख्या अधिक होने से उसका पक्ष भारी रहता है
किन विधेयकों पर वर्जित 1. धन विधेयक (Money Bill — अनु. 110) पर संयुक्त बैठक नहीं हो सकती; 2. संविधान संशोधन विधेयक (अनु. 368) पर संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है
ऐतिहासिक दृष्टांत (3 बार) 1. दहेज प्रतिषेध विधेयक (1961), 2. बैंकिंग सेवा आयोग (निरसन) विधेयक (1978), 3. आतंकवाद निवारण विधेयक (POTA 2002)

13. बजट (वार्षिक वित्तीय विवरण — अनु. 112) एवं इसके 6 चरण

बजट के 6 चरण संसदीय गतिविधि एवं विधिक महत्व
1. बजट प्रस्तुतिकरण वित्त मंत्री द्वारा लोकसभा में बजट भाषण; बजट के भाग: A (आर्थिक सर्वेक्षण व नीतियां) एवं B (कराधान प्रस्ताव); इस दिन कोई चर्चा नहीं
2. आम चर्चा (General Discussion) दोनों सदनों में बजट के सामान्य सिद्धांतों पर 3-4 दिन चर्चा; कोई मतदान या कटौती प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता
3. विभागीय समितियों द्वारा संवीक्षा सदन 3-4 सप्ताह हेतु स्थगित; 24 विभागीय स्थायी समितियां (DRSCs) मंत्रालयों की अनुदान मांगों की विस्तृत जांच कर रिपोर्ट देती हैं
4. अनुदान मांगों पर मतदान (अनु. 113) केवल लोकसभा में मतदान (राज्यसभा को मतदान का अधिकार नहीं); मंत्रालयों की मांगों पर अलग-अलग मतदान; कटौती प्रस्ताव इसी चरण में
5. विनियोग विधेयक पारित होना (अनु. 114) भारत की संचित निधि से धन निकालने की विधिक अनुमति; बिना विनियोग अधिनियम के संचित निधि से ₹1 भी नहीं निकाला जा सकता
6. वित्त विधेयक पारित होना (अनु. 117) सरकार के कराधान प्रस्तावों को कानूनी रूप देना; 75 दिनों के भीतर संसद द्वारा पारित होना अनिवार्य
कटौती प्रस्ताव (Cut Motions) प्रकार एवं उद्देश्य पारित होने का परिणाम
नीतिगत कटौती (Policy Cut) मांग की राशि घटाकर ₹1 कर दी जाए; सरकार की संपूर्ण नीति की अस्वीकृति यदि कोई भी कटौती प्रस्ताव पारित हो जाए तो सरकार के प्रति अविश्वास माना जाता है और मंत्रिमंडल को त्यागपत्र देना अनिवार्य होता है
आर्थिक कटौती (Economy Cut) मांग में से एक निश्चित राशि कम की जाए; सरकारी व्यय में मितव्ययिता लाना सरकारी बहुमत की परीक्षा
सांकेतिक कटौती (Token Cut) मांग में ₹100 की सांकेतिक कटौती; किसी विशिष्ट शिकायत/मुद्दे को रेखांकित करना प्रशासनिक जवाबदेही तय करना
💡 गिलोटिन (Guillotine): बजट सत्र में अनुदान मांगों पर मतदान हेतु निर्धारित समय समाप्त होने पर, चाहे चर्चा पूरी हुई हो या नहीं, लोकसभा अध्यक्ष बची हुई सभी अनुदान मांगों को बिना चर्चा के एक साथ मतदान हेतु रख देता है। इसे संसदीय शब्दावली में 'गिलोटिन' कहा जाता है।

14. भारत की तीन संवैधानिक निधियां (अनुच्छेद 266 एवं 267)

निधि का नाम अनुच्छेद प्राप्ति स्रोत, नियंत्रण एवं निकासी की प्रक्रिया
भारत की संचित निधि (Consolidated Fund) अनु. 266(1) सरकार को प्राप्त सभी राजस्व, लिए गए ऋण तथा ऋणों की अदायगी से प्राप्त धन; संसद द्वारा पारित विनियोग अधिनियम (अनु. 114) के बिना इसमें से कोई धन नहीं निकाला जा सकता; इस पर 'भारित व्यय' (Charged Expenditure) पर मतदान नहीं होता, केवल चर्चा होती है
भारत का लोक लेखा (Public Account) अनु. 266(2) संचित निधि के अलावा अन्य सभी सार्वजनिक राशियां (उदा. भविष्य निधि PF, बचत बैंक जमा, न्यायिक जमा, प्रेषण); कार्यपालिका के नियंत्रण में; संसदीय पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं
भारत की आकस्मिकता निधि (Contingency Fund) अनु. 267(1) अप्रत्याशित या आपातकालीन व्यय हेतु राष्ट्रपति के अधीन; वित्त सचिव राष्ट्रपति की ओर से संचालन करता है; संसद से बाद में घटनोत्तर स्वीकृति अनिवार्य; 2021 में इसकी राशि ₹500 करोड़ से बढ़ाकर ₹30,000 करोड़ की गई

15. संसदीय विशेषाधिकार (Privileges — अनु. 105 एवं 194)

विशेषाधिकार श्रेणी संवैधानिक प्रावधान, विधिक संरक्षण एवं अपवाद
व्यक्तिगत विशेषाधिकार 1. संसद सत्र के दौरान तथा सत्र के 40 दिन पूर्व व 40 दिन बाद तक दीवानी (Civil) मामलों में गिरफ्तारी से छूट (आपराधिक या निवारक हिरासत में कोई छूट नहीं); 2. सदन में भाषण देने की पूर्ण स्वतंत्रता (न्यायालय में कोई वाद नहीं अनु. 105(2)); 3. सत्र के दौरान गवाह बनने से छूट
सामूहिक विशेषाधिकार 1. अपनी बहसों व कार्यवाहियों को प्रकाशित करने अथवा गैर-सदस्यों को प्रतिबंधित करने का अधिकार; 2. गुप्त बैठक (Secret Sitting) आयोजित करने का अधिकार; 3. विशेषाधिकार हनन या सदन की अवमानना हेतु सदस्यों या बाहरी व्यक्तियों को दंडित/जेल भेजने का अधिकार (Court of Record की तरह); 4. न्यायालयों द्वारा संसदीय कार्यवाही की जांच का निषेध (अनु. 122)

16. प्रमुख वित्तीय एवं संसदीय समितियां (Parliamentary Committees)

समिति का नाम स्थापना सदस्य संख्या प्रमुख कार्य, अधिकार क्षेत्र एवं सीमाएं
लोक लेखा समिति (PAC) 1921 (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) 22 (15 LS + 7 RS) [अनुपातिक प्रतिनिधित्व] कैग (CAG) की वार्षिक लेखापरीक्षा रिपोर्टों की सूक्ष्म जांच; सरकारी धन के अपव्यय की जांच; 1967 से अध्यक्ष अनिवार्यतः विपक्ष से; 'प्राक्कलन समिति की जुड़वां बहन'; कैग इसका 'मित्र, दार्शनिक व मार्गदर्शक'
प्राक्कलन समिति (Estimates Committee) 1950 (जॉन मथाई की सिफारिश पर) 30 (सभी 30 केवल लोकसभा से; राज्यसभा का कोई सदस्य नहीं) संसद की सबसे बड़ी स्थायी समिति; बजट अनुमानों की जांच; प्रशासनिक दक्षता व सार्वजनिक व्यय में मितव्ययिता सुझाना; 'सतत मितव्ययिता समिति (Continuous Economy Committee)'; केवल बजट प्रस्तुति के बाद सक्रिय
सार्वजनिक उपक्रम समिति (CoPU) 1964 (कृष्ण मेनन समिति की संस्तुति) 22 (15 LS + 7 RS) सरकारी कंपनियों व सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) के वित्तीय लेखों, दक्षता व कैग रिपोर्टों की संवीक्षा; व्यावसायिक सिद्धांतों का मूल्यांकन
विभागीय स्थायी समितियां (DRSCs) 1993 (वर्तमान में 24 समितियां) 31 प्रत्येक (21 LS + 10 RS = कुल 744) संबंधित मंत्रालयों की अनुदान मांगों, विधेयकों व दीर्घकालिक नीतियों की गहन संवीक्षा; 16 लोकसभा व 8 राज्यसभा के अधीन

17. राज्यसभा की अनन्य / विशेष शक्तियां (Exclusive Powers)

संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद राज्यसभा का विशेष क्षेत्राधिकार एवं संघीय महत्व
राज्य सूची पर विधि निर्माण अनु. 249 उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के 2/3 विशेष बहुमत से संकल्प पारित कर संसद को राज्य सूची के किसी विषय पर 1 वर्ष हेतु कानून बनाने का अधिकार देना
नई अखिल भारतीय सेवा अनु. 312 उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से राष्ट्रीय हित में नई अखिल भारतीय सेवा (उदा. भारतीय वन सेवा IFS 1966) के सृजन का संसद को अधिकार
उपराष्ट्रपति पदमुक्ति अनु. 67(b) उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव केवल राज्यसभा में ही पुरःस्थापित हो सकता है; प्रभावी बहुमत से पारित होना अनिवार्य
आपातकाल का अनुमोदन अनु. 352, 356 यदि लोकसभा भंग हो गई हो, तो राष्ट्रीय आपातकाल या राष्ट्रपति शासन का अनुमोदन केवल राज्यसभा द्वारा 1 माह / 2 माह में किया जा सकता है

18. संसद के प्रमुख अनुच्छेदों का त्वरित संदर्भ चार्ट (Quick Reference)

अनुच्छेद संवैधानिक विषय अनुच्छेद संवैधानिक विषय
अनु. 79 संसद का गठन (राष्ट्रपति + RS + LS) अनु. 105 संसदीय विशेषाधिकार एवं उन्मुक्तियां
अनु. 80 राज्यसभा की संरचना (250 सदस्य) अनु. 108 दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting)
अनु. 81 लोकसभा की संरचना (550 सदस्य) अनु. 110 धन विधेयक की संवैधानिक परिभाषा
अनु. 85 संसद सत्र, सत्रावसान एवं लोकसभा विघटन अनु. 112 वार्षिक वित्तीय विवरण (केंद्रीय बजट)
अनु. 93 लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष अनु. 114 विनियोग विधेयक (Appropriation Bill)
अनु. 100 कोरम (1/10) एवं अध्यक्ष का निर्णायक मत अनु. 123 राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्माण शक्ति
💡 संसदीय संप्रभुता बनाम संवैधानिक सर्वोच्चता: ब्रिटिश संसद के विपरीत (जहाँ संसद संप्रभु है), भारत में संसद संप्रभु नहीं है। भारत में 'संविधान की सर्वोच्चता' है। लिखित संविधान, संघात्मक ढांचा, मूल अधिकार और न्यायपालिका की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review — अनु. 13) की शक्ति संसद की शक्तियों को सीमित करती है।
अध्याय 09 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 09: संघ एवं राज्य न्यायपालिका — सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय एवं विधिक सुधार — शॉर्ट नोट्स

SC संरचना, क्षेत्राधिकार (मूल/अपीलीय/सलाहकारी), HC रिट अधिकार (Art 226), न्यायिक समीक्षा/सक्रियता

1. सर्वोच्च न्यायालय: संगठन, संरचना एवं कॉलेजियम प्रणाली (अनुच्छेद 124)

आयाम / ऐतिहासिक विकास संवैधानिक प्रावधान, न्यायिक वाद एवं विधिक व्यवस्था
स्थापना एवं उद्घाटन 28 जनवरी 1950 को संसद भवन के चैंबर ऑफ प्रिंसेस में उद्घाटन; भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत स्थापित फेडरल कोर्ट ऑफ इंडिया (1937) का स्थान लिया; प्रीवी काउंसिल से अधिक शक्तियां प्राप्त
स्वीकृत न्यायाधीश क्षमता वर्तमान में कुल 34 न्यायाधीश (1 मुख्य न्यायाधीश (CJI) + 33 अन्य न्यायाधीश — 2019 संशोधन अधिनियम); मूल संविधान में केवल 8 (1+7) न्यायाधीश थे; संख्या बढ़ाने का अनन्य अधिकार केवल संसद को है
स्थान / सीट (अनु. 130) सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में स्थित होगा; भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) राष्ट्रपति के पूर्व अनुमोदन से देश में किसी अन्य स्थान पर भी न्यायालय की बैठक आहूत कर सकते हैं
प्रथम न्यायाधीश वाद (1981) एस.पी. गुप्ता वाद: कार्यपालिका को वरीयता; सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 124 में राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश से 'परामर्श (Consultation)' का अर्थ 'सहमति (Concurrence)' नहीं है
द्वितीय न्यायाधीश वाद (1993) सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड वाद: कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) की स्थापना; 'परामर्श' का अर्थ 'सहमति' माना; नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश (CJI) + 2 वरिष्ठतम जजों की संस्तुति बाध्यकारी
तृतीय न्यायाधीश वाद (1998) अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति संदर्भ: कॉलेजियम का विस्तार कर 5 सदस्यीय बनाया गया (मुख्य न्यायाधीश (CJI) + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश); यदि 2 जज भी असहमत हों तो मुख्य न्यायाधीश (CJI) नाम की सिफारिश नहीं कर सकते
चतुर्थ न्यायाधीश वाद (2015) 99वां संविधान संशोधन (2014) एवं राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को 4:1 बहुमत से असंवैधानिक घोषित किया; न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान का आधारभूत ढांचा (Basic Structure) माना

2. न्यायाधीशों की अर्हताएं, शपथ, कार्यकाल एवं वेतन

पहलू अनुच्छेद विहित शर्तें, विधिक प्रावधान एवं नियम
अर्हताएं (Qualifications) अनु. 124(3) भारत का नागरिक हो तथा: (a) किसी उच्च न्यायालय (HC) में लगातार कम से कम 5 वर्ष न्यायाधीश रहा हो, या (b) किसी HC में कम से कम 10 वर्ष अधिवक्ता रहा हो, या (c) राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता (Distinguished Jurist) हो
शपथ (Oath) अनु. 124(6) तीसरी अनुसूची अनुसार राष्ट्रपति या उनके द्वारा अधिकृत व्यक्ति के समक्ष; संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा, संप्रभुता-अखंडता की रक्षा तथा पक्षपात रहित न्याय की शपथ
कार्यकाल एवं त्यागपत्र अनु. 124(2) 65 वर्ष की आयु पूरी होने तक पद पर बने रहते हैं; संविधान में कोई न्यूनतम कार्यकाल तय नहीं; राष्ट्रपति को संबोधित स्वहस्ताक्षरित पत्र द्वारा त्यागपत्र दे सकते हैं
वेतन एवं पेंशन अनु. 125 संसद द्वारा निर्धारित; भारत की संचित निधि पर भारित (Charged on CFI); वित्तीय आपातकाल (अनु. 360) को छोड़कर कार्यकाल के दौरान इसमें कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं हो सकता

3. न्यायाधीशों की पदमुक्ति प्रक्रिया (न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968)

प्रक्रिया के चरण विधिक नियम, बहुमत का प्रकार एवं वैधानिक व्यवस्था
संवैधानिक आधार अनुच्छेद 124(4): केवल 2 आधारों पर — 1. साबित कदाचार (Proved Misbehaviour), 2. असमर्थता (Incapacity); 'महाभियोग' शब्द का औपचारिक प्रयोग संविधान में केवल राष्ट्रपति हेतु है
प्रस्ताव की शुरुआत लोकसभा में न्यूनतम 100 सदस्यों अथवा राज्यसभा में न्यूनतम 50 सदस्यों के हस्ताक्षरयुक्त प्रस्ताव संबंधित पीठासीन अधिकारी (स्पीकर/सभापति) को सौंपा जाता है
3-सदस्यीय जांच समिति आरोपों की जांच हेतु गठित समिति: 1. मुख्य न्यायाधीश (CJI) या SC न्यायाधीश, 2. किसी HC का मुख्य न्यायाधीश, 3. एक पारंगत विधिवेत्ता; यदि समिति दोषी पाए तभी सदन में चर्चा
पारित करने का बहुमत संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग: सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत (> 50%) तथा उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम 2/3 विशेष बहुमत उसी सत्र में
राष्ट्रपति का आदेश दोनों सदनों द्वारा पारित समावेदन पर राष्ट्रपति द्वारा पदमुक्ति का अंतिम आदेश जारी; स्वतंत्र भारत में अब तक किसी भी न्यायाधीश पर यह प्रक्रिया पूर्णतः पारित नहीं हो सकी

4. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (CJI), तदर्थ एवं सेवानिवृत्त न्यायाधीश (अनु. 126–128)

न्यायाधीश का प्रकार अनुच्छेद नियुक्ति प्रक्रिया, प्राधिकारी एवं शर्तें
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अनु. 126 मुख्य न्यायाधीश (CJI) का पद रिक्त या अनुपस्थित होने पर राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के किसी भी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति
तदर्थ न्यायाधीश (Ad-hoc) अनु. 127 न्यायालय का सत्र चालू रखने हेतु कोरम (Quorum) न होने पर; मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा राष्ट्रपति की पूर्व सहमति व संबंधित HC के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से किसी HC जज की नियुक्ति; केवल SC में (HC में नहीं)
सेवानिवृत्त न्यायाधीश अनु. 128 कार्यभार अधिक होने पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से SC या HC के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को कार्य हेतु अनुरोध; उन्हें न्यायाधीश के विशेषाधिकार मिलते हैं

5. न्यायपालिका की स्वतंत्रता हेतु संवैधानिक सुरक्षोपाय

सुरक्षोपाय का आयाम संवैधानिक प्रावधान एवं संस्थागत प्रभाव
कॉलेजियम आधारित चयन कार्यपालिका के एकतरफा राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षा; न्यायिक वरिष्ठता व परामर्श की प्रधानता
कठिन पदमुक्ति प्रक्रिया कार्यपालिका की मर्जी से नहीं हटाया जा सकता; केवल संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत द्वारा ही संभव
संचित निधि पर भारित व्यय न्यायाधीशों के वेतन-भत्ते व प्रशासनिक व्यय भारत की संचित निधि पर भारित हैं; संसद में मतदान नहीं होता
आचरण पर बहस पर रोक अनुच्छेद 121: न्यायाधीशों के न्यायिक आचरण पर संसद या विधानमंडल में चर्चा पूर्णतः प्रतिबंधित (पदमुक्ति प्रस्ताव के अतिरिक्त)
वकालत पर पूर्ण प्रतिबंध अनुच्छेद 124(7): सेवानिवृत्ति के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय का कोई भी न्यायाधीश भारत के किसी भी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष वकालत नहीं कर सकता
अवमानना पर दंड की शक्ति अनुच्छेद 129: अपनी अवमानना (Contempt of Court) हेतु दंडित करने की पूर्ण अंतर्निहित शक्ति
💡 अभिलेख न्यायालय (Court of Record — अनुच्छेद 129): सर्वोच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय है, जिसके दो मुख्य प्रभाव हैं: 1. इसके सभी फैसलों, कार्यवाहियों और आदेशों का साक्ष्य मूल्य (Evidentiary Value) होता है और उन्हें किसी अधीनस्थ अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती; 2. न्यायालय को अपनी अवमानना (आपराधिक या सिविल) हेतु 6 माह तक का कारावास या ₹2,000 तक जुर्माना अथवा दोनों से दंडित करने का अधिकार है।

6. सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार एवं शक्तियां (अनुच्छेद 131–143)

क्षेत्राधिकार का प्रकार अनुच्छेद विधिक कार्यक्षेत्र, शर्तें एवं संवैधानिक सीमाएं
मूल क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction) अनु. 131 संघीय विवादों की अनन्य सुनवाई: 1. केंद्र बनाम एक या अधिक राज्य, 2. केंद्र व राज्य बनाम अन्य राज्य, 3. दो या अधिक राज्यों के आपसी विवाद; केवल विधिक अधिकारों के प्रश्न (राजनीतिक, अंतर-राज्य जल विवाद अनु. 262 या वित्त आयोग मामले शामिल नहीं)
रिट क्षेत्राधिकार (Writ) अनु. 32 केवल मूल अधिकारों (Part III) के प्रवर्तन हेतु 5 प्रकार की रिटें (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, अधिकार पृच्छा) जारी करना; नागरिक सीधे SC जा सकते हैं; अनु. 32 स्वयं मूल अधिकार है
अपीलीय क्षेत्राधिकार अनु. 132–134 संवैधानिक मामलों (अनु. 132 — संविधान की व्याख्या का सारवान प्रश्न), दीवानी मामलों (अनु. 133 — व्यापक जनहित का विधिक प्रश्न) तथा आपराधिक मामलों (अनु. 134 — मृत्युदंड आदि) में उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील
विशेष अनुमति याचिका (SLP) अनु. 136 सर्वोच्च न्यायालय का असाधारण स्वविवेकी अधिकार; भारत के किसी भी न्यायालय या अधिकरण (सैन्य अदालत को छोड़कर) के निर्णय/आदेश के विरुद्ध विशेष अपील की अनुमति देना
परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार अनु. 143 राष्ट्रपति द्वारा राय मांगना: 1. लोक महत्व का विधिक/तथ्य का प्रश्न (सलाह देना स्वैच्छिक), 2. संविधान-पूर्व संधि/समझौते का विवाद (सलाह देना अनिवार्य); न्यायालय की राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं होती
निर्णयों का पुनरावलोकन अनु. 137 सर्वोच्च न्यायालय अपने पूर्व में दिए गए किसी भी निर्णय या आदेश की स्वयं समीक्षा (Review) कर उसे बदल सकता है
पूर्ण न्याय की शक्ति अनु. 142 सर्वोच्च न्यायालय अपने समक्ष लंबित किसी भी मामले में 'पूर्ण न्याय (Complete Justice)' सुनिश्चित करने हेतु कोई भी आवश्यक डिक्री या आदेश पारित कर सकता है (उदा. भोपाल गैस त्रासदी, अयोध्या विवाद)

7. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) एवं उपचारात्मक याचिका

अवधारणा / आयाम संवैधानिक आधार, विधिक अर्थ एवं ऐतिहासिक वाद
संवैधानिक आधार अनुच्छेद 13(2), 32, 131–136, 143, 226; विधियों व प्रशासनिक आदेशों की संवैधानिकता की जांच करने की न्यायपालिका की शक्ति; संविधान विरुद्ध होने पर शून्य घोषित करना
आधारभूत ढांचा सिद्धांत केशवानंद भारती (1973) एवं मिनर्वा मिल्स (1980) वाद: न्यायिक समीक्षा संविधान का आधारभूत ढांचा है; संसद अनुच्छेद 368 द्वारा भी इस शक्ति को समाप्त नहीं कर सकती
उपचारात्मक याचिका (Curative Petition) रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा वाद (2002): सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुनर्विचार याचिका (Review Petition) खारिज होने के बाद भी प्राकृतिक न्याय के घोर उल्लंघन या पूर्वाग्रह पर अंतिम उपचारात्मक याचिका दायर की जा सकती है

8. उच्च न्यायालय (High Courts — अनुच्छेद 214–231)

संवैधानिक विषय अनुच्छेद विहित प्रावधान, नियुक्ति प्रक्रिया एवं अधिकार
राज्यों हेतु उच्च न्यायालय अनु. 214 प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा; 7वें संशोधन 1956 (अनु. 231) द्वारा संसद को 2 या अधिक राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों (UTs) हेतु साझा उच्च न्यायालय स्थापित करने का अधिकार
वर्तमान स्थिति (कुल 25 HC) साझा HC देश में कुल 25 उच्च न्यायालय हैं (25वां अमरावती 2019); 3 साझा HC: गुवाहाटी, पंजाब व हरियाणा, बॉम्बे; दिल्ली व जम्मू-कश्मीर ऐसे केंद्रशासित प्रदेश (UTs) हैं जिनके अपने स्वतंत्र उच्च न्यायालय हैं
संरचना एवं नियुक्ति अनु. 216, 217 प्रत्येक HC में 1 मुख्य न्यायाधीश व राष्ट्रपति द्वारा तय अन्य न्यायाधीश; नियुक्ति: राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश (CJI) (कॉलेजियम = CJI + 2 वरिष्ठतम जज) + संबंधित राज्यपाल + संबंधित HC के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से
योग्यताएं (अनु. 217(2)) विधिक अर्हता भारत का नागरिक हो तथा: (a) भारत में कम से कम 10 वर्ष तक न्यायिक पद धारण कर चुका हो, या (b) कम से कम 10 वर्ष तक किसी HC में अधिवक्ता रहा हो (पारंगत विधिवेत्ता का कोई प्रावधान HC में नहीं)
कार्यकाल एवं पदमुक्ति अनु. 217(1) सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष (15वें संशोधन 1963 द्वारा 60 से 62 वर्ष की गई); पदमुक्ति: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही संसद के विशेष बहुमत द्वारा राष्ट्रपति के आदेश से
अधीक्षण शक्ति (अनु. 227) प्रशासनिक नियंत्रण अपने राज्य क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आने वाले सभी अधीनस्थ न्यायालयों व अधिकरणों (सैन्य न्यायालय छोड़कर) पर पूर्ण प्रशासनिक व न्यायिक अधीक्षण

9. सर्वोच्च न्यायालय (अनु. 32) बनाम उच्च न्यायालय (अनु. 226) — रिट तुलना

तुलनात्मक आधार सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226)
क्षेत्राधिकार का दायरा संकीर्ण — केवल संविधान के भाग 3 (Part III) में प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के प्रवर्तन हेतु रिट जारी कर सकता है व्यापक — मूल अधिकारों के साथ-साथ किसी अन्य सामान्य कानूनी अधिकार (Legal Rights) के उल्लंघन पर भी रिट जारी कर सकता है
अधिकार की प्रकृति अनुच्छेद 32 स्वयं एक मूल अधिकार है; अतः सर्वोच्च न्यायालय रिट याचिका पर विचार करने से इनकार नहीं कर सकता अनुच्छेद 226 एक संवैधानिक शक्ति है, मूल अधिकार नहीं; अतः उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार स्वविवेकी (Discretionary) है
प्रादेशिक सीमा समस्त भारत के राज्यक्षेत्र में किसी भी व्यक्ति या सरकार के विरुद्ध रिट जारी करने की राष्ट्रव्यापी शक्ति केवल अपने संबंधित राज्य क्षेत्राधिकार के भीतर या जहाँ वाद कारण (Cause of Action) उत्पन्न हुआ हो
💡 राजस्थान उच्च न्यायालय — ऐतिहासिक तथ्य: 29 अगस्त 1949 को जयपुर में स्थापित (उद्घाटन राजप्रमुख सवाई मानसिंह द्वारा); प्रथम मुख्य न्यायाधीश कमलकांत वर्मा (K.K. Verma) थे। सत्यनारायण राव समिति (1958) की सिफारिश पर मुख्य पीठ जोधपुर स्थानांतरित हुई; 31 जनवरी 1977 से जयपुर में स्थायी पीठ (Bench) कार्यरत है। वर्तमान में स्वीकृत न्यायाधीश क्षमता 50 है।

10. अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Courts — अनुच्छेद 233–237)

संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद नियुक्ति प्राधिकारी, पदसोपान एवं न्यायिक शक्तियां
जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति अनु. 233 राज्यपाल द्वारा संबंधित राज्य उच्च न्यायालय (HC) के परामर्श से; अर्हता: संघ/राज्य में पहले से सेवारत न हो और कम से कम 7 वर्ष का अधिवक्ता अनुभव हो तथा HC ने सिफारिश की हो
अन्य न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति अनु. 234 राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग एवं संबंधित उच्च न्यायालय के परामर्श से बनाए गए नियमों के अनुसार
उच्च न्यायालय का पूर्ण नियंत्रण अनु. 235 जिला न्यायालयों व अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों के पदस्थापन, पदोन्नति, अवकाश व अनुशासन पर पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण संबंधित उच्च न्यायालय का होता है
जिला एवं सत्र न्यायाधीश का दोहरा पद संरचना व शक्तियां दीवानी (Civil) मामलों की सुनवाई करते समय 'जिला न्यायाधीश (District Judge)' तथा आपराधिक (Criminal) मामलों की सुनवाई करते समय 'सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge)' कहलाता है; मृत्युदंड दे सकता है परंतु HC से पुष्टि अनिवार्य (CrPC)

11. वैकल्पिक विवाद निवारण: लोक अदालत एवं ग्राम न्यायालय

संस्था / मंच कानूनी आधार संरचना, क्षेत्राधिकार, कार्यप्रणाली एवं प्रभाव
लोक अदालत (Lok Adalat) विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 (NALSA Act) गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित; संरचना: सेवारत/सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी + वकील + सामाजिक कार्यकर्ता; क्षेत्राधिकार: सभी दीवानी मामले, पारिवारिक विवाद व समझौते योग्य (Compoundable) आपराधिक मामले; कोई कोर्ट फीस नहीं; दोनों पक्षों की सहमति से समझौता; इसका निर्णय दीवानी अदालत की डिक्री माना जाता है; इसके फैसले के विरुद्ध कोई अपील नहीं होती
ग्राम न्यायालय (Gram Nyayalaya) ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 (2 अक्टूबर 2009 से लागू) मध्यवर्ती पंचायत स्तर पर त्वरित न्याय; न्यायाधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा HC के परामर्श से (प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समकक्ष); मोबाइल कोर्ट (Mobile Court — गांवों में जाकर सुनवाई); दीवानी व छोटे फौजदारी मामले; प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर कार्य (साक्ष्य अधिनियम 1872 के कठोर नियमों से छूट)

12. ई-कोर्ट्स परियोजना, फास्ट ट्रैक कोर्ट्स एवं न्यायिक नवाचार

नवाचार / परियोजना उद्देश्य, तकनीकी ढांचा एवं विधिक उपयोगिता
ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट (e-Courts) न्यायिक प्रणाली का पूर्ण डिजिटलीकरण; राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG — लंबित मुकदमों की रियल-टाइम ट्रैकिंग); चरण-3 (2023–2027) हेतु ₹7,210 करोड़ स्वीकृत — पेपरलेस अदालतें, ई-फाइलिंग व वर्चुअल कोर्ट्स
फास्टर प्रणाली (FASTER) सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेशों, स्थगनादेशों व जमानत आदेशों को जेलों व संबंधित अधिकारियों तक सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से त्वरित प्रेषण (जमानत के बाद रिहाई में देरी रोकने हेतु)
सुवास एवं सुपेस (SUVAS & SUPACE) सुवास (SUVAS): न्यायिक आदेशों का हिंदी सहित 10 क्षेत्रीय भाषाओं में AI अनुवाद सॉफ्टवेयर; सुपेस (SUPACE): न्यायाधीशों के शोध कार्य में सहायता हेतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पोर्टल
राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) अनुच्छेद 39A (समान न्याय व निःशुल्क विधिक सहायता) के तहत 1995 में स्थापित; समाज के निर्धन, महिलाओं व वंचित वर्गों को निःशुल्क कानूनी सहायता; मुख्य संरक्षक: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI)

13. न्यायपालिका के प्रमुख अनुच्छेदों का त्वरित संदर्भ चार्ट (Quick Reference)

अनुच्छेद संवैधानिक विषय अनुच्छेद संवैधानिक विषय
अनु. 124 सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना व गठन अनु. 143 राष्ट्रपति की SC से परामर्श शक्ति
अनु. 129 अभिलेख न्यायालय (Court of Record) अनु. 214 राज्यों हेतु उच्च न्यायालय (HC)
अनु. 131 सर्वोच्च न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार अनु. 217 उच्च न्यायालय न्यायाधीशों की नियुक्ति
अनु. 136 विशेष अनुमति याचिका (SLP) अनु. 226 उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता
अनु. 137 निर्णयों का पुनरावलोकन (Review) अनु. 227 उच्च न्यायालय की अधीक्षण शक्ति
अनु. 141 SC की विधि सभी अदालतों पर बाध्यकारी अनु. 233 जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति

14. न्यायपालिका तुलनात्मक मास्टर मैट्रिक्स (Quick Master Matrix)

संवैधानिक पद अनुच्छेद नियुक्ति प्राधिकारी शपथ सेवानिवृत्ति पदमुक्ति का आधार
SC न्यायाधीश अनु. 124 राष्ट्रपति (कॉलेजियम 1+4) राष्ट्रपति 65 वर्ष संसद विशेष बहुमत (साबित कदाचार/असमर्थता)
HC न्यायाधीश अनु. 217 राष्ट्रपति (कॉलेजियम 1+2) राज्यपाल 62 वर्ष संसद विशेष बहुमत (SC जज के समान प्रक्रिया)
जिला न्यायाधीश अनु. 233 राज्यपाल (HC परामर्श) नियमानुसार 60 वर्ष उच्च न्यायालय व राज्य सेवा नियमावली
💡 न्यायिक स्वतंत्रता बनाम लोकतांत्रिक संतुलन: संविधान ने न्यायपालिका को कार्यपालिका व विधायिका के राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखकर 'विधि का शासन' और नागरिकों के 'मूल अधिकारों' का रक्षक बनाया है। कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता, जजों की रिक्तियां और मुकदमों का अंबार वर्तमान विधिक प्रणाली के मुख्य विचारणीय बिंदु हैं।
अध्याय 10 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 10: संघ-राज्य संबंध एवं आपातकालीन उपबंध — शॉर्ट नोट्स

विधायी/प्रशासनिक/वित्तीय संबंध, सरकारीया/पुंछी आयोग, Art 352 राष्ट्रीय, Art 356 राष्ट्रपति, Art 360 वित्तीय

1. भारतीय संघवाद की प्रकृति — संघीय बनाम एकात्मक लक्षण एवं विद्वानों के मत

प्रकृति के आयाम संवैधानिक लक्षण एवं संस्थागत प्रावधान
7 संघीय लक्षण (Federal Features) 1. द्वैध राज्यव्यवस्था (Dual Polity — केंद्र व राज्य सरकारें), 2. लिखित संविधान (Written Constitution), 3. शक्तियों का विभाजन (7वीं अनुसूची की 3 सूचियां), 4. संविधान की सर्वोच्चता, 5. कठोर संविधान (अनु. 368 में राज्यों की सहमति), 6. स्वतंत्र न्यायपालिका, 7. द्विसदनीय व्यवस्था (लोकसभा व राज्यसभा)
एकात्मक लक्षण (Unitary Features) 1. सशक्त केंद्र (अवशिष्ट शक्तियां केंद्र में), 2. एकल संविधान व एकल नागरिकता, 3. आपातकालीन उपबंध (भाग XVIII), 4. राज्यपाल की केंद्र द्वारा नियुक्ति, 5. अखिल भारतीय सेवाएं (AIS), 6. एकीकृत न्यायपालिका, 7. संसद द्वारा नए राज्यों का निर्माण/सीमा परिवर्तन (अनु. 3), 8. राज्य विधेयकों पर राष्ट्रपति वीटो (अनु. 200/201)
प्रमुख विद्वानों के विचार के.सी. व्हीयर: 'अर्ध-संघीय (Quasi-Federal)'; ग्रैनविले ऑस्टिन: 'सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism)'; मॉरिस जोन्स: 'सौदेबाजी का संघवाद (Bargaining Federalism)'; आइवर जेनिंग्स: 'मजबूत केंद्रीकरण प्रवृत्ति वाला संघ'; डॉ. बी.आर. अंबेडकर: 'कठोर संघवाद नहीं, बल्कि समय व परिस्थिति अनुसार एकात्मक व संघीय दोनों'
एस.आर. बोम्मई वाद (1994) सर्वोच्च न्यायालय की 9-जज संविधान पीठ ने संघवाद (Federalism) को भारतीय संविधान का 'आधारभूत ढांचा (Basic Structure)' घोषित किया; राज्यों को केंद्र का प्रशासनिक अंग या उपग्रह नहीं माना जा सकता

2. विधायी संबंध (Legislative Relations — अनुच्छेद 245–255)

विधायी विषय अनुच्छेद संवैधानिक प्रावधान एवं क्षेत्राधिकार
क्षेत्रीय विस्तार (Territorial Extent) अनु. 245 संसद संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग हेतु कानून बना सकती है; संसद के कानून का बाह्य-क्षेत्रीय प्रभाव (Extraterritorial Operation) भी होता है; राज्य विधानमंडल केवल अपने राज्य क्षेत्र हेतु कानून बनाता है
7वीं अनुसूची: संघ सूची (List I) अनु. 246 मूलतः 97 विषय (वर्तमान में 100); राष्ट्रीय महत्व के विषय जिन पर संसद को अनन्य विधि निर्माण शक्ति; उदा. रक्षा, विदेश, परमाणु ऊर्जा, रेलवे, बैंकिंग, बीमा, संचार, मुद्रा
7वीं अनुसूची: राज्य सूची (List II) अनु. 246 मूलतः 66 विषय (वर्तमान में 61); स्थानीय महत्व के विषय जिन पर राज्य विधानमंडल को सामान्य शक्ति; उदा. लोक व्यवस्था, पुलिस, जेल, लोक स्वास्थ्य, स्वच्छता, कृषि, स्थानीय स्वशासन
7वीं अनुसूची: समवर्ती सूची (List III) अनु. 246 मूलतः 47 विषय (वर्तमान में 52); केंद्र व राज्य दोनों को अधिकार; टकराव पर केंद्रीय विधि प्रभावी (अनु. 254); 42वें संशोधन 1976 द्वारा 5 विषय (शिक्षा, वन, वन्यजीव संरक्षण, माप-तौल, न्याय प्रशासन) राज्य से समवर्ती में अंतरित
अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers) अनु. 248 जो विषय तीनों सूचियों में शामिल नहीं हैं, उन पर कानून बनाने की अनन्य शक्ति केंद्र (संसद) में निहित है (कनाडा के संविधान से प्रेरित; यूएसए व ऑस्ट्रेलिया में अवशिष्ट शक्तियां राज्यों को हैं)
5 असाधारण परिस्थितियां: संसद द्वारा राज्य सूची पर कानून निर्माण संवैधानिक प्रक्रिया एवं अवधि
1. राष्ट्रीय हित में (अनु. 249) राज्यसभा अपने उपस्थित व मतदान करने वाले 2/3 सदस्यों के विशेष बहुमत से संकल्प पारित करे; 1 वर्ष हेतु प्रभावी (बार-बार बढ़ाया जा सकता है)
2. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान (अनु. 250) अनुच्छेद 352 लागू होने पर संसद को राज्य सूची के किसी भी विषय पर पूरे देश या किसी भाग हेतु कानून बनाने की शक्ति; आपातकाल समाप्ति के 6 माह बाद कानून निष्प्रभावी
3. राज्यों की सहमति से (अनु. 252) दो या अधिक राज्यों के विधानमंडल संकल्प पारित कर संसद से अनुरोध करें; यह कानून केवल उन्हीं राज्यों पर लागू होगा; संशोधन केवल संसद द्वारा
4. अंतर्राष्ट्रीय संधियों हेतु (अनु. 253) किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि, समझौते या अभीसमयों को लागू करने हेतु संसद राज्य सूची के किसी भी विषय पर विधि बना सकती है (राज्यों की सहमति आवश्यक नहीं)
5. राष्ट्रपति शासन के दौरान (अनु. 356) राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने पर संसद को राज्य विधानमंडल की विधायी शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं

3. प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations — अनुच्छेद 256–263)

प्रशासनिक आयाम अनुच्छेद संवैधानिक निर्देश, दायित्व एवं संस्थागत तंत्र
राज्यों पर केंद्र के निर्देश अनु. 256, 257 राज्य कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार करे कि संसद द्वारा निर्मित विधियों का अनुपालन सुनिश्चित हो; संघ रेलवे व राष्ट्रीय महत्व के संचार साधनों की रक्षा हेतु राज्यों को बाध्यकारी निर्देश दे सकता है
निर्देश न मानने का परिणाम अनु. 365 यदि कोई राज्य केंद्र के वैध प्रशासनिक निर्देशों का पालन करने में विफल रहता है, तो राष्ट्रपति यह मान सकते हैं कि राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है (अनु. 356 लगाने का आधार)
कार्यों का परस्पर प्रत्यायोजन अनु. 258, 258A राष्ट्रपति संबंधित राज्य सरकार की सहमति से संघ के कार्य राज्य को सौंप सकता है; संसद विधि द्वारा बिना सहमति भी सौंप सकती है; राज्य सरकार राज्यपाल द्वारा संघ को कार्य सौंप सकती है
अखिल भारतीय सेवाएं (AIS) अनु. 312 केंद्र व राज्य दोनों हेतु साझा सेवाएं (प्रशासनिक, पुलिस व वन सेवा); भर्ती व नियंत्रण केंद्र द्वारा, सेवाएं राज्यों में; संघवाद में तनाव व संतुलन दोनों का केंद्र
अंतर-राज्य जल विवाद अनु. 262 संसद विधि द्वारा अंतर-राज्य नदियों व नदी घाटियों के जल उपयोग व वितरण विवादों के न्यायनिर्णयन हेतु न्यायाधिकरण (Tribunal) बना सकती है; न्यायालयों का क्षेत्राधिकार वर्जित
अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) अनु. 263 राज्यों के आपसी व केंद्र-राज्य विवादों की जांच व समन्वय हेतु राष्ट्रपति द्वारा गठन (सरकारीया आयोग की सिफारिश पर 1990 में गठित); अध्यक्ष: प्रधानमंत्री; सदस्य: सभी राज्यों के CM + केंद्रशासित प्रदेशों (UTs) के प्रशासक + 6 कैबिनेट मंत्री

4. वित्तीय संबंध एवं कराधान प्रणाली (अनुच्छेद 268–293)

वित्तीय विषय अनुच्छेद विधिक व्यवस्था, कर विभाजन एवं संवैधानिक संस्थाएं
वस्तु एवं सेवा कर (GST) अनु. 246A, 279A 101वां संशोधन 2016: केंद्र व राज्यों को अप्रत्यक्ष करों (GST) पर समवर्ती विधायी शक्ति; वस्तु एवं सेवा कर परिषद (GST Council) (अनु. 279A) — अध्यक्ष: केंद्रीय वित्त मंत्री, सदस्य: राज्यों के वित्त मंत्री
सहायता अनुदान (Grants-in-Aid) अनु. 275, 282 विधिक अनुदान (अनु. 275): वित्त आयोग की संस्तुति पर संसद द्वारा संचित निधि से जरूरतमंद राज्यों को; विवेकाधीन अनुदान (अनु. 282): सार्वजनिक प्रयोजनों हेतु केंद्र/राज्य द्वारा स्वैच्छिक
वित्त आयोग (Finance Commission) अनु. 280 राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष में 5-सदस्यीय (1 अध्यक्ष + 4 सदस्य) आयोग का गठन; केंद्र-राज्य करों के शुद्ध आगमों का विभाजन व राज्यों को सहायता अनुदान के सिद्धांतों की सिफारिश

5. केंद्र-राज्य संबंधों पर प्रमुख आयोग एवं समितियां

समिति / आयोग वर्ष प्रमुख संस्तुतियां एवं नीतिगत सुधार
प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) 1966 मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में गठित; अंतर-राज्य परिषद की स्थापना व राज्यपालों की नियुक्ति में निष्पक्षता की सिफारिश
राजमन्नार समिति 1969 तमिलनाडु की द्रमुक (DMK) सरकार द्वारा पी.वी. राजमन्नार की अध्यक्षता में; अनु. 356, 365 व अखिल भारतीय सेवाओं को समाप्त करने तथा राज्यों को अधिक स्वायत्तता की मांग
सरकारीया आयोग (Sarkaria Commission) 1983–88 न्यायमूर्ति आर.एस. सरकारीया की अध्यक्षता में 3-सदस्यीय आयोग: 1. अनुच्छेद 356 का प्रयोग केवल 'अंतिम विकल्प (Rare of the Rarest)' के रूप में, 2. अंतर-राज्य परिषद (अनु. 263) की स्थायी स्थापना, 3. राज्यपाल की नियुक्ति से पूर्व संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से अनिवार्य परामर्श, 4. समवर्ती सूची पर कानून बनाने से पूर्व राज्यों से विचार-विमर्श
पुंछी आयोग (Punchhi Commission) 2007–10 न्यायमूर्ति मदन मोहन पुंछी की अध्यक्षता में गठित: 1. राज्यपाल को 5 वर्ष का निश्चित कार्यकाल देना व हटाने हेतु राज्य विधानसभा द्वारा महाभियोग प्रक्रिया, 2. सांप्रदायिक हिंसा या आपदा में केवल जिले स्तर पर सीमित 'स्थानीय आपातकाल (Local Emergency)' का प्रावधान
💡 क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils): राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 के तहत स्थापित वैधानिक निकाय (संवैधानिक नहीं)। देश में 5 मूल क्षेत्रीय परिषदें (उत्तरी, मध्य, पूर्वी, पश्चिमी, दक्षिणी) तथा पूर्वोत्तर परिषद अधिनियम 1971 द्वारा पूर्वोत्तर परिषद स्थापित हैं। केंद्रीय गृह मंत्री सभी क्षेत्रीय परिषदों के पदेन अध्यक्ष होते हैं।

6. राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency — अनुच्छेद 352)

पहलू / प्रक्रिया संवैधानिक नियम, 44वां संशोधन सुधार एवं विधिक प्रभाव
घोषणा के आधार (3) 1. युद्ध (War), 2. बाह्य आक्रमण (External Aggression) — 'बाह्य आपातकाल'; 3. सशस्त्र विद्रोह (Armed Rebellion) — 'आंतरिक आपातकाल' (44वें संशोधन 1978 द्वारा 'आंतरिक अशांति' शब्द हटाया गया)
मंत्रिमंडल की लिखित संस्तुति राष्ट्रपति केवल संपूर्ण केंद्रीय मंत्रिमंडल (कैबिनेट) की लिखित सिफारिश (Written Recommendation) प्राप्त होने पर ही आपातकाल घोषित कर सकता है (प्रधानमंत्री अकेले नहीं)
संसदीय अनुमोदन व समयावधि घोषणा की तिथि से 1 माह के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत (सदन की कुल संख्या का > 50% + उपस्थित व मतदान का 2/3) से अनुमोदन अनिवार्य; एक बार में 6 माह; अनिश्चितकाल तक विस्तार संभव
समाप्ति की प्रक्रिया राष्ट्रपति कभी भी वापस ले सकता है; लोकसभा के साधारण बहुमत से पारित संकल्प द्वारा आपातकाल तत्काल समाप्त (1/10 सदस्यों के नोटिस पर 14 दिन में बैठक अनिवार्य)
कार्यपालिका व विधायी प्रभाव केंद्र राज्यों को किसी भी विषय पर निर्देश दे सकता है (राज्य सरकारें निलंबित नहीं होतीं परंतु केंद्र के पूर्ण नियंत्रण में आ जाती हैं); संसद राज्य सूची के विषयों पर स्वयं विधि बना सकती है
लोकसभा कार्यकाल में वृद्धि संसद विधि द्वारा लोकसभा के 5 वर्षीय कार्यकाल को एक बार में 1 वर्ष हेतु अनिश्चितकाल तक बढ़ा सकती है (आपातकाल समाप्त होने के बाद अधिकतम 6 माह तक ही मान्य)
मूल अधिकारों पर प्रभाव अनुच्छेद 358: बाह्य आपातकाल में अनुच्छेद 19 स्वतः निलंबित; अनुच्छेद 359: राष्ट्रपति आदेश द्वारा अन्य अधिकार निलंबित, परंतु अनुच्छेद 20 एवं 21 किसी भी स्थिति में निलंबित नहीं किए जा सकते
ऐतिहासिक दृष्टांत (3 बार) 1. अक्टूबर 1962 (भारत-चीन युद्ध), 2. दिसंबर 1971 (भारत-पाक युद्ध / बांग्लादेश मुक्ति), 3. जून 1975 (आंतरिक अशांति के आधार पर इंदिरा गांधी सरकार द्वारा)

7. राष्ट्रपति शासन (President's Rule — अनुच्छेद 356 व 365)

विषय / आयाम संवैधानिक प्रावधान, न्यायिक सीमाएं एवं वैधानिक परिणाम
घोषणा के 2 आधार 1. अनुच्छेद 356: राज्यपाल की रिपोर्ट पर या अन्यथा राष्ट्रपति को समाधान हो कि राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है; 2. अनुच्छेद 365: राज्य सरकार केंद्र के वैध प्रशासनिक निर्देशों का पालन करने में विफल रहे
संसदीय अनुमोदन व अवधि घोषणा की तिथि से 2 माह के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा साधारण बहुमत से अनुमोदन अनिवार्य; एक बार में 6 माह; सामान्यतः अधिकतम 1 वर्ष (विशेष परिस्थिति में चुनाव आयोग की संस्तुति पर अधिकतम 3 वर्ष)
राज्य सरकार पर प्रभाव राज्य मंत्रिपरिषद तत्काल बर्खास्त हो जाती है; राज्य विधानसभा को या तो निलंबित (Suspended Animation) या विघटित (Dissolved) कर दिया जाता है; राज्य की कार्यकारी शक्तियां राज्यपाल को प्राप्त
विधायी व वित्तीय प्रभाव राज्य सूची पर विधि बनाने की शक्ति संसद को प्राप्त; संसद यह शक्ति राष्ट्रपति को प्रत्यायोजित कर सकती है; राज्य संचित निधि से व्यय की स्वीकृति राष्ट्रपति द्वारा (संसद सत्र में न होने पर)
मूल अधिकारों पर प्रभाव नागरिकों के मूल अधिकारों (अनुच्छेद 19, 20, 21 सहित) पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता; केवल राज्य प्रशासन का ढांचा बदलता है
न्यायिक समीक्षा (एस.आर. बोम्मई 1994) राष्ट्रपति शासन की घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन है; यदि न्यायालय इसे दुर्भावनापूर्ण पाए तो वह बर्खास्त विधानसभा व सरकार को पुनः बहाल कर सकता है; विधानसभा भंग केवल संसद अनुमोदन के बाद ही संभव

8. वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency — अनुच्छेद 360)

पहलू संवैधानिक नियम, प्रभाव एवं वास्तविक स्थिति
घोषणा का आधार जब राष्ट्रपति को समाधान हो जाए कि ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे भारत या उसके किसी राज्यक्षेत्र के वित्तीय स्थायित्व (Financial Stability) या साख (Credit) को गंभीर संकट है
संसदीय अनुमोदन व अवधि घोषणा की तिथि से 2 माह के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा साधारण बहुमत से पारित होना अनिवार्य; एक बार संसद से अनुमोदित होने के बाद अनिश्चितकाल तक प्रभावी (बारंबार अनुमोदन की आवश्यकता नहीं)
समाप्ति की विधि राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय एक पश्चातवर्ती घोषणा द्वारा समाप्त किया जा सकता है; इसके लिए किसी संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती
वित्तीय निर्देश व प्रभाव 1. केंद्र राज्यों को वित्तीय औचित्य के सिद्धांतों का पालन करने हेतु निर्देश दे सकता है; 2. राज्य विधानमंडल द्वारा पारित सभी धन विधेयकों व वित्त विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखने का आदेश
वेतन-भत्तों में कटौती संघ व राज्यों के अधीन सेवारत सभी या किसी वर्ग के कर्मचारियों तथा सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन-भत्तों में कटौती का राष्ट्रपति द्वारा निर्देश
भारत में प्रयोग स्वतंत्र भारत के इतिहास में आज तक एक बार भी वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) लागू नहीं किया गया है (शून्य बार)

9. तीनों आपातकालों का तुलनात्मक मास्टर मैट्रिक्स (Comparative Matrix)

तुलनात्मक लक्षण राष्ट्रीय आपातकाल (अनु. 352) राष्ट्रपति शासन (अनु. 356) वित्तीय आपातकाल (अनु. 360)
संवैधानिक आधार युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह संवैधानिक तंत्र की विफलता (अनु. 356/365) वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा
संसदीय अनुमोदन 1 माह के भीतर (संसद का विशेष बहुमत) 2 माह के भीतर (संसद का साधारण बहुमत) 2 माह के भीतर (संसद का साधारण बहुमत)
अधिकतम समय-सीमा कोई अधिकतम सीमा नहीं (प्रति 6 माह संसद) अधिकतम 3 वर्ष (प्रति 6 माह संसद अनुमोदन) कोई अधिकतम सीमा नहीं (नवीनीकरण नहीं)
राज्य सरकार पर प्रभाव सरकार व विधानसभा बनी रहती है (केंद्र नियंत्रण) राज्य सरकार बर्खास्त, विधानसभा निलंबित/भंग सरकार बनी रहती है (वेतन कटौती निर्देश)
मूल अधिकारों पर प्रभाव अनु. 19 निलंबित (बाह्य में); अनु. 20 व 21 अक्षुण्ण मूल अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता मूल अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता
भारत में अब तक प्रयोग कुल 3 बार (1962, 1971, 1975) 125 से अधिक बार (सर्वाधिक दुरुपयोग) आज तक कभी नहीं (0 बार)

10. संघ-राज्य संबंध व आपातकाल के प्रमुख अनुच्छेद (त्वरित संदर्भ चार्ट)

अनुच्छेद संवैधानिक विषय अनुच्छेद संवैधानिक विषय
अनु. 245 संसद व विधानमंडलों की विधायी शक्ति का विस्तार अनु. 280 केंद्रीय वित्त आयोग का गठन
अनु. 246 7वीं अनुसूची की 3 सूचियां (संघ, राज्य, समवर्ती) अनु. 312 नई अखिल भारतीय सेवाओं (AIS) का सृजन
अनु. 248 अवशिष्ट विधायी शक्तियां (संसद में निहित) अनु. 352 राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा व प्रभाव
अनु. 249 राज्य सूची पर विधि बनाने की राज्यसभा शक्ति अनु. 356 राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता (राष्ट्रपति शासन)
अनु. 262 अंतर-राज्य नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन अनु. 359 आपातकाल में मूल अधिकारों का निलंबन (20-21 छोड़कर)
अनु. 263 अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) गठन अनु. 360 वित्तीय आपातकाल के उपबंध
💡 44वां संविधान संशोधन (1978) के सुरक्षा कवच: 1. 'आंतरिक अशांति' हटाकर 'सशस्त्र विद्रोह' जोड़ा; 2. संपूर्ण केंद्रीय मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश अनिवार्य; 3. अनुमोदन अवधि 2 से घटाकर 1 माह व विशेष बहुमत अनिवार्य; 4. लोकसभा को साधारण बहुमत से आपातकाल समाप्त करने की शक्ति; 5. अनुच्छेद 20 (दोषसिद्धि से संरक्षण) व अनुच्छेद 21 (प्राण व दैहिक स्वतंत्रता) को किसी भी स्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता।
अध्याय 11 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 11: स्थानीय स्वशासन — ग्रामीण एवं शहरी (73वां व 74वां संशोधन, PESA एवं नगरीय निकाय) — शॉर्ट नोट्स

बलवंतराय से सिंघवी समिति, 73वां संशोधन (11वीं अनुसूची, 29 विषय), 74वां संशोधन (12वीं अनुसूची, 18 विषय), PESA

1. स्थानीय स्वशासन: ऐतिहासिक विकास एवं 5 प्रमुख समितियां

ऐतिहासिक पड़ाव वर्ष प्रमुख प्रावधान, प्रशासनिक पहल एवं ऐतिहासिक महत्व
लॉर्ड मेयो का संकल्प 1870 वित्तीय विकेंद्रीकरण (Financial Decentralization) की शुरुआत; स्थानीय संस्थाओं को वित्तीय स्वायत्तता
लॉर्ड रिपन का संकल्प 1882 स्थानीय स्वशासन का मैग्नाकार्टा (Magna Carta); लॉर्ड रिपन को 'भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक' कहा जाता है
संविधान सभा व अनु. 40 1949 नीति निदेशक तत्वों (DPSP) के अनुच्छेद 40 में ग्राम पंचायतों के गठन का गांधीवादी निर्देश शामिल
सामुदायिक विकास कार्यक्रम 1952 2 अक्टूबर 1952 को सामुदायिक विकास कार्यक्रम (CDP) प्रारंभ; जनसहभागिता व प्रशासनिक समन्वय के अभाव के कारण विफल
पंचायती राज का उद्घाटन 1959 2 अक्टूबर 1959 को नागौर (राजस्थान) के बगदरी गांव में पं. जवाहरलाल नेहरू द्वारा देश के प्रथम त्रिस्तरीय पंचायती राज का उद्घाटन
समिति का नाम वर्ष प्रमुख संस्तुतियां एवं नीतिगत प्रभाव
बलवंत राय मेहता समिति 1957 लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण (Democratic Decentralization) की सिफारिश; त्रिस्तरीय ढांचा (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद); बलवंत राय मेहता को 'पंचायती राज व्यवस्था का वास्तुकार/शिल्पी' कहा जाता है
अशोक मेहता समिति 1977 द्विस्तरीय ढांचा (मंडल पंचायत + जिला परिषद); राजनीतिक दलों को दलगत चुनाव चिन्ह पर खुली भागीदारी; न्याय पंचायत का गठन
जी.वी.के. राव समिति 1985 पंचायती राज संस्थाओं को 'बिना जड़ की घास (Grass without roots)' कहा; जिला परिषद को मुख्य धुरी बनाने व नियमित चुनाव की सिफारिश
एल.एम. सिंघवी समिति 1986 पंचायती राज संस्थाओं को 'संवैधानिक दर्जा' देने की प्रथम संस्तुति; आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता व न्याय पंचायतों की स्थापना
पी.के. थुंगन समिति 1988 संवैधानिक संशोधन द्वारा त्रिस्तरीय प्रणाली को संवैधानिक मान्यता, 5 वर्ष निश्चित कार्यकाल एवं राज्य वित्त आयोग के गठन की सिफारिश

2. 73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 (भाग IX एवं 11वीं अनुसूची)

पहलू / प्रावधान संवैधानिक नियम एवं संगठनात्मक संरचना
लागू होने की तिथि 24 अप्रैल 1993 से पूरे देश में प्रभावी (अतः प्रतिवर्ष 24 अप्रैल को 'राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस' मनाया जाता है)
संवैधानिक स्थिति संविधान में नया 'भाग IX' (अनुच्छेद 243 से 243O तक कुल 16 अनुच्छेद) एवं 11वीं अनुसूची (29 विषय) जोड़ी गई
त्रिस्तरीय संरचना 1. ग्राम स्तर (ग्राम पंचायत), 2. ब्लॉक/मध्यवर्ती स्तर (पंचायत समिति), 3. जिला स्तर (जिला परिषद); 20 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्यों में मध्यवर्ती स्तर बनाना अनिवार्य नहीं (अनु. 243B)
अनिवार्य उपबंध (Compulsory) ग्राम सभा की स्थापना; त्रिस्तरीय प्रणाली; न्यूनतम 21 वर्ष आयु; SC/ST को जनसंख्या अनुपात में आरक्षण; महिलाओं को कम से कम 33% आरक्षण (राजस्थान सहित कई राज्यों में 50%); 5 वर्ष निश्चित कार्यकाल; राज्य निर्वाचन आयोग (अनु. 243K); राज्य वित्त आयोग (अनु. 243I)
स्वैच्छिक उपबंध (Voluntary) पिछड़े वर्गों (OBC) को आरक्षण देना; सांसदों व विधायकों को सदस्यता व मतदान अधिकार देना; पंचायतों को कर/शुल्क लगाने की शक्तियां सौंपना; 11वीं अनुसूची के 29 विषयों का हस्तांतरण

3. पंचायती राज के प्रमुख अनुच्छेद (अनुच्छेद 243 से 243O)

अनुच्छेद संवैधानिक विषय विहित प्रावधान एवं विधिक नियम
अनु. 243 परिभाषाएं जिला, ग्राम सभा, मध्यवर्ती स्तर, पंचायत, जनसंख्या आदि शब्दों की संवैधानिक परिभाषा
अनु. 243A ग्राम सभा प्रत्यक्ष लोकतंत्र की प्राथमिक संस्था; ग्राम स्तर पर पंचायत क्षेत्र के मतदाता सूची में पंजीकृत सभी वयस्क इसके सदस्य
अनु. 243B पंचायतों का गठन सभी राज्यों में त्रिस्तरीय पंचायतों का गठन (20 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्यों में मध्यवर्ती स्तर की छूट)
अनु. 243C पंचायतों की संरचना सभी स्थानों के प्रतिनिधि प्रत्यक्ष निर्वाचित; अध्यक्ष का चुनाव: ग्राम स्तर पर राज्य विधि अनुसार, मध्यवर्ती व जिला स्तर पर निर्वाचित सदस्यों में से अप्रत्यक्ष
अनु. 243D सीटों का आरक्षण SC एवं ST को जनसंख्या अनुपात में; चक्रानुक्रम में; महिलाओं हेतु कम से कम 1/3 (33%) सीटें आरक्षित; सभी स्तरों पर अध्यक्ष पदों पर भी यही आरक्षण लागू
अनु. 243E कार्यकाल (5 वर्ष) प्रथम बैठक से 5 वर्ष; कार्यकाल पूरा होने से पूर्व चुनाव अनिवार्य; यदि समय से पूर्व विघटित हो, तो 6 माह में चुनाव; शेष अवधि 6 माह से कम हो तो चुनाव आवश्यक नहीं
अनु. 243F सदस्यता अयोग्यताएं राज्य विधानमंडल विधि के अधीन; न्यूनतम आयु 21 वर्ष (25 वर्ष की शर्त यहां लागू नहीं)
अनु. 243G शक्तियां व 29 विषय आर्थिक विकास व सामाजिक न्याय हेतु योजनाएं तैयार करना; 11वीं अनुसूची में उल्लिखित 29 विषयों का क्रियान्वयन
अनु. 243I राज्य वित्त आयोग प्रत्येक 5 वर्ष में राज्यपाल द्वारा गठन; पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा व राज्य करों के शुद्ध आगमों का पंचायतों में वितरण
अनु. 243K राज्य निर्वाचन आयोग पंचायतों की मतदाता सूची तैयार करना व चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन व नियंत्रण; आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा, पदमुक्ति HC जज के समान
अनु. 243O न्यायालयों पर रोक चुनावी मामलों (परिसीमन, सीट आवंटन) में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक; चुनाव केवल चुनाव याचिका द्वारा ही चुनौती योग्य

4. पेसा अधिनियम 1996 (PESA Act — अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार)

पेसा (PESA) के आयाम संवैधानिक प्रावधान एवं जनजातीय अधिकार
पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य भूरिया समिति (1995) की सिफारिश पर संसद द्वारा पारित; संविधान की 5वीं अनुसूची के 10 राज्यों (राजस्थान सहित) के जनजातीय क्षेत्रों में पारंपरिक रीति-रिवाजों व स्वशासन का संरक्षण
ग्राम सभा की सर्वोच्चता प्रत्येक बस्ती/गांव की अपनी स्वतंत्र ग्राम सभा; परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधनों व विवाद समाधान की पारंपरिक विधियों का संरक्षण
भूमि व खनिजों पर नियंत्रण जनजातीय भूमि के अवैध हस्तांतरण को रोकना व हस्तांतरित भूमि की बहाली; लघु/गौण खनिजों (Minor Minerals) के खनन पट्टे हेतु ग्राम सभा की पूर्व सिफारिश अनिवार्य
संसाधनों का स्वामित्व गौण वनोपज (Minor Forest Produce — MFP) का पूर्ण स्वामित्व ग्राम सभा व पंचायतों में निहित; शराब की बिक्री व नियमन का अधिकार; ग्राम स्तर पर साहूकारों पर नियंत्रण
💡 11वीं अनुसूची के 29 विषय (प्रमुख कार्यक्षेत्र): 1. कृषि व कृषि विस्तार, 2. भूमि सुधार, 3. लघु सिंचाई व जल प्रबंधन, 4. पशुपालन व डेयरी, 5. मत्स्य पालन, 6. सामाजिक वानिकी, 7. लघु वनोपज, 8. लघु उद्योग, 9. खादी व ग्रामोद्योग, 10. ग्रामीण आवास, 11. पेयजल, 12. सड़कें, पुल व जलमार्ग, 13. ग्रामीण विद्युतीकरण, 14. गैर-पारंपरिक ऊर्जा, 15. गरीबी उन्मूलन, 16. प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा, 17. स्वास्थ्य व स्वच्छता।

5. 74वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 (भाग IX-A एवं 12वीं अनुसूची)

नगरीय स्वशासन का आयाम संवैधानिक पृष्ठभूमि एवं संरचना
ऐतिहासिक शुरुआत भारत में प्रथम नगर निगम 1687 में मद्रास (चेन्नई) में स्थापित; 1726 में बॉम्बे व कलकत्ता में नगर निगम स्थापित हुए
प्रभावी होने की तिथि 1 जून 1993 से लागू; संविधान में 'भाग IX-A' (अनुच्छेद 243P से 243ZG तक कुल 18 अनुच्छेद) एवं 12वीं अनुसूची (18 विषय) जोड़ी गई
त्रिस्तरीय नगरीय ढांचा (अनु. 243Q) 1. नगर पंचायत (ग्रामीण से नगरीय में संक्रमणशील क्षेत्र हेतु), 2. नगर पालिका परिषद (लघुतर नगरीय क्षेत्र — 20,000 से 5 लाख तक आबादी), 3. नगर निगम (वृहत्तर नगरीय क्षेत्र — 5 लाख से अधिक आबादी)
नगर निगम की संरचना राजनीतिक प्रमुख: महापौर (मेयर); प्रशासनिक प्रमुख: नगर निगम आयुक्त (Municipal Commissioner — राज्य सरकार द्वारा नियुक्त वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी)

6. नगरीय निकायों के प्रमुख अनुच्छेद (अनुच्छेद 243P से 243ZG)

अनुच्छेद संवैधानिक विषय विहित प्रावधान एवं विधिक नियम
अनु. 243P परिभाषाएं महानगर क्षेत्र, नगरपालिका क्षेत्र, वार्ड आदि की परिभाषा
अनु. 243Q नगरपालिकाओं का गठन तीन प्रकार की संस्थाएं: नगर पंचायत, नगर पालिका परिषद, नगर निगम
अनु. 243R संरचना व निर्वाचन वार्डों से प्रत्यक्ष निर्वाचन; विशेष ज्ञान रखने वाले मनोनीत सदस्य (मतदान का अधिकार नहीं); सांसदों व विधायकों को पदेन प्रतिनिधित्व
अनु. 243S वार्ड समितियां 3 लाख या अधिक जनसंख्या वाली नगरपालिकाओं में एक या अधिक वार्डों को मिलाकर वार्ड समितियों का गठन अनिवार्य
अनु. 243T सीटों का आरक्षण SC एवं ST को जनसंख्या अनुपात में; महिलाओं को कम से कम 1/3 (33%) आरक्षण; अध्यक्ष पदों पर भी चक्रानुक्रम आरक्षण
अनु. 243U कार्यकाल (5 वर्ष) प्रथम बैठक से 5 वर्ष; विघटन पर 6 माह में चुनाव; शेष अवधि 6 माह से कम होने पर चुनाव आवश्यक नहीं
अनु. 243V अयोग्यताएं न्यूनतम आयु 21 वर्ष; राज्य विधानमंडल की विधियों के अधीन
अनु. 243W शक्तियां व 18 विषय 12वीं अनुसूची के 18 विषयों का प्रशासन; आर्थिक विकास व सामाजिक न्याय हेतु योजनाएं
अनु. 243Y राज्य वित्त आयोग अनुच्छेद 243I के तहत गठित राज्य वित्त आयोग ही नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करेगा
अनु. 243ZA राज्य निर्वाचन आयोग नगरपालिकाओं के निर्वाचन का संचालन, अधीक्षण व नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा
अनु. 243ZG न्यायालयों पर रोक नगरीय निर्वाचन मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक

7. जिला आयोजना समिति (DPC) एवं महानगर आयोजना समिति (MPC)

समिति का नाम अनुच्छेद संरचना, अनुपात एवं प्रमुख कार्य
जिला आयोजना समिति (DPC) अनु. 243ZD जिले की पंचायतों एवं नगरपालिकाओं द्वारा तैयार योजनाओं को समेकित कर संपूर्ण जिले हेतु प्रारूप विकास योजना बनाना; कुल सदस्यों के कम से कम 4/5 (80%) सदस्य जिले की पंचायतों व नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित
महानगर आयोजना समिति (MPC) अनु. 243ZE 10 लाख या अधिक जनसंख्या वाले महानगर क्षेत्र हेतु समग्र विकास योजना का प्रारूप बनाना; कुल सदस्यों के कम से कम 2/3 (66.6%) सदस्य नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों व पंचायतों के अध्यक्षों द्वारा अपने में से निर्वाचित

8. अन्य नगरीय संस्थाएं, राइट टू रिकॉल व अविश्वास प्रस्ताव

संस्था / प्रक्रिया संवैधानिक / विधिक स्थिति एवं कार्यप्रणाली
छावनी बोर्ड (Cantonment Board) छावनी अधिनियम 2006 (केंद्रीय कानून) के तहत स्थापित; रक्षा मंत्रालय के प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण में; नागरिक आबादी व सैन्य प्रतिष्ठानों का प्रबंधन
न्यास एवं विकास प्राधिकरण नगर सुधार न्यास (UIT) व शहरी विकास प्राधिकरण (उदा. JDA); राज्य सरकार के विशेष अधिनियमों द्वारा गठित सांविधिक निकाय
अविश्वास प्रस्ताव पंचायतों व नगरपालिकाओं के अध्यक्षों के विरुद्ध; पद ग्रहण के 2 वर्ष तक नहीं लाया जा सकता; कुल सदस्यों के 3/4 बहुमत से पारित होना अनिवार्य
राइट टू रिकॉल (Right to Recall) जनता द्वारा अपने चुने हुए प्रतिनिधि को कार्यकाल पूरा होने से पहले वापस बुलाना; राजस्थान में बारां जिले की मांगरोल नगर पालिका अध्यक्ष के विरुद्ध देश में प्रथम सफल प्रयोग (2012)

9. 97वां संविधान संशोधन अधिनियम 2011 (सहकारी समितियां — भाग IX-B)

संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद संशोधन का प्रभाव एवं उच्चतम न्यायालय का निर्णय
मूल अधिकार का दर्जा अनु. 19(1)(c) 'सहकारी समितियां (Co-operative Societies)' बनाने के अधिकार को नागरिकों का मूल अधिकार घोषित किया
नीति निदेशक तत्व अनु. 43B राज्य सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यप्रणाली व पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा
संविधान में नया भाग भाग IX-B अनुच्छेद 243ZH से 243ZT तक: सहकारी समितियों के बोर्ड का आकार (अधिकतम 21), कार्यकाल 5 वर्ष, संपरीक्षा व चुनाव
सर्वोच्च न्यायालय निर्णय (2021) संघीय संतुलन सर्वोच्च न्यायालय की 3-जज पीठ ने भाग IX-B को राज्य के भीतर की सहकारी समितियों हेतु असंवैधानिक घोषित किया (क्योंकि सहकारिता राज्य सूची का विषय है और आधे राज्यों का अनुसमर्थन नहीं हुआ था); केवल बहु-राज्य सहकारी समितियों (Multi-State Co-operatives) पर वैध माना

10. 73वां बनाम 74वां संशोधन: त्वरित तुलनात्मक मास्टर चार्ट

तुलनात्मक आयाम 73वां संशोधन (ग्रामीण स्वशासन) 74वां संशोधन (शहरी स्वशासन)
संविधान का भाग भाग IX (अनुच्छेद 243 से 243O) भाग IX-A (अनुच्छेद 243P से 243ZG)
अनुसूची एवं विषय 11वीं अनुसूची (29 विषय) 12वीं अनुसूची (18 विषय)
प्रभावी तिथि 24 अप्रैल 1993 (पंचायती राज दिवस) 1 जून 1993
आधारभूत लोकतांत्रिक इकाई ग्राम सभा (प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र) वार्ड समिति (3 लाख या अधिक जनसंख्या)
वित्त एवं चुनाव आयोग राज्य वित्त आयोग (अनु. 243I) व निर्वाचन आयोग (SEC) राज्य वित्त आयोग (अनु. 243Y) व निर्वाचन आयोग (SEC)
💡 12वीं अनुसूची के 18 विषय (प्रमुख कार्यक्षेत्र): 1. नगर योजना, 2. भूमि उपयोग व भवनों का नियमन, 3. आर्थिक व सामाजिक विकास योजना, 4. सड़कें व पुल, 5. घरेलू व औद्योगिक जल आपूर्ति, 6. लोक स्वास्थ्य व स्वच्छता, 7. अग्निशमन सेवाएं, 8. नगरीय वानिकी व पर्यावरण संरक्षण, 9. कमजोर वर्गों के हितों का संरक्षण, 10. स्लम सुधार, 11. नगरीय गरीबी उन्मूलन, 12. पार्क, उद्यान व खेल मैदान, 13. सांस्कृतिक व शैक्षणिक पहलू, 14. श्मशान, कब्रिस्तान व शवदाह गृह, 15. कांजी हाउस व पशु क्रूरता निवारण।
अध्याय 12 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 12: निर्वाचन तंत्र — निर्वाचन आयोग, मतदान व्यवहार एवं निर्वाचन सुधार — शॉर्ट नोट्स

Art 324 संरचना/शक्तियां, RPA 1950 व 1951, गोस्वामी/तारकुंडे समितियां, EVM/VVPAT, इलेक्टोरल बॉन्ड

1. भारत निर्वाचन आयोग (ECI): संवैधानिक स्थिति, संरचना एवं नियुक्ति कानून 2023

आयाम / पहलू संवैधानिक प्रावधान, कानूनी ढांचा एवं ऐतिहासिक विकास
संवैधानिक पद व स्थापना 25 जनवरी 1950 को स्थापना (अतः 25 जनवरी को 'राष्ट्रीय मतदाता दिवस' मनाया जाता है); भाग XV, अनुच्छेद 324 से 329; एक स्थायी व स्वतंत्र संवैधानिक निकाय
चुनाव अधिकार क्षेत्र संसद (लोकसभा व राज्यसभा), राज्य विधानमंडलों (विधानसभा व विधान परिषद), राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के चुनावों का संचालन; (नोट: पंचायतों व नगरपालिकाओं के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग SEC द्वारा कराए जाते हैं)
संरचना का विकास 1950 से 1989: 1-सदस्यीय; 16 अक्टूबर 1989: 3-सदस्यीय बना; 1990: पुनः 1-सदस्यीय; 1 अक्टूबर 1993 से स्थायी रूप से 3-सदस्यीय (1 मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) + 2 निर्वाचन आयुक्त (EC)); तीनों के अधिकार, वेतन व शक्तियां बराबर
अनूप बरनवाल वाद (2023) सर्वोच्च न्यायालय की 5-जज संविधान पीठ ने अंतरिम व्यवस्था दी कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) व निर्वाचन आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति 3-सदस्यीय समिति (प्रधानमंत्री + नेता प्रतिपक्ष (LoP) + मुख्य न्यायाधीश (CJI)) की सलाह पर राष्ट्रपति करेंगे
नियुक्ति अधिनियम 2023 मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें) अधिनियम 2023: 3-सदस्यीय चयन समिति = प्रधानमंत्री (अध्यक्ष) + लोकसभा में विपक्ष का नेता (LoP) + प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत 1 केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (CJI के स्थान पर मंत्री)

2. कार्यकाल, सेवा शर्तें, पदमुक्ति एवं स्वतंत्रता के सुरक्षोपाय

विषय संवैधानिक नियम विहित प्रक्रिया एवं कानूनी संरक्षण
कार्यकाल एवं आयु अनु. 324(5) पद ग्रहण से 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले पूरी हो); त्यागपत्र राष्ट्रपति को; सेवानिवृत्ति पश्चात सरकार में अन्य नियुक्ति पर संविधान मौन है
वेतन एवं विशेषाधिकार विधिक प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान वेतन-भत्ते व पेंशन; कार्यकाल के दौरान कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता
मुख्य आयुक्त (CEC) को हटाना संवैधानिक सुरक्षा मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को केवल उसी रीति व आधारों पर हटाया जा सकता है जैसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को (संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत); साबित कदाचार या असमर्थता
अन्य आयुक्तों (ECs) को हटाना सीमित सुरक्षा अन्य निर्वाचन आयुक्तों (ECs) को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है (CEC जैसी स्वतंत्र सुरक्षा अन्य निर्वाचन आयुक्तों को प्राप्त नहीं है)

3. निर्वाचन आयोग के कार्य, शक्तियां एवं चुनावी तकनीक (EVM/VVPAT)

शक्तियों का वर्गीकरण प्रमुख कार्य, चुनावी तकनीकी व्यवस्था एवं विधिक अधिकार
प्रशासनिक शक्तियां निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन; मतदाता सूची तैयार व अद्यतन करना; चुनाव तिथियों की घोषणा; आदर्श आचार संहिता (MCC) लागू करना; मतदान केंद्रों का निर्धारण; चुनावी धांधली पर पुनर्मतदान का आदेश
सलाहकारी शक्तियां अनुच्छेद 103: संसद सदस्यों की अयोग्यता पर राष्ट्रपति को सलाह देना; अनुच्छेद 192: राज्य विधानमंडल सदस्यों की अयोग्यता पर राज्यपाल को सलाह देना (आयोग की सलाह राष्ट्रपति/राज्यपाल हेतु बाध्यकारी)
अर्ध-न्यायिक शक्तियां राजनीतिक दलों को पंजीकृत करना व मान्यता देना; चुनाव चिन्ह आवंटन व विवादों का निपटारा (उदा. सादिक अली वाद 1971 — दल में संगठनात्मक व विधायी बहुमत का परीक्षण)
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) प्रथम प्रयोग 1982 केरल के पारूर उपचुनाव में; 2004 के लोकसभा चुनाव से देश भर में पूर्ण प्रयोग; भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) एवं इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL) द्वारा निर्मित; स्टैंड-अलोन मशीन
वीवीपीएटी (VVPAT) वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल: प्रथम प्रयोग 2013 नागालैंड के नोकसेन में; मतदाता को 7 सेकंड तक पर्ची दिखती है; 2019 आम चुनाव से शत-प्रतिशत (100% VVPAT) अनिवार्य
नोटा (NOTA — None of Above) सर्वोच्च न्यायालय के पीयूसीएल (PUCL) वाद 2013 के निर्णय के बाद मतपत्र तथा (EVM) में शामिल; मतदाताओं को सभी प्रत्याशियों को अस्वीकार करने का नकारात्मक अधिकार

4. निर्वाचन आयोग से संबंधित प्रमुख ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय

न्यायिक वाद / वर्ष संवैधानिक मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय एवं नीतिगत प्रभाव
मोहिंदर सिंह गिल वाद (1978) अनुच्छेद 324 का दायरा अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव हेतु व्यापक अंतर्निहित/अवशिष्ट शक्तियां देता है, जहाँ संसदीय कानून मौन हो
एडीआर वाद (ADR 2002) मतदाताओं का सूचना अधिकार उम्मीदवारों को अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि, संपत्ति-देनदारियों व शैक्षणिक योग्यता का शपथपत्र (Affidavit) देना अनिवार्य; अनु. 19(1)(a) का भाग
लिली थॉमस वाद (2013) जनप्रतिनिधित्व कानून धारा 8(4) 2 वर्ष या अधिक सजा पाने वाले सांसद/विधायक की सदस्यता तत्काल समाप्त; अपीलीय संरक्षण देने वाली धारा 8(4) को असंवैधानिक घोषित किया
चुनावी बॉन्ड वाद (2024) गुप्त राजनीतिक वित्तपोषण इलेक्टोरल बॉन्ड योजना (2018) पूर्णतः असंवैधानिक घोषित; मतदाताओं के जानने के अधिकार का उल्लंघन माना; स्टेट बैंक (SBI) को समस्त दान विवरण सार्वजनिक करने का आदेश
💡 निर्वाचन संबंधी प्रमुख अनुच्छेद (324–329): अनु. 324 (चुनाव आयोग का अधीक्षण, निर्देशन व नियंत्रण); अनु. 325 (धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर मतदाता सूची में कोई भेदभाव नहीं); अनु. 326 (वयस्क मताधिकार — 18 वर्ष, 61वें संशोधन 1988 द्वारा); अनु. 327 (संसद की चुनाव कानून बनाने की शक्ति); अनु. 328 (राज्य विधानमंडल की शक्ति); अनु. 329 (चुनावी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक; चुनाव केवल चुनाव याचिका Election Petition द्वारा चुनौती योग्य)।

5. मतदान व्यवहार (Voting Behaviour): अर्थ, निर्धारक कारक एवं सैद्धांतिक मॉडल

पहलू / कारक विधिक व राजनीतिक विश्लेषण एवं भारतीय संदर्भ
अवधारणा एवं अर्थ मतदाताओं द्वारा मतदान करते समय राजनीतिक दलों, नीतियों व उम्मीदवारों के पक्ष में निर्णय लेने की प्रक्रिया व रुझान
जाति (Caste) भारतीय मतदान का सर्वाधिक प्रभावशाली पारंपरिक कारक; 'भारत में लोग अपनी जाति पर वोट देते हैं, न कि वोट की जाति पर' (रजनी कोठारी); जातिगत गोलबंदी व टिकट वितरण
धर्म (Religion) धार्मिक पहचान, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, बहुसंख्यक राष्ट्रवाद एवं सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का चुनावी परिणामों पर सीधा प्रभाव
करिश्माई नेतृत्व (Leadership) मजबूत, निर्णायक व करिश्माई नेता की छवि के आधार पर मतदान (उदा. 1971 इंदिरा गांधी, 2014 व 2019 में नरेंद्र मोदी)
कल्याणकारी नीतियां व रेवड़ी मुफ्त बिजली, राशन, नकद अंतरण (DBT) व कर्जमाफी योजनाओं का मतदाताओं के तत्कालिक निर्णय पर भारी प्रभाव
प्रमुख सैद्धांतिक मॉडल 1. समाजशास्त्रीय मॉडल (Sociological — जाति, धर्म, वर्ग प्राथमिक), 2. मनो-सामाजिक मॉडल (Psychosocial — दल से भावनात्मक लगाव), 3. तार्किक चयन मॉडल (Rational Choice — व्यक्तिगत लाभ-हानि का आकलन)

6. प्रमुख निर्वाचन सुधार समितियां एवं आयोग

समिति / आयोग वर्ष प्रमुख संस्तुतियां एवं नीतिगत सुधार
तारकुंडे समिति 1975 जयप्रकाश नारायण द्वारा गठित; मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करने तथा चुनाव आयोग को 3-सदस्यीय बहु-सदस्यीय बनाने की सिफारिश
दिनेश गोस्वामी समिति 1990 मतदान मशीन (EVM) का व्यापक प्रयोग; अवैध हथियार रखने व बूथ कैप्चरिंग पर कठोर दंड; उपचुनाव 6 माह में कराना; निर्दलीय उम्मीदवारों पर प्रतिबंध
इंद्रजीत गुप्त समिति 1998 चुनावी भ्रष्टाचार रोकने हेतु केवल मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय/राज्य दलों के लिए 'चुनावों का आंशिक राज्य वित्तपोषण (State Funding)' की सिफारिश
विधि आयोग 170वीं व 255वीं रिपोर्ट 1999, 2015 राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र अनिवार्य करना; दल-बदल कानून को कठोर बनाना; पेड न्यूज व चुनावी विज्ञापनों पर नियंत्रण; हलफनामों की जांच
न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति 2013 महिलाओं के विरुद्ध गंभीर लैंगिक अपराधों में आरोप तय होने पर जनप्रतिनिधियों को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने की सिफारिश

7. भारत में क्रियान्वित प्रमुख निर्वाचन सुधार (Electoral Reforms)

सुधार का क्षेत्र वर्ष / कानूनी प्रावधान प्रशासनिक प्रभाव एवं विधिक परिवर्तन
मतदान आयु में कमी 61वां संशोधन 1988 अनुच्छेद 326 में संशोधन कर मताधिकार की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई
(EVM) एवं (VVPAT) 2004, 2019 मतपत्रों व बूथ कैप्चरिंग की धांधली समाप्त; मतगणना में तीव्र पारदर्शिता
आपराधिक रिकॉर्ड प्रकटीकरण 2002 (ADR वाद) उम्मीदवारों द्वारा आपराधिक मामले, संपत्ति, देनदारी व शिक्षा सार्वजनिक करना अनिवार्य
नोटा (NOTA) का प्रावधान 2013 (PUCL वाद) सभी प्रत्याशियों को नकारने का संवैधानिक अधिकार मतदाताओं को मिला
डाक मतपत्र विस्तार 2020 80 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों व 40% से अधिक दिव्यांगों हेतु घर से मतदान सुविधा
चुनावी बॉन्ड का खात्मा 2024 असीमित व गोपनीय कॉरपोरेट फंडिंग पर रोक; राजनीतिक दलों के चंदे में पारदर्शिता

8. एक राष्ट्र, एक चुनाव (One Nation, One Election — ONOE)

पहल / आयाम कोविंद समिति (मार्च 2024) संस्तुतियां एवं संवैधानिक विश्लेषण
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 1952, 1957, 1962 एवं 1967 तक देश में लोकसभा व राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ संपन्न हुए; 1968-69 में समय से पूर्व विघटन से यह चक्र टूट गया
कोविंद समिति रिपोर्ट पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में 8-सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति ने मार्च 2024 में 18,626 पृष्ठों की विस्तृत रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी
दो चरणों में चुनाव चरण 1: लोकसभा एवं सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ संपन्न कराना; चरण 2: इसके 100 दिनों के भीतर सभी स्थानीय निकायों (पंचायतों व नगरपालिकाओं) के चुनाव
साझा मतदाता सूची अनुच्छेद 325 में संशोधन कर लोकसभा, विधानसभा व स्थानीय निकायों हेतु एक 'एकल साझा मतदाता सूची (Single Electoral Roll)' व मतदाता पहचान पत्र बनाना
हंग/अविश्वास की स्थिति त्रिशंकु सदन या अविश्वास प्रस्ताव पर यदि मध्यावधि चुनाव हों, तो नई सरकार केवल 'शेष अप्रयुक्त कार्यकाल (Unexpired Term)' हेतु ही बनेगी
संविधान संशोधन आवश्यकता अनुच्छेद 83 (संसद कार्यकाल), 85 (विघटन), 172 (विधानसभा कार्यकाल), 174 (विघटन), 324A (स्थानीय निकाय) में संशोधन; स्थानीय निकाय संशोधन हेतु 50% राज्यों का अनुसमर्थन अनिवार्य

8. ONOE: पक्ष एवं विपक्ष के तर्क (Arguments)

पक्ष के तर्क (Arguments For) विपक्ष के तर्क (Arguments Against)
चुनावी व्यय में भारी बचत; बारंबार आदर्श आचार संहिता (MCC) से विकास कार्य नहीं रुकेंगे; प्रशासनिक व सुरक्षा बलों की बार-बार तैनाती से मुक्ति; नीतिगत निरंतरता संघात्मक ढांचे व क्षेत्रीय स्वायत्तता को आघात; राष्ट्रीय मुद्दों के आगे स्थानीय मुद्दे गौण होने का खतरा; 5 वर्ष से पूर्व सरकार गिरने पर समाधान जटिल
💡 निर्वाचन सुधारों का मूल निष्कर्ष: निष्पक्ष, पारदर्शी एवं स्वतंत्र चुनाव लोकतंत्र का आधारभूत ढांचा हैं। धनबल, बाहुबल और मुफ्त उपहारों (Freebies) की राजनीति पर प्रभावी नियंत्रण तथा चुनाव आयोग की संस्थागत स्वायत्तता अक्षुण्ण बनाए रखना ही भारतीय लोकतंत्र की सुदृढ़ता का स्थायी आधार है।
अध्याय 13 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 13: प्रमुख संवैधानिक एवं सांविधिक निकाय — संघ व राज्य लोक सेवा आयोग, मानवाधिकार, महिला/बाल आयोग एवं नीति आयोग — शॉर्ट नोट्स

UPSC, SPSC, वित्त आयोग (Art 280), CAG (Art 148-151), NCSC, NCST, NCBC, NITI Aayog, NHRC, CIC

1. संघ एवं राज्य लोक सेवा आयोग: संवैधानिक उपबंध (अनुच्छेद 315–323)

अनुच्छेद संवैधानिक विषय प्रमुख विधिक व प्रशासनिक प्रावधान
अनु. 315 आयोगों का गठन संघ हेतु केंद्रीय लोक सेवा आयोग तथा राज्यों हेतु राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC); 2 या अधिक राज्यों हेतु संसद द्वारा संयुक्त आयोग (JSPSC)
अनु. 316 नियुक्ति व कार्यकाल संघीय आयोग/संयुक्त आयोग के सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा; राज्य लोक सेवा आयोग सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा; कम से कम आधे सदस्य 10 वर्ष का प्रशासनिक अनुभव प्राप्त हों
अनु. 317 पदमुक्ति व निलंबन केवल कदाचार (Misbehaviour) के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय की जांच व अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा निष्कासन; दिवालिया होने या सवेतन रोजगार पर भी हटाया जा सकता है
अनु. 319 पुनर्नियुक्ति पर रोक संघीय आयोग अध्यक्ष भारत या राज्य सरकार में किसी अन्य पद हेतु अपात्र; सदस्य केवल संघीय आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग अध्यक्ष बन सकते हैं (हितों के टकराव पर रोक)
अनु. 320 आयोगों के कर्तव्य सिविल सेवाओं हेतु भर्ती परीक्षाएं संचालित करना; नियुक्ति, पदोन्नति, तबादला एवं अनुशासनात्मक मामलों पर सरकार को सलाह देना
अनु. 322 आयोग का व्यय संघीय आयोग का समस्त व्यय भारत की संचित निधि पर भारित (Charged) होता है (संसद में मतदान नहीं); राज्य लोक सेवा आयोग व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित
अनु. 323 वार्षिक प्रतिवेदन संघीय आयोग अपना वार्षिक प्रतिवेदन राष्ट्रपति को तथा राज्य लोक सेवा आयोग राज्यपाल को सौंपता है, जिसे संसद/विधानमंडल के पटल पर रखा जाता है
तुलनात्मक आयाम संघ लोक सेवा आयोग राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC)
संवैधानिक स्थिति संविधान का भाग (XIV), अनुच्छेद 315–323 संविधान का भाग (XIV), अनुच्छेद 315–323
नियुक्ति प्राधिकारी राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल द्वारा
कार्यकाल एवं आयु 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) 6 वर्ष या 62 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो)
पदमुक्ति प्राधिकारी राष्ट्रपति (सर्वोच्च न्यायालय की जांच पर) केवल राष्ट्रपति (राज्यपाल को हटाने का अधिकार नहीं)
सलाह की प्रकृति परामर्शकारी (बाध्यकारी नहीं; अनुच्छेद 320) परामर्शकारी (बाध्यकारी नहीं; अनुच्छेद 320)

2. लोक सेवा आयोगों के कार्य, शक्तियां एवं विधिक सीमाएं

पहलू / विषय विधिक अधिकार क्षेत्र एवं व्यावहारिक सीमाएं
भर्ती व परीक्षा अखिल भारतीय सेवाओं (AIS), केंद्रीय सेवाओं तथा रक्षा सेवाओं हेतु निष्पक्ष भर्ती परीक्षाओं का आयोजन
पदोन्नति व प्रतिनियुक्ति विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की अध्यक्षता करना एवं एक सेवा से दूसरी सेवा में स्थानांतरण पर परामर्श देना
अनुशासनात्मक मामले सिविल सेवकों के विरुद्ध विभागीय जांच, दंड, पेंशन कटौती आदि विधिक मामलों पर सरकार को सलाह
संवैधानिक सीमाएं आरक्षण (Reservation) नीतियों, पदों के वर्गीकरण एवं वेतनमान पर आयोग का कोई अधिकार नहीं; सरकार अनु. 320(3) के तहत कतिपय पदों को आयोग के परामर्श दायरे से बाहर रख सकती है

3. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) एवं राज्य आयोग (SHRC)

पहलू / प्रावधान राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC)
कानूनी आधार व स्थापना मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 (संशोधित 2019); सांविधिक निकाय मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 21; सांविधिक निकाय
आयोग की संरचना 1 अध्यक्ष (सेवानिवृत्त CJI या SC न्यायाधीश) + 5 सदस्य + 7 पदेन सदस्य 1 अध्यक्ष (सेवानिवृत्त HC मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश) + 2 सदस्य
चयन समिति 6-सदस्यीय: प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री, दोनों सदनों के नेता प्रतिपक्ष, राज्यसभा उपसभापति 4-सदस्यीय: मुख्यमंत्री (अध्यक्ष), विधानसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष
नियुक्ति व कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा; 3 वर्ष या 70 वर्ष आयु (2019 संशोधन से) राज्यपाल द्वारा; 3 वर्ष या 70 वर्ष आयु (2019 संशोधन से)
हटाने की शक्ति राष्ट्रपति द्वारा (कदाचार पर SC जांच उपरांत) केवल राष्ट्रपति द्वारा (राज्यपाल केवल निलंबित कर सकते हैं)
अधिकार क्षेत्र संपूर्ण भारत में मानवाधिकार उल्लंघन की जांच राज्य सूची (State List) व समवर्ती सूची (Concurrent List) के विषय

4. मानवाधिकार आयोगों की कार्यप्रणाली, शक्तियां एवं संस्थागत सीमाएं

आयाम / शक्ति विधिक कार्यप्रणाली एवं प्रक्रियात्मक सीमाएं
दीवानी न्यायालय शक्तियां जांच के दौरान सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC 1908) के तहत गवाहों को समन भेजने, साक्ष्य मांगने व हलफनामे लेने का अधिकार
स्वप्रेरणा से संज्ञान मानवाधिकार हनन पर पीड़ित की शिकायत पर या स्वयं संज्ञान (Suo Motu) लेकर जांच प्रारंभ करने की शक्ति
जेल व हिरासत निरीक्षण जेलों, बंदीगृहों व संरक्षण गृहों का दौरा कर कैदियों के जीवन स्तर व मानवाधिकारों की समीक्षा करना
परामर्शकारी प्रकृति आयोग की सिफारिशें केवल सलाहकारी हैं (दंतहीन बाघ — Toothless Tiger); आयोग न तो दंड दे सकता है और न ही मुआवजा लागू कर सकता है
समय-सीमा व सशस्त्र बल घटना के 1 वर्ष बाद शिकायत स्वीकार नहीं की जा सकती; सशस्त्र बलों के उल्लंघन मामलों में केवल केंद्र सरकार से रिपोर्ट मांग सकता है
💡 संवैधानिक बनाम सांविधिक बनाम कार्यकारी निकाय: 1. संवैधानिक निकाय (Constitutional Body): जिसका प्रत्यक्ष उल्लेख संविधान के मूल पाठ में हो (उदा. संघ लोक सेवा आयोग अनु. 315, नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक अनु. 148, निर्वाचन आयोग अनु. 324); संशोधन हेतु अनुच्छेद 368 आवश्यक। 2. सांविधिक निकाय (Statutory Body): जो संसद या राज्य विधानमंडल के साधारण कानून (Act) से बने (उदा. NHRC, NCW, NCPCR, CVC, CIC); सामान्य कानून से संशोधन संभव। 3. कार्यकारी निकाय (Executive Body): मंत्रिमंडल के कार्यकारी प्रस्ताव से गठित गैर-संवैधानिक व गैर-सांविधिक निकाय (उदा. नीति आयोग)।

5. राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) एवं राष्ट्रीय बाल आयोग (NCPCR)

पहलू / प्रावधान राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR)
स्थापना व विधिक आधार राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990 (स्थापना 31 जनवरी 1992); सांविधिक निकाय बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005 (स्थापना मार्च 2007); सांविधिक निकाय
आयोग की संरचना 1 अध्यक्ष + 5 सदस्य (कम से कम 1 SC व 1 ST अनिवार्य) + 1 सदस्य-सचिव 1 अध्यक्ष + 6 सदस्य (कम से कम 2 महिलाएं अनिवार्य); विशेषज्ञता आधारित
नियुक्ति व कार्यकाल केंद्र सरकार द्वारा मनोनयन; कार्यकाल 3 वर्ष केंद्र सरकार की चयन समिति की सिफारिश पर; कार्यकाल 3 वर्ष (अधिकतम 2 कार्यकाल)
आयु सीमा संविधान/अधिनियम में कोई निश्चित सेवानिवृत्ति आयु सीमा नहीं (कार्यकाल 3 वर्ष) अध्यक्ष हेतु अधिकतम 65 वर्ष, सदस्यों हेतु 60 वर्ष
प्रमुख कार्य व जनादेश महिलाओं के संवैधानिक व कानूनी अधिकारों की रक्षा; घरेलू हिंसा, कार्यस्थल उत्पीड़न, दहेज उत्पीड़न मामलों की जांच व स्वप्रेरणा संज्ञान 0–18 वर्ष के सभी बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा; बाल श्रम, बाल विवाह, बाल तस्करी पर रोक; शिक्षा का अधिकार (RTE 2009) की निगरानी
विशेष निगरानी दायित्व महिला बंदीगृहों व नारी निकेतनों का निरीक्षण; महिला सुरक्षा कानूनों में संशोधन की सिफारिश लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO 2012) के क्रियान्वयन की राष्ट्रीय निगरानी

6. अन्य प्रमुख संवैधानिक एवं सांविधिक आयोग (SC, ST, OBC एवं अल्पसंख्यक आयोग)

आयोग का नाम संवैधानिक/विधिक आधार संशोधन / स्थापना संरचना व प्रमुख दायित्व
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) अनुच्छेद 338 मूल संविधान में एकल आयुक्त; 65वें संशोधन 1990 से आयोग; 89वें संशोधन 2003 से पृथक 1 अध्यक्ष + 1 उपाध्यक्ष + 3 सदस्य (राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त, कार्यकाल 3 वर्ष); अनुसूचित जाति अधिकारों की सुरक्षा
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) अनुच्छेद 338A 89वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003 द्वारा (NCSC) से अलग कर स्वतंत्र संवैधानिक निकाय बना 1 अध्यक्ष + 1 उपाध्यक्ष + 3 सदस्य (1 महिला अनिवार्य); जनजाति अधिकारों व वन अधिकार कानून (FRA) की समीक्षा
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) अनुच्छेद 338B 102वां संविधान संशोधन अधिनियम 2018 द्वारा सांविधिक से पूर्ण संवैधानिक दर्जा मिला 1 अध्यक्ष + 1 उपाध्यक्ष + 3 सदस्य; सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) के कल्याण की निगरानी
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) अल्पसंख्यक आयोग अधि. 1992 सांविधिक निकाय (1992); 6 अधिसूचित अल्पसंख्यक: मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी, जैन 1 अध्यक्ष + 1 उपाध्यक्ष + 5 सदस्य (सभी अल्पसंख्यक समुदायों से, केंद्र द्वारा नामित, कार्यकाल 3 वर्ष); अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा

7. नीति आयोग (NITI Aayog): संरचना, कार्यप्रणाली एवं मार्गदर्शक सिद्धांत

पहलू / घटक संगठनात्मक व्यवस्था एवं संस्थागत विवरण
स्थापना एवं स्वरूप 1 जनवरी 2015 को केंद्रीय मंत्रिमंडल के प्रस्ताव द्वारा स्थापित; गैर-संवैधानिक व गैर-सांविधिक बौद्धिक संस्थान (Think Tank)
अध्यक्ष (Chairperson) भारत के प्रधानमंत्री (पदेन अध्यक्ष)
शासी परिषद (Governing Council) प्रधानमंत्री, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, दिल्ली व पुडुचेरी के मुख्यमंत्री एवं केंद्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल/प्रशासक (सहकारी संघवाद का प्रतीक)
विशेष आमंत्रित व पदेन सदस्य प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (गृह, वित्त, रक्षा, कृषि आदि)
उपाध्यक्ष व मुख्य कार्यकारी (CEO) प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त (उपाध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री तथा मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) को भारत सरकार के सचिव स्तर का दर्जा)
प्रमुख कार्य व सूचकांक राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं की साझा दृष्टि तैयार करना; आकांक्षी जिला कार्यक्रम (ADP); सतत विकास लक्ष्य सूचकांक (SDG India Index) जारी करना

8. योजना आयोग बनाम नीति आयोग: आधारभूत अंतर

तुलना का आधार योजना आयोग (1950–2014) नीति आयोग (2015 से वर्तमान)
दृष्टिकोण (Approach) शीर्ष-नीचे (Top-Down दृष्टिकोण); 'एक आकार सबके लिए' (One Size Fits All) नीचे-ऊपर (Bottom-Up दृष्टिकोण); स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप नीतियां
राज्यों की भूमिका राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) तक सीमित; राज्यों की सीधी भागीदारी कम शासी परिषद में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री समान भागीदार; सहकारी संघवाद
वित्तीय शक्तियां राज्यों व मंत्रालयों को पंचवर्षीय योजनाओं के तहत वित्तीय आवंटन की शक्ति वित्तीय आवंटन की कोई शक्ति नहीं (वित्तीय आवंटन केवल वित्त मंत्रालय व वित्त आयोग के पास)
कार्यप्रणाली योजनाओं का कठोर केंद्रीय प्रारूप व 5-वर्षीय योजनाएं तैयार करना रणनीतिक नीति थिंक-टैंक; 15-वर्षीय विजन, 7-वर्षीय रणनीति व 3-वर्षीय एक्शन एजेंडा

9. भारत के प्रमुख संवैधानिक व सांविधिक निकायों का महा-तुलनात्मक चार्ट

निकाय का नाम प्रकार संबंधित प्रावधान नियुक्ति प्राधिकारी कार्यकाल / आयु
संघ लोक सेवा आयोग संवैधानिक अनुच्छेद 315–323 राष्ट्रपति 6 वर्ष / 65 वर्ष
राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) संवैधानिक अनुच्छेद 315–323 राज्यपाल 6 वर्ष / 62 वर्ष
मानवाधिकार आयोग (NHRC) सांविधिक मानवाधिकार अधि. 1993 राष्ट्रपति (समिति सलाह) 3 वर्ष / 70 वर्ष
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) सांविधिक महिला आयोग अधि. 1990 केंद्र सरकार 3 वर्ष
राष्ट्रीय बाल आयोग (NCPCR) सांविधिक बाल आयोग अधि. 2005 केंद्र सरकार 3 वर्ष (65/60 वर्ष)
नीति आयोग (NITI Aayog) कार्यकारी कैबिनेट प्रस्ताव 2015 प्रधानमंत्री सरकार की इच्छानुसार
💡 निकायों की स्वतंत्रता का सार: संस्थागत स्वायत्तता बनाए रखने हेतु संचित निधि पर भारित व्यय, कार्यकाल की निश्चितता एवं कदाचार की स्थिति में न्यायिक जांच के संवैधानिक सुरक्षा उपाय अत्यंत अपरिहार्य हैं, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाएं बिना राजनीतिक दबाव के निष्पक्ष कार्य कर सकें।
अध्याय 14 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 14: सुशासन तंत्र — लोकपाल व लोकायुक्त, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) एवं सूचना आयोग (CIC) — शॉर्ट नोट्स

सुशासन के 8 स्तंभ, लोकपाल अधिनियम 2013, लोकायुक्त (राजस्थान परिप्रेक्ष्य), CVC, CBI, RTI 2005 व 2019 संशोधन

1. लोकपाल एवं लोकायुक्त: ऐतिहासिक विकास, कानूनी ढांचा एवं संगठनात्मक संरचना

वर्ष / पड़ाव ऐतिहासिक घटनाक्रम एवं वैधानिक पृष्ठभूमि
1809 (स्वीडन) विश्व के प्रथम ओम्बड्समैन (Ombudsman) की स्थापना; प्रशासनिक भ्रष्टाचार व नागरिकों की शिकायत निवारण का वैश्विक मॉडल
1966 (प्रथम ARC) प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC — मोरारजी देसाई/के. हनुमंतैया) ने केंद्र हेतु 'लोकपाल' व राज्यों हेतु 'लोकायुक्त' की सिफारिश की
1968–2011 संसद में 8 बार लोकपाल विधेयक प्रस्तुत हुआ, किंतु राजनीतिक असहमति व लोकसभा विघटन के कारण पारित नहीं हो सका
2011 (आंदोलन) अन्ना हजारे के नेतृत्व में देशव्यापी 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन; जनदबाव के कारण कानून निर्माण प्रक्रिया तीव्र हुई
2013 (अधिनियम) लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 संसद द्वारा पारित; 1 जनवरी 2014 से प्रभावी; भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने वाला शीर्ष सांविधिक निकाय
2019 एवं 2024 मार्च 2019 में प्रथम लोकपाल अध्यक्ष न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष नियुक्त; मार्च 2024 में द्वितीय अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर नियुक्त
संरचनात्मक पहलू विहित कानूनी प्रावधान (लोकपाल अधिनियम 2013)
सदस्य संख्या 1 अध्यक्ष + अधिकतम 8 सदस्य (50% सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि से तथा न्यूनतम 50% सदस्य SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं में से अनिवार्य)
योग्यता अध्यक्ष: भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) या SC के न्यायाधीश या भ्रष्टाचार-रोधी नीति, लोक प्रशासन में 25 वर्ष का अनुभव रखने वाले प्रख्यात व्यक्ति
चयन समिति (5-सदस्यीय) प्रधानमंत्री (अध्यक्ष) + लोकसभा अध्यक्ष + लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) + भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या नामित जज + एक प्रख्यात विधिवेत्ता (Jurist)
खोज समिति (Search Committee) चयन समिति की सहायता हेतु न्यूनतम 8-सदस्यीय खोज समिति (जिसमें 50% SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक व महिलाएं होंगी)
कार्यकाल एवं आयु पदभार ग्रहण से 5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले पूरी हो); पुनर्नियुक्ति पर पूर्ण प्रतिबंध; त्यागपत्र राष्ट्रपति को
पदमुक्ति प्रक्रिया राष्ट्रपति द्वारा; कम से कम 100 सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित प्रस्ताव पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जांच एवं साबित कदाचार पर निष्कासन

2. लोकपाल का क्षेत्राधिकार, शक्तियां एवं जांच तंत्र

अधिकार क्षेत्र / पद विधिक दायरे की शर्तें एवं विशेष प्रक्रियात्मक प्रावधान
प्रधानमंत्री (PM) क्षेत्राधिकार में शामिल; अपवाद: अंतरराष्ट्रीय संबंध, बाह्य/आंतरिक सुरक्षा, परमाणु ऊर्जा व अंतरिक्ष मामलों पर जांच वर्जित; जांच हेतु पूर्ण पीठ की 2/3 सहमति अनिवार्य
मंत्री एवं सांसद केंद्रीय मंत्री व सांसद शामिल; अपवाद: संसद के भीतर दिए गए भाषण या मतदान पर संरक्षण (अनुच्छेद 105 लागू)
सरकारी अधिकारी केंद्र सरकार के ग्रुप A, B, C, D — सभी संवर्गों के लोक सेवक लोकपाल के क्षेत्राधिकार में शामिल
गैर-सरकारी संगठन (NGO) विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) के तहत प्रतिवर्ष ₹10 लाख से अधिक विदेशी अनुदान प्राप्त करने वाली संस्थाएं/ट्रस्ट दायरे में
जांच व अभियोजन शाखा लोकपाल की अपनी स्वतंत्र जांच शाखा (Inquiry Wing) एवं अभियोजन शाखा (Prosecution Wing); केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को जांच सौंपने की पूर्ण शक्ति
संपत्ति कुर्की व विशेष शक्तियां भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति को जांच के दौरान अंतरिम रूप से कुर्क (Attach) करने तथा भ्रष्ट लोक सेवकों के तबादले/निलंबन की अनुशंसा की शक्ति

3. केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC): उत्पत्ति, ढांचा, शक्तियां एवं सीमाएं

पहलू / विषय संवैधानिक व विधिक प्रावधान (CVC अधिनियम 2003)
उत्पत्ति एवं विकास भ्रष्टाचार निवारण हेतु के. संथानम समिति (1962–64) की सिफारिश पर फरवरी 1964 में कार्यकारी प्रस्ताव से स्थापित
सांविधिक दर्जा विनीत नारायण वाद (1997) में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशोपरांत केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम 2003 द्वारा सांविधिक दर्जा प्रदान किया गया
आयोग की संरचना 1 केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (CVC — अध्यक्ष) + अधिकतम 2 सतर्कता आयुक्त (VC); केंद्र सरकार की सिविल व सतर्कता सेवाओं से चयन
चयन समिति (3-सदस्यीय) प्रधानमंत्री (अध्यक्ष) + केंद्रीय गृह मंत्री + लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP); राष्ट्रपति द्वारा अधिपत्र जारी कर नियुक्ति
कार्यकाल एवं आयु 4 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो); सेवानिवृत्ति पश्चात केंद्र/राज्य सरकार में किसी अन्य पद हेतु पूर्ण अपात्र
पदमुक्ति की रीति राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की जांच में कदाचार या असमर्थता सिद्ध होने पर (संघीय आयोग सदस्यों के समान संरक्षण)
जांच ब्यूरो (CBI) अधीक्षण भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत अपराधों के अन्वेषण में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (CBI) के कामकाज का अधीक्षण करना
संस्थागत सीमाएं केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) स्वयं जांच एजेंसी नहीं है; यह केवल पर्यवेक्षी व परामर्शी निकाय है; वास्तविक जांच हेतु (CBI) या मंत्रालयों पर निर्भर

4. लोकायुक्त (Lokayukta): राज्य स्तरीय भ्रष्टाचार विरोधी संस्था

आयाम / पहलू राज्य स्तरीय व्यवस्था एवं तुलनात्मक प्रावधान
कानूनी अधिदेश लोकपाल अधिनियम 2013 की धारा 63 के तहत प्रत्येक राज्य में 1 वर्ष के भीतर लोकायुक्त संस्था का गठन अनिवार्य किया गया
प्रथम राज्य महाराष्ट्र (1971) में लोकायुक्त संस्था गठित करने वाला देश का प्रथम राज्य; जबकि ओडिशा ने 1970 में पहला कानून पारित किया था
राजस्थान संदर्भ राजस्थान लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त अधिनियम 1973 द्वारा स्थापना; अगस्त 1973 से प्रभावी; प्रथम लोकायुक्त न्यायमूर्ति आई.डी. दुआ
क्षेत्राधिकार व अपवाद मंत्री, विधायक, जिला प्रमुख, प्रधान दायरे में; मुख्यमंत्री, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, सरपंच/पंच तथा लोक सेवा आयोग सदस्य बाहर
प्रमुख राज्य लोकायुक्त की प्रकृति, शक्तियां एवं विधिक अधिकार क्षेत्र
कर्नाटक लोकायुक्त स्वयं की स्वतंत्र पुलिस व जांच विंग; स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने की शक्ति; देश का सर्वाधिक सशक्त लोकायुक्त मॉडल
महाराष्ट्र लोकायुक्त 1971 में स्थापित देश का प्रथम लोकायुक्त; मुख्य रूप से केवल परामर्शकारी शक्तियां; अपनी स्वतंत्र पुलिस विंग नहीं
राजस्थान लोकायुक्त 1973 अधिनियम; केवल उप-लोकायुक्त व विभागीय जांच सेल; मुख्यमंत्री व न्यायपालिका पूर्णतः बाहर; केवल सिफारिशी अधिकार
💡 सुशासन (Good Governance) के 8 मूल स्तंभ (UNDP मॉडल): 1. विधि का शासन (Rule of Law), 2. पारदर्शिता (Transparency), 3. जवाबदेही (Accountability), 4. जन-भागीदारी (Participation), 5. अनुक्रियाशीलता (Responsiveness), 6. सर्वसम्मति-उन्मुखता (Consensus Oriented), 7. समता एवं समावेशिता (Equity & Inclusiveness), तथा 8. दक्षता व प्रभावशीलता (Effectiveness & Efficiency)। लोकपाल, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) एवं केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) इन स्तंभों के सांस्थानिक प्रहरी हैं।

5. सूचना का अधिकार (RTI Act 2005) एवं केंद्रीय सूचना आयोग (CIC)

घटक / पहलू विधिक ढांचा एवं संस्थागत विवरण (RTI Act 2005)
ऐतिहासिक जन-आंदोलन राजस्थान के देवडूंगरी (राजसमंद) में मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS — अरुणा रॉय, निखिल डे) द्वारा सरकारी मस्टररोल व बिलों में पारदर्शिता की मांग سے शुरुआत
संवैधानिक आधार सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रदत्त 'वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का अभिन्न अंग है
अधिनियम का लागू होना 15 जून 2005 को राष्ट्रपति की स्वीकृति; 12 अक्टूबर 2005 से संपूर्ण देश में पूर्ण रूप से प्रभावी
केंद्रीय आयोग (CIC) गठन सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI 2005) की धारा 12 के तहत केंद्रीय स्तर पर केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की स्थापना; सांविधिक निकाय
संरचना व चयन समिति 1 मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) + अधिकतम 10 सूचना आयुक्त (IC); चयन समिति = प्रधानमंत्री (अध्यक्ष) + लोकसभा में विपक्ष का नेता (LoP) + 1 कैबिनेट मंत्री
कार्यकाल में 2019 संशोधन 2019 से पूर्व: 5 वर्ष या 65 वर्ष; 2019 संशोधन द्वारा कार्यकाल व वेतन-भत्ते केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित करने की शक्ति प्रदान की गई (वर्तमान में 3 वर्ष)

6. सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI 2005) की प्रमुख धाराएं

धारा विधिक विषय प्रमुख कानूनी प्रावधान एवं समय-सीमा
धारा 4 स्वतः प्रकटीकरण प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authority) द्वारा 120 दिनों में अपने संगठन, कार्यों व बजट का स्वतः प्रकटीकरण (Proactive Disclosure)
धारा 6 आवेदन की प्रक्रिया नागरिक द्वारा लोक सूचना अधिकारी (PIO) को लिखित/इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आवेदन; ₹10 शुल्क; निर्धन परिवारों (BPL) हेतु पूर्णतः निःशुल्क
धारा 7 सूचना की समय-सीमा आवेदन प्राप्ति के 30 दिनों के भीतर सूचना देना अनिवार्य; यदि मामला व्यक्ति के 'जीवन व स्वतंत्रता (Life or Liberty)' से जुड़ा हो तो 48 घंटे में सूचना अनिवार्य
धारा 8 सूचना प्रकटीकरण से छूट 10 संवेदनशील विषय बाहर: राष्ट्र की संप्रभुता/सुरक्षा, न्यायालय की अवमानना, वाणिज्यिक गोपनीयता, विदेशी सरकार से मिली गोपनीय सूचना, व्यक्तिगत निजता आदि
धारा 19 अपीलीय तंत्र प्रथम अपील: 30 दिनों में विभागीय वरिष्ठ अधिकारी (FAA) को; द्वितीय अपील: 90 दिनों में केंद्रीय/राज्य सूचना आयोग (CIC/SIC) को
धारा 20 दंडात्मक प्रावधान सूचना देने से मना करने या विलंब पर लोक सूचना अधिकारी (PIO) पर ₹250 प्रतिदिन का जुर्माना (अधिकतम ₹25,000); अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश
विधिक अपवाद / उपबंध संवैधानिक संतुलन एवं जनहित अधिभावी प्रभाव (Public Interest Override)
धारा 8(1)(j) — निजता व्यक्तिगत निजता का संरक्षण; किंतु यदि लोक सूचना अधिकारी संतुष्ट हो कि बड़ा जनहित व्यक्तिगत निजता से अधिक महत्वपूर्ण है, तो सूचना दी जा सकती है
धारा 8(2) — जनहित प्रभाव शासकीय गुप्त बात अधिनियम 1923 (Official Secrets Act — OSA) पर (RTI) प्रभावी; यदि जनहित गोपनीयता से बड़ा हो तो सूचना प्रकटीकरण अनिवार्य
धारा 8(3) — 20 वर्ष नियम घटना घटित होने के 20 वर्ष बीत जाने के बाद किसी भी अभिलेख की सूचना सामान्यतः रोकी नहीं जा सकती (कतिपय राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों को छोड़कर)

7. व्हिसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम 2011 (WPA 2011)

पहलू / आयाम विधिक प्रावधान एवं सुरक्षा उपाय (Whistleblowers Protection Act 2011)
पृष्ठभूमि व उद्देश्य भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाले सत्येंद्र दुबे (NHAI इंजीनियर) व एस. मंजूनाथ (IOCL अधिकारी) की हत्या के उपरांत जन-सुरक्षा हेतु कानून पारित
नामित एजेंसी (CVC) केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) को भ्रष्टाचार की गुप्त शिकायतें प्राप्त करने व जांच कराने हेतु अधिकृत एजेंसी बनाया गया
पहचान की गोपनीयता शिकायतकर्ता की पहचान पूर्णतः गोपनीय रखी जाएगी; पहचान उजागर करने पर 3 वर्ष तक की कैद व ₹50,000 तक जुर्माने का प्रावधान
प्रतिशोध से सुरक्षा शिकायतकर्ता को पदोन्नति रोकने, स्थानांतरण या निलंबन जैसी प्रतिशोधात्मक कार्रवाई (Victimisation) से कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाता है
झूठी शिकायत पर दंड दुर्भावनापूर्ण अथवा झूठी शिकायत दर्ज कराने वाले व्यक्ति को 2 वर्ष तक का कारावास तथा ₹30,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है

8. भ्रष्टाचार निरोधक एवं पारदर्शिता संस्थाओं का महा-तुलनात्मक चार्ट

तुलनात्मक बिंदु लोकपाल (Lokpal) सतर्कता आयोग (CVC) सूचना आयोग (CIC)
विधिक आधार लोकपाल अधिनियम 2013 (CVC) अधिनियम 2003 (RTI) अधिनियम 2005
संरचना 1 अध्यक्ष + 8 सदस्य 1 मुख्य आयुक्त (CVC) + 2 आयुक्त 1 मुख्य + 10 तक सूचना आयुक्त
कार्यकाल / आयु 5 वर्ष या 70 वर्ष आयु 4 वर्ष या 65 वर्ष आयु 3 वर्ष या 65 वर्ष आयु (2019 से)

8. प्रमुख संस्थाएं: कार्य, शक्तियां एवं अधिकार (क्रमशः)

तुलनात्मक बिंदु लोकपाल (Lokpal) सतर्कता आयोग (CVC) सूचना आयोग (CIC)
मूल कार्य व दायित्व भ्रष्टाचार मामलों में जांच व अभियोजन सरकारी सतर्कता व (CBI) का पर्यवेक्षण नागरिकों की सूचना अपीलों का निपटारा
जांच शक्तियां स्वतंत्र जांच व अभियोजन शाखा सीमित (CBI/विभागों पर निर्भर) कोई जांच शक्ति नहीं (केवल समन/दस्तावेज)
दंडात्मक अधिकार संपत्ति कुर्की, अभियोजन अनुमति केवल विभागीय दंड की सिफारिश दोषी (PIO) पर ₹25,000 तक जुर्माना

9. सूचना के अधिकार से संबंधित ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय

न्यायिक वाद / वर्ष संवैधानिक सिद्धांत न्यायालय का निर्णय एवं प्रभाव
एस.पी. गुप्ता वाद (1981) खुला शासन व पारदर्शिता सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) में अंतर्निहित; शासन में खुलापन लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का मूल है
एडीआर वाद (ADR 2002) मतदाता का सूचना अधिकार उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि (आपराधिक, संपत्ति, शिक्षा) जानने का अधिकार नागरिक का मौलिक अधिकार है
सुभाष अग्रवाल वाद (2019) मुख्य न्यायाधीश (CJI) कार्यालय भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) का कार्यालय भी सूचना अधिकार अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण है
💡 सुशासन तंत्र का निष्कर्ष: लोकपाल भ्रष्टाचार पर प्रत्यक्ष प्रहार करता है, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) संस्थागत शुचिता सुनिश्चित करता है, और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) पारदर्शिता देकर आम नागरिक को सजग प्रहरी बनाता है। इन संस्थाओं की स्वायत्तता ही सुशासन का आधार है।
अध्याय 15 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 15: लोक नीति, नागरिक चार्टर, सामाजिक अंकेक्षण एवं शिकायत निवारण प्रणाली — शॉर्ट नोट्स

लोक नीति चक्र (निर्माण-क्रियान्वयन-मूल्यांकन), नागरिक अधिकार पत्र के 6 तत्व, सामाजिक अंकेक्षण (MGNREGA)

1. लोक नीति (Public Policy): अवधारणा, चक्र एवं वर्गीकरण

नीति चक्र का चरण प्रशासनिक प्रक्रिया एवं प्रमुख गतिविधियां (Policy Cycle)
1. एजेंडा निर्धारण (Agenda Setting) सामाजिक व आर्थिक समस्याओं की पहचान कर उन्हें सार्वजनिक विमर्श एवं सरकार के नीतिगत ध्यान में लाना
2. नीति निर्माण (Formulation) विभिन्न नीतिगत विकल्पों पर विचार, शोध, वित्तीय आकलन एवं नीति का औपचारिक मसौदा तैयार करना
3. नीति अंगीकरण (Adoption) मंत्रिमंडल, संसद अथवा राज्य विधानमंडल द्वारा नीति के मसौदे को वैधानिक व प्रशासनिक स्वीकृति देना
4. नीति क्रियान्वयन (Implementation) संबद्ध प्रशासनिक मंत्रालयों, विभागों एवं क्षेत्रीय एजेंसियों द्वारा नीति को जमीनी स्तर पर लागू करना
5. नीति मूल्यांकन (Evaluation) नीति के वास्तविक परिणामों व प्रभावों का अध्ययन, जन-फीडबैक तथा कमियों को दूर करने हेतु संशोधन
नीति का प्रकार उद्देश्य एवं मूल प्रकृति प्रशासनिक उदाहरण
नियामक नीतियां (Regulatory) व्यक्तिगत व व्यावसायिक व्यवहार को नियंत्रित व विहित करना पर्यावरण संरक्षण मानक, यातायात नियम, औषधि गुणवत्ता नियंत्रण
वितरणात्मक नीतियां (Distributive) विशिष्ट वर्गों को लाभ, सब्सिडी व लोक सेवाएं वितरित करना मुफ्त खाद्यान्न योजना, छात्रवृत्तियां, किसान सम्मान निधि, आवास योजना
पुनर्वितरणात्मक (Redistributive) आय व सामाजिक असमानता पाटने हेतु संसाधनों का पुनर्वितरण प्रगतिशील कराधान (Income Tax), भूमि सुधार कानून, सामाजिक सुरक्षा
संगठनात्मक नीतियां (Constituent) प्रशासनिक सुधार, नए मंत्रालयों, निकायों या संस्थाओं की स्थापना नीति आयोग का गठन, नवीन विभाग या स्वतंत्र नियामक प्राधिकरणों की स्थापना

2. लोक नीति निर्माण में प्रमुख संस्थागत भूमिकाएं

संस्था / अंग लोक नीति में संवैधानिक व प्रशासनिक भूमिका
कार्यपालिका (Executive) नीतियों का प्रारूप तैयार करना, प्राथमिकताओं का निर्धारण तथा क्षेत्रीय स्तर पर क्रियान्वयन सुनिश्चित करना
विधायिका (Legislature) नीतियों को कानूनी रूप प्रदान करना, बजट स्वीकृत करना तथा संसदीय समितियों द्वारा जवाबदेही तय करना
न्यायपालिका (Judiciary) नीतियों की संवैधानिक वैधता की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) तथा जनहित याचिकाओं (PIL) द्वारा मार्गदर्शन
नागरिक समाज व दबाव समूह जन-आंदोलनों, मीडिया व शोध संगठनों (Think Tanks) द्वारा जन-आवश्यकताओं को नीतिगत एजेंडे में शामिल कराना

3. नागरिक चार्टर (Citizen's Charter): उत्पत्ति एवं 6 आधारभूत सिद्धांत

ऐतिहासिक विकास / पहलू विधिक व प्रशासनिक स्थिति (Citizen's Charter)
वैश्विक उत्पत्ति (1991) ब्रिटेन में तत्कालीन प्रधानमंत्री जॉन मेजर की सरकार द्वारा नागरिक-केंद्रित सेवा सुधारों हेतु सर्वप्रथम प्रारंभ
भारत में अंगीकरण (1997) मई 1997 में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन ('प्रभावी एवं जन-उत्तरदायी प्रशासन') में नागरिक चार्टर बनाने की सहमति
प्रशासनिक स्वरूप प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (DARPG) द्वारा नोडल एजेंसी के रूप में दिशा-निर्देश जारी
कानूनी प्रकृति मूलतः स्वैच्छिक (Voluntary) एवं गैर-वादयोग्य (Non-justiciable); चार्टर उल्लंघन पर सीधे अदालत में वाद वर्जित
चार्टर का सिद्धांत नागरिक चार्टर के 6 मूल सिद्धांतों का अर्थ व मानक
1. गुणवत्ता (Quality) नागरिकों को उच्च गुणवत्तायुक्त, समयबद्ध एवं विश्वसनीय लोक सेवाएं प्रदान करना
2. विकल्प (Choice) सार्वजनिक सेवाओं के उपयोग में जहां संभव हो नागरिकों को चयन के विविध विकल्प देना
3. मानक (Standards) सेवा प्रदायगी की समय-सीमा, शुल्क एवं स्पष्ट सेवा-स्तर (Service Levels) पहले से प्रकाशित करना
4. मूल्य (Value) जनता के कर राजस्व का मितव्ययी, पारदर्शी एवं अधिकतम जन-कल्याणकारी उपयोग सुनिश्चित करना
5. जवाबदेही (Accountability) सेवा मानकों में शिथिलता या कमी आने पर संबंधित लोक सेवक की सीधी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करना
6. पारदर्शिता (Transparency) सेवा प्राप्ति के नियम, प्रक्रियाएं, संपर्क सूत्र एवं शुल्क विवरण सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध कराना

4. सेवोत्तम मॉडल (Sevottam Model): उत्कृष्ट सेवा प्रदायगी रूपरेखा

घटक / स्तंभ सेवोत्तम रूपरेखा (भारतीय मानक ब्यूरो IS 15700:2005)
अवधारणा व उत्पत्ति द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC 12वीं रिपोर्ट) की संस्तुति पर (DARPG) द्वारा लागू; 'सेवा' + 'उत्तम' का संगम
स्तंभ 1: नागरिक चार्टर कार्यालयों में यथार्थवादी, मापने योग्य एवं समयबद्ध नागरिक चार्टर लागू करना और समीक्षा करना
स्तंभ 2: शिकायत निवारण नागरिकों की शिकायतों के त्वरित, निष्पक्ष व पारदर्शी निवारण हेतु प्रभावी लोक शिकायत तंत्र की स्थापना
स्तंभ 3: सेवा क्षमता संवर्धन उत्कृष्ट सेवा प्रदायगी सुनिश्चित करने हेतु सरकारी कर्मचारियों का निरंतर प्रशिक्षण एवं अवसंरचना विकास
💡 नागरिक चार्टर की व्यावहारिक सीमाएं एवं विधिक समाधान: गैर-न्यायसंगत होने के कारण नागरिक चार्टर केवल औपचारिक घोषणा बनकर रह जाते थे। इस कमी को दूर करने हेतु राज्यों ने 'लोक सेवा गारंटी अधिनियम' बनाकर सेवा प्रदायगी को कानूनी अधिकार का दर्जा दिया और समय-सीमा उल्लंघन पर लोक सेवकों पर आर्थिक दंड लगाना अनिवार्य किया।

5. सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) एवं जन-सुनवाई

पहलू / आयाम विधिक प्रावधान, उत्पत्ति एवं संस्थागत ढांचा
ऐतिहासिक शुरुआत (1994-95) राजस्थान के देवडूंगरी (राजसमंद) में मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) द्वारा सरकारी विकास कार्यों के खुले वाचन से प्रारंभ
कानूनी आधार (मनरेगा धारा 17) महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA 2005) की धारा 17 के तहत ग्राम सभा द्वारा नियमित सामाजिक अंकेक्षण अनिवार्य
प्रथम स्वतंत्र कानून (2017) मेघालय समुदाय सहभागिता एवं सार्वजनिक सेवा सामाजिक अंकेक्षण अधिनियम 2017 — देश का प्रथम स्वतंत्र (Standalone) कानून
ऑडिट की कार्यप्रणाली ग्राम सभा की खुली बैठक में मस्टर रोल, बिल-वाउचर, खरीद सामग्री एवं श्रमिकों के जॉब कार्ड का सार्वजनिक वाचन व भौतिक सत्यापन
संस्थागत निदेशालय सामाजिक जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु राज्यों में स्वतंत्र 'सामाजिक अंकेक्षण निदेशालय (Social Audit Directorate)' का गठन
तुलनात्मक आयाम पारंपरिक वित्तीय ऑडिट (Financial) सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit)
ऑडिट कर्ता पेशेवर चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) या (CAG) अधिकारी योजना के लाभार्थी, ग्राम सभा एवं स्थानीय नागरिक समुदाय
मूल केंद्र बिंदु वित्तीय नियमों, वाउचरों व खातों की कागजी शुद्धता धन का सही उपयोग, कार्य की भौतिक गुणवत्ता एवं जमीनी प्रभाव
जांच की पद्धति बंद कमरों में खातों व अभिलेखों की आंतरिक जांच खुली जन-सुनवाई (Public Hearing) में दस्तावेजों का सार्वजनिक वाचन
अंतिम परिणाम तकनीकी ऑडिट रिपोर्ट (संसद/विधानमंडल को प्रेषित) मौके पर ही अनियमितता का निवारण एवं जवाबदेही निर्धारण

6. जन-सुनवाई (Jan Sunwai): पारदर्शिता एवं समुदाय आधारित सत्यापन

प्रक्रियात्मक चरण जन-सुनवाई के प्रमुख उद्देश्य एवं विधिक महत्व
अभिलेखों का पूर्व-सत्यापन ऑडिट दल द्वारा ग्राम स्तर पर घर-घर जाकर जॉब कार्ड, कार्य स्थल एवं मजदूरी भुगतान का भौतिक सत्यापन
खुली ग्राम सभा में वाचन समस्त ग्रामीणों, मजदूरों एवं अधिकारियों की उपस्थिति में मस्टर रोल और भुगतान राशि का ऊंचे स्वर में पठन
मौके पर साक्ष्य व आपत्ति ग्रामीणों द्वारा फर्जी नामों, अधूरे कार्यों या भुगतान में कटौती पर तुरंत साक्ष्य प्रस्तुत करने का अधिकार
उपचारात्मक कार्रवाई दोषी पाए जाने पर वसूली की अनुशंसा, विभागीय जांच एवं एफआईआर (FIR) दर्ज कराने की त्वरित संस्तुति

7. केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण प्रणाली (CPGRAMS)

घटक / पहलू संस्थागत ढांचा एवं तकनीकी नवाचार (CPGRAMS)
नोडल विभाग व संचालन प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (DARPG) द्वारा संचालित 24x7 ऑनलाइन एकीकृत नागरिक शिकायत पोर्टल
कार्यप्रणाली का स्वरूप नागरिक केंद्र या राज्य सरकार के किसी भी मंत्रालय/विभाग के विरुद्ध घर बैठे डिजिटल रूप से शिकायत दर्ज कर सकते हैं
निस्तारण अवधि लक्ष्य वर्ष 2024 में निर्धारित अधिकतम 21 दिनों का निस्तारण लक्ष्य; 2026 में औसत निस्तारण समय घटकर मात्र 13 दिन रह गया
'समाधान दीदी' AI चैटबॉट मई 2026 में प्रारंभ; कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित चैटबॉट द्वारा 22 आधिकारिक भाषाओं में वॉइस/टेक्स्ट शिकायत पंजीकरण
अपीलीय प्रावधान विभागीय समाधान से असंतुष्ट होने पर नागरिक द्वारा उच्चस्तरीय नोडल अधिकारी को ऑनलाइन द्वितीय अपील की सुविधा

8. लोक सेवा गारंटी अधिनियम: राज्य स्तरीय पहल एवं राजस्थान मॉडल

राज्य अधिनियम वर्ष विधिक विशेषता एवं राष्ट्रीय प्रभाव
मध्य प्रदेश 2010 लोक सेवाओं के प्रदाय की गारंटी कानून बनाने वाला देश का प्रथम राज्य
बिहार 2011 समयबद्ध सेवा प्रदायगी एवं लोक शिकायत निवारण अधिकार कानून लागू किया
राजस्थान 2011 राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम 2011 (14 नवंबर 2011 से लागू)
अन्य राज्य 2011 के बाद दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, ओडिशा आदि 20+ राज्यों द्वारा कानून अंगीकृत

8. राजस्थान लोक सेवा गारंटी अधिनियम 2011

प्रावधान / पहलू राजस्थान लोक सेवा गारंटी अधिनियम 2011 के मुख्य प्रावधान
प्रभावी तिथि व प्रारंभ 14 नवंबर 2011 (नेहरू जयंती); प्रारंभ में 15 विभागों की 108 अनिवार्य लोक सेवाएं अधिसूचित की गईं
वर्तमान कवरेज विस्तारित होकर 18 विभागों की 153 सेवाएं (राजस्व, गृह, स्थानीय निकाय, ऊर्जा, परिवहन आदि शामिल)

8. राजस्थान लोक सेवा गारंटी (अपील व दंड प्रावधान)

प्रावधान / पहलू राजस्थान लोक सेवा गारंटी अधिनियम 2011 के मुख्य प्रावधान
अपीलीय संरचना प्रथम अपील: समय-सीमा समाप्ति के 30 दिनों में; द्वितीय अपील: प्रथम अपील निर्णय के 60 दिनों में (दोनों अपील निःशुल्क)
दंडात्मक प्रावधान बिना उचित कारण सेवा न देने या विलंब पर लोक सेवक पर ₹250 प्रतिदिन का जुर्माना (अधिकतम ₹5,000); आवेदक को क्षतिपूर्ति देय
💡 नागरिक-केंद्रित प्रशासन का सार (2nd ARC 12वीं रिपोर्ट): लोक नीति, नागरिक चार्टर, सामाजिक अंकेक्षण एवं लोक सेवा गारंटी अधिनियम प्रशासन में सत्ता के एकाधिकार को समाप्त कर नागरिक को स्वामी और लोक सेवक को जनता का सच्चा ट्रस्टी बनाते हैं। पारदर्शिता, समयबद्धता और सहभागिता ही आधुनिक कल्याणकारी राज्य की पहचान हैं।
अध्याय 16 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 16: दलीय प्रणाली, गठबंधन राजनीति, क्षेत्रवाद, महिला प्रतिनिधित्व एवं AI-राजनीति — शॉर्ट नोट्स

राष्ट्रीय/राज्य दल मान्यता शर्तें, 52वां व 91वां संशोधन (दलबदल कानून), गठबंधन युग, नारी शक्ति वंदन, राजनीति में AI

1. भारत में दलीय प्रणाली का ऐतिहासिक विकास (Party System)

कालखंड / दौर दलीय प्रणाली का स्वरूप प्रमुख राजनीतिक विशेषताएं एवं प्रभाव
1947–1967 एकदलीय प्रभुत्व का दौर कांग्रेस का केंद्र व राज्यों में निर्बाध शासन; रजनी कोठारी ने इसे 'कांग्रेस प्रणाली (Congress System)' का नाम दिया
1967–1989 बहुदलीय प्रणाली का उदय 1967 में 9 राज्यों में गैर-कांग्रेसी संविद सरकारें; 1977 में केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी मोरारजी देसाई सरकार
1989–2014 गठबंधन राजनीति का दौर खंडित जनादेश; किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं; राष्ट्रीय मोर्चा, संयुक्त मोर्चा, (NDA) एवं (UPA) गठबंधन सरकारें
2014 से वर्तमान एक-प्रमुख दल + गठबंधन दौर भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में पूर्ण बहुमत; राजग (NDA) बनाम विपक्षी गठबंधन (INDIA) के बीच द्वि-ध्रुवीय चुनावी मुकाबला

2. राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय दल मान्यता के विधिक मानदंड

मान्यता का स्तर निर्वाचन प्रतीक आदेश 1968 की विहित शर्तें (कोई 1 पूर्ण हो)
राष्ट्रीय दल (National Party) — शर्त 1 लोकसभा या विधानसभा चुनाव में 4 या अधिक राज्यों में कुल वैध मतों का न्यूनतम 6% मत + कम से कम 4 लोकसभा सीटें
राष्ट्रीय दल — शर्त 2 लोकसभा की कुल सीटों का न्यूनतम 2% (वर्तमान में 11 सीटें) कम से कम 3 अलग-अलग राज्यों से जीतना अनिवार्य
राष्ट्रीय दल — शर्त 3 दल को कम से कम 4 राज्यों में राज्य स्तरीय दल (State Party) के रूप में विधिक मान्यता प्राप्त हो
वर्तमान 6 राष्ट्रीय दल 1. भारतीय जनता पार्टी (BJP), 2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC), 3. आम आदमी पार्टी (AAP), 4. बहुजन समाज पार्टी (BSP), 5. माकपा (CPI-M), 6. नेशनल पीपल्स पार्टी (NPP)
राज्य स्तरीय दल (State Party) विधानसभा में कुल वैध मतों का 6% + 2 सीटें, अथवा लोकसभा में राज्य के कुल मतों का 6% + 1 सीट, अथवा विधानसभा की कुल सीटों का 3% या न्यूनतम 3 सीटें

3. गठबंधन राजनीति (Coalition Politics): आयाम, लाभ एवं चुनौतियां

पहलू / आयाम प्रशासनिक व राजनीतिक विश्लेषण एवं भारतीय संदर्भ
अवधारणा व स्वरूप जब किसी एक दल को पूर्ण बहुमत न मिले, तब दो या अधिक दल मिलकर 'साझा न्यूनतम कार्यक्रम (CMP)' पर सरकार बनाते हैं
गठबंधन के प्रकार 1. चुनाव-पूर्व गठबंधन (Pre-Poll Alliance — अधिक स्थायी, जैसे NDA/INDIA), 2. चुनाव-पश्चात गठबंधन (Post-Poll Alliance — सत्ता केंद्रित व अस्थिर)
सकारात्मक पक्ष निरंकुशता पर रोक; क्षेत्रीय आकांक्षाओं व विविध सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व; संकीर्ण नीतियों के बजाय व्यापक सर्वसम्मति को बढ़ावा
नकारात्मक पक्ष सरकार के स्थायित्व पर निरंतर संकट; छोटे दलों द्वारा 'सौदेबाजी की राजनीति (Blackmail Politics)'; राष्ट्रीय विदेश/सुरक्षा नीति में दृढ़ता का अभाव

4. क्षेत्रवाद (Regionalism) एवं प्रमुख क्षेत्रीय दल

कारक / आयाम क्षेत्रवाद के प्रेरक कारक एवं विधिक-राजनीतिक प्रभाव
भाषाई अस्मिता भाषा आधारित उप-राष्ट्रीय पहचान; 1953 आंध्र प्रदेश गठन से शुरुआत; दक्षिण भारत में भाषा संरक्षण की प्रबल मांग
आर्थिक व क्षेत्रीय असंतुलन कतिपय राज्यों में औद्योगीकरण व बुनियादी ढांचे का पिछड़ापन; वित्तीय संसाधनों व केंद्रीय कर हस्तांतरण में विषमता
सांस्कृतिक विशिष्टता पूर्वोत्तर राज्यों में जनजातीय स्वायत्तता, स्थानीय रीति-रिवाजों व आंतरिक रेखा परमिट (ILP) जैसी विशेष सुरक्षा की मांग
प्रमुख क्षेत्रीय दल द्रमुक (DMK) व अन्नाद्रमुक (तमिलनाडु), तृणमूल कांग्रेस (TMC — प. बंगाल), बीजद (ओडिशा), तेदेपा/(YSRCP) (आंध्र प्रदेश), सपा (उ.प्र.), शिवसेना/राकांपा (महाराष्ट्र)
💡 दलीय व्यवस्था का सार: रजनी कोठारी के अनुसार 'कांग्रेस प्रणाली' केवल एक दल का शासन नहीं थी, बल्कि एक बहु-आयामी छतरी (Umbrella Organization) थी जिसमें विभिन्न गुट आम सहमति से कार्य करते थे। 1989 के बाद गठबंधन संघवाद ने भारतीय लोकतंत्र को अधिक सहभागी, समावेशी और संघीय चरित्र प्रदान किया है।

5. पहचान-राजनीति (Identity Politics): आयाम एवं प्रभाव

पहचान का आधार राजनीतिक लामबंदी की कार्यप्रणाली एवं चुनावी प्रभाव
जातीय गोलबंदी जातिगत पहचान पर आधारित दलों का गठन; टिकट वितरण व मंत्रिमंडल में जातीय समीकरणों को सर्वोच्च प्राथमिकता
धार्मिक ध्रुवीकरण धार्मिक प्रतीकों, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक विमर्श का चुनावी लाभ हेतु राजनीतिक उपयोग
क्षेत्रीय व भाषाई पहचान स्थानीय बनाम बाहरी (Sons of Soil) का नारा; स्थानीय युवाओं हेतु नौकरियों में आरक्षण की मांग
सकारात्मक पक्ष ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों (SC, ST, OBC) को राजनीतिक मंच व नीति-निर्माण में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी
नकारात्मक पक्ष विकास एवं सुशासन के वास्तविक मुद्दों की उपेक्षा; समाज में स्थायी कटुता व ध्रुवीकरण का जोखिम

6. महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व एवं नारी शक्ति वंदन अधिनियम

स्तर / कानून प्रतिनिधित्व की स्थिति एवं प्रमुख वैधानिक प्रावधान
स्थानीय स्तर (पंचायती राज) 73वें व 74वें संशोधन 1992 द्वारा न्यूनतम 33% आरक्षण; राजस्थान सहित 20+ राज्यों में 50% महिला आरक्षण लागू
18वीं लोकसभा (2024) संसद में केवल 74 महिला सांसद (कुल 543 का 13.6%); 17वीं लोकसभा (14.4%) की तुलना में महिला प्रतिनिधित्व में गिरावट
106वां संशोधन अधिनियम 2023 नारी शक्ति वंदन अधिनियम (128वां विधेयक): लोकसभा, राज्य विधानसभाओं एवं दिल्ली विधानसभा में महिलाओं हेतु 33% सीटें आरक्षित
लागू होने की पूर्व-शर्त यह अधिनियम तुरंत प्रभावी नहीं हुआ है; अगली जनगणना (Census) संपन्न होने तथा उसके आधार पर परिसीमन (Delimitation) के बाद लागू होगा
आरक्षण की अवधि लागू होने की तिथि से प्रारंभिक 15 वर्षों तक प्रभावी रहेगा; संसद कानून द्वारा इसकी अवधि आगे बढ़ा सकती है; SC/ST सीटों में 33% उप-आरक्षण

7. चुनावों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग: 2024 लोकसभा चुनाव

तकनीकी नवाचार चुनावी प्रचार में उपयोग एवं कार्यप्रणाली (AI in Politics)
AI आवाज-क्लोनिंग दिवंगत अथवा वरिष्ठ राजनेताओं की मूल आवाज का क्लोन बनाकर जन-संपर्क व डिजिटल प्रचार संदेश तैयार करना
बहुभाषी AI अवतार नेता द्वारा दिए गए मूल हिंदी/अंग्रेजी भाषणों का क्षेत्रीय भाषाओं में स्वचालित रूपांतरण व सिंक्रोनाइजेशन
माइक्रो-टारगेटिंग बिग डेटा एनालिटिक्स व कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा मतदाताओं के व्यवहार के अनुरूप व्यक्तिगत लक्षित प्रचार संदेश
डीपफेक वीडियो (Deepfakes) डीप लर्निंग तकनीक से राजनीतिक नेताओं के फर्जी, भ्रामक व उत्तेजक वीडियो/ऑडियो बनाकर चुनावी विमर्श को प्रभावित करना

8. चुनावी शुचिता एवं AI नियमन: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के दिशा-निर्देश

नियामक क्षेत्र विधिक प्रावधान एवं आयोग के दिशा-निर्देश (ECI Guidelines)
सिंथेटिक सामग्री लेबलिंग राजनीतिक दलों व उम्मीदवारों को AI-जनित या विकृत सामग्री (Synthetic Media) पर स्पष्ट लेबल/डिस्क्लेमर लगाना अनिवार्य
3 घंटे में निष्कासन सोशल मीडिया मध्यस्थों (Intermediaries) को शिकायत मिलने के 3 घंटे के भीतर भ्रामक डीपफेक सामग्री हटाने का आदेश
विधिक दंडात्मक कार्रवाई सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 (IT Act) की धारा 66D, कॉपीराइट कानून एवं भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत दंडात्मक कार्रवाई
सत्यापित संचार व्यवस्था गलत सूचना (Misinformation) से निपटने हेतु आयोग द्वारा 'मिथक बनाम यथार्थ (Myth vs Reality)' पोर्टल का संचालन
💡 लोकतांत्रिक विकास का सार: दलीय बहुलता और तकनीकी नवाचार के युग में भारतीय लोकतंत्र पहचान की संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर सुशासन और विकास के एजेंडे पर अग्रसर है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम द्वारा महिलाओं की विधायी भागीदारी तथा AI के युग में चुनावी शुचिता की रक्षा ही लोकतांत्रिक परिपक्वता का वास्तविक प्रमाण है।
अध्याय 17 / 17 — INDIAN POLITY

अध्याय 17: आंतरिक सुरक्षा — खतरे, (CAPF), खुफिया एजेंसियां एवं सुरक्षा प्रबंधन — शॉर्ट नोट्स

सुरक्षा खतरे (नक्सलवाद, आतंकवाद, साइबर), 7 CAPF (CRPF, BSF, CISF, ITBP, SSB, NSG, AR), IB, RAW, NIA, NATGRID

1. भारत की आंतरिक सुरक्षा के प्रमुख खतरे एवं प्रकृति

खतरा / आयाम विधिक व सुरक्षा स्वरूप एवं चुनौतियां
आतंकवाद (सीमा-पार व शहरी) पाक-प्रायोजित आतंकवाद, कश्मीर में सक्रिय आतंकी गुट, शहरी क्षेत्रों में स्लीपर सेल का जाल
वामपंथी उग्रवाद (LWE / नक्सलवाद) माओवादी विचारधारा प्रेरित सशस्त्र विद्रोह; 31 मार्च 2026 तक सभी जिले (LWE) मुक्त घोषित (सुरक्षा + विकास मॉडल)
पूर्वोत्तर उग्रवाद जातीय व उप-राष्ट्रीयता आधारित हथियारबंद गुट; शांति समझौतों ((NSCN), (ULFA) आदि) से निरंतर स्थिरता
सीमा-पार घुसपैठ व नार्को-आतंकवाद ड्रोन के जरिए हथियार/ड्रग्स तस्करी (पंजाब, जम्मू सीमा); नशीले पदार्थों से आतंकी फंडिंग का सिंडिकेट
साइबर व संकर (Hybrid) खतरे वित्तीय धोखाधड़ी, डेटा चोरी, महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना ((CII)) पर प्रायोजित साइबर हमले

2. आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां: क्षेत्रवार वर्गीकरण

सामरिक क्षेत्र प्रमुख सुरक्षा चुनौतियां एवं विधिक संवेदनशीलता
जम्मू-कश्मीर व लद्दाख नियंत्रण रेखा ((LoC)) से घुसपैठ, सीमा-पार गोलाबारी, छद्म युद्ध व लक्षित आतंकी हमले
मध्य व पूर्वी भारत छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा के घने वन; विकास व सरेंडर-पुनर्वास नीतियों से 2026 में शांति स्थापित
पूर्वोत्तर सीमांत भारत-म्यांमार सीमा की खुली व पर्वतीय प्रकृति, शरणार्थी समस्या व विद्रोही गुटों की शरणस्थली
पंजाब व पश्चिमी सीमा ड्रोन आधारित अत्याधुनिक हथियार व हेरोइन तस्करी, सीमा सुरक्षा ग्रिड व रात्रिकालीन निगरानी

3. केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) एवं विशिष्ट अधिदेश

बल का नाम (CAPF) प्राथमिक दायित्व, सीमा एवं परिचालन क्षेत्र
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) भारत का सबसे बड़ा अर्धसैनिक बल; आंतरिक सुरक्षा, नक्सल-रोधी अभियान, दंगा नियंत्रण व चुनाव सुरक्षा
सीमा सुरक्षा बल (BSF) भारत-पाक एवं भारत-बांग्लादेश सीमा की रक्षा; 'रक्षा की प्रथम पंक्ति (First Line of Defence)'
केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) नागरिक हवाई अड्डों, परमाणु/अंतरिक्ष प्रतिष्ठानों, दिल्ली मेट्रो व प्रमुख औद्योगिक इकाइयों की सुरक्षा
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा ((LAC)) की रक्षा; लद्दाख से अरुणाचल तक उच्च तुंगता में विशेषज्ञ बल
सशस्त्र सीमा बल (SSB) भारत-नेपाल एवं भारत-भूटान की खुली व मैत्रीपूर्ण सीमाओं की चौकसी, जन-संपर्क व अनधिकृत आवाजाही रोकथाम
असम राइफल्स (Assam Rifles) भारत का सबसे पुराना अर्धसैनिक बल (1835); भारत-म्यांमार सीमा सुरक्षा व पूर्वोत्तर में उग्रवाद-रोधी कमान
राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) गृह मंत्रालय अधीन विशेष आतंकवाद-रोधी कमांडो दस्ता (ब्लैक कैट); विमान अपहरण व बंधक संकट रोधी बल
💡 आंतरिक बनाम बाह्य सुरक्षा भेद: सेना रक्षा मंत्रालय अधीन बाह्य आक्रमण से रक्षा करती है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल ((CAPF)) गृह मंत्रालय अधीन संघ सूची (प्रविष्टि 2A) व राज्य सूची (प्रविष्टि 1-2) के तहत सीमा चौकसी व आंतरिक शांति संभालते हैं।

4. प्रमुख खुफिया, सुरक्षा एवं अन्वेषण एजेंसियां

सुरक्षा / खुफिया एजेंसी स्थापना, विधिक आधार एवं प्रमुख कार्य
आसूचना ब्यूरो (IB) 1887/1947; गृह मंत्रालय के अधीन भारत की प्राथमिक आंतरिक खुफिया एजेंसी; काउंटर-इंटेलिजेंस व आतंकवाद इनपुट
अनुसंधान एवं विश्लेषण विंग (RAW) 1968 (रामेश्वर नाथ काव); कैबिनेट सचिवालय अधीन बाह्य खुफिया, सामरिक विश्लेषण व राष्ट्रीय हित संरक्षण
राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) 2008 ((NIA) अधिनियम 2008, 26/11 उपरांत); आतंकवाद व आतंकी फंडिंग पर राष्ट्रव्यापी अधिकारिता; 2019 संशोधन से विदेशी अधिकारिता
राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) 1998; त्रि-स्तरीय ढांचा (शीर्ष परिषद, सामरिक नीति समूह, (NSAB)); अध्यक्ष प्रधानमंत्री, सचिवालय प्रमुख (NSA)
राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (NTRO) 2004; राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ((NSA)) के सीधे अधीन तकनीकी खुफिया (उपग्रह इमेजिंग, साइबर ट्रैकिंग) एजेंसी

5. साइबर सुरक्षा अवसंरचना एवं I4C प्रणाली

साइबर सुरक्षा पहल संस्थागत तंत्र एवं 2026 तक की प्रगति
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) गृह मंत्रालय की शीर्ष संस्था; राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल ((NCRP)) व अनुसंधान का संचालन
हेल्पलाइन 1930 एवं (CFCFRMS) साइबर वित्तीय धोखाधड़ी रोकने हेतु प्रणाली; जून 2026 तक ₹11,158 करोड़ से अधिक की राशि सुरक्षित की गई
साइबर हॉटस्पॉट समन्वय टीमें सर्वाधिक ऑनलाइन धोखाधड़ी वाले चिन्हित क्षेत्रों में 7 संयुक्त साइबर समन्वय टीमें सक्रिय व तैनात
राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर 2026 तक लगभग 53 लाख साइबर अपराध शिकायतें दर्ज व त्वरित निस्तारित की गईं

6. आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन की प्रमुख चुनौतियां

प्रबंधन आयाम विधिक, संस्थागत व सामरिक चुनौतियां
संघवाद व केंद्र-राज्य समन्वय 7वीं अनुसूची में 'पुलिस' व 'लोक व्यवस्था' राज्य सूची में होने से केंद्रीय बलों की तैनाती पर समन्वय संकट
बहुआयामी विषम सीमा प्रबंधन 15,106 किमी स्थलीय सीमा पर नदीय, दलदली (कच्छ), हिमाच्छादित व पर्वतीय विषमताओं से स्मार्ट फेंसिंग चुनौती
असममित व संकर (Hybrid) युद्ध ड्रोन द्वारा सीमा-पार नशीले पदार्थों/हथियारों की आपूर्ति, डीपफेक व डिजिटल दुष्प्रचार से सामाजिक सौहार्द भंग
मानव संसाधन एवं तनाव प्रबंधन अर्धसैनिक बलों में पदोन्नति विसंगतियां, दुर्गम तैनाती जनित कार्य तनाव, अत्याधुनिक हथियारों व प्रशिक्षण का अभाव

7. पुलिस सुधार एवं प्रकाश सिंह वाद (2006) के निर्देश

सुधार का क्षेत्र उच्चतम न्यायालय के 7 ऐतिहासिक निर्देश ((Prakash Singh 2006))
राज्य सुरक्षा आयोग (State Security Commission) पुलिस पर अनुचित राजनीतिक व प्रशासनिक दबाव रोकने व नीति निर्माण हेतु प्रत्येक राज्य में आयोग
(DGP) व अधिकारियों का कार्यकाल (DGP) का चयन पारदर्शी समिति द्वारा व न्यूनतम 2 वर्ष का कार्यकाल; (SP)/(SHO) का भी न्यूनतम 2 वर्ष कार्यकाल
कार्य का पृथक्करण दैनिक कानून-व्यवस्था ((Law & Order)) तथा अपराध अनुसंधान ((Investigation)) विंग का स्पष्ट पृथक्करण
पुलिस जवाबदेही आयोग (PCA) हिरासत में हिंसा, भ्रष्टाचार व गंभीर दुर्व्यवहार की जांच हेतु राज्य व जिला स्तर पर पुलिस शिकायत प्राधिकरण
💡 आंतरिक सुरक्षा का समन्वित मॉडल: 'सुरक्षा + विकास + तकनीक + जनभागीदारी' — 31 मार्च 2026 को देश के सभी जिलों को (LWE) मुक्त करने में सफलता मिली। इसी समन्वित मॉडल से स्मार्ट फेंसिंग, (I4C), पुलिस सुधार व खुफिया सूचना आदान-प्रदान द्वारा संकर व साइबर युद्ध से निपटा जा सकता है।
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