'लोकपाल (Lokpal)' शब्द स्वीडिश शब्द 'Ombudsman' से प्रेरित है, जिसका अर्थ है — 'नागरिकों के प्रतिनिधि' या 'जनता का रक्षक'। भारत में एक स्वतंत्र भ्रष्टाचार-निरोधी लोकपाल की मांग नई नहीं थी — यह विचार सबसे पहले 1966 में प्रशासनिक सुधार आयोग (First Administrative Reforms Commission) की सिफारिश से आया।
इसके बाद पहला 'लोकपाल विधेयक' 1968 में लोकसभा में पेश हुआ, और पारित भी हो गया, परंतु लोकसभा भंग होने के कारण यह राज्यसभा में लंबित रह गया और कानून नहीं बन सका। अगले चार दशकों (1968-2011) में यह विधेयक करीब आठ बार संसद में पेश हुआ, परंतु राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण हर बार अटक गया या निरस्त हो गया।
अगस्त 2011 में समाजसेवी अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन ने पूरे देश को झकझोर दिया। यह आंदोलन 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला जैसे बड़े भ्रष्टाचार मामलों की पृष्ठभूमि में उठा था, तथा इसने एक मज़बूत, स्वतंत्र लोकपाल कानून की मांग को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। इसी जन-दबाव के परिणामस्वरूप, संसद ने दिसंबर 2013 में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम पारित किया।
'लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013' दिसंबर 2013 में संसद से पारित हुआ, राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद 1 जनवरी 2014 को अधिसूचित हुआ, तथा 16 जनवरी 2014 से प्रभावी हुआ। इस अधिनियम ने केंद्र स्तर पर 'लोकपाल' तथा राज्य स्तर पर 'लोकायुक्त' — दोनों की स्थापना का प्रावधान किया।
यह ध्यान रखने योग्य है कि लोकपाल की वास्तविक नियुक्ति में कानून बनने के बाद भी कई वर्षों की देरी हुई — पहले अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति मार्च 2019 में हुई (जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष प्रथम अध्यक्ष बने), जो कानून बनने के लगभग 5 वर्ष बाद था। यह देरी नियुक्ति समिति में विपक्ष के नेता (LoP) के औपचारिक अभाव (16वीं लोकसभा में किसी भी दल के पास LoP दर्जे के लिए आवश्यक सीटें न होने) से जुड़ी तकनीकी बाधा के कारण भी हुई।
लोकपाल एक बहु-सदस्यीय निकाय है, जिसमें एक अध्यक्ष तथा अधिकतम आठ सदस्य होते हैं — इनमें से 50% सदस्य न्यायिक (Judicial) होने चाहिए, तथा शेष 50% गैर-न्यायिक सदस्यों में से भी कम से कम 50% अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक अथवा महिलाओं में से होने चाहिए — यह सामाजिक न्याय व प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का एक अनूठा प्रावधान है, जो अन्य किसी आयोग में इस रूप में नहीं मिलता।
वर्तमान में लोकपाल के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अजय माणिकराव खानविलकर हैं, जिन्होंने 10 मार्च 2024 को कार्यभार संभाला। लोकपाल वर्तमान में अध्यक्ष सहित पूर्ण नौ-सदस्यीय शक्ति (Full Strength) पर कार्यरत है — इसमें न्यायिक सदस्यों में जस्टिस एल. नारायण स्वामी, जस्टिस संजय यादव, जस्टिस रितु राज अवस्थी, जस्टिस प्रदीप कुमार मोहंती शामिल हैं; तथा गैर-न्यायिक सदस्यों में सुशील चंद्रा (भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त, देखें अध्याय 17), महेंद्र सिंह, डी.के. जैन व अर्चना रामासुंदरम शामिल हैं।
लोकपाल की नियुक्ति प्रक्रिया दो चरणों में होती है — पहले एक 'खोज समिति (Search Committee)' उम्मीदवारों की सूची तैयार करती है, फिर एक 'चयन समिति (Selection Committee)' उस सूची में से अंतिम चयन कर राष्ट्रपति को सिफारिश भेजती है।
अध्यक्षता — प्रधानमंत्री सदस्य 1 — लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) सदस्य 2 — लोकसभा में विपक्ष के नेता (अथवा सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता) सदस्य 3 — भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) अथवा उनके द्वारा नामित उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश सदस्य 4 — राष्ट्रपति द्वारा नामित एक प्रख्यात विधिवेत्ता (Eminent Jurist)
चयन समिति के निर्णय लेने से पहले, एक 'खोज समिति' (जिसमें कम से कम 7 सदस्य होते हैं, इनमें से 50% SC/ST/OBC/अल्पसंख्यक/महिला वर्ग से) संभावित उम्मीदवारों की एक विस्तृत सूची तैयार कर चयन समिति को सौंपती है। जनवरी 2024 में गठित खोज समिति की अध्यक्षता भूतपूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस रंजन प्रकाश देसाई ने की थी, जिसमें भूतपूर्व SBI प्रमुख अरुंधति भट्टाचार्य, प्रसार भारती अध्यक्ष ए. सूर्य प्रकाश तथा राजस्थान कैडर के सेवानिवृत्त IAS अधिकारी ललित के. पंवार जैसे सदस्य शामिल थे।
लोकपाल अध्यक्ष व सदस्यों को हटाने की प्रक्रिया अत्यंत सुरक्षित व कठिन बनाई गई है, ताकि यह संस्था कार्यपालिका के दबाव से पूरी तरह मुक्त रह सके।
1. राष्ट्रपति को याचिका — किसी भी व्यक्ति द्वारा दुर्व्यवहार के आधार पर हटाने की मांग वाली याचिका राष्ट्रपति को दी जा सकती है।
2. सुप्रीम कोर्ट को संदर्भ — यदि राष्ट्रपति को लगता है कि याचिका में दम है, तो वे मामला जांच हेतु उच्चतम न्यायालय को भेजते हैं।
3. सुप्रीम कोर्ट की जांच व सिफारिश — यदि सुप्रीम कोर्ट की जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो वह राष्ट्रपति को संबंधित सदस्य/अध्यक्ष को हटाने की सलाह देता है, जो राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होती है।
4. कार्यकाल — अध्यक्ष व सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक (जो भी पहले हो) होता है।
लोकपाल अधिनियम की सबसे क्रांतिकारी विशेषता यह है कि यह देश के सर्वोच्च कार्यकारी पद — प्रधानमंत्री — को भी अपने दायरे में लाता है, जो इससे पहले किसी भी भ्रष्टाचार-निरोधी कानून में नहीं था।
| श्रेणी | क्षेत्राधिकार का विवरण |
|---|---|
| प्रधानमंत्री | भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच हो सकती है, परंतु अंतरराष्ट्रीय संबंध, सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा व अंतरिक्ष जैसे संवेदनशील विषयों पर छूट प्राप्त है; शिकायत पर पूर्ण पीठ (Full Bench) द्वारा विचार व कम से कम 2/3 सदस्यों की सहमति ज़रूरी |
| केंद्रीय मंत्री | पूर्ण रूप से लोकपाल के क्षेत्राधिकार में |
| संसद सदस्य | संसद में दिए गए भाषण या मतदान को छोड़कर, अन्य भ्रष्टाचार के मामलों में क्षेत्राधिकार में |
| समूह A, B, C, D के अधिकारी | केंद्र सरकार के सभी अधिकारी लोकपाल के दायरे में — ग्रुप A/B अधिकारियों की जांच सीधे लोकपाल, ग्रुप C/D की जांच CVC के माध्यम से |
| सोसाइटी/ट्रस्ट/NGO | विदेशी अंशदान (₹10 लाख/वर्ष से अधिक) या सरकारी अनुदान (₹1 करोड़/वर्ष से अधिक) प्राप्त करने वाली संस्थाएं भी क्षेत्राधिकार में |
प्रधानमंत्री के विरुद्ध किसी भी शिकायत पर विचार करने के लिए लोकपाल की पूर्ण पीठ (Full Bench) का होना तथा कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की सहमति ज़रूरी है — यह एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच है, जो प्रधानमंत्री पद की गरिमा व स्थिरता को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। इसके अतिरिक्त, प्रारंभिक जांच पूरी तरह गोपनीय रखी जाती है, तथा यदि शिकायत खारिज होती है, तो उससे जुड़े दस्तावेज़ भी सार्वजनिक नहीं किए जाते।
लोकपाल को प्रभावी ढंग से काम करने के लिए अपनी स्वयं की दो समर्पित शाखाएं प्राप्त हैं, जो इसे सिर्फ एक 'सलाहकार' निकाय से आगे, एक 'कार्यकारी' जांच व अभियोजन क्षमता वाली संस्था बनाती हैं।
लोकपाल अधिनियम ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के साथ लोकपाल के संबंध को भी पुनर्परिभाषित किया — यह एक महत्वपूर्ण संस्थागत बदलाव था, जो CBI की स्वतंत्रता को मज़बूत करने के लिए किया गया।
1. लोकपाल-रेफर्ड मामलों में अधीक्षण — जब कोई मामला लोकपाल द्वारा CBI को जांच हेतु भेजा जाता है, तो उस विशेष मामले में CBI की जांच टीम पर लोकपाल का अधीक्षण (Superintendence) होता है, न कि केंद्र सरकार का।
2. CBI निदेशक की नियुक्ति में भूमिका — CBI निदेशक की नियुक्ति के लिए बनी उच्च-स्तरीय समिति (प्रधानमंत्री, CJI अथवा नामित न्यायाधीश, लोकसभा में विपक्ष के नेता) में लोकपाल अध्यक्ष की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं, परंतु लोकपाल अधिनियम ने अभियोजन निदेशक (Director of Prosecution) के पद व कार्यकाल को सुरक्षित बनाया, ताकि जांच में राजनीतिक हस्तक्षेप कम हो।
3. स्थानांतरण पर रोक — लोकपाल द्वारा भेजे गए मामलों की जांच कर रहे CBI अधिकारियों का तबादला, लोकपाल की मंज़ूरी के बिना नहीं किया जा सकता — यह जांच की निरंतरता व स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है।
लोकपाल अधिनियम भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति को तुरंत कुर्क (Attach) करने तथा मामलों की तेज़ी से सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रावधान करता है।
1. अंतरिम कुर्की (Provisional Attachment) — यदि लोकपाल को लगता है कि भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति को नष्ट किया जा सकता है या हस्तांतरित किया जा सकता है, तो वह उसे तुरंत अस्थायी रूप से कुर्क करने का आदेश दे सकता है।
2. विशेष न्यायालय (Special Courts) — लोकपाल अधिनियम के तहत भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई हेतु विशेष न्यायालयों की स्थापना का प्रावधान है, ताकि मुकदमे लंबे समय तक लंबित न रहें।
3. समयबद्ध जांच व सुनवाई — कानून में प्रारंभिक जांच के लिए 90 दिन (आवश्यकतानुसार विस्तार सहित अधिकतम 6 महीने), तथा विस्तृत जांच के लिए 6 महीने (विस्तार सहित) जैसी समय-सीमाएं तय की गई हैं, ताकि मामले लटके न रहें।
लोकपाल अधिनियम 2013 राज्यों को भी अपने-अपने 'लोकायुक्त (Lokayukta)' कानून बनाकर एक वर्ष के भीतर लोकायुक्त की स्थापना करने का निर्देश देता है — परंतु चूंकि 'लोक व्यवस्था व पुलिस' राज्य सूची का विषय है, इसलिए हर राज्य को अपने लोकायुक्त की संरचना व शक्तियां स्वयं तय करने की छूट है, जिससे राष्ट्रव्यापी स्तर पर एकरूपता का अभाव है।
राजस्थान लोकायुक्त भारत के सबसे पुराने लोकायुक्त संस्थानों में से एक है — राजस्थान लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973 के तहत राजस्थान में लोकायुक्त की स्थापना हुई, जो महाराष्ट्र (1971) व ओडिशा के बाद देश के शुरुआती राज्यों में से एक था, जिसने इस संस्था को अपनाया। राजस्थान लोकायुक्त, राज्य सरकार के मंत्रियों, विधायकों व लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार व प्रशासनिक अनियमितता की शिकायतों की जांच करता है, तथा राज्यपाल को अपनी रिपोर्ट सौंपता है, जिसे राज्य विधानसभा के समक्ष रखा जाता है।
केंद्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission — CVC) भारत की सबसे पुरानी भ्रष्टाचार-निरोधी संस्थाओं में से एक है। इसकी जड़ें 1962-64 के 'संथानम समिति (Santhanam Committee)' की सिफारिशों में हैं, जिसने सरकारी तंत्र में बढ़ते भ्रष्टाचार पर गहरी चिंता जताते हुए एक केंद्रीय निगरानी संस्था बनाने की सिफारिश की थी।
इस सिफारिश के आधार पर, भारत सरकार ने फरवरी 1964 में एक कार्यकारी प्रस्ताव (Executive Resolution) के ज़रिए CVC की स्थापना की — यानी शुरुआत में यह भी योजना आयोग की तरह एक गैर-सांविधिक निकाय थी। लगभग 4 दशकों बाद, 2003 में, संसद ने 'केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003' पारित कर इसे सांविधिक (Statutory) दर्जा दिया।
CVC एक बहु-सदस्यीय निकाय है, जिसमें एक केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (Central Vigilance Commissioner — CVC, अध्यक्ष) तथा अधिकतम दो सतर्कता आयुक्त (Vigilance Commissioners — VC) होते हैं।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| नियुक्ति प्राधिकारी | राष्ट्रपति, एक 3-सदस्यीय समिति की सिफारिश पर |
| नियुक्ति समिति | प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), केंद्रीय गृह मंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता |
| कार्यकाल | 4 वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो |
| हटाने की प्रक्रिया | दुर्व्यवहार/अक्षमता पर राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय को संदर्भ, न्यायालय की सकारात्मक रिपोर्ट पर ही हटाया जा सकता है |
CVC को अक्सर 'भ्रष्टाचार के विरुद्ध सर्वोच्च सांविधिक निकाय (Apex Statutory Body to Combat Corruption)' कहा जाता है, तथा इसके कार्यों को मुख्यतः निम्न श्रेणियों में बांटा जा सकता है।
1. CBI पर अधीक्षण — दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम (Delhi Special Police Establishment Act) के तहत, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े मामलों में CBI के कामकाज पर अधीक्षण की शक्ति (हालांकि लोकपाल-रेफर्ड मामलों में यह शक्ति लोकपाल के पास चली जाती है, देखें टॉपिक 8)।
2. मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) तंत्र — हर केंद्रीय मंत्रालय/सार्वजनिक उपक्रम में एक मुख्य सतर्कता अधिकारी (Chief Vigilance Officer) नियुक्त होता है, जो अपने संगठन में निवारक व दंडात्मक सतर्कता कार्यों की निगरानी करता है — CVC इन सभी CVOs पर समग्र निगरानी व मार्गदर्शन रखता है।
3. अनुशासनिक कार्रवाई पर सलाह — केंद्र सरकार के ग्रुप A अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार व अनुशासनहीनता के मामलों में जांच व अनुशासनिक कार्रवाई पर सरकार को सलाह देना।
4. शिकायतों की जांच — केंद्र सरकार व सार्वजनिक उपक्रमों के अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों की सीधे या CVO के माध्यम से जांच करवाना।
5. निवारक सतर्कता (Preventive Vigilance) — सरकारी खरीद, निविदा (Tender) प्रक्रियाओं की समीक्षा कर भ्रष्टाचार की संभावनाओं को पहले से ही कम करने हेतु सुझाव देना — जैसे 'Integrity Pact' (सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञान) की अवधारणा को बढ़ावा देना, जिसके तहत बड़े सरकारी अनुबंधों में सरकार व निजी कंपनी दोनों भ्रष्टाचार न करने का लिखित वचन देते हैं।
हर साल अक्टूबर-नवंबर में, सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती (31 अक्टूबर) के आसपास, CVC पूरे देश में 'सतर्कता जागरूकता सप्ताह (Vigilance Awareness Week)' मनाता है। इस दौरान सरकारी कार्यालयों में शपथ-ग्रहण, निबंध-प्रतियोगिताएं व जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित होते हैं, ताकि नागरिकों व सरकारी कर्मचारियों दोनों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जागरूकता बढ़े — यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी स्कूल में समय-समय पर स्वच्छता अभियान चलाया जाता है, ताकि आदत बनी रहे।
CVC 'निवारक सतर्कता (Preventive Vigilance)' पर विशेष ज़ोर देता है — यानी भ्रष्टाचार होने के बाद दंडित करने से बेहतर है कि प्रणालीगत सुधारों (जैसे ई-टेंडरिंग, ऑनलाइन शिकायत तंत्र, सरल व पारदर्शी प्रक्रियाएं) के ज़रिए भ्रष्टाचार के अवसरों को ही कम कर दिया जाए।
'प्रकटकर्ता संरक्षण अधिनियम, 2014 (Whistle Blowers Protection Act, 2014)' उन व्यक्तियों (Whistleblowers) को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है, जो सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार या सत्ता के दुरुपयोग की शिकायत करते हैं। इस कानून के तहत, CVC को शिकायतें प्राप्त करने व शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखने की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।
यद्यपि प्रकटकर्ता संरक्षण अधिनियम 2014 में पारित हो चुका है, परंतु इसे अभी तक पूर्ण रूप से क्रियान्वित करने वाले नियम (Rules) अधिसूचित नहीं हो सके हैं, तथा 2015 में एक संशोधन विधेयक भी लाया गया, जो शिकायतकर्ताओं को कुछ संवेदनशील जानकारी प्रकट करने से रोकता है — जिसकी नागरिक समाज संगठनों द्वारा आलोचना की जाती रही है, क्योंकि इससे कानून की मूल भावना (शिकायतकर्ताओं को सुरक्षा व प्रोत्साहन देना) कमज़ोर होने की आशंका है।
1. सिर्फ सलाहकार भूमिका — CVC के पास स्वयं की कोई जांच एजेंसी नहीं (वह CBI व CVOs के माध्यम से काम करता है), तथा इसकी सिफारिशें भी बाध्यकारी नहीं होतीं।
2. सीमित क्षेत्राधिकार — CVC सिर्फ केंद्र सरकार के अधिकारियों तक सीमित है — राज्य सरकार के कर्मचारी इसके दायरे से बाहर हैं (यह कार्य राज्यों के अपने सतर्कता आयोगों व ACB का है, देखें टॉपिक 28)।
3. राजनीतिक नियुक्ति समिति में असंतुलन — नियुक्ति समिति में सरकार पक्ष के दो सदस्य (PM+गृह मंत्री) बनाम सिर्फ एक विपक्षी सदस्य (LoP) होने से तटस्थता को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
4. कार्यबल व संसाधनों की सीमा — विशाल केंद्र सरकार तंत्र की निगरानी के लिए CVC का स्टाफ अपेक्षाकृत सीमित माना जाता है।
केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission — CIC) की स्थापना 'सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005 — RTI Act)' के तहत हुई। यह भारत की सबसे नागरिक-केंद्रित संस्थाओं में से एक मानी जाती है, क्योंकि यह सीधे आम नागरिक को सरकार से जवाबदेही मांगने की शक्ति देती है।
'सूचना का अधिकार' को उच्चतम न्यायालय ने कई निर्णयों में अनुच्छेद 19(1)(क) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का अभिन्न हिस्सा माना है — क्योंकि सूचना के बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अधूरी है। RTI Act 2005 से पहले भी, तमिलनाडु (1997), गोवा (1997), राजस्थान (2000) जैसे कुछ राज्यों ने अपने स्वयं के सूचना अधिकार कानून बनाए थे — राजस्थान का 'जन सूचना अधिकार अधिनियम, 2000' देश के शुरुआती राज्य-स्तरीय RTI कानूनों में से एक था, जो मज़दूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) जैसे जन-आंदोलनों की देन था।
मान लीजिए किसी गांव में सड़क निर्माण के लिए सरकारी फंड आया, परंतु सड़क नहीं बनी। RTI Act के तहत, कोई भी ग्रामीण संबंधित विभाग से यह सूचना मांग सकता है कि फंड कहां खर्च हुआ, ठेकेदार कौन था, तथा भुगतान का ब्यौरा क्या है — यह अधिकार भ्रष्टाचार को उजागर करने का एक शक्तिशाली औज़ार बन गया है, और राजस्थान के मज़दूर किसान शक्ति संगठन के 'जन सुनवाई (Public Hearing)' आंदोलन ने इसी विचार को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया।
RTI Act 2005 12 अक्टूबर 2005 से पूर्ण रूप से प्रभावी हुआ। यह कानून हर सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authority) पर यह दायित्व डालता है कि वह नागरिकों के सूचना-अनुरोधों का समयबद्ध जवाब दे।
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| लोक सूचना अधिकारी (PIO) | हर सरकारी कार्यालय में नामित अधिकारी, जो सूचना अनुरोधों का जवाब देने हेतु उत्तरदायी |
| जवाब देने की समय-सीमा | सामान्यतः 30 दिन के भीतर; जीवन/स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में 48 घंटे के भीतर |
| शुल्क | न्यूनतम आवेदन शुल्क (₹10), गरीबी रेखा से नीचे के आवेदकों के लिए निःशुल्क |
| प्रथम अपील | PIO के जवाब से असंतुष्ट होने पर, उसी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी (प्रथम अपीलीय प्राधिकारी) के समक्ष अपील |
| द्वितीय अपील | प्रथम अपील से भी असंतुष्ट होने पर, केंद्रीय सूचना आयोग (केंद्रीय विभागों हेतु) अथवा राज्य सूचना आयोग (राज्य विभागों हेतु) के समक्ष अंतिम अपील |
केंद्रीय सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त (Chief Information Commissioner — CIC) तथा अधिकतम दस सूचना आयुक्त (Information Commissioners — IC) हो सकते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जो एक 3-सदस्यीय समिति — प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में विपक्ष के नेता, तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री — की सिफारिश पर होती है।
2019 में संसद ने 'सूचना का अधिकार (संशोधन) अधिनियम' पारित किया, जिसने CIC व राज्य सूचना आयोगों की स्वतंत्रता को लेकर एक बड़ी राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया।
| बिंदु | 2019 से पहले | 2019 संशोधन के बाद |
|---|---|---|
| कार्यकाल | निश्चित 5 वर्ष, कानून में ही तय | केंद्र सरकार द्वारा नियम बनाकर तय (कानून में तय नहीं) |
| वेतन/भत्ते | मुख्य चुनाव आयुक्त/चुनाव आयुक्त के समान (कानून में तय) | केंद्र सरकार द्वारा नियम बनाकर तय |
| सेवा शर्तें | कानून में सुरक्षित, बदलाव नहीं हो सकता था | केंद्र सरकार की विवेकाधीन शक्ति के अधीन |
1. द्वितीय अपील की सुनवाई — प्रथम अपील से असंतुष्ट आवेदकों की द्वितीय व अंतिम अपील पर निर्णय देना — केंद्रीय स्तर के सार्वजनिक प्राधिकरणों के लिए यह अंतिम प्रशासनिक अपील मंच है।
2. शिकायतों पर सुनवाई — यदि किसी PIO ने आवेदन स्वीकार ही नहीं किया, या तय समय-सीमा में जवाब नहीं दिया, तो सीधे शिकायत पर सुनवाई करना।
3. जुर्माना लगाने की शक्ति — यदि कोई PIO बिना उचित कारण के सूचना देने से इनकार करता है, देरी करता है, या गलत सूचना देता है, तो CIC प्रति दिन ₹250 (अधिकतम ₹25,000 तक) का जुर्माना लगा सकता है, तथा अनुशासनिक कार्रवाई की सिफारिश भी कर सकता है।
4. वार्षिक प्रतिवेदन — RTI Act के क्रियान्वयन पर केंद्र सरकार को वार्षिक रिपोर्ट सौंपना, जो संसद में प्रस्तुत की जाती है।
एक सामान्य RTI आवेदन की पूरी यात्रा को समझना विद्यार्थियों व नागरिकों दोनों के लिए उपयोगी है — यह प्रक्रिया एक सरल, चरणबद्ध श्रृंखला में चलती है।
1. चरण 1 — आवेदन — नागरिक संबंधित सार्वजनिक प्राधिकरण के लोक सूचना अधिकारी (PIO) को निर्धारित शुल्क सहित लिखित आवेदन देता है।
2. चरण 2 — PIO का जवाब — PIO को 30 दिन (जीवन/स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में 48 घंटे) के भीतर सूचना देनी होती है, अथवा धारा 8/9 के तहत छूट का हवाला देकर मना करना होता है।
3. चरण 3 — प्रथम अपील — यदि आवेदक जवाब से असंतुष्ट है या समय-सीमा में कोई जवाब नहीं मिला, तो 30 दिन के भीतर प्रथम अपीलीय अधिकारी (उसी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी) के समक्ष अपील।
4. चरण 4 — द्वितीय अपील — प्रथम अपील के निर्णय से भी असंतुष्ट होने पर, 90 दिन के भीतर केंद्रीय/राज्य सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील — यह अंतिम प्रशासनिक स्तर है।
5. चरण 5 — न्यायिक समीक्षा — यदि आवेदक आयोग के निर्णय से भी संतुष्ट नहीं, तो वह उच्च न्यायालय/उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सकता है।
RTI Act पूर्णतः असीमित नहीं है — धारा 8 व 9 कुछ विशेष श्रेणियों की सूचना को खुलासे से छूट देती हैं, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यक्तिगत गोपनीयता व अन्य संवेदनशील हितों की रक्षा हो सके।
| धारा | छूट प्राप्त सूचना की श्रेणी |
|---|---|
| धारा 8(1)(a) | राष्ट्र की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा, रणनीतिक/वैज्ञानिक/आर्थिक हितों को प्रभावित करने वाली सूचना |
| धारा 8(1)(g) | सूचना देने वाले व्यक्ति के जीवन/शारीरिक सुरक्षा को खतरे में डालने वाली सूचना (जैसे गुप्तचर स्रोत) |
| धारा 8(1)(j) | व्यक्तिगत जानकारी, जिसका किसी सार्वजनिक गतिविधि/हित से कोई संबंध नहीं तथा जो निजता का अनुचित हनन करे |
| धारा 9 | ऐसी सूचना, जो किसी की कॉपीराइट/बौद्धिक संपदा का उल्लंघन करे |
RTI Act की धारा 8(2) एक विशेष प्रावधान करती है — यदि किसी मामले में सार्वजनिक हित (Public Interest), निजता या गोपनीयता के हित से अधिक बड़ा है, तो छूट के बावजूद भी सूचना दी जा सकती है। यह प्रावधान दिखाता है कि RTI Act में 'पारदर्शिता' को प्राथमिकता दी गई है, तथा छूट के प्रावधानों को संकीर्ण रूप से व्याख्यायित करने का निर्देश है।
RTI Act 2005 राज्यों में भी 'राज्य सूचना आयोग (State Information Commission — SIC)' के गठन का प्रावधान करता है, जो राज्य सरकार से जुड़े सार्वजनिक प्राधिकरणों के मामलों में द्वितीय अपील की सुनवाई करता है — इसकी संरचना व शक्तियां CIC जैसी ही हैं, परंतु नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य स्तरीय समिति की सिफारिश पर होती है।
राजस्थान सूचना आयोग (Rajasthan Information Commission — RIC) का गठन 18 अप्रैल 2006 को हुआ, जिसमें एक राज्य मुख्य सूचना आयुक्त तथा अधिकतम दस राज्य सूचना आयुक्त होते हैं। उल्लेखनीय है कि राजस्थान में सूचना के अधिकार की परंपरा राष्ट्रीय कानून से भी पुरानी है — राज्य ने वर्ष 2000 में ही अपना जन सूचना अधिकार अधिनियम लागू किया था (देखें टॉपिक 18), जो मज़दूर किसान शक्ति संगठन के आंदोलन का परिणाम था। वर्तमान में राजस्थान सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त श्री देवेंद्र भूषण गुप्ता (डी.बी. गुप्ता) हैं।
इन तीनों भ्रष्टाचार-रोधी/पारदर्शिता संस्थाओं के बीच समानताएं व अंतर समझना, RAS परीक्षा की दृष्टि से विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
| बिंदु | लोकपाल | CVC | CIC |
|---|---|---|---|
| स्थापना वर्ष | 2014 (कानून 2013) | 1964 (सांविधिक — 2003) | 2005 |
| मूल कानून | लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 | CVC अधिनियम 2003 | RTI अधिनियम 2005 |
| मुख्य भूमिका | भ्रष्टाचार की जांच व अभियोजन | भ्रष्टाचार की निगरानी व सलाह | सूचना के अधिकार की अंतिम अपील |
| PM क्षेत्राधिकार में? | हां (विशेष सुरक्षा सहित) | नहीं (प्रत्यक्ष रूप से नहीं) | लागू नहीं होता |
| सिफारिश बाध्यकारी? | आंशिक — अभियोजन स्वयं कर सकता है | नहीं, सिर्फ सलाहकार | निर्णय बाध्यकारी, जुर्माने की शक्ति |
राजस्थान में भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई तीन प्रमुख संस्थाओं के समन्वित प्रयासों पर टिकी है, जो केंद्र स्तर की तीन संस्थाओं (लोकपाल, CVC, CIC) के राज्य-स्तरीय समकक्ष के रूप में काम करती हैं।
| राज्य संस्था | केंद्रीय समकक्ष | भूमिका |
|---|---|---|
| राजस्थान लोकायुक्त (1973) | लोकपाल | मंत्रियों, विधायकों व लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतों की जांच |
| भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB), राजस्थान | CVC/CBI | भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत रिश्वतखोरी व आय से अधिक संपत्ति के मामलों की जांच, ट्रैप कार्रवाई (देखें अध्याय 17, RPSC मामले) |
| राजस्थान सूचना आयोग (RIC, 2006) | CIC | राज्य सार्वजनिक प्राधिकरणों से जुड़ी RTI द्वितीय अपीलों की सुनवाई |
यह ध्यान देने योग्य है कि RPSC पेपर लीक मामलों (अध्याय 17 में विस्तृत चर्चा) की जांच में राजस्थान ACB व विशेष अभियान समूह (SOG) की सक्रिय भूमिका रही है, जो दिखाता है कि राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार-रोधी तंत्र किस प्रकार एक-दूसरे के साथ समन्वय स्थापित कर काम करता है।
इस अध्याय में हमने भारत के भ्रष्टाचार-रोधी व पारदर्शिता-तंत्र की तीन आधारभूत संस्थाओं का गहराई से अध्ययन किया — लोकपाल (भ्रष्टाचार की जांच व अभियोजन हेतु 'दांतों वाली' संस्था), CVC (निवारक व सलाहकार सतर्कता तंत्र) तथा CIC (नागरिकों को सीधे सूचना का अधिकार देने वाली पारदर्शिता संस्था)।
1. विकास की एक साझा यात्रा — तीनों संस्थाएं अलग-अलग दशकों में बनीं (CVC 1964, CIC 2005, लोकपाल 2014), परंतु तीनों जन-आंदोलनों व जन-दबाव से गहराई से जुड़ी हैं — CVC संथानम समिति से, CIC मज़दूर किसान शक्ति संगठन जैसे आंदोलनों से, तथा लोकपाल अन्ना हज़ारे आंदोलन से।
2. स्वतंत्रता बनाम सरकारी नियंत्रण की सतत बहस — तीनों संस्थाओं में नियुक्ति व सेवा शर्तों को लेकर समय-समय पर यह बहस उठती रही है कि क्या सरकार का प्रभाव इनकी तटस्थता को कमज़ोर करता है — विशेषकर CIC पर 2019 संशोधन के बाद यह बहस और तीखी हुई।
3. राज्य-स्तरीय समानांतर ढांचा — राजस्थान सहित सभी राज्यों में लोकायुक्त, राज्य सतर्कता तंत्र (ACB) व राज्य सूचना आयोग के रूप में समानांतर ढांचा मौजूद है, जो स्थानीय स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
4. प्रभावशीलता — कानून से आगे की चुनौती — जैसा RPSC पेपर लीक (अध्याय 17) व अन्य मामलों से स्पष्ट है, सिर्फ मज़बूत कानून बना देना ही काफी नहीं — इन संस्थाओं की वास्तविक सफलता उनके स्वतंत्र, समयबद्ध व निष्पक्ष क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
एक भावी प्रशासक के तौर पर यह समझना ज़रूरी है कि भ्रष्टाचार-रोधी तंत्र सिर्फ दंडात्मक (Punitive) नहीं, बल्कि निवारक (Preventive) भी होना चाहिए — पारदर्शी प्रक्रियाएं, डिजिटल शासन (e-Governance), तथा जागरूक व सतर्क नागरिक — ये तीनों मिलकर ही किसी लोकपाल, CVC या CIC से कहीं अधिक प्रभावी ढंग से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकते हैं।
1. लोकपाल की स्थापना अन्ना हज़ारे आंदोलन (2011) के दबाव में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 से हुई, प्रभावी 16 जनवरी 2014 से — परंतु पहली नियुक्ति (जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष) मार्च 2019 में हुई, यानी 5 वर्ष की देरी से। 2. लोकपाल में अध्यक्ष + अधिकतम 8 सदस्य (50% न्यायिक) होते हैं — नियुक्ति खोज समिति व चयन समिति (PM+Speaker+LoP+CJI/नामित न्यायाधीश+विधिवेत्ता) के ज़रिए; वर्तमान अध्यक्ष जस्टिस ए.एम. खानविलकर (2024 से) हैं। 3. लोकपाल पहली बार प्रधानमंत्री को भी क्षेत्राधिकार में लाता है (विशेष सुरक्षा — पूर्ण पीठ+2/3 सहमति सहित), तथा लोकपाल-रेफर्ड मामलों में CBI पर अधीक्षण की शक्ति रखता है। 4. राजस्थान लोकायुक्त (1973) देश के शुरुआती राज्य लोकायुक्तों में से एक है — राज्य सूची का विषय होने से हर राज्य की व्यवस्था अलग-अलग है। 5. CVC (1964, सांविधिक दर्जा 2003 से) संथानम समिति की सिफारिश पर बनी — CBI अधीक्षण, CVO तंत्र व निवारक सतर्कता इसकी प्रमुख भूमिकाएं हैं; वर्तमान CVC — प्रवीण कुमार श्रीवास्तव। 6. CVC की सिफारिशें सिर्फ सलाहकार हैं, तथा यह सिर्फ केंद्र सरकार तक सीमित है — प्रकटकर्ता संरक्षण अधिनियम 2014 के तहत शिकायतकर्ताओं को सुरक्षा देने की ज़िम्मेदारी भी CVC के पास है। 7. CIC (RTI Act 2005 से) नागरिकों को सूचना का अधिकार देता है — राजस्थान का जन सूचना अधिकार अधिनियम 2000 (MKSS आंदोलन से जुड़ा) राष्ट्रीय कानून से भी पुराना था; वर्तमान मुख्य सूचना आयुक्त — राज कुमार गोयल (दिसंबर 2025 से)। 8. RTI संशोधन अधिनियम 2019 ने CIC/SIC आयुक्तों के कार्यकाल व वेतन को सरकार के नियमों पर निर्भर बना दिया — जिसे स्वतंत्रता कमज़ोर होने की दृष्टि से व्यापक आलोचना का सामना करना पड़ा। 9. RTI प्रक्रिया PIO → प्रथम अपील → द्वितीय अपील (CIC/SIC) → न्यायिक समीक्षा के क्रम में चलती है; धारा 8-9 सूचना से छूट देती हैं, परंतु धारा 8(2) सार्वजनिक हित बड़ा होने पर सूचना देना अनिवार्य बनाती है। 10. राजस्थान का भ्रष्टाचार-रोधी तंत्र — लोकायुक्त (1973), ACB व राजस्थान सूचना आयोग (2006) — केंद्रीय लोकपाल-CVC-CIC त्रिमूर्ति के राज्य-स्तरीय समकक्ष के रूप में समन्वित ढंग से काम करता है, जैसा RPSC पेपर लीक मामलों में देखा गया।