सरल भाषा में समझें — द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) खत्म होते ही, जिन दो देशों ने सबसे ज़्यादा ताकत हासिल की — संयुक्त राज्य अमेरिका (पूँजीवाद एवं लोकतंत्र का समर्थक) एवं सोवियत संघ (साम्यवाद एवं एक-दलीय शासन का समर्थक) — वे एक-दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंद्वी बन गए। इसे "युद्ध" तो कहा गया, लेकिन "शीत" (ठंडा) इसलिए, क्योंकि इन दोनों महाशक्तियों ने कभी एक-दूसरे पर सीधे गोली नहीं चलाई — यह लड़ाई विचारधारा, प्रचार, जासूसी, हथियारों की होड़ एवं परोक्ष (Proxy) युद्धों के ज़रिए लड़ी गई। सरल उदाहरण से समझें तो जैसे दो प्रतिद्वंद्वी टीमें सीधे मैदान में भिड़े बिना, अपने-अपने समर्थकों के ज़रिए एक-दूसरे को हराने की कोशिश करें — शीत युद्ध कुछ वैसा ही था, बस स्तर पूरी दुनिया का था।
यह शीत युद्ध का सबसे खतरनाक क्षण था — जब सोवियत संघ ने क्यूबा (अमेरिका के ठीक पड़ोस) में परमाणु मिसाइलें तैनात करने की कोशिश की, तो दुनिया 13 दिनों तक परमाणु युद्ध के कगार पर खड़ी रही। अंततः बातचीत से संकट टला, लेकिन इसने दिखाया कि शीत युद्ध कितना विनाशकारी मोड़ ले सकता था।
◆ शीत युद्ध ◆ NATO ◆ वारसा संधि ◆ हथियारों की होड़ ◆ अंतरिक्ष होड़ ◆ प्रॉक्सी युद्ध ◆ गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) ◆ क्यूबा मिसाइल संकट
पृष्ठभूमि (Background) — द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) की समाप्ति के बाद दुनिया दो महाशक्तियों — संयुक्त राज्य अमेरिका एवं सोवियत संघ (USSR — Union of Soviet Socialist Republics) — के बीच बँट गई थी। यह दौर "शीत युद्ध" (Cold War, 1945-1991) कहलाया, जिसमें दोनों पक्ष सीधा युद्ध तो नहीं लड़ते थे, पर हथियारों की होड़ (Arms Race), जासूसी, प्रचार-युद्ध एवं गुटबंदी के ज़रिए एक-दूसरे को पछाड़ने की कोशिश करते थे। लेकिन 1980 के दशक तक सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में फँस चुकी थी — केंद्रीकृत योजना व्यवस्था (Centrally Planned Economy) नाकाम हो रही थी, अफगानिस्तान युद्ध (1979-89) ने खजाना खाली कर दिया था, और तकनीकी क्षेत्र में सोवियत संघ पश्चिम से काफी पीछे रह गया था।
1985 में मिखाइल गोर्बाचेव (Mikhail Gorbachev) सोवियत संघ के महासचिव (General Secretary) बने। उन्होंने अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए दो बड़े सुधार पेश किए — "ग्लासनोस्त" (Glasnost — खुलापन/पारदर्शिता) एवं "पेरेस्त्रोइका" (Perestroika — पुनर्गठन)। इन सुधारों का उद्देश्य था सेंसरशिप घटाना और अर्थव्यवस्था में सीमित बाज़ार-तत्व लाना, लेकिन इसका उल्टा असर हुआ — जनता को खुलकर असंतोष जताने की आज़ादी मिली और पूर्वी यूरोप के साम्यवादी देशों में स्वतंत्रता की मांग तेज़ हो गई।
महत्वपूर्ण घटनाक्रम — 1988-89 में पोलैंड के "सॉलिडैरिटी" (Solidarity) आंदोलन ने पहला गैर-साम्यवादी चुनाव जिताया; 9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार गिरी; 2-3 दिसंबर 1989 को माल्टा शिखर सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश एवं गोर्बाचेव ने संयुक्त रूप से शीत युद्ध की समाप्ति घोषित की; और 25 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ औपचारिक रूप से 15 स्वतंत्र देशों में विभाजित होकर समाप्त हो गया।
पतन के गहरे कारण (Deeper Causes of Collapse)
आर्थिक अतिविस्तार (Economic Overstretch) — सोवियत संघ अपनी GDP का लगभग 25-40% रक्षा एवं हथियारों पर खर्च कर रहा था, जबकि आम नागरिकों के लिए खाद्यान्न एवं उपभोक्ता वस्तुएँ भी दुर्लभ थीं।
चेरनोबिल परमाणु दुर्घटना (अप्रैल 1986) — इस भीषण दुर्घटना ने सोवियत तकनीकी एवं प्रशासनिक व्यवस्था की खामियाँ खुलकर उजागर कर दीं, तथा गोर्बाचेव के "ग्लासनोस्त" को और बल दिया।
राष्ट्रवाद का उभार — बाल्टिक देशों (लिथुआनिया ने मार्च 1990 में सबसे पहले स्वतंत्रता की घोषणा की, फिर एस्टोनिया एवं लातविया) में सोवियत संघ से अलग होने की मांग तेज़ हुई, जो बाद में अन्य गणराज्यों में भी फैली।
तकनीकी पिछड़ापन — पश्चिम में कंप्यूटर एवं सूचना-तकनीक क्रांति तेज़ी से बढ़ रही थी, जबकि सोवियत केंद्रीकृत व्यवस्था नवाचार (Innovation) में पीछे रह गई।
भूमध्य सागर में एक जहाज़ पर हुई इस बैठक में अमेरिका एवं सोवियत संघ के राष्ट्राध्यक्षों ने कहा कि "दुनिया अब शीत युद्ध के दौर से बाहर निकल रही है" — इसीलिए इसे "शीत युद्ध की कब्र" भी कहा जाता है, जैसे 1945 का याल्टा सम्मेलन (Yalta Conference) शीत युद्ध की शुरुआत का प्रतीक था, ठीक वैसे ही माल्टा सम्मेलन इसके अंत का प्रतीक बना।
| नए स्वतंत्र देश | क्षेत्र |
|---|---|
| रूस, यूक्रेन, बेलारूस | पूर्वी यूरोप |
| एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया | बाल्टिक क्षेत्र |
| कज़ाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिज़स्तान | मध्य एशिया |
| जॉर्जिया, आर्मेनिया, अज़रबैजान | काकेशस क्षेत्र |
| मोल्दोवा | पूर्वी यूरोप |
◆ शीत युद्ध ◆ ग्लासनोस्त ◆ पेरेस्त्रोइका ◆ बर्लिन दीवार ◆ माल्टा सम्मेलन ◆ बेलावेज़ा समझौता ◆ CIS ◆ सोवियत विघटन ◆ द्विध्रुवीयता
पृष्ठभूमि — द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी दो हिस्सों में बँट गया था — पश्चिम जर्मनी (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस के प्रभाव में, पूँजीवादी) एवं पूर्वी जर्मनी (सोवियत प्रभाव में, साम्यवादी)। 1961 में बर्लिन की दीवार बनाकर पूर्वी जर्मनी के नागरिकों का पश्चिम की ओर पलायन रोका गया था। बर्लिन दीवार का गिरना सिर्फ प्रतीकात्मक घटना नहीं थी, बल्कि इसने पूरी पुनर्मिलन प्रक्रिया को गति दी।
नवंबर 1989 में चेकोस्लोवाकिया में साम्यवादी सरकार बिना किसी हिंसा के सत्ता छोड़ने पर मजबूर हुई — इसीलिए इसे "मखमली क्रांति" (Velvet Revolution) कहा गया, जो दिखाता है कि शीत युद्ध की समाप्ति ज़्यादातर देशों में शांतिपूर्ण तरीके से हुई (रोमानिया एक अपवाद था, जहाँ हिंसक क्रांति में राष्ट्रपति चाउशेस्कू को दिसंबर 1989 में सत्ता से हटाया गया)।
भारत की भूमिका/उदाहरण — भारत ने पुनर्मिलित जर्मनी को शीघ्र मान्यता दी एवं कूटनीतिक निरंतरता बनाए रखी। आज भारत-जर्मनी संबंध "सामरिक साझेदारी" (Strategic Partnership, 2000 से) के स्तर पर पहुँच चुके हैं — जर्मनी भारत का यूरोप में सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और दोनों देशों के बीच "कुशल श्रमिक प्रवासन एवं गतिशीलता समझौता" (Migration and Mobility Partnership Agreement, 2022) जैसे हालिया समझौते भारतीय पेशेवरों के लिए जर्मनी में अवसर बढ़ा रहे हैं।
◆ टू-प्लस-फोर संधि ◆ जर्मन एकता दिवस ◆ वारसा संधि ◆ NATO ◆ मखमली क्रांति ◆ 1989 की क्रांतियां ◆ जर्मनी-भारत सामरिक साझेदारी
पृष्ठभूमि — यूगोस्लाविया बाल्कन क्षेत्र (दक्षिण-पूर्वी यूरोप) का एक साम्यवादी संघीय देश था, जिसमें सर्ब, क्रोएट, बोस्नियाई-मुस्लिम, स्लोवेनियाई, मैसिडोनियाई एवं मोंटेनेग्रिन जैसे कई जातीय-धार्मिक समूह एक साथ रहते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के करिश्माई नेता मार्शल टीटो (Marshal Tito) ने अपने व्यक्तित्व एवं सख्त शासन से इन विविध समूहों को दशकों तक एकजुट रखा। 1980 में टीटो की मृत्यु एवं 1991 में शीत युद्ध की समाप्ति — दोनों ने मिलकर दशकों से दबे जातीय-राष्ट्रवाद को बाहर निकाल दिया।
NATO ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्पष्ट मंज़ूरी के बिना ही यूगोस्लाविया पर बमबारी की — इसे "मानवीय हस्तक्षेप" (Humanitarian Intervention) का नाम दिया गया। लेकिन कई देशों (भारत सहित) ने इसे किसी देश की संप्रभुता एवं गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांत का उल्लंघन माना, क्योंकि बिना UNSC अनुमति किसी देश पर सैन्य कार्रवाई अंतर्राष्ट्रीय कानून के विरुद्ध है।
भारत की भूमिका/उदाहरण — भारत ने बाल्कन संकट में संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियान (UNPROFOR) में सैनिक भेजकर योगदान दिया, परंतु NATO की एकतरफा कोसोवो कार्रवाई पर भारत ने खुलकर चिंता जताई — क्योंकि भारत हमेशा से संप्रभुता एवं गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांत का कड़ा समर्थक रहा है (विशेषकर जम्मू-कश्मीर जैसे मुद्दों के संदर्भ में, जहाँ भारत किसी भी बाहरी हस्तक्षेप का कड़ा विरोध करता है)।
◆ यूगोस्लाविया ◆ मार्शल टीटो ◆ बोस्नियाई युद्ध ◆ स्रेब्रेनित्सा नरसंहार ◆ डेटन समझौता ◆ कोसोवो युद्ध ◆ ओह्रिड समझौता ◆ मानवीय हस्तक्षेप
पृष्ठभूमि — जैसे ही सोवियत संघ का पतन हुआ, दुनिया में सिर्फ एक ही महाशक्ति बची — संयुक्त राज्य अमेरिका। अमेरिकी विचारक फ्रांसिस फुकुयामा (Francis Fukuyama) ने 1989 में एक प्रसिद्ध निबंध "The End of History?" लिखा, जिसमें दावा किया गया कि उदार लोकतंत्र (Liberal Democracy) एवं बाज़ार अर्थव्यवस्था (Market Economy) ही मानव सामाजिक-राजनीतिक विकास का अंतिम एवं सर्वोत्तम रूप है।
अगस्त 1990 में जब इराक ने कुवैत पर आक्रमण किया, तो अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश ने संयुक्त राष्ट्र के अधिकार-पत्र के तहत एक बहुराष्ट्रीय गठबंधन बनाया और "न्यू वर्ल्ड ऑर्डर" (New World Order) शब्द गढ़ा। जनवरी-फरवरी 1991 का खाड़ी युद्ध (Gulf War) — जिसे "ऑपरेशन डेज़र्ट स्टॉर्म" कहा गया — अमेरिकी सैन्य वर्चस्व एवं संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से वैश्विक कार्रवाई की क्षमता का पहला बड़ा प्रदर्शन बना।
अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं (IMF, विश्व बैंक) के ज़रिए "वाशिंगटन सहमति" (Washington Consensus) नीतियाँ — निजीकरण, उदारीकरण, वित्तीय अनुशासन — दुनिया भर के विकासशील देशों में फैलाईं।
अमेरिकी डॉलर वैश्विक व्यापार एवं रिज़र्व मुद्रा के रूप में और मज़बूत हुआ, तथा NATO एकमात्र प्रभावी वैश्विक सुरक्षा गठबंधन बन गया।
सांस्कृतिक स्तर पर हॉलीवुड, अंग्रेज़ी भाषा, अमेरिकी उपभोक्ता ब्रांड्स (मैकडॉनल्ड्स, कोका-कोला) का वैश्विक प्रसार तेज़ हुआ — जिसे कुछ विद्वान "सांस्कृतिक साम्राज्यवाद" (Cultural Imperialism) भी कहते हैं।
भारत के लिए यह युद्ध सीधा आर्थिक झटका लेकर आया — खाड़ी देशों से तेल आपूर्ति बाधित हुई, तेल की कीमतें आसमान छू गईं, और खाड़ी में काम कर रहे लाखों भारतीय प्रवासियों की प्रेषण राशि (Remittances) अचानक रुक गई — यही झटका आगे चलकर भारत के 1991 के भुगतान संतुलन संकट (Balance of Payments Crisis) की एक बड़ी वजह बना (विस्तार से टॉपिक 11 में देखें)।
| विश्व व्यवस्था का चरण | समयकाल | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| द्विध्रुवीयता (Bipolarity) | 1945 – 1991 | अमेरिका बनाम सोवियत संघ — दो प्रतिस्पर्धी गुट, हथियारों की होड़ |
| एकध्रुवीयता (Unipolarity) | 1991 – 2008 (लगभग) | अमेरिका एकमात्र महाशक्ति, "नई विश्व व्यवस्था", वाशिंगटन सहमति |
| बहुध्रुवीकरण (Multipolarization) | 2008 (वित्तीय संकट) – वर्तमान (2026) | चीन, भारत, रूस, EU जैसी कई शक्तियों का उदय, BRICS-G20 का बढ़ता महत्व |
एकध्रुवीयता की आलोचना (Criticism of Unipolarity)
कई विद्वानों (जैसे नोम चॉम्स्की) ने अमेरिकी एकध्रुवीय वर्चस्व को "अमेरिकी साम्राज्य" (American Empire) कहकर आलोचना की, यह तर्क देते हुए कि अमेरिका ने अपने आर्थिक-सैन्य प्रभुत्व का उपयोग कमज़ोर देशों पर अनुचित दबाव बनाने में किया।
इराक युद्ध (2003) — जो बिना ठोस संयुक्त राष्ट्र प्राधिकरण के लड़ा गया — एकध्रुवीय वर्चस्व के दुरुपयोग का एक बड़ा उदाहरण माना जाता है, जिसने अमेरिकी विश्वसनीयता को वैश्विक स्तर पर नुकसान पहुँचाया।
कुछ विद्वान इसे "एकाकी महाशक्ति" (Lonely Superpower) की स्थिति भी कहते हैं — शक्ति तो असीम थी, परंतु वैश्विक वैधता (Legitimacy) एवं सहयोग की कमी बनी रही।
◆ एकध्रुवीयता ◆ फुकुयामा ◆ इतिहास का अंत ◆ न्यू वर्ल्ड ऑर्डर ◆ खाड़ी युद्ध ◆ वाशिंगटन सहमति ◆ सांस्कृतिक साम्राज्यवाद ◆ अमेरिकी साम्राज्य ◆ इराक युद्ध 2003
पृष्ठभूमि — सोवियत पतन के बाद पश्चिमी बौद्धिक जगत में इस बात पर गहरी बहस छिड़ गई कि शीत युद्धोत्तर दुनिया की दिशा आखिर क्या होगी। इस बहस के दो सबसे बड़े नाम थे — फ्रांसिस फुकुयामा एवं सैम्युअल हंटिंगटन — दोनों अमेरिकी विचारक, लेकिन दोनों के निष्कर्ष एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत थे।
फुकुयामा ने अपने निबंध "The End of History?" (1989) एवं बाद में पुस्तक (1992) में दावा किया कि उदार लोकतंत्र एवं बाज़ार अर्थव्यवस्था के सामने अब कोई वैचारिक प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा — यानी मानव इतिहास की "वैचारिक यात्रा" यहीं समाप्त हो गई। इसके ठीक उलट, हार्वर्ड के प्रोफेसर सैम्युअल हंटिंगटन ने 1993 में "Foreign Affairs" पत्रिका में "The Clash of Civilizations?" नामक निबंध लिखा, जिसमें दावा किया गया कि भविष्य के संघर्षों का मुख्य आधार विचारधारा या अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि **सभ्यताओं** (पश्चिमी, इस्लामी, हिंदू, कन्फ्यूशियाई, स्लाव-रूढ़िवादी आदि) के बीच सांस्कृतिक टकराव होगा।
लोकतंत्रीकरण की "तीसरी लहर" (Third Wave of Democracy)
हंटिंगटन ने अपनी एक अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक "The Third Wave" (1991) में बताया कि दुनिया में लोकतंत्रीकरण तीन बड़ी "लहरों" में हुआ — पहली लहर 19वीं सदी में, दूसरी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, और तीसरी लहर 1970 के दशक के मध्य से शुरू होकर शीत युद्धोत्तर दौर (1989-91) में अपने चरम पर पहुँची, जब पूर्वी यूरोप, लैटिन अमेरिका एवं अफ्रीका के कई देशों ने सैन्य/एक-दलीय शासन छोड़कर लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाई।
| फुकुयामा का दृष्टिकोण | हंटिंगटन का दृष्टिकोण |
|---|---|
| ✓ उदार लोकतंत्र ही अंतिम एवं सर्वोत्तम शासन-व्यवस्था | ✗ सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक टकराव भविष्य का मुख्य संघर्ष |
| ✓ वैचारिक संघर्षों का अंत | ✗ धर्म एवं सांस्कृतिक पहचान सबसे मज़बूत विभाजक रेखा |
| ✓ पश्चिमीकरण से शांति की उम्मीद | ✗ पश्चिम बनाम गैर-पश्चिम तनाव की आशंका |
भारत जैसा विशाल, बहु-धार्मिक, बहु-भाषी एवं बहु-सभ्यतागत लोकतंत्र स्वयं यह सिद्ध करता है कि हंटिंगटन का "सभ्यताओं का संघर्ष" कोई अनिवार्यता नहीं — विविध सभ्यताएँ एक ही लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व रख सकती हैं। यही भारत की "अनेकता में एकता" (Unity in Diversity) की सबसे बड़ी वैश्विक मिसाल है।
◆ इतिहास का अंत ◆ फुकुयामा ◆ सभ्यताओं का संघर्ष ◆ हंटिंगटन ◆ तीसरी लहर (लोकतंत्रीकरण) ◆ अनेकता में एकता
पृष्ठभूमि — शीत युद्ध के दौरान अमेरिका एवं सोवियत संघ अक्सर एक-दूसरे के प्रस्तावों पर वीटो (Veto) का प्रयोग करते थे, जिससे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) प्रायः निष्क्रिय बनी रहती थी। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद वीटो-प्रतिद्वंद्विता कम हुई और UNSC कहीं अधिक सक्रिय भूमिका निभाने लगी।
रवांडा त्रासदी ने साबित किया कि सिर्फ शांति सेना भेज देना पर्याप्त नहीं — यदि जनादेश (Mandate), संसाधन एवं राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी हो तो सबसे बड़ी सेना भी नरसंहार नहीं रोक सकती। इसी घटना ने आगे चलकर "R2P" सिद्धांत की बुनियाद रखी।
भारत की भूमिका — भारत संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों में सैनिक/पुलिस-बल भेजने वाले सबसे बड़े योगदानकर्ता देशों में से एक रहा है — अब तक 50 से अधिक मिशनों में ढाई लाख से ज़्यादा भारतीय सैनिकों एवं पुलिसकर्मियों ने योगदान दिया है (विस्तार से अध्याय 11 में)। लेकिन भारत R2P सिद्धांत के **दुरुपयोग की आशंका** को लेकर सतर्क रहा है, क्योंकि यह सिद्धांत संप्रभुता (Sovereignty) के मूल सिद्धांत से सीधे टकराता है — भारत का हमेशा से मानना रहा है कि मानवीय हस्तक्षेप के नाम पर किसी देश की आंतरिक संप्रभुता का हनन नहीं होना चाहिए।
◆ UNSC वीटो ◆ शांति स्थापना अभियान ◆ सोमालिया ◆ रवांडा नरसंहार ◆ R2P सिद्धांत ◆ संप्रभुता ◆ गैर-हस्तक्षेप सिद्धांत
पृष्ठभूमि — शीत युद्ध की समाप्ति ने अमेरिका एवं रूस (सोवियत संघ के उत्तराधिकारी) को अपने विशाल एवं महँगे परमाणु शस्त्रागार को घटाने का सुनहरा अवसर दिया, क्योंकि अब सीधा वैचारिक टकराव समाप्त हो चुका था।
(A) START-I (1991) एवं START-II (1993) संधियों के तहत अमेरिका एवं रूस ने अपने रणनीतिक परमाणु हथियारों की संख्या में भारी कटौती करने पर सहमति दी।
(B) मई 1995 में "परमाणु अप्रसार संधि" (NPT — Non-Proliferation Treaty) को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया गया (Indefinite Extension) — लेकिन भारत ने इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, क्योंकि यह संधि सिर्फ पाँच "मान्यता-प्राप्त" परमाणु शक्तियों (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन) को स्थायी रूप से परमाणु हथियार रखने की अनुमति देती है, जबकि बाकी दुनिया को हमेशा के लिए इससे वंचित रखती है — भारत ने इसे **"परमाणु रंगभेद" (Nuclear Apartheid)** कहकर इसकी कड़ी आलोचना की।
(C) 1996 में "व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि" (CTBT — Comprehensive Test Ban Treaty) पेश हुई, जिस पर भी भारत ने हस्ताक्षर नहीं किए, क्योंकि इससे भारत की भविष्य की सामरिक परीक्षण क्षमता स्थायी रूप से सीमित हो जाती।
भारत का निर्णायक कदम — पोखरण-II (11 व 13 मई 1998)
इसी असमान वैश्विक परमाणु व्यवस्था के जवाब में भारत ने अपनी सामरिक स्वायत्तता को दृढ़ता से स्थापित करने का फैसला किया। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में, DRDO (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) तथा BARC (भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र) की संयुक्त टीम ने "ऑपरेशन शक्ति" (Operation Shakti) के तहत 11 मई 1998 को तीन तथा 13 मई 1998 को दो — कुल पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए। इसके साथ ही भारत आधिकारिक रूप से परमाणु शक्ति-संपन्न देश (Nuclear Weapon State) घोषित हो गया।
ये सभी ऐतिहासिक परीक्षण राजस्थान के जैसलमेर ज़िले के निकट, थार रेगिस्तान में स्थित पोखरण परीक्षण रेंज में हुए — यही वजह है कि भारत की सबसे बड़ी सामरिक उपलब्धियों में से एक सीधे राजस्थान की धरती से जुड़ी है। इससे पहले भी 18 मई 1974 को भारत ने यहीं "स्माइलिंग बुद्धा" (Pokhran-I) नामक पहला परमाणु परीक्षण किया था।
◆ START-I/II ◆ NPT ◆ परमाणु रंगभेद ◆ CTBT ◆ पोखरण-II ◆ ऑपरेशन शक्ति ◆ DRDO ◆ BARC ◆ असैन्य परमाणु समझौता
पृष्ठभूमि — जैसे-जैसे दुनिया दो महाशक्ति-गुटों के कठोर बंधन से मुक्त हुई, विभिन्न क्षेत्रों के देशों ने अपने साझा आर्थिक एवं रणनीतिक हितों के लिए क्षेत्रीय संगठनों को कहीं अधिक गहरा एवं मज़बूत बनाना शुरू किया।
यूरोप में — 7 फरवरी 1992 को "मास्ट्रिष्ट संधि" (Maastricht Treaty, औपचारिक नाम: Treaty on European Union) पर हस्ताक्षर हुए, जो 1 नवंबर 1993 से प्रभावी हुई। इसी संधि से आधुनिक "यूरोपीय संघ" (European Union) का औपचारिक जन्म हुआ, जिसने साझा यूरोपीय नागरिकता, साझा मुद्रा "यूरो" (आगे चलकर 1999/2002 में लागू) एवं साझा विदेश-सुरक्षा नीति की बुनियाद रखी (विस्तार से अध्याय 13 में)।
दक्षिण-पूर्व एशिया में — 1967 में बना "आसियान" (ASEAN — Association of Southeast Asian Nations) शीत युद्धोत्तर दौर में तेज़ी से फैला। ब्रुनेई (1984), वियतनाम (1995), लाओस एवं म्यांमार (1997) तथा कंबोडिया (1999) के जुड़ने से आसियान का 10-सदस्यीय स्वरूप पूरा हुआ। 1992 में "आसियान मुक्त व्यापार क्षेत्र" (AFTA — ASEAN Free Trade Area) की स्थापना हुई, जिसने क्षेत्रीय व्यापार बाधाओं को घटाया।
| संगठन | स्थापना/मुख्य संधि | सदस्य विस्तार (शीत युद्धोत्तर काल) |
|---|---|---|
| यूरोपीय संघ (EU) | मास्ट्रिष्ट संधि — 7 फरवरी 1992 | 1995 में ऑस्ट्रिया-स्वीडन-फिनलैंड, 2004 में 10 पूर्वी यूरोपीय देश शामिल |
| आसियान (ASEAN) | स्थापना 1967, AFTA — 1992 | ब्रुनेई(1984), वियतनाम(1995), लाओस-म्यांमार(1997), कंबोडिया(1999) |
भारत को 1992 में आसियान का "क्षेत्रीय संवाद भागीदार" (Sectoral Dialogue Partner) का दर्जा मिला, जो लुक ईस्ट नीति की सीधी उपज थी — यह 1996 में "पूर्ण संवाद भागीदार" (Full Dialogue Partner) एवं 2002 से शिखर-स्तरीय साझेदारी (Summit-level Partnership) में बदल गया।
वर्तमान महत्व — आज यूरोपीय संघ भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है, और भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर 2025-26 में बातचीत अंतिम एवं निर्णायक चरण में है। इसी तरह आसियान के साथ भारत का व्यापार एवं रणनीतिक जुड़ाव "एक्ट ईस्ट नीति" के तहत लगातार गहरा हो रहा है (विस्तार से अध्याय 13 एवं 17 में)।
◆ मास्ट्रिष्ट संधि ◆ यूरोपीय संघ ◆ आसियान ◆ AFTA ◆ एशियाई वित्तीय संकट 1997 ◆ चियांग माई पहल ◆ भारत-EU FTA
पृष्ठभूमि — शीत युद्ध की समाप्ति ने दुनिया को एक ऐसे दौर में धकेल दिया जहाँ पूँजी, वस्तुएँ, सेवाएँ, सूचना एवं लोग पहले से कहीं ज़्यादा आसानी से सीमाओं के पार आने-जाने लगे — इसे "वैश्वीकरण" (Globalization) कहा जाता है। सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्रांति, इंटरनेट का प्रसार एवं सस्ती हवाई/समुद्री यातायात ने इस प्रक्रिया को और तेज़ किया।
(A) 1994 में "मारकेश समझौता" (Marrakesh Agreement) के तहत GATT (सामान्य व्यापार एवं शुल्क समझौता) को बदलकर 1 जनवरी 1995 से "विश्व व्यापार संगठन" (WTO — World Trade Organization) की स्थापना हुई, जिसने वैश्विक व्यापार के नियम कहीं अधिक व्यवस्थित रूप में तय किए (विस्तार से अध्याय 12 में)।
(B) बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) का विस्तार तेज़ हुआ, तथा पूँजी प्रवाह (Capital Flow) पर लगे प्रतिबंध कई देशों ने ढीले किए।
(C) IMF एवं विश्व बैंक ने कर्ज़ देने की शर्त के रूप में विकासशील देशों में "संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम" (Structural Adjustment Programmes) लागू करवाए।
भारत की भूमिका — भारत WTO का संस्थापक सदस्य (1995) बना और उसी दौर में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में बेंगलुरु एवं हैदराबाद वैश्विक आउटसोर्सिंग हब के रूप में उभरे। राजस्थान जैसे राज्यों में भी वैश्वीकरण का सीधा असर दिखा — जयपुर का रत्न-आभूषण एवं वस्त्र निर्यात, तथा मारवाड़ी व्यापारिक समुदाय का वैश्विक कारोबारी नेटवर्क इसी दौर में और मज़बूत हुआ।
| वैश्वीकरण के लाभ | वैश्वीकरण की चुनौतियां |
|---|---|
| ✓ पूँजी एवं तकनीक का आसान प्रवाह | ✗ आर्थिक असमानता में वृद्धि |
| ✓ रोज़गार के नए अवसर (जैसे IT/BPO क्षेत्र) | ✗ स्थानीय उद्योगों पर प्रतिस्पर्धी दबाव |
| ✓ उपभोक्ताओं के लिए सस्ते एवं विविध उत्पाद | ✗ सांस्कृतिक एकरूपता (Homogenization) का खतरा |
| ✓ ज्ञान एवं सूचना का तीव्र आदान-प्रदान | ✗ वैश्विक आर्थिक झटकों का तेज़ी से फैलना (जैसे 2008 का संकट) |
◆ वैश्वीकरण ◆ GATT ◆ WTO ◆ मारकेश समझौता ◆ MNCs ◆ संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम ◆ डीग्लोबलाइज़ेशन ◆ लिबरेशन डे शुल्क ◆ मेक इन इंडिया
पृष्ठभूमि — 1990-91 के खाड़ी युद्ध ने भारत की अर्थव्यवस्था को तिहरी चोट दी — तेल आयात बिल बढ़ा, खाड़ी से भारतीय श्रमिकों की प्रेषण राशि रुकी, और वैश्विक निवेशकों का भरोसा डगमगाया। इसके अलावा वर्षों से चली आ रही राजकोषीय अनुशासनहीनता एवं "लाइसेंस राज" (License Raj) की अक्षमताएँ पहले से मौजूद थीं।
जून 1991 तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार गिरकर लगभग 1.2 अरब डॉलर रह गया था — यानी मुश्किल से दो-तीन हफ्तों के आयात लायक। भारत भुगतान संतुलन (Balance of Payments) के गंभीर संकट में फँस गया एवं अंतर्राष्ट्रीय दायित्व चुकाने में चूक (Default) की कगार पर पहुँच गया।
जून 1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने और उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री नियुक्त किया। 24 जुलाई 1991 को मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक बजट पेश किया, जिसे "युगांतरकारी बजट" (Epochal Budget) कहा जाता है — इसने तीन स्तंभों पर आधारित सुधार एजेंडा प्रस्तुत किया, जिसे संक्षेप में "LPG सुधार" कहा जाता है।
| स्तंभ | अर्थ | मुख्य कदम |
|---|---|---|
| उदारीकरण (Liberalization) | सरकारी नियंत्रण एवं प्रतिबंधों में कमी | लाइसेंस राज को समाप्त करना, अधिकांश उद्योगों को लाइसेंस-मुक्त (De-licensing) करना |
| निजीकरण (Privatization) | सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका घटाना | सार्वजनिक उपक्रमों के लिए आरक्षित क्षेत्रों को सीमित करना, विनिवेश (Disinvestment) की शुरुआत |
| वैश्वीकरण (Globalization) | वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ाव | रुपये का लगभग 18-19% अवमूल्यन (Devaluation), विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के लिए द्वार खोलना, विदेश निवेश प्रोत्साहन बोर्ड (FIPB) की स्थापना |
उदारीकरण के बाद राजस्थान में निजी निवेश तेज़ी से बढ़ा — RIICO (राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम) के माध्यम से नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित हुए, तथा जयपुर का रत्न-आभूषण उद्योग एवं कोटा का वस्त्र-उद्योग वैश्विक निर्यात बाज़ार से सीधे जुड़ गए।
वर्तमान महत्व — 1991 के सुधारों की नींव पर आज भारत विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। 2025-26 में जारी वैश्विक व्यापार-युद्ध एवं शुल्क-बाधाओं (देखें टॉपिक 10) के दौर में भी भारत "आत्मनिर्भर भारत" एवं PLI योजनाओं के ज़रिए 1991 की उदारीकरण भावना को नई चुनौतियों के अनुरूप ढाल रहा है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि — क्यों संभव हुए ऐसे कठोर सुधार?
यह भी समझना ज़रूरी है कि 1991 में नरसिम्हा राव की सरकार लोकसभा में बहुमत से कम सीटों वाली "अल्पमत सरकार" (Minority Government) थी, फिर भी उन्होंने राजनीतिक साहस दिखाते हुए ऐसे कठोर आर्थिक सुधार लागू किए जिनका औद्योगिक घरानों, ट्रेड यूनियनों एवं यहाँ तक कि उनकी अपनी पार्टी के भीतर भी विरोध था। इतिहासकार इसे भारतीय राजनीति के सबसे साहसी नीतिगत फैसलों में से एक मानते हैं, क्योंकि संकट को अवसर में बदलने का यह प्रयास सफल रहा।
◆ भुगतान संतुलन संकट ◆ युगांतरकारी बजट 1991 ◆ LPG सुधार ◆ लाइसेंस राज ◆ रुपये का अवमूल्यन ◆ FIPB ◆ RIICO ◆ अल्पमत सरकार 1991
पृष्ठभूमि — स्वतंत्रता (1947) के बाद से भारत ने पंडित नेहरू के नेतृत्व में "गुटनिरपेक्षता" (Non-Alignment) की नीति अपनाई थी — यानी अमेरिकी एवं सोवियत, दोनों गुटों से औपचारिक सैन्य गठबंधन से दूर रहना। लेकिन जब 1991 में दोनों गुटों में से एक (सोवियत संघ) ही खत्म हो गया, तो गुटनिरपेक्षता की मूल अवधारणा अपने आप अप्रासंगिक होने लगी — आखिर किस "गुट" से निरपेक्ष रहा जाए, जब एक गुट बचा ही न हो?
इस निर्वात (Vacuum) में भारत ने धीरे-धीरे "रणनीतिक स्वायत्तता" (Strategic Autonomy) की नीति अपनाई — यानी औपचारिक गुट में शामिल हुए बिना, अपने राष्ट्रीय हित के अनुसार अलग-अलग शक्तियों से व्यापक जुड़ाव रखना। इसी दौर (1991-92) में नरसिम्हा राव सरकार ने "लुक ईस्ट नीति" (Look East Policy) शुरू की, ताकि सोवियत संघ के कमज़ोर पड़ने से बने रणनीतिक-आर्थिक शून्य को दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ जुड़ाव बढ़ाकर भरा जा सके।
भारत ने रूस के साथ 1971 की "भारत-सोवियत मैत्री संधि" की विरासत को नए रूप में जारी रखा।
साथ ही अमेरिका के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए — जो आगे चलकर 2005 के भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते (Civil Nuclear Deal) तक पहुँचे।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) औपचारिक रूप से आज भी अस्तित्व में है, परंतु शीत युद्धोत्तर दौर में इसकी वैश्विक प्रासंगिकता काफी कम हो गई।
सोवियत संघ के विघटन से भारत का सबसे बड़ा रक्षा-आपूर्तिकर्ता एवं व्यापारिक साझेदार अस्थिर हो गया था — ऐसे में नरसिम्हा राव सरकार ने सिंगापुर, थाईलैंड, मलेशिया जैसे आसियान (ASEAN) देशों से आर्थिक एवं रणनीतिक जुड़ाव बढ़ाना शुरू किया, जो 2014 के बाद "एक्ट ईस्ट नीति" (Act East Policy) में और सशक्त रूप ले चुका है (विस्तार से अध्याय 17 में)।
| गुटनिरपेक्षता (शीत युद्ध काल) | रणनीतिक स्वायत्तता / बहु-संरेखण (वर्तमान) |
|---|---|
| ✓ दो स्पष्ट महाशक्ति-गुटों से दूरी | ✗ कई शक्तियों से एक साथ गहरा जुड़ाव (जैसे अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान) |
| ✓ वैचारिक स्वतंत्रता पर बल | ✗ मुद्दा-आधारित साझेदारी (Issue-based partnerships) |
| ✓ NAM मंच केंद्रीय भूमिका में | ✗ QUAD, BRICS, SCO जैसे कई मंचों में एक साथ सदस्यता |
वर्तमान महत्व — आज (2025-26) भारत की यह "बहु-संरेखित" (Multi-aligned) विदेश नीति साफ दिखती है — भारत एक तरफ अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया के साथ QUAD में है, तो दूसरी तरफ रूस, चीन के साथ BRICS एवं शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भी सक्रिय है। रूस-यूक्रेन युद्ध (2022-वर्तमान) पर भारत का "तटस्थ किंतु संलग्न" रुख — रूस से रियायती दर पर तेल खरीदना, साथ ही अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग गहरा करना — रणनीतिक स्वायत्तता की नीति का सबसे स्पष्ट वर्तमान उदाहरण है।
◆ गुटनिरपेक्षता ◆ रणनीतिक स्वायत्तता ◆ बहु-संरेखण ◆ लुक ईस्ट नीति ◆ NAM ◆ भारत-सोवियत मैत्री संधि ◆ भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता
पृष्ठभूमि — पिछले कुछ वर्षों में विश्लेषक इस बात पर एकमत हो रहे हैं कि अमेरिका का "एकध्रुवीय क्षण" (Unipolar Moment) अब समाप्ति की ओर है। यह कोई अचानक हुआ बदलाव नहीं, बल्कि 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से धीरे-धीरे बन रहे रुझान का परिणाम है, जो अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
भारत की भूमिका — भारत आज बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में "वैश्विक दक्षिण" (Global South) की सशक्त आवाज़ के रूप में उभरा है। भारत की G-20 अध्यक्षता (2023) के दौरान अफ्रीकी संघ को G-20 का स्थायी सदस्य बनवाना इसी दिशा में एक बड़ा कदम था (विस्तार से अध्याय 14 में)। म्यूनिख सुरक्षा सर्वेक्षण 2025 के अनुसार, भारत, ब्राज़ील, चीन एवं दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में बड़ी संख्या में लोग मानते हैं कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था विकासशील देशों के हितों की बेहतर पूर्ति करेगी — जबकि G-7 देशों में इसे लेकर चिंता ज़्यादा है। यह वैश्विक जनमत में आ रहे बड़े बदलाव को दर्शाता है।
◆ बहुध्रुवीकरण ◆ म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन 2025 ◆ BRICS विस्तार ◆ BRICS अध्यक्षता भारत 2026 ◆ 18वां BRICS शिखर सम्मेलन ◆ लिबरेशन डे शुल्क ◆ वैश्विक दक्षिण