📋 इस अध्याय में
- जलवायु-परिवर्तन एवं वैश्विक-जलवायु-राजनीति — पृष्ठभूमि (UNFCCC, IPCC, क्योटो प्रोटोकॉल)
- COP शिखर सम्मेलनों का विकास — क्योटो से पेरिस तक
- पेरिस समझौता (2015) — संरचना, NDC व्यवस्था एवं भारत की भूमिका
- भारत का पंचामृत — COP26 ग्लासगो (2021) की प्रतिबद्धताएं
- भारत की अद्यतन NDC एवं नेट-ज़ीरो 2070 रोडमैप
- जलवायु-वित्त बहस — साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR-RC) एवं भारत का रुख
- COP29 बाकू (2024) — नया सामूहिक परिमाणित जलवायु-वित्त लक्ष्य (NCQG)
- COP30 बेलेम (2025) — अनुकूलन-केंद्रित COP एवं भारत की भूमिका
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) — स्थापना, विस्तार एवं वर्तमान स्वरूप
- वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड (OSOWOG) पहल
- मिशन LiFE — अवधारणा, लॉन्च एवं वैश्विक संदेश
- आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) एवं वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन (GBA)
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन — प्रगति एवं लक्ष्य
- कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) चुनौती एवं जलवायु-व्यापार तनाव
- समग्र मूल्यांकन एवं भविष्य की दिशा
📖 🌟 आरंभिक कहानी (Hook Story)
1 नवंबर 2021 — स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में, जहां दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेता जलवायु-परिवर्तन पर अरबों डॉलर के वित्तीय-आंकड़ों एवं जटिल तकनीकी-लक्ष्यों पर बहस कर रहे थे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बिल्कुल अलग, सरल सवाल पूछा — "क्या आपने कभी सोचा है कि पंखा बंद करने, कपड़े धूप में सुखाने, या पुरानी चीज़ों को दोबारा उपयोग करने जैसी छोटी-छोटी रोज़मर्रा की आदतें दुनिया को बचा सकती हैं?" इसी सवाल के साथ उन्होंने एक नई वैश्विक-अवधारणा — "मिशन LiFE" (Lifestyle for Environment) — प्रस्तुत की, जो जलवायु-कूटनीति को केवल सरकारों एवं बड़ी कंपनियों के बीच की बातचीत से निकालकर, हर एक व्यक्ति की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़ने का प्रयास था। उसी शिखर सम्मेलन में, भारत ने "पंचामृत" (पांच अमृत-लक्ष्य) की घोषणा भी की — 2070 तक नेट-ज़ीरो बनने का ऐतिहासिक वादा। यह क्षण दिखाता है कि भारत, जलवायु-कूटनीति में एक साथ दो भूमिकाएं निभाता है — एक ओर वह वैश्विक-मंचों पर विकसित-देशों से जलवायु-न्याय एवं वित्तीय-ज़िम्मेदारी की मांग करने वाला एक दृढ़, मुखर विकासशील-देश है, तथा दूसरी ओर वह स्वयं सौर-ऊर्जा, हरित-हाइड्रोजन एवं सतत-जीवनशैली के क्षेत्र में एक वैश्विक-मार्गदर्शक बनने की महत्वाकांक्षा रखता है — यही दोहरी भूमिका इस अध्याय की केंद्रीय कहानी है।
1 जलवायु-परिवर्तन एवं वैश्विक-जलवायु-राजनीति — पृष्ठभूमि (Climate Change and Global Climate Politics — Background)
पृष्ठभूमि — 1980 के दशक के अंत तक, वैज्ञानिक-समुदाय में यह सहमति बनने लगी थी कि मानव-जनित ग्रीनहाउस-गैस उत्सर्जन पृथ्वी के तापमान को खतरनाक रूप से बढ़ा रहा है — इसी वैज्ञानिक-चिंता ने जलवायु-परिवर्तन को अंतरराष्ट्रीय-राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया।
संरचना — वैश्विक-जलवायु-शासन के आधारभूत स्तंभ
- जलवायु-परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC, 1988) — संयुक्त राष्ट्र (अध्याय 11) एवं विश्व मौसम-विज्ञान संगठन द्वारा स्थापित यह वैज्ञानिक-निकाय, नियमित रूप से जलवायु-विज्ञान पर आकलन-रिपोर्ट प्रकाशित करता है, जो सभी अंतरराष्ट्रीय-वार्ताओं का वैज्ञानिक-आधार बनती हैं।
- जलवायु-परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC, 1992) — 1992 के रियो पृथ्वी-शिखर सम्मेलन में हस्ताक्षरित यह संधि, वैश्विक-जलवायु-कूटनीति की आधारशिला है, तथा इसके तहत प्रतिवर्ष "पक्षकार-सम्मेलन" (Conference of Parties — COP) आयोजित होता है।
- "साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व" का मूल सिद्धांत — UNFCCC में ही यह सिद्धांत स्थापित हुआ कि सभी देशों की जलवायु-सुरक्षा में साझा-ज़िम्मेदारी है, लेकिन ऐतिहासिक उत्सर्जन के लिए विकसित-देशों की ज़िम्मेदारी अधिक है (टॉपिक 6 में विस्तृत विवरण) — यह भारत की जलवायु-कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार-स्तंभ बना हुआ है।
- क्योटो प्रोटोकॉल (1997) — पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन-कटौती समझौता, जिसने केवल विकसित-देशों पर मात्रात्मक उत्सर्जन-सीमा लागू की — भारत जैसे विकासशील-देशों को इससे छूट दी गई थी, जो CBDR सिद्धांत का प्रारंभिक व्यावहारिक-रूप था।
💡 उदाहरण — जलवायु-कूटनीति की मूल-चुनौती
जलवायु-परिवर्तन एक ऐसी "साझा-संपत्ति समस्या" (Global Commons Problem) है, जहां कोई भी देश अकेले इसका समाधान नहीं कर सकता, लेकिन सभी देशों के अलग-अलग ऐतिहासिक-योगदान एवं वर्तमान-क्षमताएं होने के कारण, न्यायसंगत ज़िम्मेदारी-बंटवारे पर सहमति बनाना अत्यंत कठिन बना रहता है — यही जटिलता अगले सभी टॉपिक्स की केंद्रीय पृष्ठभूमि है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ IPCC (1988) ◆ UNFCCC (1992) ◆ साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR) ◆ क्योटो प्रोटोकॉल (1997)
2 COP शिखर सम्मेलनों का विकास — क्योटो से पेरिस तक (Evolution of COP Summits — From Kyoto to Paris)
पृष्ठभूमि — क्योटो प्रोटोकॉल (टॉपिक 1) की सबसे बड़ी सीमा यह थी कि इसमें अमेरिका जैसे सबसे बड़े ऐतिहासिक-उत्सर्जक कभी शामिल ही नहीं हुए, तथा चीन एवं भारत जैसी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं को छूट मिली रही — इसने अगले डेढ़ दशक में एक नए, अधिक समावेशी ढांचे की तलाश को जन्म दिया।
संरचना — COP-यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव
- कोपेनहेगन COP15 (2009) — एक बड़ी निराशा — विश्व के नेताओं की भारी उपस्थिति के बावजूद, कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन किसी कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते पर सहमति बनाने में विफल रहा — यह वार्ताओं की जटिलता एवं विकसित-विकासशील मतभेदों (टॉपिक 6) की गहराई को उजागर करने वाली एक महत्वपूर्ण घटना थी।
- पेरिस COP21 (2015) — ऐतिहासिक सफलता — कोपेनहेगन की असफलता से सीख लेते हुए, पेरिस समझौते (टॉपिक 3) ने एक नया, अधिक लचीला दृष्टिकोण अपनाया, जिसमें हर देश अपनी स्वेच्छा से राष्ट्रीय-निर्धारित योगदान (NDC) तय करता है, न कि ऊपर से थोपे गए सख्त-लक्ष्य।
- ग्लासगो COP26 (2021) — भारत की बड़ी घोषणाएं — इसी शिखर सम्मेलन में भारत ने पंचामृत (टॉपिक 4) एवं मिशन LiFE (टॉपिक 11) दोनों की घोषणा की, जो भारत की जलवायु-कूटनीति के लिए एक निर्णायक क्षण साबित हुआ।
- हालिया शिखर सम्मेलन — शर्म अल-शेख (COP27, 2022), दुबई (COP28, 2023), बाकू (COP29, 2024, टॉपिक 7) एवं बेलेम (COP30, 2025, टॉपिक 8) — प्रत्येक ने जलवायु-वित्त, अनुकूलन एवं "हानि एवं क्षति" (Loss and Damage) जैसे मुद्दों पर क्रमिक प्रगति की है।
📌 प्रमुख COP शिखर सम्मेलनों की समयरेखा
- 1997 —
- 2009 —
- 2015 —
- 2021 —
- 2023 —
- 2024 —
- 2025 —
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ कोपेनहेगन असफलता (2009) ◆ पेरिस सफलता (2015) ◆ ग्लासगो घोषणाएं (2021) ◆ वैश्विक स्टॉकटेक
3 पेरिस समझौता (2015) — संरचना, NDC व्यवस्था एवं भारत की भूमिका (Paris Agreement 2015 — Structure, NDC Framework and Indias Role)
पृष्ठभूमि — 12 दिसंबर 2015 को पेरिस में सर्वसम्मति से अपनाया गया पेरिस समझौता, वैश्विक-जलवायु-कूटनीति के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है, जिसने क्योटो-प्रोटोकॉल (टॉपिक 1) की "ऊपर से नीचे" (Top-Down) व्यवस्था को "नीचे से ऊपर" (Bottom-Up) दृष्टिकोण से बदल दिया।
संरचना — पेरिस समझौते के मूल तत्व
- तापमान-लक्ष्य — समझौते का केंद्रीय लक्ष्य वैश्विक-तापमान वृद्धि को औद्योगिक-पूर्व स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना, तथा 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने का प्रयास करना है।
- राष्ट्रीय-निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions — NDC) — प्रत्येक देश स्वयं अपने उत्सर्जन-कटौती लक्ष्य तय करता है, तथा हर पांच वर्ष में इसे और महत्वाकांक्षी बनाकर संयुक्त राष्ट्र को प्रस्तुत करता है — यह लचीलापन ही समझौते की व्यापक स्वीकार्यता का मुख्य कारण था।
- भारत की भूमिका — सेतु-निर्माता — भारत ने पेरिस वार्ता में विकसित एवं विकासशील देशों के बीच "सेतु" (Bridge, अध्याय 5 टॉपिक 9 का सिद्धांत) की भूमिका निभाई, तथा CBDR सिद्धांत (टॉपिक 6) को समझौते के केंद्र में बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- वैश्विक स्टॉकटेक (Global Stocktake) — हर पांच वर्ष में सामूहिक प्रगति का आकलन करने की व्यवस्था — पहला वैश्विक स्टॉकटेक COP28 दुबई (2023) में पूरा हुआ, जिसने स्पष्ट किया कि वर्तमान प्रयास 1.5 डिग्री लक्ष्य के लिए अपर्याप्त हैं।
⚠️ पेरिस समझौता — कानूनी प्रकृति की बारीकी
यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि पेरिस समझौते के तहत भाग लेना कानूनी रूप से बाध्यकारी है, लेकिन व्यक्तिगत NDC-लक्ष्यों को प्राप्त करना कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है — यह इसकी सबसे बड़ी ताकत (व्यापक भागीदारी) एवं सबसे बड़ी कमज़ोरी (प्रवर्तन-क्षमता की कमी), दोनों है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य ◆ राष्ट्रीय-निर्धारित योगदान (NDC) ◆ सेतु-निर्माता भूमिका ◆ वैश्विक स्टॉकटेक
4 भारत का पंचामृत — COP26 ग्लासगो (2021) की प्रतिबद्धताएं (Indias Panchamrit — COP26 Glasgow 2021 Commitments)
पृष्ठभूमि — हुक कहानी में वर्णित नवंबर 2021 के ग्लासगो शिखर सम्मेलन में, प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की जलवायु-नीति में एक निर्णायक मोड़ की घोषणा की — "पंचामृत" (Panchamrit, संस्कृत में "पांच अमृत"), पांच महत्वाकांक्षी जलवायु-लक्ष्यों का एक समग्र पैकेज।
संरचना — पंचामृत के पांच लक्ष्य
- 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा-क्षमता — 2030 तक भारत की कुल विद्युत-उत्पादन क्षमता में गैर-जीवाश्म (सौर, पवन, जल, परमाणु) स्रोतों की हिस्सेदारी 500 गीगावाट तक पहुंचाना।
- 50% ऊर्जा-आवश्यकता नवीकरणीय-स्रोतों से — 2030 तक भारत की कुल ऊर्जा-आवश्यकता का आधा हिस्सा नवीकरणीय-ऊर्जा स्रोतों से पूरा करना।
- 1 अरब टन उत्सर्जन-कटौती — 2021 से 2030 तक, भारत के कुल अनुमानित कार्बन-उत्सर्जन में 1 अरब टन की कुल कटौती करना।
- कार्बन-तीव्रता में 45% कमी — 2005 के स्तर की तुलना में, 2030 तक भारत की अर्थव्यवस्था की कार्बन-तीव्रता (प्रति यूनिट GDP उत्सर्जन) में 45% की कमी लाना।
- 2070 तक नेट-ज़ीरो — भारत ने पहली बार एक स्पष्ट, दीर्घकालिक नेट-ज़ीरो लक्ष्य-वर्ष की घोषणा की, जो चीन (2060) एवं विकसित-देशों (अधिकांश ने 2050 चुना) दोनों से अलग, भारत की अपनी विकासात्मक-आवश्यकताओं के अनुरूप एक यथार्थवादी समय-सीमा है।
| पंचामृत लक्ष्य | संख्यात्मक विवरण |
|---|
| गैर-जीवाश्म ऊर्जा-क्षमता | 500 गीगावाट (2030 तक) |
| नवीकरणीय-ऊर्जा हिस्सेदारी | 50% ऊर्जा-आवश्यकता (2030 तक) |
| उत्सर्जन-कटौती | 1 अरब टन (2021-2030) |
| कार्बन-तीव्रता में कमी | 45% (2005 के स्तर से, 2030 तक) |
| नेट-ज़ीरो लक्ष्य-वर्ष | 2070 |
⚠️ पंचामृत — क्यों महत्वपूर्ण है
पंचामृत ने भारत को पहली बार एक स्पष्ट, दीर्घकालिक नेट-ज़ीरो लक्ष्य वाले प्रमुख विकासशील-देश के रूप में स्थापित किया, जबकि साथ ही यह सुनिश्चित किया कि यह लक्ष्य भारत के विकासात्मक-अधिकारों (CBDR, टॉपिक 6) से समझौता किए बिना, यथार्थवादी समय-सीमा में तय हो।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ पंचामृत (पांच अमृत-लक्ष्य) ◆ 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता ◆ 2070 नेट-ज़ीरो लक्ष्य ◆ ग्लासगो शिखर सम्मेलन (2021)
5 भारत की अद्यतन NDC एवं नेट-ज़ीरो 2070 रोडमैप (Indias Updated NDC and the Net-Zero 2070 Roadmap)
पृष्ठभूमि — ग्लासगो में पंचामृत (टॉपिक 4) की घोषणा के बाद, भारत ने पेरिस समझौते (टॉपिक 3) की अनिवार्य प्रक्रिया के तहत, अपने पंचामृत-लक्ष्यों को औपचारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र को प्रस्तुत किए गए "अद्यतन राष्ट्रीय-निर्धारित योगदान" (Updated NDC) में बदल दिया।
संरचना — अद्यतन NDC एवं दीर्घकालिक रणनीति
- अद्यतन NDC की सामग्री — इस दस्तावेज़ ने भारत के पहले के NDC (जो केवल कार्बन-तीव्रता में 33-35% कमी का लक्ष्य रखता था) को पंचामृत के अधिक महत्वाकांक्षी 45% कार्बन-तीव्रता कटौती लक्ष्य से प्रतिस्थापित किया।
- दीर्घकालिक निम्न-उत्सर्जन विकास रणनीति (LT-LEDS) — COP27 (2022) में भारत ने अपनी दीर्घकालिक रणनीति प्रस्तुत की, जो 2070 नेट-ज़ीरो लक्ष्य तक पहुंचने के लिए बिजली, परिवहन, उद्योग, वन एवं शहरी-नियोजन जैसे क्षेत्रों में विस्तृत मार्ग-रेखा प्रदान करती है।
- "जलवायु-न्यायसंगत संक्रमण" का सिद्धांत — भारत की रणनीति इस बात पर ज़ोर देती है कि नेट-ज़ीरो की ओर बढ़ना गरीबी-उन्मूलन एवं आर्थिक-विकास (अध्याय 3) के साथ संतुलित होना चाहिए, न कि इन लक्ष्यों की कीमत पर — यह "जलवायु-न्याय" (Climate Justice) की भारत की व्यापक अवधारणा का केंद्रीय तत्व है।
- क्षेत्र-वार प्रगति — भारत ने सौर-ऊर्जा क्षमता में विश्व के सबसे तेज़ विस्तार में से एक हासिल किया है, तथा विद्युत-वाहन (EV) अपनाने, रेलवे के विद्युतीकरण एवं ऊर्जा-दक्ष भवन-मानकों में भी उल्लेखनीय प्रगति की है।
💡 उदाहरण — भारत की उपलब्धि — समय से पहले लक्ष्य-प्राप्ति
भारत ने अपने गैर-जीवाश्म ऊर्जा-क्षमता के 2030 के मूल लक्ष्य (जो पहले 40% था) को निर्धारित समय-सीमा से नौ वर्ष पहले ही हासिल कर लिया, जिससे उसे और अधिक महत्वाकांक्षी 50% (टॉपिक 4) लक्ष्य निर्धारित करने का आत्मविश्वास मिला — यह ट्रैक-रिकॉर्ड भारत की जलवायु-विश्वसनीयता का एक ठोस आधार है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ अद्यतन NDC ◆ दीर्घकालिक निम्न-उत्सर्जन रणनीति (LT-LEDS) ◆ जलवायु-न्यायसंगत संक्रमण ◆ समय-पूर्व लक्ष्य-प्राप्ति
6 जलवायु-वित्त बहस — साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR-RC) एवं भारत का रुख (Climate Finance Debate — CBDR-RC and Indias Position)
पृष्ठभूमि — जलवायु-कूटनीति में सबसे गहरा एवं स्थायी विवाद "जलवायु-वित्त" (Climate Finance) को लेकर है — यानी विकसित-देश, विकासशील-देशों को उत्सर्जन-कटौती एवं जलवायु-अनुकूलन के लिए कितना वित्तीय-सहयोग देंगे।
संरचना — CBDR-RC सिद्धांत एवं भारत के तर्क
- CBDR-RC का पूर्ण-रूप एवं अर्थ — "साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व एवं संबंधित-क्षमताएं" (Common But Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities) — UNFCCC (टॉपिक 1) में स्थापित यह सिद्धांत मानता है कि विकसित-देशों ने औद्योगीकरण के दौरान ऐतिहासिक रूप से कहीं अधिक उत्सर्जन किया है, इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी अधिक है।
- ऐतिहासिक उत्सर्जन का तर्क — भारत लगातार यह तर्क देता है कि प्रति-व्यक्ति संचयी-उत्सर्जन (Per Capita Cumulative Emissions) के आधार पर आकलन होना चाहिए, न कि केवल वर्तमान वार्षिक-उत्सर्जन के आधार पर — इस मापदंड पर भारत का योगदान अमेरिका एवं यूरोप (अध्याय 13) से कहीं कम है।
- 100 अरब डॉलर के वादे की असफलता — 2009 कोपेनहेगन (टॉपिक 2) में विकसित-देशों ने 2020 तक प्रतिवर्ष 100 अरब डॉलर जलवायु-वित्त देने का वादा किया था, लेकिन यह लक्ष्य वर्षों तक पूरी तरह पूरा नहीं हुआ — इस असफलता ने विकासशील-देशों के विश्वास को गहरा आघात पहुंचाया।
- "जलवायु-वित्त" बनाम "ऋण-आधारित सहायता" का अंतर — भारत का मुख्य तर्क यह है कि जलवायु-वित्त अनुदान (Grants) एवं रियायती-वित्त (Concessional Finance) के रूप में मिलना चाहिए, न कि ऐसे ऋण के रूप में, जो विकासशील-देशों पर नया कर्ज़-बोझ डाल दे।
| विकासशील-देशों (भारत सहित) का रुख | विकसित-देशों का रुख |
|---|
| ✓ ऐतिहासिक-उत्सर्जन आधारित ज़िम्मेदारी | ✗ सभी बड़े-उत्सर्जकों (चीन, भारत सहित) की भागीदारी |
| ✓ अनुदान एवं रियायती-वित्त की मांग | ✗ निजी-क्षेत्र वित्त पर अधिक ज़ोर |
| ✓ विकसित-देशों की प्राथमिक ज़िम्मेदारी | ✗ "सभी कर्ताओं" से योगदान की मांग |
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ CBDR-RC सिद्धांत ◆ ऐतिहासिक संचयी-उत्सर्जन ◆ 100 अरब डॉलर वादे की असफलता ◆ अनुदान बनाम ऋण
7 COP29 बाकू (2024) — नया सामूहिक परिमाणित जलवायु-वित्त लक्ष्य (NCQG) (COP29 Baku 2024 — New Collective Quantified Goal on Climate Finance)
पृष्ठभूमि — नवंबर 2024 में अज़रबैजान की राजधानी बाकू में आयोजित COP29 का सबसे बड़ा एजेंडा 100 अरब डॉलर के पुराने, असफल वादे (टॉपिक 6) के स्थान पर एक नया, बड़ा जलवायु-वित्त लक्ष्य तय करना था।
संरचना — NCQG पर हुआ समझौता एवं भारत की प्रतिक्रिया
- नया सामूहिक परिमाणित लक्ष्य (New Collective Quantified Goal — NCQG) — लंबी, तनावपूर्ण वार्ता (जो निर्धारित समय से आगे बढ़कर ओवरटाइम में गई) के बाद, COP29 ने 2035 तक प्रतिवर्ष 300 अरब डॉलर के विकसित-देशों के योगदान वाले लक्ष्य को अपनाया, तथा सभी स्रोतों (सार्वजनिक एवं निजी) से प्रतिवर्ष कुल 1.3 खरब डॉलर जुटाने का व्यापक-लक्ष्य तय किया।
- भारत का असंतोष — भारत ने अन्य जलवायु-संवेदनशील विकासशील-देशों के साथ मिलकर, इस समझौते पर खुली निराशा जताई — भारत का तर्क था कि 1.3 खरब डॉलर पूरी तरह विकसित-देशों से, अनुदान एवं रियायती-वित्त (टॉपिक 6) के रूप में आना चाहिए था, न कि "सभी स्रोतों" से मिलाकर।
- समान-विचारधारा वाले विकासशील-देशों (LMDC) के प्रतिनिधि के रूप में भारत — बाकू में भारत ने "समान-विचारधारा वाले विकासशील-देशों" (Like-Minded Developing Countries — LMDC) समूह की ओर से उच्च-स्तरीय मंत्रिस्तरीय-वार्ता में औपचारिक वक्तव्य दिया, जो भारत की वैश्विक-दक्षिण नेतृत्व (अध्याय 14, टॉपिक 13) की भूमिका की निरंतरता है।
- जलवायु-संवेदनशील देशों का वॉकआउट — वार्ता के दौरान, कुछ अत्यंत जलवायु-संवेदनशील (Climate-Vulnerable) देशों ने असंतोष में बैठक से वॉकआउट भी किया, जो दर्शाता है कि जलवायु-वित्त पर विश्वास की गहरी कमी अभी भी बनी हुई है।
📌 COP29 NCQG — प्रमुख आंकड़े
- 300 अरब डॉलर/वर्ष —
- 1.3 खरब डॉलर/वर्ष —
- 100 अरब डॉलर —
⚠️ NCQG — एक अधूरा समाधान
भले ही NCQG, पुराने 100 अरब डॉलर के लक्ष्य से तीन गुना अधिक है, लेकिन भारत सहित कई विकासशील-देशों को लगता है कि यह वास्तविक ज़रूरत (जो कहीं अधिक आंकी गई है) से कम है, तथा "सभी स्रोतों" की भाषा विकसित-देशों को अपनी प्रत्यक्ष ज़िम्मेदारी से बचने का रास्ता देती है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ नया सामूहिक परिमाणित लक्ष्य (NCQG) ◆ 300 अरब बनाम 1.3 खरब डॉलर ◆ समान-विचारधारा वाले विकासशील-देश (LMDC) ◆ जलवायु-संवेदनशील देशों का वॉकआउट
8 COP30 बेलेम (2025) — अनुकूलन-केंद्रित COP एवं भारत की भूमिका (COP30 Belem 2025 — The Adaptation-Focused COP and Indias Role)
पृष्ठभूमि — नवंबर 2025 में ब्राज़ील के बेलेम शहर (अमेज़न वर्षावन के प्रवेश-द्वार पर स्थित) में आयोजित COP30, जान-बूझकर इस प्रतीकात्मक स्थान पर आयोजित किया गया, ताकि वनों की जलवायु-सुरक्षा में भूमिका को रेखांकित किया जा सके।
संरचना — COP30 के प्रमुख आयाम एवं भारत की प्राथमिकताएं
- "अनुकूलन का COP" — भारत की केंद्रीय मांग — भारत ने COP30 को स्पष्ट रूप से "अनुकूलन-केंद्रित COP" (COP of Adaptation) के रूप में प्रस्तुत किया, यह तर्क देते हुए कि अब तक की जलवायु-कूटनीति में उत्सर्जन-कटौती (Mitigation) पर जितना ज़ोर दिया गया, अनुकूलन (Adaptation, यानी पहले से हो रहे जलवायु-प्रभावों से निपटने की क्षमता) पर उतना नहीं।
- वैश्विक अनुकूलन-लक्ष्य (Global Goal on Adaptation — GGA) — भारत ने अरब-देशों एवं अन्य विकासशील-देशों के साथ मिलकर, GGA पर एक ठोस परिणाम की मांग को सफलतापूर्वक बेलेम-समिट के मुख्य "मुतिराओ" (Mutirão, पुर्तगाली शब्द जिसका अर्थ है सामूहिक-प्रयास) पैकेज का हिस्सा बनाया।
- बाकू अनुकूलन रोडमैप (Baku Adaptation Roadmap) — इसे अंतिम रूप दिया गया, तथा GGA की प्रगति मापने के लिए 59 स्वैच्छिक-संकेतक (Voluntary Indicators) पर सहमति बनी, जो अनुकूलन-प्रयासों को अधिक मापने-योग्य एवं जवाबदेह बनाता है।
- अनुकूलन-वित्त तीन-गुना करने का आह्वान — बेलेम पैकेज में 2035 तक अनुकूलन-वित्त को तीन-गुना करने का आह्वान किया गया, जो जलवायु-संवेदनशील देशों (छोटे द्वीप-राष्ट्रों सहित, अध्याय 15, टॉपिक 12 में उल्लिखित FIPIC देश) के लिए अधिक संसाधन सुनिश्चित करता है।
- भारत का "जलवायु-न्याय बाध्यकारी दायित्व" वाला रुख — भारत ने स्पष्ट किया कि समता (Equity), जलवायु-न्याय एवं वित्त को स्वैच्छिक-प्रतिबद्धताओं के बजाय बाध्यकारी-दायित्वों (Binding Obligations) के रूप में देखा जाना चाहिए — यह भारत की जलवायु-कूटनीति की निरंतर, दृढ़ स्थिति है।
💡 उदाहरण — बेलेम पैकेज — 29 निर्णयों का समूह
COP30 में देशों ने "बेलेम पैकेज" को औपचारिक रूप से अपनाया, जो कुल 29 वार्ता-परिणामों का एक व्यापक समूह है, जो वित्त, न्यायसंगत-संक्रमण (Just Transition), अनुकूलन-ट्रैकिंग, लैंगिक-समावेशन एवं बेहतर सहयोग के ज़रिए चर्चा से क्रियान्वयन की ओर बढ़ने पर केंद्रित है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ अनुकूलन-केंद्रित COP ◆ वैश्विक अनुकूलन-लक्ष्य (GGA) ◆ बाकू अनुकूलन रोडमैप ◆ बेलेम पैकेज (29 निर्णय)
9 अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) — स्थापना, विस्तार एवं वर्तमान स्वरूप (International Solar Alliance — Establishment, Expansion and Current Form)
पृष्ठभूमि — नवंबर 2015 में, पेरिस COP21 (टॉपिक 3) की शुरुआत के साथ ही, भारत एवं फ्रांस ने संयुक्त रूप से एक बिल्कुल नए प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय-संगठन का शुभारंभ किया — अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance — ISA), जो सौर-समृद्ध देशों को एक साझा मंच पर लाने वाला विश्व का पहला ऐसा संगठन था।
संरचना — ISA का विकास एवं वर्तमान स्थिति
- मुख्यालय एवं मूल-उद्देश्य — भारत के गुरुग्राम में मुख्यालय वाला ISA, मूल रूप से "सूर्य-रेखा" (कर्क एवं मकर रेखा के बीच) के देशों के लिए बनाया गया था, ताकि सौर-ऊर्जा तकनीक, वित्त एवं क्षमता-निर्माण में सहयोग को बढ़ावा मिले।
- सार्वभौमिक-सदस्यता की ओर विस्तार — 2018 में संशोधन के बाद, ISA की सदस्यता सूर्य-रेखा से बाहर के देशों के लिए भी खोल दी गई, जिससे यह वास्तव में एक वैश्विक-संगठन बन गया।
- 2025 में ऐतिहासिक विस्तार — अगस्त 2025 में मोल्दोवा, ISA में शामिल होने वाला "यूरोप एवं अन्य" (Europe and Others) क्षेत्र का पहला देश बना, जिससे ISA के पूर्ण-सदस्यों की संख्या 107 तक पहुंच गई (कुल हस्ताक्षरकर्ता देश 120 से अधिक)।
- 8वीं ISA महासभा (2025) — अक्टूबर 2025 में नई दिल्ली में आयोजित इस महासभा में 124 देशों ने भागीदारी की, जिसमें 40 से अधिक मंत्रियों ने शिरकत की — यह ISA के बढ़ते वैश्विक-कद का प्रमाण है।
| ISA विकास-चरण | वर्ष/विवरण |
|---|
| स्थापना (भारत-फ्रांस पहल) | नवंबर 2015, पेरिस COP21 |
| सार्वभौमिक-सदस्यता संशोधन | 2018 |
| 107वां सदस्य (मोल्दोवा) | अगस्त 2025 |
| 8वीं महासभा | अक्टूबर 2025, नई दिल्ली — 124 देशों की भागीदारी |
💡 उदाहरण — ISA का व्यावहारिक प्रभाव
ISA ने विशेषकर छोटे एवं विकासशील-देशों को सौर-परियोजनाओं के लिए वित्त जुटाने, जोखिम कम करने एवं तकनीकी-मानक स्थापित करने में सहायता की है — यह भारत के नेतृत्व में बना एक ऐसा संस्थागत-ढांचा है, जो अध्याय 14 (ब्रिक्स NDB, टॉपिक 3) की तरह ही, वैकल्पिक, विकासशील-देश-केंद्रित वैश्विक-संस्था के रूप में कार्य करता है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ भारत-फ्रांस संयुक्त पहल ◆ सूर्य-रेखा से सार्वभौमिक विस्तार ◆ 107 पूर्ण सदस्य (2025) ◆ 8वीं ISA महासभा
10 वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड (OSOWOG) पहल (One Sun One World One Grid — OSOWOG Initiative)
पृष्ठभूमि — ISA (टॉपिक 9) की स्थापना के बाद, भारत ने सौर-कूटनीति में एक अगला, और भी महत्वाकांक्षी कदम प्रस्तावित किया — "वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड" (One Sun One World One Grid — OSOWOG), जिसे 2018 में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय-सौर गठबंधन की सभा में प्रस्तुत किया गया।
संरचना — OSOWOG की अवधारणा एवं दृष्टिकोण
- मूल अवधारणा — सूर्य कभी अस्त नहीं होता — OSOWOG का आधारभूत विचार यह है कि, चूंकि पृथ्वी पर हमेशा किसी न किसी हिस्से में सूर्य चमक रहा होता है, इसलिए यदि विश्व के सभी क्षेत्रों के विद्युत-ग्रिड आपस में जोड़ दिए जाएं, तो सौर-ऊर्जा को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में निर्बाध रूप से स्थानांतरित किया जा सकता है, जिससे ऊर्जा-भंडारण की समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी।
- तीन-चरण कार्यान्वयन योजना — पहला चरण दक्षिण-एशिया एवं मध्य-पूर्व के ग्रिड को जोड़ने पर केंद्रित है, दूसरा चरण अफ्रीका को शामिल करता है, तथा तीसरा चरण वास्तव में एक "वैश्विक ग्रिड" (Global Grid) का निर्माण करेगा।
- "हरित-ग्रिड पहल" (Green Grids Initiative — GGI) — COP26 ग्लासगो (टॉपिक 4) में, OSOWOG को ब्रिटेन के साथ साझेदारी में "हरित-ग्रिड पहल — वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड" के रूप में औपचारिक रूप दिया गया, जिससे इसे अंतरराष्ट्रीय-समर्थन एवं तकनीकी-सहायता मिली।
- चुनौतियां — व्यावहारिक कार्यान्वयन की जटिलता — इतने विशाल पैमाने पर अंतर-देशीय ग्रिड-संपर्क बनाना, भारी निवेश, जटिल तकनीकी-मानकीकरण एवं कई देशों के बीच राजनीतिक-सहमति की मांग करता है — इसलिए OSOWOG अभी भी अपने प्रारंभिक, क्रमिक-कार्यान्वयन चरण में है।
⚠️ OSOWOG — एक दीर्घकालिक, महत्वाकांक्षी दृष्टि
OSOWOG को तत्काल पूरा होने वाली परियोजना के बजाय, एक दीर्घकालिक वैश्विक-दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए, जो भारत की हरित-कूटनीति की महत्वाकांक्षा के स्तर को दर्शाता है — भले ही व्यावहारिक कार्यान्वयन में दशकों लग सकते हैं।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ OSOWOG (2018) ◆ वैश्विक-ग्रिड संपर्क अवधारणा ◆ हरित-ग्रिड पहल (GGI) ◆ तीन-चरण कार्यान्वयन योजना
11 मिशन LiFE — अवधारणा, लॉन्च एवं वैश्विक संदेश (Mission LiFE — Concept, Launch and Global Message)
पृष्ठभूमि — हुक कहानी में वर्णित नवंबर 2021 के ग्लासगो-भाषण के बाद, भारत ने मिशन LiFE को एक ठोस, औपचारिक वैश्विक-अभियान के रूप में विकसित किया, जिसे जून 2022 में स्टॉकहोम+50 सम्मेलन में तथा फिर औपचारिक रूप से अक्टूबर 2022 में लॉन्च किया गया।
संरचना — मिशन LiFE की अवधारणा एवं कार्यप्रणाली
- "LiFE" का पूर्ण-रूप — Lifestyle for Environment (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) — यह अवधारणा "उपयोग करो एवं फेंको" (Use and Dispose) वाली उपभोगवादी जीवनशैली के बजाय "सचेत उपयोग" (Mindful Consumption) को बढ़ावा देती है।
- तीन-स्तरीय कार्य-रणनीति — मिशन LiFE, व्यक्तिगत-व्यवहार में बदलाव (जैसे ऊर्जा-बचत, पुनर्चक्रण), सामुदायिक-भागीदारी (सामूहिक स्थानीय-पहल) एवं नीतिगत-समर्थन (सरकारी-नीतियां जो सतत-व्यवहार को प्रोत्साहित करें) — इन तीन स्तरों पर एक साथ काम करता है।
- 75 सुझाए गए व्यक्तिगत-कार्य — मिशन LiFE के तहत, ऊर्जा-बचत, जल-संरक्षण, अपशिष्ट-प्रबंधन एवं सतत-भोजन जैसी श्रेणियों में 75 से अधिक सरल, व्यावहारिक दैनिक-कार्यों की एक सूची प्रस्तुत की गई है, जिन्हें कोई भी नागरिक अपने रोज़मर्रा के जीवन में अपना सकता है।
- वैश्विक-मान्यता — मिशन LiFE को G-20 (अध्याय 14, टॉपिक 11) की भारत की अध्यक्षता के दौरान भी एक प्रमुख विषय के रूप में शामिल किया गया, जिससे इस भारतीय-अवधारणा को एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय-मंच पर मान्यता मिली।
💡 उदाहरण — मिशन LiFE — मांग-पक्ष (Demand-Side) जलवायु-कार्रवाई
जहां अधिकांश जलवायु-नीतियां आपूर्ति-पक्ष (Supply-Side) पर केंद्रित होती हैं — जैसे स्वच्छ-ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना (टॉपिक 4, 9) — वहीं मिशन LiFE, उपभोग-पैटर्न बदलकर मांग-पक्ष से उत्सर्जन कम करने का एक अनूठा, पूरक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो भारतीय-परंपरा में "आवश्यकता जितना उपयोग" के प्राचीन सिद्धांत से प्रेरित है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ LiFE — Lifestyle for Environment ◆ सचेत उपयोग (Mindful Consumption) ◆ 75 सुझाए गए दैनिक-कार्य ◆ मांग-पक्ष जलवायु-कार्रवाई
12 आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) एवं वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन (GBA) (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure and Global Biofuels Alliance)
पृष्ठभूमि — ISA (टॉपिक 9) एवं OSOWOG (टॉपिक 10) के बाद, भारत ने दो और भारत-नेतृत्व वाले वैश्विक-गठबंधन स्थापित किए हैं, जो जलवायु-कूटनीति के अलग-अलग किंतु परस्पर-जुड़े आयामों को कवर करते हैं।
संरचना — दो अतिरिक्त भारत-नेतृत्व वाले गठबंधन
- आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure — CDRI, 2019) — सितंबर 2019 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु-कार्रवाई शिखर सम्मेलन में शुरू यह गठबंधन, चक्रवात, भूकंप एवं बाढ़ जैसी आपदाओं के प्रति अवसंरचना (सड़कें, बिजली, अस्पताल) को अधिक प्रतिरोधी बनाने पर केंद्रित है।
- CDRI का महत्व — जलवायु-अनुकूलन का ठोस उदाहरण — CDRI, टॉपिक 8 में चर्चित "अनुकूलन" (Adaptation) एजेंडे का एक व्यावहारिक, अवसंरचना-केंद्रित क्रियान्वयन है, विशेषकर छोटे द्वीप-राष्ट्रों एवं जलवायु-संवेदनशील तटीय-क्षेत्रों (अध्याय 15, टॉपिक 12, FIPIC देश) के लिए।
- वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन (Global Biofuels Alliance — GBA, 2023) — भारत की G-20 अध्यक्षता (अध्याय 14, टॉपिक 12) के दौरान सितंबर 2023 में दिल्ली शिखर सम्मेलन में शुरू यह गठबंधन, पेट्रोल/डीज़ल के स्थान पर इथेनॉल जैसे जैव-ईंधनों के वैश्विक-व्यापार एवं मानकीकरण को बढ़ावा देता है।
- सामान्य सदस्यता-पैटर्न — यह उल्लेखनीय है कि जॉर्डन जैसे कई देश, ISA, CDRI एवं GBA — तीनों भारत-नेतृत्व वाले गठबंधनों में एक साथ शामिल हुए हैं, जो दर्शाता है कि भारत की हरित-कूटनीति पहलें अब एक व्यापक, परस्पर-सुदृढ़ "पारिस्थितिकी-तंत्र" (Ecosystem) के रूप में कार्य कर रही हैं।
| CDRI (2019) | GBA (2023) |
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| ✓ आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना पर केंद्रित | ✗ जैव-ईंधन व्यापार एवं मानकीकरण |
| ✓ अनुकूलन-एजेंडे का ठोस क्रियान्वयन | ✗ G-20 अध्यक्षता की विरासत (अध्याय 14) |
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ CDRI (2019) ◆ GBA (2023) ◆ आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना ◆ भारत-नेतृत्व गठबंधनों का पारिस्थितिकी-तंत्र
13 राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन — प्रगति एवं लक्ष्य (National Green Hydrogen Mission — Progress and Targets)
पृष्ठभूमि — जनवरी 2023 में स्वीकृत राष्ट्रीय हरित-हाइड्रोजन मिशन, भारत की हरित-कूटनीति एवं घरेलू-ऊर्जा-रणनीति के बीच का सबसे महत्वपूर्ण सेतु है, जो भारत को हरित-हाइड्रोजन के वैश्विक-उत्पादन एवं निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य रखता है।
संरचना — मिशन की संरचना एवं वर्तमान प्रगति
- दो-चरण कार्यान्वयन — चरण-1 (2022-23 से 2025-26) घरेलू इलेक्ट्रोलाइज़र-उत्पादन को प्रोत्साहित करने एवं इस्पात, गतिशीलता एवं शिपिंग में पायलट-परियोजनाओं पर केंद्रित है, जबकि चरण-2 (2026-27 से 2029-30) में हरित-हाइड्रोजन को जीवाश्म-ईंधन के बराबर लागत-प्रतिस्पर्धी बनाने का लक्ष्य है।
- वर्तमान प्रगति (मई 2025 तक) — 19 कंपनियों को कुल 8,62,000 टन प्रति वर्ष हरित-हाइड्रोजन उत्पादन-क्षमता आवंटित की जा चुकी है, तथा 15 कंपनियों को 3,000 मेगावाट वार्षिक इलेक्ट्रोलाइज़र-विनिर्माण क्षमता मिली है — इसके अतिरिक्त लगभग 8,000 टन प्रति वर्ष व्यावसायिक हरित-हाइड्रोजन क्षमता का भौतिक-निर्माण पूरा हो चुका है।
- मांग-पक्ष प्रगति — भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI) ने देश भर के 13 उर्वरक-संयंत्रों के लिए 7,24,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष हरित-अमोनिया आपूर्ति की कीमतें खोजी हैं, जो घरेलू-मांग सृजन की दिशा में एक ठोस कदम है।
- 2030 का व्यापक लक्ष्य — मिशन के तहत, हरित-हाइड्रोजन उत्पादन के लिए 2030 तक लगभग 125 गीगावाट अतिरिक्त नवीकरणीय-ऊर्जा क्षमता, 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश, 6 लाख से अधिक रोज़गार-सृजन, तथा जीवाश्म-ईंधन आयात में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कमी लाने का लक्ष्य है।
| संकेतक | आंकड़ा (मई 2025 तक/2030 लक्ष्य) |
|---|
| आवंटित उत्पादन-क्षमता | 8,62,000 टन/वर्ष (19 कंपनियां) |
| इलेक्ट्रोलाइज़र-विनिर्माण क्षमता | 3,000 मेगावाट/वर्ष (15 कंपनियां) |
| 2030 तक नई नवीकरणीय-क्षमता (लक्ष्य) | लगभग 125 गीगावाट |
| 2030 तक निवेश (लक्ष्य) | 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक |
| 2030 तक रोज़गार-सृजन (लक्ष्य) | 6 लाख से अधिक |
💡 उदाहरण — हरित-हाइड्रोजन — भविष्य की हरित-कूटनीति का उपकरण
जैसे-जैसे भारत हरित-हाइड्रोजन उत्पादन में वैश्विक-नेतृत्व स्थापित करेगा, वह इसे इस्पात, शिपिंग एवं भारी-उद्योग जैसे "कठिन-से-विघटित" (Hard-to-Abate) क्षेत्रों के वैश्विक-डीकार्बोनाइज़ेशन में एक प्रमुख निर्यातक की भूमिका दिलाएगा — यह ISA एवं OSOWOG (टॉपिक 9-10) की तरह ही, भारत की एक और महत्वाकांक्षी हरित-कूटनीति पहल है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ राष्ट्रीय हरित-हाइड्रोजन मिशन (2023) ◆ दो-चरण कार्यान्वयन ◆ इलेक्ट्रोलाइज़र-विनिर्माण क्षमता ◆ 125 गीगावाट नवीकरणीय-क्षमता लक्ष्य
14 कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) चुनौती एवं जलवायु-व्यापार तनाव (CBAM Challenge and Climate-Trade Tensions)
पृष्ठभूमि — जैसे-जैसे जलवायु-नीति एवं अंतरराष्ट्रीय-व्यापार-नीति आपस में गहराई से जुड़ती जा रही हैं, यूरोपीय संघ (अध्याय 13, टॉपिक 4) का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (Carbon Border Adjustment Mechanism — CBAM) भारत की हरित-कूटनीति के लिए एक नई, जटिल चुनौती के रूप में उभरा है।
संरचना — CBAM की चुनौती एवं भारत की प्रतिक्रिया
- CBAM की कार्यप्रणाली — 2026 से पूर्ण रूप से प्रभावी होने वाला यह तंत्र, EU में आयातित कार्बन-गहन उत्पादों (इस्पात, सीमेंट, उर्वरक, एल्युमिनियम, बिजली, हाइड्रोजन) पर उनकी उत्पादन-प्रक्रिया में हुए कार्बन-उत्सर्जन के अनुसार शुल्क लगाता है।
- भारत की मुख्य आपत्ति — "एकतरफा व्यापार-अवरोध" — भारत का तर्क है कि CBAM, WTO के गैर-भेदभाव सिद्धांतों (अध्याय 12, टॉपिक 3) का उल्लंघन करते हुए, एकतरफा रूप से जलवायु-नीति को व्यापार-नीति के साथ जोड़ता है, तथा CBDR-RC सिद्धांत (टॉपिक 6) की पूरी तरह अनदेखी करता है।
- भारतीय निर्यातकों पर प्रभाव — भारत के इस्पात एवं एल्युमिनियम उद्योग, जिनका EU को उल्लेखनीय निर्यात होता है, CBAM लागू होने के बाद अतिरिक्त कार्बन-शुल्क का सामना करेंगे, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।
- भारत की दोहरी-रणनीति — भारत एक साथ दो रास्तों पर काम कर रहा है — पहला, WTO एवं द्विपक्षीय भारत-EU FTA वार्ता (अध्याय 7, टॉपिक 1; अध्याय 12) के ज़रिए CBAM पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराना, तथा दूसरा, घरेलू-स्तर पर अपना खुद का कार्बन-बाज़ार (Carbon Market) एवं उत्सर्जन-व्यापार-योजना विकसित करना, ताकि भारतीय-उद्योग वैश्विक कार्बन-मानकों के लिए बेहतर ढंग से तैयार हो सकें।
⚠️ जलवायु-व्यापार तनाव — एक उभरता वैश्विक-मुद्दा
CBAM केवल भारत-EU संबंधों (अध्याय 13) का मुद्दा नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि आने वाले वर्षों में जलवायु-नीति एवं व्यापार-नीति (अध्याय 12) एक-दूसरे से तेज़ी से जुड़ती जाएंगी — भारत को इस नए "जलवायु-व्यापार-तंत्र" (Climate-Trade Nexus) के लिए एक दीर्घकालिक, समन्वित रणनीति विकसित करनी होगी।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) ◆ एकतरफा व्यापार-अवरोध की आपत्ति ◆ इस्पात-एल्युमिनियम निर्यात प्रभाव ◆ घरेलू कार्बन-बाज़ार विकास
15 समग्र मूल्यांकन एवं भविष्य की दिशा (Overall Assessment and Future Direction)
पृष्ठभूमि — इस अध्याय में पढ़ी गई सभी पहलों — पंचामृत से लेकर मिशन LiFE, ISA से लेकर हरित-हाइड्रोजन मिशन तक — को एक साथ रखकर देखने पर, भारत की जलवायु एवं हरित-कूटनीति की एक व्यापक, सुसंगत तस्वीर उभरती है।
संरचना — पांच व्यापक निष्कर्ष
- भारत — एक साथ "मांगकर्ता" एवं "आपूर्तिकर्ता" — भारत, जलवायु-वित्त एवं CBDR-RC (टॉपिक 6-7) पर विकसित-देशों से न्याय की मांग करने वाला एक दृढ़ विकासशील-देश है, जबकि साथ ही वह ISA, OSOWOG एवं हरित-हाइड्रोजन (टॉपिक 9-10, 13) के ज़रिए स्वयं वैश्विक हरित-समाधान प्रदान करने वाला एक "आपूर्तिकर्ता" भी है — यह दोहरी भूमिका हुक कहानी में वर्णित पंचामृत एवं मिशन LiFE के युगल-प्रस्तुतीकरण में स्पष्ट रूप से झलकती है।
- जलवायु-न्याय भारत की मूल-प्राथमिकता बनी रहेगी — COP29 (टॉपिक 7) एवं COP30 (टॉपिक 8) दोनों में भारत का रुख दिखाता है कि चाहे जितनी भी वैश्विक-हरित-पहलों का नेतृत्व करे, भारत कभी भी ऐतिहासिक-उत्तरदायित्व एवं समता के सिद्धांत (CBDR-RC, टॉपिक 6) से समझौता नहीं करेगा।
- भारत-नेतृत्व वाले गठबंधनों का बढ़ता नेटवर्क — ISA, CDRI, GBA (टॉपिक 9, 12) — मिलकर एक ऐसा "पारिस्थितिकी-तंत्र" बनाते हैं, जो भारत को केवल एक भागीदार-देश के बजाय, वैश्विक हरित-वास्तुकला का एक निर्माता (Architect) बनाता है — यह अध्याय 14 (ब्रिक्स NDB, टॉपिक 3) में देखी गई वैकल्पिक-संस्था-निर्माण की प्रवृत्ति का हरित-संस्करण है।
- जलवायु-व्यापार तनाव एक नई, बढ़ती चुनौती — CBAM (टॉपिक 14) दिखाता है कि आने वाले वर्षों में जलवायु-कूटनीति एवं व्यापार-कूटनीति (अध्याय 12-13) एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़ जाएंगी, तथा भारत को दोनों क्षेत्रों में समन्वित रणनीति अपनानी होगी।
- भविष्य की दिशा — घरेलू-प्रगति एवं वैश्विक-नेतृत्व का संतुलन — भारत की चुनौती यह होगी कि वह अपने घरेलू 2030 पंचामृत-लक्ष्यों (टॉपिक 4-5) एवं 2070 नेट-ज़ीरो रोडमैप को गति दे, साथ ही वैश्विक-मंचों (COP, ISA, G-20) पर जलवायु-न्याय एवं वैश्विक-दक्षिण के हितों का प्रभावी प्रतिनिधित्व भी जारी रखे।
💡 उदाहरण — अगले अध्याय से जुड़ाव
यह अध्याय भारत की समग्र बहुपक्षीय एवं आर्थिक-कूटनीति (अध्याय 3, 12-15) की एक महत्वपूर्ण, हरित-आयाम वाली कड़ी है — अगले एवं अंतिम अध्याय 17 में हम भारत की व्यापक समसामयिक रणनीतिक-पहलों — नेबरहुड फर्स्ट, एक्ट ईस्ट, सागर/महासागर (अध्याय 15, टॉपिक 12 से आगे विस्तार) एवं रक्षा-कूटनीति — को एक समग्र दृष्टिकोण से जोड़कर देखेंगे, जो इस पूरी पुस्तक के सभी 16 अध्यायों को एक व्यापक निष्कर्ष तक पहुंचाएगा।
⚠️ परीक्षा दृष्टिकोण से महत्व
RAS Mains में "भारत की जलवायु-कूटनीति में नेतृत्व" या "पंचामृत एवं मिशन LiFE का महत्व" जैसे प्रश्न पूछे जा सकते हैं — उत्तर में जलवायु-न्याय की मांग एवं स्वयं के हरित-नेतृत्व — दोनों पहलुओं को संतुलित रूप से शामिल करना चाहिए, तथा नवीनतम COP29/COP30 घटनाक्रम का उल्लेख अनिवार्य है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ मांगकर्ता एवं आपूर्तिकर्ता की दोहरी भूमिका ◆ जलवायु-न्याय की निरंतरता ◆ भारत-नेतृत्व हरित-गठबंधन नेटवर्क ◆ घरेलू-वैश्विक संतुलन
📌 अध्याय सार (Chapter Summary)
- 1. वैश्विक-जलवायु-राजनीति की नींव IPCC (1988), UNFCCC (1992) एवं क्योटो प्रोटोकॉल (1997) पर टिकी है, जिसमें "साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व" (CBDR-RC) भारत की जलवायु-कूटनीति का मूल-सिद्धांत बना हुआ है।
- 2. पेरिस समझौता (2015) ने "ऊपर से नीचे" के बजाय "नीचे से ऊपर" NDC-आधारित दृष्टिकोण अपनाया, जिसमें भारत ने विकसित-विकासशील देशों के बीच सेतु-निर्माता की भूमिका निभाई।
- 3. भारत के पंचामृत (COP26, 2021) ने 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता, 50% नवीकरणीय-ऊर्जा हिस्सेदारी एवं 2070 नेट-ज़ीरो जैसे पांच महत्वाकांक्षी लक्ष्य स्थापित किए, जिन्हें भारत ने औपचारिक अद्यतन NDC में बदला।
- 4. जलवायु-वित्त पर भारत लगातार अनुदान एवं रियायती-वित्त की मांग करता है, तथा COP29 बाकू (2024) के 1.3 खरब डॉलर के NCQG लक्ष्य पर भी असंतोष जताया, क्योंकि यह "सभी स्रोतों" से जुटाने पर आधारित है, केवल विकसित-देशों से नहीं।
- 5. COP30 बेलेम (2025) में भारत ने इसे "अनुकूलन का COP" बनाने में सफलता पाई, जिसमें वैश्विक अनुकूलन-लक्ष्य (GGA), बाकू अनुकूलन रोडमैप एवं अनुकूलन-वित्त तीन-गुना करने की प्रतिबद्धता शामिल है।
- 6. अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA, 2015) आज 107 पूर्ण-सदस्यों (2025 में मोल्दोवा सहित) वाला एक वैश्विक-संगठन बन चुका है, जो भारत की सबसे सफल संस्था-निर्माण पहलों में गिना जाता है।
- 7. OSOWOG — "वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड" — वैश्विक-ग्रिड संपर्क की एक दीर्घकालिक, महत्वाकांक्षी दृष्टि है, जिसे ग्लासगो में "हरित-ग्रिड पहल" के रूप में अंतरराष्ट्रीय-समर्थन मिला।
- 8. मिशन LiFE (2022) व्यक्तिगत जीवनशैली में बदलाव के ज़रिए "मांग-पक्ष" जलवायु-कार्रवाई का एक अनूठा, भारतीय-परंपरा-प्रेरित वैश्विक-अभियान है।
- 9. CDRI (2019) एवं GBA (2023) — भारत-नेतृत्व वाले दो अतिरिक्त गठबंधन — क्रमशः आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना एवं जैव-ईंधन व्यापार पर केंद्रित हैं, जो ISA के साथ मिलकर एक व्यापक हरित-गठबंधन पारिस्थितिकी-तंत्र बनाते हैं।
- 10. राष्ट्रीय हरित-हाइड्रोजन मिशन (2023) भारत को हरित-हाइड्रोजन के वैश्विक-उत्पादन एवं निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में ठोस प्रगति कर रहा है, जिसमें 2030 तक 125 गीगावाट अतिरिक्त नवीकरणीय-क्षमता का लक्ष्य है।
- 11. EU का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM, 2026 से पूर्ण प्रभावी) भारत के लिए एक नई जलवायु-व्यापार चुनौती है, जिसे भारत WTO-आपत्ति एवं घरेलू कार्बन-बाज़ार विकास — दोनों रणनीतियों से संबोधित कर रहा है।
- 12. भारत की जलवायु-कूटनीति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी दोहरी भूमिका है — जलवायु-न्याय का दृढ़ मांगकर्ता एवं हरित-समाधानों का सक्रिय वैश्विक-आपूर्तिकर्ता — जो उसे किसी भी अन्य वैश्विक-शक्ति से अलग, एक अनूठी स्थिति में खड़ा करती है।