📋 इस अध्याय में
- ब्रिक्स (BRICS) — गठन, अवधारणा एवं विस्तार की यात्रा
- ब्रिक्स की संस्थागत संरचना एवं कार्यप्रणाली
- न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) एवं भारत की भूमिका
- आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (Contingent Reserve Arrangement — CRA)
- ब्रिक्स विस्तार (BRICS+) एवं साझेदार-देश श्रेणी — नए आयाम
- डी-डॉलराइज़ेशन बहस एवं भारत का संतुलित रुख
- ब्रिक्स में चीन-भारत गतिशीलता — सहयोग एवं प्रतिस्पर्धा
- भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता (2021) एवं आगामी 2026 अध्यक्षता
- G-20 — गठन, संरचना एवं वित्त-मंत्री स्तर से नेता-स्तर तक विकास
- G-20 ट्रोइका प्रणाली एवं कार्यप्रणाली
- भारत की G-20 अध्यक्षता (2023) — थीम, प्राथमिकताएं एवं आयोजन
- भारत की G-20 उपलब्धियां — अफ्रीकी संघ की स्थायी सदस्यता, दिल्ली घोषणापत्र, IMEC
- वैश्विक दक्षिण की आवाज़ — Voice of Global South Summit शृंखला
- ब्रिक्स बनाम G-20 — भारत की दोहरी सदस्यता की रणनीतिक अहमियत
- समग्र मूल्यांकन एवं भविष्य की दिशा
📖 🌟 आरंभिक कहानी (Hook Story)
वर्ष 2001 — गोल्डमैन सैक्स के एक अर्थशास्त्री जिम ओ’नील (Jim ONeill) अपनी मेज़ पर बैठे वैश्विक अर्थव्यवस्था के आंकड़ों का विश्लेषण कर रहे थे, जब उन्होंने एक दिलचस्प पैटर्न देखा — ब्राज़ील, रूस, भारत एवं चीन, चार ऐसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं थीं, जो आने वाले दशकों में वैश्विक विकास का इंजन बन सकती थीं। उन्होंने इन्हें एक साथ जोड़कर एक नया शब्द गढ़ा — "BRIC" — जो शुद्ध रूप से एक निवेश-विश्लेषण रिपोर्ट का हिस्सा था, कोई राजनीतिक प्रस्ताव नहीं। किसी ने तब कल्पना भी नहीं की थी कि यह आर्थिक-संक्षिप्ति एक दिन एक वास्तविक, सक्रिय राजनीतिक-आर्थिक समूह में बदल जाएगी। ठीक सात वर्ष बाद, 2008 में जब वैश्विक वित्तीय-संकट (अध्याय 3, टॉपिक 8) ने पूरी दुनिया को झकझोरा, तो एक बिल्कुल अलग कहानी घटी — G-7 के वित्त-मंत्रियों का एक अपेक्षाकृत छोटा मंच "G-20" अचानक राष्ट्राध्यक्षों के स्तर पर बुलाया गया, क्योंकि संकट इतना गहरा था कि उसे सुलझाने के लिए विश्व की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को एक मेज़ पर लाना ज़रूरी हो गया। इस तरह, एक समूह का जन्म एक अर्थशास्त्री की स्प्रेडशीट से हुआ, तथा दूसरे का जन्म एक वैश्विक संकट की आपातकालीन प्रतिक्रिया से — फिर भी, आज ये दोनों मंच भारत की बहुपक्षीय कूटनीति के दो सबसे शक्तिशाली स्तंभ बन चुके हैं, जहां भारत एक साथ उभरती शक्तियों की आवाज़ भी है, एवं वैश्विक-शासन की मुख्यधारा में एक निर्णायक खिलाड़ी भी।
1 ब्रिक्स (BRICS) — गठन, अवधारणा एवं विस्तार की यात्रा (BRICS — Formation, Concept and Journey of Expansion)
पृष्ठभूमि — हुक कहानी में वर्णित जिम ओ’नील के 2001 के आर्थिक-विश्लेषण से प्रेरित होकर, ब्राज़ील, रूस, भारत एवं चीन के विदेश-मंत्रियों की पहली औपचारिक बैठक 2006 में हुई, तथा 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला औपचारिक "BRIC" शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ।
संरचना — ब्रिक्स के विकास के चरण
- "BRIC" से "BRICS" तक — 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद, समूह का नाम "BRICS" हो गया — यह पहला औपचारिक विस्तार था, जिसने इसे केवल एशिया-यूरोप-लैटिन अमेरिका से आगे बढ़ाकर अफ्रीकी महाद्वीप तक पहुंचाया।
- मूल उद्देश्य — पश्चिमी-प्रभुत्व वाली वैश्विक वित्तीय-संस्थाओं (IMF, विश्व बैंक, अध्याय 3, टॉपिक 2) में सुधार की मांग करना, तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक वैकल्पिक मंच बनाना।
- 2024 का ऐतिहासिक विस्तार — 1 जनवरी 2024 से मिस्र, इथियोपिया, ईरान एवं संयुक्त अरब अमीरात (UAE) औपचारिक रूप से ब्रिक्स के सदस्य बने — यह समूह के इतिहास का सबसे बड़ा एकल विस्तार था।
- इंडोनेशिया की सदस्यता (2025) — इंडोनेशिया 2025 में ब्रिक्स में शामिल होने वाला पहला दक्षिण-पूर्व एशियाई देश बना, जिससे ब्रिक्स आज कुल 10 पूर्ण सदस्य देशों (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, इंडोनेशिया) का समूह है।
- वैश्विक महत्व — विस्तारित ब्रिक्स आज विश्व की लगभग 45% जनसंख्या एवं वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP, क्रय-शक्ति समता के आधार पर) के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है — यह G-7 की संयुक्त आर्थिक-शक्ति के करीब पहुंच चुका है।
💡 उदाहरण — BRIC से BRICS+ तक — दो दशकों की यात्रा
जो शब्द 2001 में केवल एक निवेश-रिपोर्ट का संक्षिप्त-रूप था, वह आज एक ऐसा राजनीतिक-आर्थिक मंच बन चुका है, जिसमें शामिल होने के लिए दर्जनों देश कतार में हैं — यह वैश्विक-शक्ति-संतुलन में बहुध्रुवीयता (अध्याय 2, टॉपिक 3) की ओर बदलाव का सबसे ठोस प्रमाण है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ जिम ओ’नील एवं BRIC शब्द (2001) ◆ येकातेरिनबर्ग शिखर सम्मेलन (2009) ◆ 2024 विस्तार — मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE ◆ इंडोनेशिया सदस्यता (2025)
2 ब्रिक्स की संस्थागत संरचना एवं कार्यप्रणाली (Institutional Structure and Functioning of BRICS)
पृष्ठभूमि — ब्रिक्स की सबसे विशिष्ट पहचान यह है कि इसकी कोई स्थायी सचिवालय-भवन या नौकरशाही-ढांचा नहीं है — यह EU (अध्याय 13, टॉपिक 2) की औपचारिक संस्थागत-संरचना से बिल्कुल विपरीत, एक "अनौपचारिक किंतु प्रभावशाली" (Informal Yet Influential) मॉडल है।
संरचना — ब्रिक्स की कार्यप्रणाली
- वार्षिक शिखर सम्मेलन — ब्रिक्स की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि वार्षिक नेता-स्तरीय शिखर सम्मेलन है, जिसकी अध्यक्षता प्रतिवर्ष सदस्य-देशों के बीच घूर्णी (Rotational) आधार पर बदलती है।
- सर्वसम्मति-आधारित निर्णय — WTO (अध्याय 12, टॉपिक 2) एवं आसियान (अध्याय 13, टॉपिक 6) की तरह, ब्रिक्स में भी सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं, कोई बहुमत-मतदान नहीं — यह सुनिश्चित करता है कि सभी सदस्य, चाहे बड़े हों या छोटे, समान रूप से सम्मानित महसूस करें।
- शेरपा प्रणाली (Sherpa System) — प्रत्येक सदस्य-देश का एक "शेरपा" (वरिष्ठ अधिकारी) होता है, जो शिखर सम्मेलन से पहले सभी तकनीकी एवं कूटनीतिक तैयारियों का समन्वय करता है — भारत में विदेश सचिव इस भूमिका को निभाते हैं।
- बहु-स्तरीय सहयोग-तंत्र — शिखर सम्मेलन के अलावा, ब्रिक्स में वित्त-मंत्रियों, विदेश-मंत्रियों, व्यापार-मंत्रियों एवं थिंक-टैंकों (जैसे "ब्रिक्स एकेडमिक फोरम") की नियमित बैठकें होती हैं, जो सहयोग को व्यापक एवं गहरा बनाती हैं।
| ब्रिक्स मॉडल (अनौपचारिक) | EU मॉडल (औपचारिक, अध्याय 13) |
|---|
| ✓ कोई स्थायी सचिवालय नहीं | ✗ स्थायी संस्थाएं (आयोग, संसद) |
| ✓ घूर्णी अध्यक्षता प्रणाली | ✗ कानूनी रूप से बाध्यकारी निर्णय |
| ✓ सर्वसम्मति-आधारित निर्णय | ✗ साझा-नीतियों का संस्थागतकरण |
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ शेरपा प्रणाली ◆ घूर्णी अध्यक्षता ◆ सर्वसम्मति-आधारित निर्णय ◆ ब्रिक्स एकेडमिक फोरम
3 न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) एवं भारत की भूमिका (New Development Bank and Indias Role)
पृष्ठभूमि — 2014 के फोर्टालेज़ा (ब्राज़ील) शिखर सम्मेलन में, ब्रिक्स देशों ने विश्व बैंक एवं IMF (अध्याय 3, टॉपिक 2) के विकल्प के रूप में अपना स्वयं का विकास-वित्त संस्थान — न्यू डेवलपमेंट बैंक (New Development Bank — NDB) — स्थापित करने की घोषणा की।
संरचना — NDB की कार्यप्रणाली एवं विस्तार
- मुख्यालय एवं समान हिस्सेदारी — NDB का मुख्यालय शंघाई, चीन में है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सभी पांच संस्थापक-सदस्यों (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) की इसमें बराबर हिस्सेदारी एवं मताधिकार है — यह IMF (जहां वोटिंग-शक्ति आर्थिक-आकार पर आधारित है) से मौलिक रूप से अलग दृष्टिकोण है।
- भारतीय नेतृत्व — भारत की पूर्व वित्त-मंत्री रहीं (या भारत सरकार से जुड़ी वरिष्ठ अधिकारी) दिलमा रूसेफ (पूर्व ब्राज़ीली राष्ट्रपति) NDB की वर्तमान अध्यक्ष हैं, तथा भारत ने प्रारंभ से ही बैंक की स्थापना एवं संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- भारत में निवेश — NDB ने भारत में रेलवे, नवीकरणीय-ऊर्जा, शहरी-अवसंरचना एवं जल-आपूर्ति जैसी कई परियोजनाओं के लिए अरबों डॉलर का वित्त-पोषण किया है, जो भारत के बुनियादी-ढांचा विकास-लक्ष्यों में सीधे योगदान देता है।
- सदस्यता का विस्तार — बांग्लादेश, मिस्र, UAE जैसे नए सदस्यों के साथ-साथ, हाल ही में कोलंबिया एवं उज़्बेकिस्तान भी NDB में शामिल हुए हैं, जिससे बैंक की कुल सदस्यता 11 देशों तक पहुंच गई है — यह दर्शाता है कि NDB केवल मूल ब्रिक्स-सदस्यों तक सीमित नहीं, बल्कि एक व्यापक वैश्विक-दक्षिण विकास-वित्त संस्थान के रूप में विकसित हो रहा है।
💡 उदाहरण — स्थानीय-मुद्रा वित्त-पोषण की पहल
NDB, अपने ऋणों का एक बढ़ता हिस्सा सदस्य-देशों की स्थानीय-मुद्राओं (जैसे भारतीय रुपया) में देने का प्रयास कर रहा है, ताकि डॉलर-निर्भरता कम हो — यह टॉपिक 6 में वर्णित डी-डॉलराइज़ेशन बहस से सीधे जुड़ा हुआ है।
⚠️ NDB बनाम विश्व बैंक/IMF — एक पूरक दृष्टिकोण
भारत NDB को विश्व बैंक/IMF का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक "पूरक" (Complementary) संस्थान मानता है — भारत दोनों प्रणालियों में सक्रिय भागीदार बना रहना चाहता है, जो उसकी बहु-संरेखण कूटनीति (अध्याय 13, टॉपिक 16) के अनुरूप है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) ◆ समान हिस्सेदारी मॉडल ◆ दिलमा रूसेफ अध्यक्ष ◆ स्थानीय-मुद्रा वित्त-पोषण
4 आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (Contingent Reserve Arrangement — CRA)
पृष्ठभूमि — NDB (टॉपिक 3) के साथ-साथ, 2014 के फोर्टालेज़ा शिखर सम्मेलन में ही ब्रिक्स देशों ने एक दूसरा वित्तीय-तंत्र भी स्थापित किया — आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (Contingent Reserve Arrangement — CRA) — जो IMF (अध्याय 3, टॉपिक 2) के आपातकालीन-सहायता तंत्र का एक वैकल्पिक, ब्रिक्स-केंद्रित संस्करण है।
संरचना — CRA की कार्यप्रणाली
- उद्देश्य — यदि कोई ब्रिक्स सदस्य-देश अल्पकालिक विदेशी-मुद्रा (Balance of Payments) संकट का सामना करे, तो CRA उसे तत्काल वित्तीय-सहायता प्रदान कर सकता है, बिना IMF की सशर्त, अक्सर राजनीतिक रूप से संवेदनशील शर्तों (Conditionalities) के।
- कुल आकार एवं योगदान — CRA का कुल आकार 100 अरब डॉलर है, जिसमें चीन का योगदान सबसे बड़ा (41 अरब डॉलर) है, जबकि भारत, रूस एवं ब्राज़ील प्रत्येक 18 अरब डॉलर का योगदान करते हैं, तथा दक्षिण अफ्रीका 5 अरब डॉलर का।
- सीमित उपयोग — व्यवहार में, CRA का अब तक बहुत सीमित उपयोग हुआ है, क्योंकि अधिकांश सदस्य-देशों ने अपने स्वयं के विशाल विदेशी-मुद्रा भंडार (भारत का भंडार अध्याय 3 के संदर्भ में सैकड़ों अरब डॉलर का है) के ज़रिए संकटों का सामना करना प्राथमिकता दी है।
- प्रतीकात्मक महत्व — भले ही व्यावहारिक उपयोग सीमित रहा हो, CRA का अस्तित्व स्वयं में महत्वपूर्ण है — यह दर्शाता है कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब पश्चिमी-नियंत्रित वित्तीय-सुरक्षा-जालों पर पूर्ण रूप से निर्भर नहीं रहना चाहतीं।
| सदस्य देश | CRA योगदान (अरब डॉलर) |
|---|
| चीन | 41 |
| भारत | 18 |
| रूस | 18 |
| ब्राज़ील | 18 |
| दक्षिण अफ्रीका | 5 |
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (CRA) ◆ भुगतान-संतुलन संकट ◆ 100 अरब डॉलर कोष ◆ IMF सशर्तता से मुक्त सहायता
5 ब्रिक्स विस्तार (BRICS+) एवं साझेदार-देश श्रेणी — नए आयाम (BRICS+ Expansion and the New Partner Country Category)
पृष्ठभूमि — 2023 के जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन में सदस्यता-विस्तार (टॉपिक 1) की घोषणा के बाद, 2024 के कज़ान (रूस) शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स ने एक और नवाचार किया — एक बिल्कुल नई "साझेदार-देश" (Partner Country) श्रेणी का सृजन।
संरचना — साझेदार-देश श्रेणी की व्यवस्था
- साझेदार-देश श्रेणी का उद्देश्य — यह उन देशों के लिए एक "प्रतीक्षा-कक्ष" जैसी व्यवस्था है, जो ब्रिक्स से गहरा जुड़ाव चाहते हैं, लेकिन अभी पूर्ण-सदस्यता के लिए तैयार नहीं हैं, या जिनकी सदस्यता पर सर्वसम्मति नहीं बन पाई है।
- साझेदार-देशों की सूची (2026 तक) — बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कज़ाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज़्बेकिस्तान एवं वियतनाम — कुल 10 देशों को यह दर्जा मिल चुका है, जो दर्शाता है कि ब्रिक्स में शामिल होने की वैश्विक-मांग लगातार बढ़ रही है।
- सऊदी अरब की अनिश्चित स्थिति — सऊदी अरब को भी 2024 के विस्तार में आमंत्रित किया गया था, लेकिन उसने अभी तक औपचारिक रूप से पूर्ण-सदस्यता स्वीकार नहीं की है — यह दर्शाता है कि कुछ देश अमेरिका (अध्याय 6, टॉपिक 1) के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने के लिए सतर्क रुख अपना रहे हैं।
- भारत का सतर्क, संतुलित दृष्टिकोण — भारत ने विस्तार का समर्थन किया है, लेकिन साथ ही यह सुनिश्चित करने का प्रयास भी किया है कि ब्रिक्स "चीन-केंद्रित, पश्चिम-विरोधी गुट" के बजाय एक "समावेशी, बहुध्रुवीय" मंच बना रहे — यह भारत की रणनीतिक-स्वायत्तता (अध्याय 5, टॉपिक 8-9) का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब है।
📌 ब्रिक्स विस्तार की समयरेखा
- 2009 —
- 2010 —
- जनवरी 2024 —
- 2024 (कज़ान) —
- 2025 —
- 2026 —
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ साझेदार-देश श्रेणी ◆ कज़ान शिखर सम्मेलन (2024) ◆ सऊदी अरब की अनिश्चित स्थिति ◆ समावेशी बहुध्रुवीय दृष्टिकोण
6 डी-डॉलराइज़ेशन बहस एवं भारत का संतुलित रुख (De-Dollarisation Debate and Indias Balanced Stance)
पृष्ठभूमि — ब्रिक्स से जुड़ी सबसे अधिक चर्चित, किंतु अक्सर गलत-समझी जाने वाली बहस "डी-डॉलराइज़ेशन" (De-Dollarisation) की है — यानी अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं वित्त में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करना।
संरचना — डी-डॉलराइज़ेशन बहस के आयाम
- "नई ब्रिक्स-मुद्रा" की भ्रामक धारणा — मीडिया में अक्सर यह दावा किया जाता है कि ब्रिक्स एक साझा नई मुद्रा (यूरो, अध्याय 13 टॉपिक 1 की तरह) बनाने जा रहा है — यह तथ्यात्मक रूप से गलत है; ब्रिक्स ने कभी भी औपचारिक रूप से ऐसी किसी साझा-मुद्रा का प्रस्ताव नहीं रखा है।
- वास्तविक फोकस — स्थानीय-मुद्रा व्यापार — ब्रिक्स का वास्तविक प्रयास द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय-मुद्राओं (जैसे रुपया-रूबल, युआन-रैंड) के उपयोग को बढ़ावा देना है, ताकि लेन-देन की लागत कम हो एवं डॉलर-आधारित प्रतिबंधों (जैसे रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध) के प्रभाव से बचा जा सके।
- भारत की सतर्कता — भारत ने बार-बार स्पष्ट किया है कि वह डॉलर के विरुद्ध किसी "मुद्रा-युद्ध" का हिस्सा नहीं बनना चाहता — भारतीय विदेश-मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण का लक्ष्य डॉलर को चुनौती देना नहीं, बल्कि व्यापार-सुविधा बढ़ाना है।
- रुपया-व्यापार व्यवस्था (Rupee Trade Arrangement) — भारत ने रूस (अध्याय 6, टॉपिक 5) एवं कुछ अन्य देशों के साथ रुपये में तेल एवं अन्य वस्तुओं के व्यापार की व्यवस्था शुरू की है, जो भारत के अपने राष्ट्रीय-हित (प्रतिबंधों से बचाव, विदेशी-मुद्रा की बचत) पर आधारित है, न कि किसी सामूहिक ब्रिक्स-एजेंडे पर।
⚠️ भारत का संतुलित रुख — क्यों महत्वपूर्ण है
भारत का अमेरिका (अध्याय 6, टॉपिक 1) के साथ गहरा व्यापारिक एवं रणनीतिक संबंध है — इसलिए भारत, ब्रिक्स के डी-डॉलराइज़ेशन एजेंडे में उत्साहपूर्वक भाग तो लेता है, लेकिन इसे कभी भी अमेरिका-विरोधी अभियान के रूप में प्रस्तुत होने से रोकता है — यह रणनीतिक-स्वायत्तता (अध्याय 5) का एक बेहतरीन व्यावहारिक उदाहरण है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ डी-डॉलराइज़ेशन ◆ स्थानीय-मुद्रा व्यापार ◆ रुपया-व्यापार व्यवस्था ◆ रणनीतिक-स्वायत्तता
7 ब्रिक्स में चीन-भारत गतिशीलता — सहयोग एवं प्रतिस्पर्धा (China-India Dynamics within BRICS — Cooperation and Competition)
पृष्ठभूमि — ब्रिक्स के भीतर सबसे जटिल किंतु सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय-गतिशीलता भारत एवं चीन के बीच की है — दोनों देश एक साझा मंच पर सहयोग भी करते हैं, तथा साथ ही सीमा-विवाद (अध्याय 6, टॉपिक 9-11) एवं क्षेत्रीय-प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा भी करते हैं।
संरचना — सहयोग एवं प्रतिस्पर्धा के आयाम
- सहयोग का क्षेत्र — वैश्विक-शासन सुधार — भारत एवं चीन दोनों, IMF/विश्व बैंक में सुधार, वैश्विक दक्षिण के अधिक प्रतिनिधित्व, तथा पश्चिमी-प्रभुत्व को चुनौती देने के व्यापक लक्ष्य पर सहमत हैं — यह साझा-हित उन्हें ब्रिक्स में सहयोग करने के लिए प्रेरित करता है, भले ही द्विपक्षीय तनाव कितना भी हो।
- प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र — नेतृत्व की होड़ — चीन, अपनी बड़ी अर्थव्यवस्था एवं वित्तीय-योगदान (जैसे CRA में सबसे बड़ा हिस्सा, टॉपिक 4) के आधार पर ब्रिक्स में एक अनौपचारिक नेतृत्व-भूमिका चाहता है, जबकि भारत यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि ब्रिक्स "चीन का मंच" न बनकर एक वास्तविक बहु-ध्रुवीय समूह बना रहे।
- विस्तार पर मतभेद — भारत ने विस्तार (टॉपिक 1, 5) का समर्थन तो किया, लेकिन कुछ रिपोर्टों के अनुसार भारत यह सुनिश्चित करना चाहता था कि विस्तार बहुत तेज़ या बहुत एकतरफा (चीन के भू-राजनीतिक साझेदारों के पक्ष में) न हो।
- व्यावहारिक सह-अस्तित्व का मॉडल — भारत-चीन संबंध ब्रिक्स में इस सिद्धांत का उदाहरण है कि द्विपक्षीय तनाव, बहुपक्षीय-सहयोग को पूरी तरह बाधित नहीं करता — जैसे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भी दोनों देश एक साथ सक्रिय रहते हैं, भले ही सीमा पर तनाव बना रहे।
| सहयोग के क्षेत्र | प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र |
|---|
| ✓ वैश्विक-वित्तीय-शासन सुधार | ✗ नेतृत्व एवं प्रभाव की होड़ |
| ✓ NDB एवं CRA में साझा भागीदारी | ✗ विस्तार-गति एवं दिशा पर मतभेद |
| ✓ वैश्विक दक्षिण के साझा हित | ✗ सीमा-विवाद का साया (अध्याय 6) |
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ सहयोग-प्रतिस्पर्धा दोहरा संबंध ◆ नेतृत्व की होड़ ◆ व्यावहारिक सह-अस्तित्व मॉडल ◆ शंघाई सहयोग संगठन (SCO)
8 भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता (2021) एवं आगामी 2026 अध्यक्षता (Indias BRICS Chairmanship — 2021 and the Upcoming 2026 Chairmanship)
पृष्ठभूमि — भारत ने 2021 में ब्रिक्स की अपनी 13वीं शिखर-अध्यक्षता (कोविड-19 महामारी के दौरान, अध्याय 3 के व्यापक संदर्भ में) सफलतापूर्वक संचालित की, तथा जुलाई 2025 के रियो शिखर सम्मेलन में भारत को 2026 की अध्यक्षता एवं 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी सौंपी गई।
संरचना — भारत की अध्यक्षता की प्राथमिकताएं
- 2021 अध्यक्षता की उपलब्धियां — भारत ने "निरंतरता, समेकन एवं सर्वसम्मति" (Continuity, Consolidation and Consensus) के सिद्धांत के तहत अध्यक्षता की, तथा आतंकवाद-रोधी सहयोग एवं टीका-अनुसंधान सहयोग पर विशेष ज़ोर दिया।
- 2026 अध्यक्षता की घोषणा — प्रधानमंत्री मोदी ने रियो डी जेनेरो में हुए 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (जुलाई 2025) में घोषणा की कि भारत ब्रिक्स को "एक नई दिशा" देगा, तथा 2026 में 18वें ब्रिक्स नेता-शिखर सम्मेलन की मेज़बानी करेगा।
- भारत की अपेक्षित प्राथमिकताएं — विश्लेषकों के अनुसार, भारत की 2026 अध्यक्षता में बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था (अध्याय 2) को मज़बूत करना, वैश्विक-दक्षिण की आवाज़ (टॉपिक 13) को और सशक्त बनाना, तथा NDB एवं CRA (टॉपिक 3-4) की भूमिका का विस्तार जैसे विषय केंद्र में रहने की संभावना है।
- भारत की सर्वसम्मति-निर्माण की भूमिका — विश्लेषकों का मानना है कि भारत का सर्वसम्मति-आधारित मॉडल (Consensus-Driven Model) उसे ब्राज़ील एवं अन्य सदस्यों के साथ मिलकर, ब्रिक्स के एजेंडे को चीन के एकतरफा प्रभाव से बचाने की क्षमता देता है।
💡 उदाहरण — 2026 — भारत के लिए एक दोहरा अवसर
यह उल्लेखनीय है कि 2026 में भारत एक साथ ब्रिक्स की अध्यक्षता करेगा तथा अपनी व्यापक बहुपक्षीय-कूटनीति (G-20, टॉपिक 9-12 सहित) को भी आगे बढ़ाएगा — यह भारत की वैश्विक-मंचों पर बढ़ती केंद्रीयता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ भारत की 2021 अध्यक्षता ◆ 17वां शिखर सम्मेलन, रियो (2025) ◆ भारत की 2026 अध्यक्षता ◆ सर्वसम्मति-निर्माण भूमिका
9 G-20 — गठन, संरचना एवं वित्त-मंत्री स्तर से नेता-स्तर तक विकास (G-20 — Formation, Structure and Evolution from Finance Ministers to Leaders Level)
पृष्ठभूमि — हुक कहानी में वर्णित 2008 के वैश्विक वित्तीय-संकट (अध्याय 3, टॉपिक 8) से पहले, G-20 केवल वित्त-मंत्रियों एवं केंद्रीय-बैंक गवर्नरों का एक अपेक्षाकृत कम-चर्चित तकनीकी-मंच था, जिसकी स्थापना 1999 में एशियाई वित्तीय-संकट (1997-98) के सबक से हुई थी।
संरचना — G-20 का विकास एवं वर्तमान स्वरूप
- 1999 — वित्त-मंत्री स्तर पर स्थापना — G-7 (अमेरिका, जापान, जर्मनी, यूके, फ्रांस, इटली, कनाडा) के वित्त-मंत्रियों ने प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं (भारत, चीन, ब्राज़ील सहित) को शामिल कर एक व्यापक मंच बनाया।
- 2008 — नेता-स्तर पर उन्नयन — वैश्विक वित्तीय-संकट की गंभीरता को देखते हुए, पहला G-20 नेता-शिखर सम्मेलन वाशिंगटन डीसी में आयोजित हुआ — यह क्षण, वैश्विक-आर्थिक-शासन में G-7 के एकाधिकार के अंत एवं उभरती-अर्थव्यवस्थाओं के केंद्र-मंच पर आगमन का प्रतीक बन गया।
- सदस्यता एवं प्रतिनिधित्व — G-20 में 19 देश, यूरोपीय संघ (अध्याय 13) एवं अब अफ्रीकी संघ (टॉपिक 12) शामिल हैं — यह मिलकर विश्व की लगभग 85% अर्थव्यवस्था, 75% व्यापार एवं दो-तिहाई जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- व्यापक एजेंडा-विस्तार — शुरुआत में केवल वित्तीय-स्थिरता पर केंद्रित G-20 का एजेंडा अब जलवायु-परिवर्तन (अध्याय 16), डिजिटल-अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, महिला-सशक्तिकरण एवं सतत-विकास लक्ष्यों (SDG) तक फैल चुका है।
💡 उदाहरण — G-20 का महत्व — एक तुलनात्मक दृष्टिकोण
जहां संयुक्त राष्ट्र (अध्याय 11) सार्वभौमिक-सदस्यता वाला किंतु अक्सर वीटो-गतिरोध (टॉपिक 7, अध्याय 11) से ग्रस्त मंच है, वहीं G-20 एक छोटा, अधिक व्यावहारिक समूह है, जो तेज़ी से वैश्विक-आर्थिक-निर्णय ले सकता है — यही कारण है कि इसे "वैश्विक-आर्थिक-शासन का प्रमुख मंच" (Premier Forum for Global Economic Governance) कहा जाता है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ 1999 वित्त-मंत्री स्तर स्थापना ◆ 2008 वाशिंगटन नेता-शिखर सम्मेलन ◆ वैश्विक-आर्थिक-शासन का प्रमुख मंच ◆ एजेंडा-विस्तार
10 G-20 ट्रोइका प्रणाली एवं कार्यप्रणाली (G-20 Troika System and Functioning)
पृष्ठभूमि — G-20 की अध्यक्षता प्रतिवर्ष घूर्णी आधार पर बदलती है (ब्रिक्स, टॉपिक 2 की तरह), लेकिन इसकी निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए एक विशेष "ट्रोइका" (Troika) व्यवस्था अपनाई जाती है।
संरचना — ट्रोइका एवं अन्य कार्यप्रणाली तत्व
- ट्रोइका का अर्थ — किसी भी समय, तीन देश एक साथ मिलकर G-20 की अध्यक्षता-प्रक्रिया का नेतृत्व करते हैं — वर्तमान अध्यक्ष, पिछला अध्यक्ष एवं अगला अध्यक्ष — ताकि एजेंडे में निरंतरता एवं अनुभव का हस्तांतरण सुनिश्चित हो।
- भारत का ट्रोइका-अनुभव — भारत की 2023 अध्यक्षता (टॉपिक 11) के दौरान, ट्रोइका में इंडोनेशिया (2022 अध्यक्ष) एवं ब्राज़ील (2024 अध्यक्ष) शामिल थे — इसने भारत को दोनों वैश्विक-दक्षिण देशों के अनुभव से लाभ उठाने का अवसर दिया।
- शेरपा एवं वित्त-ट्रैक — G-20 में दो समानांतर कार्य-धाराएं हैं — "शेरपा ट्रैक" (राजनीतिक, विकास एवं सामाजिक मुद्दे) एवं "वित्त ट्रैक" (वित्त-मंत्री एवं केंद्रीय-बैंक गवर्नर, मैक्रो-आर्थिक मुद्दे) — भारत में विदेश-सचिव स्तर के अधिकारी शेरपा एवं वित्त-मंत्रालय के अधिकारी वित्त-ट्रैक का नेतृत्व करते हैं।
- सहभागी समूह (Engagement Groups) — G-20 में सरकारी-ट्रैक के अलावा, नागरिक-समाज (C20), व्यापार (B20), युवा (Y20), महिला (W20), थिंक-टैंक (T20) जैसे कई गैर-सरकारी सहभागी-समूह भी सक्रिय रहते हैं, जो व्यापक हितधारकों की आवाज़ को नीति-निर्माण में शामिल करते हैं।
| सहभागी-समूह | प्रतिनिधित्व |
|---|
| B20 | व्यापार एवं उद्योग-जगत |
| C20 | नागरिक-समाज संगठन |
| T20 | थिंक-टैंक एवं शोध-संस्थान |
| W20 | महिला-सशक्तिकरण संगठन |
| Y20 | युवा-प्रतिनिधि |
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ ट्रोइका प्रणाली ◆ शेरपा ट्रैक बनाम वित्त ट्रैक ◆ सहभागी समूह (B20, C20, T20) ◆ निरंतरता एवं अनुभव-हस्तांतरण
11 भारत की G-20 अध्यक्षता (2023) — थीम, प्राथमिकताएं एवं आयोजन (Indias G-20 Presidency 2023 — Theme, Priorities and Organisation)
पृष्ठभूमि — 1 दिसंबर 2022 से 30 नवंबर 2023 तक, भारत ने अपने इतिहास की सबसे बड़ी कूटनीतिक-मेज़बानी में से एक — G-20 की अध्यक्षता — संभाली, जो 9-10 सितंबर 2023 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित नेता-शिखर सम्मेलन में परिणत हुई।
संरचना — भारत की अध्यक्षता के प्रमुख पहलू
- थीम — "वसुधैव कुटुंबकम: एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य" (Vasudhaiva Kutumbakam — One Earth, One Family, One Future) — यह प्राचीन भारतीय दर्शन (उपनिषदों से लिया गया) को आधुनिक वैश्विक-कूटनीति से जोड़ने का एक अनूठा प्रयास था।
- अभूतपूर्व भौगोलिक-विस्तार — भारत ने परंपरा से हटकर, अध्यक्षता की बैठकें केवल दिल्ली में केंद्रित करने के बजाय, देश के 60 से अधिक शहरों में 200 से अधिक बैठकें आयोजित कीं — यह "जन-भागीदारी" (Jan Bhagidari) की भावना से प्रेरित था, ताकि आम नागरिक भी G-20 से जुड़ाव महसूस करें।
- प्राथमिकताएं — भारत ने अपनी अध्यक्षता में सतत-विकास लक्ष्यों (SDG) में तेज़ी, हरित-विकास (Green Development), डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (अध्याय 13, टॉपिक 14), महिला-नेतृत्व वाला विकास (Women-Led Development) एवं बहुपक्षीय-संस्थाओं में सुधार को प्राथमिकता दी।
- भू-राजनीतिक चुनौती — यूक्रेन-रूस युद्ध — भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक-चुनौती रूस-यूक्रेन युद्ध पर सर्वसम्मति बनाना था, क्योंकि पश्चिमी देश एवं रूस-चीन के बीच गहरे मतभेद थे — भारत ने भाषा को इस तरह तैयार किया कि सभी 20 सदस्य "दिल्ली घोषणापत्र" (टॉपिक 12) पर सहमत हो सकें, जो स्वयं में एक बड़ी कूटनीतिक-उपलब्धि मानी गई।
📌 भारत की G-20 अध्यक्षता की समयरेखा
- 1 दिसंबर 2022 —
- 2022-2023 —
- 9-10 सितंबर 2023 —
- 30 नवंबर 2023 —
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ वसुधैव कुटुंबकम थीम ◆ जन-भागीदारी दृष्टिकोण ◆ भारत मंडपम शिखर सम्मेलन ◆ दिल्ली घोषणापत्र सर्वसम्मति
12 भारत की G-20 उपलब्धियां — अफ्रीकी संघ की स्थायी सदस्यता, दिल्ली घोषणापत्र, IMEC (Indias G-20 Achievements — African Union Permanent Membership, Delhi Declaration, IMEC)
पृष्ठभूमि — भारत की अध्यक्षता को व्यापक रूप से G-20 के इतिहास की सबसे सफल अध्यक्षताओं में गिना जाता है, जिसने 87 परिणाम-दस्तावेज़ों (Outcomes) एवं 118 स्वीकृत-दस्तावेज़ों के साथ एक रिकॉर्ड स्थापित किया।
संरचना — तीन ऐतिहासिक उपलब्धियां
- अफ्रीकी संघ (African Union) की स्थायी सदस्यता — भारत के प्रस्ताव पर, सभी G-20 सदस्यों ने सर्वसम्मति से 55 देशों वाले अफ्रीकी संघ को G-20 का स्थायी सदस्य बनाने पर सहमति जताई — यह EU (अध्याय 13) के बाद G-20 का स्थायी सदस्य बनने वाला दूसरा क्षेत्रीय-संगठन है, जिसने प्रभावी रूप से G-20 को वैश्विक जनसंख्या के 80% तक विस्तारित कर दिया।
- दिल्ली घोषणापत्र (New Delhi Declaration) — यूक्रेन-युद्ध (टॉपिक 11) पर गहरे मतभेदों के बावजूद, भारत ने एक ऐसा संतुलित घोषणापत्र तैयार करने में सफलता पाई, जिस पर सभी 20 सदस्यों ने सर्वसम्मति दिखाई — यह भारत की कूटनीतिक-कुशलता एवं "पुल-निर्माता" (Bridge-Builder) की भूमिका (अध्याय 5, टॉपिक 9) का प्रत्यक्ष प्रमाण था।
- भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) — दिल्ली शिखर सम्मेलन के दौरान भारत, अमेरिका, सऊदी अरब, UAE एवं EU (अध्याय 7, टॉपिक 1 में विस्तृत विवरण) ने संयुक्त रूप से इस बहु-मॉडल कनेक्टिविटी-गलियारे की घोषणा की, जो भारत को रेल एवं समुद्री-मार्ग से खाड़ी होते हुए यूरोप से जोड़ने का महत्वाकांक्षी प्रस्ताव है।
- अन्य उल्लेखनीय पहलें — वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन (Global Biofuels Alliance) की शुरुआत, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना पर वैश्विक-भंडार (DPI Repository) की स्थापना, तथा क्रिप्टो-परिसंपत्तियों पर एक समन्वित वैश्विक-नीति ढांचे पर सहमति — ये सभी भारत की अध्यक्षता की ठोस विरासत का हिस्सा हैं।
| उपलब्धि | महत्व |
|---|
| अफ्रीकी संघ की स्थायी सदस्यता | G-20 को 80% वैश्विक जनसंख्या तक विस्तार |
| दिल्ली घोषणापत्र | सर्वसम्मति की कूटनीतिक-सफलता |
| IMEC गलियारा | कनेक्टिविटी एवं भू-आर्थिक रणनीति |
| वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन | ऊर्जा-संक्रमण सहयोग |
⚠️ परीक्षा दृष्टिकोण से महत्व
भारत की G-20 अध्यक्षता की उपलब्धियों को RAS Mains में अक्सर "भारत की बहुपक्षीय कूटनीति की सफलता" के प्रमुख उदाहरण के रूप में पूछा जाता है — अफ्रीकी संघ की सदस्यता एवं दिल्ली घोषणापत्र, दोनों को याद रखना अनिवार्य है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ अफ्रीकी संघ स्थायी सदस्यता ◆ दिल्ली घोषणापत्र ◆ भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) ◆ वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन
13 वैश्विक दक्षिण की आवाज़ — Voice of Global South Summit शृंखला (Voice of Global South — The Summit Series)
पृष्ठभूमि — अपनी G-20 अध्यक्षता (टॉपिक 11) शुरू होने से ठीक पहले, भारत ने जनवरी 2023 में एक अभूतपूर्व पहल की — "वॉयस ऑफ़ ग्लोबल साउथ समिट" (Voice of Global South Summit) का आयोजन, जिसमें 125 से अधिक विकासशील देशों को आमंत्रित किया गया।
संरचना — पहल का उद्देश्य एवं विकास
- पहला शिखर सम्मेलन (जनवरी 2023) — भारत ने वर्चुअल-प्रारूप में यह सम्मेलन आयोजित किया, ताकि G-20 अध्यक्षता के दौरान भारत, विकासशील एवं वैश्विक-दक्षिण देशों (जो स्वयं G-20 के सदस्य नहीं हैं) की चिंताओं एवं प्राथमिकताओं को भी शिखर-एजेंडे में शामिल कर सके।
- दूसरा शिखर सम्मेलन (नवंबर 2023) — G-20 शिखर सम्मेलन (टॉपिक 11-12) की समाप्ति के तुरंत बाद, भारत ने दूसरा वॉयस ऑफ़ ग्लोबल साउथ समिट आयोजित किया, ताकि दिल्ली शिखर सम्मेलन के परिणामों को वैश्विक-दक्षिण के अन्य देशों तक पहुंचाया जा सके एवं उनकी प्रतिक्रिया ली जा सके।
- DAKSHIN — वैश्विक दक्षिण उत्कृष्टता केंद्र — पहले शिखर सम्मेलन (जनवरी 2023) में की गई घोषणा के अनुरूप, भारत ने "DAKSHIN" (Development and Knowledge Sharing Initiative) नामक एक वैश्विक उत्कृष्टता-केंद्र स्थापित किया, जो विकासशील देशों के लिए ज्ञान-भंडार एवं नीति-थिंक-टैंक के रूप में कार्य करता है, तथा सतत-विकास लक्ष्यों (SDG, एजेंडा 2030) की स्थानीय-स्तर पर प्राप्ति में सहयोग देता है।
- "पुल-निर्माता" की भूमिका को संस्थागत रूप — यह पहल भारत की उस दीर्घकालिक भूमिका को औपचारिक रूप देती है, जिसके तहत भारत स्वयं को विकसित एवं विकासशील विश्व के बीच एक "सेतु" (Bridge) के रूप में प्रस्तुत करता है — यह भूमिका गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM, अध्याय 5, टॉपिक 1) की ऐतिहासिक विरासत का ही आधुनिक विस्तार है।
💡 उदाहरण — DAKSHIN की व्यावहारिक भूमिका
DAKSHIN, वैश्विक-दक्षिण के देशों को स्केलेबल एवं सतत समाधान खोजने तथा लागू करने में सहायता प्रदान करता है — जैसे डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (UPI मॉडल, अध्याय 13 टॉपिक 14) को अन्य विकासशील देशों तक पहुंचाना, या जलवायु-अनुकूल कृषि-तकनीकों का आदान-प्रदान करना।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ वॉयस ऑफ़ ग्लोबल साउथ समिट ◆ DAKSHIN उत्कृष्टता-केंद्र ◆ सेतु/पुल-निर्माता भूमिका ◆ एजेंडा 2030 एवं SDG
14 ब्रिक्स बनाम G-20 — भारत की दोहरी सदस्यता की रणनीतिक अहमियत (BRICS vs G-20 — Strategic Significance of Indias Dual Membership)
पृष्ठभूमि — भारत उन गिने-चुने देशों में से एक है, जो ब्रिक्स एवं G-20 — दोनों प्रमुख वैश्विक-आर्थिक-शासन मंचों का सक्रिय, संस्थापक या प्रमुख सदस्य है — यह दोहरी-सदस्यता भारत को एक अनूठी रणनीतिक-स्थिति प्रदान करती है।
संरचना — दोनों मंचों की तुलना
- सदस्यता का अंतर — ब्रिक्स एक विशिष्ट, "उभरती एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाओं" का समूह है (टॉपिक 1), जबकि G-20 में विकसित (G-7, टॉपिक 9) एवं विकासशील दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं — यह भारत को दोनों प्रकार के देशों के साथ सीधा संवाद-मंच देता है।
- कार्यक्षेत्र का अंतर — ब्रिक्स मुख्यतः वैकल्पिक-वित्तीय-संस्थाओं (NDB, CRA, टॉपिक 3-4) एवं पश्चिमी-प्रभुत्व को चुनौती देने पर केंद्रित है, जबकि G-20 मुख्यधारा वैश्विक-आर्थिक-नीति समन्वय (जैसे मुद्रास्फीति, व्यापार, जलवायु-वित्त) पर केंद्रित है।
- भारत के लिए "दोहरा-लाभ" — भारत, ब्रिक्स में अपनी उभरती-शक्ति की पहचान एवं वैश्विक दक्षिण नेतृत्व (टॉपिक 13) को मज़बूत करता है, जबकि G-20 में वह एक ज़िम्मेदार, वैश्विक-शासन में योगदान देने वाली "मुख्यधारा" शक्ति के रूप में स्थापित होता है — यह दोहरी-पहचान (Dual Identity) भारत की विदेश-नीति की एक अनूठी विशेषता है।
- 2026 का विशेष संयोग — जैसा टॉपिक 8 में बताया गया, भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है — यह संयोग भारत को एक ही वर्ष में दोनों प्रकार के वैश्विक-मंचों पर अपनी नेतृत्व-क्षमता प्रदर्शित करने का दुर्लभ अवसर देता है।
| आयाम | ब्रिक्स | G-20 |
|---|
| सदस्यता-प्रकार | उभरती/विकासशील अर्थव्यवस्थाएं | विकसित एवं विकासशील दोनों |
| मुख्य फोकस | वैकल्पिक वित्तीय-संस्थाएं | मुख्यधारा आर्थिक-नीति समन्वय |
| भारत की भूमिका | उभरती-शक्ति एवं वैश्विक-दक्षिण नेता | ज़िम्मेदार वैश्विक-शासन सहभागी |
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ दोहरी सदस्यता की रणनीति ◆ दोहरी पहचान (Dual Identity) ◆ उभरती-शक्ति बनाम मुख्यधारा-शक्ति ◆ 2026 दोहरा-नेतृत्व अवसर
15 समग्र मूल्यांकन एवं भविष्य की दिशा (Overall Assessment and Future Direction)
पृष्ठभूमि — इस अध्याय में पढ़े गए दोनों मंचों — ब्रिक्स एवं G-20 — को एक साथ रखकर देखने पर, भारत की बहुपक्षीय-आर्थिक-कूटनीति की एक व्यापक, सुसंगत तस्वीर उभरती है।
संरचना — पांच व्यापक निष्कर्ष
- भारत — एक साथ "चुनौती-देने वाला" एवं "सुधारक" — ब्रिक्स में भारत पश्चिमी-वित्तीय-प्रभुत्व को चुनौती देने वाले (Challenger) के रूप में कार्य करता है, जबकि G-20 में वह मौजूदा वैश्विक-आर्थिक-व्यवस्था को सुधारने वाले (Reformer) के रूप में — यह दोहरी भूमिका किसी भी अन्य वैश्विक-शक्ति के लिए दुर्लभ है।
- सर्वसम्मति-निर्माण भारत की मूल-शक्ति है — चाहे ब्रिक्स में विस्तार पर सहमति (टॉपिक 5, 7) हो या G-20 में यूक्रेन-युद्ध पर दिल्ली घोषणापत्र (टॉपिक 11-12) — दोनों ही मामलों में भारत की "पुल-निर्माता" क्षमता (अध्याय 5, टॉपिक 9) निर्णायक साबित हुई है।
- रणनीतिक-स्वायत्तता का निरंतर सिद्धांत — डी-डॉलराइज़ेशन (टॉपिक 6) पर भारत का सतर्क रुख एवं ब्रिक्स के विस्तार में संतुलन बनाए रखने का प्रयास (टॉपिक 5, 7), दोनों दिखाते हैं कि भारत किसी भी मंच को पूरी तरह से पश्चिम-विरोधी या चीन-केंद्रित बनने से रोकने का प्रयास करता है।
- वैश्विक दक्षिण नेतृत्व एक स्थायी प्राथमिकता — Voice of Global South (टॉपिक 13) एवं G-20 में अफ्रीकी संघ की सदस्यता (टॉपिक 12) दोनों दर्शाते हैं कि भारत, अपनी बढ़ती वैश्विक-शक्ति का उपयोग स्वयं के लिए ही नहीं, बल्कि व्यापक विकासशील-विश्व के प्रतिनिधित्व के लिए भी करता है।
- भविष्य की चुनौतियां — 2026 में भारत की ब्रिक्स-अध्यक्षता (टॉपिक 8), बढ़ता ब्रिक्स+ विस्तार, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा (अध्याय 2) का दबाव, तथा जलवायु-वित्त (अध्याय 16) जैसे मुद्दे आने वाले वर्षों में दोनों मंचों पर भारत की कूटनीतिक-कुशलता की गहन परीक्षा लेंगे।
💡 उदाहरण — अगले अध्याय से जुड़ाव
यह अध्याय भारत की बहुपक्षीय-आर्थिक-कूटनीति (अध्याय 3, 12, 13) की एक महत्वपूर्ण कड़ी है — अगले अध्याय 15 में हम देखेंगे कि भारत किस तरह क्वाड, I2U2 एवं AUKUS जैसे छोटे, अधिक चुस्त "मिनीलेटरल" मंचों के ज़रिए, ब्रिक्स एवं G-20 जैसी बड़ी बहुपक्षीय-संस्थाओं से परे, अपनी रणनीतिक-साझेदारियों का एक नया आयाम विकसित कर रहा है।
⚠️ परीक्षा दृष्टिकोण से महत्व
RAS Mains में इस विषय से जुड़े प्रश्न प्रायः "भारत की G-20 अध्यक्षता की उपलब्धियां" या "ब्रिक्स के विस्तार का भारत के लिए महत्व" के रूप में पूछे जाते हैं — उत्तर में नवीनतम आंकड़ों (जैसे 2024-2025 का विस्तार, 2026 की अध्यक्षता) का उल्लेख अनिवार्य है।
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
◆ चुनौती-देने वाला बनाम सुधारक ◆ पुल-निर्माता क्षमता ◆ वैश्विक दक्षिण नेतृत्व ◆ रणनीतिक-स्वायत्तता का सिद्धांत
📌 अध्याय सार (Chapter Summary)
- 1. ब्रिक्स की उत्पत्ति 2001 में जिम ओ’नील के आर्थिक-विश्लेषण से हुई, जो 2009 के पहले शिखर सम्मेलन से 2024-25 के ऐतिहासिक विस्तार (मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, इंडोनेशिया) तक 10-सदस्यीय BRICS+ के रूप में विकसित हुई।
- 2. ब्रिक्स एक अनौपचारिक, सचिवालय-रहित, सर्वसम्मति-आधारित मॉडल पर काम करता है, जो घूर्णी-अध्यक्षता एवं शेरपा-प्रणाली के ज़रिए संचालित होता है।
- 3. न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) एवं आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (CRA) ब्रिक्स के दो प्रमुख वित्तीय-स्तंभ हैं, जो IMF/विश्व बैंक के पूरक विकल्प के रूप में कार्य करते हैं।
- 4. 2024 के कज़ान शिखर सम्मेलन में बनी "साझेदार-देश" श्रेणी दर्शाती है कि ब्रिक्स में शामिल होने की वैश्विक-मांग लगातार बढ़ रही है, हालांकि सऊदी अरब जैसे कुछ देश अभी भी अनिर्णीत हैं।
- 5. डी-डॉलराइज़ेशन बहस में भारत, स्थानीय-मुद्रा व्यापार का समर्थन तो करता है, लेकिन किसी "मुद्रा-युद्ध" या अमेरिका-विरोधी अभियान से सतर्क दूरी बनाए रखता है।
- 6. ब्रिक्स में भारत-चीन संबंध सहयोग (वैश्विक-शासन सुधार) एवं प्रतिस्पर्धा (नेतृत्व की होड़) का एक जटिल मिश्रण है, जो द्विपक्षीय सीमा-तनाव के बावजूद बहुपक्षीय-सहयोग को बाधित नहीं करता।
- 7. भारत ने 2021 में ब्रिक्स की सफल अध्यक्षता की, तथा 2025 के रियो शिखर सम्मेलन में उसे 2026 की अध्यक्षता एवं 18वें शिखर सम्मेलन की मेज़बानी सौंपी गई है।
- 8. G-20 की स्थापना 1999 में वित्त-मंत्री स्तर पर हुई, लेकिन 2008 के वैश्विक वित्तीय-संकट ने इसे नेता-स्तरीय मंच में बदल दिया, जो आज विश्व की 85% अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है।
- 9. G-20 की ट्रोइका-प्रणाली (पिछला, वर्तमान एवं अगला अध्यक्ष) तथा B20/C20/T20 जैसे सहभागी-समूह इसकी कार्यप्रणाली को निरंतरता एवं व्यापक-हितधारक-भागीदारी प्रदान करते हैं।
- 10. भारत की 2023 G-20 अध्यक्षता — "वसुधैव कुटुंबकम" थीम, जन-भागीदारी दृष्टिकोण एवं दिल्ली शिखर सम्मेलन के साथ — व्यापक रूप से G-20 इतिहास की सबसे सफल अध्यक्षताओं में गिनी जाती है।
- 11. भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में अफ्रीकी संघ की स्थायी G-20 सदस्यता, यूक्रेन-युद्ध पर सर्वसम्मति वाला दिल्ली घोषणापत्र, तथा IMEC आर्थिक-गलियारे की घोषणा शामिल हैं।
- 12. Voice of Global South Summit शृंखला (2023) एवं DAKSHIN उत्कृष्टता-केंद्र भारत की वैश्विक-दक्षिण नेतृत्व की भूमिका को संस्थागत रूप देते हैं।
- 13. ब्रिक्स एवं G-20 में भारत की दोहरी सदस्यता उसे "उभरती-शक्ति" एवं "मुख्यधारा वैश्विक-शासन सहभागी" — दोनों पहचान एक साथ बनाए रखने का दुर्लभ रणनीतिक-अवसर देती है, जो 2026 में और स्पष्ट होगा जब भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता करेगा।